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शान्ति पर्व · अध्याय 13

सहदेव का उपदेश: संसार नहीं, ममता का त्याग

भाइयों में अन्तिम वक्ता सहदेव युधिष्ठिर से कहते हैं कि बाहरी वस्तुओं को छोड़ देने से सिद्धि नहीं मिलती; 'मेरा' का भाव मृत्यु है, जबकि 'मेरा नहीं' का भाव शाश्वत है। यदि आत्मा अविनाशी है तो हिंसा का दोष नहीं लगता, और यदि वह शरीर के साथ नष्ट होती है तो कर्म-मार्ग व्यर्थ है; इसलिए राजा को सज्जनों और पूर्व चक्रवर्तियों के चले मार्ग पर चलना, पृथ्वी का शासन और भोग करना और प्राणियों के स्वभाव को देखना चाहिए। अन्त में वे अपने व्यथा-भरे वचनों के लिए क्षमा माँगते हैं, जो उन्होंने भक्ति से कहे हैं।

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सहदेव उवाच

श्लोक 1 (12.13.1)

न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत । शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ॥

na bāhyaṃ dravyamutsṛjya siddhirbhavati bhārata | śārīraṃ dravyamutsṛjya siddhirbhavati vā na vā

हे भारत, बाहरी वस्तुओं को छोड़ देने से सिद्धि नहीं मिलती; शरीर से जुड़ी वस्तुओं को छोड़ देने से सिद्धि मिल भी सकती है और नहीं भी।

श्लोक 2 (12.13.2)

बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेष्वनुगृध्यतः । यो धर्मो यत्सुखं वा स्याद्द्विषतां तत्तथाऽस्तु नः ॥

bāhyadravyavimuktasya śārīreṣvanugṛdhyataḥ | yo dharmo yatsukhaṃ vā syāddviṣatāṃ tattathā'stu naḥ

जो बाहरी वस्तुओं से मुक्त है पर शरीर की वस्तुओं में आसक्त है, उसका जो धर्म या सुख हो, वह हमारे शत्रुओं का हो; हमारे लिए वैसा ही हो।

श्लोक 3 (12.13.3)

शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य पृथिवीमनुशासतः । यो धर्मो यत्सुखं वा स्यात्सुहृदां तत्तथाऽस्तु नः ॥

śārīraṃ dravyamutsṛjya pṛthivīmanuśāsataḥ | yo dharmo yatsukhaṃ vā syātsuhṛdāṃ tattathā'stu naḥ

जो शरीर की वस्तुओं को छोड़कर पृथ्वी पर शासन करता है, उसका जो धर्म या सुख हो, वह हमारे मित्रों का हो; हमारे लिए वैसा ही हो।

श्लोक 4 (12.13.4)

द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति द्व्यक्षरो मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥

dvyakṣarastu bhavenmṛtyustryakṣaraṃ brahma śāśvatam | mameti dvyakṣaro mṛtyurna mameti ca śāśvatam

मृत्यु दो अक्षरों की है और शाश्वत ब्रह्म तीन अक्षरों का। "मम" (मेरा) दो अक्षरों की मृत्यु है, और "न मम" (मेरा नहीं) शाश्वत है।

श्लोक 5 (12.13.5)

ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव समाश्रितौ । अदृश्यमानौ भूतानि योजयेतामसंशयम् ॥

brahmamṛtyū tato rājannātmanyeva samāśritau | adṛśyamānau bhūtāni yojayetāmasaṃśayam

हे राजन्, ब्रह्म और मृत्यु दोनों आत्मा में ही आश्रित हैं; अदृश्य रहकर वे निःसन्देह प्राणियों को एक-दूसरे से भिड़ाते हैं।

श्लोक 6 (12.13.6)

अविनाशोऽस्य सत्वस्य नियतो यदि भारत । हित्वा शरीरं भूतानां न हिंसा प्रतिपत्स्यते ॥

avināśo'sya satvasya niyato yadi bhārata | hitvā śarīraṃ bhūtānāṃ na hiṃsā pratipatsyate

हे भारत, यदि इस सत्त्व का अविनाशी होना निश्चित हो, तो प्राणियों के शरीर को छोड़ देने से हिंसा का दोष नहीं लगेगा।

श्लोक 7 (12.13.7)

अथापि च सहोत्पत्तिः सत्वस्य प्रलयस्तथा । नष्टे शरीरे नष्टः स्याद्वृथा च स्यात्क्रियापथः ॥

athāpi ca sahotpattiḥ satvasya pralayastathā | naṣṭe śarīre naṣṭaḥ syādvṛthā ca syātkriyāpathaḥ

पर यदि सत्त्व की उत्पत्ति और प्रलय शरीर के साथ ही होते हैं, तो शरीर के नष्ट होने पर वह भी नष्ट हो जाएगा और कर्म का मार्ग व्यर्थ ठहरेगा।

श्लोक 8 (12.13.8)

तस्मादेकान्तमुत्सृज्य पूर्वैः पूर्वतरैश्च यः । पन्था निषेवितः सद्भिः स निषेव्यो विजानता ॥

tasmādekāntamutsṛjya pūrvaiḥ pūrvataraiśca yaḥ | panthā niṣevitaḥ sadbhiḥ sa niṣevyo vijānatā

इसलिए एकान्तिक दृष्टि छोड़कर, पूर्वजों और उनसे भी पूर्वजों के द्वारा सज्जनों ने जिस मार्ग का सेवन किया है, समझदार को उसी का सेवन करना चाहिए।

श्लोक 9 (12.13.9)

स्वायंभुवेन मनुना तथाऽन्यैश्चक्रवर्तिभिः । यद्ययं ह्यधमः पन्थाः कस्मात्तैस्तैर्निषेवितः ॥

svāyaṃbhuvena manunā tathā'nyaiścakravartibhiḥ | yadyayaṃ hyadhamaḥ panthāḥ kasmāttaistairniṣevitaḥ

स्वायम्भुव मनु और अन्य चक्रवर्ती राजाओं ने भी, यदि यह मार्ग निकृष्ट है, तो उसका सेवन क्यों किया?

श्लोक 10 (12.13.10)

कृतत्रेतादियुक्तानि गुणवन्ति च भारत । युगानि बहुशस्तैश्च भुक्तेयमवनी नृप ॥

kṛtatretādiyuktāni guṇavanti ca bhārata | yugāni bahuśastaiśca bhukteyamavanī nṛpa

हे भारत, कृत, त्रेता आदि गुणों से भरे युगों में उन्होंने बहुत बार इस पृथ्वी का भोग किया, हे राजन्।

श्लोक 11 (12.13.11)

लब्ध्वाऽपि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम् । न भुङ्क्ते यो नृपः सम्यक्किंफलं तस्य जीविते ॥

labdhvā'pi pṛthivīṃ kṛtsnāṃ sahasthāvarajaṅgamām | na bhuṅkte yo nṛpaḥ samyakkiṃphalaṃ tasya jīvite

जो राजा चर-अचर सहित सारी पृथ्वी को पाकर भी उसका ठीक से भोग नहीं करता, उसके जीवन का क्या फल है?

श्लोक 12 (12.13.12)

अथवा वसतो राजन्वने वन्येन जीवतः । द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते ॥

athavā vasato rājanvane vanyena jīvataḥ | dravyeṣu yasya mamatā mṛtyorāsye sa vartate

अथवा हे राजन्, जो वन में रहता है और वन के कन्द-मूल से जीता है, यदि उसे वस्तुओं में ममता है, तो वह मृत्यु के मुख में है।

श्लोक 13 (12.13.13)

बाह्यान्तराणां भूतानां स्वभावं पश्य भारत । ये तु पश्यन्ति तद्भूतं मुच्यन्ते ते महाभयात् ॥

bāhyāntarāṇāṃ bhūtānāṃ svabhāvaṃ paśya bhārata | ye tu paśyanti tadbhūtaṃ mucyante te mahābhayāt

हे भारत, बाहर और भीतर के प्राणियों के स्वभाव को देखिए; जो उस सत्ता को देखते हैं, वे महान भय से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 14 (12.13.14)

भवान्पिता भवान्माता भवान्भ्राता भवान्गुरुः । दुःखप्रलापानार्तस्य तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥

bhavānpitā bhavānmātā bhavānbhrātā bhavānguruḥ | duḥkhapralāpānārtasya tanme tvaṃ kṣantumarhasi

आप मेरे पिता हैं, माता हैं, भाई हैं और गुरु हैं; मैं पीड़ा से व्याकुल हूँ, इसलिए मेरे विलाप के लिए आपको मुझे क्षमा करना चाहिए।

श्लोक 15 (12.13.15)

तथ्यं वा यदि वाऽतथ्यं यन्मयैतत्प्रभाषितम् । तद्विद्धि पृथिवीपाल भक्त्या भरतसत्तम ॥

tathyaṃ vā yadi vā'tathyaṃ yanmayaitatprabhāṣitam | tadviddhi pṛthivīpāla bhaktyā bharatasattama

जो मैंने कहा है, वह सत्य हो या असत्य, हे पृथ्वीपाल, हे भरतश्रेष्ठ, उसे भक्ति से कहा हुआ समझिए।

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