शान्ति पर्व · अध्याय 105
राज्य पाने के लिए कालकवृक्षीय की नीति
मुनि कालकवृक्षीय क्षेमदर्शी को राज्य पुनः पाने की नीति बताते हैं: अभिमान और क्रोध छोड़ना, शत्रु राजा की विनम्रता से सेवा करना, दूसरों का विश्वास जीतना और सहायक जुटाना। फिर वे बताते हैं कि विलास, महँगी योजनाओं, चापलूस पुरोहितों और दैव की चर्चा तथा चतुर उपायों से शत्रु राजा को भीतर से कैसे नष्ट किया जा सकता है। मुनि चेताते हैं कि ऐसे उपाय दृढ़ पुरुष ही कर सकता है, दुर्बल नहीं।
मुनिरुवाच
श्लोक 1 (12.105.1)
अथ चेत्पौरुषं किंचित्क्षत्रियात्मनि पश्यसि । ब्रवीम्यहं तु ते नीतिं राज्यस्य प्रतिपत्तये ॥
atha cetpauruṣaṃ kiṃcitkṣatriyātmani paśyasi | bravīmyahaṃ tu te nītiṃ rājyasya pratipattaye
यदि तुम अपने क्षत्रिय स्वभाव में कुछ पौरुष देखते हो, तो मैं राज्य की प्राप्ति के लिए तुम्हें नीति बताता हूँ।
श्लोक 2 (12.105.2)
तां चेच्छक्ष्यस्यनुष्ठातुं कर्म चैव करिष्यसि । शृणु सर्वमशेषेण यत्ते वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥
tāṃ cecchakṣyasyanuṣṭhātuṃ karma caiva kariṣyasi | śṛṇu sarvamaśeṣeṇa yatte vakṣyāmi tattvataḥ
यदि तुम उसका पालन कर सकोगे और कार्य करोगे, तो जो मैं तुम्हें यथार्थ रूप से बताऊँगा, वह सब पूरा-पूरा सुनो।
श्लोक 3 (12.105.3)
आचरिष्यसि चेत्कर्म महतोऽर्थानवाप्स्यसि । राज्यं वा राज्यमन्त्रं वा महतीं वा पुनः श्रियम् । यद्येतद्रोचते राजन्पुनर्ब्रूहि ब्रवीमि ते ॥
ācariṣyasi cetkarma mahato'rthānavāpsyasi | rājyaṃ vā rājyamantraṃ vā mahatīṃ vā punaḥ śriyam | yadyetadrocate rājanpunarbrūhi bravīmi te
यदि तुम इस पर आचरण करोगे, तो बड़ा धन पाओगे: राज्य, या राज्य की मन्त्रणा में स्थान, या फिर महान् श्री। हे राजन्! यदि यह तुम्हें रुचता है, तो फिर पूछो, मैं तुम्हें बताऊँगा।
राजोवाच
श्लोक 4 (12.105.4)
ब्रवीतु भगवान्नीतिमभिपन्नोऽस्म्यधीहि भो । अमोघ एव मेऽद्यास्तु त्वया सह समागमः ॥
bravītu bhagavānnītimabhipanno'smyadhīhi bho | amogha eva me'dyāstu tvayā saha samāgamaḥ
भगवन्! आप नीति बताइए, मैं उसके लिए तत्पर हूँ। हे भो! मुझे सिखाइए। आज आपके साथ मेरी भेंट निष्फल न हो।
मुनिरुवाच
श्लोक 5 (12.105.5)
हित्वा मानं च दम्भं च क्रोधं हर्षं भयं तथा । प्रत्यमित्राणि सेवस्व प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । तमुत्तमेन शौचेन कर्मणा चावधारय ॥
hitvā mānaṃ ca dambhaṃ ca krodhaṃ harṣaṃ bhayaṃ tathā | pratyamitrāṇi sevasva praṇipatya kṛtāñjaliḥ | tamuttamena śaucena karmaṇā cāvadhāraya
मान, दम्भ, क्रोध, हर्ष और भय को छोड़कर, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए शत्रु की सेवा करो, और उत्तम सच्चाई तथा कर्म से उसे विश्वास दिलाओ।
श्लोक 6 (12.105.6)
दातुमर्हति ते वित्तं वैदेहः सत्यविक्रमः । प्रमाणं सर्वभूतेषु प्रग्रहं च गमिष्यसि ॥
dātumarhati te vittaṃ vaidehaḥ satyavikramaḥ | pramāṇaṃ sarvabhūteṣu pragrahaṃ ca gamiṣyasi
सत्य-पराक्रमी वैदेह राजा तुम्हें धन देने योग्य है; तुम सब प्राणियों में विश्वास और आदर पाओगे।
श्लोक 7 (12.105.7)
ततः सहायान्सोत्साहाँल्लप्स्यसेऽव्यसनाञ्शुचीन् । वर्तमानः स्वशास्त्रे वै संयतात्मा जितेन्द्रियः । अभ्युद्धरति चात्मानं प्रसादयति च प्रजाः ॥
tataḥ sahāyānsotsāhām̐llapsyase'vyasanāñśucīn | vartamānaḥ svaśāstre vai saṃyatātmā jitendriyaḥ | abhyuddharati cātmānaṃ prasādayati ca prajāḥ
तब तुम्हें उत्साही, व्यसनों से रहित और पवित्र सहायक मिलेंगे; क्योंकि जो अपने नीतिशास्त्र के अनुसार चलता है, संयमी और जितेन्द्रिय है, वह अपना उद्धार करता है और प्रजा को प्रसन्न करता है।
श्लोक 8 (12.105.8)
तेनैव त्वं धृतिमता श्रीमता चापि सत्कृतः । प्रमाणं सर्वभूतेषु गत्वा च ग्रहणं महत् ॥
tenaiva tvaṃ dhṛtimatā śrīmatā cāpi satkṛtaḥ | pramāṇaṃ sarvabhūteṣu gatvā ca grahaṇaṃ mahat
उसी धैर्यवान और श्रीसम्पन्न आचरण से सम्मानित होकर तुम सब प्राणियों में विश्वास और महान् आदर पाओगे।
श्लोक 9 (12.105.9)
ततः सुहृद्बलं लब्ध्वा मन्त्रयित्वा सुमन्त्रितम् । सान्त्वेन भेदयित्वाऽरीन्बिल्वं बिल्वेन शातय । परैर्वा संविदं कृत्वा बलमप्यस्य घातय ॥
tataḥ suhṛdbalaṃ labdhvā mantrayitvā sumantritam | sāntvena bhedayitvā'rīnbilvaṃ bilvena śātaya | parairvā saṃvidaṃ kṛtvā balamapyasya ghātaya
तब मित्रों का बल पाकर और भली-भाँति मन्त्रणा करके, साम से शत्रुओं में फूट डालो और एक बिल्व को दूसरे बिल्व से तोड़ो; अथवा दूसरों से सन्धि करके उसकी सेना को भी नष्ट कर दो।
श्लोक 10 (12.105.10)
अलभ्या ये शुभा भावाः स्त्रियश्चाच्छादनानि च । शय्यासनानि यानानि महार्हाणि गृहाणि च ॥
alabhyā ye śubhā bhāvāḥ striyaścācchādanāni ca | śayyāsanāni yānāni mahārhāṇi gṛhāṇi ca
जो उत्तम वस्तुएँ दुर्लभ हैं, स्त्रियाँ, वस्त्र, शय्याएँ, आसन, सवारियाँ और बहुमूल्य घर,
श्लोक 11 (12.105.11)
पक्षिणो मृगजातानि रसगन्धाः फलानि च । तेष्वेव सज्जयेथास्त्वं यथा नश्येत्स्वयं परः ॥
pakṣiṇo mṛgajātāni rasagandhāḥ phalāni ca | teṣveva sajjayethāstvaṃ yathā naśyetsvayaṃ paraḥ
पक्षी, मृग आदि जीव, रस, गन्ध और फल, उन्हीं में तुम उसे लगाओ, ताकि शत्रु स्वयं ही नष्ट हो जाए।
श्लोक 12 (12.105.12)
यद्येवं प्रतिषेद्धव्यो यद्युपेक्षणमर्हति । सदैव राजशार्दूल विदुषा हितमिच्छता । न जातु विवृतः कार्यः शत्रुः सुनयमिच्छता ॥
yadyevaṃ pratiṣeddhavyo yadyupekṣaṇamarhati | sadaiva rājaśārdūla viduṣā hitamicchatā | na jātu vivṛtaḥ kāryaḥ śatruḥ sunayamicchatā
यदि उसका प्रतिरोध करना हो, या वह उपेक्षा के योग्य हो, तो हे राजशार्दूल! अपना हित चाहने वाले विद्वान् को सदा, और सुनीति चाहने वाले को, शत्रु को कभी सावधान नहीं कर देना चाहिए।
श्लोक 13 (12.105.13)
वसस्व परमामित्रं विषये मित्रसंमतः । भजस्व श्वेतकाकीयैर्मित्रधर्ममनर्थकैः ॥
vasasva paramāmitraṃ viṣaye mitrasaṃmataḥ | bhajasva śvetakākīyairmitradharmamanarthakaiḥ
परम शत्रु के देश में मित्र के रूप में आदृत होकर रहो, और कुत्ते, मृग और कौए के-से व्यवहारों से, जो निरर्थक हैं, मित्र के धर्म का निर्वाह करो।
श्लोक 14 (12.105.14)
आरम्भांश्चास्य महतो दुष्करान्संप्रयोजय । नदीबन्धविभेदांश्च बलवद्भिर्विरुध्यताम् ॥
ārambhāṃścāsya mahato duṣkarānsaṃprayojaya | nadībandhavibhedāṃśca balavadbhirvirudhyatām
उसे बड़े और कठिन कार्यों में लगाओ, नदियों के बाँध बाँधने और तोड़ने में लगाओ, और उसे बलवानों से विरोध में डाल दो।
श्लोक 15 (12.105.15)
उद्यानानि महार्हाणि शयनान्यासनानि च । प्रीतिभोगमुखेनैव कोशमस्य विरेचय ॥
udyānāni mahārhāṇi śayanānyāsanāni ca | prītibhogamukhenaiva kośamasya virecaya
बहुमूल्य उद्यानों, शय्याओं और आसनों तथा भोग-सुख के द्वारा उसके कोश को खाली करा दो।
श्लोक 16 (12.105.16)
यज्ञदाने प्रशंसास्मै ब्राह्मणाननुवर्तय । ते त्वा प्रियं करिष्यन्ति तच्छेत्स्यन्ति वृका इव ॥
yajñadāne praśaṃsāsmai brāhmaṇānanuvartaya | te tvā priyaṃ kariṣyanti tacchetsyanti vṛkā iva
उसके सामने यज्ञ और दान की प्रशंसा करो और ब्राह्मणों को उसके पीछे लगाओ; वे तुम्हारा प्रिय करेंगे और भेड़ियों की तरह उसे काट डालेंगे।
श्लोक 17 (12.105.17)
असंशयं पुण्यशीलः प्राप्नोति परमां गतिम् । त्रिविष्टपे पुण्यतमं स्थानं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥
asaṃśayaṃ puṇyaśīlaḥ prāpnoti paramāṃ gatim | triviṣṭape puṇyatamaṃ sthānaṃ prāpnoti śāśvatam
निस्सन्देह पुण्यशील पुरुष परम गति को पाता है; वह स्वर्ग में सबसे अधिक पुण्यमय शाश्वत स्थान पाता है।
श्लोक 18 (12.105.18)
कोशक्षये त्वमित्राणां वशं कौसल्य गच्छति । उभयत्र प्रयुक्तस्य धर्मे चाधर्म एव च ॥
kośakṣaye tvamitrāṇāṃ vaśaṃ kausalya gacchati | ubhayatra prayuktasya dharme cādharma eva ca
हे कौसल्य! कोश के क्षीण होने पर वह शत्रुओं के वश में चला जाता है, जो धर्म और अधर्म दोनों में लगा रहा हो।
श्लोक 19 (12.105.19)
फलार्थमूलमुच्छिद्यात्तेन नन्दन्ति शत्रवः । न चास्मै मानुषं कर्म दैवमस्योपवर्णय ॥
phalārthamūlamucchidyāttena nandanti śatravaḥ | na cāsmai mānuṣaṃ karma daivamasyopavarṇaya
वह फल और अर्थ दोनों की जड़ काट देता है, और इसी से शत्रु प्रसन्न होते हैं। उसके सामने मनुष्य के प्रयत्न की चर्चा न करो; उसे दैव का वर्णन सुनाओ।
श्लोक 20 (12.105.20)
असंशयं दैवपरः क्षिप्रमेव विनश्यति । याजयैनं विश्वजिता सर्वस्वेन वियुज्यताम् ॥
asaṃśayaṃ daivaparaḥ kṣiprameva vinaśyati | yājayainaṃ viśvajitā sarvasvena viyujyatām
निस्सन्देह जो दैव पर निर्भर रहता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उससे विश्वजित् यज्ञ करवाओ, ताकि वह अपने सारे धन से वंचित हो जाए।
श्लोक 21 (12.105.21)
ततो गच्छत्यसिद्धार्थः पीड्यमानो महाजनम् । त्यागधर्मविदं पुण्यं कंचिदस्योपवर्णय ॥
tato gacchatyasiddhārthaḥ pīḍyamāno mahājanam | tyāgadharmavidaṃ puṇyaṃ kaṃcidasyopavarṇaya
तब अपना प्रयोजन सिद्ध न होने पर वह प्रजाजनों को पीड़ित करता हुआ आगे बढ़ेगा। तब उसके सामने त्याग के धर्म को जानने वाले किसी पुण्यात्मा का वर्णन करो।
श्लोक 22 (12.105.22)
अपि त्यागं बुभूषेत कच्चिद्गच्छेदनामयम् । सिद्धेनौषधियोगेन सर्वशत्रुविनाशिना । गजानश्वान्मनुष्यांश्च कृतकैरुपघातय ॥
api tyāgaṃ bubhūṣeta kaccidgacchedanāmayam | siddhenauṣadhiyogena sarvaśatruvināśinā | gajānaśvānmanuṣyāṃśca kṛtakairupaghātaya
तब सम्भव है कि वह त्याग की इच्छा करे और किसी निरोग अवस्था को पहुँच जाए। सिद्ध की हुई, सब शत्रुओं का नाश करने वाली ओषधि के प्रयोग और बनावटी उपायों से उसके हाथी, घोड़े और मनुष्यों को मार डालो।
श्लोक 23 (12.105.23)
एते चान्ये च बहवो दम्भयोगाः सुचिन्तिताः । शक्या विषहता कर्तुं न क्लीबेन नृपात्मज ॥
ete cānye ca bahavo dambhayogāḥ sucintitāḥ | śakyā viṣahatā kartuṃ na klībena nṛpātmaja
ये और दूसरे बहुत-से भली-भाँति सोचे हुए छल-उपाय हे राजकुमार! सहन करने में समर्थ पुरुष ही कर सकता है, कायर नहीं।