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शान्ति पर्व · अध्याय 10

भीमसेन का युधिष्ठिर को फटकारना

युधिष्ठिर के संसार छोड़ देने के विचार पर भीमसेन तीखा उलाहना देते हैं। वे कहते हैं कि राजा की बुद्धि रटकर वेदपाठ करने वाले ब्राह्मण की तरह कुण्ठित हो गई है, कि यदि पाण्डव उनका यह मन जानते तो कभी युद्ध न करते, और कि शत्रुओं को मारकर पृथ्वी जीत लेने के बाद क्षत्रिय को उसे धर्मपूर्वक भोगना चाहिए। अनेक उपमाओं से वे दिखाते हैं कि युद्ध का फल छोड़ देना कितना निरर्थक होगा, और तर्क देते हैं कि संन्यास आपत्ति के समय के लिए है तथा सारा जगत् कर्म से ही चलता है, इसलिए कर्म ही करना चाहिए।

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

भीम उवाच

श्लोक 1 (12.10.1)

श्रोत्रियस्येव ते राजन्मन्दकस्याविपश्चितः । अनुवाकहता बुद्धिर्नैषा तत्त्वार्थदर्शिनी ॥

śrotriyasyeva te rājanmandakasyāvipaścitaḥ | anuvākahatā buddhirnaiṣā tattvārthadarśinī

हे राजन्, आपकी बुद्धि एक मन्दबुद्धि, अविवेकी श्रोत्रिय की-सी है, जो अनुवाकों के रटने से कुण्ठित हो गई है। यह तत्त्व को देखने वाली बुद्धि नहीं है।

श्लोक 2 (12.10.2)

आलस्ये कृतचित्तस्य राजधर्मानसूयतः । विनाशे धार्तराष्ट्राणां किं फलं भरतर्षभ ॥

ālasye kṛtacittasya rājadharmānasūyataḥ | vināśe dhārtarāṣṭrāṇāṃ kiṃ phalaṃ bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, जिसका मन आलस्य में लगा है और जो राजधर्मों में दोष देखता है, उसके लिए धृतराष्ट्र के पुत्रों के विनाश का क्या फल है?

श्लोक 3 (12.10.3)

क्षमाऽनुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं न विद्यते । क्षात्रमाचरतो मार्गमपि बन्धोस्त्वदन्तरे ॥

kṣamā'nukampā kāruṇyamānṛśaṃsyaṃ na vidyate | kṣātramācarato mārgamapi bandhostvadantare

क्षत्रिय के मार्ग पर चलने वाले के लिए क्षमा, अनुकम्पा, करुणा और कोमलता का स्थान नहीं होता, आपके सिवा किसी बन्धु के प्रति भी नहीं।

श्लोक 4 (12.10.4)

यदीमां भवतो बुद्धिं विद्याम वयमीदृशीम् । शस्त्रं नैव ग्रहीष्यामो न वधिष्याम कंचन ॥

yadīmāṃ bhavato buddhiṃ vidyāma vayamīdṛśīm | śastraṃ naiva grahīṣyāmo na vadhiṣyāma kaṃcana

यदि हमें आपकी ऐसी बुद्धि का पता होता, तो हम न कभी शस्त्र उठाते, न किसी का वध करते।

श्लोक 5 (12.10.5)

भैक्षमेवाचरिष्याम शरीरस्याविमोक्षणात् । न चेदं दारुणं युद्धमभविष्यन्महीक्षिताम् ॥

bhaikṣamevācariṣyāma śarīrasyāvimokṣaṇāt | na cedaṃ dāruṇaṃ yuddhamabhaviṣyanmahīkṣitām

हम शरीर के बने रहने भर के लिए भिक्षा माँगकर जी लेते, और राजाओं का यह भयंकर युद्ध कभी न होता।

श्लोक 6 (12.10.6)

प्राणस्यान्नमिदं सर्वमिति वै कवयो विदुः । स्थावरं जङ्गमं चैव सर्वं प्राणस्य भोजनम् ॥

prāṇasyānnamidaṃ sarvamiti vai kavayo viduḥ | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva sarvaṃ prāṇasya bhojanam

यह सब प्राणधारी का अन्न है, ऐसा ज्ञानी कहते हैं। चर और अचर, सब कुछ प्राणधारी का भोजन है।

श्लोक 7 (12.10.7)

आददानस्य चेद्राज्यं ये केचित्परिपन्थिनः । हन्तव्यास्त इति प्राज्ञाः क्षत्रधर्मविदो विदुः ॥

ādadānasya cedrājyaṃ ye kecitparipanthinaḥ | hantavyāsta iti prājñāḥ kṣatradharmavido viduḥ

यदि कोई राज्य ग्रहण कर रहा हो, तो जो कोई उसके मार्ग में बाधक हों, वे मारे जाने योग्य हैं, ऐसा क्षत्रिय-धर्म जानने वाले विद्वान कहते हैं।

श्लोक 8 (12.10.8)

ते सदोषा हताऽस्माभिरन्नस्य परिपन्थिनः । तान्हत्वा भुङ्क्ष्व धर्मेण युधिष्ठिर महीमिमाम् ॥

te sadoṣā hatā'smābhirannasya paripanthinaḥ | tānhatvā bhuṅkṣva dharmeṇa yudhiṣṭhira mahīmimām

अन्न के उन दोषी शत्रुओं को हमने मार डाला है। हे युधिष्ठिर, उन्हें मारकर अब धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का भोग करो।

श्लोक 9 (12.10.9)

यथा हि पुरुषः खात्वा कूपमप्राप्य चोदकम् । पङ्कदिग्धो निवर्तेत कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥

yathā hi puruṣaḥ khātvā kūpamaprāpya codakam | paṅkadigdho nivarteta karmedaṃ nastathopamam

जैसे कोई मनुष्य कुआँ खोदकर, जल पाए बिना कीचड़ से लथपथ लौट आए, वैसा ही हमारा यह कर्म होगा।

श्लोक 10 (12.10.10)

यथाऽऽरुह्य महावृक्षमपहृत्य ततो मधु । अप्राश्य निधनं गच्छेत्कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥

yathā''ruhya mahāvṛkṣamapahṛtya tato madhu | aprāśya nidhanaṃ gacchetkarmedaṃ nastathopamam

या जैसे कोई मनुष्य बड़े वृक्ष पर चढ़कर वहाँ से मधु उतार ले और उसे चखे बिना ही मर जाए, वैसा ही हमारा यह कर्म होगा।

श्लोक 11 (12.10.11)

यथा महान्तमध्वानमाशया पुरुषः पतन् । स निराशो निवर्तेत कर्मैतन्नस्तथोपमम् ॥

yathā mahāntamadhvānamāśayā puruṣaḥ patan | sa nirāśo nivarteta karmaitannastathopamam

या जैसे कोई मनुष्य आशा लेकर लम्बे मार्ग पर चल पड़े और निराश होकर लौट आए, वैसा ही हमारा यह कर्म होगा।

श्लोक 12 (12.10.12)

यथा शत्रून्घातयित्वा पुरुषः कुरुनन्दन । आत्मानं घातयेत्पश्चात्कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥

yathā śatrūnghātayitvā puruṣaḥ kurunandana | ātmānaṃ ghātayetpaścātkarmedaṃ nastathopamam

या जैसे कोई मनुष्य, हे कुरुनन्दन, शत्रुओं को मरवाकर बाद में स्वयं को भी मरवा ले, वैसा ही हमारा यह कर्म होगा।

श्लोक 13 (12.10.13)

यथान्नं क्षुधितो लब्ध्वा न भुञ्जीयाद्यदृच्छया । कामी च कामिनीं लब्ध्वा कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥

yathānnaṃ kṣudhito labdhvā na bhuñjīyādyadṛcchayā | kāmī ca kāminīṃ labdhvā karmedaṃ nastathopamam

या जैसे कोई भूखा मनुष्य संयोग से भोजन पाकर भी उसे न खाए, या कामी पुरुष अपनी प्रिया को पाकर भी उसका भोग न करे, वैसा ही हमारा यह कर्म होगा।

श्लोक 14 (12.10.14)

वयमेवात्र गर्ह्या हि यद्वयं मन्दचेतसम् । त्वां राजन्ननुगच्छामो ज्येष्ठोऽयमिति भारत ॥

vayamevātra garhyā hi yadvayaṃ mandacetasam | tvāṃ rājannanugacchāmo jyeṣṭho'yamiti bhārata

यहाँ दोष हमारा ही है, हे राजन्, कि "यह ज्येष्ठ हैं" यह सोचकर हम मन्दबुद्धि आपके पीछे चलते रहे, हे भारत।

श्लोक 15 (12.10.15)

वयं हि बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः । क्लीबस्य वाक्ये तिष्ठामो यथैवाशक्तयस्तथा ॥

vayaṃ hi bāhubalinaḥ kṛtavidyā manasvinaḥ | klībasya vākye tiṣṭhāmo yathaivāśaktayastathā

हम बाहुबल वाले, विद्वान और स्वाभिमानी हैं, फिर भी एक दुर्बल के वचन में ऐसे बने हुए हैं जैसे असमर्थ हों।

श्लोक 16 (12.10.16)

अगतीकगतीनस्मान्नष्टार्थानर्थसिद्धये । कथं वै नानुपश्येयुर्जनाः पश्यत यादृशम् ॥

agatīkagatīnasmānnaṣṭārthānarthasiddhaye | kathaṃ vai nānupaśyeyurjanāḥ paśyata yādṛśam

हम, जिन्हें निराश्रितों का आश्रय होना चाहिए था, अपना प्रयोजन सिद्ध करने के प्रयास में ही उसे खो बैठे हैं। लोग हमारी ओर कैसे ध्यान न देंगे? देखो, हम कैसे लोग हैं!

श्लोक 17 (12.10.17)

आपत्काले हि संन्यासः कर्तव्य इति शिष्यते । जरयाऽभिपरीतेन शत्रुभिर्व्यंसितेन वा ॥

āpatkāle hi saṃnyāsaḥ kartavya iti śiṣyate | jarayā'bhiparītena śatrubhirvyaṃsitena vā

संन्यास आपत्ति के समय के लिए विहित है, जब मनुष्य बुढ़ापे से घिर गया हो या शत्रुओं ने उसे गिरा दिया हो।

श्लोक 18 (12.10.18)

तस्मादिह कृतप्रज्ञास्त्यागं न परिचक्षते । धर्मव्यतिक्रमं चैव मन्यन्ते सूक्ष्मदर्शिनः ॥

tasmādiha kṛtaprajñāstyāgaṃ na paricakṣate | dharmavyatikramaṃ caiva manyante sūkṣmadarśinaḥ

इसीलिए यहाँ स्थिर बुद्धि वाले ज्ञानी त्याग की प्रशंसा नहीं करते, और सूक्ष्म दृष्टि वाले उसे धर्म का उल्लंघन मानते हैं।

श्लोक 19 (12.10.19)

कथं तस्मात्समुत्पन्नास्तन्निष्ठास्तदुपाश्रयाः । तदेव निन्दां भाषेयुर्धाता तत्र न गर्ह्यते ॥

kathaṃ tasmātsamutpannāstanniṣṭhāstadupāśrayāḥ | tadeva nindāṃ bhāṣeyurdhātā tatra na garhyate

जो उसी से उत्पन्न हुए, उसी में लगे और उसी के आश्रित हैं, वे उसी की निन्दा कैसे करेंगे? उसमें विधाता भी निन्दित नहीं होता।

श्लोक 20 (12.10.20)

श्रिया विहीनैरधनैर्नास्तिकैः संप्रवर्तितम् । वेदवादस्य विज्ञानं सत्याभासमिवानृतम् ॥

śriyā vihīnairadhanairnāstikaiḥ saṃpravartitam | vedavādasya vijñānaṃ satyābhāsamivānṛtam

वेदवाद का यह ज्ञान श्रीहीन, निर्धन और नास्तिकों द्वारा चलाया गया है; यह सत्य-सा दिखता है, पर है मिथ्या।

श्लोक 21 (12.10.21)

शक्यं तु मौनमास्थाय बिभ्रताऽऽत्मानमात्मना । धर्मच्छद्म समास्थाय च्यवितुं न तु जीवितुम् ॥

śakyaṃ tu maunamāsthāya bibhratā''tmānamātmanā | dharmacchadma samāsthāya cyavituṃ na tu jīvitum

मनुष्य मौन धारण करके, स्वयं अपने ही बल से अपने को सँभालते हुए और धर्म का आवरण ओढ़कर नष्ट तो हो सकता है, पर जी नहीं सकता।

श्लोक 22 (12.10.22)

शक्यं पुनररण्येषु सुखमेकेन जीवितुम् । अबिभ्रता पुत्रपौत्रान्देवर्षीनतिथीन्पितॄन् ॥

śakyaṃ punararaṇyeṣu sukhamekena jīvitum | abibhratā putrapautrāndevarṣīnatithīnpitṝn

तब तो वनों में अकेले सुखपूर्वक जिया जा सकता है, यदि पुत्रों, पौत्रों, देवताओं, ऋषियों, अतिथियों और पितरों का भरण न करना हो।

श्लोक 23 (12.10.23)

नेमे मृगाः स्वर्गजितो न वराहा न पक्षिणः । अथान्येन प्रकारेण पुण्यमाहुर्न ते जनाः ॥

neme mṛgāḥ svargajito na varāhā na pakṣiṇaḥ | athānyena prakāreṇa puṇyamāhurna te janāḥ

ये मृग, वराह और पक्षी वन में रहकर भी स्वर्ग नहीं जीतते, और किसी अन्य प्रकार से भी लोग इसे पुण्य नहीं कहते।

श्लोक 24 (12.10.24)

यदि संन्यासतः सिद्धिं राजा कश्चिदवाप्नुयात् । पर्वताश्च द्रुमाश्चैव क्षिप्रम् सिद्धिमवाप्नुयुः ॥

yadi saṃnyāsataḥ siddhiṃ rājā kaścidavāpnuyāt | parvatāśca drumāścaiva kṣipram siddhimavāpnuyuḥ

यदि कोई राजा संन्यास से सिद्धि पा सकता, तो पर्वत और वृक्ष शीघ्र ही सिद्धि पा जाते।

श्लोक 25 (12.10.25)

एते हि नित्यसंन्यासा दृश्यन्ते निरुपद्रवाः । अपरिग्रहवन्तश्च सततं ब्रह्मचारिणः ॥

ete hi nityasaṃnyāsā dṛśyante nirupadravāḥ | aparigrahavantaśca satataṃ brahmacāriṇaḥ

ये तो नित्य संन्यास में रहने वाले, निरुपद्रव, अपरिग्रही और सदा ब्रह्मचारी दिखाई देते हैं।

श्लोक 26 (12.10.26)

अथ चेदात्मभाग्येषु नान्येषां सिद्धिमश्नुते । तस्मात्कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥

atha cedātmabhāgyeṣu nānyeṣāṃ siddhimaśnute | tasmātkarmaiva kartavyaṃ nāsti siddhirakarmaṇaḥ

और यदि अपने-अपने भाग में कोई दूसरों की सिद्धि को नहीं पाता, तो कर्म ही करना चाहिए; कर्म के बिना सिद्धि नहीं है।

श्लोक 27 (12.10.27)

औदकाः सृष्टयश्चैव जन्तवः सिद्धिमाप्नुयुः । तेषामात्मैव भर्तव्यो नान्यः कश्चन विद्यते ॥

audakāḥ sṛṣṭayaścaiva jantavaḥ siddhimāpnuyuḥ | teṣāmātmaiva bhartavyo nānyaḥ kaścana vidyate

जल में उत्पन्न जीव और अन्य सृष्ट प्राणी भी सिद्धि पाते हैं; उनके लिए अपने-आप का ही पालन करना है, और कोई दूसरा नहीं है।

श्लोक 28 (12.10.28)

अवेक्षस्व यथा स्वैः स्वैः कर्मभिर्व्यापृतं जगत् । तस्मात्कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥

avekṣasva yathā svaiḥ svaiḥ karmabhirvyāpṛtaṃ jagat | tasmātkarmaiva kartavyaṃ nāsti siddhirakarmaṇaḥ

देखो कि सारा जगत् अपने-अपने कर्मों में कैसे लगा हुआ है। इसलिए कर्म ही करना चाहिए; कर्म के बिना सिद्धि नहीं है।

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