शान्ति पर्व · अध्याय 7
युधिष्ठिर का राज्य त्यागने का संकल्प
कर्ण और मारे गए स्वजनों के शोक से विह्वल युधिष्ठिर अर्जुन से कहते हैं कि बन्धुओं के वध की कीमत पर मिली इस विजय का कोई मूल्य नहीं, और माताओं का पुत्रों को पालना व्यर्थ गया। वे दुर्योधन, धृतराष्ट्र और अपने ही लोभ को दोष देते हैं, कहते हैं कि त्याग से पाप धुलता है, और घोषणा करते हैं कि वे राज्य छोड़कर वन जाएँगे तथा भाइयों से पृथ्वी का शासन करने को कहते हैं। इस पर अर्जुन उत्तर देने लगते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.7.1)
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा शोकव्याकुलचेतनः । शुशोच दुःखसंतप्तः स्मृत्वा कर्णं महारथम् ॥
yudhiṣṭhirastu dharmātmā śokavyākulacetanaḥ | śuśoca duḥkhasaṃtaptaḥ smṛtvā karṇaṃ mahāratham
वैशम्पायन ने कहा — धर्मात्मा युधिष्ठिर शोक से व्याकुल चित्त हो, महारथी कर्ण को याद करके दुःख से सन्तप्त होकर शोक करने लगे।
श्लोक 2 (12.7.2)
आविष्टो दुःखशोकाभ्यां निःश्वसंश्च पुनः पुनः । दृष्ट्वार्जुनमुवाचेदं वचनं शोककर्शितः ॥
āviṣṭo duḥkhaśokābhyāṃ niḥśvasaṃśca punaḥ punaḥ | dṛṣṭvārjunamuvācedaṃ vacanaṃ śokakarśitaḥ
दुःख और शोक से घिरे, बार-बार साँसें भरते हुए, शोक से पीड़ित युधिष्ठिर ने अर्जुन की ओर देखकर यह बात कही।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (12.7.3)
यद्भैक्ष्यमाचरिष्याम वृष्ण्यन्धकपुरे वयम् । ज्ञातीन्निष्पुरुषान्कृत्वा नेमां प्राप्स्याम दुर्गतिम् ॥
yadbhaikṣyamācariṣyāma vṛṣṇyandhakapure vayam | jñātīnniṣpuruṣānkṛtvā nemāṃ prāpsyāma durgatim
युधिष्ठिर ने कहा — यदि हम वृष्णियों और अन्धकों के नगर में भिक्षा माँगकर जीते, तो अपने बन्धुओं को पुरुषहीन करके इस दुर्गति में न पड़ते।
श्लोक 4 (12.7.4)
अमित्रा नः समृद्धार्था वृत्तार्थाः कुरवः किल । आत्मानमात्मना हत्वा किं धर्मफलमाप्नुमः ॥
amitrā naḥ samṛddhārthā vṛttārthāḥ kuravaḥ kila | ātmānamātmanā hatvā kiṃ dharmaphalamāpnumaḥ
हमारे शत्रु कौरव तो समृद्ध थे और, कहते हैं, अपने सब प्रयोजन पूरे कर चुके थे। अपने ही हाथों अपने को मारकर हमें धर्म का कौन-सा फल मिलेगा?
श्लोक 5 (12.7.5)
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलमौरसम् । धिगस्तु चार्थं येनेमामापदं गमिता वयम् ॥
dhigastu kṣātramācāraṃ dhigastu balamaurasam | dhigastu cārthaṃ yenemāmāpadaṃ gamitā vayam
क्षत्रिय के आचार को धिक्कार है, बाहुबल को धिक्कार है, और उस धन को धिक्कार है जिसके कारण हम इस विपत्ति में पड़े!
श्लोक 6 (12.7.6)
साधु क्षमा दमः शौचमविरोधो विमत्सरः । अहिंसा सत्यवचनं नित्यानि वनचारिणाम् ॥
sādhu kṣamā damaḥ śaucamavirodho vimatsaraḥ | ahiṃsā satyavacanaṃ nityāni vanacāriṇām
क्षमा, दम, शुचिता, विरोध और मत्सर का अभाव, अहिंसा और सत्य वचन — ये अच्छे हैं और वनवासियों के सदा के आचरण हैं।
श्लोक 7 (12.7.7)
वयं तु लोभान्मोहाच्च दम्भं मानं च संश्रिताः । इमामवस्थां संप्राप्ता राज्यक्लेशबुभुक्षया ॥
vayaṃ tu lobhānmohācca dambhaṃ mānaṃ ca saṃśritāḥ | imāmavasthāṃ saṃprāptā rājyakleśabubhukṣayā
किन्तु हम लोभ और मोह से दम्भ और अभिमान में पड़े और राज्य के क्लेशों को भोगने की भूख से इस दशा को पहुँचे।
श्लोक 8 (12.7.8)
त्रैलोक्यस्यापि राज्येन नास्मान्कश्चित्प्रहर्षयेत् । बान्धवान्निहतान्दृष्ट्वा पृथिव्यामामिषैषिणः ॥
trailokyasyāpi rājyena nāsmānkaścitpraharṣayet | bāndhavānnihatāndṛṣṭvā pṛthivyāmāmiṣaiṣiṇaḥ
बान्धवों को मरा हुआ देखकर, हम पृथ्वी की लूट के लालचियों को तीनों लोकों का राज्य भी आनन्द नहीं दे सकता।
श्लोक 9 (12.7.9)
ते वयं पृथिवीहेतोरवध्यान्पृथिवीतले । संपरित्यज्य जीवामो हीनार्था हतबान्धवाः ॥
te vayaṃ pṛthivīhetoravadhyānpṛthivītale | saṃparityajya jīvāmo hīnārthā hatabāndhavāḥ
पृथ्वी के लिए हमने पृथ्वी पर उन्हें छोड़ दिया जो मारने योग्य नहीं थे, और अब प्रयोजन गँवाकर, बान्धवों को खोकर जी रहे हैं।
श्लोक 10 (12.7.10)
आमिषे गृध्यमानानामशुभं वै शुनामिव । आमिषं चैव नो नष्टमामिषस्य च भोजिनाम् ॥
āmiṣe gṛdhyamānānāmaśubhaṃ vai śunāmiva | āmiṣaṃ caiva no naṣṭamāmiṣasya ca bhojinām
मांस के लोभी कुत्तों की तरह हमें अशुभ ही मिला; और मांस भी हमारे हाथ से गया, हम जो मांस खानेवाले थे।
श्लोक 11 (12.7.11)
न पृथिव्या सकलया न सुवर्णस्य राशिभिः । न गजाश्वेन सर्वेण ते त्याज्या य इमे हताः ॥
na pṛthivyā sakalayā na suvarṇasya rāśibhiḥ | na gajāśvena sarveṇa te tyājyā ya ime hatāḥ
न समूची पृथ्वी के बदले, न सोने के ढेरों के बदले, न सारे गौ-अश्वों के बदले इन मारे गए लोगों को छोड़ना उचित था।
श्लोक 12 (12.7.12)
काममन्युपरीतास्ते क्रोधामर्षसमन्विताः । मृत्युयानं समारुह्य गता वैवस्वतक्षयम् ॥
kāmamanyuparītāste krodhāmarṣasamanvitāḥ | mṛtyuyānaṃ samāruhya gatā vaivasvatakṣayam
काम और क्रोध से भरे, रोष और असहिष्णुता से युक्त वे मृत्यु के रथ पर चढ़कर वैवस्वत के लोक को चले गए।
श्लोक 13 (12.7.13)
बहुकल्याणमिच्छन्त ईहन्ते पितरः सुतान् । तपसा ब्रह्मचर्येण वन्दनेन तितिक्षया ॥
bahukalyāṇamicchanta īhante pitaraḥ sutān | tapasā brahmacaryeṇa vandanena titikṣayā
पिता बहुत कल्याण चाहते हुए तप, ब्रह्मचर्य, वन्दन और सहनशीलता से पुत्रों के लिए यत्न करते हैं;
श्लोक 14 (12.7.14)
उपवासैस्तथेज्याभिर्व्रतकौतुकमङ्गलैः । लभन्ते मातरो गर्भांस्तान्मासान्दश बिभ्रति ॥
upavāsaistathejyābhirvratakautukamaṅgalaiḥ | labhante mātaro garbhāṃstānmāsāndaśa bibhrati
और उपवासों, यज्ञों, व्रतों, जातकर्म आदि मंगल-कृत्यों से माताएँ गर्भ पाती हैं और उन्हें दस महीने धारण करती हैं।
श्लोक 15 (12.7.15)
यदि स्वस्ति प्रजायन्ते जाता जीवन्ति वा यदि । संभाविता जातबला विदध्युर्यदि नः सुखम् । इह चामुत्र चैवेति कृपणाः फलहेतवः ॥
yadi svasti prajāyante jātā jīvanti vā yadi | saṃbhāvitā jātabalā vidadhyuryadi naḥ sukham | iha cāmutra caiveti kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ
यदि वे कुशल से जन्में, जन्म लेकर जीवित रहें, मान और बल पाकर यदि हमें सुख दें — यहाँ भी और परलोक में भी — ऐसी आशा वे दीन माताएँ फल की चाह से करती हैं।
श्लोक 16 (12.7.16)
तासामयं समुद्योगो निर्वृत्तः केवलोऽफलः । यदासां निहताः पुत्रा युवानो मृष्टकुण्डलाः ॥
tāsāmayaṃ samudyogo nirvṛttaḥ kevalo'phalaḥ | yadāsāṃ nihatāḥ putrā yuvāno mṛṣṭakuṇḍalāḥ
उनका यह सारा यत्न केवल निष्फल होकर रह गया, क्योंकि उनके युवा, चमकते कुण्डल पहने पुत्र मार डाले गए।
श्लोक 17 (12.7.17)
अभुक्त्वा पार्थिवान्भोगानृणान्यनपहाय च । पितृभ्यो देवताभ्यश्च गता वैवस्वतक्षयम् ॥
abhuktvā pārthivānbhogānṛṇānyanapahāya ca | pitṛbhyo devatābhyaśca gatā vaivasvatakṣayam
राजाओं के भोग भोगे बिना, पितरों और देवताओं के ऋण चुकाए बिना वे वैवस्वत के लोक को चले गए।
श्लोक 18 (12.7.18)
यदैषामम्ब पितरौ जातकर्मकराविह । संजातबालरूपेषु तदैव निहता नृपाः ॥
yadaiṣāmamba pitarau jātakarmakarāviha | saṃjātabālarūpeṣu tadaiva nihatā nṛpāḥ
हे माता! अभी तो यहाँ इनके माता-पिता ने इनके जातकर्म पूरे ही किए थे और इनके बालक-जैसे रूप अभी बने ही थे, कि तभी वे राजा मार डाले गए।
श्लोक 19 (12.7.19)
संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधामर्षसमन्विताः । न ते जयफलं किंचिद्भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥
saṃyuktāḥ kāmamanyubhyāṃ krodhāmarṣasamanvitāḥ | na te jayaphalaṃ kiṃcidbhoktāro jātu karhicit
काम और क्रोध से बँधे, रोष और असहिष्णुता से भरे उन्होंने कभी, किसी समय, विजय का कोई फल नहीं भोगा।
श्लोक 20 (12.7.20)
पाञ्चालानां कुरूणां च हता एव हि येऽहताः । न सकामा वयं ते च न चास्माभिर्न तैर्जितम् ॥
pāñcālānāṃ kurūṇāṃ ca hatā eva hi ye'hatāḥ | na sakāmā vayaṃ te ca na cāsmābhirna tairjitam
पांचालों और कौरवों में जो जीवित हैं, वे भी मरे हुओं जैसे ही हैं। न हमारी कामना पूरी हुई, न उनकी; न हमने सचमुच जीता, न उन्होंने।
श्लोक 21 (12.7.21)
न तैर्भुक्तेयमवनिर्न नार्यो गीतवादितम् । नामात्यसुहृदां वाक्यं न च श्रुतवतां श्रुतम् । न रत्नानि परार्ध्यानि न भूर्न द्रविणागमः ॥
na tairbhukteyamavanirna nāryo gītavāditam | nāmātyasuhṛdāṃ vākyaṃ na ca śrutavatāṃ śrutam | na ratnāni parārdhyāni na bhūrna draviṇāgamaḥ
उन्होंने न इस पृथ्वी को भोगा, न स्त्रियों को, न गीत-वाद्य को; न मन्त्रियों और मित्रों की बात को, न विद्वानों की सुनी हुई बातों को; न बहुमूल्य रत्नों को, न भूमि को, न धन की आय को।
श्लोक 22 (12.7.22)
न च धर्म्यानिमाँल्लोकान्प्रपद्याम स्वकर्मभिः । वयमेवास्य लोकस्य विनाशे कारणं स्मृताः । धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण निकृतिप्रीतिसंयुताः ॥
na ca dharmyānimām̐llokānprapadyāma svakarmabhiḥ | vayamevāsya lokasya vināśe kāraṇaṃ smṛtāḥ | dhṛtarāṣṭrasya putreṇa nikṛtiprītisaṃyutāḥ
और हम अपने कर्मों से इन धर्मयुक्त लोकों को भी नहीं पाएँगे। हम ही इस लोक के विनाश के कारण माने गए हैं — हम, जो धृतराष्ट्र के पुत्र के द्वारा छल और उसके आनन्द से जुड़ गए।
श्लोक 23 (12.7.23)
सदैव निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा विद्वेषजीवनः । मिथ्यावृत्तश्च सततमस्मास्वनपराधिषु ॥
sadaiva nikṛtiprajño dveṣṭā vidveṣajīvanaḥ | mithyāvṛttaśca satatamasmāsvanaparādhiṣu
वह सदा छल में चतुर, द्वेष करनेवाला, द्वेष पर ही जीनेवाला था, और हम निरपराधों के प्रति निरन्तर मिथ्या आचरण करता रहा।
श्लोक 24 (12.7.24)
ऋद्धिमस्मासु तां दृष्ट्वा विवर्णो हरिणः कृशः । धृतराष्ट्रश्च नृपतिः सौबलेन निवेदितः ॥
ṛddhimasmāsu tāṃ dṛṣṭvā vivarṇo hariṇaḥ kṛśaḥ | dhṛtarāṣṭraśca nṛpatiḥ saubalena niveditaḥ
हमारी वह समृद्धि देखकर वह पीला, मुरझाया और दुबला पड़ गया; और राजा धृतराष्ट्र को सौबल (शकुनि) ने यह बता दिया।
श्लोक 25 (12.7.25)
तं पिता पुत्रगृध्नुत्वादनुमेनेऽनये स्थितम् । अनपेक्ष्यैव पितरं गाङ्गेयं विदुरं तथा ॥
taṃ pitā putragṛdhnutvādanumene'naye sthitam | anapekṣyaiva pitaraṃ gāṅgeyaṃ viduraṃ tathā
पुत्र के मोह में पड़े पिता ने अनीति में स्थित उसकी बात मान ली, अपने पिता, गंगापुत्र भीष्म और विदुर की भी परवाह न करके।
श्लोक 26 (12.7.26)
असंशयं त्वयं राजा यथैवाहं तथा गतः । अनियम्याशुचिं लुब्धं पुत्रं कामवशानुगम् ॥
asaṃśayaṃ tvayaṃ rājā yathaivāhaṃ tathā gataḥ | aniyamyāśuciṃ lubdhaṃ putraṃ kāmavaśānugam
निस्सन्देह यह राजा भी वैसी ही दशा को पहुँचा जैसी मेरी है — जिसने अपवित्र, लोभी, काम के वश में चलनेवाले पुत्र को रोका नहीं।
श्लोक 27 (12.7.27)
यशसः पतितो दीप्ताद्धातयित्वा सहोदरान् । इमौ हि वृद्धौ शोकाग्नौ प्रक्षिप्य स सुयोधनः । अस्मत्प्रद्वेषसंतप्तः पापबुद्धिः सदैव ह ॥
yaśasaḥ patito dīptāddhātayitvā sahodarān | imau hi vṛddhau śokāgnau prakṣipya sa suyodhanaḥ | asmatpradveṣasaṃtaptaḥ pāpabuddhiḥ sadaiva ha
देदीप्यमान यश से गिरा हुआ, अपने भाइयों को मरवाकर, इन दोनों वृद्धों को शोक की आग में झोंककर, हमसे द्वेष से जलता हुआ वह सुयोधन सदा पापबुद्धि ही रहा।
श्लोक 28 (12.7.28)
को हि बन्धुः कुलीनः संस्तथा ब्रूयात्सुहृज्जने । यथाऽसाववदद्वाक्यं युयुत्सुः कृष्णसन्निधौ ॥
ko hi bandhuḥ kulīnaḥ saṃstathā brūyātsuhṛjjane | yathā'sāvavadadvākyaṃ yuyutsuḥ kṛṣṇasannidhau
कौन कुलीन बन्धु अपने सुहृदों से वैसी बात कहेगा, जैसी उस युद्ध के लोभी ने कृष्ण के सामने कही?
श्लोक 29 (12.7.29)
आत्मनो हि वयं दोषाद्विनष्टाः शाश्वतीः समाः । प्रदहन्तो दिशः सर्वा भास्वरा इव तेजसा ॥
ātmano hi vayaṃ doṣādvinaṣṭāḥ śāśvatīḥ samāḥ | pradahanto diśaḥ sarvā bhāsvarā iva tejasā
अपने ही दोष से हम अनन्त वर्षों के लिए नष्ट हो गए — हम, जो अपने तेज से सब दिशाओं को देदीप्यमान सूर्यों की तरह जलाते थे।
श्लोक 30 (12.7.30)
सोऽस्माकं वैरपुरुषो दुर्मतिः प्रग्रहं गतः । दुर्योधनकृते ह्येतत्कुलं नो विनिपातितम् ॥
so'smākaṃ vairapuruṣo durmatiḥ pragrahaṃ gataḥ | duryodhanakṛte hyetatkulaṃ no vinipātitam
वह दुर्बुद्धि हमारा वैरी बन्धन में पड़ गया; फिर भी दुर्योधन के कारण हमारा यह कुल गिरा दिया गया।
श्लोक 31 (12.7.31)
अवध्यानां वधं कृत्वा लोके प्राप्ताः स्म वाच्यतां ॥
avadhyānāṃ vadhaṃ kṛtvā loke prāptāḥ sma vācyatāṃ
न मारने योग्यों को मारकर हम संसार में निन्दा के भागी हुए।
श्लोक 32 (12.7.32)
कुलस्यास्यान्तकरणं दुर्मतिं पापपूरुषम् । राजा राष्ट्रेश्वरं कृत्वा धृतराष्ट्रोऽद्य शोचति ॥
kulasyāsyāntakaraṇaṃ durmatiṃ pāpapūruṣam | rājā rāṣṭreśvaraṃ kṛtvā dhṛtarāṣṭro'dya śocati
इस कुल का अन्त करनेवाले दुर्बुद्धि, पापी को राष्ट्र का स्वामी बनाकर राजा धृतराष्ट्र आज शोक कर रहे हैं।
श्लोक 33 (12.7.33)
हताः शूराः कृतं पापं विषयोऽसौ विनाशितः । हत्वा नो विगतो मन्युः शोको मां दारयत्ययम् ॥
hatāḥ śūrāḥ kṛtaṃ pāpaṃ viṣayo'sau vināśitaḥ | hatvā no vigato manyuḥ śoko māṃ dārayatyayam
शूर मारे गए, पाप हो गया, वह देश नष्ट हो गया। उन्हें मारकर हमारा क्रोध चला गया, और यह शोक मुझे चीरे डालता है।
श्लोक 34 (12.7.34)
धनञ्जय कृतं पापं कल्याणेनोपहन्यते । ख्यापनेनानुतापेन दानेन तपसाऽपि वा । निवृत्त्या तीर्थगमनाच्छुतिस्मृतिजपेन वा ॥
dhanañjaya kṛtaṃ pāpaṃ kalyāṇenopahanyate | khyāpanenānutāpena dānena tapasā'pi vā | nivṛttyā tīrthagamanācchutismṛtijapena vā
हे धनंजय! किया हुआ पाप कल्याणकारी कर्म से नष्ट होता है — पाप को प्रकट कर देने से, पश्चात्ताप से, दान से, तप से, उससे निवृत्त होने से, तीर्थयात्रा से, तथा श्रुति-स्मृति के जप से।
श्लोक 35 (12.7.35)
त्यागवांश्च पुनः पापं नालं कर्तुमिति श्रुतिः । त्यागवाञ्जन्ममरणे नाप्नोतीति श्रुतिर्यतः । प्राप्तवर्त्मा कृतमतिर्ब्रह्म संपद्यते तदा ॥
tyāgavāṃśca punaḥ pāpaṃ nālaṃ kartumiti śrutiḥ | tyāgavāñjanmamaraṇe nāpnotīti śrutiryataḥ | prāptavartmā kṛtamatirbrahma saṃpadyate tadā
और त्यागी फिर पाप करने में समर्थ नहीं होता, ऐसा श्रुति कहती है। चूँकि श्रुति कहती है कि त्यागी जन्म-मरण को नहीं पाता, इसलिए तब मार्ग पाकर, दृढ़ निश्चयवाला वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 36 (12.7.36)
स धनञ्जय निर्द्वन्द्वो मुनिर्ज्ञानसमन्वितः । वनमामन्त्र्य वः सर्वान्गमिष्यामि परंतप ॥
sa dhanañjaya nirdvandvo munirjñānasamanvitaḥ | vanamāmantrya vaḥ sarvāngamiṣyāmi paraṃtapa
हे धनंजय! द्वन्द्वों से रहित, ज्ञान से युक्त मुनि बनकर, हे परंतप, मैं तुम सबसे विदा लेकर वन को जाऊँगा।
श्लोक 37 (12.7.37)
न हि कृत्स्नतमो धर्मः शक्यः प्राप्तुमिति श्रुतिः । परिग्रहवता तन्मे प्रत्यक्षमरिसूदन ॥
na hi kṛtsnatamo dharmaḥ śakyaḥ prāptumiti śrutiḥ | parigrahavatā tanme pratyakṣamarisūdana
श्रुति कहती है कि परिग्रह रखनेवाला पूर्ण धर्म को नहीं पा सकता; हे शत्रुसूदन! यह मेरे लिए प्रत्यक्ष है।
श्लोक 38 (12.7.38)
मया निसृष्टं पापं हि परिग्रहमभीप्सता । जन्मक्षयनिमित्तं च प्राप्तुं शक्यमिति श्रुतिः ॥
mayā nisṛṣṭaṃ pāpaṃ hi parigrahamabhīpsatā | janmakṣayanimittaṃ ca prāptuṃ śakyamiti śrutiḥ
परिग्रह की इच्छा करते हुए मुझसे पाप हो गया; और श्रुति कहती है कि जन्म के क्षय का कारण पाया जा सकता है।
श्लोक 39 (12.7.39)
स परिग्रहमुत्सृज्य कृत्स्नं राज्यं सुखानि च । गमिष्यामि विनिर्मुक्तो विशोको निर्ममः क्वचित् । प्रशासध्वमिमामुर्वी क्षेमां निहतकण्टकाम् । न ममार्थोऽस्ति राज्येन भोगैर्वा कुरुनन्दन ॥
sa parigrahamutsṛjya kṛtsnaṃ rājyaṃ sukhāni ca | gamiṣyāmi vinirmukto viśoko nirmamaḥ kvacit | praśāsadhvamimāmurvī kṣemāṃ nihatakaṇṭakām | na mamārtho'sti rājyena bhogairvā kurunandana
इसलिए परिग्रह, समूचा राज्य और सुख छोड़कर मैं बन्धनमुक्त, शोकरहित और ममता से रहित होकर कहीं चला जाऊँगा। तुम सब इस शान्त, निष्कण्टक पृथ्वी का शासन करो; हे कुरुनन्दन! मुझे राज्य या भोगों से कोई प्रयोजन नहीं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (12.7.40)
एतावदुक्त्वा वचनं कुरुराजो युधिष्ठिरः । उपारमत्ततः पार्थः कनीयान्प्रत्यभाषत ॥
etāvaduktvā vacanaṃ kururājo yudhiṣṭhiraḥ | upāramattataḥ pārthaḥ kanīyānpratyabhāṣata
ऐसा कहकर कुरुराज युधिष्ठिर चुप हो गए; तब छोटे भाई पार्थ (अर्जुन) ने उत्तर दिया।