सभा पर्व · अध्याय 56
मणिपर्वत की कन्याएँ और अदिति के कुण्डलों की वापसी
नरक का वध करने के बाद कृष्ण उस असुर का अक्षय धन देखते हैं, और इन्द्र हाथी, घोड़े, गौएँ और सम्पत्ति द्वारका पहुँचाने का वचन देते हैं। मणिपर्वत पर नरक द्वारा बन्दी बनाई गई देवताओं और गन्धर्वों की कन्याएँ, जो व्रत और तप में लगी थीं, कृष्ण को उस पति के रूप में प्रणाम करती हैं जिसकी भविष्यवाणी नारद और वायुदेव ने की थी, और कृष्ण उनकी इच्छा स्वीकार करते हैं। कृष्ण पर्वत को उखाड़कर उसे, उन स्त्रियों और धन को गरुड़ पर रखते हैं, जो उन्हें स्वर्ग ले जाते हैं; वहाँ कृष्ण अदिति को कुण्डल लौटाते हैं, अदिति सत्यभामा को वर देती हैं कि जब तक कृष्ण पृथ्वी पर हैं वे वृद्ध नहीं होंगी, और कृष्ण द्वारका लौट आते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.56.1)
निहत्य नरकं भौमं सत्यभामासहायवान् । सहितो लोकपालैश्च ददर्श नरकालयम् ॥
nihatya narakaṃ bhaumaṃ satyabhāmāsahāyavān | sahito lokapālaiśca dadarśa narakālayam
भौम नरक का वध करके सत्यभामा के साथ और लोकपालों से घिरे हुए कृष्ण ने नरक का भवन देखा।
श्लोक 2 (2.56.2)
अथास्य गृहमासाद्य नरकस्य महात्मनः । ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥
athāsya gṛhamāsādya narakasya mahātmanaḥ | dadarśa dhanamakṣayyaṃ ratnāni vividhāni ca
उस महान् नरक के भवन में जाकर उन्होंने अक्षय धन और अनेक प्रकार के रत्न देखे —
श्लोक 3 (2.56.3)
मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यविकृतानि च । विस्ताराल्पांश्चार्कमणीन्विपुलान्स्फाटिकानपि ॥
maṇimuktāpravālāni vaiḍūryavikṛtāni ca | vistārālpāṃścārkamaṇīnvipulānsphāṭikānapi
मणि, मोती और मूँगे, वैदूर्य की बनी वस्तुएँ, छोटे-बड़े सूर्यकान्त मणि और बहुत-से स्फटिक;
श्लोक 4 (2.56.4)
जाम्बूनदमयान्येव शातकुम्भमयानि च । प्रदीप्तज्वलनाभानि शीतरश्मिप्रभाणि च ॥
jāmbūnadamayānyeva śātakumbhamayāni ca | pradīptajvalanābhāni śītaraśmiprabhāṇi ca
जाम्बूनद और शातकुम्भ सोने की बनी वस्तुएँ, जिनमें कुछ प्रज्वलित अग्नि जैसी चमकती थीं और कुछ चन्द्रमा जैसी आभा वाली थीं।
श्लोक 5 (2.56.5)
हिरण्यवर्णं रुचिरं श्वेतमभ्यन्तरं गृहम् । तदक्षय्यं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥
hiraṇyavarṇaṃ ruciraṃ śvetamabhyantaraṃ gṛham | tadakṣayyaṃ gṛhe dṛṣṭaṃ narakasya dhanaṃ bahu
भीतर का कक्ष सुनहरे रंग का, सुन्दर और उजला था; नरक के भवन में वह अक्षय और अपार धन दिखाई दिया।
श्लोक 6 (2.56.6)
न हि राज्ञः कुबेरस्य तावद्धनसमुच्छ्रयः । दृष्टपूर्वः पुरा साक्षान्महेन्द्रभवनेष्वपि ॥
na hi rājñaḥ kuberasya tāvaddhanasamucchrayaḥ | dṛṣṭapūrvaḥ purā sākṣānmahendrabhavaneṣvapi
धन का ऐसा ढेर पहले कभी नहीं देखा गया था — न स्वयं राजा कुबेर के यहाँ, न महेन्द्र के भवनों में।
श्लोक 7 (2.56.7)
हते भौमे निशुम्भे च वासवः सगणोऽब्रवीत् । दाशार्हपतिमासीनमाहृत्य मणिकुण्डले ॥
hate bhaume niśumbhe ca vāsavaḥ sagaṇo'bravīt | dāśārhapatimāsīnamāhṛtya maṇikuṇḍale
भौम और निशुम्भ के मारे जाने पर अपने गणों सहित इन्द्र ने मणिमय कुण्डल लाकर बैठे हुए दाशार्हपति कृष्ण से कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 8 (2.56.8)
हेमसूत्रा महाकक्ष्यास्तोमरैर्वीर्यशालिनः । विमलानि पताकानि वासांसि विविधानि च ॥
hemasūtrā mahākakṣyāstomarairvīryaśālinaḥ | vimalāni patākāni vāsāṃsi vividhāni ca
"सोने की साँकलों और बड़ी-बड़ी पेटियों से सजे, तोमरधारी योद्धाओं से युक्त पराक्रमी हाथी; निर्मल पताकाएँ और अनेक प्रकार के वस्त्र;
श्लोक 9 (2.56.9)
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवालविकृताः कुथाः । ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः ॥
bhīmarūpāśca mātaṅgāḥ pravālavikṛtāḥ kuthāḥ | te ca viṃśatisāhasrā dvistāvatyaḥ kareṇavaḥ
मूँगे से कढ़ी झूलों वाले भयानक रूप के बीस हजार हाथी, और उनसे दुगुनी हथिनियाँ;
श्लोक 10 (2.56.10)
अष्टौ शतसहस्राणि देशजाश्चोत्तमा हयाः । गोभिश्चाविकृतैर्यावत्कामात्तव जनार्दन ॥
aṣṭau śatasahasrāṇi deśajāścottamā hayāḥ | gobhiścāvikṛtairyāvatkāmāttava janārdana
आठ लाख उत्तम देशी घोड़े, और हे जनार्दन, जितनी आप चाहें उतनी निर्दोष गौएँ —
श्लोक 11 (2.56.11)
एतत्ते प्रापयिष्यामि वृष्ण्यावासमरिन्दम । वसु यत्त्रिषु लोकेषु धर्मेणावर्जितं त्वया ॥
etatte prāpayiṣyāmi vṛṣṇyāvāsamarindama | vasu yattriṣu lokeṣu dharmeṇāvarjitaṃ tvayā
हे शत्रुदमन! यह सब मैं वृष्णियों के निवास-स्थान तक पहुँचवा दूँगा — वह धन जो आपने तीनों लोकों में धर्मपूर्वक अर्जित किया है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (2.56.12)
देवगन्धर्वरत्नानि दैतेयासुरजानि च । यानि सन्ति हिरण्यानि नरकस्य निवेशने ॥
devagandharvaratnāni daiteyāsurajāni ca | yāni santi hiraṇyāni narakasya niveśane
देवताओं और गन्धर्वों के रत्न, दैत्यों और असुरों से प्राप्त रत्न, और नरक के भवन में जो भी सोना था,
श्लोक 13 (2.56.13)
एतत्तु गरुडे सर्वं क्षिप्रमारोप्य वासवः । दाशार्हपतिना सार्धमुपायान्मणिपर्वतम् ॥
etattu garuḍe sarvaṃ kṣipramāropya vāsavaḥ | dāśārhapatinā sārdhamupāyānmaṇiparvatam
यह सब इन्द्र ने शीघ्र गरुड़ पर लदवाया और दाशार्हपति कृष्ण के साथ मणिपर्वत पर गए।
श्लोक 14 (2.56.14)
चित्रग्रथितमेघाभः प्रबभौ मणिपर्वतः । हेमचित्रवितानैश्च प्रासादैरुपशोभितः ॥
citragrathitameghābhaḥ prababhau maṇiparvataḥ | hemacitravitānaiśca prāsādairupaśobhitaḥ
रंग-बिरंगे गुँथे हुए मेघ के समान वह मणिपर्वत शोभा पा रहा था; वह सोने से चित्रित चँदोवों वाले प्रासादों से सुशोभित था,
श्लोक 15 (2.56.15)
हर्म्याणि च विशालानि मणिसोपानवन्ति च । तत्रस्था वरवर्णिन्यो ददृशुर्मधुसूदनम् ॥
harmyāṇi ca viśālāni maṇisopānavanti ca | tatrasthā varavarṇinyo dadṛśurmadhusūdanam
और मणियों की सीढ़ियों वाले विशाल महलों से भी। वहाँ रहने वाली सुन्दर स्त्रियों ने मधुसूदन को देखा —
श्लोक 16 (2.56.16)
गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तदा । त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तमपराजितम् ॥
gandharvasuramukhyānāṃ priyā duhitarastadā | triviṣṭapasame deśe tiṣṭhantamaparājitam
वे गन्धर्वों और देवताओं के प्रमुखों की प्रिय पुत्रियाँ थीं; उन्होंने स्वर्ग के समान उस स्थान में खड़े अपराजित कृष्ण को देखा।
श्लोक 17 (2.56.17)
परिवव्रुर्महाबाहुमेकवेणीधराः स्त्रियः । सर्वाः काषायवासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥
parivavrurmahābāhumekaveṇīdharāḥ striyaḥ | sarvāḥ kāṣāyavāsinyaḥ sarvāśca niyatendriyāḥ
एक वेणी धारण करने वाली उन स्त्रियों ने महाबाहु कृष्ण को घेर लिया। वे सब गेरुए वस्त्र पहने थीं और सबने अपनी इन्द्रियों को वश में कर रखा था।
श्लोक 18 (2.56.18)
व्रतसन्तापजः शोको नात्र कश्चिदपीडयत् । अरजांसि च वासांसि बिभ्रत्यः कौशिकान्यपि ॥
vratasantāpajaḥ śoko nātra kaścidapīḍayat | arajāṃsi ca vāsāṃsi bibhratyaḥ kauśikānyapi
व्रतों के कष्ट से उत्पन्न शोक वहाँ किसी को पीड़ित नहीं करता था। वे निर्मल वस्त्र, रेशमी वस्त्र भी, धारण किए हुए थीं।
श्लोक 19 (2.56.19)
समेत्य यदुसिंहस्य चक्रुरस्याञ्जलिं स्त्रियः । ऊचुश्चैनं हृषीकेशं सर्वास्ताः कमलेक्षणाः ॥
sametya yadusiṃhasya cakrurasyāñjaliṃ striyaḥ | ūcuścainaṃ hṛṣīkeśaṃ sarvāstāḥ kamalekṣaṇāḥ
यदुसिंह कृष्ण के सामने आकर उन स्त्रियों ने हाथ जोड़े, और उन सब कमलनयनी स्त्रियों ने हृषीकेश से कहा —
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 20 (2.56.20)
नारदेन समाख्यातमस्माकं पुरुषोत्तम । आगमिष्यति गोविन्दः सुरकार्यार्थसिद्धये ॥
nāradena samākhyātamasmākaṃ puruṣottama | āgamiṣyati govindaḥ surakāryārthasiddhaye
"हे पुरुषोत्तम! नारद ने हमसे कहा था — 'देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए गोविन्द आएँगे।
श्लोक 21 (2.56.21)
सोऽसुरं नरकं हत्वा निशुम्भं मुरमेव च । भौमं च सपरीवारं हयग्रीवं च दानवम् ॥
so'suraṃ narakaṃ hatvā niśumbhaṃ murameva ca | bhaumaṃ ca saparīvāraṃ hayagrīvaṃ ca dānavam
वे असुर नरक, निशुम्भ और मुर को, परिवार सहित भौम को और दानव हयग्रीव को मारकर,
श्लोक 22 (2.56.22)
तथा पञ्चजनं चैव प्राप्स्यते धनमक्षयम् । सोऽचिरेणैव कालेन युष्मन्मोक्ता भविष्यति ॥
tathā pañcajanaṃ caiva prāpsyate dhanamakṣayam | so'cireṇaiva kālena yuṣmanmoktā bhaviṣyati
तथा पञ्चजन को भी मारकर अक्षय धन प्राप्त करेंगे; और शीघ्र ही वे तुम्हें मुक्त करने वाले होंगे।'
श्लोक 23 (2.56.23)
एवमुक्त्वागमद्धीरो देवर्षिर्नारदस्तथा । त्वां चिन्तयानाः सततं तपो घोरमुपास्महे ॥
evamuktvāgamaddhīro devarṣirnāradastathā | tvāṃ cintayānāḥ satataṃ tapo ghoramupāsmahe
यह कहकर धीर देवर्षि नारद चले गए। तब से हम निरन्तर आपका ध्यान करती हुई कठोर तप कर रही हैं।
श्लोक 24 (2.56.24)
कालेऽतीते महाबाहुं कदा द्रक्ष्याम माधवम् । इत्येवं हृदि सङ्कल्पं कृत्वा पुरुषसत्तम । तपश्चराम सततं रक्ष्यमाणा हि दानवैः ॥
kāle'tīte mahābāhuṃ kadā drakṣyāma mādhavam | ityevaṃ hṛdi saṅkalpaṃ kṛtvā puruṣasattama | tapaścarāma satataṃ rakṣyamāṇā hi dānavaiḥ
'समय बीतने पर हम महाबाहु माधव को कब देखेंगी?' हे पुरुषश्रेष्ठ! हृदय में यही संकल्प लेकर, दानवों के पहरे में रहती हुई भी, हम निरन्तर तप करती रहीं।
श्लोक 25 (2.56.25)
ततोऽस्मत्प्रियकामार्थं भगवान्मारुतोऽब्रवीत् । यथोक्तं नारदेनाथ न चिरात्तद्भविष्यति ॥
tato'smatpriyakāmārthaṃ bhagavānmāruto'bravīt | yathoktaṃ nāradenātha na cirāttadbhaviṣyati
फिर हमें प्रसन्न करने की इच्छा से भगवान् वायुदेव ने कहा — 'नारद ने जैसा कहा है, वह शीघ्र ही होगा।'"
भीष्म उवाच
श्लोक 26 (2.56.26)
तासां परमनारीणामृषभाक्षं पुरः स्थितम् । ददृशुर्देवगन्धर्वा गृष्टीनामिव गोपतिम् ॥
tāsāṃ paramanārīṇāmṛṣabhākṣaṃ puraḥ sthitam | dadṛśurdevagandharvā gṛṣṭīnāmiva gopatim
देवताओं और गन्धर्वों ने वृषभ जैसे नेत्रों वाले कृष्ण को उन श्रेष्ठ नारियों के सामने खड़े देखा, जैसे बछियों के बीच साँड़।
श्लोक 27 (2.56.27)
तस्य चन्द्रोपमं वक्त्रमुदीक्ष्य मुदितेन्द्रियाः । सम्प्रहृष्टा महाबाहुमिदं वचनमब्रुवन् ॥
tasya candropamaṃ vaktramudīkṣya muditendriyāḥ | samprahṛṣṭā mahābāhumidaṃ vacanamabruvan
उनका चन्द्रमा जैसा मुख देखकर, प्रसन्न इन्द्रियों वाली उन स्त्रियों ने अत्यन्त हर्षित होकर महाबाहु से यह वचन कहा —
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 28 (2.56.28)
सत्यव्रत पुरा वायुरिदमस्मानिहाब्रवीत् । सर्वभूतहितज्ञश्च महर्षिरपि नारदः ॥
satyavrata purā vāyuridamasmānihābravīt | sarvabhūtahitajñaśca maharṣirapi nāradaḥ
"हे सत्यव्रत! बहुत पहले वायुदेव ने यहाँ हमसे यह कहा था, और सब प्राणियों का हित जानने वाले महर्षि नारद ने भी —
श्लोक 29 (2.56.29)
विष्णुर्नारायणो देवः शङ्खचक्रगदासिभृत् । स भौमं नरकं हत्वा भर्ता वो भविता ध्रुवम् ॥
viṣṇurnārāyaṇo devaḥ śaṅkhacakragadāsibhṛt | sa bhaumaṃ narakaṃ hatvā bhartā vo bhavitā dhruvam
'शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करने वाले देव विष्णु नारायण भौम नरक को मारकर निश्चय ही तुम्हारे पति होंगे।'
श्लोक 30 (2.56.30)
दिष्ट्या तस्यर्षिमुख्यस्य नारदस्य महात्मनः । वचनादेव सत्यं नो भर्ता भवितुमर्हसि ॥
diṣṭyā tasyarṣimukhyasya nāradasya mahātmanaḥ | vacanādeva satyaṃ no bhartā bhavitumarhasi
हमारा सौभाग्य है! उन महात्मा ऋषिश्रेष्ठ नारद के वचन से ही आप सचमुच हमारे पति होने योग्य हैं।
श्लोक 31 (2.56.31)
यत्प्रियं बत पश्याम श्रुतं प्रियमरिन्दम । दर्शनेन कृतार्थाः स्मो वयमस्य महात्मनः ॥
yatpriyaṃ bata paśyāma śrutaṃ priyamarindama | darśanena kṛtārthāḥ smo vayamasya mahātmanaḥ
अहा! हे शत्रुदमन, जिस प्रिय की हमने कामना की थी उसे आज देख रही हैं, और जो सुना था वह भी प्रिय सिद्ध हुआ। इन महात्मा के दर्शन से ही हम कृतार्थ हो गईं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 32 (2.56.32)
उवाच हि यदुश्रेष्ठः सर्वास्ता जातमन्मथाः । यथा ब्रूत विशालाक्ष्यस्तत्सर्वं वो भविष्यति ॥
uvāca hi yaduśreṣṭhaḥ sarvāstā jātamanmathāḥ | yathā brūta viśālākṣyastatsarvaṃ vo bhaviṣyati
तब यदुश्रेष्ठ कृष्ण ने प्रेम से भरी उन सब स्त्रियों से कहा — "हे विशाल नेत्रों वाली स्त्रियो! तुम जैसा कहती हो, वह सब तुम्हारे लिए वैसा ही होगा।"
श्लोक 33 (2.56.33)
ततस्ता गरुडे सर्वाः सरत्नधनसञ्चयाः । क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे भगवान्देवकीसुतः ॥
tatastā garuḍe sarvāḥ saratnadhanasañcayāḥ | kṣipramāropayāñcakre bhagavāndevakīsutaḥ
फिर देवकीनन्दन भगवान् ने उन सबको उनके रत्नों और धन के संचय सहित शीघ्र गरुड़ पर चढ़ा दिया।
श्लोक 34 (2.56.34)
सपक्षिगणमातङ्गं सव्यालमृगपन्नगम् । शाखामृगगणैर्जुष्टं सप्रस्तरशिलातलम् ॥
sapakṣigaṇamātaṅgaṃ savyālamṛgapannagam | śākhāmṛgagaṇairjuṣṭaṃ saprastaraśilātalam
पक्षियों के झुंडों और हाथियों से युक्त, हिंसक पशुओं, मृगों और सर्पों से भरा, वानर-समूहों से सेवित, शिलाओं और चट्टानों वाला,
श्लोक 35 (2.56.35)
न्यङ्कुभिश्च वराहैश्च रुरुभिश्च निषेवितम् । सप्रपातमहासानुं विचित्रशिखिसङ्कुलम् ॥
nyaṅkubhiśca varāhaiśca rurubhiśca niṣevitam | saprapātamahāsānuṃ vicitraśikhisaṅkulam
न्यंकु मृगों, सूअरों और रुरु मृगों से सेवित, झरनों और विशाल शिखरों वाला, रंग-बिरंगे मोरों से भरा —
श्लोक 36 (2.56.36)
स महेन्द्रानुजः शौरिश्चकार गरुडोपरि । पश्यतां सर्वभूतानामुत्पाट्य मणिपर्वतम् ॥
sa mahendrānujaḥ śauriścakāra garuḍopari | paśyatāṃ sarvabhūtānāmutpāṭya maṇiparvatam
उस मणिपर्वत को महेन्द्र के छोटे भाई शौरि ने सब प्राणियों के देखते-देखते उखाड़कर गरुड़ की पीठ पर रख दिया।
श्लोक 37 (2.56.37)
उपेन्द्रं बलदेवं च वासवं च महाबलम् । स्वपक्षबलविक्षेपैर्महाद्रिशिखरोपमः ॥
upendraṃ baladevaṃ ca vāsavaṃ ca mahābalam | svapakṣabalavikṣepairmahādriśikharopamaḥ
उपेन्द्र (कृष्ण), बलदेव और महाबली इन्द्र को लेकर, विशाल पर्वत-शिखर के समान गरुड़ ने अपने पंखों के प्रबल प्रहार से
श्लोक 38 (2.56.38)
दिक्षु सर्वासु संरावं स चक्रे गरुडो वहन् । आरुजन्पर्वताग्राणि पादपांश्च समुत्क्षिपन् ॥
dikṣu sarvāsu saṃrāvaṃ sa cakre garuḍo vahan | ārujanparvatāgrāṇi pādapāṃśca samutkṣipan
उन्हें ले जाते हुए सब दिशाओं में गर्जना कर दी; वे पर्वतों की चोटियों को तोड़ते और वृक्षों को उछालते चले।
श्लोक 39 (2.56.39)
सञ्जहार महाभ्राणि वैश्वानरपथं गतः । ग्रहनक्षत्रताराणां सप्तर्षीणां स्वतेजसा ॥
sañjahāra mahābhrāṇi vaiśvānarapathaṃ gataḥ | grahanakṣatratārāṇāṃ saptarṣīṇāṃ svatejasā
अग्नि के मार्ग पर जाते हुए उन्होंने बड़े-बड़े बादलों को हटा दिया; अपने तेज से वे ग्रहों, नक्षत्रों, तारों और सप्तर्षियों के
श्लोक 40 (2.56.40)
प्रभाजालमतिक्रम्य चाश्विनोश्च परन्तप । प्राप्य पुण्यतमं स्थानं देवलोकमरिन्दमः ॥
prabhājālamatikramya cāśvinośca parantapa | prāpya puṇyatamaṃ sthānaṃ devalokamarindamaḥ
और दोनों अश्विनीकुमारों के प्रभा-मण्डल को भी लाँघ गए, हे परन्तप! और सबसे पवित्र स्थान देवलोक में पहुँचकर शत्रुदमन
श्लोक 41 (2.56.41)
शक्रसद्म समासाद्य चावरुह्य जनार्दनः । सोऽभिवाद्यादितेः पादावर्चितः सर्वदैवतैः । ब्रह्मदक्षपुरोगैश्च प्रजापतिभिरेव च ॥
śakrasadma samāsādya cāvaruhya janārdanaḥ | so'bhivādyāditeḥ pādāvarcitaḥ sarvadaivataiḥ | brahmadakṣapurogaiśca prajāpatibhireva ca
जनार्दन इन्द्र के भवन में आकर उतरे। उन्होंने अदिति के चरणों में प्रणाम किया, और सब देवताओं तथा ब्रह्मा और दक्ष आदि प्रजापतियों ने उनका पूजन किया।
श्लोक 42 (2.56.42)
अदितेः कुण्डले दिव्ये ददावथ तदा विभुः । रत्नानि च परार्घ्याणि रामेण सह केशवः ॥
aditeḥ kuṇḍale divye dadāvatha tadā vibhuḥ | ratnāni ca parārghyāṇi rāmeṇa saha keśavaḥ
तब प्रभु केशव ने बलराम के साथ अदिति को उनके दिव्य कुण्डल और अत्यन्त मूल्यवान् रत्न भेंट किए।
श्लोक 43 (2.56.43)
प्रतिगृह्य च तत्सर्वमदितिर्वासवानुजम् । पूजयामास दाशार्हं रामं च विगतज्वरा ॥
pratigṛhya ca tatsarvamaditirvāsavānujam | pūjayāmāsa dāśārhaṃ rāmaṃ ca vigatajvarā
अदिति ने वह सब स्वीकार किया और चिन्तामुक्त होकर इन्द्र के छोटे भाई दाशार्ह कृष्ण तथा बलराम का सत्कार किया।
श्लोक 44 (2.56.44)
शची महेन्द्रमहिषी कृष्णस्य महिषीं तदा । सत्यभामां तु सङ्गृह्य अदित्यै सा न्यवेदयत् ॥
śacī mahendramahiṣī kṛṣṇasya mahiṣīṃ tadā | satyabhāmāṃ tu saṅgṛhya adityai sā nyavedayat
तब महेन्द्र की पटरानी शची ने कृष्ण की रानी सत्यभामा का हाथ पकड़कर उन्हें अदिति के सामने प्रस्तुत किया।
श्लोक 45 (2.56.45)
सा तस्याः सत्यभामायाः कृष्णप्रियचिकीर्षया । वरं प्रादाद्देवमाता सत्यायै विगतज्वरा ॥
sā tasyāḥ satyabhāmāyāḥ kṛṣṇapriyacikīrṣayā | varaṃ prādāddevamātā satyāyai vigatajvarā
और चिन्तामुक्त देवमाता अदिति ने कृष्ण का प्रिय करने की इच्छा से सत्यभामा को वर दिया —
अदितिरुवाच
श्लोक 46 (2.56.46)
जरां न यास्यसि शुभे यावत्कृष्णोऽस्ति भूतले । सर्वगन्धगुणोपेता भविष्यसि वरानने ॥
jarāṃ na yāsyasi śubhe yāvatkṛṣṇo'sti bhūtale | sarvagandhaguṇopetā bhaviṣyasi varānane
"हे शुभे! जब तक कृष्ण पृथ्वी पर हैं, तुम्हें बुढ़ापा नहीं आएगा; और हे सुमुखी, तुम सब प्रकार की सुगन्ध और गुणों से सम्पन्न रहोगी।"
भीष्म उवाच
श्लोक 47 (2.56.47)
विसृज्य सत्यभामा वै पौलोमीं च सुमध्यमा । शच्यापि समनुज्ञाता ययौ कृष्णनिवेशनम् ॥
visṛjya satyabhāmā vai paulomīṃ ca sumadhyamā | śacyāpi samanujñātā yayau kṛṣṇaniveśanam
पुलोमा की पुत्री शची से विदा लेकर, और शची की अनुमति पाकर, सुन्दर कटि वाली सत्यभामा कृष्ण के निवास-स्थान पर गईं।
श्लोक 48 (2.56.48)
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैर्महर्षिगणसेवितः । द्वारकां प्रययौ कृष्णो देवलोकादरिन्दमः ॥
sampūjyamānastridaśairmaharṣigaṇasevitaḥ | dvārakāṃ prayayau kṛṣṇo devalokādarindamaḥ
देवताओं से पूजित और महर्षियों के समूहों से सेवित शत्रुदमन कृष्ण देवलोक से द्वारका के लिए चल पड़े।
श्लोक 49 (2.56.49)
शीघ्रादेत्य महाबाहुर्दीर्घमध्वानमच्युतः । वर्धमानपुरद्वारमाससाद सुरोत्तमः ॥
śīghrādetya mahābāhurdīrghamadhvānamacyutaḥ | vardhamānapuradvāramāsasāda surottamaḥ
लम्बा मार्ग शीघ्रता से पार करके देवश्रेष्ठ महाबाहु अच्युत नगर के वर्धमान नामक द्वार पर पहुँचे।