शान्ति पर्व · अध्याय 9
युधिष्ठिर का संसार-त्याग का संकल्प
युधिष्ठिर अपने भाइयों से कहते हैं कि वे ग्राम्य सुखों को छोड़कर तपस्वी का जीवन बिताएँगे: पहले फल-मूल खाकर वन में रहने वाले वानप्रस्थ की तरह, फिर मुण्डित सिर लिए दिन में एक ही बार भिक्षा माँगने वाले परिव्राजक की तरह, और लाभ-हानि, प्रशंसा-निन्दा तथा जीवन-मृत्यु को समान मानते हुए। वे तृष्णा से हुए अपने पाप, सब प्राणियों को बाँधने वाले जन्म-मरण के चक्र के दुःख और अविनाशी पद पाने की अपनी इच्छा की बात करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.9.1)
मुहूर्तं तावदेकाग्रो मनः श्रोत्रेऽन्तरात्मनि । धारयन्नपि ते श्रुत्वा रोचते वचनं मम ॥
muhūrtaṃ tāvadekāgro manaḥ śrotre'ntarātmani | dhārayannapi te śrutvā rocate vacanaṃ mama
एक क्षण के लिए मन को एकाग्र करके, भीतर अपने आत्मा में स्थिर रखकर सुनो। सुन लेने पर मेरी बात तुम्हें अच्छी लगेगी।
श्लोक 2 (12.9.2)
सार्थगम्यमहं मार्गं न जातु त्वत्कृते पुनः । गच्छेयं तं गमिष्यामि हित्वा ग्राम्यसुखान्युत ॥
sārthagamyamahaṃ mārgaṃ na jātu tvatkṛte punaḥ | gaccheyaṃ taṃ gamiṣyāmi hitvā grāmyasukhānyuta
जो मार्ग बहुत-से लोग साथ मिलकर चलते हैं, उस पर मैं तुम्हारे लिए फिर कभी नहीं चलूँगा। ग्राम्य सुखों को छोड़कर मैं उसी दूसरे मार्ग से जाऊँगा।
श्लोक 3 (12.9.3)
क्षेम्यश्चैकाकिना गम्यः पन्था कोस्तीति पृच्छ माम् । अथवा नेच्छसि प्रष्टुमपृच्छन्नपि मे शृणु ॥
kṣemyaścaikākinā gamyaḥ panthā kostīti pṛccha mām | athavā necchasi praṣṭumapṛcchannapi me śṛṇu
मुझसे पूछो कि अकेले चलने वाले के लिए कौन-सा मार्ग कल्याणकारी है। अथवा यदि तुम पूछना नहीं चाहते, तो बिना पूछे ही मुझसे सुन लो।
श्लोक 4 (12.9.4)
हित्वा ग्राम्यसुखाचारं तप्यमानो महत्तपः । अरण्ये फलमूलाशी चरिष्यामि मृगैः सह ॥
hitvā grāmyasukhācāraṃ tapyamāno mahattapaḥ | araṇye phalamūlāśī cariṣyāmi mṛgaiḥ saha
ग्राम के सुखों के आचरण को छोड़कर, कठोर तप करता हुआ मैं वन में फल-मूल खाकर मृगों के साथ विचरूँगा।
श्लोक 5 (12.9.5)
जुह्वानोऽग्निं यथाकालमुभौ कालावुपस्पृशन् । कृशः परिमिताहारश्चर्मचीरजटाधरः ॥
juhvāno'gniṃ yathākālamubhau kālāvupaspṛśan | kṛśaḥ parimitāhāraścarmacīrajaṭādharaḥ
मैं समय पर अग्नि में आहुति दूँगा और दोनों सन्ध्याओं में स्नान करूँगा। दुबला, परिमित आहार करने वाला, वल्कल, मृगचर्म और जटा धारण किए हुए,
श्लोक 6 (12.9.6)
शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासाश्रमक्षमः । तपसा विधिदृष्टेन शरीरमुपशोषयन् ॥
śītavātātapasahaḥ kṣutpipāsāśramakṣamaḥ | tapasā vidhidṛṣṭena śarīramupaśoṣayan
सर्दी, हवा और धूप सहता हुआ, भूख-प्यास और परिश्रम को झेलता हुआ, विधि के अनुसार तप से शरीर को सुखा दूँगा,
श्लोक 7 (12.9.7)
मनःकर्णसुखा नित्यं शृण्वन्नुच्चावचा गिरः । मुदितानामरण्येषु नदतां मृगपक्षिणाम् ॥
manaḥkarṇasukhā nityaṃ śṛṇvannuccāvacā giraḥ | muditānāmaraṇyeṣu nadatāṃ mṛgapakṣiṇām
वनों में आनन्द से बोलते हुए मृगों और पक्षियों की मन और कानों को सुख देने वाली नाना प्रकार की मधुर वाणियाँ सदा सुनता हुआ,
श्लोक 8 (12.9.8)
आजिघ्रन्पेशलान्गन्धान्फुल्लानां वृक्षवीरुधाम् । नानारूपान्वने पश्यन्रमणीयान्वनौकसः ॥
ājighranpeśalāngandhānphullānāṃ vṛkṣavīrudhām | nānārūpānvane paśyanramaṇīyānvanaukasaḥ
फूले हुए वृक्षों और लताओं की कोमल सुगन्ध सूँघता हुआ, और वन में नाना रूपों वाले मनोहर वनवासी जीवों को देखता हुआ,
श्लोक 9 (12.9.9)
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कूलवासिनः । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किंपुनर्ग्रामवासिनाम् ॥
vānaprasthajanasyāpi darśanaṃ kūlavāsinaḥ | nāpriyāṇyācariṣyāmi kiṃpunargrāmavāsinām
वानप्रस्थ जनों के, या नदी-तट पर रहने वालों के दर्शन होने पर भी मैं उनके प्रति कोई अप्रिय आचरण नहीं करूँगा; फिर गाँव में रहने वालों की तो बात ही क्या?
श्लोक 10 (12.9.10)
एकान्तशीली विमृशन्पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितॄन्देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ॥
ekāntaśīlī vimṛśanpakvāpakvena vartayan | pitṝndevāṃśca vanyena vāgbhiradbhiśca tarpayan
एकान्त में रहता हुआ, चिन्तन करता हुआ, पके-कच्चे जैसे भी फल से निर्वाह करता हुआ, वन की उपज, वाणी और जल से पितरों और देवताओं को तृप्त करता हुआ,
श्लोक 11 (12.9.11)
एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । सेवमानः प्रतीक्षिष्ये देहस्यास्य समापनम् ॥
evamāraṇyaśāstrāṇāmugramugrataraṃ vidhim | sevamānaḥ pratīkṣiṣye dehasyāsya samāpanam
इस प्रकार वनवासियों के शास्त्रों की कठोर से कठोरतर विधि का पालन करते हुए मैं इस देह के अन्त की प्रतीक्षा करूँगा।
श्लोक 12 (12.9.12)
अथवैकोऽहमेकाहमेकैकस्मिन्वनस्पतौ । चरन्भैक्षं मुनिर्मुण्डः क्षपयिष्ये कलेवरम् ॥
athavaiko'hamekāhamekaikasminvanaspatau | caranbhaikṣaṃ munirmuṇḍaḥ kṣapayiṣye kalevaram
अथवा मैं अकेला, एक-एक वृक्ष के नीचे एक-एक दिन ठहरता हुआ, मुण्डित सिर वाला मुनि बनकर भिक्षा माँगते हुए इस शरीर को क्षीण कर दूँगा,
श्लोक 13 (12.9.13)
पांसुभिः समभिच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रयः । वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ॥
pāṃsubhiḥ samabhicchannaḥ śūnyāgārapratiśrayaḥ | vṛkṣamūlaniketo vā tyaktasarvapriyāpriyaḥ
धूल से ढका हुआ, सूने घर में आश्रय लेता हुआ, अथवा वृक्ष की जड़ को ही निवास बनाता हुआ, प्रिय और अप्रिय सबको छोड़कर,
श्लोक 14 (12.9.14)
न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः । निराशीर्निर्ममो भूत्वा निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥
na śocanna prahṛṣyaṃśca tulyanindātmasaṃstutiḥ | nirāśīrnirmamo bhūtvā nirdvandvo niṣparigrahaḥ
न शोक करता हुआ, न हर्षित होता हुआ, अपनी निन्दा और स्तुति को समान मानता हुआ, आशा और ममता से रहित, द्वन्द्वों से परे, कुछ भी संग्रह न करने वाला होकर,
श्लोक 15 (12.9.15)
आत्मारामः प्रसन्नात्मा जडान्धबधिराकृतिः । अकुर्वाणः परैः कांचित्संविदं जातु कैरपि ॥
ātmārāmaḥ prasannātmā jaḍāndhabadhirākṛtiḥ | akurvāṇaḥ paraiḥ kāṃcitsaṃvidaṃ jātu kairapi
आत्मा में रमण करता हुआ, प्रसन्नचित्त, जड़, अन्धे और बहरे जैसा रूप धारण किए, किसी से कभी कोई समझौता न करता हुआ,
श्लोक 16 (12.9.16)
जङ्गमाजङ्गमान्सर्वानविहिंसंश्चतुर्विधान् । प्रजाः सर्वाः स्वधर्मस्थाः समः प्राणभृतः प्रति ॥
jaṅgamājaṅgamānsarvānavihiṃsaṃścaturvidhān | prajāḥ sarvāḥ svadharmasthāḥ samaḥ prāṇabhṛtaḥ prati
चारों प्रकार के चर और अचर प्राणियों में से किसी की हिंसा न करता हुआ, अपने-अपने स्वभाव में स्थित सब प्राणियों के प्रति समभाव रखता हुआ,
श्लोक 17 (12.9.17)
न चाप्यवहसन्कंचिन्न कुर्वन्भ्रुकुटीः क्वचित् । प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वेन्द्रियसुसंयतः ॥
na cāpyavahasankaṃcinna kurvanbhrukuṭīḥ kvacit | prasannavadano nityaṃ sarvendriyasusaṃyataḥ
किसी का उपहास न करता हुआ, कभी भौंहें न चढ़ाता हुआ, सदा प्रसन्न मुख और सब इन्द्रियों को भली-भाँति वश में रखकर,
श्लोक 18 (12.9.18)
अपृच्छन्कस्यचिन्मार्गं प्रव्रजन्नेव केनचित् । न देशं न दिशं कांचिद्गन्तुमिच्छन्विशेषतः ॥
apṛcchankasyacinmārgaṃ pravrajanneva kenacit | na deśaṃ na diśaṃ kāṃcidgantumicchanviśeṣataḥ
किसी से मार्ग न पूछता हुआ, जिस किसी मार्ग से भी चल पड़ता हुआ, किसी विशेष देश या दिशा में जाने की इच्छा न रखता हुआ,
श्लोक 19 (12.9.19)
गमने निरपेक्षश्च पश्चादनवलोकयन् । ऋजुः प्रणिहितो गच्छन्स्त्रीसंस्थापरिवर्जकः ॥
gamane nirapekṣaśca paścādanavalokayan | ṛjuḥ praṇihito gacchanstrīsaṃsthāparivarjakaḥ
यात्रा के विषय में उदासीन, पीछे मुड़कर न देखता हुआ, सीधा और सावधान होकर चलता हुआ, और स्त्रियों के सङ्ग से दूर रहता हुआ।
श्लोक 20 (12.9.20)
स्वभावस्तु प्रयात्यग्रे प्रभवन्त्यशनान्यपि । द्वन्द्वानि च विरुद्धानि तानि सर्वाण्यचिन्तयन् ॥
svabhāvastu prayātyagre prabhavantyaśanānyapi | dvandvāni ca viruddhāni tāni sarvāṇyacintayan
मेरा स्वभाव ही मेरे आगे-आगे चले; भोजन भी अपने-आप आ जाएगा। और जो परस्पर विरोधी द्वन्द्व हैं, उनमें से किसी का भी मैं विचार नहीं करूँगा।
श्लोक 21 (12.9.21)
अल्पं वा स्वादु वा भोज्यं पूर्वालाभेन जातुचित् । अन्येष्वपि चरँल्लाभमलाभे सप्त पूरयन् ॥
alpaṃ vā svādu vā bhojyaṃ pūrvālābhena jātucit | anyeṣvapi caram̐llābhamalābhe sapta pūrayan
भोजन थोड़ा मिले या स्वादिष्ट, यदि पहले घर में न मिले तो मैं दूसरे घरों में भी जाऊँगा, और कुछ न मिलने पर सात घरों तक चक्कर पूरा करूँगा।
श्लोक 22 (12.9.22)
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ॥
vidhūme nyastamusale vyaṅgāre bhuktavajjane | atītapātrasaṃcāre kāle vigatabhikṣuke
जब धुआँ उठना बन्द हो गया हो, मूसल रख दिया गया हो, अंगारे बुझ गए हों, घर के लोग भोजन कर चुके हों, बर्तनों का आना-जाना थम गया हो और भिक्षुक लौट गए हों,
श्लोक 23 (12.9.23)
एककालं चरन्भैक्षं त्रीनथ द्वे च पञ्च वा । स्नेहपाशं विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम् ॥
ekakālaṃ caranbhaikṣaṃ trīnatha dve ca pañca vā | snehapāśaṃ vimucyāhaṃ cariṣyāmi mahīmimām
तब दिन में एक ही बार तीन, दो या पाँच घरों से भिक्षा लेता हुआ, स्नेह के बन्धन काटकर, मैं इस पृथ्वी पर विचरूँगा।
श्लोक 24 (12.9.24)
अलाभे सति वा लाभे समदर्शी महातपाः । न जिजीविषुवत्किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् ॥
alābhe sati vā lābhe samadarśī mahātapāḥ | na jijīviṣuvatkiṃcinna mumūrṣuvadācaran
लाभ और अलाभ में समदृष्टि रखने वाला महातपस्वी होकर, मैं न जीने की इच्छा रखने वाले की तरह रहूँगा, न मरने की इच्छा रखने वाले की तरह,
श्लोक 25 (12.9.25)
जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन्न च द्विषन् । वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः । नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः ॥
jīvitaṃ maraṇaṃ caiva nābhinandanna ca dviṣan | vāsyaikaṃ takṣato bāhuṃ candanenaikamukṣataḥ | nākalyāṇaṃ na kalyāṇaṃ cintayannubhayostayoḥ
जीवन और मरण का न स्वागत करता हुआ, न उनसे द्वेष करता हुआ; जो एक भुजा को बसूले से काटे और जो दूसरी को चन्दन से लेपे, उन दोनों के विषय में न बुरा सोचता हुआ, न भला।
श्लोक 26 (12.9.26)
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । सर्वास्ताः समभित्यज्य निमेषादिव्यवस्थितः ॥
yāḥ kāścijjīvatā śakyāḥ kartumabhyudayakriyāḥ | sarvāstāḥ samabhityajya nimeṣādivyavasthitaḥ
जीवित रहते हुए मनुष्य जो-जो अभ्युदय के कर्म कर सकता है, उन सबको पूरी तरह त्यागकर मैं केवल पलक झपकने जैसी देह-रक्षा की क्रियाओं में ही स्थित रहूँगा।
श्लोक 27 (12.9.27)
तेषु नित्यमसक्तश्च त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः । अपरित्यक्तसंकल्पः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ॥
teṣu nityamasaktaśca tyaktasarvendriyakriyaḥ | aparityaktasaṃkalpaḥ sunirṇiktātmakalmaṣaḥ
उनमें भी सदा अनासक्त, सब इन्द्रिय-क्रियाओं को त्यागे हुए, फिर भी अपने संकल्प को न छोड़ने वाला, और आत्मा के मल को भली-भाँति धो चुका हुआ,
श्लोक 28 (12.9.28)
विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित्तिष्ठन्सधर्मा मातरिश्वनः ॥
vimuktaḥ sarvasaṅgebhyo vyatītaḥ sarvavāgurāḥ | na vaśe kasyacittiṣṭhansadharmā mātariśvanaḥ
सब आसक्तियों से मुक्त, सब जालों से परे, किसी के वश में न रहने वाला, वायु के समान स्वभाव वाला होकर,
श्लोक 29 (12.9.29)
वीतरागश्चरन्नेवं तुष्टिं प्राप्स्यामि मानसीम् । तृष्णया हि महत्पापमज्ञानादस्मि कारितः ॥
vītarāgaścarannevaṃ tuṣṭiṃ prāpsyāmi mānasīm | tṛṣṇayā hi mahatpāpamajñānādasmi kāritaḥ
इस प्रकार वीतराग होकर विचरता हुआ मैं मन की सन्तुष्टि प्राप्त करूँगा। क्योंकि तृष्णा के कारण, अज्ञान से, मुझसे बड़ा पाप करवाया गया है।
श्लोक 30 (12.9.30)
कुशलाकुशलान्येके कृत्वा कर्माणि मानवाः । कार्यकारणसंश्लिष्टं स्वजनं नाम बिभ्रति ॥
kuśalākuśalānyeke kṛtvā karmāṇi mānavāḥ | kāryakāraṇasaṃśliṣṭaṃ svajanaṃ nāma bibhrati
कुछ मनुष्य भले-बुरे कर्म करके, कार्य और कारण से जुड़े हुए जिन्हें वे अपना कुटुम्ब कहते हैं, उन्हें पालते-पोसते हैं।
श्लोक 31 (12.9.31)
आयुषोऽन्ते प्रहायेदं क्षीणप्राणं कलेवरम् । प्रतिगृह्णाति तत्पापं कर्तुः कर्मफलं हि तत् ॥
āyuṣo'nte prahāyedaṃ kṣīṇaprāṇaṃ kalevaram | pratigṛhṇāti tatpāpaṃ kartuḥ karmaphalaṃ hi tat
आयु के अन्त में प्राणहीन हुए इस शरीर को छोड़कर वह उस पाप को ग्रहण करता है, क्योंकि वही कर्ता के कर्म का फल है।
श्लोक 32 (12.9.32)
एवं संसारचक्रेऽस्मिन्व्याविद्धे रथचक्रवत् । समेति भूतग्रामोऽयं भूतग्रामेण कार्यवान् ॥
evaṃ saṃsāracakre'sminvyāviddhe rathacakravat | sameti bhūtagrāmo'yaṃ bhūtagrāmeṇa kāryavān
इस प्रकार रथ के पहिये की तरह घुमाए जाते हुए इस संसार-चक्र में प्राणियों का यह समूह अपने प्रयोजन से दूसरे प्राणि-समूह से आ मिलता है।
श्लोक 33 (12.9.33)
जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरभिद्रुतम् । अपारमिव चास्वस्थं संसारं त्यजतः सुखम् ॥
janmamṛtyujarāvyādhivedanābhirabhidrutam | apāramiva cāsvasthaṃ saṃsāraṃ tyajataḥ sukham
जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और वेदना से घिरे हुए, अनन्त-से दिखने वाले और अस्वस्थ करने वाले इस संसार को जो त्याग देता है, उसे सुख मिलता है।
श्लोक 34 (12.9.34)
दिवः पतत्सु देवेषु स्थानेभ्यश्च महर्षिषु । को हि नाम भवेनार्थी भवेत्कारणतत्त्ववित् ॥
divaḥ patatsu deveṣu sthānebhyaśca maharṣiṣu | ko hi nāma bhavenārthī bhavetkāraṇatattvavit
जब देवता स्वर्ग से गिर रहे हैं और महर्षि अपने स्थानों से, तब कारण के तत्त्व को जानने वाला कौन मनुष्य संसार का अभिलाषी होगा?
श्लोक 35 (12.9.35)
कृत्वा हि विविधं कर्म तत्तद्विविधलक्षणम् । पार्थिवैर्नृपतिः स्वल्पैः कारणैरेव बध्यते ॥
kṛtvā hi vividhaṃ karma tattadvividhalakṣaṇam | pārthivairnṛpatiḥ svalpaiḥ kāraṇaireva badhyate
अनेक प्रकार के, अलग-अलग लक्षणों वाले कर्म करके भी राजा छोटे-छोटे राजाओं द्वारा, थोड़े-से कारणों से ही बँध जाता है।
श्लोक 36 (12.9.36)
तस्मात्प्रज्ञामृतमिदं चिरान्मां प्रत्युपस्थितम् । तत्प्राप्य प्रार्थये स्थानमव्ययं शाश्वतं ध्रुवम् ॥
tasmātprajñāmṛtamidaṃ cirānmāṃ pratyupasthitam | tatprāpya prārthaye sthānamavyayaṃ śāśvataṃ dhruvam
इसलिए यह प्रज्ञा-रूपी अमृत, जो मुझे बहुत समय बाद प्राप्त हुआ है, उसे पाकर मैं उस अविनाशी, शाश्वत और अचल पद की कामना करता हूँ।
श्लोक 37 (12.9.37)
एतया संततं धृत्या चरन्नेवंप्रकारया । जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरभिद्रुतम् । देहं संस्थापयिष्यामि निर्भयं मार्गमास्थितः ॥
etayā saṃtataṃ dhṛtyā carannevaṃprakārayā | janmamṛtyujarāvyādhivedanābhirabhidrutam | dehaṃ saṃsthāpayiṣyāmi nirbhayaṃ mārgamāsthitaḥ
इसी प्रकार के इस दृढ़ निश्चय के साथ सदा चलता हुआ, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और वेदना से घिरे इस शरीर को मैं निर्भय मार्ग पर स्थित होकर टिकाए रखूँगा।