शान्ति पर्व · अध्याय 8
अर्जुन का धन और राज्य के पक्ष में तर्क
भिक्षु-जीवन अपनाने की युधिष्ठिर की इच्छा पर अर्जुन तीखा उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि पृथ्वी जीत चुका राजा भीख नहीं माँग सकता; धर्म, काम और स्वर्ग सब धन से ही चलते हैं; निर्धन का संसार में तिरस्कार होता है; और राजाओं ने भी देवताओं की भाँति दूसरों से लेकर ही अपने स्थान पाए हैं। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि दिलीप, नहुष और मान्धाता की तरह वे अश्वमेध करें और कुमार्ग पर न जाएँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.8.1)
अथार्जुन उवाचेदमधिक्षिप्त इवाक्षमी । अभिनीततरं वाक्यं दृढवादपराक्रमः ॥
athārjuna uvācedamadhikṣipta ivākṣamī | abhinītataraṃ vākyaṃ dṛḍhavādaparākramaḥ
वैशम्पायन ने कहा — तब मानो अपमान से आहत और असहिष्णु अर्जुन ने, जिसका बल दृढ़ तर्क में था, बहुत पैनी बात कही;
श्लोक 2 (12.8.2)
दर्शयन्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः । स्मयमानो महातेजाः सृक्किणी परिसंलिहन् ॥
darśayannaindrirātmānamugramugraparākramaḥ | smayamāno mahātejāḥ sṛkkiṇī parisaṃlihan
अपना उग्र रूप दिखाते हुए उस उग्र पराक्रमी, महातेजस्वी इन्द्रपुत्र ने मुसकराते हुए और अपने होंठों के कोने चाटते हुए कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (12.8.3)
अहो दुःखमहो कृच्छ्रमहो वैक्लव्यमुत्तमम् । यत्कृत्वाऽमानुषं कर्म त्यजेथाः श्रियमुत्तमाम् ॥
aho duḥkhamaho kṛcchramaho vaiklavyamuttamam | yatkṛtvā'mānuṣaṃ karma tyajethāḥ śriyamuttamām
अर्जुन ने कहा — हाय, कैसा दुःख है, कैसा कष्ट, कैसी भारी दुर्बलता, कि अमानुषी कर्म करके भी आप उत्तम राजलक्ष्मी को छोड़ देना चाहते हैं!
श्लोक 4 (12.8.4)
शत्रून्हत्वा महीं लब्ध्वा स्वधर्मेणोपपादिताम् । हतामित्रः कथं स त्वं त्यजेथा बुद्धिलाघवात् ॥
śatrūnhatvā mahīṃ labdhvā svadharmeṇopapāditām | hatāmitraḥ kathaṃ sa tvaṃ tyajethā buddhilāghavāt
शत्रुओं को मारकर और अपने धर्म से मिली पृथ्वी पाकर, शत्रुओं का नाश करनेवाले आप बुद्धि की हलकाई से उसे कैसे त्याग देंगे?
श्लोक 5 (12.8.5)
क्लीबस्य हि कुतो राज्यं दीर्घसूत्रस्य वा पुनः । किमर्थं च महीपालानवधीः क्रोधमूर्च्छितः ॥
klībasya hi kuto rājyaṃ dīrghasūtrasya vā punaḥ | kimarthaṃ ca mahīpālānavadhīḥ krodhamūrcchitaḥ
नपुंसक या आलसी का राज्य कहाँ? और फिर क्रोध से मूर्छित होकर आपने राजाओं को क्यों मारा?
श्लोक 6 (12.8.6)
यो ह्याजिजीविषेद्भैक्षं कर्मणा नैव कस्य चित् । समारम्भान्बुभूषेत हतस्वस्तिरकिञ्चनः । सर्वलोकेषु विख्यातो न पुत्रपशुसंहितः ॥
yo hyājijīviṣedbhaikṣaṃ karmaṇā naiva kasya cit | samārambhānbubhūṣeta hatasvastirakiñcanaḥ | sarvalokeṣu vikhyāto na putrapaśusaṃhitaḥ
वही मनुष्य भिक्षा पर जीना चाहेगा, किसी के श्रम पर नहीं, और उद्यमों से आगे बढ़ने की इच्छा न करेगा, जिसका कल्याण नष्ट हो गया हो, जिसके पास कुछ न हो, जो सब लोकों में प्रसिद्ध न हो और जिसके पुत्र-पशु न हों।
श्लोक 7 (12.8.7)
कापालीं नृप पापिष्ठां वृत्तिमासाद्य जीवतः । संत्यज्य राज्यमृद्धं ते लोकोऽयं किं वदिष्यति ॥
kāpālīṃ nṛpa pāpiṣṭhāṃ vṛttimāsādya jīvataḥ | saṃtyajya rājyamṛddhaṃ te loko'yaṃ kiṃ vadiṣyati
हे राजन्! समृद्ध राज्य छोड़कर भिक्षापात्र लेकर जीने की सबसे निकृष्ट वृत्ति अपनाएँगे तो यह संसार क्या कहेगा?
श्लोक 8 (12.8.8)
सर्वारम्भान्समुत्सृज्य हतस्वस्तिरकिञ्चनः । कस्मादाशंससे भैक्षं चर्तुं प्राकृतवत्प्रभो ॥
sarvārambhānsamutsṛjya hatasvastirakiñcanaḥ | kasmādāśaṃsase bhaikṣaṃ cartuṃ prākṛtavatprabho
सब उद्यम छोड़कर, कल्याण खोकर और अकिंचन होकर, हे प्रभो! आप साधारण मनुष्य की तरह भिक्षा माँगने की आशा क्यों करते हैं?
श्लोक 9 (12.8.9)
कस्माद्राजकुले जातो जित्वा कृत्स्नां वसुंधराम् । धर्मार्थावखिलौ हित्वा वनं मौढ्यात्प्रतिष्ठसे ॥
kasmādrājakule jāto jitvā kṛtsnāṃ vasuṃdharām | dharmārthāvakhilau hitvā vanaṃ mauḍhyātpratiṣṭhase
राजकुल में जन्म लेकर, सारी पृथ्वी जीतकर, धर्म और अर्थ दोनों को पूर्णतः छोड़कर आप मूर्खतावश वन को क्यों जा रहे हैं?
श्लोक 10 (12.8.10)
यदीमानि हवींषीह विमथिष्यन्त्यसाधवः । भवता विप्रहीणत्वात्प्राप्तं त्वामेव किल्विषम् ॥
yadīmāni havīṃṣīha vimathiṣyantyasādhavaḥ | bhavatā viprahīṇatvātprāptaṃ tvāmeva kilviṣam
यदि दुष्ट लोग यहाँ इन हवियों को बिगाड़ देंगे, तो आपके त्याग देने के कारण दोष आप ही पर आएगा।
श्लोक 11 (12.8.11)
आकिञ्चन्यं मुनीनां च इति वै नहुषोऽब्रवीत् । कृत्वा नृशंसं ह्यधने धिगस्त्वधनतामिह ॥
ākiñcanyaṃ munīnāṃ ca iti vai nahuṣo'bravīt | kṛtvā nṛśaṃsaṃ hyadhane dhigastvadhanatāmiha
‘अकिंचन होना मुनियों के लिए है’ — ऐसा नहुष ने कहा था; ‘पर निर्धन मनुष्य क्रूर कर्म करने को विवश होता है, इसलिए यहाँ निर्धनता को धिक्कार है।’
श्लोक 12 (12.8.12)
आश्वस्तन्यमृषीणां हि विद्यते वेद तद्भवान् । यं त्विमं धर्ममित्याहुर्धनादेष प्रवर्तते ॥
āśvastanyamṛṣīṇāṃ hi vidyate veda tadbhavān | yaṃ tvimaṃ dharmamityāhurdhanādeṣa pravartate
ऋषियों में कल के लिए कुछ न रखने की रीति है, यह आप जानते हैं। पर जिसे लोग धर्म कहते हैं, वह धन से ही चलता है।
श्लोक 13 (12.8.13)
धर्मं स हरते तस्य धनं हरति यस्य यः । ह्रियमाणे धने राजन्वयं कस्य क्षमेमहि ॥
dharmaṃ sa harate tasya dhanaṃ harati yasya yaḥ | hriyamāṇe dhane rājanvayaṃ kasya kṣamemahi
जो जिसका धन हर लेता है, वह उसके धर्म को भी हर लेता है। हे राजन्! धन छीना जा रहा हो तो हम किसे क्षमा कर सकते हैं?
श्लोक 14 (12.8.14)
अभिशस्तं प्रपश्यन्ति दरिद्रं पार्श्वतः स्थितम् । दारिद्र्यं पातकं लोके कस्तच्छंसितुमर्हति ॥
abhiśastaṃ prapaśyanti daridraṃ pārśvataḥ sthitam | dāridryaṃ pātakaṃ loke kastacchaṃsitumarhati
लोग पास खड़े निर्धन को अपराधी की तरह देखते हैं। निर्धनता संसार में पाप है; उसकी प्रशंसा कौन कर सकता है?
श्लोक 15 (12.8.15)
पतितः शोच्यते राजन्निर्धनश्चापि शोच्यते । विशेषं नाधिगच्छामि पतितस्याधनस्य च ॥
patitaḥ śocyate rājannirdhanaścāpi śocyate | viśeṣaṃ nādhigacchāmi patitasyādhanasya ca
हे राजन्! पतित पर भी शोक किया जाता है और निर्धन पर भी; मुझे पतित और निर्धन में कोई अन्तर नहीं दीखता।
श्लोक 16 (12.8.16)
अर्थेभ्यो हि विवृद्धेभ्यः संभृतेभ्यस्ततस्ततः । क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥
arthebhyo hi vivṛddhebhyaḥ saṃbhṛtebhyastatastataḥ | kriyāḥ sarvāḥ pravartante parvatebhya ivāpagāḥ
यहाँ-वहाँ से जुटाए बढ़े हुए धन से ही सब कार्य चलते हैं, जैसे पर्वतों से नदियाँ बहती हैं।
श्लोक 17 (12.8.17)
अर्थाद्धर्मश्च कामश्च स्वर्गश्चैव नराधिप । प्राणयात्राऽपि लोकस्य विना ह्यर्थं न सिद्ध्यति ॥
arthāddharmaśca kāmaśca svargaścaiva narādhipa | prāṇayātrā'pi lokasya vinā hyarthaṃ na siddhyati
हे नराधिप! धन से धर्म, काम और स्वर्ग मिलते हैं; धन के बिना लोगों का जीवन-निर्वाह भी नहीं चलता।
श्लोक 18 (12.8.18)
अर्थेन हि विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः । विच्छिद्यन्ते क्रियाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥
arthena hi vihīnasya puruṣasyālpamedhasaḥ | vicchidyante kriyāḥ sarvā grīṣme kusarito yathā
धनहीन, अल्प बुद्धिवाले पुरुष के सब कर्म ऐसे सूख जाते हैं जैसे ग्रीष्म में छोटी नदियाँ।
श्लोक 19 (12.8.19)
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥
yasyārthāstasya mitrāṇi yasyārthāstasya bāndhavāḥ | yasyārthāḥ sa pumām̐lloke yasyārthāḥ sa ca paṇḍitaḥ
जिसके पास धन है, उसी के मित्र हैं; जिसके पास धन है, उसी के बान्धव हैं; जिसके पास धन है वही संसार में पुरुष है, और जिसके पास धन है वही पण्डित है।
श्लोक 20 (12.8.20)
अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विधित्सितुम् । अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैरिव महागजाः ॥
adhanenārthakāmena nārthaḥ śakyo vidhitsitum | arthairarthā nibadhyante gajairiva mahāgajāḥ
धनहीन, धन चाहनेवाला मनुष्य धन पाने का उपाय नहीं कर सकता; धन से धन वैसे बँधता है जैसे बड़े हाथी हाथियों से।
श्लोक 21 (12.8.21)
धर्मः कामश्च स्वर्गश्च हर्षः क्रोधः श्रुतं दमः । अर्थादेतानि सर्वाणि प्रवर्तन्ते नराधिप ॥
dharmaḥ kāmaśca svargaśca harṣaḥ krodhaḥ śrutaṃ damaḥ | arthādetāni sarvāṇi pravartante narādhipa
धर्म, काम, स्वर्ग, हर्ष, क्रोध, विद्या और दम — ये सब, हे नराधिप, धन से ही चलते हैं।
श्लोक 22 (12.8.22)
धनात्कुलं प्रभवति धनाद्धर्मः प्रवर्धते । नाधनस्यास्त्ययं लोको न परः पुरुषोत्तम ॥
dhanātkulaṃ prabhavati dhanāddharmaḥ pravardhate | nādhanasyāstyayaṃ loko na paraḥ puruṣottama
धन से कुल उत्पन्न होता है, धन से धर्म बढ़ता है। हे पुरुषोत्तम! निर्धन के लिए न यह लोक है, न परलोक।
श्लोक 23 (12.8.23)
नाधनो धर्मकृत्यानि यथावदनुतिष्ठति । धनाद्धि धर्मः स्रवति शैलादभिनदी यथा ॥
nādhano dharmakṛtyāni yathāvadanutiṣṭhati | dhanāddhi dharmaḥ sravati śailādabhinadī yathā
निर्धन धर्म के कार्य ठीक से नहीं कर पाता; धर्म धन से ही बहता है, जैसे पर्वत से नदी।
श्लोक 24 (12.8.24)
यः कृशार्थः कृशगवः कृशभृत्यः कृशातिथिः । स वै राजन्कृशो नाम न शरीरकृशः कृशः ॥
yaḥ kṛśārthaḥ kṛśagavaḥ kṛśabhṛtyaḥ kṛśātithiḥ | sa vai rājankṛśo nāma na śarīrakṛśaḥ kṛśaḥ
जिसका धन थोड़ा, गायें थोड़ी, सेवक थोड़े और अतिथि थोड़े हों, हे राजन्! वही ‘कृश’ कहलाता है, शरीर से दुबला नहीं।
श्लोक 25 (12.8.25)
अवेक्षस्व यथान्यायं पश्य देवासुरं यथा । राजन्किमन्यज्ज्ञातीनां वधाद्गृध्यन्ति देवताः ॥
avekṣasva yathānyāyaṃ paśya devāsuraṃ yathā | rājankimanyajjñātīnāṃ vadhādgṛdhyanti devatāḥ
नियम के अनुसार विचार कीजिए; देवों और असुरों का वृत्तान्त देखिए। हे राजन्! देवता अपने बन्धुओं के वध के सिवा और किसकी लालसा करते हैं?
श्लोक 26 (12.8.26)
न चेद्धर्तव्यमन्यस्य कथं तद्धर्ममारभेत् । एतावानेव वेदेषु निश्चयः कविभिः कृतः ॥
na ceddhartavyamanyasya kathaṃ taddharmamārabhet | etāvāneva vedeṣu niścayaḥ kavibhiḥ kṛtaḥ
यदि दूसरे का धन न लिया जाए, तो राजा वह धर्म कैसे आरम्भ करे? वेदों में कवियों ने बस यही निश्चय किया है।
श्लोक 27 (12.8.27)
अध्येतव्या त्रयी नित्यं भवितव्यं विपश्चिता । सर्वथा धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि यत्नतः ॥
adhyetavyā trayī nityaṃ bhavitavyaṃ vipaścitā | sarvathā dhanamāhāryaṃ yaṣṭavyaṃ cāpi yatnataḥ
त्रयी विद्या का अध्ययन करना चाहिए, ज्ञानी को समृद्ध होना चाहिए; हर प्रकार से धन जुटाना चाहिए और यत्न से यज्ञ करना चाहिए।
श्लोक 28 (12.8.28)
द्रोहाद्देवैरवाप्तानि दिवि स्थानानि सर्वशः । द्रोहात्किमन्यज्ज्ञातीनां गृध्यन्ते येन देवताः ॥
drohāddevairavāptāni divi sthānāni sarvaśaḥ | drohātkimanyajjñātīnāṃ gṛdhyante yena devatāḥ
देवताओं ने द्रोह से ही स्वर्ग के सब स्थान पाए हैं। अपने बन्धुओं के प्रति द्रोह के सिवा और किस बात के लिए देवता लालायित होते हैं?
श्लोक 29 (12.8.29)
इति देवा व्यवसिता वेदवादाश्च शाश्वताः । अधीयन्तेऽध्यापयन्ते यजन्ते याजयन्ति च ॥
iti devā vyavasitā vedavādāśca śāśvatāḥ | adhīyante'dhyāpayante yajante yājayanti ca
ऐसा देवताओं ने निश्चय किया है, और यही वेदों के शाश्वत वचन हैं; इन्हें पढ़ा और पढ़ाया जाता है, यज्ञ किया और कराया जाता है।
श्लोक 30 (12.8.30)
कृत्स्नं तदेव तच्छ्रेयो यदप्याददतेऽन्यतः । न पश्यामोऽनपकृतं धनं किंचित्क्वचिद्वयम् ॥
kṛtsnaṃ tadeva tacchreyo yadapyādadate'nyataḥ | na paśyāmo'napakṛtaṃ dhanaṃ kiṃcitkvacidvayam
वही सब परम कल्याण है, चाहे दूसरों से छीना जाए। हमें कहीं भी ऐसा कोई धन नहीं दीखता जो किसी को हानि पहुँचाए बिना मिला हो।
श्लोक 31 (12.8.31)
एवमेव हि राजानो यजन्ति पृथिवीमिमाम् । जित्वा ममेयं ब्रुवते पुत्रा इव पितुर्धनम् ॥
evameva hi rājāno yajanti pṛthivīmimām | jitvā mameyaṃ bruvate putrā iva piturdhanam
इसी प्रकार राजा इस पृथ्वी के लिए यज्ञ करते हैं; जीतकर वे कहते हैं, ‘यह मेरी है’, जैसे पुत्र पिता के धन के विषय में कहते हैं।
श्लोक 32 (12.8.32)
राजर्षयोऽपि ते स्वर्ग्या धर्मो ह्येषां निरुच्यते ॥
rājarṣayo'pi te svargyā dharmo hyeṣāṃ nirucyate
वे राजर्षि भी स्वर्ग के अधिकारी हैं, और यही उनका धर्म कहा जाता है।
श्लोक 33 (12.8.33)
यथैव पूर्णादुदधेः स्यन्दन्त्यापो दिशो दश । एवं राजकुलाद्वित्तं पृथिवीं प्रतितिष्ठति ॥
yathaiva pūrṇādudadheḥ syandantyāpo diśo daśa | evaṃ rājakulādvittaṃ pṛthivīṃ pratitiṣṭhati
जैसे पूर्ण समुद्र से जल दसों दिशाओं में बहता है, वैसे ही राजकुल से धन पृथ्वी पर फैलता है।
श्लोक 34 (12.8.34)
आसीदियं दिलीपस्य नृगस्य नहुषस्य च । अंबरीषस्य मान्धातुः पृथिवी सा त्वयि स्थिता ॥
āsīdiyaṃ dilīpasya nṛgasya nahuṣasya ca | aṃbarīṣasya māndhātuḥ pṛthivī sā tvayi sthitā
यह पृथ्वी दिलीप की थी, नृग की, नहुष की, अम्बरीष और मान्धाता की; वही अब आपके अधिकार में है।
श्लोक 35 (12.8.35)
स त्वां द्रव्यमयो यज्ञः संप्राप्तः सर्वदक्षिणः । तं चेन्न यजसे राजन्प्राप्तस्त्वं राज्यकिल्बिषम् ॥
sa tvāṃ dravyamayo yajñaḥ saṃprāptaḥ sarvadakṣiṇaḥ | taṃ cenna yajase rājanprāptastvaṃ rājyakilbiṣam
सब दक्षिणाओं से युक्त, धन-सम्पन्न वह यज्ञ आपके सामने आ गया है। हे राजन्! यदि आप उसे न करेंगे तो राज्य का दोष आपको लगेगा।
श्लोक 36 (12.8.36)
येषां राजाऽश्वमेधेन यजते दक्षिणावता । उपेत्य तस्यावभृथे पूताः सर्वे भवन्ति ते ॥
yeṣāṃ rājā'śvamedhena yajate dakṣiṇāvatā | upetya tasyāvabhṛthe pūtāḥ sarve bhavanti te
जिनके लिए राजा दक्षिणा-युक्त अश्वमेध यज्ञ करता है, वे सब उसके अवभृथ-स्नान पर पहुँचकर पवित्र हो जाते हैं।
श्लोक 37 (12.8.37)
विश्वरूपो महादेवः सर्वमेधे महामखे । जुहाव सर्वभूतानि तथैवात्मानमात्मना ॥
viśvarūpo mahādevaḥ sarvamedhe mahāmakhe | juhāva sarvabhūtāni tathaivātmānamātmanā
सर्वमेध नामक महायज्ञ में विश्वरूप महादेव ने सब प्राणियों की और अपने आप की भी स्वयं आहुति दे दी।
श्लोक 38 (12.8.38)
शाश्वतोऽयं भूतिपथो नास्त्यन्तमनुशुश्रुम । महाजनपथं गन्ता मा राजन्कुपथं गमः ॥
śāśvato'yaṃ bhūtipatho nāstyantamanuśuśruma | mahājanapathaṃ gantā mā rājankupathaṃ gamaḥ
ऐश्वर्य का यह मार्ग शाश्वत है; हमने इसका अन्त होना नहीं सुना। हे राजन्! आप महापुरुषों के मार्ग पर चलनेवाले हैं; कुमार्ग पर मत जाइए।