शान्ति पर्व · अध्याय 14
द्रौपदी का युधिष्ठिर से दण्ड और राजधर्म का आग्रह
भाइयों के बीच युधिष्ठिर को चुप बैठा देखकर द्रौपदी उन्हें उलाहना देती हैं: द्वैतवन में उन्होंने कहा था कि विजय से वनवास का दुःख सुख में बदल जाएगा, और अब वे फिर शोक कर रहे हैं। वे कहती हैं कि दण्ड के बिना राजा राज्य नहीं चला सकता; आगे के अंश में बताया गया है कि राजा देवताओं के अंशों से कैसे रचा गया, दण्ड जगत् की रक्षा कैसे करता है, और आततायियों तथा ब्रह्महत्या करने वालों का क्या दण्ड है। वे द्यूतसभा में हुए अपने अपमान का स्मरण कराती हैं और कहती हैं कि धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने में कोई दोष नहीं। अन्त में वे उनसे पृथ्वी पर शासन करने, यज्ञ करने और द्विजों को दान देने का आग्रह करती हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.14.1)
अव्याहरति कौन्तेये धर्मराजे युधिष्ठिरे । भ्रातृणां ब्रुवतां तांस्तान्विविधान्वेदनिश्चयान् ॥
avyāharati kaunteye dharmarāje yudhiṣṭhire | bhrātṛṇāṃ bruvatāṃ tāṃstānvividhānvedaniścayān
जब कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर चुप बैठे थे और उनके भाई एक-एक करके वेदों के भिन्न-भिन्न निश्चित सिद्धान्त कह रहे थे,
श्लोक 2 (12.14.2)
महाभिजनसंपन्ना श्रीमत्यायतलोचना । अभ्यभाषत राजानं द्रौपदी योषितां वरा ॥
mahābhijanasaṃpannā śrīmatyāyatalocanā | abhyabhāṣata rājānaṃ draupadī yoṣitāṃ varā
तब उत्तम कुल में उत्पन्न, शोभामयी, विशाल नेत्रों वाली, स्त्रियों में श्रेष्ठ द्रौपदी ने राजा से कहा,
श्लोक 3 (12.14.3)
आसीनमृषभं राज्ञां भ्रातृभिः परिवारितम् । सिंहशार्दूलसदृशैर्वारणैरिव यूथपम् ॥
āsīnamṛṣabhaṃ rājñāṃ bhrātṛbhiḥ parivāritam | siṃhaśārdūlasadṛśairvāraṇairiva yūthapam
जब वे राजाओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर सिंहों और व्याघ्रों के समान भाइयों से घिरे बैठे थे, जैसे हाथियों के बीच यूथपति बैठा हो।
श्लोक 4 (12.14.4)
अभिमानवती नित्यं विशेषेण युधिष्ठिरे । लालिता सततं राज्ञा धर्माधर्मनिदर्शिनी ॥
abhimānavatī nityaṃ viśeṣeṇa yudhiṣṭhire | lālitā satataṃ rājñā dharmādharmanidarśinī
वह सदा अभिमानिनी थीं, और युधिष्ठिर पर तो विशेष रूप से; राजा ने उन्हें सदा लाड़-प्यार से रखा था, और वे धर्म तथा अधर्म को पहचानने वाली थीं।
श्लोक 5 (12.14.5)
आमन्त्रयित्वा सुश्रोणी साम्ना परमवल्गुना । भर्तारमभिसंप्रेक्ष्य ततो वचनमब्रवीत् ॥
āmantrayitvā suśroṇī sāmnā paramavalgunā | bhartāramabhisaṃprekṣya tato vacanamabravīt
सुन्दर कटि वाली द्रौपदी ने अत्यन्त मधुर और कोमल वाणी से सम्बोधित करके अपने पति की ओर देखा और फिर यह वचन कहा।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 6 (12.14.6)
इमे ते भ्रातरः पार्थ शुष्यन्ते स्तोकका इव । वावाश्यमानास्तिष्ठन्ति न चैनानभिनन्दसे ॥
ime te bhrātaraḥ pārtha śuṣyante stokakā iva | vāvāśyamānāstiṣṭhanti na cainānabhinandase
हे पार्थ, आपके ये भाई चातकों की तरह पुकारते हुए खड़े हैं और सूखे जा रहे हैं, पर आप इनका अभिनन्दन नहीं करते।
श्लोक 7 (12.14.7)
नन्दयैतान्महाराज मत्तानिव महाद्विपान् । उपपन्नेन वाक्येन सततं दुःखभागिनः ॥
nandayaitānmahārāja mattāniva mahādvipān | upapannena vākyena satataṃ duḥkhabhāginaḥ
हे महाराज, मतवाले बड़े हाथियों की तरह इन्हें भी उचित वचनों से प्रसन्न कीजिए; ये सदा आपके दुःख के भागी रहे हैं।
श्लोक 8 (12.14.8)
कथं द्वैतवने राजन्पूर्वमुक्त्वा तथा वचः । भ्रातॄनेतान्स्म सहिताञ्शीतवातातपार्दितान् ॥
kathaṃ dvaitavane rājanpūrvamuktvā tathā vacaḥ | bhrātṝnetānsma sahitāñśītavātātapārditān
हे राजन्, द्वैतवन में जब ये सब भाई एकत्र थे और शीत, वायु तथा धूप से पीड़ित थे, तब आपने इनसे ऐसा वचन क्यों कहा था—
श्लोक 9 (12.14.9)
वयं दुर्योधनं हत्वा मृधे भोक्ष्याम मेदिनीम् । संपूर्णां सर्वकामानामाहवे विजयैषिणः ॥
vayaṃ duryodhanaṃ hatvā mṛdhe bhokṣyāma medinīm | saṃpūrṇāṃ sarvakāmānāmāhave vijayaiṣiṇaḥ
"हम युद्ध में दुर्योधन को मारकर, विजय की इच्छा से लड़ते हुए, सब कामनाओं से भरी हुई पृथ्वी का भोग करेंगे;
श्लोक 10 (12.14.10)
नृवीरांश्च रथान्हत्वा निहत्य च महागजान् । संस्तीर्य च रथैर्भूमिं ससादिभिररिंदमाः ॥
nṛvīrāṃśca rathānhatvā nihatya ca mahāgajān | saṃstīrya ca rathairbhūmiṃ sasādibhirariṃdamāḥ
वीर योद्धाओं और रथों को मारकर, बड़े-बड़े हाथियों का वध करके, और रथों तथा घुड़सवारों से भूमि को पाट करके, हे शत्रुओं का दमन करने वालो,
श्लोक 11 (12.14.11)
यजेम विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । वनवासकृतं दुःखं भविष्यति सुखाय नः ॥
yajema vividhairyajñaiḥ samṛddhairāptadakṣiṇaiḥ | vanavāsakṛtaṃ duḥkhaṃ bhaviṣyati sukhāya naḥ
हम समृद्ध और पूरी दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ करेंगे; वनवास में जो दुःख हमने सहा है, वह हमारे सुख का कारण बन जाएगा।"
श्लोक 12 (12.14.12)
इत्येतानेवमुक्त्वा त्वं स्वयं धर्मभृतां वर । कथमद्य पुनर्वीर विनिहंसि मनांसि नः ॥
ityetānevamuktvā tvaṃ svayaṃ dharmabhṛtāṃ vara | kathamadya punarvīra vinihaṃsi manāṃsi naḥ
हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, स्वयं इन्हें ऐसा कहकर, हे वीर, आज आप फिर हमारे मनों को क्यों कुचल रहे हैं?
श्लोक 13 (12.14.13)
न क्लीबो वसुधां भुङ्क्ते न क्लीबो धनमश्नुते । न क्लीबस्य गृहे पुत्रा मत्स्याः पङ्क इवासते ॥
na klībo vasudhāṃ bhuṅkte na klībo dhanamaśnute | na klībasya gṛhe putrā matsyāḥ paṅka ivāsate
निर्बल-हृदय मनुष्य पृथ्वी का भोग नहीं करता, वह धन नहीं पाता; ऐसे के घर में पुत्र कीचड़ में पड़ी मछलियों की तरह रहते हैं।
श्लोक 14 (12.14.14)
नादण्डः क्षत्रियो भाति नादण्डो भूमिमश्नुते । नादण्डस्य प्रजा राज्ञः सुखं विन्दन्ति भारत ॥
nādaṇḍaḥ kṣatriyo bhāti nādaṇḍo bhūmimaśnute | nādaṇḍasya prajā rājñaḥ sukhaṃ vindanti bhārata
दण्ड के बिना क्षत्रिय शोभा नहीं पाता, दण्ड के बिना वह भूमि नहीं पाता; हे भारत, दण्डहीन राजा की प्रजा सुख नहीं पाती।
श्लोक 15 (12.14.15)
सदेवासुरगन्धर्वैरप्सरोभिर्विभूषितम् । रक्षोभिर्गुह्यकैर्नागैर्मनुष्यैश्च विभूषितम् ॥
sadevāsuragandharvairapsarobhirvibhūṣitam | rakṣobhirguhyakairnāgairmanuṣyaiśca vibhūṣitam
यह जगत् देवताओं, असुरों और गन्धर्वों से, अप्सराओं से, राक्षसों, गुह्यकों, नागों और मनुष्यों से सुशोभित है;
श्लोक 16 (12.14.16)
त्रिवर्गेण च संपूर्णं त्रिवर्गस्यागमेन च । दण्डेनाभ्याहृतं सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥
trivargeṇa ca saṃpūrṇaṃ trivargasyāgamena ca | daṇḍenābhyāhṛtaṃ sarvaṃ jagadbhogāya kalpate
और धर्म, अर्थ, काम इन तीनों वर्गों से तथा उन्हें पाने के साधनों से पूर्ण है; यह सारा जगत् दण्ड के द्वारा वश में आकर ही भोग के योग्य होता है।
श्लोक 17 (12.14.17)
स्वायंभुवं महीपाल आगमं शृणु शाश्वतम् । विप्राणां विदितश्चायं तव चैव विशांपते ॥
svāyaṃbhuvaṃ mahīpāla āgamaṃ śṛṇu śāśvatam | viprāṇāṃ viditaścāyaṃ tava caiva viśāṃpate
हे पृथ्वीपालक, स्वायम्भुव का सनातन आगम सुनिए; हे प्रजापते, यह ब्राह्मणों को भी विदित है और आपको भी।
श्लोक 18 (12.14.18)
अराजके हि लोकेऽस्मिन्सर्वतो विद्रुते भयात् । रक्षार्थमस्य लोकस्य राजानमसृजत्प्रभुः । महाकायं महावीर्यं पालने जगतः क्षमम् ॥
arājake hi loke'sminsarvato vidrute bhayāt | rakṣārthamasya lokasya rājānamasṛjatprabhuḥ | mahākāyaṃ mahāvīryaṃ pālane jagataḥ kṣamam
जब यह लोक राजा के बिना भय से चारों ओर बिखर गया था, तब प्रभु ने इसकी रक्षा के लिए एक राजा रचा—विशाल देह वाला, महापराक्रमी, जगत् का पालन करने में समर्थ।
श्लोक 19 (12.14.19)
अनिलाग्नियमार्काणामिन्द्रस्य वरुणस्य च । चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥
anilāgniyamārkāṇāmindrasya varuṇasya ca | candravitteśayoścaiva mātrā nirhṛtya śāśvatīḥ
वायु, अग्नि, यम, सूर्य, इन्द्र, वरुण, चन्द्रमा और धनेश कुबेर के शाश्वत अंश लेकर उसे रचा;
श्लोक 20 (12.14.20)
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां संभवत्यंशतो नृपः । तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ॥
yasmādeṣāṃ surendrāṇāṃ saṃbhavatyaṃśato nṛpaḥ | tasmādabhibhavatyeṣa sarvabhūtāni tejasā
और क्योंकि राजा इन देवेश्वरों के अंश से उत्पन्न होता है, इसलिए वह अपने तेज से सब प्राणियों को दबा लेता है।
श्लोक 21 (12.14.21)
तपत्यादित्यवच्चैव चक्षूंषि च मनांसि च । न चैनं भुवि शक्नोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ॥
tapatyādityavaccaiva cakṣūṃṣi ca manāṃsi ca | na cainaṃ bhuvi śaknoti kaścidapyabhivīkṣitum
वह सूर्य की तरह आँखों और मनों को तपाता है, और पृथ्वी पर कोई उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता।
श्लोक 22 (12.14.22)
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमश्च धर्मराट् । स कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रतापवान् ॥
so'gnirbhavati vāyuśca so'rkaḥ somaśca dharmarāṭ | sa kuberaḥ sa varuṇaḥ sa mahendraḥ pratāpavān
वह अग्नि और वायु है, वही सूर्य और चन्द्रमा है, वही धर्मराज है; वही कुबेर है, वही वरुण है, वही प्रतापी महेन्द्र है।
श्लोक 23 (12.14.23)
पितामहस्य देवस्य विष्णोः शर्वस्य चैव हि । ऋषीणां चैव सर्वेषां तस्मिंस्तेजः प्रतिष्ठितम् ॥
pitāmahasya devasya viṣṇoḥ śarvasya caiva hi | ṛṣīṇāṃ caiva sarveṣāṃ tasmiṃstejaḥ pratiṣṭhitam
उसमें पितामह देव ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सब ऋषियों का तेज प्रतिष्ठित है।
श्लोक 24 (12.14.24)
बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥
bālo'pi nāvamantavyo manuṣya iti bhūmipaḥ | mahatī devatā hyeṣā nararūpeṇa tiṣṭhati
राजा बालक भी हो तो "यह तो मनुष्य ही है" ऐसा समझकर उसका अनादर नहीं करना चाहिए; वह मनुष्य के रूप में स्थित एक महान् देवता है।
श्लोक 25 (12.14.25)
एकमेव दहत्यग्निर्नरं दुरुपसर्पिणम् । कुलं दहति राजाग्निः सपशुद्रव्यसंचयम् ॥
ekameva dahatyagnirnaraṃ durupasarpiṇam | kulaṃ dahati rājāgniḥ sapaśudravyasaṃcayam
अग्नि तो केवल उसी एक मनुष्य को जलाती है जो उसके पास अनुचित रीति से जाता है; राजारूपी अग्नि पशुओं और धन-सम्पत्ति के साथ पूरे कुल को जला देती है।
श्लोक 26 (12.14.26)
धृतराष्ट्रकुलं दग्धं क्रोधोद्भूतेन वह्निना । प्रत्यक्षमेतल्लोकस्य संशयो हि न विद्यते ॥
dhṛtarāṣṭrakulaṃ dagdhaṃ krodhodbhūtena vahninā | pratyakṣametallokasya saṃśayo hi na vidyate
धृतराष्ट्र का कुल क्रोध से उत्पन्न अग्नि में जल गया है; यह संसार के सामने प्रत्यक्ष है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 27 (12.14.27)
कुलजो वृत्तसंपन्नो धार्मिकश्च महीपतिः । प्रजानां पालने युक्तः पूज्यते दैवतैरपि ॥
kulajo vṛttasaṃpanno dhārmikaśca mahīpatiḥ | prajānāṃ pālane yuktaḥ pūjyate daivatairapi
जो राजा कुलीन, सदाचारी और धार्मिक होकर प्रजा के पालन में लगा रहता है, देवता भी उसका सम्मान करते हैं।
श्लोक 28 (12.14.28)
कार्यं योऽवेक्ष्य शक्तिं च देशकालौ च तत्वतः । कुरुते धर्मसिद्ध्यर्थं वैश्वरूप्यं पुनः पुनः ॥
kāryaṃ yo'vekṣya śaktiṃ ca deśakālau ca tatvataḥ | kurute dharmasiddhyarthaṃ vaiśvarūpyaṃ punaḥ punaḥ
जो कार्य, अपनी शक्ति तथा देश और काल को ठीक-ठीक देखकर धर्म की सिद्धि के लिए बार-बार भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है—
श्लोक 29 (12.14.29)
तस्य प्रसादे पद्मा श्रीर्विजयश्च पराक्रमे । मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजोमयो हि सः ॥
tasya prasāde padmā śrīrvijayaśca parākrame | mṛtyuśca vasati krodhe sarvatejomayo hi saḥ
उसकी प्रसन्नता में कमलवासिनी लक्ष्मी रहती हैं, उसके पराक्रम में विजय, और उसके क्रोध में मृत्यु; क्योंकि वह सर्वथा तेजोमय है।
श्लोक 30 (12.14.30)
तं यस्तु द्वेष्टि संमोहात्स विनश्यति मानवः । तस्य ह्याशुविनाशाय राजाऽपि कुरुते मनः ॥
taṃ yastu dveṣṭi saṃmohātsa vinaśyati mānavaḥ | tasya hyāśuvināśāya rājā'pi kurute manaḥ
जो मनुष्य मोहवश उससे द्वेष करता है, वह नष्ट हो जाता है; ऐसे मनुष्य के शीघ्र विनाश के लिए राजा स्वयं मन में ठान लेता है।
श्लोक 31 (12.14.31)
तस्माद्धर्मं यदिष्टेषु स व्यवस्यति पार्थिवः । अनिष्टं चाप्यनिष्टेषु तद्धर्मं न विचालयेत् ॥
tasmāddharmaṃ yadiṣṭeṣu sa vyavasyati pārthivaḥ | aniṣṭaṃ cāpyaniṣṭeṣu taddharmaṃ na vicālayet
इसलिए वह राजा अपने प्रिय जनों के लिए जिसे धर्म ठहराता है, और अप्रिय जनों के लिए जिसे अधर्म, उस निर्णय को कोई डिगाए नहीं।
श्लोक 32 (12.14.32)
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् । ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत्पूर्वमीश्वरः ॥
tasyārthe sarvabhūtānāṃ goptāraṃ dharmamātmajam | brahmatejomayaṃ daṇḍamasṛjatpūrvamīśvaraḥ
उसी के लिए ईश्वर ने आरम्भ में दण्ड की रचना की—सब प्राणियों का रक्षक, धर्मस्वरूप, उनका अपना पुत्र, ब्रह्मतेज से भरा हुआ।
श्लोक 33 (12.14.33)
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । भयाद्भोगाय कल्पन्ते धर्मान्न विचलन्ति च ॥
tasya sarvāṇi bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | bhayādbhogāya kalpante dharmānna vicalanti ca
उसके भय से सब प्राणी, चर और अचर, भोग के योग्य बनते हैं और धर्म से विचलित नहीं होते।
श्लोक 34 (12.14.34)
देशकालौ च शक्तिं च कार्यं चावेक्ष्य तत्वतः । यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥
deśakālau ca śaktiṃ ca kāryaṃ cāvekṣya tatvataḥ | yathārhataḥ saṃpraṇayennareṣvanyāyavartiṣu
देश, काल, अपनी शक्ति और कार्य को ठीक-ठीक देखकर वह अन्याय के मार्ग पर चलने वाले मनुष्यों पर यथायोग्य दण्ड का प्रयोग करे।
श्लोक 35 (12.14.35)
स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः । वर्णानामाश्रमाणां च धर्मप्रभुरथाव्ययः ॥
sa rājā puruṣo daṇḍaḥ sa netā śāsitā ca saḥ | varṇānāmāśramāṇāṃ ca dharmaprabhurathāvyayaḥ
वह राजा ही पुरुष है, वही दण्ड है, वही नेता और शासक है; वह वर्णों और आश्रमों के धर्म का अविनाशी स्वामी है।
श्लोक 36 (12.14.36)
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति । दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥
daṇḍaḥ śāsti prajāḥ sarvā daṇḍa evābhirakṣati | daṇḍaḥ supteṣu jāgarti daṇḍaṃ dharmaṃ vidurbudhāḥ
दण्ड सब प्रजाओं पर शासन करता है, दण्ड ही उनकी रक्षा करता है; जब सब सोते हैं तब दण्ड जागता रहता है—विद्वान् दण्ड को ही धर्म जानते हैं।
श्लोक 37 (12.14.37)
सुसमीक्ष्य धृतो दण्डः सर्वा रञ्जयति प्रजाः । असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वशः ॥
susamīkṣya dhṛto daṇḍaḥ sarvā rañjayati prajāḥ | asamīkṣya praṇītastu vināśayati sarvaśaḥ
भली-भाँति विचारकर धारण किया गया दण्ड सब प्रजा को प्रसन्न करता है; बिना विचारे चलाया गया दण्ड सबका सर्वनाश कर देता है।
श्लोक 38 (12.14.38)
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः । जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥
yadi na praṇayedrājā daṇḍaṃ daṇḍyeṣvatandritaḥ | jale matsyānivābhakṣyandurbalānbalavattarāḥ
यदि राजा आलस्य छोड़कर दण्ड के योग्य लोगों पर दण्ड न चलाए, तो बलवान् निर्बलों को वैसे ही खा जाएँ जैसे जल में बड़ी मछलियाँ छोटी को खा जाती हैं।
श्लोक 39 (12.14.39)
काकोऽद्याच्च पुरोडाशं श्वा चैवावलिहेद्धविः । स्वामित्वं न क्वचिच्च स्यात्प्रपद्येताधरोत्तरम् ॥
kāko'dyācca puroḍāśaṃ śvā caivāvaliheddhaviḥ | svāmitvaṃ na kvacicca syātprapadyetādharottaram
कौआ पुरोडाश खा जाए और कुत्ता हवि चाट जाए; कहीं किसी का स्वामित्व न रहे और ऊँच-नीच उलट जाए।
श्लोक 40 (12.14.40)
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभस्तु शुचिर्नरः । दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥
sarvo daṇḍajito loko durlabhastu śucirnaraḥ | daṇḍasya hi bhayātsarvaṃ jagadbhogāya kalpate
सारा संसार दण्ड से ही वश में है, पवित्र मनुष्य दुर्लभ है; दण्ड के भय से ही सारा जगत् भोग के योग्य बनता है।
श्लोक 41 (12.14.41)
देवदानवगन्धर्वा रक्षांसि पतगोरगाः । तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैवाभिपीडिताः ॥
devadānavagandharvā rakṣāṃsi patagoragāḥ | te'pi bhogāya kalpante daṇḍenaivābhipīḍitāḥ
देवता, दानव, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी और सर्प—ये भी दण्ड से पीड़ित होकर ही भोग के योग्य होते हैं।
श्लोक 42 (12.14.42)
दूष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन्सर्वसेतवः । सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात् ॥
dūṣyeyuḥ sarvavarṇāśca bhidyeransarvasetavaḥ | sarvalokaprakopaśca bhaveddaṇḍasya vibhramāt
सब वर्ण दूषित हो जाएँगे, सब मर्यादाएँ टूट जाएँगी, और दण्ड के तनिक भ्रमित होने से सारे संसार में उथल-पुथल मच जाएगी।
श्लोक 43 (12.14.43)
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा । प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥
yatra śyāmo lohitākṣo daṇḍaścarati pāpahā | prajāstatra na muhyanti netā cetsādhu paśyati
जहाँ श्याम वर्ण और लाल नेत्रों वाला दण्ड पाप का नाश करता हुआ विचरता है, वहाँ प्रजा मोहग्रस्त नहीं होती, यदि उसका नेता ठीक देखता हो।
श्लोक 44 (12.14.44)
आहुस्तस्य प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् । समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥
āhustasya praṇetāraṃ rājānaṃ satyavādinam | samīkṣyakāriṇaṃ prājñaṃ dharmakāmārthakovidam
उसका प्रणेता उस राजा को कहते हैं जो सत्यवादी हो, सोच-विचारकर काम करने वाला हो, बुद्धिमान् हो और धर्म, काम तथा अर्थ का ज्ञाता हो।
श्लोक 45 (12.14.45)
तं राजा प्रणयन्सम्यक्स्वर्गायाभिप्रवर्तते । कामात्मविषयी क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥
taṃ rājā praṇayansamyaksvargāyābhipravartate | kāmātmaviṣayī kṣudro daṇḍenaiva nihanyate
जो राजा उसका ठीक-ठीक प्रयोग करता है वह स्वर्ग की ओर बढ़ता है; और जो कामनाओं में डूबा, विषयी और क्षुद्र है, वह दण्ड से ही मारा जाता है।
श्लोक 46 (12.14.46)
दण्डो हि सुमहातेजा दुर्धरश्चाकृतात्मभिः । धर्माद्विचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम् ॥
daṇḍo hi sumahātejā durdharaścākṛtātmabhiḥ | dharmādvicalitaṃ hanti nṛpameva sabāndhavam
दण्ड महान् तेजस्वी है और अशिक्षित मन वालों के लिए असह्य है; जो राजा धर्म से डिगता है उसे वह बन्धुओं सहित मार डालता है।
श्लोक 47 (12.14.47)
ततो दुर्गं च राष्ट्रं च लोकं च सचराचरम् । अन्तरिक्षगतांश्चैव मुनीन्देवांश्च हिंसति ॥
tato durgaṃ ca rāṣṭraṃ ca lokaṃ ca sacarācaram | antarikṣagatāṃścaiva munīndevāṃśca hiṃsati
फिर वह उसके दुर्ग और राष्ट्र को, चराचर सहित लोक को, और आकाश में रहने वाले मुनियों तथा देवताओं को भी कष्ट देता है।
श्लोक 48 (12.14.48)
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना । अशक्यो न्यायतो नेतुं विषयांश्चैव सेवता ॥
so'sahāyena mūḍhena lubdhenākṛtabuddhinā | aśakyo nyāyato netuṃ viṣayāṃścaiva sevatā
जिसके कोई सहायक नहीं, जो मूढ़, लोभी और अशिक्षित बुद्धि वाला है, तथा विषयों में रमा हुआ है, उससे यह न्यायपूर्वक नहीं चलाया जा सकता।
श्लोक 49 (12.14.49)
शुचिना सत्यसन्धेन नीतिशास्त्रानुसारिणा । दण्डः प्रणेतुं शक्यो हि सुसहायेन धीमता ॥
śucinā satyasandhena nītiśāstrānusāriṇā | daṇḍaḥ praṇetuṃ śakyo hi susahāyena dhīmatā
किन्तु जो पवित्र, सत्य पर टिकने वाला, नीतिशास्त्र के अनुसार चलने वाला, बुद्धिमान् और अच्छे सहायकों वाला हो, वही दण्ड को चला सकता है।
श्लोक 50 (12.14.50)
स्वराष्ट्रे न्यायवर्ती स्याद्भृशदण्डश्च शत्रुषु । सुहृत्स्वजिह्मः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः ॥
svarāṣṭre nyāyavartī syādbhṛśadaṇḍaśca śatruṣu | suhṛtsvajihmaḥ snigdheṣu brāhmaṇeṣu kṣamānvitaḥ
वह अपने राष्ट्र में न्याय का पालन करे, शत्रुओं पर कठोर दण्ड रखे, स्नेही मित्रों के प्रति सरल रहे और ब्राह्मणों के प्रति क्षमाशील रहे।
श्लोक 51 (12.14.51)
एवंवृत्तस्य राज्ञस्तु शिलोञ्छेनापि जीवतः । विस्तीर्येत यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥
evaṃvṛttasya rājñastu śiloñchenāpi jīvataḥ | vistīryeta yaśo loke tailabindurivāmbhasi
जो राजा ऐसा आचरण करता है, वह शिलोञ्छ से जीवन बिताता हो तब भी उसका यश संसार में जल पर तेल की बूँद की तरह फैलता है।
श्लोक 52 (12.14.52)
अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरकृतात्मनः । संक्षिप्येत यशो लोके घृतबिन्दुरिवाम्भसि ॥
atastu viparītasya nṛpaterakṛtātmanaḥ | saṃkṣipyeta yaśo loke ghṛtabindurivāmbhasi
किन्तु इसके विपरीत चलने वाले अशिक्षित-आत्मा राजा का यश संसार में जल में घी की बूँद की तरह सिकुड़ जाता है।
श्लोक 53 (12.14.53)
देवदेवेन रुद्रेण ब्रह्मणा च महीपते । विष्णुना चैव देवेन शक्रेण च महात्मना ॥
devadevena rudreṇa brahmaṇā ca mahīpate | viṣṇunā caiva devena śakreṇa ca mahātmanā
हे पृथ्वीपते, देवों के देव रुद्र, ब्रह्मा, देव विष्णु और महात्मा इन्द्र ने,
श्लोक 54 (12.14.54)
लोकपालैश्च भूतैश्च पाण्डवैश्च महात्मभिः । धर्माद्विचलिता राजन्धार्तराष्ट्रा निपातिताः । अधार्मिका दुराचाराः ससैन्या विनिपातिताः ॥
lokapālaiśca bhūtaiśca pāṇḍavaiśca mahātmabhiḥ | dharmādvicalitā rājandhārtarāṣṭrā nipātitāḥ | adhārmikā durācārāḥ sasainyā vinipātitāḥ
लोकपालों और प्राणियों ने तथा महात्मा पाण्डवों ने मिलकर, हे राजन्, धर्म से डिगे हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों को मार गिराया—उन अधार्मिक, दुराचारियों को सेनाओं सहित गिरा दिया।
श्लोक 55 (12.14.55)
तान्निहत्य न दोषस्ते स्वल्पोऽपि जगतीपते । छलेन मायया वाऽथ क्षत्रधर्मेण वा नृप ॥
tānnihatya na doṣaste svalpo'pi jagatīpate | chalena māyayā vā'tha kṣatradharmeṇa vā nṛpa
उन्हें मारकर आपको तनिक भी दोष नहीं लगता, हे पृथ्वीपते—चाहे वह छल से हो, माया से हो, या क्षत्रिय-धर्म से, हे राजन्।
श्लोक 56 (12.14.56)
मित्रता सर्वभूतेषु दानमध्ययनं तपः । ब्राह्मणस्यैव धर्मः स्यान्न राज्ञो राजसत्तम ॥
mitratā sarvabhūteṣu dānamadhyayanaṃ tapaḥ | brāhmaṇasyaiva dharmaḥ syānna rājño rājasattama
सब प्राणियों से मित्रता, दान, अध्ययन और तप—यह ब्राह्मण का ही धर्म है, हे राजाओं में श्रेष्ठ, राजा का नहीं।
श्लोक 57 (12.14.57)
असतां प्रतिषेधश्च सतां च परिपालनम् । एष राज्ञां परो धर्मः समरे चापलायनम् ॥
asatāṃ pratiṣedhaśca satāṃ ca paripālanam | eṣa rājñāṃ paro dharmaḥ samare cāpalāyanam
दुष्टों को रोकना, सज्जनों की रक्षा करना और युद्ध में पीठ न दिखाना—यह राजाओं का परम धर्म है।
श्लोक 58 (12.14.58)
यस्मिन्क्षमा च क्रोधश्च दानादाने भयाभये । निग्रहानुग्रहौ चोभौ स वै धर्मविदुच्यते ॥
yasminkṣamā ca krodhaśca dānādāne bhayābhaye | nigrahānugrahau cobhau sa vai dharmaviducyate
जिसमें क्षमा और क्रोध, दान और ग्रहण, अभय और भय, निग्रह और अनुग्रह दोनों हैं, वही सचमुच धर्म का ज्ञाता कहलाता है।
श्लोक 59 (12.14.59)
न श्रुतेन न दानेन न सांत्वेन न चेज्यया । त्वयेयं पृथिवी लब्धा न संकोचेन चाप्युत ॥
na śrutena na dānena na sāṃtvena na cejyayā | tvayeyaṃ pṛthivī labdhā na saṃkocena cāpyuta
आपने यह पृथ्वी न शास्त्र-ज्ञान से पाई, न दान से, न सान्त्वना से, न यज्ञ से, और न दीनता से माँगकर ही।
श्लोक 60 (12.14.60)
यत्तद्बलममित्राणां तथा वीरसमुद्यतम् । हस्त्यश्वरथसंपन्नं त्रिभिरङ्गैरनुत्तमम् ॥
yattadbalamamitrāṇāṃ tathā vīrasamudyatam | hastyaśvarathasaṃpannaṃ tribhiraṅgairanuttamam
शत्रुओं की वह सेना, जिसे वीरों ने खड़ा किया था, जो हाथी, घोड़े और रथों से भरी थी और अपने तीनों अंगों में सर्वश्रेष्ठ थी,
श्लोक 61 (12.14.61)
रक्षितं द्रोणकर्णाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च । तत्त्वया निहतं वीर तस्माद्भुङ्क्ष्व वसुंधराम् ॥
rakṣitaṃ droṇakarṇābhyāmaśvatthāmnā kṛpeṇa ca | tattvayā nihataṃ vīra tasmādbhuṅkṣva vasuṃdharām
जिसकी रक्षा द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य कर रहे थे—उसे आपने नष्ट किया, हे वीर; इसलिए अब पृथ्वी का भोग कीजिए।
श्लोक 62 (12.14.62)
जम्बूद्वीपो महाराज नानाजनपदैर्युतः । त्वया पुरुषशार्दूल दण्डेन मृदितः प्रभो ॥
jambūdvīpo mahārāja nānājanapadairyutaḥ | tvayā puruṣaśārdūla daṇḍena mṛditaḥ prabho
हे महाराज, अनेक जनपदों से भरा जम्बूद्वीप, हे पुरुषसिंह, हे प्रभो, आपने दण्ड से रौंद डाला है।
श्लोक 63 (12.14.63)
जम्बूद्वीपेन सदृशः क्रौञ्चद्वीपो नराधिप । अपरेण महामेरोर्दण्डेन मृदितस्त्वया ॥
jambūdvīpena sadṛśaḥ krauñcadvīpo narādhipa | apareṇa mahāmerordaṇḍena mṛditastvayā
हे नरेश्वर, महामेरु के पश्चिम में जम्बूद्वीप के समान क्रौञ्चद्वीप है; उसे भी आपने दण्ड से रौंद डाला है।
श्लोक 64 (12.14.64)
क्रौञ्चद्वीपेन सदृशः शाकद्वीपो नराधिप । पूर्वेण तु महामेरोर्दण्डेन मृदितस्त्वया ॥
krauñcadvīpena sadṛśaḥ śākadvīpo narādhipa | pūrveṇa tu mahāmerordaṇḍena mṛditastvayā
हे नरेश्वर, महामेरु के पूर्व में क्रौञ्चद्वीप के समान शाकद्वीप है; उसे भी आपने दण्ड से रौंद डाला है।
श्लोक 65 (12.14.65)
उत्तरेण महामेरोः शाकद्वीपेन संमितः । भद्राश्वः पुरुषव्याघ्र दण्डेन मृदितस्त्वया ॥
uttareṇa mahāmeroḥ śākadvīpena saṃmitaḥ | bhadrāśvaḥ puruṣavyāghra daṇḍena mṛditastvayā
हे पुरुषव्याघ्र, महामेरु के उत्तर में शाकद्वीप के समान भद्राश्व है; उसे भी आपने दण्ड से रौंद डाला है।
श्लोक 66 (12.14.66)
द्वीपाश्च सान्तरद्वीपा नानाजनपदाश्रयाः । विगाह्य सागरं वीर दण्डेन मृदितास्त्वया ॥
dvīpāśca sāntaradvīpā nānājanapadāśrayāḥ | vigāhya sāgaraṃ vīra daṇḍena mṛditāstvayā
हे वीर, सागर में उतरकर आपने अनेक जनपदों के आश्रयरूप सब द्वीपों और उनके बीच के छोटे द्वीपों को भी दण्ड से रौंद डाला है।
श्लोक 67 (12.14.67)
एतान्यप्रतिमेयानि कृत्वा कर्माणि भारत । न प्रीयसे महाराज पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥
etānyapratimeyāni kṛtvā karmāṇi bhārata | na prīyase mahārāja pūjyamāno dvijātibhiḥ
हे भारत, ऐसे अनुपम कर्म करके भी, हे महाराज, ब्राह्मणों से पूजित होते हुए भी आप प्रसन्न नहीं होते।
श्लोक 68 (12.14.68)
स त्वं भ्रातॄनिमान्दृष्ट्वा प्रतिनन्दस्व भारत । ऋषभानिव संमत्तान्गजेन्द्रान्गर्जितानिव ॥
sa tvaṃ bhrātṝnimāndṛṣṭvā pratinandasva bhārata | ṛṣabhāniva saṃmattāngajendrāngarjitāniva
इसलिए हे भारत, इन भाइयों को देखकर इनका अभिनन्दन कीजिए—ये मतवाले साँड़ों की तरह हैं, गरजते हुए गजराजों की तरह हैं।
श्लोक 69 (12.14.69)
अमरप्रतिमाः सर्वे शत्रुसाहाः परंतपाः । एकैकोऽपि सुखायैषां मम स्यादिति मे मतिः ॥
amarapratimāḥ sarve śatrusāhāḥ paraṃtapāḥ | ekaiko'pi sukhāyaiṣāṃ mama syāditi me matiḥ
ये सभी देवताओं के समान हैं, शत्रुओं को सह लेने वाले और उन्हें तपाने वाले; मेरा मत है कि इनमें से अकेला एक भी मेरे सुख के लिए पर्याप्त है।
श्लोक 70 (12.14.70)
किं पुनः पुरुषव्याघ्राः पतयो मे नरर्षभाः । समस्तानीन्द्रियाणीव शरीरस्य विचेष्टने ॥
kiṃ punaḥ puruṣavyāghrāḥ patayo me nararṣabhāḥ | samastānīndriyāṇīva śarīrasya viceṣṭane
फिर मेरे पतियों का तो कहना ही क्या, जो पुरुषसिंह और नरश्रेष्ठ हैं, और शरीर की चेष्टा में समस्त इन्द्रियों की तरह सब मिलकर एक हैं!
श्लोक 71 (12.14.71)
अनृतं नाब्रवीच्छ्वश्रूः सर्वज्ञा सर्वदर्शिनी । युधिष्ठिरस्त्वां पाञ्चालि सुखे धास्यत्यनुत्तमे ॥
anṛtaṃ nābravīcchvaśrūḥ sarvajñā sarvadarśinī | yudhiṣṭhirastvāṃ pāñcāli sukhe dhāsyatyanuttame
सर्वज्ञ और सर्वदर्शिनी मेरी सास ने झूठ नहीं कहा था: "हे पाञ्चाली, युधिष्ठिर तुझे परम सुख में स्थापित करेगा।"
श्लोक 72 (12.14.72)
इत्वा राजसहस्राणि बहून्याशुपराक्रमः । तद्व्यर्थं संप्रपश्यामि मोहात्तव जनाधिप ॥
itvā rājasahasrāṇi bahūnyāśuparākramaḥ | tadvyarthaṃ saṃprapaśyāmi mohāttava janādhipa
शीघ्र पराक्रम वाले आपने कितने ही सहस्र राजाओं को मारा, फिर भी हे जनाधिप, आपके मोह के कारण मैं इस सबको व्यर्थ ही देखती हूँ।
श्लोक 73 (12.14.73)
येषामुन्मत्तको ज्येष्ठः सर्वे तेऽप्यनुसारिणः । तवोन्मादान्महाराजसोन्मादाः सर्वपाण्डवाः ॥
yeṣāmunmattako jyeṣṭhaḥ sarve te'pyanusāriṇaḥ | tavonmādānmahārājasonmādāḥ sarvapāṇḍavāḥ
जिनका ज्येष्ठ भाई उन्मत्त हो, वे सब उसी के पीछे चलते हैं; हे महाराज, आपके उन्माद से सब पाण्डव उन्मत्त हो रहे हैं।
श्लोक 74 (12.14.74)
यदि हि स्युरनुन्मत्ता भ्रातरस्ते नराधिप । बद्ध्वा त्वां नास्तिकैः सार्धं प्रशासेयुर्वसुंधराम् ॥
yadi hi syuranunmattā bhrātaraste narādhipa | baddhvā tvāṃ nāstikaiḥ sārdhaṃ praśāseyurvasuṃdharām
हे नरेश्वर, यदि आपके भाई उन्मत्त न होते, तो आपको नास्तिकों के साथ बाँधकर स्वयं पृथ्वी पर शासन करते।
श्लोक 75 (12.14.75)
कुरुते मूढ एवं हि यः श्रेयो नाधिगच्छति । धूपैरञ्जनयोगैश्च नस्यकर्मभिरेव च ॥
kurute mūḍha evaṃ hi yaḥ śreyo nādhigacchati | dhūpairañjanayogaiśca nasyakarmabhireva ca
जो कल्याण को नहीं पाता वही मूढ़ ऐसा आचरण करता है; उसका उपचार धूप, अञ्जन के प्रयोग और नस्य-कर्मों से,
श्लोक 76 (12.14.76)
उन्मत्तिरपनेतव्या तव राजन्यदृच्छया । भेषजैः स चिकित्स्यः स्याद्य उन्मार्गेण गच्छति ॥
unmattirapanetavyā tava rājanyadṛcchayā | bheṣajaiḥ sa cikitsyaḥ syādya unmārgeṇa gacchati
"हे राजन्, जैसे भी हो, आपका उन्माद दूर करना चाहिए"—जो कुमार्ग पर चलता है उसकी औषधियों से चिकित्सा करनी चाहिए।
श्लोक 77 (12.14.77)
साहं सर्वाधमा लोके स्त्रीणां भरतसत्तम । तथा विनिकृता पुत्रैर्याऽहमिच्छामि जीवितुम् ॥
sāhaṃ sarvādhamā loke strīṇāṃ bharatasattama | tathā vinikṛtā putrairyā'hamicchāmi jīvitum
हे भरतश्रेष्ठ, मैं संसार की सब स्त्रियों में अधम हूँ—उन पुत्रों से इतना अपमानित होकर भी मैं जीना चाहती हूँ।
श्लोक 78 (12.14.78)
धृतराष्ट्रसुता राजन्नित्यमुत्पथगामिनः । तादृशानां वधे दोषं नाहं पश्यामि कर्हिचित् ॥
dhṛtarāṣṭrasutā rājannityamutpathagāminaḥ | tādṛśānāṃ vadhe doṣaṃ nāhaṃ paśyāmi karhicit
हे राजन्, धृतराष्ट्र के पुत्र सदा कुमार्ग पर चलने वाले थे; ऐसे लोगों के वध में मुझे कभी कोई दोष नहीं दिखता।
श्लोक 79 (12.14.79)
इमांश्चोशनसा गीताञ्श्लोकाञ्शृणु नराधिप ॥
imāṃścośanasā gītāñślokāñśṛṇu narādhipa
और हे नरेश्वर, उशना (शुक्राचार्य) के गाए हुए ये श्लोक सुनिए।
श्लोक 80 (12.14.80)
आत्महन्ताऽर्थहन्ता च बन्धुहन्ता विषप्रदः । अकारणेन हन्ता च यश्च भार्यां परामृशेत् ॥
ātmahantā'rthahantā ca bandhuhantā viṣapradaḥ | akāraṇena hantā ca yaśca bhāryāṃ parāmṛśet
जो आत्मघाती है, जो धन का नाश करने वाला है, जो बन्धुओं का हत्यारा है, जो विष देने वाला है, जो बिना कारण मारने वाला है, और जो पराई स्त्री का स्पर्श करता है—
श्लोक 81 (12.14.81)
निर्दोषं वधमेतेषां षण्णामप्याततायिनाम् । ब्रह्मा प्रोवाच भगवान्भार्गवाय महात्मने ॥
nirdoṣaṃ vadhameteṣāṃ ṣaṇṇāmapyātatāyinām | brahmā provāca bhagavānbhārgavāya mahātmane
इन छह आततायियों का वध निर्दोष है—ऐसा भगवान् ब्रह्मा ने महात्मा भार्गव से कहा था।
श्लोक 82 (12.14.82)
ब्रह्मक्षत्रविशां राजन्सत्पथे वर्तिनामपि । प्रसह्यागारमागम्य हन्तारं गरदं तथा ॥
brahmakṣatraviśāṃ rājansatpathe vartināmapi | prasahyāgāramāgamya hantāraṃ garadaṃ tathā
हे राजन्, सन्मार्ग पर चलने वाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में भी जो बलपूर्वक घर में घुसकर मारने आता है, और वैसे ही जो विष देता है,
श्लोक 83 (12.14.83)
अभक्ष्यापेयदातारमग्निदं च निशातयेत् । मार्ग एष महीपानां गोब्राह्मणवधेषु च ॥
abhakṣyāpeyadātāramagnidaṃ ca niśātayet | mārga eṣa mahīpānāṃ gobrāhmaṇavadheṣu ca
जो अभक्ष्य और अपेय देता है, और जो आग लगाता है—ऐसे को मार गिराना चाहिए। गौओं और ब्राह्मणों के वध के मामलों में भी राजाओं का यही मार्ग है।
श्लोक 84 (12.14.84)
केशग्रहे च नारीणामपि युध्येत्पितामहम् । ब्रह्माणं देवदेवेशं किं पुनः पापकारिणम् ॥
keśagrahe ca nārīṇāmapi yudhyetpitāmaham | brahmāṇaṃ devadeveśaṃ kiṃ punaḥ pāpakāriṇam
स्त्रियों के केश पकड़े जाने पर तो पितामह ब्रह्मा, देवों के देवेश्वर, से भी युद्ध करना चाहिए—फिर पापी की तो बात ही क्या!
श्लोक 85 (12.14.85)
गोब्राह्मणार्थे व्यसने च राज्ञां राष्ट्रोपमर्दे स्वशरीरहेतोः । स्त्रीणां च विक्रुष्टरुतानि श्रुत्वा विप्रोऽपि युध्येत महाप्रभावः ॥
gobrāhmaṇārthe vyasane ca rājñāṃ rāṣṭropamarde svaśarīrahetoḥ | strīṇāṃ ca vikruṣṭarutāni śrutvā vipro'pi yudhyeta mahāprabhāvaḥ
गौओं और ब्राह्मणों पर विपत्ति आने पर, राज्य के उजड़ने पर, अपने शरीर की रक्षा के लिए, और स्त्रियों की चीख-पुकार सुनकर महाप्रभावशाली ब्राह्मण को भी युद्ध करना चाहिए।
श्लोक 86 (12.14.86)
धर्माद्विचलितं विप्रं निहन्यादाततायिनम् । तस्यान्यत्र वधं विद्वान्मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥
dharmādvicalitaṃ vipraṃ nihanyādātatāyinam | tasyānyatra vadhaṃ vidvānmanasā'pi na cintayet
धर्म से डिगे हुए आततायी ब्राह्मण को मारा जा सकता है; इसके सिवा अन्य किसी दशा में विद्वान् उसके वध की मन से भी कल्पना न करे।
श्लोक 87 (12.14.87)
गोब्राह्मणवधे वृत्तं मन्त्रत्राणार्थमेव च । निहन्यात्क्षत्रियो विप्रं स्वकुटुम्बस्य चाप्तये ॥
gobrāhmaṇavadhe vṛttaṃ mantratrāṇārthameva ca | nihanyātkṣatriyo vipraṃ svakuṭumbasya cāptaye
जो ब्राह्मण गौओं और ब्राह्मणों के वध में लगा हो, उसे क्षत्रिय मन्त्रों की रक्षा के लिए और अपने कुटुम्ब की भलाई के लिए मार सकता है।
श्लोक 88 (12.14.88)
तस्करेण नृशंसेन धर्मात्प्रचलितेन च । क्षत्रबन्धुः परं शक्त्या युध्येद्विप्रेण संयुगे ॥
taskareṇa nṛśaṃsena dharmātpracalitena ca | kṣatrabandhuḥ paraṃ śaktyā yudhyedvipreṇa saṃyuge
जो ब्राह्मण चोर, क्रूर और धर्म से च्युत हो, उससे क्षत्रिय को अपनी पूरी शक्ति से युद्ध में लड़ना चाहिए।
श्लोक 89 (12.14.89)
आततायिनमायान्तमपि वेदान्तपारगम् । जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन भ्रूणहा भवेत् ॥
ātatāyinamāyāntamapi vedāntapāragam | jighāṃsantaṃ jighāṃsīyānna tena bhrūṇahā bhavet
वेदान्त का पारगामी भी यदि आततायी बनकर आए, तो मारने की इच्छा रखने वाले को मारा जा सकता है; इससे वह भ्रूणहत्या का दोषी नहीं होता।
श्लोक 90 (12.14.90)
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वाऽप्यन्त्यजोपि वा । न हन्याद्ब्राह्मणं शान्तं तृणेनापि कदाचन ॥
brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vā'pyantyajopi vā | na hanyādbrāhmaṇaṃ śāntaṃ tṛṇenāpi kadācana
ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो, शूद्र हो या अन्त्यज ही क्यों न हो—शान्त ब्राह्मण पर कभी तिनके से भी प्रहार न करे।
श्लोक 91 (12.14.91)
ब्राह्मणायावगुर्याद्यः स्पृष्ट्वा गुरुतरं महत् । वर्षाणां त्रिशतं पापः प्रतिष्ठां नाधिगच्छति ॥
brāhmaṇāyāvaguryādyaḥ spṛṣṭvā gurutaraṃ mahat | varṣāṇāṃ triśataṃ pāpaḥ pratiṣṭhāṃ nādhigacchati
जो ब्राह्मण पर शस्त्र उठाता है और उसे छू भी देता है—जो और भी बड़ा अपराध है—वह पापी तीन सौ वर्ष तक कहीं ठिकाना नहीं पाता।
श्लोक 92 (12.14.92)
सहस्राणि च वर्षाणि निहत्य नरके पतेत् । तस्मान्नैवावगुर्याद्धि नैव शस्त्रं निपातयेत् ॥
sahasrāṇi ca varṣāṇi nihatya narake patet | tasmānnaivāvaguryāddhi naiva śastraṃ nipātayet
और यदि मार डाले तो हज़ारों वर्ष नरक में पड़ता है; इसलिए न धमकाए और न शस्त्र चलाए।
श्लोक 93 (12.14.93)
शोणितं यावतः पांसून्गृह्णातीति हि धारणा । तावतीः स समाः पापो नरके परिवर्तते ॥
śoṇitaṃ yāvataḥ pāṃsūngṛhṇātīti hi dhāraṇā | tāvatīḥ sa samāḥ pāpo narake parivartate
रक्त जितने धूलि-कण सोख लेता है, यह मान्यता है, उतने ही वर्ष वह पापी नरक में पड़ा घूमता रहता है।
श्लोक 94 (12.14.94)
त्वगस्थिभेदं विप्रस्य यः कुर्यात्कारयेत वा । ब्रह्महा स तु विज्ञेयः प्रायश्चित्ती नराधमः ॥
tvagasthibhedaṃ viprasya yaḥ kuryātkārayeta vā | brahmahā sa tu vijñeyaḥ prāyaścittī narādhamaḥ
जो ब्राह्मण की त्वचा और अस्थि को काटता या कटवाता है, उसे ब्रह्महत्यारा जानना चाहिए; वह नराधम प्रायश्चित्त का भागी है।
श्लोक 95 (12.14.95)
श्रोत्रियं ब्राह्मणं हत्वा तथाऽऽत्रेयीं च ब्राह्मणीम् । चतुर्विशतिवर्षाणि चरेद्ब्रह्महणो व्रतम् ॥
śrotriyaṃ brāhmaṇaṃ hatvā tathā''treyīṃ ca brāhmaṇīm | caturviśativarṣāṇi caredbrahmahaṇo vratam
श्रोत्रिय ब्राह्मण को अथवा आत्रेयी ब्राह्मणी को मारकर वह चौबीस वर्ष तक ब्रह्मघाती का व्रत करे।
श्लोक 96 (12.14.96)
द्विगुणां ब्रह्महत्येयं सर्वैः प्रोक्ता महर्षिभिः । प्रायश्चित्तमकुर्वाणं कृताङ्कं विप्रवासयेत् ॥
dviguṇāṃ brahmahatyeyaṃ sarvaiḥ proktā maharṣibhiḥ | prāyaścittamakurvāṇaṃ kṛtāṅkaṃ vipravāsayet
इन दशाओं में यह ब्रह्महत्या दोगुनी है—ऐसा सब महर्षियों ने कहा है; जो प्रायश्चित्त न करे उसे दागकर देश से निकाल दे।
श्लोक 97 (12.14.97)
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं वा घातयेन्नृपः । ब्रह्मघ्नं तस्करं चैव माभूदेवं चरिष्यति ॥
brāhmaṇaṃ kṣatriyaṃ vaiśyaṃ śūdraṃ vā ghātayennṛpaḥ | brahmaghnaṃ taskaraṃ caiva mābhūdevaṃ cariṣyati
राजा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र को भी, यदि वह ब्रह्मघाती और चोर हो, मरवा सकता है, जिससे आगे कोई ऐसा आचरण न करे।
श्लोक 98 (12.14.98)
छित्त्वा हस्तौ च पादौ च नासिकोष्ठौ च भूपतिः । ब्रह्मघ्नं चोत्तमं पापं नेत्रोद्धारेण योजयेत् ॥
chittvā hastau ca pādau ca nāsikoṣṭhau ca bhūpatiḥ | brahmaghnaṃ cottamaṃ pāpaṃ netroddhāreṇa yojayet
हाथ-पैर, नाक और होंठ काटकर राजा उस ब्रह्मघाती, महापापी को आँखें निकलवाने का दण्ड दे।
श्लोक 99 (12.14.99)
शूद्रस्यैव स्मृतो दण्डस्तद्वद्राजन्यवैश्ययोः । प्रायश्चित्तमकुर्वाणं ब्राह्मणं तु प्रवासयेत् ॥
śūdrasyaiva smṛto daṇḍastadvadrājanyavaiśyayoḥ | prāyaścittamakurvāṇaṃ brāhmaṇaṃ tu pravāsayet
यह दण्ड शूद्र के लिए कहा गया है, और वैसे ही क्षत्रिय तथा वैश्य के लिए; किन्तु प्रायश्चित्त न करने वाले ब्राह्मण को देश से निकाल दे।
श्लोक 100 (12.14.100)
क्षत्रियं वैश्यशूद्रौ च शस्त्रेणैव च घातयेत् । ब्रह्मघ्नान्ब्राह्मणान्राजा कृताङ्कान्विप्रवासयेत् ॥
kṣatriyaṃ vaiśyaśūdrau ca śastreṇaiva ca ghātayet | brahmaghnānbrāhmaṇānrājā kṛtāṅkānvipravāsayet
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को शस्त्र से मरवाए; ब्रह्मघाती ब्राह्मणों को राजा दागकर देश से निकाल दे।
श्लोक 101 (12.14.101)
विकलेन्द्रियांस्त्रिवर्णांश्च चण्डालैः सह वासयेत् । तैश्च यः संपिबेत्कश्चित्स पिबन्ब्रह्महा भवेत् ॥
vikalendriyāṃstrivarṇāṃśca caṇḍālaiḥ saha vāsayet | taiśca yaḥ saṃpibetkaścitsa pibanbrahmahā bhavet
जिन तीनों वर्णों के लोगों की इन्द्रियाँ विकल कर दी गई हों, उन्हें चाण्डालों के साथ बसाए; और जो कोई उनके साथ पीता है, वह पीने वाला ब्रह्मघाती हो जाता है।
श्लोक 102 (12.14.102)
प्रेतानां न च देयानि पिण्डदानानि केनचित् ॥
pretānāṃ na ca deyāni piṇḍadānāni kenacit
ऐसे मरे हुओं को कोई भी पिण्डदान न दे।
श्लोक 103 (12.14.103)
कृष्णवर्णा विरूपा च निर्णीता लम्बमूर्धजा । दुनोत्यदृष्ट्वा कर्तारं ब्रह्महत्येति तां विदुः ॥
kṛṣṇavarṇā virūpā ca nirṇītā lambamūrdhajā | dunotyadṛṣṭvā kartāraṃ brahmahatyeti tāṃ viduḥ
वह काले रंग की, कुरूप और लम्बे केशों वाली बताई गई है; वह कर्ता को बिना दिखाई दिए ही सताती है—उसी को ब्रह्महत्या कहते हैं।
श्लोक 104 (12.14.104)
ब्रह्मघ्नेन पिबन्तश्च विप्रा देशाः पुराणि च । अचिरादेव पीड्यन्ते दुर्भिक्षव्याधितस्करैः ॥
brahmaghnena pibantaśca viprā deśāḥ purāṇi ca | acirādeva pīḍyante durbhikṣavyādhitaskaraiḥ
जो ब्राह्मण, देश और नगर ब्रह्मघाती के साथ पीते हैं, वे शीघ्र ही अकाल, रोग और चोरों से पीड़ित होते हैं।
श्लोक 105 (12.14.105)
ब्राह्मणं पापकर्माणं विप्राणामाततायिनम् । क्षत्रियं वैश्यशूद्रौ च नेत्रोद्धारेण योजयेत् ॥
brāhmaṇaṃ pāpakarmāṇaṃ viprāṇāmātatāyinam | kṣatriyaṃ vaiśyaśūdrau ca netroddhāreṇa yojayet
जो पापकर्मी ब्राह्मण ब्राह्मणों पर आततायी हो, उसे, और वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र को, आँखें निकलवाने का दण्ड दे।
श्लोक 106 (12.14.106)
दुर्बलानां बलं राजा बलिनो ये च साधवः । बलिनां दुर्बलानां च पापानां मृत्युरिष्यते ॥
durbalānāṃ balaṃ rājā balino ye ca sādhavaḥ | balināṃ durbalānāṃ ca pāpānāṃ mṛtyuriṣyate
निर्बलों का बल राजा है, और उन बलवानों का भी जो सज्जन हैं; पापी चाहे बली हों या निर्बल, उनके लिए मृत्यु का विधान है।
श्लोक 107 (12.14.107)
सदोषमपि यो हन्यादश्राव्य जगतीपते । दुर्बलं बलवन्तं वा स पराजयमर्हति ॥
sadoṣamapi yo hanyādaśrāvya jagatīpate | durbalaṃ balavantaṃ vā sa parājayamarhati
हे पृथ्वीपते, जो अपराधी को भी, चाहे वह निर्बल हो या बलवान्, बिना आरोप सुनाए मार डालता है, वह स्वयं दोषी ठहरने योग्य है।
श्लोक 108 (12.14.108)
राजाज्ञां प्राड्विवाकं च नेच्छेद्यच्चापि निष्पतेत् । साक्षिणं साधुवाक्यं च जितं तमपि निर्दिशेत् ॥
rājājñāṃ prāḍvivākaṃ ca necchedyaccāpi niṣpatet | sākṣiṇaṃ sādhuvākyaṃ ca jitaṃ tamapi nirdiśet
जो राजा की आज्ञा और न्यायाधीश को नहीं मानता, या भाग निकलता है, उसे वह हारा हुआ घोषित करे—साक्षी और मीठे वचन बोलने वाले को भी।
श्लोक 109 (12.14.109)
बन्धनान्निष्पतेद्यच्च प्रतिभूर्न ददाति च । कुलजश्च धनाढ्यश्च स पराजयमर्हति ॥
bandhanānniṣpatedyacca pratibhūrna dadāti ca | kulajaśca dhanāḍhyaśca sa parājayamarhati
जो बन्धन से निकल भागता है और जमानत नहीं देता, चाहे वह कुलीन और धनी ही क्यों न हो, वह हार का भागी है।
श्लोक 110 (12.14.110)
राजाज्ञया समाहूतो यो न गच्छेत्सभां नरः । बलवन्तमुपाश्रित्य सायुधः स पराजितः ॥
rājājñayā samāhūto yo na gacchetsabhāṃ naraḥ | balavantamupāśritya sāyudhaḥ sa parājitaḥ
राजा की आज्ञा से बुलाए जाने पर जो मनुष्य सभा में नहीं आता, और किसी बलवान् का सहारा लेकर हथियार बाँधे रहता है, वह हार गया।
श्लोक 111 (12.14.111)
तं दण्डेन विनिर्जित्य महासाहसिकं नरम् । वियुक्तदेहसर्वस्वं परलोकं विसर्जयेत् ॥
taṃ daṇḍena vinirjitya mahāsāhasikaṃ naram | viyuktadehasarvasvaṃ paralokaṃ visarjayet
ऐसे महाहिंसक मनुष्य को दण्ड से जीतकर उसे देह और सर्वस्व से रहित करके परलोक भेज दे।
श्लोक 112 (12.14.112)
मृतस्यापि न देयानि पिण्डदानानि केनचित् । दत्त्वा दण्डं प्रयच्छेत मध्यमं पूर्वसाहसम् ॥
mṛtasyāpi na deyāni piṇḍadānāni kenacit | dattvā daṇḍaṃ prayaccheta madhyamaṃ pūrvasāhasam
मरने के बाद भी उसे कोई पिण्डदान न दे। दण्ड देकर वह प्रथम कोटि की हिंसा के लिए मध्यम दण्ड (जुर्माना) ठहराए।
श्लोक 113 (12.14.113)
कुलस्त्रीव्यभिचारं च राष्ट्रस्य च विमर्दनम् । ब्रह्महत्यां च चौर्यं च राजद्रोहं च पञ्चमम् ॥
kulastrīvyabhicāraṃ ca rāṣṭrasya ca vimardanam | brahmahatyāṃ ca cauryaṃ ca rājadrohaṃ ca pañcamam
कुलस्त्री से व्यभिचार, राष्ट्र का विध्वंस, ब्रह्महत्या, चोरी और पाँचवाँ राजद्रोह—
श्लोक 114 (12.14.114)
युद्धादन्यत्र हिंसायां सुरापस्य च कीर्तने । महान्तं गुरुतल्पे च मित्रद्रोहे च पातकम् ॥
yuddhādanyatra hiṃsāyāṃ surāpasya ca kīrtane | mahāntaṃ gurutalpe ca mitradrohe ca pātakam
युद्ध से बाहर की हिंसा में, मद्यपान की घोषणा किए गए व्यक्ति के विषय में, गुरुपत्नी-गमन में और मित्रद्रोह में महान् पाप होता है।
श्लोक 115 (12.14.115)
न कथंचिदुपेक्षेत महासाहसिकं नरम् । सर्वस्वमपहृत्याशु ततः प्राणैर्वियोजयेत् ॥
na kathaṃcidupekṣeta mahāsāhasikaṃ naram | sarvasvamapahṛtyāśu tataḥ prāṇairviyojayet
महाहिंसक मनुष्य की कभी उपेक्षा न करे; उसका सर्वस्व शीघ्र छीनकर फिर उसे प्राणों से अलग कर दे।
श्लोक 116 (12.14.116)
त्रिषु वर्णेषु यो दण्डः प्रणीतो ब्रह्मणा पुरा । महासाहसिकं विप्रं कृताङ्कं विप्रवासयेत् ॥
triṣu varṇeṣu yo daṇḍaḥ praṇīto brahmaṇā purā | mahāsāhasikaṃ vipraṃ kṛtāṅkaṃ vipravāsayet
जो दण्ड ब्रह्मा ने पूर्वकाल में तीनों वर्णों के लिए निश्चित किया था, उसके अनुसार महाहिंसक ब्राह्मण को दागकर देश से निकाल दे।
श्लोक 117 (12.14.117)
साहस्रो वा भवेद्दण्डः काञ्चनो देहनिष्क्रिया । चतुर्णामपि वर्णानामेवमाहोशना कविः ॥
sāhasro vā bhaveddaṇḍaḥ kāñcano dehaniṣkriyā | caturṇāmapi varṇānāmevamāhośanā kaviḥ
अथवा दण्ड एक सहस्र का हो, या देह के छुटकारे के रूप में सोना; चारों वर्णों के लिए कवि उशना ने ऐसा ही कहा है।
श्लोक 118 (12.14.118)
नारीणां बालवृद्धानां गोपतेश्च महामतिः । पापानां दुर्विनीतानां प्राणान्तं च बृहस्पतिः । दण्डमाह महाभाग सर्वेषामाततायिनाम् ॥
nārīṇāṃ bālavṛddhānāṃ gopateśca mahāmatiḥ | pāpānāṃ durvinītānāṃ prāṇāntaṃ ca bṛhaspatiḥ | daṇḍamāha mahābhāga sarveṣāmātatāyinām
हे महाभाग, महामति बृहस्पति ने भी स्त्रियों, बालकों, वृद्धों और गोस्वामी पर आक्रमण करने वाले पापी, दुराचारी लोगों के लिए, सब आततायियों की तरह, प्राणान्त तक दण्ड बताया है।
श्लोक 119 (12.14.119)
सर्वेषां पापबुद्धीनां पापकर्मैव कुर्वताम् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां दण्डो निर्दोष इष्यते । सौबलस्य च दुर्बुद्धेः कर्णस्य च दुरात्मनः ॥
sarveṣāṃ pāpabuddhīnāṃ pāpakarmaiva kurvatām | dhṛtarāṣṭrasya putrāṇāṃ daṇḍo nirdoṣa iṣyate | saubalasya ca durbuddheḥ karṇasya ca durātmanaḥ
जो सब पापबुद्धि वाले केवल पापकर्म ही करते हैं—धृतराष्ट्र के पुत्र, दुर्बुद्धि शकुनि और दुरात्मा कर्ण—उनके लिए दण्ड निर्दोष माना गया है।
श्लोक 120 (12.14.120)
पश्यतां चैव शूराणां याऽहं द्यूते सभां तदा । रजस्वला समानीता भवतां पश्यतां नृप । वाससैकेन संवीता तव दोषेण भूपते ॥
paśyatāṃ caiva śūrāṇāṃ yā'haṃ dyūte sabhāṃ tadā | rajasvalā samānītā bhavatāṃ paśyatāṃ nṛpa | vāsasaikena saṃvītā tava doṣeṇa bhūpate
और मैं, जो उस समय द्यूत के बाद वीरों के देखते हुए रजस्वला अवस्था में सभा में लाई गई, हे राजन्, आप सबके देखते हुए, केवल एक वस्त्र में लिपटी हुई—हे भूपते, आपके ही दोष से।
श्लोक 121 (12.14.121)
माभूद्धर्मविलोपस्ते धृतराष्ट्रकुलक्षयात् । क्रोधाग्निना तु दग्धं च सपशुद्रव्यसंचयम् ॥
mābhūddharmavilopaste dhṛtarāṣṭrakulakṣayāt | krodhāgninā tu dagdhaṃ ca sapaśudravyasaṃcayam
धृतराष्ट्र के कुल के विनाश से आपके धर्म का लोप न हो; वह कुल पशुओं और संचित धन के साथ क्रोध की अग्नि में जल चुका है।
श्लोक 122 (12.14.122)
साऽहमेवंविधं दुःखं संप्राप्ता तव हेतुना । आदित्यस्य प्रसादेन न च प्राणैर्वियोजिता ॥
sā'hamevaṃvidhaṃ duḥkhaṃ saṃprāptā tava hetunā | ādityasya prasādena na ca prāṇairviyojitā
आपके ही कारण मैंने ऐसा दुःख पाया; सूर्य की कृपा से ही मैं प्राणों से वियुक्त नहीं हुई।
श्लोक 123 (12.14.123)
रक्षिता देवदेवेन जगतः कालहेतुना । दिवाकरेण देवेन विवस्त्रा न कृता तदा ॥
rakṣitā devadevena jagataḥ kālahetunā | divākareṇa devena vivastrā na kṛtā tadā
जगत् के काल के कारण, देवों के देव, देव दिवाकर ने मेरी रक्षा की; इसीलिए उस समय मैं वस्त्रहीन नहीं की गई।
श्लोक 124 (12.14.124)
एतेषां यतमानानां न मेऽद्य वचनं मृषा । त्वं तु सर्वां महीं त्यक्त्वा कुरुषे स्वयमापदम् ॥
eteṣāṃ yatamānānāṃ na me'dya vacanaṃ mṛṣā | tvaṃ tu sarvāṃ mahīṃ tyaktvā kuruṣe svayamāpadam
प्रयत्न करने वाले इन भाइयों के विषय में आज मेरा वचन झूठा नहीं है; पर आप सारी पृथ्वी को त्यागकर स्वयं अपने ऊपर आपत्ति ला रहे हैं।
श्लोक 125 (12.14.125)
यथाऽऽस्तां संमतौ राज्ञां पृथिव्यां राजसत्तमौ । मांधाता चाम्बरीषश्च तथा राजन्विराजसे ॥
yathā''stāṃ saṃmatau rājñāṃ pṛthivyāṃ rājasattamau | māṃdhātā cāmbarīṣaśca tathā rājanvirājase
जैसे पृथ्वी पर मान्धाता और अम्बरीष, ये दो श्रेष्ठ राजा राजाओं में सम्मानित थे, वैसे ही हे राजन्, आप भी शोभित होते हैं।
श्लोक 126 (12.14.126)
प्रशाधि पृथिवीं देवीं प्रजा धर्मेण पालयन् । सपर्वतवनद्वीपां मा राजन्विमना भव ॥
praśādhi pṛthivīṃ devīṃ prajā dharmeṇa pālayan | saparvatavanadvīpāṃ mā rājanvimanā bhava
पर्वतों, वनों और द्वीपों सहित देवी पृथ्वी पर शासन कीजिए और प्रजा का धर्म से पालन कीजिए; हे राजन्, उदास न हों।
श्लोक 127 (12.14.127)
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्युध्यस्वारीन्प्रयच्छ च । धनानि भोगान्वासांसि द्विजातिभ्यो नृपोत्तम ॥
yajasva vividhairyajñairyudhyasvārīnprayaccha ca | dhanāni bhogānvāsāṃsi dvijātibhyo nṛpottama
अनेक यज्ञों से यजन कीजिए, शत्रुओं से लड़िए, और हे नृपश्रेष्ठ, द्विजों को धन, भोग और वस्त्र दीजिए।