शान्ति पर्व · अध्याय 103
बृहस्पति द्वारा इन्द्र को शत्रुओं से व्यवहार का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा को कोमल, उग्र या बड़े पक्ष वाले शत्रु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। भीष्म बृहस्पति और इन्द्र के प्राचीन संवाद को सुनाते हैं: क्रोध को छिपाए रखना, मीठे वचनों से शत्रु की सेवा करते हुए उचित समय पर प्रहार करना, शत्रुओं से एक-एक करके निपटना, और गुप्तचरों, छल तथा सबल सेना का उपयोग करना। फिर इन्द्र दुष्ट को पहचानने के लक्षण पूछते हैं, बृहस्पति उन्हें बताते हैं, और इन्द्र उसी उपदेश पर चलकर शत्रुओं को वश में कर लेते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.103.1)
कथं मृदौ कथं तीक्ष्णे महापक्षे च भारत । अरौ वर्तेत नृपतिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kathaṃ mṛdau kathaṃ tīkṣṇe mahāpakṣe ca bhārata | arau varteta nṛpatistanme brūhi pitāmaha
हे भारत! राजा को कोमल शत्रु के साथ, उग्र शत्रु के साथ और बड़े पक्ष वाले शत्रु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? हे पितामह, यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.103.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | bṛhaspateśca saṃvādamindrasya ca yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, बृहस्पति और इन्द्र का संवाद।
श्लोक 3 (12.103.3)
बृहस्पतिं देवपतिरभिवाद्य कृताञ्जलिः । उपसंगम्य पप्रच्छ वासवः परवीरहा ॥
bṛhaspatiṃ devapatirabhivādya kṛtāñjaliḥ | upasaṃgamya papraccha vāsavaḥ paravīrahā
शत्रुवीरों का संहार करने वाले देवराज इन्द्र ने हाथ जोड़कर बृहस्पति को प्रणाम किया और उनके पास जाकर यह पूछा।
इन्द्र उवाच
श्लोक 4 (12.103.4)
अहितेषु कथं ब्रह्मन्प्रवर्तेयमतन्द्रितः । असमुच्छिद्य चैवैतान्नियच्छेयमुपायतः ॥
ahiteṣu kathaṃ brahmanpravarteyamatandritaḥ | asamucchidya caivaitānniyaccheyamupāyataḥ
हे ब्रह्मन्! मैं आलस्य छोड़कर शत्रुओं के प्रति कैसा बर्ताव करूँ, और उन्हें जड़ से उखाड़े बिना उपाय से कैसे वश में रखूँ?
श्लोक 5 (12.103.5)
सेनयोर्व्यतिषङ्गे च जयः साधारणो भवेत् । किं कुर्वाणं न मां जह्याज्ज्वलिता श्रीः प्रतापिनी ॥
senayorvyatiṣaṅge ca jayaḥ sādhāraṇo bhavet | kiṃ kurvāṇaṃ na māṃ jahyājjvalitā śrīḥ pratāpinī
जब दोनों सेनाएँ आपस में भिड़ें और जय दोनों के लिए समान रूप से सम्भव हो, तब मैं क्या करूँ कि देदीप्यमान, प्रतापवती लक्ष्मी मुझे न छोड़े?
भीष्म उवाच
श्लोक 6 (12.103.6)
ततो धर्मार्थकामानां कुशलः प्रतिभानवान् । राजधर्मविधानज्ञः प्रत्युवाच पुरंदरम् ॥
tato dharmārthakāmānāṃ kuśalaḥ pratibhānavān | rājadharmavidhānajñaḥ pratyuvāca puraṃdaram
तब धर्म, अर्थ और काम में कुशल, प्रतिभासम्पन्न तथा राजधर्म के विधान के ज्ञाता बृहस्पति ने पुरन्दर को उत्तर दिया।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 7 (12.103.7)
न जातु कलहेनेच्छेन्नियन्तुमपकारिणः । बालैरासेवितं ह्येतद्यदमर्षो यदक्षमा ॥
na jātu kalahenecchenniyantumapakāriṇaḥ | bālairāsevitaṃ hyetadyadamarṣo yadakṣamā
अपकार करने वालों को वश में करने के लिए कभी झगड़े का सहारा न ले; क्रोध और असहनशीलता तो बालकों के ही स्वभाव हैं।
श्लोक 8 (12.103.8)
न शत्रुर्विवृतः कार्यो वधमस्याभिकाङ्क्षता ॥
na śatrurvivṛtaḥ kāryo vadhamasyābhikāṅkṣatā
जो शत्रु का वध करना चाहता है, वह उसे सावधान न होने दे।
श्लोक 9 (12.103.9)
क्रोधं भयं च हर्षं च नियम्य स्वयमात्मनि । अमित्रमुपसेवेत विश्वस्तवदविश्वसन् ॥
krodhaṃ bhayaṃ ca harṣaṃ ca niyamya svayamātmani | amitramupaseveta viśvastavadaviśvasan
क्रोध, भय और हर्ष को अपने भीतर ही रोककर वह शत्रु की सेवा करे; विश्वास करने वाले-सा बना रहे, पर वास्तव में विश्वास न करे।
श्लोक 10 (12.103.10)
प्रियमेव वदेन्नित्यं नाप्रियं किंचिदाचरेत् । विरमेच्छुष्कवैरेभ्यः कर्णजापं च वर्जयेत् ॥
priyameva vadennityaṃ nāpriyaṃ kiṃcidācaret | viramecchuṣkavairebhyaḥ karṇajāpaṃ ca varjayet
वह सदा प्रिय बोले, कोई अप्रिय आचरण न करे, निष्फल वैर से दूर रहे और कान में फुसफुसाना छोड़ दे।
श्लोक 11 (12.103.11)
यथा वैतंसिको युक्तो द्विजानां सदृशस्वरः । तान्द्विजान्कुरुते वश्यांस्तथायुक्तो महीपतिः । वशं चोपनयेच्छत्रून्निहन्याच्च पुरंदर ॥
yathā vaitaṃsiko yukto dvijānāṃ sadṛśasvaraḥ | tāndvijānkurute vaśyāṃstathāyukto mahīpatiḥ | vaśaṃ copanayecchatrūnnihanyācca puraṃdara
जैसे सावधान बहेलिया पक्षियों की-सी बोली बोलकर उन पक्षियों को अपने वश में कर लेता है, वैसे ही सावधान राजा भी शत्रुओं को अपने वश में लाए और फिर हे पुरन्दर, उन्हें मार डाले।
श्लोक 12 (12.103.12)
न नित्यं परिभूयारीन्सुखं स्वपिति वासव । जागर्त्येव हि दुष्टात्मा संकरेऽग्निरिवोत्थितः ॥
na nityaṃ paribhūyārīnsukhaṃ svapiti vāsava | jāgartyeva hi duṣṭātmā saṃkare'gnirivotthitaḥ
हे वासव! जो सदा शत्रुओं का तिरस्कार करता रहता है, वह सुख की नींद नहीं सो पाता; दुष्टात्मा शत्रु जागता ही रहता है, जैसे कूड़े के ढेर में आग भड़क उठती है।
श्लोक 13 (12.103.13)
न सन्निपातः कर्तव्यः सामान्ये विजये सति । विश्वास्यैवोपसंनम्यो वशे कृत्वा रिपुः प्रभो ॥
na sannipātaḥ kartavyaḥ sāmānye vijaye sati | viśvāsyaivopasaṃnamyo vaśe kṛtvā ripuḥ prabho
जब विजय अनिश्चित हो और दोनों में से किसी की भी हो सकती हो, तब आमने-सामने की भिड़न्त नहीं करनी चाहिए। हे प्रभो! पहले शत्रु को विश्वास दिलाकर उसके पास जाए और उसे अपने वश में कर ले।
श्लोक 14 (12.103.14)
संप्रधार्य सहामात्यैर्मन्त्रविद्भिर्महात्मभिः । उपेक्ष्यमाणो विज्ञातो हृदयेनापराजितः । अथास्य प्रहरेत्काले विधेर्विचलितो यदा ॥
saṃpradhārya sahāmātyairmantravidbhirmahātmabhiḥ | upekṣyamāṇo vijñāto hṛdayenāparājitaḥ | athāsya praharetkāle vidhervicalito yadā
मन्त्र के जानने वाले महात्मा मन्त्रियों के साथ विचार करके, शत्रु को जानते हुए भी उसकी उपेक्षा करता-सा रहे और हृदय से अपराजित बना रहे; फिर जब वह शत्रु विधि से डिगे, तब उचित समय पर उस पर प्रहार करे।
श्लोक 15 (12.103.15)
दण्डं च दूषयेदस्य पुरुषैराप्तकारिभिः ॥
daṇḍaṃ ca dūṣayedasya puruṣairāptakāribhiḥ
और विश्वासपात्र पुरुषों के द्वारा शत्रु की सेना को बिगाड़ दे।
श्लोक 16 (12.103.16)
आदिमध्यावसानज्ञान्प्रच्छन्नं च विचारयेत् । बलानि दूषयेदस्य जानन्नेव प्रमाणतः ॥
ādimadhyāvasānajñānpracchannaṃ ca vicārayet | balāni dūṣayedasya jānanneva pramāṇataḥ
आदि, मध्य और अन्त को जानने वाले पुरुषों से गुप्त रूप से विचार करे, और शत्रु की सेनाओं को ठीक-ठीक जानकर उन्हें बिगाड़ दे।
श्लोक 17 (12.103.17)
भेदेनोपप्रदानेन संसृजेदौषधैस्तथा । न त्वेव खलु संसर्गं रोचयेदरिभिः सह ॥
bhedenopapradānena saṃsṛjedauṣadhaistathā | na tveva khalu saṃsargaṃ rocayedaribhiḥ saha
भेद, दान और ओषधियों के द्वारा भी उन पर प्रभाव डाले; परन्तु शत्रुओं के साथ मेल-जोल रखना कभी पसन्द न करे।
श्लोक 18 (12.103.18)
दीर्घकालमपीक्षेत निग्राह्या एव शत्रवः । कालकाङ्क्षी च युक्तः सन्नुपासीत शचीपते ॥
dīrghakālamapīkṣeta nigrāhyā eva śatravaḥ | kālakāṅkṣī ca yuktaḥ sannupāsīta śacīpate
चाहे बहुत समय लग जाए, वह प्रतीक्षा करे; शत्रुओं का तो दमन करना ही है। हे शचीपति! उचित समय की प्रतीक्षा करता हुआ और सजग रहकर वह उनकी सेवा में लगा रहे।
श्लोक 19 (12.103.19)
तथा प्रियं च वक्तव्यं यथा विस्रम्भमाप्नुयात् । न सद्योऽरीन्विहन्याच्च द्रष्टव्यो विजयो ध्रुवः । भूयः शल्यं घटयति नवं च कुरुते व्रणम् ॥
tathā priyaṃ ca vaktavyaṃ yathā visrambhamāpnuyāt | na sadyo'rīnvihanyācca draṣṭavyo vijayo dhruvaḥ | bhūyaḥ śalyaṃ ghaṭayati navaṃ ca kurute vraṇam
उसे इतना प्रिय बोलना चाहिए कि शत्रु विश्वास करने लगें। वह शत्रुओं को तुरन्त न मारे; विजय को निश्चित करके देखना चाहिए। जो काँटे को फिर से कुरेदता है, वह नया घाव कर देता है।
श्लोक 20 (12.103.20)
प्राप्ते च प्रहरेत्काले न च संवर्तते पुनः । हन्तुकामस्य देवेन्द्र पुरुषस्य रिपून्प्रति ॥
prāpte ca praharetkāle na ca saṃvartate punaḥ | hantukāmasya devendra puruṣasya ripūnprati
उचित समय आने पर प्रहार करे, क्योंकि हे देवेन्द्र, शत्रुओं को मारना चाहने वाले पुरुष के लिए वह समय फिर लौटकर नहीं आता।
श्लोक 21 (12.103.21)
यं हि कालो व्यतिक्रामेत्पुरुषं कालकाङ्क्षिणम् । दुर्लभः स पुनस्तेन कालः कर्म चिकीर्षता ॥
yaṃ hi kālo vyatikrāmetpuruṣaṃ kālakāṅkṣiṇam | durlabhaḥ sa punastena kālaḥ karma cikīrṣatā
जो पुरुष अवसर की प्रतीक्षा में है, उसके हाथ से यदि वह अवसर निकल जाए, तो कार्य करना चाहने पर वह उसे फिर कठिनाई से पाता है।
श्लोक 22 (12.103.22)
औजस्यं जनयेदेव संगृह्णन्साधुसंमतम् । कालेन साधयेत्कृत्यमप्राप्तो न हि पीडयेत् ॥
aujasyaṃ janayedeva saṃgṛhṇansādhusaṃmatam | kālena sādhayetkṛtyamaprāpto na hi pīḍayet
वह सज्जनों को मान्य बातों को अपनाता हुआ अपना ओज बढ़ाए और समय आने पर ही कार्य सिद्ध करे; समय आने से पहले दबाव न डाले।
श्लोक 23 (12.103.23)
विहाय कामं क्रोधं च तथाऽहंकारमेव च । युक्तो विवरमन्विच्छेदहितानां सदा नृपः ॥
vihāya kāmaṃ krodhaṃ ca tathā'haṃkārameva ca | yukto vivaramanvicchedahitānāṃ sadā nṛpaḥ
राजा काम, क्रोध और अहंकार को छोड़कर सावधान रहे और सदा शत्रुओं की दुर्बलता का अवसर खोजता रहे।
श्लोक 24 (12.103.24)
मार्दवं दण्ड आलस्यं प्रमादश्च सुरोत्तम । मायाः सुविहिताः शक्र शातयन्त्यविचक्षणम् ॥
mārdavaṃ daṇḍa ālasyaṃ pramādaśca surottama | māyāḥ suvihitāḥ śakra śātayantyavicakṣaṇam
हे सुरोत्तम! कोमलता, दण्ड (बल का प्रयोग), आलस्य और प्रमाद तथा हे शक्र! भली-भाँति रची हुई मायाएँ नासमझ को गिरा देती हैं।
श्लोक 25 (12.103.25)
निहत्यैतानि चत्वारि मायां प्रतिविधाय च । ततः शक्नोति शत्रूणां प्रहर्तुमविचारयन् ॥
nihatyaitāni catvāri māyāṃ pratividhāya ca | tataḥ śaknoti śatrūṇāṃ prahartumavicārayan
इन चारों को दबाकर और माया का प्रतिकार करके तब वह निःसंकोच शत्रुओं पर प्रहार कर सकता है।
श्लोक 26 (12.103.26)
यदेवैतेन शक्येत गुह्यं कर्तुं तदाऽऽचरेत् । यच्छन्ति सचिवा गुह्यं मिथो विश्रावयन्त्यपि ॥
yadevaitena śakyeta guhyaṃ kartuṃ tadā''caret | yacchanti sacivā guhyaṃ mitho viśrāvayantyapi
जो बात अकेला मनुष्य गुप्त रख सके, उसे वह उसी प्रकार करे। मन्त्री भी जिस रहस्य को रखे रहते हैं, उसे आपस में सुना भी देते हैं।
श्लोक 27 (12.103.27)
अशक्यमिति कृत्वा वा ततोऽन्यैः संविदं चरेत् । ब्रह्मदण्डमदृष्टेषु दृष्टेषु चतुरङ्गिणीम् ॥
aśakyamiti kṛtvā vā tato'nyaiḥ saṃvidaṃ caret | brahmadaṇḍamadṛṣṭeṣu dṛṣṭeṣu caturaṅgiṇīm
अथवा यह समझकर कि यह अकेले नहीं हो सकेगा, तब दूसरों से परामर्श करे। जो दूर और अदृश्य हों उन पर ब्रह्मदण्ड (पुरोहित द्वारा अभिचार) का प्रयोग करे, और जो दृष्टि में हों उन पर चतुरंगिणी सेना का।
श्लोक 28 (12.103.28)
भेदं च प्रथमं विद्यात्तूष्णीं दण्डं तथैव च । काले प्रयोजयेद्राजा तस्मिंस्तस्मिंस्तदातदा ॥
bhedaṃ ca prathamaṃ vidyāttūṣṇīṃ daṇḍaṃ tathaiva ca | kāle prayojayedrājā tasmiṃstasmiṃstadātadā
वह पहले भेद को जाने और वैसे ही चुपचाप दिया जाने वाला दण्ड भी; राजा उन्हें उस-उस अवसर पर समय के अनुसार काम में लाए।
श्लोक 29 (12.103.29)
प्रणिपातं च गच्छेत काले शत्रोर्बलीयसः । युक्तोऽस्य वधमन्विच्छेदप्रमत्तः प्रमाद्यतः ॥
praṇipātaṃ ca gaccheta kāle śatrorbalīyasaḥ | yukto'sya vadhamanvicchedapramattaḥ pramādyataḥ
बलवान शत्रु के सामने उचित समय पर झुक भी जाए; सावधान रहकर उसके वध का उपाय खोजता रहे, जब वह असावधान हो।
श्लोक 30 (12.103.30)
प्रणिपातेन दानेन वाचा मधुरया ब्रुवन् । अमित्रमुपसेवेत न च जातु विशङ्कयेत् ॥
praṇipātena dānena vācā madhurayā bruvan | amitramupaseveta na ca jātu viśaṅkayet
प्रणाम, दान और मधुर वाणी से शत्रु की सेवा करे और उसे कभी सन्देह का अवसर न दे।
श्लोक 31 (12.103.31)
स्थानानि शङ्कितानां च नित्यमेव विवर्जयेत् । न च तेष्वाश्वसेद्राजा जाग्रतीह निराकृताः ॥
sthānāni śaṅkitānāṃ ca nityameva vivarjayet | na ca teṣvāśvasedrājā jāgratīha nirākṛtāḥ
जिन पर शंका हो, उनके स्थानों से राजा सदा दूर रहे और उन पर निश्चिन्त होकर विश्वास न करे; अपमानित लोग यहाँ सदा जागते रहते हैं।
श्लोक 32 (12.103.32)
न ह्यतो दुष्करं कर्म किंचिदस्ति सुरोत्तम । यथा विविधवृत्तानामैश्वर्यममराधिप ॥
na hyato duṣkaraṃ karma kiṃcidasti surottama | yathā vividhavṛttānāmaiśvaryamamarādhipa
हे सुरोत्तम, हे अमराधिप! अनेक प्रकार के आचरण वाले अस्थिर लोगों पर प्रभुत्व रखने से अधिक कठिन कोई काम नहीं है।
श्लोक 33 (12.103.33)
तथा विविधशीलानामपि संभव उच्यते । प्रयतेद्योगमास्थाय मित्रामित्रानवारयन् ॥
tathā vividhaśīlānāmapi saṃbhava ucyate | prayatedyogamāsthāya mitrāmitrānavārayan
इसी प्रकार भिन्न-भिन्न स्वभाव वालों के विषय में भी सफलता सम्भव कही जाती है। वह किसी उपाय का आश्रय लेकर प्रयत्न करे और मित्रों तथा शत्रुओं में से किसी को न हटाए।
श्लोक 34 (12.103.34)
मृदुमप्यवमन्यन्ते तीक्ष्णादुद्विजते जनः । मातीक्ष्णो मा मृदुर्भूस्त्वं तीक्ष्णो भव मृदुर्भव ॥
mṛdumapyavamanyante tīkṣṇādudvijate janaḥ | mātīkṣṇo mā mṛdurbhūstvaṃ tīkṣṇo bhava mṛdurbhava
कोमल का भी लोग अनादर करते हैं और कठोर से लोग डरकर दूर भागते हैं। इसलिए तुम न केवल कठोर बनो, न केवल कोमल; कठोर भी बनो और कोमल भी बनो।
श्लोक 35 (12.103.35)
यथा वप्रे वेगवति सर्वतः संप्लुतोदके । नित्यं विचरणाद्बाधस्तथा राज्यं प्रमाद्यतः ॥
yathā vapre vegavati sarvataḥ saṃplutodake | nityaṃ vicaraṇādbādhastathā rājyaṃ pramādyataḥ
जैसे वेग वाली बाढ़ से चारों ओर डूबे हुए बाँध को निरन्तर कटाव से हानि पहुँचती है, वैसे ही असावधान राजा के राज्य को हानि पहुँचती है।
श्लोक 36 (12.103.36)
न बहूनुपरुध्येत यौगपद्येन शात्रवान् । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन च पुरंदर ॥
na bahūnuparudhyeta yaugapadyena śātravān | sāmnā dānena bhedena daṇḍena ca puraṃdara
हे पुरन्दर! साम, दान, भेद या दण्ड से बहुत-से शत्रुओं को एक साथ न घेरे।
श्लोक 37 (12.103.37)
एकैकमेषां निष्पिष्य शिष्टेषु निपुणं चरेत् । न तु शक्तोऽपि मेधावी सर्वानेवाचरेद्बुधः ॥
ekaikameṣāṃ niṣpiṣya śiṣṭeṣu nipuṇaṃ caret | na tu śakto'pi medhāvī sarvānevācaredbudhaḥ
इनमें से एक-एक को कुचलकर बाकी के साथ कुशलता से व्यवहार करे; बुद्धिमान पुरुष समर्थ होकर भी सबसे एक साथ न उलझे।
श्लोक 38 (12.103.38)
यदा स्यान्महती सेना हयनागरथाकुला । पदातियन्त्रबहुला अनुरक्ता षडङ्गिनी ॥
yadā syānmahatī senā hayanāgarathākulā | padātiyantrabahulā anuraktā ṣaḍaṅginī
जब उसके पास घोड़ों, हाथियों और रथों से भरी, पैदल सैनिकों और यन्त्रों से सम्पन्न, अनुरक्त और छह अंगों वाली विशाल सेना हो,
श्लोक 39 (12.103.39)
यदा बहुविधां वृद्धिं मन्येत प्रतियोगतः । तदा विवृत्य प्रहरेद्दस्यूनामविचारयन् ॥
yadā bahuvidhāṃ vṛddhiṃ manyeta pratiyogataḥ | tadā vivṛtya prahareddasyūnāmavicārayan
और जब वह शत्रुओं की तुलना में अपनी वृद्धि अनेक प्रकार से बढ़ी हुई माने, तब खुलकर सामने आए और बिना हिचक उन दस्युओं (शत्रुओं) पर प्रहार करे।
श्लोक 40 (12.103.40)
न साम दण्डोपनिषत्प्रशस्यते । न मार्दवं शत्रुषु यात्रिकं सदा । न सस्यघातो न च संकरक्रिया । न चापि भूयः प्रकृतेर्विचारणा ॥
na sāma daṇḍopaniṣatpraśasyate | na mārdavaṃ śatruṣu yātrikaṃ sadā | na sasyaghāto na ca saṃkarakriyā | na cāpi bhūyaḥ prakṛtervicāraṇā
साम की प्रशंसा नहीं की जाती, बल्कि गुप्त दण्ड की नीति ही सराही जाती है। शत्रुओं के प्रति कोमलता चढ़ाई के समय कभी उचित नहीं; न फसलों का नाश, न विष आदि मिलाने की क्रिया, और न अपने राज्य के अंगों की बार-बार जाँच-पड़ताल।
श्लोक 41 (12.103.41)
मायाविभेदानुपसर्जनानि । वाचं तथैव प्रथमं प्रयोगात् । आप्तैर्मनुष्यैरुपचारयेत । पुरेषु राष्ट्रेषु च संप्रयुक्तान् ॥
māyāvibhedānupasarjanāni | vācaṃ tathaiva prathamaṃ prayogāt | āptairmanuṣyairupacārayeta | pureṣu rāṣṭreṣu ca saṃprayuktān
अनेक प्रकार की मायाएँ और शत्रुओं को एक-दूसरे से भिड़ाने के उपाय, तथा किसी भी कार्य से पहले वाणी का प्रयोग, ये सब वह नगरों और राष्ट्रों में भेजे हुए विश्वासपात्र पुरुषों से करवाए।
श्लोक 42 (12.103.42)
पुराऽपि चैताननुसृत्य भूमिपाः । पुरेषु भोगानखिलाञ्जयन्ति । पुरेषु नीतिं विहितां यथाविधि । प्रयोजयन्तो बलवृत्रसूदन ॥
purā'pi caitānanusṛtya bhūmipāḥ | pureṣu bhogānakhilāñjayanti | pureṣu nītiṃ vihitāṃ yathāvidhi | prayojayanto balavṛtrasūdana
हे बल और वृत्र का संहार करने वाले! प्राचीन काल में भी राजा इन शत्रुओं के पीछे उनके नगरों में पहुँचकर और वहाँ विधि के अनुसार बताई गई नीति का प्रयोग करके उनके सारे भोगों को जीत लेते थे।
श्लोक 43 (12.103.43)
प्रदाय गूढानि वसूनि नाम । प्रच्छिद्य भोगानपहाय च स्वान् । दुष्टाः स्वदोषैरिति कीर्तयित्वा । पुरेषु राष्ट्रेषु च योजयन्ति ॥
pradāya gūḍhāni vasūni nāma | pracchidya bhogānapahāya ca svān | duṣṭāḥ svadoṣairiti kīrtayitvā | pureṣu rāṣṭreṣu ca yojayanti
उन्हें गुप्त रूप से धन देकर, उनके भोग छीनकर और उन्हें अपने से अलग करके, 'ये अपने ही दोषों से बिगड़े हैं' ऐसा घोषित करके वे उन्हें शत्रुओं के नगरों और राष्ट्रों में नियुक्त कर देते हैं।
श्लोक 44 (12.103.44)
तथैव चान्यैरपि शास्त्रवेदिभिः । स्वलंकृतैः शास्त्रविधानलिङ्गितैः । सुशिक्षितैर्भाष्यकथाविशारदैः । परेषु कृत्यामुपधारयेच्च ॥
tathaiva cānyairapi śāstravedibhiḥ | svalaṃkṛtaiḥ śāstravidhānaliṅgitaiḥ | suśikṣitairbhāṣyakathāviśāradaiḥ | pareṣu kṛtyāmupadhārayecca
और इसी प्रकार शास्त्रों के जानने वाले, भली-भाँति सजे हुए, शास्त्रविहित चिह्नों से युक्त, सुशिक्षित तथा भाष्य और कथा में निपुण दूसरे पुरुषों के द्वारा भी वह शत्रुओं पर मारण-अभिचार (घातक कृत्या) का प्रयोग कराए।
इन्द्र उवाच
श्लोक 45 (12.103.45)
कानि लिङ्गानि दुष्टस्य भवन्ति द्विजसत्तम । कथं दुष्टं विजानीयादेतत्पृष्टो ब्रवीहि मे ॥
kāni liṅgāni duṣṭasya bhavanti dvijasattama | kathaṃ duṣṭaṃ vijānīyādetatpṛṣṭo bravīhi me
हे द्विजश्रेष्ठ! दुष्ट मनुष्य के लक्षण क्या होते हैं? दुष्ट को कैसे पहचाना जाए? यह पूछे जाने पर मुझे बताइए।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 46 (12.103.46)
परोक्षमगुणानाह सद्गुणानभ्यसूयति । परैर्वा कीर्त्यमानेषु तूष्णीमास्ते पराङ्मुखः ॥
parokṣamaguṇānāha sadguṇānabhyasūyati | parairvā kīrtyamāneṣu tūṣṇīmāste parāṅmukhaḥ
वह पीठ पीछे दोष बताता है, गुणों से डाह करता है, और जब दूसरे प्रशंसा करते हैं तब मुँह फेरकर चुप बैठा रहता है।
श्लोक 47 (12.103.47)
तूष्णींभावेऽपि विज्ञेयं न चेद्भवति कारणम् । विश्वासं चोष्ठसंदंशं शिरसश्च प्रकम्पनम् ॥
tūṣṇīṃbhāve'pi vijñeyaṃ na cedbhavati kāraṇam | viśvāsaṃ coṣṭhasaṃdaṃśaṃ śirasaśca prakampanam
चुप रहने पर भी यह जान लेना चाहिए, यदि उसका कोई कारण न हो; और वैसे ही विश्वास का दिखावा, होंठ चबाना और सिर हिलाना भी लक्षण हैं।
श्लोक 48 (12.103.48)
करोत्यभीक्ष्णं संसृष्टमसंसृष्टश्च भाषते । अदृष्टवद्विकुरुते दृष्ट्वा वा नाभिभाषते ॥
karotyabhīkṣṇaṃ saṃsṛṣṭamasaṃsṛṣṭaśca bhāṣate | adṛṣṭavadvikurute dṛṣṭvā vā nābhibhāṣate
वह बार-बार साथ का व्यवहार करता है, पर बोलता ऐसे है जैसे कोई सम्बन्ध ही न हो; देखकर भी अनदेखा-सा करता है, या देखकर भी बात नहीं करता।
श्लोक 49 (12.103.49)
पृथगेत्य समश्नाति नेदमद्य यथाविधि । आसने शयने याने भावा लक्ष्या विशेषतः ॥
pṛthagetya samaśnāti nedamadya yathāvidhi | āsane śayane yāne bhāvā lakṣyā viśeṣataḥ
वह आकर अलग भोजन करता है और 'आज यह विधि के अनुसार नहीं है' ऐसा कहता है। बैठने, सोने और सवारी के समय उसके भावों को विशेष रूप से देखना चाहिए।
श्लोक 50 (12.103.50)
आर्तिरार्ते प्रिये प्रीतिरेतावन्मित्रलक्षणम् । विपरीतं तु बोद्धव्यमरिलक्षणमेव तत् ॥
ārtirārte priye prītiretāvanmitralakṣaṇam | viparītaṃ tu boddhavyamarilakṣaṇameva tat
दूसरे के दुःख में दुःख और उसके प्रिय होने पर प्रसन्नता, मित्र का बस इतना ही लक्षण है; इसके विपरीत को शत्रु का लक्षण जानना चाहिए।
श्लोक 51 (12.103.51)
एतान्येव यथोक्तानि बुध्येथास्त्रिदशाधिप । पुरुषाणां प्रदुष्टानां स्वभावो बलवत्तरः ॥
etānyeva yathoktāni budhyethāstridaśādhipa | puruṣāṇāṃ praduṣṭānāṃ svabhāvo balavattaraḥ
हे त्रिदशाधिप! जैसे बताए गए हैं, उन्हीं लक्षणों को तुम पहचानना; दूषित मनुष्यों में स्वभाव ही अधिक बलवान होता है।
श्लोक 52 (12.103.52)
इति दुष्टस्य विज्ञानमुक्तं ते सुरसत्तम । निशाम्य शास्त्रतत्त्वार्थं यथावदमरेश्वरः ॥
iti duṣṭasya vijñānamuktaṃ te surasattama | niśāmya śāstratattvārthaṃ yathāvadamareśvaraḥ
हे सुरश्रेष्ठ! इस प्रकार दुष्ट को पहचानने का उपाय तुम्हें बता दिया। शास्त्र के तत्त्वार्थ को ठीक-ठीक सुनकर देवेश्वर इन्द्र ने,
भीष्म उवाच
श्लोक 53 (12.103.53)
स तद्वचः शत्रुनिबर्हणे रत । स्तथा चकारावितथं बृहस्पतेः । चचार काले विजयाय चारिहा । वशं च शत्रूननयत्पुरंदरः ॥
sa tadvacaḥ śatrunibarhaṇe rata | stathā cakārāvitathaṃ bṛhaspateḥ | cacāra kāle vijayāya cārihā | vaśaṃ ca śatrūnanayatpuraṃdaraḥ
जो शत्रुओं के संहार में रत थे, उन्होंने बृहस्पति के वचन के अनुसार सच्चाई से वैसा ही किया। शत्रुहन्ता पुरन्दर ने विजय के लिए उचित समय पर कार्य किया और शत्रुओं को अपने वश में कर लिया।