शान्ति पर्व · अध्याय 11
अर्जुन द्वारा इन्द्र और तपस्वियों का आख्यान
अर्जुन युधिष्ठिर को एक प्राचीन आख्यान सुनाते हैं। घर छोड़कर वन में गए कुछ युवा ब्राह्मणों पर इन्द्र दया करके स्वर्णिम पक्षी के रूप में उनके पास आते हैं और बाँटकर खाने के बाद बचा हुआ अन्न खाने वालों की प्रशंसा करते हैं। तपस्वी इसे अपनी प्रशंसा समझते हैं; पक्षी उनकी भूल सुधारकर बताता है कि यज्ञ तथा देवताओं, पितरों, अतिथियों और परिजनों में अन्न बाँटने वाला गृहस्थ-जीवन ही सबसे कठिन और श्रेष्ठ तप है। इससे समझकर तपस्वी गृहस्थ-धर्म में लौट जाते हैं, और अर्जुन युधिष्ठिर से पृथ्वी का शासन करने का आग्रह करते हैं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (12.11.1)
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । तापसैः सह संवादं शक्रस्य भरतर्षभ ॥
atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | tāpasaiḥ saha saṃvādaṃ śakrasya bharatarṣabha
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, हे भरतश्रेष्ठ: इन्द्र का कुछ तपस्वियों के साथ संवाद।
श्लोक 2 (12.11.2)
शक्यं पुनररण्येषु सुखमेतेन जीवितुम् । केचिद्गृहान्परित्यज्य वनमभ्यागमन्द्विजाः । अजातश्मश्रवो मन्दाः कुले जाताः प्रवव्रजुः ॥
śakyaṃ punararaṇyeṣu sukhametena jīvitum | kecidgṛhānparityajya vanamabhyāgamandvijāḥ | ajātaśmaśravo mandāḥ kule jātāḥ pravavrajuḥ
"वनों में इस प्रकार सुखपूर्वक जिया जा सकता है।" कुछ ब्राह्मण घर छोड़कर वन में चले गए; वे नासमझ युवक थे, जिनकी दाढ़ी-मूँछ अभी उगी नहीं थी, और जो अच्छे कुलों में जन्मे होकर भी संन्यासी हो गए थे।
श्लोक 3 (12.11.3)
धर्मोऽयमिति मन्वानाः समृद्धा धर्मचारिणः । त्यक्त्वा भ्रातॄन्पितॄंश्चैव तानिन्द्रोऽन्वकृपायत ॥
dharmo'yamiti manvānāḥ samṛddhā dharmacāriṇaḥ | tyaktvā bhrātṝnpitṝṃścaiva tānindro'nvakṛpāyata
"यही धर्म है" ऐसा मानकर वे सम्पन्न, धर्म का आचरण करने वाले लोग भाइयों और पिताओं को छोड़कर चले गए, और इन्द्र को उन पर दया आई।
श्लोक 4 (12.11.4)
स तान्बभाषे मघवान्पक्षीभूत्वा हिरण्मयः । सुदुष्करं मनुष्यैस्तु यत्कृतं विघसाशिभिः ॥
sa tānbabhāṣe maghavānpakṣībhūtvā hiraṇmayaḥ | suduṣkaraṃ manuṣyaistu yatkṛtaṃ vighasāśibhiḥ
उदार इन्द्र ने स्वर्णिम पक्षी का रूप लेकर उनसे कहा, "बचा हुआ अन्न खाने वाले इन मनुष्यों ने कैसा अत्यन्त कठिन कार्य किया है!"
इन्द्र उवाच
श्लोक 5 (12.11.5)
पुण्यं भवति कर्मैषां प्रशस्तं चैव जीवितम् । सिद्धार्थास्ते गतिं मुख्यां प्राप्ताः कर्मपरायणाः ॥
puṇyaṃ bhavati karmaiṣāṃ praśastaṃ caiva jīvitam | siddhārthāste gatiṃ mukhyāṃ prāptāḥ karmaparāyaṇāḥ
"इनका कर्म पुण्यमय है और इनका जीवन प्रशंसनीय है। कर्म में लगे रहने वाले ये सिद्धार्थ होकर परम गति को पा चुके हैं।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 6 (12.11.6)
अहो बतायं शकुनिर्विघसाशान्प्रशंसति । अस्मान्नूनमयं शास्ति वयं च विघसाशिनः ॥
aho batāyaṃ śakunirvighasāśānpraśaṃsati | asmānnūnamayaṃ śāsti vayaṃ ca vighasāśinaḥ
"अहो! यह पक्षी बचा हुआ अन्न खाने वालों की प्रशंसा कर रहा है। निश्चय ही यह हमें ही उपदेश दे रहा है, क्योंकि हम भी बचा हुआ अन्न खाने वाले हैं।"
शकुनिरुवाच
श्लोक 7 (12.11.7)
नाहं युष्मान्प्रशंसामि पङ्कदिग्धान्रजस्वलान् । उच्छिष्टभोजिनो मन्दानन्ये वै विघसाशिनः ॥
nāhaṃ yuṣmānpraśaṃsāmi paṅkadigdhānrajasvalān | ucchiṣṭabhojino mandānanye vai vighasāśinaḥ
"मैं तुम्हारी प्रशंसा नहीं कर रहा, जो कीचड़ में सने और धूल से भरे हुए, जूठन खाने वाले मूर्ख हो। बचा हुआ अन्न खाने वाले तो दूसरे ही लोग हैं।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 8 (12.11.8)
इदं श्रेयः परमिति वयमेवममंस्महि । शकुने ब्रूहि यच्छ्रेयो वयं ते श्रद्दधामहे ॥
idaṃ śreyaḥ paramiti vayamevamamaṃsmahi | śakune brūhi yacchreyo vayaṃ te śraddadhāmahe
"हमने तो यही परम कल्याण माना था। हे शकुनि, जो श्रेयस्कर है वह बताओ; हम तुम्हारी बात पर विश्वास करते हैं।"
शकुनिरुवाच
श्लोक 9 (12.11.9)
यदि मां नाभिशङ्कध्वं विभज्यात्मानमात्मना । ततोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं हितं वचः ॥
yadi māṃ nābhiśaṅkadhvaṃ vibhajyātmānamātmanā | tato'haṃ vaḥ pravakṣyāmi yāthātathyaṃ hitaṃ vacaḥ
"यदि तुम अपने को अपने ही विवेक से परखकर मुझ पर शंका न करो, तो मैं तुम्हें यथार्थ और हितकारी वचन बताऊँगा।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 10 (12.11.10)
शृणुमस्ते वचस्तात पन्थानो विदितास्तव । नियोगे चैव धर्मात्मन्स्थातुमिच्छाम शाधि नः ॥
śṛṇumaste vacastāta panthāno viditāstava | niyoge caiva dharmātmansthātumicchāma śādhi naḥ
"तात, हम आपकी बात सुनेंगे; आप मार्गों को जानते हैं। हे धर्मात्मा, हम आपके आदेश में रहना चाहते हैं; हमें शिक्षा दीजिए।"
शकुनिरुवाच
श्लोक 11 (12.11.11)
चतुष्पदां गौः प्रवरा लोहानां काञ्चनं वरम् । शब्दानां प्रवरो मन्त्रो ब्राह्मणो द्विपदां वरः ॥
catuṣpadāṃ gauḥ pravarā lohānāṃ kāñcanaṃ varam | śabdānāṃ pravaro mantro brāhmaṇo dvipadāṃ varaḥ
"चौपायों में गौ श्रेष्ठ है, धातुओं में सोना, शब्दों में मन्त्र, और दोपायों में ब्राह्मण।
श्लोक 12 (12.11.12)
मन्त्रोऽयं जातकर्मादिर्ब्राह्मणस्य विधीयते । जीवतोऽपि यथाकालं श्मशाननिधनान्तकः ॥
mantro'yaṃ jātakarmādirbrāhmaṇasya vidhīyate | jīvato'pi yathākālaṃ śmaśānanidhanāntakaḥ
जातकर्म आदि से लेकर श्मशान में अन्तिम संस्कार तक ये मन्त्र ब्राह्मण के जीवन में यथासमय विहित हैं।
श्लोक 13 (12.11.13)
कर्माणि वैदिकान्यस्य स्वर्ग्यः पन्थास्त्वनुत्तमः । अथ सर्वाणि कर्माणि मन्त्रसिद्धानि चक्षते । आम्नायदृढवादीनि तथा सिद्धिरिहेष्यते ॥
karmāṇi vaidikānyasya svargyaḥ panthāstvanuttamaḥ | atha sarvāṇi karmāṇi mantrasiddhāni cakṣate | āmnāyadṛḍhavādīni tathā siddhiriheṣyate
उसके वैदिक कर्म स्वर्ग का सर्वोत्तम मार्ग हैं। सब कर्म मन्त्रों से सिद्ध होने वाले कहे जाते हैं, और परम्परा के दृढ़ कथनों के अनुसार यहाँ सिद्धि मानी जाती है।
श्लोक 14 (12.11.14)
मासार्धमासा ऋतव आदित्यशशितारकम् । ग्रसन्ते कर्म भूतानि तदिदं कर्मशंसिनाम् ॥
māsārdhamāsā ṛtava ādityaśaśitārakam | grasante karma bhūtāni tadidaṃ karmaśaṃsinām
पक्ष, मास, ऋतुएँ, सूर्य, चन्द्रमा, तारे और सभी प्राणी कर्म को अपने भीतर समेटे रहते हैं। कर्म की प्रशंसा करने वालों का यही मत है।
श्लोक 15 (12.11.15)
सिद्धिक्षेत्रमिदं पुण्यमयमेवाश्रमो महान् ॥
siddhikṣetramidaṃ puṇyamayamevāśramo mahān
यह पवित्र सिद्धिक्षेत्र ही महान् आश्रम है।"
श्लोक 16 (12.11.16)
अथ ये कर्म निन्दन्तो मनुष्याः कापथं गताः । मूढानामर्थहीनानां तेषामेनस्तु विद्यते ॥
atha ye karma nindanto manuṣyāḥ kāpathaṃ gatāḥ | mūḍhānāmarthahīnānāṃ teṣāmenastu vidyate
"परन्तु जो मनुष्य कर्म की निन्दा करते हुए कुमार्ग पर चले गए हैं, उन मूढ़ों और अर्थहीनों को पाप लगता है।
श्लोक 17 (12.11.17)
देववंशान्पितृवंशान्ब्रह्मवंशांश्च शाश्वतान् । संत्यज्य मूढा वर्तन्ते ततो यान्त्यशुचीन्पथः ॥
devavaṃśānpitṛvaṃśānbrahmavaṃśāṃśca śāśvatān | saṃtyajya mūḍhā vartante tato yāntyaśucīnpathaḥ
देवों, पितरों और ब्रह्मा की सनातन वंश-परम्पराओं को छोड़कर वे मूढ़ जीते हैं, और इसी से अशुद्ध मार्गों पर जाते हैं।
श्लोक 18 (12.11.18)
एतद्वोऽस्तु तपोयुक्तं ददामीत्यृषिचोदितम् । तस्मात्तदध्यावसतस्तपस्वित्वमिहोच्यते ॥
etadvo'stu tapoyuktaṃ dadāmītyṛṣicoditam | tasmāttadadhyāvasatastapasvitvamihocyate
"यह तप के साथ तुम्हारा हो, मैं इसे देता हूँ" ऐसा ऋषि ने प्रेरित किया। इसीलिए उसमें रहने वालों को यहाँ तपस्वी कहा जाता है।
श्लोक 19 (12.11.19)
देववंशान्ब्रह्मवंशान्पितृवंशांश्च शाश्वतान् । संविभज्य गुरोश्चर्यां तद्वै दुष्करमुच्यते ॥
devavaṃśānbrahmavaṃśānpitṛvaṃśāṃśca śāśvatān | saṃvibhajya guroścaryāṃ tadvai duṣkaramucyate
देवों, ब्रह्मा और पितरों की सनातन वंश-परम्पराओं को निभाना, कर्तव्यों का बँटवारा करके बड़ों की सेवा करना, यही वास्तव में कठिन कहा जाता है।
श्लोक 20 (12.11.20)
देवा वै दुष्करं कृत्वा विभूतिं परमां गताः । तस्माद्गार्हस्थ्यमुद्वोढुं दुष्करं प्रब्रवीमि वः ॥
devā vai duṣkaraṃ kṛtvā vibhūtiṃ paramāṃ gatāḥ | tasmādgārhasthyamudvoḍhuṃ duṣkaraṃ prabravīmi vaḥ
देवताओं ने कठिन कार्य करके ही परम ऐश्वर्य पाया। इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि गृहस्थ-जीवन का भार उठाना कठिन है।
श्लोक 21 (12.11.21)
तपः श्रेष्ठं प्रजानां हि मूलमेतन्न संशयः । कुटुम्बविधिनाऽनेन यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
tapaḥ śreṣṭhaṃ prajānāṃ hi mūlametanna saṃśayaḥ | kuṭumbavidhinā'nena yasminsarvaṃ pratiṣṭhitam
तप ही श्रेष्ठ है, और प्राणियों का मूल यही है, इसमें सन्देह नहीं: गृहस्थी की यह व्यवस्था, जिस पर सब कुछ टिका है।
श्लोक 22 (12.11.22)
एतद्विदुस्तपो विप्रा द्वन्द्वातीता विमत्सराः । एतस्माद्वनमध्ये तु लोकेषु तप उच्यते ॥
etadvidustapo viprā dvandvātītā vimatsarāḥ | etasmādvanamadhye tu lokeṣu tapa ucyate
द्वन्द्वों से परे और ईर्ष्या से रहित ब्राह्मण इसी को तप जानते हैं। इसके बाद ही लोक में वन के बीच तप कहा जाता है।
श्लोक 23 (12.11.23)
दुराधर्षं पदं चैव गच्छन्ति विघसाशिनः । सायंप्रातर्विभज्यान्नं स्वकुटुम्बे यथाविधि ॥
durādharṣaṃ padaṃ caiva gacchanti vighasāśinaḥ | sāyaṃprātarvibhajyānnaṃ svakuṭumbe yathāvidhi
बचा हुआ अन्न खाने वाले अजेय पद को प्राप्त होते हैं; वे प्रातः और सायं विधि के अनुसार अपने कुटुम्ब में अन्न बाँटते हैं।
श्लोक 24 (12.11.24)
दत्त्वाऽतिथिभ्यो देवेभ्यः पितृभ्यः स्वजनाय च । अवशिष्टानि येऽश्नन्ति तानाहुर्विघसाशिनः ॥
dattvā'tithibhyo devebhyaḥ pitṛbhyaḥ svajanāya ca | avaśiṣṭāni ye'śnanti tānāhurvighasāśinaḥ
अतिथियों, देवताओं, पितरों और स्वजनों को देकर जो शेष बचा अन्न खाते हैं, उन्हें विघसाशी कहा जाता है।
श्लोक 25 (12.11.25)
तस्मात्स्वधर्ममास्थाय सुव्रताः सत्यवादिनः । लोकस्य गुरवो भूत्वा ते भवन्त्यनुपस्कृताः ॥
tasmātsvadharmamāsthāya suvratāḥ satyavādinaḥ | lokasya guravo bhūtvā te bhavantyanupaskṛtāḥ
इसलिए अपने धर्म में स्थित, उत्तम व्रतों वाले और सत्यवादी लोग संसार के गुरु बनकर निर्दोष होते हैं।
श्लोक 26 (12.11.26)
त्रिदिवं प्राप्य शक्रस्य स्वर्गलोके विमत्सराः । वसन्ति शाश्वतान्वर्षाञ्जना दुष्करकारिणः ॥
tridivaṃ prāpya śakrasya svargaloke vimatsarāḥ | vasanti śāśvatānvarṣāñjanā duṣkarakāriṇaḥ
इन्द्र के त्रिदिव में, स्वर्गलोक में पहुँचकर वे कठिन कर्म करने वाले लोग ईर्ष्या से रहित होकर अनन्त वर्षों तक वहाँ निवास करते हैं।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 27 (12.11.27)
ततस्ते तद्वचः श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम् । उत्सृज्य नास्तिकमतिं गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रिताः ॥
tataste tadvacaḥ śrutvā dharmārthasahitaṃ hitam | utsṛjya nāstikamatiṃ gārhasthyaṃ dharmamāśritāḥ
तब धर्म और अर्थ से युक्त उसके हितकारी वचन सुनकर उन्होंने नास्तिक बुद्धि त्याग दी और गृहस्थ-धर्म का आश्रय लिया।
श्लोक 28 (12.11.28)
तस्मात्त्वमपि सर्वज्ञ धैर्यमालम्ब्य शाश्वतम् । प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां हतामित्रां नरोत्तम ॥
tasmāttvamapi sarvajña dhairyamālambya śāśvatam | praśādhi pṛthivīṃ kṛtsnāṃ hatāmitrāṃ narottama
इसलिए, हे सर्वज्ञ, आप भी शाश्वत धैर्य का सहारा लेकर शत्रुओं का नाश करके सारी पृथ्वी का शासन कीजिए, हे नरश्रेष्ठ।