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शान्ति पर्व · अध्याय 100

भीष्म द्वारा सेना के प्रयाण और युद्ध की रीति

युधिष्ठिर पूछते हैं कि विजय चाहने वाले राजा धर्म को कुछ दबाकर भी सेना का संचालन कैसे करते हैं। भीष्म उपाय बताते हैं: प्रयाण के लिए उचित ऋतु और भूमि, तैयार किए जाने वाले शस्त्र और कवच, किन पर प्रहार नहीं करना चाहिए, सैनिकों का वेतन और संगठन, और सेनानायकों को शपथ से बाँधने की रीति। वे कहते हैं कि भागने से केवल विनाश और अपयश मिलता है; अन्त में वे व्यूह-रचना तथा अपने पक्ष का उत्साह बढ़ाने वाली ध्वनियों और वाद्यों का वर्णन करते हैं।

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.100.1)

यथा जयार्थिनः सेनां नयन्ति भरतर्षभ । ईषद्धर्मं प्रपीड्यापि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

yathā jayārthinaḥ senāṃ nayanti bharatarṣabha | īṣaddharmaṃ prapīḍyāpi tanme brūhi pitāmaha

हे भरतश्रेष्ठ पितामह, विजय की इच्छा रखने वाले लोग धर्म को कुछ दबाकर भी जिस प्रकार अपनी सेना को आगे ले जाते हैं, वह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.100.2)

सन्त्येव हि स्थिता धर्म उपपत्त्या तथा परे । साध्वाचारतया केचित्तथैवौपयिकादपि ॥

santyeva hi sthitā dharma upapattyā tathā pare | sādhvācāratayā kecittathaivaupayikādapi

कुछ धर्म तर्कसंगत युक्ति पर टिके हैं, कुछ सज्जनों के आचरण पर, और कुछ उपयोगिता (उपाय) के आधार पर।

श्लोक 3 (12.100.3)

उपायधर्मान्वक्ष्यामि संसिद्धानर्थसिद्धये । निर्मर्यादा दस्यवस्तु भवन्ति परिपन्थिनः ॥

upāyadharmānvakṣyāmi saṃsiddhānarthasiddhaye | nirmaryādā dasyavastu bhavanti paripanthinaḥ

मैं तुम्हें उपायों के वे नियम बताऊँगा जो प्रयोजन की सिद्धि के लिए भली-भाँति प्रतिष्ठित हैं। किन्तु जो डाकू किसी मर्यादा को नहीं मानते, वे मार्ग में बाधक बन जाते हैं।

श्लोक 4 (12.100.4)

तेषां प्रतिविघातार्थं प्रवक्ष्याम्यथ नैगमम् । कार्याणां संप्रसिद्ध्यर्थं तानुपायान्निबोध मे ॥

teṣāṃ prativighātārthaṃ pravakṣyāmyatha naigamam | kāryāṇāṃ saṃprasiddhyarthaṃ tānupāyānnibodha me

उनसे बचाव के लिए अब मैं वेद में बताया गया उपाय कहूँगा। कार्यों की पूर्ण सिद्धि के लिए उन उपायों को मुझसे सुनो।

श्लोक 5 (12.100.5)

उभे प्रज्ञे वेदितव्ये ऋज्वी वक्रा च भारत । जानन्वक्रां न सेवेत प्रतिबाधेत चागताम् ॥

ubhe prajñe veditavye ṛjvī vakrā ca bhārata | jānanvakrāṃ na seveta pratibādheta cāgatām

हे भारत, दो प्रकार की बुद्धि जाननी चाहिए: सीधी और टेढ़ी। टेढ़ी बुद्धि को जानकर उसका सहारा न ले, और जब वह सामने आए तो उसे रोक दे।

श्लोक 6 (12.100.6)

अमित्रा एव राजानं भेदेनोपचरन्त्युत । तां राजा विकृतिं जानन्यथाऽमित्रान्प्रबाधते ॥

amitrā eva rājānaṃ bhedenopacarantyuta | tāṃ rājā vikṛtiṃ jānanyathā'mitrānprabādhate

शत्रु ही भेद डालकर राजा के पास पहुँचते हैं। उस छल को पहचानने वाला राजा उसी के अनुसार शत्रुओं को रोकता है।

श्लोक 7 (12.100.7)

गजानां पार्थ वर्माणि गोवृषाजगराणि च । शल्यकण्टकलोहानि तनुत्राणि मतानि च ॥

gajānāṃ pārtha varmāṇi govṛṣājagarāṇi ca | śalyakaṇṭakalohāni tanutrāṇi matāni ca

हे पार्थ, हाथियों के कवच गाय, बैल और अजगर के चमड़े के बनते हैं; और मनुष्यों के शरीर-रक्षक कवच शल्य (काँटेदार कीलों), काँटों और लोहे के माने गए हैं।

श्लोक 8 (12.100.8)

शातपीतानि शस्त्राणि सन्नाहाः पीतलोहकाः । नानारञ्जनरक्ताः स्युः पताकाः केतवश्च ह ॥

śātapītāni śastrāṇi sannāhāḥ pītalohakāḥ | nānārañjanaraktāḥ syuḥ patākāḥ ketavaśca ha

शस्त्र तीखे और पानी चढ़े हुए हों, कवच पीले लोहे के हों, और पताकाएँ तथा ध्वज अनेक रंगों में रँगे हुए हों।

श्लोक 9 (12.100.9)

ऋष्टयस्तोमराः खड्गा निशिताश्च परश्वथाः । फलकान्यथ चर्माणि प्रतिकल्प्यान्यनेकशः ॥

ṛṣṭayastomarāḥ khaḍgā niśitāśca paraśvathāḥ | phalakānyatha carmāṇi pratikalpyānyanekaśaḥ

ऋष्टि, तोमर, खड्ग, तीखे फरसे, ढालें और चर्म-कवच अनेक संख्या में, बदले के लिए अतिरिक्त भी, तैयार रखे जाएँ।

श्लोक 10 (12.100.10)

अभिनीतानि शस्त्राणि योधाश्च कृतनिश्चयाः । चैत्रे वा मार्गशीर्षे वा सेनायोगः प्रशस्यते ॥

abhinītāni śastrāṇi yodhāśca kṛtaniścayāḥ | caitre vā mārgaśīrṣe vā senāyogaḥ praśasyate

शस्त्र सजा लिए जाएँ और योद्धा दृढ़ निश्चय वाले हों। सेना का प्रयाण चैत्र या मार्गशीर्ष मास में प्रशस्त माना गया है।

श्लोक 11 (12.100.11)

पक्वसस्या हि पृथिवी भवत्यम्बुमती तदा । नैवातिशीतो नात्युष्णः कालो भवति भारत ॥

pakvasasyā hi pṛthivī bhavatyambumatī tadā | naivātiśīto nātyuṣṇaḥ kālo bhavati bhārata

उस समय पृथ्वी पर फसलें पक चुकी होती हैं और जल भरपूर होता है; हे भारत, न बहुत सर्दी होती है, न बहुत गर्मी।

श्लोक 12 (12.100.12)

तस्मात्तदा योजयेत परेषां व्यसनेऽथवा । एते हि योगाः सेनायाः प्रशस्ताः परबाधने ॥

tasmāttadā yojayeta pareṣāṃ vyasane'thavā | ete hi yogāḥ senāyāḥ praśastāḥ parabādhane

इसलिए सेना को तभी चलाना चाहिए, अथवा जब शत्रु संकट में हो। शत्रु पर दबाव डालने के लिए सेना के ये ही अवसर श्रेष्ठ माने गए हैं।

श्लोक 13 (12.100.13)

जलवांस्तृणवान्मार्गः समो गम्यः प्रशस्यते । चारैः सुविदिताभ्यासः कुशलैर्वनगोचरैः ॥

jalavāṃstṛṇavānmārgaḥ samo gamyaḥ praśasyate | cāraiḥ suviditābhyāsaḥ kuśalairvanagocaraiḥ

वह मार्ग श्रेष्ठ माना जाता है जिसमें जल और घास हो, जो समतल और चलने योग्य हो, और जिसका अभ्यास वन में विचरने वाले कुशल गुप्तचरों से भली-भाँति ज्ञात हो।

श्लोक 14 (12.100.14)

न ह्यरण्यानि शक्यन्ते गन्तुं मृगगणैरिव । तस्मात्सेनासु तानेव योजयन्ति जयार्थिनः ॥

na hyaraṇyāni śakyante gantuṃ mṛgagaṇairiva | tasmātsenāsu tāneva yojayanti jayārthinaḥ

क्योंकि मृगों के झुंडों की तरह सेनाएँ वनों को पार नहीं कर सकतीं; इसलिए विजय चाहने वाले लोग उन्हीं वनचरों को सेनाओं में नियुक्त करते हैं।

श्लोक 15 (12.100.15)

अग्रतः पुरुषानीकं शक्तं चापि कुलोद्भवम् । आवासस्तोयवान्मार्गः पर्याकाशः प्रशस्यते ॥

agrataḥ puruṣānīkaṃ śaktaṃ cāpi kulodbhavam | āvāsastoyavānmārgaḥ paryākāśaḥ praśasyate

आगे सक्षम और कुलीन पैदल सैनिकों की टुकड़ी रहे। जल वाला, मार्ग पर स्थित और चारों ओर खुला पड़ाव प्रशस्त माना जाता है।

श्लोक 16 (12.100.16)

परेषामपसर्पाणां प्रतिघातस्तथा भवेत् । आकाशं हि वनाभ्याशे मन्यन्ते गुणवत्तरम् ॥

pareṣāmapasarpāṇāṃ pratighātastathā bhavet | ākāśaṃ hi vanābhyāśe manyante guṇavattaram

इस प्रकार शत्रु के गुप्तचरों को भी रोका जा सकेगा। वन के निकट खुली भूमि को अधिक गुणकारी माना जाता है।

श्लोक 17 (12.100.17)

बहुभिर्गुणजातैश्च ये युद्धकुशला जनाः । उपन्यासो भवेत्तत्र बलानां नातिदूरतः ॥

bahubhirguṇajātaiśca ye yuddhakuśalā janāḥ | upanyāso bhavettatra balānāṃ nātidūrataḥ

जो लोग युद्ध में कुशल हैं, उनके लिए अनेक गुणों को देखते हुए सेनाओं की स्थापना वहीं हो, बहुत दूर नहीं।

श्लोक 18 (12.100.18)

उपन्यासोऽपसर्पाणां पदातीनां च गूहनम् । हतशत्रुप्रतीघातमापदर्थं परायणम् ॥

upanyāso'pasarpāṇāṃ padātīnāṃ ca gūhanam | hataśatrupratīghātamāpadarthaṃ parāyaṇam

गुप्तचरों की नियुक्ति हो और पैदल सैनिकों को छिपाकर रखा जाए; पराजित शत्रु पर पलटवार का साधन हो, और संकट के समय अन्तिम आश्रय भी।

श्लोक 19 (12.100.19)

सप्तर्षीन्पृष्ठतः कृत्वा युध्येयुरचला इव । अनेन विधिना शत्रूञ्जिगीषेतापि दुर्जयान् ॥

saptarṣīnpṛṣṭhataḥ kṛtvā yudhyeyuracalā iva | anena vidhinā śatrūñjigīṣetāpi durjayān

सप्तर्षियों को पीछे रखकर वे पर्वतों की भाँति अडिग होकर युद्ध करें। इस विधि से दुर्जेय शत्रुओं को भी जीतने की इच्छा की जा सकती है।

श्लोक 20 (12.100.20)

यतो वायुर्यतः सूर्यो यतः सोमस्ततो जयः । पूर्वंपूर्वं ज्याय एषां सन्निपाते युधिष्ठिर ॥

yato vāyuryataḥ sūryo yataḥ somastato jayaḥ | pūrvaṃpūrvaṃ jyāya eṣāṃ sannipāte yudhiṣṭhira

जिस ओर वायु हो, जिस ओर सूर्य हो, जिस ओर चन्द्रमा हो, उसी ओर विजय है। हे युधिष्ठिर, इनके टकराने पर इनमें पहले-पहले वाला अधिक बलवान् होता है।

श्लोक 21 (12.100.21)

अकर्दमामनुदकाममर्यादामलोष्टकाम् । अश्वभूमिं प्रशंसन्ति ये युद्धकुशला जनाः ॥

akardamāmanudakāmamaryādāmaloṣṭakām | aśvabhūmiṃ praśaṃsanti ye yuddhakuśalā janāḥ

युद्ध-कुशल लोग घुड़सवारों के लिए वह भूमि श्रेष्ठ बताते हैं जिसमें कीचड़ न हो, पानी न हो, बाँध-प्राचीर आदि की आड़ न हो और ढेले न हों।

श्लोक 22 (12.100.22)

समा निरुदकाकाशा रथभूमिः प्रशस्यते । नीचद्रुमा महाकक्षा सोदका हस्तियोधिनाम् ॥

samā nirudakākāśā rathabhūmiḥ praśasyate | nīcadrumā mahākakṣā sodakā hastiyodhinām

रथों के लिए समतल, जलहीन और खुली भूमि श्रेष्ठ मानी जाती है; हाथी पर लड़ने वालों के लिए नीचे वृक्षों, बड़ी झाड़ियों और जल वाली भूमि।

श्लोक 23 (12.100.23)

बहुदुर्गा महाकक्षा वेणुवेत्रतिरस्कृता । पदातीनां क्षमा भूमिः पर्वतोपवनानि च ॥

bahudurgā mahākakṣā veṇuvetratiraskṛtā | padātīnāṃ kṣamā bhūmiḥ parvatopavanāni ca

जहाँ बहुत-से दुर्ग हों, बड़ी झाड़ियाँ हों, बाँस और बेंत की ओट हो, तथा पर्वत और उपवन हों, वह भूमि पैदल सैनिकों के अनुकूल है।

श्लोक 24 (12.100.24)

पदातिबहुला सेना दृढा भवति भारत । रथाश्वबहुला सेना सुदिनेषु प्रशस्यते ॥

padātibahulā senā dṛḍhā bhavati bhārata | rathāśvabahulā senā sudineṣu praśasyate

हे भारत, पैदल सैनिकों से भरपूर सेना दृढ़ होती है। रथों और घोड़ों से भरपूर सेना अच्छे मौसम के दिनों में प्रशस्त मानी जाती है।

श्लोक 25 (12.100.25)

पदातिनागबहुला प्रावृट्‌काले प्रशस्यते । गुणानेतान्प्रसंख्याय देशकालौ प्रयोजयेत् ॥

padātināgabahulā prāvṛṭkāle praśasyate | guṇānetānprasaṃkhyāya deśakālau prayojayet

वर्षा ऋतु में पैदल सैनिकों और हाथियों से भरपूर सेना प्रशस्त मानी जाती है। इन गुणों पर भली-भाँति विचार करके स्थान और समय का निश्चय करना चाहिए।

श्लोक 26 (12.100.26)

एवं संचिन्त्य यो याति तिथिनक्षत्रपूजितः । विजयं लभते नित्यं सेनां सम्यक्प्रयोजयन् ॥

evaṃ saṃcintya yo yāti tithinakṣatrapūjitaḥ | vijayaṃ labhate nityaṃ senāṃ samyakprayojayan

जो इस प्रकार विचार करके, उचित तिथि और नक्षत्र के पूजन के साथ प्रस्थान करता है और अपनी सेना का ठीक प्रयोग करता है, वह सदा विजय पाता है।

श्लोक 27 (12.100.27)

प्रसुप्तांस्तृषिताञ्श्रान्तान्प्रकीर्णान्नाभिघातयेत् । मोक्षे प्रयाणे चलने पानभोजनकालयोः । अतिक्षिप्तान्व्यतिक्षिप्तान्निहतान्प्रतनूकृतान् ॥

prasuptāṃstṛṣitāñśrāntānprakīrṇānnābhighātayet | mokṣe prayāṇe calane pānabhojanakālayoḥ | atikṣiptānvyatikṣiptānnihatānpratanūkṛtān

सोए हुए, प्यासे, थके हुए और बिखरे हुए लोगों पर प्रहार न करे; न पशु खोलने के समय, न प्रयाण के समय, न इधर-उधर चलते समय, न खाने-पीने के समय; और न उन पर जो बिखरकर तितर-बितर हो गए हों, अस्त-व्यस्त हो गए हों, मारे जा चुके हों या थोड़े रह गए हों।

श्लोक 28 (12.100.28)

अविस्रब्धान्कृतारम्भानुपन्यासात्प्रतापितान् । बहिश्चरानुपन्यासान्कृतवेश्मानुसारिणः ॥

avisrabdhānkṛtārambhānupanyāsātpratāpitān | bahiścarānupanyāsānkṛtaveśmānusāriṇaḥ

न उन पर जो सावधान और सतर्क हों, जिन्होंने कोई कार्य आरम्भ कर दिया हो, जो किसी युक्ति से तंग किए गए हों, जो थोड़े-से लोग शिविर से बाहर चारा आदि लेने निकले हों, और जो अपने बनाए आश्रयों की ओर लौट रहे हों।

श्लोक 29 (12.100.29)

पारम्पर्यागते द्वारे ये केचिदनुवर्तिनः । परिचर्यापरोद्धारो ये च केचन वल्गिनः ॥

pāramparyāgate dvāre ye kecidanuvartinaḥ | paricaryāparoddhāro ye ca kecana valginaḥ

न उन पर जो परम्परा से मिले द्वार पर अनुयायी के रूप में हों, न सेवा करने वालों और द्वार रोकने वालों पर, और न उन पर जो उछल-उछलकर लड़ने वाले हों।

श्लोक 30 (12.100.30)

अनीकं ये विभिदन्ति भिन्नं संस्थापयन्ति च । समानाशनपानास्ते कार्या द्विगुणवेतनाः ॥

anīkaṃ ye vibhidanti bhinnaṃ saṃsthāpayanti ca | samānāśanapānāste kāryā dviguṇavetanāḥ

जो शत्रु की सेना को तोड़ते हैं और अपनी टूटी हुई सेना को फिर जमा देते हैं, उन्हें समान भोजन-पान और दुगुना वेतन दिया जाए।

श्लोक 31 (12.100.31)

जातिगोत्रं च विज्ञाय कर्म चानुत्तमं शुभम् । समानदेहरक्षार्थे कार्या द्विगुणवेतनाः । त्रिगुणं चतुर्गुणं चैव वेतनं तेषु कारयेत् ॥

jātigotraṃ ca vijñāya karma cānuttamaṃ śubham | samānadeharakṣārthe kāryā dviguṇavetanāḥ | triguṇaṃ caturguṇaṃ caiva vetanaṃ teṣu kārayet

उनकी जाति-गोत्र और उनके उत्तम, शुभ कर्मों को जानकर, राजा के शरीर की रक्षा के लिए उन्हें दुगुना वेतन दिया जाए; और उन्हें तिगुना तथा चौगुना वेतन भी दिया जाए।

श्लोक 32 (12.100.32)

दशाधिपतयः कार्याः शताधिपतयस्तथा । ततः सहस्राधिपतिं कुर्याच्छूरमतन्द्रितम् ॥

daśādhipatayaḥ kāryāḥ śatādhipatayastathā | tataḥ sahasrādhipatiṃ kuryācchūramatandritam

दस-दस पर अधिकारी नियुक्त करे, वैसे ही सौ-सौ पर भी; फिर हजार पर किसी शूर और आलस्यरहित पुरुष को अधिपति बनाए।

श्लोक 33 (12.100.33)

यथा मुख्यान्सन्निपात्य वक्तव्याः संशपामहे । यथा जयार्थं संग्रामे न जह्याम परस्परम् ॥

yathā mukhyānsannipātya vaktavyāḥ saṃśapāmahe | yathā jayārthaṃ saṃgrāme na jahyāma parasparam

प्रमुख लोगों को एकत्र करके उनसे कहना चाहिए: "हम शपथ लेते हैं कि विजय के लिए युद्ध में हम एक-दूसरे को नहीं छोड़ेंगे।"

श्लोक 34 (12.100.34)

इहैव ते निवर्तन्तां ये च केचन भीरवः । न घातयेयुः प्रदरं कुर्वाणास्तुमुले सति ॥

ihaiva te nivartantāṃ ye ca kecana bhīravaḥ | na ghātayeyuḥ pradaraṃ kurvāṇāstumule sati

"जो कोई भीरु हों, वे यहीं लौट जाएँ; ऐसा न हो कि घमासान छिड़ने पर वे पंक्ति तोड़कर विनाश करा दें।"

श्लोक 35 (12.100.35)

न सन्निपाते प्रदरं वधं वा कुर्युरीदृशाः । आत्मानं च स्वपक्षं च पलायन्हन्ति संयुगे ॥

na sannipāte pradaraṃ vadhaṃ vā kuryurīdṛśāḥ | ātmānaṃ ca svapakṣaṃ ca palāyanhanti saṃyuge

"ऐसे लोग युद्ध की टक्कर में न पंक्ति तोड़ें, न विनाश कराएँ। भागने वाला रणभूमि में अपना और अपने पक्ष का नाश कर देता है।"

श्लोक 36 (12.100.36)

अर्थनाशो वधोऽकीर्तिरयशश्च पलायने । अमनोज्ञाऽसुखा वाचः पुरुषस्य पलायतः ॥

arthanāśo vadho'kīrtirayaśaśca palāyane | amanojñā'sukhā vācaḥ puruṣasya palāyataḥ

भागने में धन का नाश, मृत्यु, अपकीर्ति और अपयश मिलते हैं; और भागने वाले पुरुष को अप्रिय और दुःख देने वाले वचन सुनने पड़ते हैं।

श्लोक 37 (12.100.37)

प्रतिध्वस्तोष्ठदन्तस्य न्यस्तसर्वायुधस्य च । हित्वा पलायमानस्य सहायान्प्राणसंशये । अमित्रैरवरुद्धस्य द्विषतामस्तु नः सदा ॥

pratidhvastoṣṭhadantasya nyastasarvāyudhasya ca | hitvā palāyamānasya sahāyānprāṇasaṃśaye | amitrairavaruddhasya dviṣatāmastu naḥ sadā

जिसके होंठ और दाँत टूट गए हों, जिसने सब शस्त्र डाल दिए हों, जो प्राण संकट में पड़ने पर साथियों को छोड़कर भागता हो और शत्रुओं से घिर गया हो, ऐसे मनुष्य की यह दशा सदा हमारे शत्रुओं की हो।

श्लोक 38 (12.100.38)

मनुष्यापसदा ह्येते ये भवन्ति पराङ्भुखाः । राशिवर्धनमात्रास्ते नैव ते प्रेत्य नो इह ॥

manuṣyāpasadā hyete ye bhavanti parāṅbhukhāḥ | rāśivardhanamātrāste naiva te pretya no iha

जो पीठ दिखाते हैं, वे मनुष्यों में अधम हैं, केवल भीड़ बढ़ाने भर के हैं; न उनका परलोक है, न यह लोक।

श्लोक 39 (12.100.39)

अमित्रा हृष्टमनसः प्रत्युद्यान्ति पलायिनम् । जयिनस्तु नरास्तात मङ्गलैर्वन्दनेन च ॥

amitrā hṛṣṭamanasaḥ pratyudyānti palāyinam | jayinastu narāstāta maṅgalairvandanena ca

भागने वाले का स्वागत करने शत्रु प्रसन्न मन से आगे आते हैं; किन्तु हे तात, विजयी पुरुषों का स्वागत मंगल-वचनों और वन्दना से होता है।

श्लोक 40 (12.100.40)

यस्य स्म व्यसने राजन्ननुमोदन्ति शत्रवः । तदसह्यतरं दुःखं मन्यन्ते मरणादपि ॥

yasya sma vyasane rājannanumodanti śatravaḥ | tadasahyataraṃ duḥkhaṃ manyante maraṇādapi

हे राजन्, जिसकी विपत्ति पर शत्रु प्रसन्न होते हैं, उस दुःख को लोग मृत्यु से भी अधिक असह्य मानते हैं।

श्लोक 41 (12.100.41)

श्रियं जानीत धर्मस्य मूलं सर्वसुखस्य च । या भीरूणां पराख्यातिः शूरस्तामधिगच्छति ॥

śriyaṃ jānīta dharmasya mūlaṃ sarvasukhasya ca | yā bhīrūṇāṃ parākhyātiḥ śūrastāmadhigacchati

जान लो कि श्री (समृद्धि) धर्म की और सब सुखों की जड़ है। भीरुओं से निकलकर दूसरों के पास जाने वाली उस श्री को शूर प्राप्त करता है।

श्लोक 42 (12.100.42)

ते वयं स्वर्गमिच्छन्तः संग्रामे त्यक्तजीविताः । जयन्तो वध्यमाना वा प्राप्नुयाम च सद्गतिम् ॥

te vayaṃ svargamicchantaḥ saṃgrāme tyaktajīvitāḥ | jayanto vadhyamānā vā prāpnuyāma ca sadgatim

इसलिए हम स्वर्ग की इच्छा से रणभूमि में प्राणों का मोह छोड़कर, जीतें या मारे जाएँ, सद्गति प्राप्त करेंगे।

श्लोक 43 (12.100.43)

एवं संशप्तशपथाः समभित्यक्तजीविताः । अमित्रवाहिनीं वीराः प्रतिगाहन्त्यभीरवः ॥

evaṃ saṃśaptaśapathāḥ samabhityaktajīvitāḥ | amitravāhinīṃ vīrāḥ pratigāhantyabhīravaḥ

इस प्रकार शपथ लेकर और प्राणों का मोह त्यागकर निर्भय वीर शत्रु की सेना में घुस पड़ते हैं।

श्लोक 44 (12.100.44)

अग्रतः पुरुषाऽनीकमसिचर्मवतां भवेत् । पृष्ठतः शकटानीकं कलत्रं मध्यतस्तथा ॥

agrataḥ puruṣā'nīkamasicarmavatāṃ bhavet | pṛṣṭhataḥ śakaṭānīkaṃ kalatraṃ madhyatastathā

आगे तलवार और ढाल वाले पुरुषों की पंक्ति हो, पीछे गाड़ियों की पंक्ति, और बीच में स्त्रियाँ।

श्लोक 45 (12.100.45)

परेषां प्रतिघातार्थं पदातीनां च गूहनम् । अपि तस्मिन्पुरे वृद्धा भवेयुर्ये पुरोगमाः ॥

pareṣāṃ pratighātārthaṃ padātīnāṃ ca gūhanam | api tasminpure vṛddhā bhaveyurye purogamāḥ

शत्रु पर प्रतिघात करने के लिए पैदल सैनिक छिपाकर रखे जाएँ; और उस अग्रभाग में वे वृद्ध पुरुष भी हों जो आगे चलने वाले हैं।

श्लोक 46 (12.100.46)

ये पुरस्तादभिमताः सत्ववन्तो मनस्विनः । ते पूर्वमभिवर्तेरंश्चैतानेवेतरे जनाः ॥

ye purastādabhimatāḥ satvavanto manasvinaḥ | te pūrvamabhivarteraṃścaitānevetare janāḥ

जो आगे के लिए सम्मानित हैं, वे साहसी और उदार मन वाले पहले आगे बढ़ें, और दूसरे लोग उन्हीं के पीछे चलें।

श्लोक 47 (12.100.47)

अपि चोद्धर्षणं कार्यं भीरूणामपि यत्नतः । स्कन्धदर्शनमात्रात्तु तिष्ठेयुर्वा समीपतः ॥

api coddharṣaṇaṃ kāryaṃ bhīrūṇāmapi yatnataḥ | skandhadarśanamātrāttu tiṣṭheyurvā samīpataḥ

भीरुओं को भी यत्नपूर्वक उत्साहित करना चाहिए; अथवा वे केवल जमावड़ा दिखाने के लिए पास ही खड़े रहें।

श्लोक 48 (12.100.48)

संहतान्योधयेदल्पान्कामं विस्तारयेद्बहून् । सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह ॥

saṃhatānyodhayedalpānkāmaṃ vistārayedbahūn | sūcīmukhamanīkaṃ syādalpānāṃ bahubhiḥ saha

थोड़े लोग सटकर लड़ें, और बहुत लोग इच्छानुसार फैला दिए जाएँ। थोड़ों का बहुतों के साथ बना व्यूह सूचीमुख कहलाता है।

श्लोक 49 (12.100.49)

संप्रयुक्ते निकृष्टे वा सत्यं वा यदि वाऽनृतम् । प्रगृह्य बाहून्क्रोशेत हन्त भग्नाः परे इति ॥

saṃprayukte nikṛṣṭe vā satyaṃ vā yadi vā'nṛtam | pragṛhya bāhūnkrośeta hanta bhagnāḥ pare iti

युद्ध छिड़ने पर या सेना की दशा बिगड़ने पर, सच हो या झूठ, भुजाएँ उठाकर पुकार लगानी चाहिए: "मारो! शत्रु टूट गए!"

श्लोक 50 (12.100.50)

आगतं मे मित्रबलं प्रहरध्वमभीतवत् । सत्ववन्तो निधावेयुः कुर्वन्तो भैरवान्रवान् ॥

āgataṃ me mitrabalaṃ praharadhvamabhītavat | satvavanto nidhāveyuḥ kurvanto bhairavānravān

"हमारी मित्र सेना आ गई है! निडर होकर प्रहार करो!" शूर वीर भयंकर नाद करते हुए दौड़ पड़ें।

श्लोक 51 (12.100.51)

क्ष्वेडाः किलकिलाशब्दाः क्रकचा गोविषाणिकाः । भेरीमृदङ्गपणवान्नादयेयुश्च जर्झरान् ॥

kṣveḍāḥ kilakilāśabdāḥ krakacā goviṣāṇikāḥ | bherīmṛdaṅgapaṇavānnādayeyuśca jarjharān

वे सिंहनाद और 'किलकिल' की ध्वनियाँ करें, तथा क्रकच, गोशृंग-तुरहियाँ, भेरी, मृदंग, पणव और झर्झर बजाएँ।

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