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शान्ति पर्व · अध्याय 12

गृहस्थ-धर्म और यज्ञ के पक्ष में नकुल का उपदेश

अर्जुन के बाद नकुल संसार छोड़ने की इच्छा रखने वाले युधिष्ठिर से कहते हैं। वे समझाते हैं कि देवता भी कर्म पर ही टिके हैं, सच्चा त्याग अभिमान का त्याग है, घर छोड़ना नहीं, और यज्ञ, दान तथा पितरों, देवताओं और अतिथियों के प्रति कर्तव्य से भरा गृहस्थाश्रम सब आश्रमों में भारी है। बीच में ईश्वर को चेतना और कर्म का एकमात्र स्रोत बताने वाला प्रसंग आता है, और अन्त में नकुल राजा से महायज्ञ करने, ब्राह्मणों को उदारता से दान देने, प्रजा की रक्षा करने और शोक त्यागने का आग्रह करते हैं।

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.12.1)

अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नकुलो वाक्यमब्रवीत् । राजानमभिसंप्रेक्ष्य सर्वधर्मभृतां वरम् ॥

arjunasya vacaḥ śrutvā nakulo vākyamabravīt | rājānamabhisaṃprekṣya sarvadharmabhṛtāṃ varam

अर्जुन की बात सुनकर नकुल ने सब धर्मों को धारण करने वालों में श्रेष्ठ राजा की ओर देखकर कहा।

श्लोक 2 (12.12.2)

अनुरुध्य महाप्राज्ञो भ्रातुश्चित्तमरिंदम । व्यूढोरस्को महाबाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता ॥

anurudhya mahāprājño bhrātuścittamariṃdama | vyūḍhorasko mahābāhustāmrāsyo mitabhāṣitā

हे शत्रुदमन, अपने भाई के मन के अनुकूल होकर अत्यन्त बुद्धिमान, चौड़ी छाती और बलवान भुजाओं वाले, ताँबे के रंग के मुख वाले और मितभाषी नकुल बोले।

नकुल उवाच

श्लोक 3 (12.12.3)

विशाखयूपे देवानां सर्वेषामग्नयश्चिताः । तस्माद्विद्धि महाराज देवाः कर्मफले स्थिताः ॥

viśākhayūpe devānāṃ sarveṣāmagnayaścitāḥ | tasmādviddhi mahārāja devāḥ karmaphale sthitāḥ

विशाखयूप में सब देवताओं की अग्नि-वेदियाँ चुनी हुई खड़ी हैं। हे महाराज, इससे जान लीजिए कि देवता भी कर्म के फल पर ही टिके हैं।

श्लोक 4 (12.12.4)

अनास्तिकानां भूतानां प्राणदाः पितरश्च ये । तेऽपि कर्मैव कुर्वन्ति विधिं पश्यस्व पार्थिव ॥

anāstikānāṃ bhūtānāṃ prāṇadāḥ pitaraśca ye | te'pi karmaiva kurvanti vidhiṃ paśyasva pārthiva

जो आस्तिक प्राणियों को प्राण देने वाले हैं और जो पितर हैं, वे भी कर्म ही करते हैं। हे राजन्, इस विधान को देखिए।

श्लोक 5 (12.12.5)

वेदवादापविद्धास्तु तान्विद्धि भृशनास्तिकान् । न हि वेदोक्तमुत्सृज्य विप्रः सर्वेषु कर्मसु ॥

vedavādāpaviddhāstu tānviddhi bhṛśanāstikān | na hi vedoktamutsṛjya vipraḥ sarveṣu karmasu

जो वेद के मार्ग से भ्रष्ट हो गए हैं, उन्हें पक्का नास्तिक समझिए। क्योंकि कोई ब्राह्मण किसी भी कर्म में वेद-विहित कर्म को नहीं छोड़ता;

श्लोक 6 (12.12.6)

देवयानेन नाकस्य पृष्ठमाप्नोति भारत । अत्याश्रमानयं सर्वानित्याहुर्वेदनिश्चयाः ॥

devayānena nākasya pṛṣṭhamāpnoti bhārata | atyāśramānayaṃ sarvānityāhurvedaniścayāḥ

और देवयान मार्ग से वह स्वर्ग के शिखर तक पहुँचता है, हे भारत। वेद में निश्चय रखने वाले कहते हैं कि यह आश्रम अन्य सब आश्रमों से बढ़कर है।

श्लोक 7 (12.12.7)

ब्राह्मणाः श्रुतिसंपन्नास्तान्निबोध नराधिप । वित्तानि धर्मलब्धानि क्रतुमुख्येष्ववासृजन् ॥

brāhmaṇāḥ śrutisaṃpannāstānnibodha narādhipa | vittāni dharmalabdhāni kratumukhyeṣvavāsṛjan

हे नरेश, उन ब्राह्मणों को पहचानिए जो शास्त्र-ज्ञान से सम्पन्न हैं और जिन्होंने धर्म से कमाया धन श्रेष्ठ यज्ञों में लगा दिया।

श्लोक 8 (12.12.8)

कृतात्मा स महाराज स वै त्यागी स्मृतो नरः ॥

kṛtātmā sa mahārāja sa vai tyāgī smṛto naraḥ

हे महाराज, ऐसा आत्म-संयमी पुरुष ही सचमुच त्यागी माना गया है।

श्लोक 9 (12.12.9)

अनवेक्ष्य सुखादानं तथैवोर्ध्वं प्रतिष्ठितः । आत्मत्यागी महाराज स त्यागी तापसो मतः ॥

anavekṣya sukhādānaṃ tathaivordhvaṃ pratiṣṭhitaḥ | ātmatyāgī mahārāja sa tyāgī tāpaso mataḥ

जो सुख-भोग की ओर ध्यान नहीं देता और इसी प्रकार ऊँचे मार्ग में स्थित रहता है, जो स्वयं को त्याग देता है, हे महाराज, वह त्यागी तपस्वी माना जाता है।

श्लोक 10 (12.12.10)

अनिकेतः परिपतन्वृक्षमूलाश्रयो मुनिः । अयाचकः सदायोगी स त्यागी पार्थ भिक्षुकः ॥

aniketaḥ paripatanvṛkṣamūlāśrayo muniḥ | ayācakaḥ sadāyogī sa tyāgī pārtha bhikṣukaḥ

जो बिना घर के घूमता है, पेड़ की जड़ में रहता है, मौन रहने वाला मुनि है, कुछ नहीं माँगता और सदा योग में लगा रहता है, हे पार्थ, वह भिक्षु त्यागी है।

श्लोक 11 (12.12.11)

क्रोधहर्षावनादृत्य पैशुन्यं च विशेषतः । विप्रो वेदानधीते यः स त्यागी गुरुपूजकः ॥

krodhaharṣāvanādṛtya paiśunyaṃ ca viśeṣataḥ | vipro vedānadhīte yaḥ sa tyāgī gurupūjakaḥ

जो ब्राह्मण क्रोध और हर्ष को तथा विशेष रूप से चुगली को छोड़कर वेदों का अध्ययन करता है, वह गुरु की पूजा करने वाला त्यागी है।

श्लोक 12 (12.12.12)

आश्रमांस्तुलया सर्वान्धृतानाहुर्मनीषिणः । एकतश्च त्रयो राजन्गृहस्थाश्रम एकतः ॥

āśramāṃstulayā sarvāndhṛtānāhurmanīṣiṇaḥ | ekataśca trayo rājangṛhasthāśrama ekataḥ

विद्वान् कहते हैं कि सब आश्रमों को तराजू पर तौला गया था; हे राजन्, एक ओर तीन आश्रम थे और दूसरी ओर अकेला गृहस्थाश्रम।

श्लोक 13 (12.12.13)

समीक्ष्य तुलया पार्थ कामं स्वर्गं च भारत । अयं पन्था महर्षीणामियं लोकविदां गतिः ॥

samīkṣya tulayā pārtha kāmaṃ svargaṃ ca bhārata | ayaṃ panthā maharṣīṇāmiyaṃ lokavidāṃ gatiḥ

हे पार्थ, हे भारत, काम और स्वर्ग को तराजू पर तौलकर देखा गया; यही महर्षियों का मार्ग है, यही लोक को जानने वालों की गति है।

श्लोक 14 (12.12.14)

इति यः कुरुते भावं स त्यागी भरतर्षभ । नरः परित्यज्य गृहान्वनमेति विमूढवत् ॥

iti yaḥ kurute bhāvaṃ sa tyāgī bharatarṣabha | naraḥ parityajya gṛhānvanameti vimūḍhavat

हे भरतश्रेष्ठ, जो ऐसा भाव रखता है वही त्यागी है। जो मनुष्य घर छोड़कर वन में चला जाता है, वह मूढ़ के समान करता है।

श्लोक 15 (12.12.15)

यदा कामान्समीक्षेत धर्मवैतंसिको नरः । अथैनं मृत्युपाशेन कण्ठे बध्नाति मृत्युराट् ॥

yadā kāmānsamīkṣeta dharmavaitaṃsiko naraḥ | athainaṃ mṛtyupāśena kaṇṭhe badhnāti mṛtyurāṭ

जब धर्म का दिखावा करने वाला मनुष्य कामनाओं की ओर देखता है, तब मृत्यु का राजा उसके गले में मृत्यु का फंदा कस देता है।

श्लोक 16 (12.12.16)

अभिमानकृतं कर्म नैतत्फलवदुच्यते । त्यागयुक्तं महाराज सर्वमेव महाफलम् ॥

abhimānakṛtaṃ karma naitatphalavaducyate | tyāgayuktaṃ mahārāja sarvameva mahāphalam

अभिमान से किया हुआ कर्म फलदायी नहीं कहा जाता; पर हे महाराज, त्याग से युक्त सब कुछ महान फल देने वाला होता है।

श्लोक 17 (12.12.17)

शमो दमस्तथा धैर्यं सत्यं शौचमथार्जवम् । यज्ञो धृतिश्च धर्मश्च नित्यमार्षो विधिः स्मृतः ॥

śamo damastathā dhairyaṃ satyaṃ śaucamathārjavam | yajño dhṛtiśca dharmaśca nityamārṣo vidhiḥ smṛtaḥ

शम, दम, धैर्य, सत्य, शुद्धता, सरलता, यज्ञ, धृति और धर्म: यही ऋषियों का सदा से चला आता विधान माना गया है।

श्लोक 18 (12.12.18)

पितृदेवातिथिकृते समारम्भोऽत्र शस्यते । अत्रैव हि महाराज त्रिवर्गः केवलं फलम् ॥

pitṛdevātithikṛte samārambho'tra śasyate | atraiva hi mahārāja trivargaḥ kevalaṃ phalam

पितरों, देवताओं और अतिथियों के लिए किया गया प्रयत्न यहीं सराहा जाता है; और हे महाराज, यहीं तीनों पुरुषार्थ पूरा फल हैं।

श्लोक 19 (12.12.19)

एतस्मिन्वर्तमानस्य विधौ विप्रनिषेविते । त्यागिनः प्रसृतस्येह नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ॥

etasminvartamānasya vidhau vipraniṣevite | tyāginaḥ prasṛtasyeha nocchittirvidyate kvacit

जो ब्राह्मणों द्वारा सेवित इस विधान में रहता है, इसमें आगे बढ़ा हुआ त्यागी है, उसका यहाँ कभी नाश नहीं होता।

श्लोक 20 (12.12.20)

असृजद्धि प्रजा राजन्प्रजापतिरकल्मषः । मां यक्ष्यन्तीति धर्मात्मा यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ॥

asṛjaddhi prajā rājanprajāpatirakalmaṣaḥ | māṃ yakṣyantīti dharmātmā yajñairvividhadakṣiṇaiḥ

हे राजन्, निष्पाप और धर्मात्मा प्रजापति ने प्रजा की रचना यह सोचकर की कि "ये नाना प्रकार के यज्ञों और दक्षिणाओं से मेरी पूजा करेंगे।"

श्लोक 21 (12.12.21)

वीरुधश्चैव वृक्षांश्च यज्ञार्थं वै तथौषधीः । पशूंश्चैव तथा मेध्यान्यज्ञार्थानि हवींषि च ॥

vīrudhaścaiva vṛkṣāṃśca yajñārthaṃ vai tathauṣadhīḥ | paśūṃścaiva tathā medhyānyajñārthāni havīṃṣi ca

उसने यज्ञ के लिए लताएँ, वृक्ष और ओषधियाँ बनाईं, और पवित्र पशु तथा यज्ञ के योग्य हवि-सामग्री भी बनाई।

श्लोक 22 (12.12.22)

गृहस्थाश्रमिणस्तच्च यज्ञकर्माविरोधितम् । तस्माद्गार्हस्थ्यमेवेह दुष्करं दुर्लभं तथा ॥

gṛhasthāśramiṇastacca yajñakarmāvirodhitam | tasmādgārhasthyameveha duṣkaraṃ durlabhaṃ tathā

वह गृहस्थाश्रम वालों का है और यज्ञ-कर्म का विरोधी नहीं है। इसीलिए गृहस्थ-जीवन यहाँ कठिन भी है और दुर्लभ भी।

श्लोक 23 (12.12.23)

तत्संप्राप्य गृहस्था ये पशुधान्यधनान्विताः । न यजन्ते महाराज शाश्वतं तेषु किल्विषम् ॥

tatsaṃprāpya gṛhasthā ye paśudhānyadhanānvitāḥ | na yajante mahārāja śāśvataṃ teṣu kilviṣam

जो गृहस्थ इसे पाकर पशु, अन्न और धन से सम्पन्न होकर भी यज्ञ नहीं करते, हे महाराज, उन पर सदा का पाप बना रहता है।

श्लोक 24 (12.12.24)

स्वाध्याययज्ञा ऋषयो ज्ञानयज्ञास्तथा परे । अथापरे महायज्ञान्मनस्येव वितन्वते ॥

svādhyāyayajñā ṛṣayo jñānayajñāstathā pare | athāpare mahāyajñānmanasyeva vitanvate

कुछ ऋषियों का यज्ञ स्वाध्याय है, कुछ का ज्ञान-यज्ञ है, और कुछ दूसरे महान यज्ञों को मन में ही सम्पन्न करते हैं।

श्लोक 25 (12.12.25)

इदमन्यन्महाराज विद्वद्भिः कथितं मम । भूमिरग्निश्च वायुश्च न चापो न दिवाकरः ॥

idamanyanmahārāja vidvadbhiḥ kathitaṃ mama | bhūmiragniśca vāyuśca na cāpo na divākaraḥ

हे महाराज, विद्वानों ने मुझसे यह और भी कहा है: न पृथ्वी है, न अग्नि, न वायु, न जल, न सूर्य,

श्लोक 26 (12.12.26)

नक्षत्राणि न चन्द्रश्च न दिशः काल एव च । शब्दः स्पर्शश्च रूपं च न गन्धो न रसः क्वचित् ॥

nakṣatrāṇi na candraśca na diśaḥ kāla eva ca | śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca na gandho na rasaḥ kvacit

न नक्षत्र, न चन्द्रमा, न दिशाएँ, न काल ही; शब्द, स्पर्श और रूप नहीं हैं, न गन्ध है, न रस, कहीं भी नहीं।

श्लोक 27 (12.12.27)

न च सन्ति प्रमाणानि यैः प्रमेयं प्रसाध्यते । प्रत्यक्षमनुमानं न नोपमानमथागमः ॥

na ca santi pramāṇāni yaiḥ prameyaṃ prasādhyate | pratyakṣamanumānaṃ na nopamānamathāgamaḥ

ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिनसे प्रमेय सिद्ध हो: न प्रत्यक्ष, न अनुमान, न उपमान, न शास्त्र,

श्लोक 28 (12.12.28)

नार्थापत्तिर्न चैतिह्यं न दृष्टान्तो न संशयः । न क्वचिन्निर्णयो राजन्न धर्माधर्म एव च ॥

nārthāpattirna caitihyaṃ na dṛṣṭānto na saṃśayaḥ | na kvacinnirṇayo rājanna dharmādharma eva ca

न अर्थापत्ति, न परम्परा, न दृष्टान्त, न संशय। हे राजन्, कहीं कोई निर्णय नहीं है, और न धर्म-अधर्म ही है।

श्लोक 29 (12.12.29)

तिर्यक्च स्थावरं चैव न देवा न च मानुषाः । वर्णाश्रमविभागाश्च न च कर्ता न कामकृत् । न चार्थश्च विभूतिश्च न चार्थस्य विचेष्टितम् ॥

tiryakca sthāvaraṃ caiva na devā na ca mānuṣāḥ | varṇāśramavibhāgāśca na ca kartā na kāmakṛt | na cārthaśca vibhūtiśca na cārthasya viceṣṭitam

न पशु-पक्षी हैं, न स्थावर, न देवता, न मनुष्य; न वर्णों और आश्रमों के भेद, न कर्ता, न कामना से कर्म करने वाला; न धन, न ऐश्वर्य, न धन के लिए कोई चेष्टा।

श्लोक 30 (12.12.30)

तमोभूतमिदं सर्वमनालोकं जगन्नृप । न चात्मा विद्यमानोपि मनसा योगमिच्छति ॥

tamobhūtamidaṃ sarvamanālokaṃ jagannṛpa | na cātmā vidyamānopi manasā yogamicchati

हे राजन्, यह सारा संसार अन्धकार-रूप और प्रकाश-रहित हो गया है; और आत्मा विद्यमान होते हुए भी मन के साथ योग नहीं चाहती।

श्लोक 31 (12.12.31)

अचेतनं मनस्त्वासीदात्मा एव सचेतनः । ईश्वरश्चेतनस्त्वेकस्तेनेदं गहनीकृतम् । मन्त्राश्च चेतना राजन्न च देहेन योजिताः ॥

acetanaṃ manastvāsīdātmā eva sacetanaḥ | īśvaraścetanastvekastenedaṃ gahanīkṛtam | mantrāśca cetanā rājanna ca dehena yojitāḥ

मन जड़ था; केवल आत्मा ही चेतन है। एकमात्र ईश्वर ही चेतन है, और उसी ने इस जगत् को गहन बना दिया है। हे राजन्, मन्त्र भी चेतन हैं, यद्यपि वे देह से जुड़े नहीं हैं।

श्लोक 32 (12.12.32)

तेन विश्वसृजो नाम ऋषयो मन्त्रदेवताः । चैतन्यमीश्वरात्प्राप्य ब्रह्माण्डं तैर्विनिर्मितम् ॥

tena viśvasṛjo nāma ṛṣayo mantradevatāḥ | caitanyamīśvarātprāpya brahmāṇḍaṃ tairvinirmitam

उसी से विश्वसृज नाम के ऋषियों ने, जो मन्त्रों के देवता हैं, ईश्वर से चेतना पाकर ब्रह्माण्ड की रचना की।

श्लोक 33 (12.12.33)

इष्ट्वा विश्वसृजं यज्ञं निर्मितः प्रपितामहः । सृष्टिस्तेन समारब्धा प्रसादादीश्वरस्य च ॥

iṣṭvā viśvasṛjaṃ yajñaṃ nirmitaḥ prapitāmahaḥ | sṛṣṭistena samārabdhā prasādādīśvarasya ca

विश्वसृज यज्ञ करके प्रपितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए; उन्होंने ईश्वर की कृपा से सृष्टि का आरम्भ किया।

श्लोक 34 (12.12.34)

चैतन्यमीश्वरस्येदं सचेतनमिदं जगत् । योगेन च समाविष्टं जगत्कृत्स्नं च शंभुना ॥

caitanyamīśvarasyedaṃ sacetanamidaṃ jagat | yogena ca samāviṣṭaṃ jagatkṛtsnaṃ ca śaṃbhunā

यह ईश्वर की चेतना है, जिससे यह जगत् चेतन है; और सारा जगत् शम्भु के योग से व्याप्त है।

श्लोक 35 (12.12.35)

धर्मश्चार्थश्च कामश्च उक्तो मोक्षश्च संक्षये । ब्रह्मणः परमेशस्य ईश्वरेण यदृच्छया ॥

dharmaścārthaśca kāmaśca ukto mokṣaśca saṃkṣaye | brahmaṇaḥ parameśasya īśvareṇa yadṛcchayā

धर्म, अर्थ और काम, तथा प्रलय के समय मोक्ष, परमेश्वर ब्रह्मा के लिए ईश्वर ने अपनी इच्छा से बताए।

श्लोक 36 (12.12.36)

अज्ञो जन्तुरनीशश्च भाजनं सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ॥

ajño janturanīśaśca bhājanaṃ sukhaduḥkhayoḥ | īśvaraprerito gacchetsvargaṃ vā śvabhrameva vā

अज्ञानी जीव, जिसका कोई स्वामित्व नहीं, सुख-दुःख का पात्र है; ईश्वर की प्रेरणा से वह स्वर्ग जाए या नरक।

श्लोक 37 (12.12.37)

प्रधानं पुरुषः चैव आत्मानं सर्वदेहिनाम् । मनसा विषयैश्चैव चेतनेन प्रचोदिताः । सुखदुःखेन युज्यन्ते कर्मभिश्च प्रचोदिताः ॥

pradhānaṃ puruṣaḥ caiva ātmānaṃ sarvadehinām | manasā viṣayaiścaiva cetanena pracoditāḥ | sukhaduḥkhena yujyante karmabhiśca pracoditāḥ

प्रधान, पुरुष और सब देहधारियों की आत्मा, मन, विषयों और चेतन से प्रेरित होकर, सुख-दुःख से जुड़ते हैं और कर्मों से प्रेरित होते हैं।

श्लोक 38 (12.12.38)

वर्णाश्रमविभागाश्च ईश्वरेण प्रवर्तिताः । सदेवासुरगन्धर्वं येनेदं निर्मितं जगत् ॥

varṇāśramavibhāgāśca īśvareṇa pravartitāḥ | sadevāsuragandharvaṃ yenedaṃ nirmitaṃ jagat

वर्णों और आश्रमों के भेद ईश्वर ने चलाए, जिसने देवता, असुर और गन्धर्वों सहित यह जगत् रचा।

श्लोक 39 (12.12.39)

त्वं चान्ये च महाराज ईश्वरस्य वशे स्थिताः । जीवन्ते च म्रियन्ते च न स्वतन्त्राः कथंचन ॥

tvaṃ cānye ca mahārāja īśvarasya vaśe sthitāḥ | jīvante ca mriyante ca na svatantrāḥ kathaṃcana

हे महाराज, आप और दूसरे सब ईश्वर के वश में हैं; वे जीते और मरते हैं, किसी प्रकार स्वतन्त्र नहीं हैं।

श्लोक 40 (12.12.40)

हित्वाहित्वा च भूतानि हत्वा सर्वमिदं जगत् । यजन्ते कर्मणा देवा न स पापेन लिप्यते ॥

hitvāhitvā ca bhūtāni hatvā sarvamidaṃ jagat | yajante karmaṇā devā na sa pāpena lipyate

प्राणियों को बार-बार छोड़ते हुए और इस सारे जगत् का संहार करते हुए देवता कर्म से यज्ञ करते हैं; वह पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 41 (12.12.41)

हिंसात्मकानि कर्माणि सर्वेषां गृहमेधिनाम् । देवतानामृषीणां च ते च यान्ति परां गतिम् ॥

hiṃsātmakāni karmāṇi sarveṣāṃ gṛhamedhinām | devatānāmṛṣīṇāṃ ca te ca yānti parāṃ gatim

सब गृहस्थों, देवताओं और ऋषियों के कर्म हिंसा से युक्त हैं, फिर भी वे परम गति को पाते हैं।

श्लोक 42 (12.12.42)

पातिताः शत्रवः पूर्व सर्वत्र वसुधाधिपैः । प्रजानां हितकामैश्च आत्मनश्च हितैषिभिः ॥

pātitāḥ śatravaḥ pūrva sarvatra vasudhādhipaiḥ | prajānāṃ hitakāmaiśca ātmanaśca hitaiṣibhiḥ

पूर्वकाल में पृथ्वी के स्वामी राजाओं ने प्रजा का हित चाहते हुए और अपना कल्याण खोजते हुए सर्वत्र शत्रुओं को मार गिराया।

श्लोक 43 (12.12.43)

यदि तत्र भवेत्पापं कथं ते स्वर्गमास्थिताः । न प्राप्ता नरकं राजन्वेष्टिताः पापकर्मभिः ॥

yadi tatra bhavetpāpaṃ kathaṃ te svargamāsthitāḥ | na prāptā narakaṃ rājanveṣṭitāḥ pāpakarmabhiḥ

यदि उसमें पाप होता, तो वे स्वर्ग में कैसे पहुँचे? हे राजन्, पापकर्मों से घिरे होने पर भी वे नरक को नहीं गए।

श्लोक 44 (12.12.44)

एवं मनःसमाधानं मार्गमातिष्ठतो नृप । द्विजातेर्ब्रह्मभूतस्य स्पृहयन्ति दिवौकसः ॥

evaṃ manaḥsamādhānaṃ mārgamātiṣṭhato nṛpa | dvijāterbrahmabhūtasya spṛhayanti divaukasaḥ

जो द्विज मन को स्थिर करने के इस मार्ग पर चलता है और ब्रह्म-रूप हो गया है, उसकी स्वर्गवासी भी इच्छा करते हैं।

श्लोक 45 (12.12.45)

स रत्नानि विचित्राणि संहृतानि ततस्ततः । मखेष्वनभिसन्त्यज्य नास्तिक्यमभिजल्पसि ॥

sa ratnāni vicitrāṇi saṃhṛtāni tatastataḥ | makheṣvanabhisantyajya nāstikyamabhijalpasi

आप यहाँ-वहाँ से नाना रत्न बटोरकर उन्हें यज्ञों में दान नहीं करते, और फिर भी नास्तिकता की बातें करते हैं।

श्लोक 46 (12.12.46)

कुटुम्बमास्थिते त्यागं न पश्यामि नराधिप । राजसूयाश्वमेधेषु सर्वमेधेषु वा पुनः ॥

kuṭumbamāsthite tyāgaṃ na paśyāmi narādhipa | rājasūyāśvamedheṣu sarvamedheṣu vā punaḥ

हे नरेश, जो परिवार में बना रहता है उसमें मैं त्याग नहीं देखता; और राजसूय, अश्वमेध या फिर सर्वमेध में,

श्लोक 47 (12.12.47)

ये चान्ये क्रतवस्तात ब्राह्मणैरभिपूजिताः । तैर्यजस्व महीपाल शक्रो देवपतिर्यथा ॥

ye cānye kratavastāta brāhmaṇairabhipūjitāḥ | tairyajasva mahīpāla śakro devapatiryathā

तथा अन्य जिन यज्ञों का ब्राह्मण आदर करते हैं, उनसे यजन कीजिए, हे पृथ्वीपाल, जैसे देवताओं के स्वामी इन्द्र ने किया था।

श्लोक 48 (12.12.48)

राज्ञः प्रमाददोषेण दस्युभिः परिमुष्यताम् । अशरण्यः प्रजानां यः स राजा कलिरुच्यते ॥

rājñaḥ pramādadoṣeṇa dasyubhiḥ parimuṣyatām | aśaraṇyaḥ prajānāṃ yaḥ sa rājā kalirucyate

जिस राजा की असावधानी से प्रजा को डाकू लूटते हैं और जो प्रजा का शरण नहीं बनता, वह राजा "कलि" कहलाता है।

श्लोक 49 (12.12.49)

अश्वान्गाश्चैव दासीश्च करेणूश्च स्वलंकृताः । ग्रामाञ्जनपदांश्चैव क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥

aśvāngāścaiva dāsīśca kareṇūśca svalaṃkṛtāḥ | grāmāñjanapadāṃścaiva kṣetrāṇi ca gṛhāṇi ca

घोड़े, गायें, दासियाँ, सजी हुई हथिनियाँ, गाँव, जनपद, खेत और घर:

श्लोक 50 (12.12.50)

अप्रदाय द्विजातिभ्यो मात्सर्याविष्टचेतसः । वयं ते राजकलयो भविष्याम विशांपते ॥

apradāya dvijātibhyo mātsaryāviṣṭacetasaḥ | vayaṃ te rājakalayo bhaviṣyāma viśāṃpate

हे विशाम्पते, यदि ईर्ष्या से भरे मन से हम इन्हें द्विजों को नहीं देंगे, तो हम कलि-रूप राजा बन जाएँगे।

श्लोक 51 (12.12.51)

अदातारोऽशरण्याश्च राजकिल्विषभागिनः । दुःखानामेव भोक्तारो न सुखानां कदाचन ॥

adātāro'śaraṇyāśca rājakilviṣabhāginaḥ | duḥkhānāmeva bhoktāro na sukhānāṃ kadācana

जो कुछ नहीं देते, किसी के शरण नहीं हैं और राजा के पाप के भागी हैं, वे केवल दुःख भोगते हैं, सुख कभी नहीं।

श्लोक 52 (12.12.52)

अनिष्ट्वा च महायज्ञैरकृत्वा च पितृस्वधाम् । तीर्थेष्वनभिसंप्लुत्य प्रव्रजिष्यसि चेत्प्रभो ॥

aniṣṭvā ca mahāyajñairakṛtvā ca pitṛsvadhām | tīrtheṣvanabhisaṃplutya pravrajiṣyasi cetprabho

हे प्रभो, यदि आप महायज्ञ किए बिना, पितरों को स्वधा दिए बिना और तीर्थों में स्नान किए बिना संन्यास लेकर चल देंगे,

श्लोक 53 (12.12.53)

छिन्नाभ्रमिव गन्तासि विलयं मारुतेरितम् । लोकयोरुभयोर्भ्रष्टो ह्यन्तराले व्यवस्थितः ॥

chinnābhramiva gantāsi vilayaṃ māruteritam | lokayorubhayorbhraṣṭo hyantarāle vyavasthitaḥ

तो हवा से उड़ाए गए फटे बादल की तरह नाश को प्राप्त होंगे, दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर बीच में अटके रहेंगे।

श्लोक 54 (12.12.54)

अन्तर्बहिश्च यत्किंचिन्मनोव्यासङ्गकारकम् । परित्यज्य भवेत्त्यागी न हित्वा प्रतितिष्ठति ॥

antarbahiśca yatkiṃcinmanovyāsaṅgakārakam | parityajya bhavettyāgī na hitvā pratitiṣṭhati

भीतर या बाहर जो कुछ भी मन को आसक्त करता है, उसे छोड़कर मनुष्य त्यागी बनता है; केवल छोड़ देने से, बिना प्रतिष्ठित हुए, कोई स्थिर नहीं होता।

श्लोक 55 (12.12.55)

एतस्मिन्वर्तमानस्य विधौ विप्रनिषेविते । ब्राह्मणस्य महाराज नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ॥

etasminvartamānasya vidhau vipraniṣevite | brāhmaṇasya mahārāja nocchittirvidyate kvacit

हे महाराज, ब्राह्मणों द्वारा सेवित इस विधान में रहने वाले ब्राह्मण का कभी नाश नहीं होता।

श्लोक 56 (12.12.56)

निहत्य शत्रूंस्तरसा समृद्धाञ्शक्रो यथा दैत्यबलानि सङ्ख्ये । कः पार्थ शोचेन्निरतः स्वधर्मे पूर्वैः स्मृते पार्थिवशिष्टजुष्टे ॥

nihatya śatrūṃstarasā samṛddhāñśakro yathā daityabalāni saṅkhye | kaḥ pārtha śocennirataḥ svadharme pūrvaiḥ smṛte pārthivaśiṣṭajuṣṭe

हे पार्थ, जैसे इन्द्र ने युद्ध में दैत्यों की सेनाओं को मारा, वैसे ही समृद्ध शत्रुओं को शीघ्र मारकर, जो अपने धर्म में लगा है, जिसे पूर्वजों ने बताया और श्रेष्ठ राजाओं ने अपनाया, ऐसा कौन शोक करेगा?

श्लोक 57 (12.12.57)

क्षात्रेण धर्मेण पराक्रमेण जित्वा महीं मन्त्रविद्भ्यः प्रदाय । नाकस्य पृष्ठेऽसि नरेन्द्र गन्ता न शोचितव्यं भवताऽद्य पार्थ ॥

kṣātreṇa dharmeṇa parākrameṇa jitvā mahīṃ mantravidbhyaḥ pradāya | nākasya pṛṣṭhe'si narendra gantā na śocitavyaṃ bhavatā'dya pārtha

क्षत्रिय-धर्म और पराक्रम से पृथ्वी को जीतकर और मन्त्रवेत्ताओं को देकर, हे नरेन्द्र, आप स्वर्ग के शिखर पर जाएँगे। हे पार्थ, अब आपको शोक नहीं करना चाहिए।

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