सभा पर्व · अध्याय 55
इन्द्र की प्रार्थना और नरकासुर का वध
भीष्म बताते हैं कि कृष्ण मथुरा छोड़कर द्वारका आ गए, और पृथ्वी का पुत्र, प्राग्ज्योतिषपुर का स्वामी नरकासुर — जिसकी रक्षा हयग्रीव, निकुम्भ, पञ्चजन और मुर करते थे — देवताओं को सताने लगा और उसने अदिति के कुण्डल छीन लिए। इन्द्र यादवों की सुधर्मा सभा में आते हैं, वृष्णि और अन्धक प्रमुखों को गले लगाते हैं और कृष्ण से नरक को मारने की प्रार्थना करते हैं। गरुड़ पर सवार होकर कृष्ण मुर के पाशों को काटते हैं, मुर, निशुम्भ, हयग्रीव और विरूपाक्ष को मारते हैं, और प्राग्ज्योतिष में चक्र से नरक का सिर काट देते हैं। पृथ्वी कुण्डल सौंपकर उनसे अपने पुत्र की प्रजा की रक्षा करने को कहती है, और कृष्ण समझाते हैं कि नरक का वध क्यों आवश्यक था।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.55.1)
शूरसेनपुरं त्यक्त्वा ततो यादवनन्दनः । द्वारकां भगवान्कृष्णः प्रत्यपद्यत भारत ॥
śūrasenapuraṃ tyaktvā tato yādavanandanaḥ | dvārakāṃ bhagavānkṛṣṇaḥ pratyapadyata bhārata
हे भारत! तब यादवों को आनन्द देने वाले भगवान् कृष्ण शूरसेनों की नगरी (मथुरा) छोड़कर द्वारका में जा बसे।
श्लोक 2 (2.55.2)
ततो महात्मा यानानि रत्नानि विविधानि च । यथार्हं पुण्डरीकाक्षो नैर्ऋतात्प्रत्यपद्यत ॥
tato mahātmā yānāni ratnāni vividhāni ca | yathārhaṃ puṇḍarīkākṣo nairṛtātpratyapadyata
वहाँ उन कमलनयन महात्मा ने नैर्ऋत (राक्षस) से यथोचित रूप से अनेक प्रकार के वाहन और रत्न प्राप्त किए।
श्लोक 3 (2.55.3)
तत्र विघ्नं चरन्ति स्म दैतेयाः सहदानवैः । ताञ्जघान महाबाहुर्वरमत्तान्महासुरान् ॥
tatra vighnaṃ caranti sma daiteyāḥ sahadānavaiḥ | tāñjaghāna mahābāhurvaramattānmahāsurān
वहाँ दैत्य दानवों के साथ मिलकर विघ्न डालते फिरते थे; वरदान के मद में चूर उन महान् असुरों को महाबाहु कृष्ण ने मार डाला।
श्लोक 4 (2.55.4)
स विघ्नमकरोत्तत्र नरको नाम नैर्ऋतः । अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थं युधिष्ठिर ॥
sa vighnamakarottatra narako nāma nairṛtaḥ | aditiṃ dharṣayāmāsa kuṇḍalārthaṃ yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! वहाँ नरक नाम का एक नैर्ऋत (राक्षस) विघ्न डालने लगा। उसने कुण्डलों के लिए अदिति पर आक्रमण किया।
श्लोक 5 (2.55.5)
न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत्पुरा । कृतपूर्वं महाघोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥
na cāsuragaṇaiḥ sarvaiḥ sahitaiḥ karma tatpurā | kṛtapūrvaṃ mahāghoraṃ yadakārṣīnmahāsuraḥ
उस महान् असुर ने जैसा अत्यन्त घोर कर्म किया, वैसा पहले सारे असुर-गण मिलकर भी कभी नहीं कर पाए थे।
श्लोक 6 (2.55.6)
यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम् । विषयान्तपालाश्चत्वारो यस्यासन्युद्धदुर्मदाः ॥
yaṃ mahī suṣuve devī yasya prāgjyotiṣaṃ puram | viṣayāntapālāścatvāro yasyāsanyuddhadurmadāḥ
देवी पृथ्वी ने उसे जन्म दिया था और प्राग्ज्योतिष उसका नगर था। उसके राज्य की सीमाओं के चार रक्षक थे, जो युद्ध में उन्मत्त रहते थे,
श्लोक 7 (2.55.7)
आदेवयानमावृत्य पन्थानं पर्यवस्थिताः । त्रासनाः सुरसङ्घानां विरूपै राक्षसैः सह ॥
ādevayānamāvṛtya panthānaṃ paryavasthitāḥ | trāsanāḥ surasaṅghānāṃ virūpai rākṣasaiḥ saha
जो देवयान तक का मार्ग घेरकर डटे रहते थे और विकराल राक्षसों के साथ देव-समूहों को त्रास देते थे —
श्लोक 8 (2.55.8)
हयग्रीवो निकुम्भश्च घोरः पञ्चजनस्तदा । मुरः पुत्रसहस्रैश्च वरमत्तो महासुरः ॥
hayagrīvo nikumbhaśca ghoraḥ pañcajanastadā | muraḥ putrasahasraiśca varamatto mahāsuraḥ
हयग्रीव, निकुम्भ, भयंकर पञ्चजन, और अपने हजारों पुत्रों के साथ वरदान के मद में चूर महान् असुर मुर।
श्लोक 9 (2.55.9)
तद्वधार्थं महाबाहुरेष चक्रगदासिभृत् । जातो वृष्णिषु देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः ॥
tadvadhārthaṃ mahābāhureṣa cakragadāsibhṛt | jāto vṛṣṇiṣu devakyāṃ vāsudevo janārdanaḥ
उनके विनाश के लिए ही चक्र, गदा और खड्ग धारण करने वाले ये महाबाहु वासुदेव जनार्दन वृष्णिवंश में देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए।
श्लोक 10 (2.55.10)
तस्यास्य पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः । निवासो द्वारकायां तु विदितो वः प्रधानतः ॥
tasyāsya puruṣendrasya lokaprathitatejasaḥ | nivāso dvārakāyāṃ tu vidito vaḥ pradhānataḥ
लोक-विख्यात तेज वाले इन पुरुषश्रेष्ठ का निवास द्वारका में है, यह आप सब भली-भाँति जानते हैं।
श्लोक 11 (2.55.11)
अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात् । अतिवैराजमप्यद्धा प्रत्यक्षस्ते युधिष्ठिर ॥
atīva hi purī ramyā dvārakā vāsavakṣayāt | ativairājamapyaddhā pratyakṣaste yudhiṣṭhira
द्वारका नगरी इन्द्र की पुरी से भी अधिक रमणीय है; हे युधिष्ठिर, वह सचमुच विराज-लोक से भी बढ़कर है, यह तुमने अपनी आँखों से देखा है।
श्लोक 12 (2.55.12)
तस्मिन्देवपुरप्रख्ये सा सभा वृष्ण्युपाश्रया । सुधर्मेति च विख्याता योजनायतविस्तृता ॥
tasmindevapuraprakhye sā sabhā vṛṣṇyupāśrayā | sudharmeti ca vikhyātā yojanāyatavistṛtā
देवताओं के नगर जैसी उस पुरी में वृष्णियों की आश्रय-स्थली वह सभा है, जो सुधर्मा नाम से विख्यात है और एक योजन लम्बी-चौड़ी है।
श्लोक 13 (2.55.13)
तत्र वृष्ण्यन्धकाः सर्वे रामकृष्णपुरोगमाः । लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ॥
tatra vṛṣṇyandhakāḥ sarve rāmakṛṣṇapurogamāḥ | lokayātrāmimāṃ kṛtsnāṃ parirakṣanta āsate
वहाँ बलराम और कृष्ण के नेतृत्व में सभी वृष्णि और अन्धक बैठकर इस सम्पूर्ण लोक-व्यवहार की रक्षा करते हैं।
श्लोक 14 (2.55.14)
तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद्भरतर्षभ । दिव्यगन्धा ववुर्वाताः कुसुमानां च वृष्टयः ॥
tatrāsīneṣu sarveṣu kadācidbharatarṣabha | divyagandhā vavurvātāḥ kusumānāṃ ca vṛṣṭayaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! एक बार जब वे सब वहाँ बैठे थे, तब दिव्य सुगन्ध वाली वायु बहने लगी और फूलों की वर्षा होने लगी।
श्लोक 15 (2.55.15)
ततः सूर्यसहस्राभस्तेजोराशिर्महाद्भुतः । मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डरं गजमास्थितः ॥
tataḥ sūryasahasrābhastejorāśirmahādbhutaḥ | madhye tu tejasastasya pāṇḍaraṃ gajamāsthitaḥ
तब हजार सूर्यों जैसी आभा वाला एक अद्भुत तेजपुंज प्रकट हुआ; और उस तेज के बीच, श्वेत हाथी पर आरूढ़,
श्लोक 16 (2.55.16)
वृतो देवगणैः सर्वैर्वासवः प्रत्यदृश्यत । रामकृष्णौ च राजा च वृष्ण्यन्धकगणैः सह ॥
vṛto devagaṇaiḥ sarvairvāsavaḥ pratyadṛśyata | rāmakṛṣṇau ca rājā ca vṛṣṇyandhakagaṇaiḥ saha
सब देव-गणों से घिरे इन्द्र दिखाई दिए। बलराम, कृष्ण और राजा उग्रसेन, वृष्णि और अन्धक गणों के साथ,
श्लोक 17 (2.55.17)
उत्पत्य सहसा देवे नमस्कारमकुर्वत । सोऽवतीर्य गजात्तूर्णं परिष्वज्य जनार्दनम् ॥
utpatya sahasā deve namaskāramakurvata | so'vatīrya gajāttūrṇaṃ pariṣvajya janārdanam
तुरन्त उठ खड़े हुए और उन्होंने देवराज को नमस्कार किया। इन्द्र ने शीघ्र हाथी से उतरकर जनार्दन को गले लगाया,
श्लोक 18 (2.55.18)
सस्वजे बलदेवं च राजानं च तमाहुकम् । वसुदेवोद्धवौ चैव विकद्रुं च महामतिम् ॥
sasvaje baladevaṃ ca rājānaṃ ca tamāhukam | vasudevoddhavau caiva vikadruṃ ca mahāmatim
और बलदेव तथा राजा आहुक को भी गले लगाया; फिर वसुदेव और उद्धव, बुद्धिमान् विकद्रु,
श्लोक 19 (2.55.19)
प्रद्युम्नसाम्बनिशठाननिरुद्धं च सात्यकिम् । गदं सारणमक्रूरं भानुझल्लिविडूरथान् ॥
pradyumnasāmbaniśaṭhānaniruddhaṃ ca sātyakim | gadaṃ sāraṇamakrūraṃ bhānujhalliviḍūrathān
प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध और सात्यकि, गद, सारण, अक्रूर, भानु, झल्लि और विडूरथ,
श्लोक 20 (2.55.20)
तथैव कृतवर्माणं चारुदेष्णं महाबलम् । देवकल्पान्महाराज तान्दाशार्हपुरोगमान् ॥
tathaiva kṛtavarmāṇaṃ cārudeṣṇaṃ mahābalam | devakalpānmahārāja tāndāśārhapurogamān
इसी प्रकार कृतवर्मा और महाबली चारुदेष्ण को भी — हे महाराज, दाशार्हों के अग्रणी उन देवतुल्य पुरुषों को।
श्लोक 21 (2.55.21)
परिष्वज्य च दृष्ट्वा च भगवान्भूतभावनः । वृष्ण्यन्धकमहामात्रान्परिष्वज्याथ वासवः ॥
pariṣvajya ca dṛṣṭvā ca bhagavānbhūtabhāvanaḥ | vṛṣṇyandhakamahāmātrānpariṣvajyātha vāsavaḥ
उन्हें गले लगाकर और देखकर, प्राणियों के पालक भगवान् इन्द्र ने वृष्णि और अन्धकों के प्रधान पुरुषों का आलिंगन किया,
श्लोक 22 (2.55.22)
प्रगृह्य पूजां तैर्दत्तां भगवान्पाकशासनः । सोऽदितेर्वचनात्तात कुण्डलार्थे जनार्दनम् ॥
pragṛhya pūjāṃ tairdattāṃ bhagavānpākaśāsanaḥ | so'ditervacanāttāta kuṇḍalārthe janārdanam
और पाकशासन भगवान् इन्द्र ने उनकी दी हुई पूजा स्वीकार की। फिर, तात, अदिति के कहने पर कुण्डलों के लिए जनार्दन से
श्लोक 23 (2.55.23)
उवाच परमप्रीतो जहि भौमं नरेश्वर ॥
uvāca paramaprīto jahi bhaumaṃ nareśvara
अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा — "हे नरेश्वर, भौम (नरक) का वध कीजिए।"
श्लोक 24 (2.55.24)
तमुवाच महाबाहुः प्रियमाणो जनार्दनः । निहत्य नरकं भौममाहरिष्यामि कुण्डले ॥
tamuvāca mahābāhuḥ priyamāṇo janārdanaḥ | nihatya narakaṃ bhaumamāhariṣyāmi kuṇḍale
प्रसन्न होकर महाबाहु जनार्दन ने उनसे कहा — "मैं भौम नरक का वध करके कुण्डल ले आऊँगा।"
श्लोक 25 (2.55.25)
एवमुक्त्वाऽथ गोविन्दो राममेवाभ्यभाषत । प्रद्युम्नमनिरुद्धं च साम्बं चाप्रतिमं बले ॥
evamuktvā'tha govindo rāmamevābhyabhāṣata | pradyumnamaniruddhaṃ ca sāmbaṃ cāpratimaṃ bale
यह कहकर गोविन्द ने बलराम से, तथा प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और अनुपम बलशाली साम्ब से बात की।
श्लोक 26 (2.55.26)
एतांश्चोक्त्वा तथा तत्र वासुदेवो महायशाः । अथारुह्य सुपर्णं वै शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥
etāṃścoktvā tathā tatra vāsudevo mahāyaśāḥ | athāruhya suparṇaṃ vai śaṅkhacakragadāsibhṛt
उनसे वहाँ इस प्रकार कहकर महायशस्वी वासुदेव शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण किए गरुड़ पर सवार हुए,
श्लोक 27 (2.55.27)
ययौ तदा हृषीकेशो देवानां हितकाम्यया । तं प्रयान्तममित्रघ्नं देवाः सहपुरन्दराः ॥
yayau tadā hṛṣīkeśo devānāṃ hitakāmyayā | taṃ prayāntamamitraghnaṃ devāḥ sahapurandarāḥ
और हृषीकेश देवताओं के हित की कामना से चल पड़े। शत्रुनाशक कृष्ण को जाते देख इन्द्र सहित देवता
श्लोक 28 (2.55.28)
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीत्या स्तुवन्तो विष्णुमच्युतम् । उग्रान्रक्षोगणान्हत्वा नरकस्य महासुरान् ॥
pṛṣṭhato'nuyayuḥ prītyā stuvanto viṣṇumacyutam | ugrānrakṣogaṇānhatvā narakasya mahāsurān
प्रेमपूर्वक अच्युत विष्णु की स्तुति करते हुए उनके पीछे-पीछे चले। नरक के भयंकर राक्षस-गणों, उसके महान् असुरों को मारकर
श्लोक 29 (2.55.29)
क्षुरान्तान्मौरवान्पाशान्षट्सहस्रं ददर्श सः । सञ्छिद्य पाशाञ्छस्त्रेण मुरं हत्वा सहान्वयम् ॥
kṣurāntānmauravānpāśānṣaṭsahasraṃ dadarśa saḥ | sañchidya pāśāñchastreṇa muraṃ hatvā sahānvayam
उन्होंने मुर के छुरे जैसी धार वाले छह हजार पाश देखे। शस्त्र से उन पाशों को काटकर और मुर को उसके वंश सहित मारकर,
श्लोक 30 (2.55.30)
शैलसङ्घानतिक्रम्य निशुम्भं च व्यपोथयत् ॥
śailasaṅghānatikramya niśumbhaṃ ca vyapothayat
शिलाओं के समूहों को लाँघकर उन्होंने निशुम्भ को मार गिराया।
श्लोक 31 (2.55.31)
यः सहस्रसमस्त्वेकः सर्वान्देवानपोथयत् । तं जघान महावीर्यं हयग्रीवं महाबलम् ॥
yaḥ sahasrasamastvekaḥ sarvāndevānapothayat | taṃ jaghāna mahāvīryaṃ hayagrīvaṃ mahābalam
जो अकेला ही हजारों के बराबर था और जिसने सब देवताओं को पछाड़ दिया था, उस महापराक्रमी, महाबली हयग्रीव को उन्होंने मार डाला।
श्लोक 32 (2.55.32)
अपारतेजा दुर्धर्षः सर्वयादवनन्दनः । मध्ये लोहितगङ्गायां भगवान्देवकीसुतः ॥
apāratejā durdharṣaḥ sarvayādavanandanaḥ | madhye lohitagaṅgāyāṃ bhagavāndevakīsutaḥ
अपार तेजस्वी, अजेय, सब यादवों को आनन्द देने वाले देवकीनन्दन भगवान् ने लोहितगंगा के बीच
श्लोक 33 (2.55.33)
औदकायां विरूपाक्षं जघान मधुसूदनः । ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया । पुरमासादयामास तत्र युद्धमवर्तत ॥
audakāyāṃ virūpākṣaṃ jaghāna madhusūdanaḥ | tataḥ prāgjyotiṣaṃ nāma dīpyamānamiva śriyā | puramāsādayāmāsa tatra yuddhamavartata
औदका में मधुसूदन ने विरूपाक्ष को मारा। फिर वे शोभा से मानो जगमगाते प्राग्ज्योतिष नामक नगर में पहुँचे, और वहाँ युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 34 (2.55.34)
तद्युद्धमभवद्घोरं तेन भौमेन भारत । कुण्डलार्थे सुरेशस्य नरकेण महात्मना ॥
tadyuddhamabhavadghoraṃ tena bhaumena bhārata | kuṇḍalārthe sureśasya narakeṇa mahātmanā
हे भारत! देवराज के कुण्डलों के लिए उस भौम, महाबली नरक के साथ वह युद्ध बड़ा भयंकर हुआ।
श्लोक 35 (2.55.35)
मुहूर्तं लालयित्वा तु नरकं मधुसूदनः । प्रवृत्तचक्रं चक्रेण प्रममाथ बलाद्बली ॥
muhūrtaṃ lālayitvā tu narakaṃ madhusūdanaḥ | pravṛttacakraṃ cakreṇa pramamātha balādbalī
कुछ देर नरक के साथ खिलवाड़ करके बलवान् मधुसूदन ने चक्र घुमाते हुए नरक को अपने चक्र से बलपूर्वक मथ डाला।
श्लोक 36 (2.55.36)
चक्रप्रमथितं तस्य पपात सहसा भुवि । उत्तमाङ्गं हताङ्गस्य वृत्रे वज्रहते यथा ॥
cakrapramathitaṃ tasya papāta sahasā bhuvi | uttamāṅgaṃ hatāṅgasya vṛtre vajrahate yathā
चक्र से कटा हुआ उस मारे गए असुर का सिर सहसा भूमि पर गिर पड़ा, जैसे वज्र से मारे गए वृत्र का गिरा था।
श्लोक 37 (2.55.37)
भूमिस्तु पतितं दृष्ट्वा प्रायच्छत्कुण्डले सुतम् । प्रदाय च महाबाहुमिदं वचनमब्रवीत् ॥
bhūmistu patitaṃ dṛṣṭvā prāyacchatkuṇḍale sutam | pradāya ca mahābāhumidaṃ vacanamabravīt
अपने पुत्र को गिरा देखकर पृथ्वी ने कुण्डल दे दिए, और उन्हें सौंपकर महाबाहु कृष्ण से यह वचन कहा —
भूमिरुवाच
श्लोक 38 (2.55.38)
सृष्टस्त्वयैव मधुहंस्त्वयैव विनिपातितः । यथेच्छसि तथा क्रीडा प्रजास्तस्यानुपालय ॥
sṛṣṭastvayaiva madhuhaṃstvayaiva vinipātitaḥ | yathecchasi tathā krīḍā prajāstasyānupālaya
"हे मधुसूदन! आपने ही उसे रचा था और आपने ही उसे मार गिराया। आपकी लीला आपकी इच्छा के अनुसार है। उसकी प्रजा का पालन कीजिए।"
श्रीवासुदेव उवाच
श्लोक 39 (2.55.39)
देवानां च मुनीनां च पितॄणां च महात्मनाम् । उद्वेजनीयो भूतानां ब्रह्मद्विट् पुरुषाधमः ॥
devānāṃ ca munīnāṃ ca pitṝṇāṃ ca mahātmanām | udvejanīyo bhūtānāṃ brahmadviṭ puruṣādhamaḥ
"वह देवताओं, मुनियों, महात्मा पितरों और सभी प्राणियों को त्रास देने वाला, ब्राह्मणों का द्वेषी और अधम पुरुष था।
श्लोक 40 (2.55.40)
लोकद्विष्टः सुतस्ते तु देवारिर्लोककण्टकः । सर्वलोकनमस्कार्यामदितिं बाधयद्बली ॥
lokadviṣṭaḥ sutaste tu devārirlokakaṇṭakaḥ | sarvalokanamaskāryāmaditiṃ bādhayadbalī
तुम्हारा पुत्र संसार से द्वेष करने वाला, देवताओं का शत्रु और लोकों का काँटा था; उस बलवान् ने सब लोकों द्वारा वन्दनीय अदिति को सताया।
श्लोक 41 (2.55.41)
कुण्डले हृतवान्दर्पात्ततस्ते निहतः सुतः । नैव मन्युस्त्वया कार्यो यत्कृतं मयि भामिनि ॥
kuṇḍale hṛtavāndarpāttataste nihataḥ sutaḥ | naiva manyustvayā kāryo yatkṛtaṃ mayi bhāmini
उसने अहंकार में आकर उनके कुण्डल हर लिए, इसी कारण तुम्हारा पुत्र मारा गया। हे भामिनि! मैंने जो किया है, उस पर तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 42 (2.55.42)
त्वत्प्रभावाच्च ते पुत्रो लब्धवान्गतिमुत्तमाम् । तस्माद्गच्छ महाभागे भारावतरणं कृतम् ॥
tvatprabhāvācca te putro labdhavāngatimuttamām | tasmādgaccha mahābhāge bhārāvataraṇaṃ kṛtam
तुम्हारे ही प्रभाव से तुम्हारे पुत्र ने उत्तम गति पाई है। इसलिए हे महाभागे, अब जाओ; पृथ्वी का भार उतार दिया गया है।"