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शान्ति पर्व · अध्याय 106

कौसल्य और विदेहराज की सन्धि

कौसल्य मुनि से कहता है कि वह छल या पाखण्ड से जीवन नहीं बिताएगा; मुनि उसके चरित्र की प्रशंसा करके विदेहराज के साथ उसकी स्थायी मैत्री कराने का वचन देते हैं। वे विदेहराज को बुलाकर कौसल्य की शुद्धता का साक्ष्य देते हैं और सन्धि की सलाह देते हैं, यह याद दिलाते हुए कि न जय सदा रहती है, न पराजय। विदेहराज मान लेता है, कहता है कि कौसल्य ने अपने गुणों से उसे जीत लिया है, उसे अपने घर में सम्मान देता है और अपनी कन्या तथा अनेक रत्न प्रदान करता है। भीष्म अन्त में कहते हैं कि राजाओं के लिए जय और पराजय समान हैं।

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राजोवाच

श्लोक 1 (12.106.1)

न निकृत्या न दम्भेन ब्रह्मन्निच्छामि जीवितुम् । नाधर्मयुक्तानिच्छेयमर्थान्सुमहतोऽप्यहम् ॥

na nikṛtyā na dambhena brahmannicchāmi jīvitum | nādharmayuktāniccheyamarthānsumahato'pyaham

हे ब्राह्मण, मैं छल से या पाखण्ड से जीना नहीं चाहता। अधर्म से जुड़े हुए बहुत बड़े धन की भी मैं इच्छा नहीं करूँगा।

श्लोक 2 (12.106.2)

पुरस्तादेव भगवन्मयैतदपवर्जितम् । येन पापं न शङ्केत यद्वा कृत्स्नं हितं भवेत् ॥

purastādeva bhagavanmayaitadapavarjitam | yena pāpaṃ na śaṅketa yadvā kṛtsnaṃ hitaṃ bhavet

भगवन्, मैंने इसे बहुत पहले ही छोड़ दिया था, ताकि मुझमें किसी पाप की शंका न हो, या जिससे सब कुछ पूरी तरह हितकर हो।

श्लोक 3 (12.106.3)

आनृशंस्येन धर्मेण लोके ह्यस्मिञ्जिजीविषुः । नाहमेतदलं कर्तुं नैतन्मय्युपपद्यते ॥

ānṛśaṃsyena dharmeṇa loke hyasmiñjijīviṣuḥ | nāhametadalaṃ kartuṃ naitanmayyupapadyate

मैं इस लोक में क्रूरता से रहित, दया के धर्म से ही जीना चाहता हूँ। मैं यह (छल-कपट) करने में समर्थ नहीं हूँ, और यह मुझे शोभा भी नहीं देता।

मुनिरुवाच

श्लोक 4 (12.106.4)

उपपन्नस्त्वमेतेन यथा क्षत्रिय भाषसे । प्रकृत्या ह्युपपन्नोऽसि बुद्ध्या चाद्भुतदर्शनः ॥

upapannastvametena yathā kṣatriya bhāṣase | prakṛtyā hyupapanno'si buddhyā cādbhutadarśanaḥ

हे क्षत्रिय, तुम जैसा कह रहे हो, उससे तुम सर्वथा योग्य सिद्ध होते हो। तुम स्वभाव से ही गुणसम्पन्न हो और बुद्धि से अद्भुत दृष्टि वाले हो।

श्लोक 5 (12.106.5)

उभयोरेव साह्यार्थे यतिष्ये तव तस्य च । संश्लेषं वा करिष्यामि शाश्वतं ह्यनपायिनम् ॥

ubhayoreva sāhyārthe yatiṣye tava tasya ca | saṃśleṣaṃ vā kariṣyāmi śāśvataṃ hyanapāyinam

मैं तुम दोनों की, तुम्हारी और उसकी, सहायता के लिए प्रयत्न करूँगा, अथवा तुम दोनों के बीच ऐसा मेल करा दूँगा जो स्थायी हो और कभी न टूटे।

श्लोक 6 (12.106.6)

त्वादृशं हि कुले जातमनृशंसं बहुश्रुतम् । अमात्यं को न कुर्वीत राज्यप्रणयकोविदम् ॥

tvādṛśaṃ hi kule jātamanṛśaṃsaṃ bahuśrutam | amātyaṃ ko na kurvīta rājyapraṇayakovidam

तुम जैसे कुलीन, दयालु, बहुश्रुत और राज्य-संचालन में निपुण पुरुष को अपना मन्त्री कौन नहीं बनाएगा?

श्लोक 7 (12.106.7)

यस्त्वं प्रव्राजितो राज्याद्व्यसनं चोत्तमं गतः । आनृशंस्येन वृत्तेन क्षत्रियेच्छसि जीवितुम् ॥

yastvaṃ pravrājito rājyādvyasanaṃ cottamaṃ gataḥ | ānṛśaṃsyena vṛttena kṣatriyecchasi jīvitum

तुम राज्य से निकाले गए और घोर संकट में पड़े हो, फिर भी हे क्षत्रिय, तुम दयायुक्त आचरण से ही जीवन बिताना चाहते हो।

श्लोक 8 (12.106.8)

आगन्ता मद्गृहं तात वैदेहः सत्यसंगरः । अथाहं तं नियोक्ष्यामि तत्करिष्यत्यसंशयम् ॥

āgantā madgṛhaṃ tāta vaidehaḥ satyasaṃgaraḥ | athāhaṃ taṃ niyokṣyāmi tatkariṣyatyasaṃśayam

वत्स, अपने वचन का पक्का विदेहराज मेरे घर आएगा। तब मैं उसे प्रेरित करूँगा, और वह निःसन्देह वही करेगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.106.9)

तत आहूय वैदेहं मुनिर्वचनमब्रवीत् । अयं राजकुले जातो विदिताभ्यन्तरो मम ॥

tata āhūya vaidehaṃ munirvacanamabravīt | ayaṃ rājakule jāto viditābhyantaro mama

तब मुनि ने विदेहराज को बुलाकर कहा, "यह राजकुल में जन्मा है, और इसका अन्तःस्वभाव मुझे भली-भाँति ज्ञात है।"

मुनिरुवाच

श्लोक 10 (12.106.10)

आदर्श इव शुद्धात्मा शारदश्चन्द्रमा यथा । नास्मिन्पश्यामि वृजिनं सर्वतो मे परीक्षितः ॥

ādarśa iva śuddhātmā śāradaścandramā yathā | nāsminpaśyāmi vṛjinaṃ sarvato me parīkṣitaḥ

यह दर्पण के समान और शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल आत्मा वाला है। इसमें मुझे कोई दोष नहीं दिखता; मैंने इसे सब ओर से परख लिया है।

श्लोक 11 (12.106.11)

तेन ते संधिरेवास्तु विश्वसास्मिन्यथा मयि । न राज्यमनमात्येन शक्यं शास्तुममित्रहन् ॥

tena te saṃdhirevāstu viśvasāsminyathā mayi | na rājyamanamātyena śakyaṃ śāstumamitrahan

इसलिए इसके साथ तुम्हारी सन्धि हो; जैसे मुझ पर विश्वास करते हो, वैसे ही इस पर भी करो। हे शत्रुहन्ता, बिना मन्त्री के राज्य का शासन नहीं किया जा सकता।

श्लोक 12 (12.106.12)

अमात्यः शुद्ध एव स्याद्बुद्धिसंपन्न एव वा । तस्माच्चैव भयं राज्ञः पश्य राज्यस्य योजनम् ॥

amātyaḥ śuddha eva syādbuddhisaṃpanna eva vā | tasmāccaiva bhayaṃ rājñaḥ paśya rājyasya yojanam

मन्त्री या तो शुद्ध चरित्र वाला हो या बुद्धिसम्पन्न; फिर भी उसी से राजा को भय रहता है। देखो, राज्य की व्यवस्था कैसे की जाती है।

श्लोक 13 (12.106.13)

धर्मात्मनां क्वचिल्लोके नान्यास्ति गतिरीदृशी । तदा राजपुत्रोऽयं सतां मार्गमनुष्ठितः । असंगृहीतस्त्वेवैष त्वया धर्मपुरोगमः ॥

dharmātmanāṃ kvacilloke nānyāsti gatirīdṛśī | tadā rājaputro'yaṃ satāṃ mārgamanuṣṭhitaḥ | asaṃgṛhītastvevaiṣa tvayā dharmapurogamaḥ

धर्मात्माओं के लिए संसार में कहीं ऐसा दूसरा आश्रय नहीं है। इसीलिए इस राजकुमार ने सज्जनों का मार्ग अपनाया है; धर्म को आगे रखने वाले इसको तुमने अभी तक अपना नहीं बनाया है।

श्लोक 14 (12.106.14)

संसेव्यमानः शत्रूंस्ते गृह्णीयान्महतो गणान् ॥

saṃsevyamānaḥ śatrūṃste gṛhṇīyānmahato gaṇān

यदि उसे साथ लेकर उसका भली-भाँति आदर-सत्कार किया जाए, तो वह तुम्हारे शत्रुओं के बड़े-बड़े समूहों को पकड़ लेगा।

श्लोक 15 (12.106.15)

यद्ययं प्रतियुद्ध्येत स्वकर्म क्षत्रियस्य तत् । जिगीषमाणस्त्वां युद्धे पितृपैतामहे पदे ॥

yadyayaṃ pratiyuddhyeta svakarma kṣatriyasya tat | jigīṣamāṇastvāṃ yuddhe pitṛpaitāmahe pade

यदि यह तुमसे युद्ध करके अपने पिता-पितामह के आसन को जीतना चाहे, तो वह क्षत्रिय का अपना धर्म ही होगा।

श्लोक 16 (12.106.16)

त्वं अपि प्रतियुद्ध्येथा विजिगीषुर्व्रते स्थितः । अयुद्ध्वैव नियोगान्मे वशे कुरु हिते स्थितः ॥

tvaṃ api pratiyuddhyethā vijigīṣurvrate sthitaḥ | ayuddhvaiva niyogānme vaśe kuru hite sthitaḥ

तुम भी विजय की इच्छा रखकर और अपने व्रत में दृढ़ रहकर उससे लड़ सकते हो। परन्तु मेरे कहने से बिना युद्ध किए ही, हित में स्थित रहकर, उसे अपने वश में कर लो।

श्लोक 17 (12.106.17)

स त्वं धर्ममवेक्षस्व हित्वा लोभमसांप्रतम् । न च कामान्न च द्रोहात्स्वधर्मं हातुमर्हसि ॥

sa tvaṃ dharmamavekṣasva hitvā lobhamasāṃpratam | na ca kāmānna ca drohātsvadharmaṃ hātumarhasi

इसलिए अनुचित लोभ को छोड़कर धर्म पर दृष्टि रखो। न कामना से और न द्वेष से तुम्हें अपना धर्म छोड़ना चाहिए।

श्लोक 18 (12.106.18)

नैव नित्यं जयस्तात नैव नित्यं पराजयः । तस्माज्जयश्च भोक्तव्यो भोक्तव्यश्च पराजयः ॥

naiva nityaṃ jayastāta naiva nityaṃ parājayaḥ | tasmājjayaśca bhoktavyo bhoktavyaśca parājayaḥ

वत्स, न जय सदा रहती है और न पराजय। इसलिए जय का भी भोग करना पड़ता है और पराजय का भी।

श्लोक 19 (12.106.19)

आत्मन्यपि च संदृश्यावुभौ जयपराजयौ । निःशेषकारिणां तात निःशेषकरणाद्भयम् ॥

ātmanyapi ca saṃdṛśyāvubhau jayaparājayau | niḥśeṣakāriṇāṃ tāta niḥśeṣakaraṇādbhayam

जय और पराजय दोनों अपने भीतर भी देखी जा सकती हैं। और जो कुछ भी शेष नहीं छोड़ते, उन्हें, वत्स, कुछ भी शेष न छोड़ने से ही भय होता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (12.106.20)

इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं वचनं ब्राह्मणर्षभम् । प्रतिपूज्याभिसत्कृत्य पूजार्हमनुमान्य च ॥

ityuktaḥ pratyuvācedaṃ vacanaṃ brāhmaṇarṣabham | pratipūjyābhisatkṛtya pūjārhamanumānya ca

ऐसा कहे जाने पर उसने उन ब्राह्मणश्रेष्ठ का प्रतिसम्मान और आदर करके, उन पूज्य को मान देकर यह उत्तर दिया।

वैदेह उवाच

श्लोक 21 (12.106.21)

यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महाश्रुतः । श्रेयस्कामो यथा ब्रूयादुभयोरेव तत्क्षमम् ॥

yathā brūyānmahāprājño yathā brūyānmahāśrutaḥ | śreyaskāmo yathā brūyādubhayoreva tatkṣamam

आपने वैसा ही कहा है जैसा महाप्राज्ञ कहता, जैसा महाविद्वान् कहता, जैसा हित चाहने वाला कहता, और जो हम दोनों के लिए उचित है।

श्लोक 22 (12.106.22)

यद्यद्वचनमुक्तोऽस्मि करिष्यामि च तत्तथा । एतद्धि परमं श्रेयो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥

yadyadvacanamukto'smi kariṣyāmi ca tattathā | etaddhi paramaṃ śreyo na me'trāsti vicāraṇā

आपने मुझसे जो-जो कहा है, मैं वैसा ही करूँगा। यही परम कल्याण है; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।

भीष्म उवाच

श्लोक 23 (12.106.23)

ततः कौसल्यमाहूय मैथिलो वाक्यमब्रवीत् । धर्मतो बुद्धितश्चैव बलेन च जितं मया ॥

tataḥ kausalyamāhūya maithilo vākyamabravīt | dharmato buddhitaścaiva balena ca jitaṃ mayā

तब मिथिलानरेश ने कौसल्य को बुलाकर कहा, "मैंने धर्म से, बुद्धि से और बल से जीत पाई है।"

वैदेह उवाच

श्लोक 24 (12.106.24)

अहं त्वया चात्मगुणैर्जितः पार्थिवसत्तम । आत्मानमनवज्ञाय जितवद्वर्ततां भवान् ॥

ahaṃ tvayā cātmaguṇairjitaḥ pārthivasattama | ātmānamanavajñāya jitavadvartatāṃ bhavān

परन्तु हे राजाओं में श्रेष्ठ, मैं आपके अपने गुणों से जीत लिया गया हूँ। अपने को छोटा न मानिए; विजेता की तरह व्यवहार कीजिए।

श्लोक 25 (12.106.25)

नावमन्यामि ते बुद्धिं नावमन्ये च पौरुषम् । नावमन्ये जयामीति जितवद्वर्ततां भवान् ॥

nāvamanyāmi te buddhiṃ nāvamanye ca pauruṣam | nāvamanye jayāmīti jitavadvartatāṃ bhavān

मैं आपकी बुद्धि का तिरस्कार नहीं करता और आपके पौरुष का भी नहीं। मैं यह सोचकर भी तिरस्कार नहीं करता कि मैं जीत रहा हूँ। आप विजेता की तरह व्यवहार कीजिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 26 (12.106.26)

यथावत्पूजितो राजन्गृहं गन्तासि मे गृहात् । ततः संपूज्य तौ विप्रं विश्वस्तौ जग्मतुर्गृहान् ॥

yathāvatpūjito rājangṛhaṃ gantāsi me gṛhāt | tataḥ saṃpūjya tau vipraṃ viśvastau jagmaturgṛhān

उसने कहा, "हे राजन्, यथोचित सत्कार पाकर आप मेरे घर से अपने घर जाएँगे।" फिर उस ब्राह्मण का सत्कार करके, एक-दूसरे पर विश्वास रखते हुए वे दोनों घर को गए।

श्लोक 27 (12.106.27)

वैदेहस्त्वथ कौसल्यं प्रवेश्य गृहमञ्जसा । पाद्यार्घ्यमधुपर्कैस्तं पूजार्हं प्रत्यपूजयत् ॥

vaidehastvatha kausalyaṃ praveśya gṛhamañjasā | pādyārghyamadhuparkaistaṃ pūjārhaṃ pratyapūjayat

तब विदेहराज कौसल्य को सहज भाव से अपने घर ले गया और उन पूज्य का पाद्य, अर्घ्य और मधुपर्क से सत्कार किया।

श्लोक 28 (12.106.28)

ददौ दुहितरं चास्मै रत्नानि विविधानि च । एष राज्ञां परो धर्मः समौ जयपराजयौ ॥

dadau duhitaraṃ cāsmai ratnāni vividhāni ca | eṣa rājñāṃ paro dharmaḥ samau jayaparājayau

और उसने उसे अपनी कन्या तथा अनेक प्रकार के रत्न दिए। राजाओं का यही परम धर्म है: जय और पराजय समान हैं।

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