शान्ति पर्व · अध्याय 104
कालकवृक्षीय द्वारा पदच्युत कोसल-राजकुमार को सान्त्वना
युधिष्ठिर पूछते हैं कि धन, कोश और सेना खो चुके धर्मात्मा राजा को कैसे रहना चाहिए। भीष्म बताते हैं कि राज्य से वंचित कोसल-राजकुमार क्षेमदर्शी ने मुनि कालकवृक्षीय से उपदेश माँगा। मुनि सिखाते हैं कि सब कुछ अनित्य है, शोक से कुछ नहीं मिलता, धनहीन लोग भी अच्छी तरह जीते हैं और धन स्वयं विपत्ति का कारण बनता है। वे राजकुमार को इन्द्रिय-संयम और सादा जीवन अपनाने को कहते हैं और फिर पूछते हैं कि वह स्वयं क्या श्रेयस्कर मानता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.104.1)
धार्मिकोऽर्थानसंप्राप्य राजामात्यैः प्रबाधितः । च्युतः कोशाच्च दण्डाच्च सुखमिच्छन्कथं चरेत् ॥
dhārmiko'rthānasaṃprāpya rājāmātyaiḥ prabādhitaḥ | cyutaḥ kośācca daṇḍācca sukhamicchankathaṃ caret
धर्मात्मा राजा जो धन नहीं पा सका, जिसे उसके अपने मन्त्रियों ने सताया और जो कोश तथा सेना से भी वंचित हो गया, वह सुख चाहता हुआ किस प्रकार आचरण करे?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.104.2)
अत्रायं क्षेमदर्शीय इतिहासोऽनुगीयते । तत्तेऽह संप्रवक्ष्यामि तन्निबोध युधिष्ठिर ॥
atrāyaṃ kṣemadarśīya itihāso'nugīyate | tatte'ha saṃpravakṣyāmi tannibodha yudhiṣṭhira
इस विषय में क्षेमदर्शी का यह इतिहास गाया जाता है। हे युधिष्ठिर! मैं तुम्हें वह सुनाऊँगा, उसे सुनो।
श्लोक 3 (12.104.3)
क्षेमदर्शी नृपसुतो यत्र क्षीणबलः पुरा । मुनिं कालकवृक्षीयमाजगामेति नः श्रुतम् । तं पप्रच्छानुसंगृह्य कृच्छ्रामापदमास्थितः ॥
kṣemadarśī nṛpasuto yatra kṣīṇabalaḥ purā | muniṃ kālakavṛkṣīyamājagāmeti naḥ śrutam | taṃ papracchānusaṃgṛhya kṛcchrāmāpadamāsthitaḥ
हमने सुना है कि राजकुमार क्षेमदर्शी, जिसका बल पहले क्षीण हो चुका था, मुनि कालकवृक्षीय के पास आया और भारी विपत्ति में पड़ा होने के कारण उनके चरण पकड़कर उनसे पूछा।
राजोवाच
श्लोक 4 (12.104.4)
अर्थेषु भागी पुरुष ईहमानः पुनः पुनः । अलब्ध्वा मद्विधो राज्यं ब्रह्मन्किं कर्तुमर्हति ॥
artheṣu bhāgī puruṣa īhamānaḥ punaḥ punaḥ | alabdhvā madvidho rājyaṃ brahmankiṃ kartumarhati
हे ब्रह्मन्! धन में भाग पाने का अधिकारी मुझ जैसा पुरुष बार-बार प्रयत्न करके भी जब राज्य नहीं पा सका, तब वह क्या करे?
श्लोक 5 (12.104.5)
अन्यत्र मरणाद्दैन्यादन्यत्र परसंश्रयात् । क्षुद्रादन्यत्र चाचारात्तन्ममाचक्ष्व सत्तम ॥
anyatra maraṇāddainyādanyatra parasaṃśrayāt | kṣudrādanyatra cācārāttanmamācakṣva sattama
हे सत्तम! मृत्यु, दीनता, दूसरों के आश्रय और नीच आचरण के सिवा जो उपाय हो, वह मुझे बताइए।
श्लोक 6 (12.104.6)
व्याधिना चाभिपन्नस्य मानसेनेतरेण वा । बहुश्रुतः कृतप्रज्ञस्त्वद्विधः शरणं भवेत् ॥
vyādhinā cābhipannasya mānasenetareṇa vā | bahuśrutaḥ kṛtaprajñastvadvidhaḥ śaraṇaṃ bhavet
जो मन की या दूसरी (शरीर की) व्याधि से ग्रस्त हो, उसके लिए आप जैसा बहुश्रुत और प्रज्ञावान पुरुष शरण बन सकता है।
श्लोक 7 (12.104.7)
निर्विद्य हि नरः कामान्नियम्य सुखमेधते । त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लब्ध्वा बुद्धिमयं वसु ॥
nirvidya hi naraḥ kāmānniyamya sukhamedhate | tyaktvā prītiṃ ca śokaṃ ca labdhvā buddhimayaṃ vasu
जो मनुष्य कामनाओं से विरक्त होकर संयम रखता है, वह प्रीति और शोक को छोड़कर बुद्धिरूप धन को पा लेने पर सुख से बढ़ता है।
श्लोक 8 (12.104.8)
सुखमर्थाश्रयं येषामनुशोचामि तानहम् । मम ह्यर्थाः सुबहवो नष्टाः स्वप्नगता इव ॥
sukhamarthāśrayaṃ yeṣāmanuśocāmi tānaham | mama hyarthāḥ subahavo naṣṭāḥ svapnagatā iva
जिनका सुख धन पर टिका है, उनके लिए मैं शोक करता हूँ; क्योंकि मेरे बहुत-से धन स्वप्न में मिली वस्तुओं की तरह नष्ट हो गए।
श्लोक 9 (12.104.9)
दुष्करं बत कुर्वन्ति महतोऽर्थांस्त्यजन्ति ये । वयं त्वेतान्परित्यक्तुमसतोऽपि न शक्नुमः ॥
duṣkaraṃ bata kurvanti mahato'rthāṃstyajanti ye | vayaṃ tvetānparityaktumasato'pi na śaknumaḥ
जो बड़े-बड़े धनों को छोड़ देते हैं, वे सचमुच कठिन काम करते हैं; हम तो इन तुच्छ वस्तुओं को भी छोड़ नहीं पाते।
श्लोक 10 (12.104.10)
इमामवस्थां संप्राप्तं दीनमार्तं श्रिया च्युतम् । यदन्यत्सुखमस्तीह तद्ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ॥
imāmavasthāṃ saṃprāptaṃ dīnamārtaṃ śriyā cyutam | yadanyatsukhamastīha tadbrahmannanuśādhi mām
हे ब्रह्मन्! इस अवस्था में पहुँचे हुए, दीन, पीड़ित और श्री से गिरे हुए मुझे जो कोई दूसरा सुख इस संसार में है, उसका उपदेश दीजिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 11 (12.104.11)
कौसल्येनैवमुक्तस्तु राजपुत्रेण धीमता । मुनिः कालकवृक्षीयः प्रत्युवाच महाद्युतिः ॥
kausalyenaivamuktastu rājaputreṇa dhīmatā | muniḥ kālakavṛkṣīyaḥ pratyuvāca mahādyutiḥ
बुद्धिमान कोसल-राजकुमार के इस प्रकार कहने पर महातेजस्वी मुनि कालकवृक्षीय ने उत्तर दिया।
मुनिरुवाच
श्लोक 12 (12.104.12)
पुरस्तादेव ते बुद्धिरियं कार्या विजानतः । अनित्यं सर्वमेवैतदहं च मम चास्ति यत् ॥
purastādeva te buddhiriyaṃ kāryā vijānataḥ | anityaṃ sarvamevaitadahaṃ ca mama cāsti yat
आप जानने वाले को पहले से ही यह निश्चय कर लेना चाहिए था कि यह सब अनित्य है, मैं और जो कुछ मेरा है, वह भी।
श्लोक 13 (12.104.13)
यत्किंचिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत् । एवं न व्यथते प्राज्ञः कृच्छ्रामप्यापदं गतः ॥
yatkiṃcinmanyase'stīti sarvaṃ nāstīti viddhi tat | evaṃ na vyathate prājñaḥ kṛcchrāmapyāpadaṃ gataḥ
जिस किसी को तुम 'है' मानते हो, उस सबको 'नहीं है' जानो। इस प्रकार प्राज्ञ पुरुष भारी विपत्ति में पड़कर भी व्यथित नहीं होता।
श्लोक 14 (12.104.14)
यद्धि भूतं भविष्यच्च ध्रुवं तन्न भविष्यति । एवं विदितवेद्यस्त्वमनर्थेभ्यः प्रमोक्ष्यसे ॥
yaddhi bhūtaṃ bhaviṣyacca dhruvaṃ tanna bhaviṣyati | evaṃ viditavedyastvamanarthebhyaḥ pramokṣyase
जो बीत चुका और जो होने वाला है, वह निश्चय ही स्थिर नहीं रहेगा। इस प्रकार जानने योग्य को जान लेने पर तुम अनर्थों से छूट जाओगे।
श्लोक 15 (12.104.15)
ये च पूर्वसमारम्भा ये च पूर्वतरे परे । सर्वं नास्तीति ते चैव तज्ज्ञात्वा को नु संज्वरेत् ॥
ye ca pūrvasamārambhā ye ca pūrvatare pare | sarvaṃ nāstīti te caiva tajjñātvā ko nu saṃjvaret
जो पहले के आरम्भ थे, जो उससे भी पहले के थे और जो दूसरों के थे, वह सब अब नहीं है, और वे भी नहीं हैं; यह जानकर कौन शोक में जलेगा?
श्लोक 16 (12.104.16)
भूत्वा च न भवत्येतदभूत्वा च भविष्यति । शोके न ह्यस्ति सामर्थ्यं शोचेत स कथं नरः ॥
bhūtvā ca na bhavatyetadabhūtvā ca bhaviṣyati | śoke na hyasti sāmarthyaṃ śoceta sa kathaṃ naraḥ
यह होकर नहीं रहता और न होकर फिर हो जाएगा। शोक में कोई सामर्थ्य नहीं है, फिर मनुष्य शोक क्यों करे?
श्लोक 17 (12.104.17)
क्वनु तेऽद्य पिता राजन्क्वनु तेऽद्य पितामहः । न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽपि वा ॥
kvanu te'dya pitā rājankvanu te'dya pitāmahaḥ | na tvaṃ paśyasi tānadya na tvāṃ paśyanti te'pi vā
हे राजन्! आज तुम्हारे पिता कहाँ हैं? तुम्हारे पितामह कहाँ हैं? तुम उन्हें आज देख नहीं पाते और वे भी तुम्हें नहीं देखते।
श्लोक 18 (12.104.18)
आत्मनोऽध्रुवतां पश्यंस्तांस्त्वं किमनुशोचसि । बुद्ध्या चैवानुबुद्ध्यस्व ध्रुवं हि न च विद्यते ॥
ātmano'dhruvatāṃ paśyaṃstāṃstvaṃ kimanuśocasi | buddhyā caivānubuddhyasva dhruvaṃ hi na ca vidyate
अपनी भी अनित्यता को देखते हुए तुम उनके लिए क्यों शोक करते हो? बुद्धि से समझो कि कुछ भी स्थिर नहीं है।
श्लोक 19 (12.104.19)
अहं च त्वं च नृपते सुहृदः शत्रवश्च ते । अवश्यं न भविष्यामः सर्वं च न भविष्यति ॥
ahaṃ ca tvaṃ ca nṛpate suhṛdaḥ śatravaśca te | avaśyaṃ na bhaviṣyāmaḥ sarvaṃ ca na bhaviṣyati
हे राजन्! मैं, तुम, तुम्हारे मित्र और तुम्हारे शत्रु, हम सब अवश्य नहीं रहेंगे और सब कुछ नहीं रहेगा।
श्लोक 20 (12.104.20)
ये तु विंशतिवर्षा वै त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः । अर्वागेव हि ते सर्वे मरिष्यन्ति शरच्छतात् ॥
ye tu viṃśativarṣā vai triṃśadvarṣāśca mānavāḥ | arvāgeva hi te sarve mariṣyanti śaracchatāt
जो मनुष्य बीस या तीस वर्ष के हैं, वे सब सौ शरद् ऋतुओं (वर्षों) से पहले ही मर जाएँगे।
श्लोक 21 (12.104.21)
अपि चेन्महतो वित्तान्न प्रमुच्यते पूरुषः । नैतन्ममेति तन्मत्वा कुर्वीत प्रियमात्मनः ॥
api cenmahato vittānna pramucyate pūruṣaḥ | naitanmameti tanmatvā kurvīta priyamātmanaḥ
यदि मनुष्य बड़े धन से छूट न सके, तो भी 'यह मेरा नहीं है' ऐसा मानकर अपने लिए जो हितकर हो वही करे।
श्लोक 22 (12.104.22)
अनागतं यन्न ममेति विद्या । दतिक्रान्तं यन्न ममेति विद्यात् । दिष्टं बलीय इति मन्यमाना । स्ते पण्डितास्तत्सतां वृत्तिमाहुः ॥
anāgataṃ yanna mameti vidyā | datikrāntaṃ yanna mameti vidyāt | diṣṭaṃ balīya iti manyamānā | ste paṇḍitāstatsatāṃ vṛttimāhuḥ
जो भविष्य को 'मेरा नहीं' और बीते हुए को 'मेरा नहीं' जानें और दैव को बलवान मानें, उन पण्डितों के उस आचरण को ही सज्जनों की वृत्ति कहते हैं।
श्लोक 23 (12.104.23)
अनाढ्याश्चापि जीवन्ति राज्यं चाप्यनुशासते । बुद्धिपौरुषसंपन्नास्त्वया तुल्याधिका जनाः ॥
anāḍhyāścāpi jīvanti rājyaṃ cāpyanuśāsate | buddhipauruṣasaṃpannāstvayā tulyādhikā janāḥ
धनहीन लोग भी जीते हैं और राज्य का शासन भी करते हैं; बुद्धि और पौरुष से सम्पन्न वे लोग तुम्हारे बराबर या तुमसे बढ़कर होते हैं।
श्लोक 24 (12.104.24)
न च त्वमिव शोचन्ति तस्मात्त्वमपि मा शुचः । किं न त्वं तैर्नरैः श्रेयांस्तुल्यो वा बुद्धिपौरुषैः ॥
na ca tvamiva śocanti tasmāttvamapi mā śucaḥ | kiṃ na tvaṃ tairnaraiḥ śreyāṃstulyo vā buddhipauruṣaiḥ
वे तुम्हारी तरह शोक नहीं करते, इसलिए तुम भी शोक मत करो। क्या तुम बुद्धि और पौरुष में उन लोगों से श्रेष्ठ या उनके समान नहीं हो?
राजोवाच
श्लोक 25 (12.104.25)
यादृच्छिकं सर्वमासीत्तद्राज्यमिति चिन्तये । ह्रियते सर्वमेवेदं कालेन महता द्विज ॥
yādṛcchikaṃ sarvamāsīttadrājyamiti cintaye | hriyate sarvamevedaṃ kālena mahatā dvija
मैं सोचता हूँ कि वह सारा राज्य मुझे संयोग से मिला था। हे द्विज! यह सब कुछ महान् काल के द्वारा हर लिया जाता है।
श्लोक 26 (12.104.26)
तस्यैव ह्रियमाणस्य स्रोतसेव तपोधन । फलमेतत्प्रपश्यामि यथालब्धेन वर्तयन् ॥
tasyaiva hriyamāṇasya srotaseva tapodhana | phalametatprapaśyāmi yathālabdhena vartayan
हे तपोधन! धारा के समान बहा ले जाए गए उस राज्य का यही फल मैं देखता हूँ कि जो कुछ मिल जाए उसी से मैं जीवन चला रहा हूँ।
मुनिरुवाच
श्लोक 27 (12.104.27)
अनागतमतीतं च याथातथ्यविनिश्चयात् । नानुशोचेत कौसल्य सर्वार्थेषु तथा भव ॥
anāgatamatītaṃ ca yāthātathyaviniścayāt | nānuśoceta kausalya sarvārtheṣu tathā bhava
हे कौसल्य! भविष्य और अतीत को यथार्थ रूप से निश्चय करके मनुष्य को शोक नहीं करना चाहिए; सब बातों में ऐसे ही बनो।
श्लोक 28 (12.104.28)
अवाप्यान्कामयन्नर्थान्नानवाप्यान्कदाचन । प्रत्युत्पन्नाननुभवन्मा शुचस्त्वमनागतान् ॥
avāpyānkāmayannarthānnānavāpyānkadācana | pratyutpannānanubhavanmā śucastvamanāgatān
जो पाया जा सकता है उसी की कामना करो, जो नहीं पाया जा सकता उसकी कभी नहीं; जो सामने मिला है उसका उपभोग करते हुए अनागत के लिए शोक मत करो।
श्लोक 29 (12.104.29)
यथालब्धोपपन्नार्थैस्तथा कौसल्य रंस्यसे । कच्चिच्छुद्धस्वभावेन श्रिया हीनो न शोचसि ॥
yathālabdhopapannārthaistathā kausalya raṃsyase | kaccicchuddhasvabhāvena śriyā hīno na śocasi
हे कौसल्य! जो कुछ मिले उन्हीं वस्तुओं से तुम आनन्द पाओगे। परन्तु बताओ, श्री से हीन होकर भी क्या तुम शुद्ध स्वभाव के कारण शोक नहीं करते?
श्लोक 30 (12.104.30)
पुरस्ताद्भूतपूर्वत्वाद्धीनभोग्यो हि दुर्मतिः । धातारं गर्हते नित्यं लब्धार्थश्च न मृष्यते ॥
purastādbhūtapūrvatvāddhīnabhogyo hi durmatiḥ | dhātāraṃ garhate nityaṃ labdhārthaśca na mṛṣyate
जो दुर्बुद्धि पहले सम्पन्न रहा था और अब भोग से हीन हो गया है, वह विधाता की सदा निन्दा करता है और धन पाए हुए लोगों को सह नहीं पाता।
श्लोक 31 (12.104.31)
अनर्हानपि चैवान्यान्मन्यते श्रीमतो जनान् । एतस्मात्कारणादेतद्दुःखं भूयोऽनुवर्तते ॥
anarhānapi caivānyānmanyate śrīmato janān | etasmātkāraṇādetadduḥkhaṃ bhūyo'nuvartate
वह अयोग्य लोगों को भी श्रीमान् समझता है। इसी कारण यह दुःख उसके पास बार-बार लौट आता है।
श्लोक 32 (12.104.32)
ईर्ष्याभिमानसंपन्ना राजन्पुरुषमानिनः । कच्चित्त्वं न तथा प्राज्ञ मत्सरी कोसलाधिप ॥
īrṣyābhimānasaṃpannā rājanpuruṣamāninaḥ | kaccittvaṃ na tathā prājña matsarī kosalādhipa
हे राजन्! ईर्ष्या और अभिमान से भरे हुए लोग अपने को बड़ा पुरुष मानते हैं। हे प्राज्ञ कोसलाधिप! आशा है कि तुम वैसे डाह करने वाले नहीं हो।
श्लोक 33 (12.104.33)
सहस्व श्रियमन्येषां यद्यपि त्वयि नास्ति सा । अन्यत्रापि सतीं लक्ष्मीं कुशला भुञ्जते नराः । अभिनिष्यन्दते देही श्रीभूतश्च द्विषज्जनात् ॥
sahasva śriyamanyeṣāṃ yadyapi tvayi nāsti sā | anyatrāpi satīṃ lakṣmīṃ kuśalā bhuñjate narāḥ | abhiniṣyandate dehī śrībhūtaśca dviṣajjanāt
दूसरों की श्री को सहन करो, चाहे तुम्हारे पास वह न हो। कुशल लोग दूसरी जगह स्थित लक्ष्मी का भी उपभोग करते हैं, और श्रीसम्पन्न हुआ देहधारी शत्रु जनों से भी उसे खींच लेता है।
श्लोक 34 (12.104.34)
श्रियं च पुत्रपौत्रं च मनुष्या धर्मचारिणः । त्यागधर्मविदो धीराः स्वयमेव त्यजन्त्युत ॥
śriyaṃ ca putrapautraṃ ca manuṣyā dharmacāriṇaḥ | tyāgadharmavido dhīrāḥ svayameva tyajantyuta
धर्म का आचरण करने वाले, त्याग के धर्म को जानने वाले धीर मनुष्य स्वयं ही श्री, पुत्रों और पौत्रों को छोड़ देते हैं।
श्लोक 35 (12.104.35)
त्यक्तं स्वायंभुवे वंशे शुभेन भरतेन च । नानारत्नसमाकीर्णं राज्यं स्फीतमिति श्रुतम् ॥
tyaktaṃ svāyaṃbhuve vaṃśe śubhena bharatena ca | nānāratnasamākīrṇaṃ rājyaṃ sphītamiti śrutam
सुना जाता है कि स्वायम्भुव के वंश में और कल्याणकारी भरत के द्वारा अनेक रत्नों से भरा हुआ समृद्ध राज्य त्याग दिया गया था।
श्लोक 36 (12.104.36)
तथाऽन्यैर्भूमिपालैश्च त्यक्तं राज्यं महोदयम् । त्यक्त्वा राज्यानि ते सर्वे वने वन्यफलाशिनः । गताश्च तपसः पारं दुःखस्यान्तं च भूमिपाः ॥
tathā'nyairbhūmipālaiśca tyaktaṃ rājyaṃ mahodayam | tyaktvā rājyāni te sarve vane vanyaphalāśinaḥ | gatāśca tapasaḥ pāraṃ duḥkhasyāntaṃ ca bhūmipāḥ
दूसरे राजाओं ने भी अपने महान् अभ्युदय वाले राज्य छोड़ दिए। राज्यों को छोड़कर वे सब वन में जंगली फल खाते हुए रहे और वे राजा तपस्या के पार और दुःख के अन्त को पहुँच गए।
श्लोक 37 (12.104.37)
बहुसंकुसुकं दृष्ट्वा विधित्सासाधनेन च । तथान्ये संत्यजन्त्येव मत्वा परमदुर्लभम् ॥
bahusaṃkusukaṃ dṛṣṭvā vidhitsāsādhanena ca | tathānye saṃtyajantyeva matvā paramadurlabham
कर्म करने की अनन्त इच्छा और उसके साधनों के कारण उसे अत्यन्त अस्थिर देखकर तथा परम पद को अत्यन्त दुर्लभ मानकर दूसरे लोग भी उसे छोड़ देते हैं।
श्लोक 38 (12.104.38)
त्वं पुनः प्राज्ञरूपः सन्कृपणं परितप्यसे । अकाम्यान्कामयानोऽर्थान्पराधीनानुपद्रवान् ॥
tvaṃ punaḥ prājñarūpaḥ sankṛpaṇaṃ paritapyase | akāmyānkāmayāno'rthānparādhīnānupadravān
पर तुम बुद्धिमान दिखते हुए भी दीन की तरह सन्ताप करते हो, क्योंकि जो चाहने योग्य नहीं, जो दूसरों के अधीन हैं और उपद्रवों से भरे हैं, उन वस्तुओं को चाहते हो।
श्लोक 39 (12.104.39)
तां बुद्धिमनुविज्ञाय त्वमेवैनान्परित्यज । अनर्थाश्चार्थरूपेण ह्यर्थाश्चानर्थरूपिणः ॥
tāṃ buddhimanuvijñāya tvamevainānparityaja | anarthāścārtharūpeṇa hyarthāścānartharūpiṇaḥ
उस बुद्धि को समझकर तुम स्वयं ही इन्हें छोड़ दो; अनर्थ धन के रूप में आते हैं और धन अनर्थ के रूप में।
श्लोक 40 (12.104.40)
अर्थायैव हि केषांचिद्धननाशा भवन्त्युत । अनित्यं तत्सुखं मत्वा श्रियमन्ये न लिप्सते ॥
arthāyaiva hi keṣāṃciddhananāśā bhavantyuta | anityaṃ tatsukhaṃ matvā śriyamanye na lipsate
कुछ लोगों का धन-नाश धन के लिए ही होता है। उस सुख को अनित्य मानकर दूसरा श्री की चाह नहीं करता।
श्लोक 41 (12.104.41)
रममाणः श्रिया कश्चिन्नान्यच्छ्रेयोऽभिमन्यते । तथा तस्येहमानस्य संरम्भोऽपि विनश्यति ॥
ramamāṇaḥ śriyā kaścinnānyacchreyo'bhimanyate | tathā tasyehamānasya saṃrambho'pi vinaśyati
श्री में रमता हुआ कोई पुरुष और किसी को श्रेयस्कर नहीं मानता; इसी प्रकार चेष्टा करते हुए उसका उद्यम भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 42 (12.104.42)
कृच्छ्राल्लब्धमभिप्रेतं यथा कौसल्य नश्यति । तदा निर्विद्यते सोऽर्थात्परिभग्नक्रमो नरः ॥
kṛcchrāllabdhamabhipretaṃ yathā kausalya naśyati | tadā nirvidyate so'rthātparibhagnakramo naraḥ
हे कौसल्य! जब कठिनाई से पाई हुई अभीष्ट वस्तु नष्ट हो जाती है, तब जिसका क्रम टूट चुका है वह मनुष्य धन से विरक्त हो जाता है।
श्लोक 43 (12.104.43)
अनित्यां तां श्रियं मत्वा श्रियं वा कः परीप्सति ॥
anityāṃ tāṃ śriyaṃ matvā śriyaṃ vā kaḥ parīpsati
उस श्री को अनित्य मानकर भला श्री को कौन चाहेगा?
श्लोक 44 (12.104.44)
धर्ममेकेऽभिपद्यन्ते कल्याणाभिजना नराः । परत्र सुखमिच्छन्तो निर्विद्येयुश्च लौकिकात् ॥
dharmameke'bhipadyante kalyāṇābhijanā narāḥ | paratra sukhamicchanto nirvidyeyuśca laukikāt
कुलीन मनुष्यों में कुछ लोग धर्म का आश्रय लेते हैं; परलोक में सुख चाहते हुए वे लौकिक पदार्थों से विरक्त हो जाते हैं।
श्लोक 45 (12.104.45)
जीवितं संत्यजन्त्येके धनलोभपरा नराः । न जीवितार्थं मन्यन्ते पुरुषा हि धनादृते ॥
jīvitaṃ saṃtyajantyeke dhanalobhaparā narāḥ | na jīvitārthaṃ manyante puruṣā hi dhanādṛte
कुछ लोग धन के लोभ में लगे हुए अपने जीवन तक को त्याग देते हैं; वे मानते हैं कि धन के बिना मनुष्यों के लिए जीवन का कोई प्रयोजन नहीं।
श्लोक 46 (12.104.46)
पश्य चैषां कृपणतां पश्य चैषामबुद्धिताम् । अध्रुवे जीविते मोहादर्थतृष्णामुपाश्रिताः ॥
paśya caiṣāṃ kṛpaṇatāṃ paśya caiṣāmabuddhitām | adhruve jīvite mohādarthatṛṣṇāmupāśritāḥ
इनकी दीनता देखो और इनकी नासमझी देखो; इस अस्थिर जीवन में वे मोह से धन की तृष्णा का आश्रय लिए हुए हैं।
श्लोक 47 (12.104.47)
संचये च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते । संयोगे च वियोगान्ते कोनु विप्रणयेन्मनः ॥
saṃcaye ca vināśānte maraṇānte ca jīvite | saṃyoge ca viyogānte konu vipraṇayenmanaḥ
संचय का अन्त विनाश है, जीवन का अन्त मरण है और संयोग का अन्त वियोग है; तब कौन इनमें अपना मन लगाएगा?
श्लोक 48 (12.104.48)
धनं वा पुरुषो राजन्पुरुषं वा पुनर्धनम् । अवश्यं प्रजहात्येव तद्विद्वान्कोनु संज्वरेत् ॥
dhanaṃ vā puruṣo rājanpuruṣaṃ vā punardhanam | avaśyaṃ prajahātyeva tadvidvānkonu saṃjvaret
हे राजन्! धन पुरुष को छोड़ देता है, या पुरुष धन को छोड़ देता है, यह अवश्य होता है; यह जानकर कौन विद्वान् सन्ताप करेगा?
श्लोक 49 (12.104.49)
अन्यत्रोपनता ह्यापत्पुरुषं तोषयत्युत । तेन शान्तिं न लभते नाहमेवेति कारणात् ॥
anyatropanatā hyāpatpuruṣaṃ toṣayatyuta | tena śāntiṃ na labhate nāhameveti kāraṇāt
दूसरी जगह पड़ी हुई विपत्ति मनुष्य को सन्तोष देती है; पर 'केवल मैं ही नहीं हूँ' इस कारण से वह उससे शान्ति नहीं पाता।
श्लोक 50 (12.104.50)
अन्येषामपि नश्यन्ति सुहृदश्च धनानि च । पश्य बुद्ध्या मनुष्याणां तुल्यामापदमात्मनः । नियच्छ यच्छ संयच्छ इन्द्रियाणि मनस्तथा ॥
anyeṣāmapi naśyanti suhṛdaśca dhanāni ca | paśya buddhyā manuṣyāṇāṃ tulyāmāpadamātmanaḥ | niyaccha yaccha saṃyaccha indriyāṇi manastathā
दूसरों के भी मित्र और धन नष्ट होते हैं। बुद्धि से देखो कि दूसरे मनुष्यों की और तुम्हारी विपत्ति समान है। इन्द्रियों को और वैसे ही मन को रोको, वश में करो और संयम में रखो।
श्लोक 51 (12.104.51)
प्रतिषेद्धा न चाप्येषु दुर्बलेष्वहितेषु च ॥
pratiṣeddhā na cāpyeṣu durbaleṣvahiteṣu ca
इन दुर्बल और अहितकर विषयों में तुम अपने को रोकने वाले बनो।
श्लोक 52 (12.104.52)
प्राप्तिसृष्टेषु भावेषु व्यपकृष्टेष्वसंभवे । प्रज्ञानतृप्तो विक्रान्तस्त्वद्विधो नानुशोचति ॥
prāptisṛṣṭeṣu bhāveṣu vyapakṛṣṭeṣvasaṃbhave | prajñānatṛpto vikrāntastvadvidho nānuśocati
जब अवस्थाएँ प्राप्ति से दी गई हों और छीन ली गई हों तथा उनके फिर मिलने की सम्भावना न हो, तब ज्ञान से तृप्त और पराक्रमी तुम जैसा पुरुष शोक नहीं करता।
श्लोक 53 (12.104.53)
अल्पमिच्छन्नचपलो मृदुर्दान्तः सुसंस्थितः । ब्रह्मचर्योपपन्नश्च त्वद्विधो नैव मुह्यति ॥
alpamicchannacapalo mṛdurdāntaḥ susaṃsthitaḥ | brahmacaryopapannaśca tvadvidho naiva muhyati
थोड़े की इच्छा रखने वाला, चंचलता से रहित, कोमल, संयमी, भली-भाँति स्थित और ब्रह्मचर्य से युक्त तुम जैसा पुरुष कभी मोहित नहीं होता।
श्लोक 54 (12.104.54)
न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि । नृशंसवृत्तिं पापिष्ठां दुःखां कापुरुषोचिताम् ॥
na tveva jālmīṃ kāpālīṃ vṛttimeṣitumarhasi | nṛśaṃsavṛttiṃ pāpiṣṭhāṃ duḥkhāṃ kāpuruṣocitām
तुम्हें दीन, भिक्षुक की-सी वृत्ति कभी नहीं खोजनी चाहिए, जो क्रूर, अत्यन्त पापमय, दुःखद और नीच पुरुषों के योग्य है।
श्लोक 55 (12.104.55)
अपि मूलफलाहारो रमस्वैको महावने । वाग्यतः संगृहीतात्मा सर्वभूतदयान्वितः ॥
api mūlaphalāhāro ramasvaiko mahāvane | vāgyataḥ saṃgṛhītātmā sarvabhūtadayānvitaḥ
इससे अच्छा तो कन्द-मूल और फल खाकर, मौन रहकर, मन को वश में करके और सब प्राणियों पर दया रखकर महावन में अकेले रमण करो।
श्लोक 56 (12.104.56)
सदृशं पण्डितस्यैतदीषादन्तेन हस्तिना । यदेको रमतेऽरण्ये यच्चाप्यल्पेन तुष्यति ॥
sadṛśaṃ paṇḍitasyaitadīṣādantena hastinā | yadeko ramate'raṇye yaccāpyalpena tuṣyati
यह पण्डित के योग्य है, जैसे लम्बे दाँतों वाले हाथी के लिए वन: कि वह वन में अकेला रमता है और थोड़े से सन्तुष्ट रहता है।
श्लोक 57 (12.104.57)
महाह्रदः संक्षुभित आत्मनैव प्रसीदति । एवं नरः स्वात्मनैव कृतप्रज्ञः प्रसीदति ॥
mahāhradaḥ saṃkṣubhita ātmanaiva prasīdati | evaṃ naraḥ svātmanaiva kṛtaprajñaḥ prasīdati
बड़ा सरोवर क्षुब्ध होकर अपने आप ही फिर निर्मल हो जाता है। वैसे ही स्थिर प्रज्ञा वाला मनुष्य अपने ही द्वारा प्रसन्न हो जाता है।
श्लोक 58 (12.104.58)
एतदेवं गतस्याहं सुखं पश्यामि केवलम् । असंभवे श्रियो राजन्हीनस्य सचिवादिभिः । दैवे प्रतिनिविष्टे च किं श्रेयो मन्यते भवान् ॥
etadevaṃ gatasyāhaṃ sukhaṃ paśyāmi kevalam | asaṃbhave śriyo rājanhīnasya sacivādibhiḥ | daive pratiniviṣṭe ca kiṃ śreyo manyate bhavān
ऐसी स्थिति में पहुँचे हुए पुरुष के लिए मैं केवल सुख ही देखता हूँ। परन्तु हे राजन्! जब श्री पाना असम्भव है, तुम मन्त्री आदि से हीन हो और दैव अड़ गया है, तब तुम स्वयं क्या श्रेयस्कर मानते हो?