शान्ति पर्व · अध्याय 15
अर्जुन द्वारा दण्ड की महिमा का वर्णन
द्रौपदी की बात के उत्तर में अर्जुन युधिष्ठिर से दण्ड की महिमा कहते हैं: दण्ड ही प्रजा पर शासन करता, उसकी रक्षा और पालन करता, दुष्टों को रोकता और सब आश्रमों को अपने मार्ग पर रखता है। वे राजा को स्मरण कराते हैं कि सभी प्राणी एक-दूसरे को खाकर जीते हैं, क्षत्रिय प्रहार करने के लिए ही रचा गया है, और विधिपूर्वक पाए राज्य पर शोक उचित नहीं। अन्त में वे यज्ञ करने, प्रजा की रक्षा करने और शत्रुओं का वध करने का आग्रह करते हैं, क्योंकि अन्तरात्मा का वध नहीं होता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.15.1)
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत् । अनुमान्य महाबाहुं ज्येष्ठं भ्रातरमीश्वरम् ॥
yājñasenyā vacaḥ śrutvā punarevārjuno'bravīt | anumānya mahābāhuṃ jyeṣṭhaṃ bhrātaramīśvaram
याज्ञसेनी की बात सुनकर अर्जुन ने फिर अपने बड़े भाई, उन महाबाहु स्वामी का आदर करके उनसे कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (12.15.2)
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति । दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥
daṇḍaḥ śāsti prajāḥ sarvā daṇḍa evābhirakṣati | daṇḍaḥ supteṣu jāgarti daṇḍaṃ dharmaṃ vidurbudhāḥ
दण्ड ही सारी प्रजा पर शासन करता है और दण्ड ही उसकी रक्षा करता है; जब लोग सोते हैं, तब दण्ड जागता रहता है। विद्वान दण्ड को ही धर्म जानते हैं।
श्लोक 3 (12.15.3)
दण्डः संरक्षते धर्मं तथैवार्थं जनाधिप । कामं संरक्षते दण्डस्त्रिवर्गो दण्ड उच्यते ॥
daṇḍaḥ saṃrakṣate dharmaṃ tathaivārthaṃ janādhipa | kāmaṃ saṃrakṣate daṇḍastrivargo daṇḍa ucyate
हे नरेश्वर, दण्ड धर्म की रक्षा करता है, वैसे ही अर्थ की भी; दण्ड काम की रक्षा करता है। दण्ड को ही त्रिवर्ग कहा जाता है।
श्लोक 4 (12.15.4)
दण्डेन रक्ष्यते धान्यं धनं दण्डेन रक्ष्यते । एतद्विद्वानुपादाय स्वभावं पश्य लौकिकम् ॥
daṇḍena rakṣyate dhānyaṃ dhanaṃ daṇḍena rakṣyate | etadvidvānupādāya svabhāvaṃ paśya laukikam
दण्ड से अन्न की रक्षा होती है और दण्ड से ही धन की रक्षा होती है। यह समझकर लोक के स्वभाव को वैसा ही देखो जैसा वह है।
श्लोक 5 (12.15.5)
राजदण्डभयादेके नराः पापं न कुर्वते । यमदण्डभयादेके परलोकभयादपि ॥
rājadaṇḍabhayādeke narāḥ pāpaṃ na kurvate | yamadaṇḍabhayādeke paralokabhayādapi
कुछ मनुष्य राजा के दण्ड के भय से पाप नहीं करते; कुछ यम के दण्ड के भय से, और कुछ परलोक के भय से भी।
श्लोक 6 (12.15.6)
परस्परभयादेके पापाः पापं न कुर्वते । एवं सांसिद्धिके लोके सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥
parasparabhayādeke pāpāḥ pāpaṃ na kurvate | evaṃ sāṃsiddhike loke sarvaṃ daṇḍe pratiṣṭhitam
कुछ पापी एक-दूसरे के भय से पाप नहीं करते। इस प्रकार स्वभावतः ऐसे इस लोक में सब कुछ दण्ड पर ही टिका है।
श्लोक 7 (12.15.7)
दण्डस्यैव भयादेके न खादन्ति परस्परम् । अन्धेतमसि मज्जेयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ॥
daṇḍasyaiva bhayādeke na khādanti parasparam | andhetamasi majjeyuryadi daṇḍo na pālayet
कुछ लोग दण्ड के ही भय से एक-दूसरे को नहीं खाते। यदि दण्ड रक्षा न करे तो वे घने अन्धकार में डूब जाएँ।
श्लोक 8 (12.15.8)
यस्माददान्तान्दमयत्यशिष्टान्दण्डयत्यपि । दमनाद्दण्डनाच्चैव तस्माद्दण्डं विदुर्बुधाः ॥
yasmādadāntāndamayatyaśiṣṭāndaṇḍayatyapi | damanāddaṇḍanāccaiva tasmāddaṇḍaṃ vidurbudhāḥ
क्योंकि वह उद्दण्डों को वश में करता है और अनुशासनहीनों को दण्डित करता है, इसलिए दमन और दण्डन के कारण विद्वान उसे दण्ड कहते हैं।
श्लोक 9 (12.15.9)
वाचि दण्डो ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां भुजार्पणम् । धनदण्डाः स्मृता वैश्या निर्दण्डः शूद्र उच्यते ॥
vāci daṇḍo brāhmaṇānāṃ kṣatriyāṇāṃ bhujārpaṇam | dhanadaṇḍāḥ smṛtā vaiśyā nirdaṇḍaḥ śūdra ucyate
ब्राह्मणों के लिए दण्ड वाणी का है; क्षत्रियों के लिए केवल भोजन-मात्र देकर रोक देना; वैश्यों के लिए धन-दण्ड कहा गया है; और शूद्र को दण्ड-रहित कहा जाता है।
श्लोक 10 (12.15.10)
असंमोहाय मर्त्यानामर्थसंरक्षणाय च । मर्यादा स्थापिता लोके दण्डसंज्ञा विशांपते ॥
asaṃmohāya martyānāmarthasaṃrakṣaṇāya ca | maryādā sthāpitā loke daṇḍasaṃjñā viśāṃpate
हे प्रजापालक, मनुष्यों को मोह से बचाने और धन की रक्षा के लिए लोक में यह मर्यादा स्थापित की गई है, जिसका नाम दण्ड है।
श्लोक 11 (12.15.11)
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति सूद्यतः । प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥
yatra śyāmo lohitākṣo daṇḍaścarati sūdyataḥ | prajāstatra na muhyanti netā cetsādhu paśyati
जहाँ श्याम वर्ण और लाल नेत्रों वाला दण्ड भली-भाँति उठा हुआ विचरता है, वहाँ प्रजा मोह में नहीं पड़ती, यदि नेता ठीक-ठीक विचार करे।
श्लोक 12 (12.15.12)
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः । दण्डस्यैव भयादेते मनुष्या वर्त्मनि स्थिताः ॥
brahmacārī gṛhasthaśca vānaprasthaśca bhikṣukaḥ | daṇḍasyaiva bhayādete manuṣyā vartmani sthitāḥ
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षु: ये मनुष्य दण्ड के भय से ही अपने-अपने मार्ग पर टिके रहते हैं।
श्लोक 13 (12.15.13)
नाभीतो यजते राजन्नाभीतो दातुमिच्छति । नाभीतः पुरुषः कश्चित्समये स्थातुमिच्छति ॥
nābhīto yajate rājannābhīto dātumicchati | nābhītaḥ puruṣaḥ kaścitsamaye sthātumicchati
हे राजन्, निर्भय मनुष्य यज्ञ नहीं करता; निर्भय मनुष्य दान देना नहीं चाहता; और कोई भी निर्भय पुरुष मर्यादा में रहना नहीं चाहता।
श्लोक 14 (12.15.14)
नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम् । नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥
nācchittvā paramarmāṇi nākṛtvā karma duṣkaram | nāhatvā matsyaghātīva prāpnoti mahatīṃ śriyam
दूसरों के मर्मस्थल काटे बिना, कठिन कर्म किए बिना, और मछुआरे की तरह मारे बिना कोई बड़ी लक्ष्मी नहीं पाता।
श्लोक 15 (12.15.15)
नाघ्नतः कीर्तिरस्तीह न वित्तं न पुनः प्रजाः । इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत । माहेन्द्रं च गृहं लेभे लोकानां चेश्वरोऽभवत् ॥
nāghnataḥ kīrtirastīha na vittaṃ na punaḥ prajāḥ | indro vṛtravadhenaiva mahendraḥ samapadyata | māhendraṃ ca gṛhaṃ lebhe lokānāṃ ceśvaro'bhavat
जो वध नहीं करता, उसे यहाँ न कीर्ति मिलती है, न धन, न सन्तान। इन्द्र वृत्र का वध करके ही महेन्द्र बने। उन्होंने महेन्द्र का महान धाम पाया और लोकों के स्वामी हुए।
श्लोक 16 (12.15.16)
य एव देवा हन्तारस्ताँल्लोकोऽर्चयते भृशम् । हन्तारुद्रस्तथास्कन्दः शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ॥
ya eva devā hantārastām̐lloko'rcayate bhṛśam | hantārudrastathāskandaḥ śakro'gnirvaruṇo yamaḥ
जो देवता संहारक हैं, उन्हीं की लोग सबसे अधिक पूजा करते हैं: संहारक रुद्र, स्कन्द, शक्र, अग्नि, वरुण और यम।
श्लोक 17 (12.15.17)
हन्ता कालस्तथा वायुर्मृत्युर्वैश्रवणो रविः । वसवो मरुतः साध्या विश्वेदेवाश्च भारत ॥
hantā kālastathā vāyurmṛtyurvaiśravaṇo raviḥ | vasavo marutaḥ sādhyā viśvedevāśca bhārata
काल, वायु, मृत्यु, वैश्रवण और सूर्य भी संहारक हैं; वसु, मरुद्गण, साध्य और विश्वेदेव भी, हे भारत।
श्लोक 18 (12.15.18)
एतान्देवान्नमस्यन्ति प्रतापप्रणता जनाः । न ब्रह्माणं न धातारं न पूषाणं कथंचन ॥
etāndevānnamasyanti pratāpapraṇatā janāḥ | na brahmāṇaṃ na dhātāraṃ na pūṣāṇaṃ kathaṃcana
लोग इन देवताओं को उनके प्रताप से झुककर नमस्कार करते हैं; ब्रह्मा को, धाता को या पूषा को कभी नहीं।
श्लोक 19 (12.15.19)
मध्यस्थान्सर्वभूतेषु दान्ताञ्शमपरायणान् । यजन्ते मानवाः केचित्प्रशान्तान्सर्वकर्मसु ॥
madhyasthānsarvabhūteṣu dāntāñśamaparāyaṇān | yajante mānavāḥ kecitpraśāntānsarvakarmasu
कुछ ही मनुष्य उनकी पूजा करते हैं जो सब प्राणियों में तटस्थ, जितेन्द्रिय, शान्ति में लगे हुए और सब कर्मों में शान्त रहते हैं।
श्लोक 20 (12.15.20)
न हि पश्यामि जीवन्तं लोके कंचिदहिंसया । सत्वैः सत्वा हि जीवन्ति दुर्बलैर्बलवत्तराः ॥
na hi paśyāmi jīvantaṃ loke kaṃcidahiṃsayā | satvaiḥ satvā hi jīvanti durbalairbalavattarāḥ
मैं संसार में किसी को ऐसा नहीं देखता जो बिना हिंसा के जीता हो। प्राणी प्राणियों के सहारे जीते हैं, बलवान दुर्बलों के सहारे।
श्लोक 21 (12.15.21)
नकुलो मूषिकानत्ति बिडालो नकुलं तथा । बिडालमत्ति श्वा राजञ्श्वानं व्यालमृगस्तथा ॥
nakulo mūṣikānatti biḍālo nakulaṃ tathā | biḍālamatti śvā rājañśvānaṃ vyālamṛgastathā
नेवला चूहों को खाता है, बिलाव नेवले को, और हे राजन्, कुत्ता बिलाव को खाता है; कुत्ते को हिंस्र वनपशु खा जाता है।
श्लोक 22 (12.15.22)
तानत्ति पुरुषः सर्वान्पश्य धर्मो यथा गतः । प्राणस्यान्नमिदं सर्वं जङ्गमं स्थावरं च यत् ॥
tānatti puruṣaḥ sarvānpaśya dharmo yathā gataḥ | prāṇasyānnamidaṃ sarvaṃ jaṅgamaṃ sthāvaraṃ ca yat
मनुष्य उन सबको खा जाता है; देखो, धर्म किस प्रकार चला है। यह सारा जंगम और स्थावर प्राणों का अन्न है।
श्लोक 23 (12.15.23)
विधानं दैवविहितं तत्र विद्वान्न मुह्यति । यथा सृष्टोऽसि राजेन्द्र तथा भवितुमर्हसि ॥
vidhānaṃ daivavihitaṃ tatra vidvānna muhyati | yathā sṛṣṭo'si rājendra tathā bhavitumarhasi
यह देवताओं का रचा विधान है, और विद्वान इससे मोहित नहीं होता। हे राजेन्द्र, तुम जिस रूप में रचे गए हो, वैसे ही तुम्हें होना चाहिए।
श्लोक 24 (12.15.24)
विनीतक्रोधहर्षा हि मन्दा वनमुपाश्रिताः । विना वधं न कुर्वन्ति तापसाः प्राणयापनम् ॥
vinītakrodhaharṣā hi mandā vanamupāśritāḥ | vinā vadhaṃ na kurvanti tāpasāḥ prāṇayāpanam
जिन मन्द तपस्वियों ने क्रोध और हर्ष को जीतकर वन का आश्रय लिया है, वे भी बिना वध के प्राण-धारण नहीं करते।
श्लोक 25 (12.15.25)
उदके बहवः प्राणाः पृथिव्यां च फलेषु च । न च कश्चिन्न तान्हन्ति किमन्यत्प्राणयापनम् ॥
udake bahavaḥ prāṇāḥ pṛthivyāṃ ca phaleṣu ca | na ca kaścinna tānhanti kimanyatprāṇayāpanam
जल में, पृथ्वी पर और फलों में बहुत-से प्राणी रहते हैं। ऐसा कोई नहीं जो उन्हें न मारता हो; फिर प्राण-धारण का और उपाय क्या है?
श्लोक 26 (12.15.26)
सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित् । पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात्स्कन्धपर्ययः ॥
sūkṣmayonīni bhūtāni tarkagamyāni kānicit | pakṣmaṇo'pi nipātena yeṣāṃ syātskandhaparyayaḥ
कुछ प्राणी इतने सूक्ष्म जन्म के हैं कि उन्हें केवल तर्क से जाना जा सकता है; पलक के गिरने मात्र से उनका शरीर नष्ट हो जाता है।
श्लोक 27 (12.15.27)
ग्रामान्निष्क्रम्य मुनयो विगतक्रोधमत्सराः । वने कुटुम्बधर्माणो दृश्यन्ते परिमोहिताः ॥
grāmānniṣkramya munayo vigatakrodhamatsarāḥ | vane kuṭumbadharmāṇo dṛśyante parimohitāḥ
क्रोध और मत्सर से रहित मुनि गाँव छोड़कर वन में जाते हैं, फिर भी वहाँ गृहस्थ-जैसा जीवन बिताते और मोह में पड़े दिखाई देते हैं।
श्लोक 28 (12.15.28)
भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीनण्डजान्पशून् । मनुष्यास्तन्वते यज्ञांस्ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च ॥
bhūmiṃ bhittvauṣadhīśchittvā vṛkṣādīnaṇḍajānpaśūn | manuṣyāstanvate yajñāṃste svargaṃ prāpnuvanti ca
पृथ्वी को चीरकर, औषधियों, वृक्षों, अण्डज जीवों और पशुओं को काटकर मनुष्य यज्ञ करते हैं, और उसी से स्वर्ग पाते हैं।
श्लोक 29 (12.15.29)
दण्डनीत्यां प्रणीतायां सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः । कौन्तेय सर्वभूतानां तत्र मे नास्ति संशयः ॥
daṇḍanītyāṃ praṇītāyāṃ sarve sidhyantyupakramāḥ | kaunteya sarvabhūtānāṃ tatra me nāsti saṃśayaḥ
जब दण्ड-नीति ठीक से चलाई जाती है, तब सब उद्योग सफल होते हैं। हे कुन्तीपुत्र, सब प्राणियों के विषय में इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 30 (12.15.30)
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः । जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥
daṇḍaścenna bhavelloke vinaśyeyurimāḥ prajāḥ | jale matsyānivābhakṣyandurbalānbalavattarāḥ
यदि संसार में दण्ड न हो तो ये प्रजाएँ नष्ट हो जाएँ, जैसे जल में बलवान मछलियाँ दुर्बलों को खा जाती हैं।
श्लोक 31 (12.15.31)
सत्यं बतेदं ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं दण्डः प्रजा रक्षति साधुनीतः । पश्याग्नयः पूतिमांसस्य भीताः सन्तर्जिता दण्डभयाज्ज्वलन्ति ॥
satyaṃ batedaṃ brahmaṇā pūrvamuktaṃ daṇḍaḥ prajā rakṣati sādhunītaḥ | paśyāgnayaḥ pūtimāṃsasya bhītāḥ santarjitā daṇḍabhayājjvalanti
ब्रह्मा ने बहुत पहले सच ही कहा था कि भली-भाँति चलाया गया दण्ड प्रजा की रक्षा करता है। देखो, सड़े मांस पर भी अग्नियाँ डरी और फटकारी हुई, दण्ड के भय से जल उठती हैं।
श्लोक 32 (12.15.32)
अन्धंतम इवेदं स्यान्न प्रज्ञायेत किंचन । दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विभजन्साध्वसाधुनी ॥
andhaṃtama ivedaṃ syānna prajñāyeta kiṃcana | daṇḍaścenna bhavelloke vibhajansādhvasādhunī
यदि संसार में भले-बुरे का भेद करने वाला दण्ड न हो, तो यह जगत् घोर अन्धकार जैसा हो जाए और कुछ भी पहचाना न जा सके।
श्लोक 33 (12.15.33)
येऽपि संभिन्नमर्यादा नास्तिका वेदनिन्दकाः । तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनाशु निपीडिताः ॥
ye'pi saṃbhinnamaryādā nāstikā vedanindakāḥ | te'pi bhogāya kalpante daṇḍenāśu nipīḍitāḥ
जिन्होंने सब मर्यादाएँ तोड़ दी हैं, वे नास्तिक और वेद-निन्दक भी दण्ड से शीघ्र पीड़ित होकर भोग के योग्य बन जाते हैं।
श्लोक 34 (12.15.34)
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्जनः । दण्डस्य हि भयाद्भीतो भोगायैव प्रकल्पते ॥
sarvo daṇḍajito loko durlabho hi śucirjanaḥ | daṇḍasya hi bhayādbhīto bhogāyaiva prakalpate
सारा संसार दण्ड से वश में है; पवित्र मनुष्य दुर्लभ है। दण्ड के भय से डरा हुआ मनुष्य ही भोग के योग्य बनता है।
श्लोक 35 (12.15.35)
चातुर्वर्ण्यप्रमोदाय सुनीतिकरणाय च । दण्डो विधात्रा विहितो धर्मार्थौ भुवि रक्षितुम् ॥
cāturvarṇyapramodāya sunītikaraṇāya ca | daṇḍo vidhātrā vihito dharmārthau bhuvi rakṣitum
चारों वर्णों के आनन्द और उत्तम नीति के पालन के लिए विधाता ने पृथ्वी पर धर्म और अर्थ की रक्षा हेतु दण्ड का विधान किया।
श्लोक 36 (12.15.36)
यदि दण्डान्न विभ्येयुर्वयांसि श्वापदानि च । अद्युः पशून्मनुष्यांश्च यज्ञार्थानि हवींषि च ॥
yadi daṇḍānna vibhyeyurvayāṃsi śvāpadāni ca | adyuḥ paśūnmanuṣyāṃśca yajñārthāni havīṃṣi ca
यदि पक्षी और हिंस्र पशु दण्ड से न डरें, तो वे पशुओं और मनुष्यों को तथा यज्ञ के लिए रखी हवियों को भी खा जाएँ।
श्लोक 37 (12.15.37)
न ब्रह्मचार्यधीयीत न काल्यं दुहते च गौः । न कन्योद्वहनं गच्छेद्यदि दण्डो न पालयेत् ॥
na brahmacāryadhīyīta na kālyaṃ duhate ca gauḥ | na kanyodvahanaṃ gacchedyadi daṇḍo na pālayet
यदि दण्ड रक्षा न करे तो ब्रह्मचारी अध्ययन न करे, गाय प्रातःकाल दुही न जाए, और कन्या विवाह को न जाए।
श्लोक 38 (12.15.38)
विष्वग्लोपः प्रवर्तेत भिद्येरन्सर्वसेतवः । ममत्वं न प्रजानीयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ॥
viṣvaglopaḥ pravarteta bhidyeransarvasetavaḥ | mamatvaṃ na prajānīyuryadi daṇḍo na pālayet
यदि दण्ड रक्षा न करे तो सब ओर विनाश फैल जाए, सब मर्यादाएँ टूट जाएँ, और लोग 'मेरा' का भाव ही न जानें।
श्लोक 39 (12.15.39)
न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेयुरकुतोभयाः । विधिवद्दक्षिणावन्ति यदि दण्डो न पालयेत् ॥
na saṃvatsarasatrāṇi tiṣṭheyurakutobhayāḥ | vidhivaddakṣiṇāvanti yadi daṇḍo na pālayet
यदि दण्ड रक्षा न करे तो विधिपूर्वक दक्षिणा वाले वर्ष-भर के सत्र निर्भय होकर न चल सकें।
श्लोक 40 (12.15.40)
चरेयुर्नाश्रमे धर्मं यथोक्तं विधिमाश्रिताः । न विद्यां प्राप्नुयात्कश्चिद्यदि दण्डो न पालयेत् ॥
careyurnāśrame dharmaṃ yathoktaṃ vidhimāśritāḥ | na vidyāṃ prāpnuyātkaścidyadi daṇḍo na pālayet
यदि दण्ड रक्षा न करे तो लोग विधि का आश्रय लेकर आश्रमों के धर्म का यथोक्त पालन न करें, और कोई विद्या न पा सके।
श्लोक 41 (12.15.41)
न चोष्ट्रा न बलीवर्दा नाश्वाश्वतरगर्दभाः । युक्ता वहेयुर्यानानि यदि दण्डो न पालयेत् ॥
na coṣṭrā na balīvardā nāśvāśvataragardabhāḥ | yuktā vaheyuryānāni yadi daṇḍo na pālayet
यदि दण्ड रक्षा न करे तो ऊँट, बैल, घोड़े, खच्चर और गधे जुतकर गाड़ियाँ न खींचें।
श्लोक 42 (12.15.42)
न प्रेष्या वचनं कुर्युर्न बालो जातु कर्हिचित् । तिष्ठेत्पितुर्मते धर्मे यदि दण्डो न पालयेत् ॥
na preṣyā vacanaṃ kuryurna bālo jātu karhicit | tiṣṭhetpiturmate dharme yadi daṇḍo na pālayet
यदि दण्ड रक्षा न करे तो सेवक आज्ञा न मानें, और बालक कभी पिता की इच्छा के अनुसार धर्म में स्थिर न रहे।
श्लोक 43 (12.15.43)
दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः । दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोकोऽयं च प्रतिष्ठितः ॥
daṇḍe sthitāḥ prajāḥ sarvā bhayaṃ daṇḍe vidurbudhāḥ | daṇḍe svargo manuṣyāṇāṃ loko'yaṃ ca pratiṣṭhitaḥ
सारी प्रजा दण्ड पर टिकी है, और विद्वान भय को दण्ड में ही जानते हैं। मनुष्यों का स्वर्ग दण्ड पर प्रतिष्ठित है, और यह लोक भी।
श्लोक 44 (12.15.44)
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वाऽपि दृश्यते । यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ॥
na tatra kūṭaṃ pāpaṃ vā vañcanā vā'pi dṛśyate | yatra daṇḍaḥ suvihitaścaratyarivināśanaḥ
जहाँ शत्रुओं का नाश करने वाला दण्ड भली-भाँति चलता है, वहाँ न कपट, न पाप, न छल दिखाई देता है।
श्लोक 45 (12.15.45)
हविः श्वा प्रलिहेद्दृष्ट्वा दण्डश्चेन्नोद्यतो भवेत् । हरेत्काकः पुरोडाशं यदि दण्डो न पालयेत् ॥
haviḥ śvā praliheddṛṣṭvā daṇḍaścennodyato bhavet | haretkākaḥ puroḍāśaṃ yadi daṇḍo na pālayet
यदि दण्ड उठा हुआ न हो तो कुत्ता हवि को देखते ही चाट जाए; यदि दण्ड रक्षा न करे तो कौआ पुरोडाश उठा ले जाए।
श्लोक 46 (12.15.46)
यदीदं धर्मतो राज्यं विहितं यद्यधर्मतः । कार्यस्तत्र न शोको वै भुङ्क्ष्व भोगान्यजस्व च ॥
yadīdaṃ dharmato rājyaṃ vihitaṃ yadyadharmataḥ | kāryastatra na śoko vai bhuṅkṣva bhogānyajasva ca
यह राज्य धर्म से मिला हो या अधर्म से, उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। भोगों को भोगो और यज्ञ करो।
श्लोक 47 (12.15.47)
सुखेन धर्मं श्रीमन्तश्चरन्ति शुचिवाससः । संवसन्तः प्रियैर्दारैर्भुञ्जानाश्चान्नमुत्तमम् ॥
sukhena dharmaṃ śrīmantaścaranti śucivāsasaḥ | saṃvasantaḥ priyairdārairbhuñjānāścānnamuttamam
समृद्ध लोग स्वच्छ वस्त्र पहने सुख से धर्म का आचरण करते हैं, अपनी प्रिय पत्नियों के साथ रहते और उत्तम अन्न खाते हैं।
श्लोक 48 (12.15.48)
अर्थे सर्वे समारम्भाः समायत्ता न संशयः । स च दण्डे समायत्तः पश्य दण्डस्य गौरवम् ॥
arthe sarve samārambhāḥ samāyattā na saṃśayaḥ | sa ca daṇḍe samāyattaḥ paśya daṇḍasya gauravam
सब उद्योग निःसन्देह धन पर निर्भर हैं, और धन दण्ड पर निर्भर है। देखो, दण्ड का कितना गौरव है।
श्लोक 49 (12.15.49)
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम् । अहिंसाऽसाधुहिंसेति श्रेयान्धर्मपरिग्रहः ॥
lokayātrārthameveha dharmapravacanaṃ kṛtam | ahiṃsā'sādhuhiṃseti śreyāndharmaparigrahaḥ
धर्म का उपदेश केवल लोक-व्यवहार के लिए किया गया है। 'अहिंसा' का अर्थ दुष्ट की हिंसा है; इस प्रकार धर्म को ग्रहण करना श्रेष्ठ है।
श्लोक 50 (12.15.50)
नात्यन्तं गुणवत्किंचिन्न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् । उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु च ॥
nātyantaṃ guṇavatkiṃcinna cāpyatyantanirguṇam | ubhayaṃ sarvakāryeṣu dṛśyate sādhvasādhu ca
कुछ भी पूरी तरह गुणवान नहीं है, और न कुछ पूरी तरह गुणहीन; सब कार्यों में भला और बुरा दोनों दिखाई देते हैं।
श्लोक 51 (12.15.51)
पशूनां वृषणं छित्त्वा ततो भिन्दन्ति नस्सु तान् । वहन्ति बहवो भारान्बध्नन्ति दमयन्ति च ॥
paśūnāṃ vṛṣaṇaṃ chittvā tato bhindanti nassu tān | vahanti bahavo bhārānbadhnanti damayanti ca
बैलों के अण्डकोश काटकर फिर उनकी नाक छेदते हैं; बहुतों से बोझ ढुलवाते हैं, उन्हें बाँधते और वश में करते हैं।
श्लोक 52 (12.15.52)
एवं पर्याकुले लोके वितथैर्जर्झरीकृते । तैस्तैर्न्यायैर्महाराज पुराणं धर्ममाचर ॥
evaṃ paryākule loke vitathairjarjharīkṛte | taistairnyāyairmahārāja purāṇaṃ dharmamācara
इस प्रकार इस व्याकुल और झूठ से जर्जर हुए संसार में, हे महाराज, उन-उन उपायों से पुराने धर्म का आचरण करो।
श्लोक 53 (12.15.53)
यज देहि प्रजा रक्ष धर्मं समनुपालय । अमित्राञ्जहि कौन्तेय मित्राणि परिपालय ॥
yaja dehi prajā rakṣa dharmaṃ samanupālaya | amitrāñjahi kaunteya mitrāṇi paripālaya
यज्ञ करो, दान दो, प्रजा की रक्षा करो, धर्म का पालन करो। हे कुन्तीपुत्र, शत्रुओं को मारो और मित्रों का पालन करो।
श्लोक 54 (12.15.54)
मा च ते निघ्नतः शत्रून्मन्युर्भवतु पार्थिव । न तत्र किल्विषं किंचिद्धन्तुर्भवति भारत ॥
mā ca te nighnataḥ śatrūnmanyurbhavatu pārthiva | na tatra kilviṣaṃ kiṃciddhanturbhavati bhārata
हे राजन्, शत्रुओं को मारते समय तुम्हारे मन में दीनता न हो। हे भारत, उसमें मारने वाले को कोई पाप नहीं लगता।
श्लोक 55 (12.15.55)
आततायी हि यो हन्यादाततायिनमागतम् । न तेन भ्रूणहा स स्यान्मन्युस्तं मन्युमार्च्छति ॥
ātatāyī hi yo hanyādātatāyinamāgatam | na tena bhrūṇahā sa syānmanyustaṃ manyumārcchati
यदि कोई आततायी अपने ऊपर आए आततायी को मारे, तो उससे वह भ्रूणहत्यारा नहीं होता; क्रोध क्रोध को ही प्राप्त होता है।
श्लोक 56 (12.15.56)
अवध्यः सर्वभूतानामन्तरात्मा न संशयः । अवध्ये चात्मनि कथं वध्यो भवति कस्यचित् ॥
avadhyaḥ sarvabhūtānāmantarātmā na saṃśayaḥ | avadhye cātmani kathaṃ vadhyo bhavati kasyacit
सब प्राणियों का अन्तरात्मा अवध्य है, इसमें सन्देह नहीं। जब आत्मा अवध्य है, तो किसी का वध किसी के द्वारा कैसे हो सकता है?
श्लोक 57 (12.15.57)
यथा हि पुरुषः शालां पुनः संप्रविशेन्नवाम् । एवं जीवः शरीराणि तानितानि प्रपद्यते ॥
yathā hi puruṣaḥ śālāṃ punaḥ saṃpraviśennavām | evaṃ jīvaḥ śarīrāṇi tānitāni prapadyate
जैसे मनुष्य बार-बार नए घर में प्रवेश करता है, वैसे ही जीव एक के बाद दूसरे शरीर को प्राप्त होता है।
श्लोक 58 (12.15.58)
देहान्पुराणानुत्सृज्य नवान्संप्रतिपद्यते । एवं मृत्युमुखं प्राहुर्जना ये तत्त्वदर्शिनः ॥
dehānpurāṇānutsṛjya navānsaṃpratipadyate | evaṃ mṛtyumukhaṃ prāhurjanā ye tattvadarśinaḥ
पुराने शरीरों को छोड़कर वह नए शरीर धारण करता है। तत्त्वदर्शी लोग इसी को मृत्यु का मुख कहते हैं।