शान्ति पर्व · अध्याय 108
माता, पिता और गुरु की पूजा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि सबसे बड़ा कर्तव्य कौन-सा है। भीष्म उत्तर देते हैं कि माता, पिता और गुरु की पूजा, जिनकी अनुमति से ही कर्म धर्म बनता है; वे ही तीन लोक, तीन आश्रम, तीन वेद और तीन अग्नियाँ हैं। वे गुरु को पिता और माता से भी ऊपर बताते हैं, चेताते हैं कि इन तीनों से द्रोह भ्रूणहत्या से भी बड़ा पाप है, और अन्त में उन चार अपराधियों की बात करते हैं जिनके प्रायश्चित्त का कोई विधान नहीं सुना गया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.108.1)
महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत । किंस्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेयतमं मतम् ॥
mahānayaṃ dharmapatho bahuśākhaśca bhārata | kiṃsvideveha dharmāṇāmanuṣṭheyatamaṃ matam
हे भारत, यह धर्म का मार्ग विशाल है और इसकी अनेक शाखाएँ हैं। यहाँ सब धर्मों में कौन-सा सबसे अधिक अनुष्ठान करने योग्य माना गया है?
श्लोक 2 (12.108.2)
किं कार्यं सर्वभूतानां गरीयो भवतो मतम् । यथाऽहं परमं धर्ममिह च प्रेत्य चाप्नुयाम् ॥
kiṃ kāryaṃ sarvabhūtānāṃ garīyo bhavato matam | yathā'haṃ paramaṃ dharmamiha ca pretya cāpnuyām
आपके मत में सब प्राणियों के लिए सबसे भारी कर्तव्य कौन-सा है, जिससे मैं यहाँ भी और मरने के बाद भी परम धर्म पा सकूँ?
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.108.3)
मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा बहुमता मम । अत्र वर्तन्नरो लोकान्यशश्च महदश्नुते ॥
mātāpitrorgurūṇāṃ ca pūjā bahumatā mama | atra vartannaro lokānyaśaśca mahadaśnute
मेरे मत में माता, पिता और गुरुओं की पूजा सबसे अधिक मान्य है। इसमें लगा हुआ मनुष्य लोकों को और बड़े यश को पाता है।
श्लोक 4 (12.108.4)
यदेते ह्यनुजानीयुः कर्म तात सुपूजिताः । धर्मं धर्मविरुद्धं वा तत्कर्तव्यं युधिष्ठिर ॥
yadete hyanujānīyuḥ karma tāta supūjitāḥ | dharmaṃ dharmaviruddhaṃ vā tatkartavyaṃ yudhiṣṭhira
हे तात युधिष्ठिर, भली-भाँति पूजित होने पर ये जिस कर्म की अनुमति दें, चाहे वह धर्म हो या धर्म के विरुद्ध, वही करना चाहिए।
श्लोक 5 (12.108.5)
न तैरभ्यननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् । यं मे तेऽभ्यनुजानीयुः स धर्म इति निश्चयः ॥
na tairabhyananujñāto dharmamanyaṃ samācaret | yaṃ me te'bhyanujānīyuḥ sa dharma iti niścayaḥ
उनकी अनुमति के बिना किसी दूसरे धर्म का आचरण नहीं करना चाहिए। जिसकी वे मुझे अनुमति दें, वही धर्म है: यह निश्चय है।
श्लोक 6 (12.108.6)
एत एव त्रयो लोका एत एवाश्रमास्त्रयः । एत एव त्रयो वेदा एत एव त्रयोऽग्नयः ॥
eta eva trayo lokā eta evāśramāstrayaḥ | eta eva trayo vedā eta eva trayo'gnayaḥ
ये तीनों ही तीन लोक हैं, ये ही तीन आश्रम हैं, ये ही तीन वेद हैं और ये ही तीन अग्नियाँ हैं।
श्लोक 7 (12.108.7)
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताऽग्निर्दक्षिणः स्मृतः । गुरुराहवनीयस्तु साऽग्नित्रेता गरीयसी ॥
pitā vai gārhapatyo'gnirmātā'gnirdakṣiṇaḥ smṛtaḥ | gururāhavanīyastu sā'gnitretā garīyasī
पिता गार्हपत्य अग्नि है, माता दक्षिणाग्नि कही गई है और गुरु आहवनीय है। अग्नियों की यह त्रयी सबसे भारी है।
श्लोक 8 (12.108.8)
त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रींल्लोकानपि जेष्यसि । पितृवृत्त्या त्विमं लोकं मातृवृत्त्या तथा परम् ॥
triṣvapramādyanneteṣu trīṃllokānapi jeṣyasi | pitṛvṛttyā tvimaṃ lokaṃ mātṛvṛttyā tathā param
यदि तुम इन तीनों के विषय में प्रमाद न करो, तो तीनों लोकों को भी जीत लोगे: पिता की सेवा से इस लोक को, माता की सेवा से परलोक को,
श्लोक 9 (12.108.9)
ब्रह्मलोकं गुरोर्वृत्त्या नियमेन तरिष्यसि । सम्यगेतेषु वर्तस्व त्रिषु लोकेषु भारत ॥
brahmalokaṃ gurorvṛttyā niyamena tariṣyasi | samyageteṣu vartasva triṣu lokeṣu bhārata
और गुरु की नियमपूर्वक सेवा से ब्रह्मलोक को पार करोगे। हे भारत, इन तीनों के प्रति तीनों लोकों में उचित व्यवहार करो।
श्लोक 10 (12.108.10)
यशः प्राप्स्यसि भद्रं ते धर्मं च सुमहाफलम् । नैतानतिशयीथास्त्वं नात्यश्नीथा न दूषयेः ॥
yaśaḥ prāpsyasi bhadraṃ te dharmaṃ ca sumahāphalam | naitānatiśayīthāstvaṃ nātyaśnīthā na dūṣayeḥ
तुम्हारा कल्याण हो; तुम यश पाओगे और अत्यन्त महान् फल वाला धर्म भी। तुम इनसे आगे न बढ़ो, इनसे अधिक न खाओ, और इनका अपमान न करो।
श्लोक 11 (12.108.11)
नित्यं परिचरेश्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम् । कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान्प्राप्स्यसे त्वं जनाधिप ॥
nityaṃ paricareścaiva tadvai sukṛtamuttamam | kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokānprāpsyase tvaṃ janādhipa
सदा इनकी सेवा करते रहो; यही सबसे उत्तम पुण्य कर्म है। हे जनाधिप, इससे तुम कीर्ति, पुण्य, यश और लोक पाओगे।
श्लोक 12 (12.108.12)
सर्वे तस्यादृता लोका यस्यैते त्रय आदृताः । अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः ॥
sarve tasyādṛtā lokā yasyaite traya ādṛtāḥ | anādṛtāstu yasyaite sarvāstasyāphalāḥ kriyāḥ
जो इन तीनों का आदर करता है, उसके लिए सब लोक आदृत हो जाते हैं; और जो इनका अनादर करता है, उसके सब कर्म निष्फल हो जाते हैं।
श्लोक 13 (12.108.13)
न चायं न परो लोको न यशस्तस्य भारत । अमानिता नित्यमेव यस्यैते गुरवस्त्रयः ॥
na cāyaṃ na paro loko na yaśastasya bhārata | amānitā nityameva yasyaite guravastrayaḥ
हे भारत, जो इन तीनों गुरुजनों का सदा अनादर करता है, उसके लिए न यह लोक है, न परलोक, न यश।
श्लोक 14 (12.108.14)
न चास्मिन्न परे लोके यशस्तस्य प्रकाशते । यच्चान्यदपि कल्याणं पारत्रं समुदाहृतम् ॥
na cāsminna pare loke yaśastasya prakāśate | yaccānyadapi kalyāṇaṃ pāratraṃ samudāhṛtam
न इस लोक में और न परलोक में उसका यश चमकता है, और परलोक के विषय में कहा गया कोई अन्य कल्याण भी उसे नहीं मिलता।
श्लोक 15 (12.108.15)
तेभ्य एव हि यत्सर्वं कृत्यं यन्निसृजाम्यहम् । तदासीन्मे शतगुणं सहस्रगुणमेव च । तस्मान्मे संप्रकाशन्ते त्रयो लोका युधिष्ठिर ॥
tebhya eva hi yatsarvaṃ kṛtyaṃ yannisṛjāmyaham | tadāsīnme śataguṇaṃ sahasraguṇameva ca | tasmānme saṃprakāśante trayo lokā yudhiṣṭhira
जो कुछ करना था और जो कुछ मैंने अर्पित किया, वह सब उन्हीं को दिया; वह मुझे सौ गुना और हज़ार गुना होकर लौटा। इसीलिए हे युधिष्ठिर, मुझे तीनों लोक प्रकाशित दिखाई देते हैं।
श्लोक 16 (12.108.16)
दशैव तु सदाऽऽचार्यः श्रोत्रियानधितिष्ठति । दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान्पिता दश ॥
daśaiva tu sadā''cāryaḥ śrotriyānadhitiṣṭhati | daśācāryānupādhyāya upādhyāyānpitā daśa
एक आचार्य सदा दस श्रोत्रियों से ऊपर होता है; एक उपाध्याय दस आचार्यों से; और पिता दस उपाध्यायों से;
श्लोक 17 (12.108.17)
पितॄन्दश तु मातैका सर्वां वा पृथिवीमपि । गुरुत्वेनाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः ॥
pitṝndaśa tu mātaikā sarvāṃ vā pṛthivīmapi | gurutvenābhibhavati nāsti mātṛsamo guruḥ
और अकेली माता गौरव में दस पिताओं को, या समस्त पृथ्वी को भी, पीछे छोड़ देती है। माता के समान कोई गुरु नहीं है।
श्लोक 18 (12.108.18)
गुरुर्गरीयान्पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः । उभौ हि मातापितरौ जन्मन्येवोपयुज्यतः ॥
gururgarīyānpitṛto mātṛtaśceti me matiḥ | ubhau hi mātāpitarau janmanyevopayujyataḥ
मेरा मत है कि गुरु पिता और माता दोनों से भारी है; क्योंकि माता-पिता केवल जन्म में ही काम आते हैं।
श्लोक 19 (12.108.19)
शरीरमेतौ सृजतः पिता माता च भारत । आचार्यशिष्टा या जातिः सा सम्यगजरामरा ॥
śarīrametau sṛjataḥ pitā mātā ca bhārata | ācāryaśiṣṭā yā jātiḥ sā samyagajarāmarā
हे भारत, पिता और माता शरीर की सृष्टि करते हैं; पर आचार्य से सिखाया हुआ जो जन्म है, वह सचमुच जरा और मृत्यु से रहित है।
श्लोक 20 (12.108.20)
अवध्या हि सदा माता पिता चाप्यपकारिणौ ॥
avadhyā hi sadā mātā pitā cāpyapakāriṇau
माता और पिता, चाहे उन्होंने अपकार ही किया हो, कभी वध के योग्य नहीं हैं।
श्लोक 21 (12.108.21)
न स दुष्यति तत्कृत्वा न च ते दूषयन्ति तम् । धर्माय यतमानानां विदुर्देवाः सहर्षिभिः ॥
na sa duṣyati tatkṛtvā na ca te dūṣayanti tam | dharmāya yatamānānāṃ vidurdevāḥ saharṣibhiḥ
ऐसा करने से वह दोषी नहीं होता, और न वे उसे दूषित करते हैं। धर्म के लिए प्रयत्न करने वालों के विषय में देवता ऋषियों सहित यह जानते हैं।
श्लोक 22 (12.108.22)
य आवृणोत्यवितथेन कर्मणा । ऋतं ब्रुवन्नमृतं संप्रयच्छन् । तं मन्येथाः पितरं मातरं च । तस्मै न द्रुह्येत्कृतमस्य जानन् ॥
ya āvṛṇotyavitathena karmaṇā | ṛtaṃ bruvannamṛtaṃ saṃprayacchan | taṃ manyethāḥ pitaraṃ mātaraṃ ca | tasmai na druhyetkṛtamasya jānan
जो अटल कर्म से तुम पर अनुग्रह करता है, वेद का उपदेश देता और अमृत प्रदान करता है, उसे अपने पिता और माता के समान मानो; उसके किए को जानते हुए उससे कभी द्रोह न करो।
श्लोक 23 (12.108.23)
विद्यां श्रुत्वा ये गुरुं नाद्रियन्ते । प्रत्यासन्नं मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं । न चास्य तद्ब्रह्मफलं ददाति । यथैव ते गुरुभिर्भावनीया । स्तथैव तेषां गुरवोऽभ्यर्चनीयाः ॥
vidyāṃ śrutvā ye guruṃ nādriyante | pratyāsannaṃ manasā karmaṇā vā | teṣāṃ pāpaṃ bhrūṇahatyāviśiṣṭaṃ | na cāsya tadbrahmaphalaṃ dadāti | yathaiva te gurubhirbhāvanīyā | stathaiva teṣāṃ guravo'bhyarcanīyāḥ
जो लोग विद्या सीखकर अपने समीप स्थित गुरु का मन या कर्म से आदर नहीं करते, उनका पाप भ्रूणहत्या से भी बढ़कर है, और वह विद्या उन्हें ब्रह्म का फल नहीं देती। जैसे ऐसे शिष्य अपने गुरुओं द्वारा पालनीय हैं, वैसे ही उनके गुरु भी उनके द्वारा पूजनीय हैं।
श्लोक 24 (12.108.24)
तस्मात्पूजयितव्याश्च संविभज्याश्च यत्नतः । गुरवोऽर्चयितव्याश्च पुराणं धर्ममिच्छता ॥
tasmātpūjayitavyāśca saṃvibhajyāśca yatnataḥ | guravo'rcayitavyāśca purāṇaṃ dharmamicchatā
इसलिए पुरातन धर्म चाहने वाले को गुरुजनों का पूजन करना चाहिए, यत्नपूर्वक उन्हें अपने भाग में सहभागी बनाना चाहिए और उनकी अर्चना करनी चाहिए।
श्लोक 25 (12.108.25)
येन प्रीणन्ति पितरस्तेन प्रीतः प्रजापतिः । प्रीणाति जननी येन पृथिवी तेन पूजिता ॥
yena prīṇanti pitarastena prītaḥ prajāpatiḥ | prīṇāti jananī yena pṛthivī tena pūjitā
जिससे पितर प्रसन्न होते हैं, उससे प्रजापति प्रसन्न होते हैं; जिससे माता प्रसन्न होती है, उससे पृथ्वी की पूजा होती है।
श्लोक 26 (12.108.26)
येन प्रीणात्युपाध्यायस्तेन स्याद्ब्रह्म पूजितम् । मातृतः पितृतश्चैव तस्मात्पूज्यतमो गुरुः ॥
yena prīṇātyupādhyāyastena syādbrahma pūjitam | mātṛtaḥ pitṛtaścaiva tasmātpūjyatamo guruḥ
जिससे उपाध्याय प्रसन्न होता है, उससे ब्रह्म की पूजा हो जाती है। इसलिए माता और पिता से भी गुरु अधिक पूज्य है।
श्लोक 27 (12.108.27)
ऋषयश्च हि देवाश्च प्रीयन्ते पितृभिः सह । पूज्यमानेषु गुरुषु तस्मात्पूज्यतमो गुरुः ॥
ṛṣayaśca hi devāśca prīyante pitṛbhiḥ saha | pūjyamāneṣu guruṣu tasmātpūjyatamo guruḥ
क्योंकि गुरुओं की पूजा होने पर ऋषि और देवता, पितरों के साथ, प्रसन्न होते हैं; इसलिए गुरु सबसे अधिक पूज्य है।
श्लोक 28 (12.108.28)
केनचिन्न च वृत्तेन ह्यवज्ञेयो गुरुर्भवेत् । न च माता न च पिता तादृशो यादृशो गुरुः ॥
kenacinna ca vṛttena hyavajñeyo gururbhavet | na ca mātā na ca pitā tādṛśo yādṛśo guruḥ
किसी भी आचरण के कारण गुरु का अनादर नहीं करना चाहिए; न माता और न पिता वैसे हैं जैसा गुरु है।
श्लोक 29 (12.108.29)
न तेऽवमानमर्हन्ति न तेषां दूषयेत्कृतम् । गुरूणामेव सत्कारं विदुर्देवाः सहर्षिभिः ॥
na te'vamānamarhanti na teṣāṃ dūṣayetkṛtam | gurūṇāmeva satkāraṃ vidurdevāḥ saharṣibhiḥ
वे अनादर के योग्य नहीं हैं, और उनके किए की निन्दा नहीं करनी चाहिए। देवता ऋषियों सहित जानते हैं कि गुरुओं का सत्कार ही सर्वोपरि है।
श्लोक 30 (12.108.30)
उपाध्यायं पितरं मातरं च । ये विद्रुह्यन्ते मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं । तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥
upādhyāyaṃ pitaraṃ mātaraṃ ca | ye vidruhyante manasā karmaṇā vā | teṣāṃ pāpaṃ bhrūṇahatyāviśiṣṭaṃ | tasmānnānyaḥ pāpakṛdasti loke
जो अपने उपाध्याय, पिता या माता से मन या कर्म से द्रोह करते हैं, उनका पाप भ्रूणहत्या से भी बढ़कर है; इसलिए संसार में उनसे बड़ा पापी कोई नहीं।
श्लोक 31 (12.108.31)
भृतो भर्तारं यो न बिभर्ति पुत्रः । स्वयोनिजः पितरं मातरं च । तस्य पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं । तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥
bhṛto bhartāraṃ yo na bibharti putraḥ | svayonijaḥ pitaraṃ mātaraṃ ca | tasya pāpaṃ bhrūṇahatyāviśiṣṭaṃ | tasmānnānyaḥ pāpakṛdasti loke
जो पुत्र उन्हीं की देह से जन्मा है और जिसका स्वयं पालन-पोषण हुआ है, वह यदि अपने पालन करने वाले पिता और माता का भरण-पोषण नहीं करता, तो उसका पाप भ्रूणहत्या से भी बढ़कर है; इसलिए संसार में उससे बड़ा पापी कोई नहीं।
श्लोक 32 (12.108.32)
मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य स्त्रीघ्नस्य पिशुनस्य च । चतुर्णामपि चैतेषां निष्कृतिं नानुशुश्रुम् ॥
mitradruhaḥ kṛtaghnasya strīghnasya piśunasya ca | caturṇāmapi caiteṣāṃ niṣkṛtiṃ nānuśuśrum
मित्र से द्रोह करने वाले, कृतघ्न, स्त्री की हत्या करने वाले और चुगलखोर, इन चारों के लिए हमने कोई प्रायश्चित्त नहीं सुना।
श्लोक 33 (12.108.33)
एतत्सर्वं मनुनिर्देशदृष्टं । यत्कर्तव्यं पुरुषेणेह किंचित् । एतच्छ्रेयो नान्यदस्माद्विशिष्टं । सर्वान्धर्माननुसृत्यैतदुक्तम् ॥
etatsarvaṃ manunirdeśadṛṣṭaṃ | yatkartavyaṃ puruṣeṇeha kiṃcit | etacchreyo nānyadasmādviśiṣṭaṃ | sarvāndharmānanusṛtyaitaduktam
मनु के निर्देश में पुरुष के लिए यहाँ जो कुछ करणीय है, वह सब यही देखा गया है। यही परम कल्याण है; इससे बढ़कर कुछ नहीं। सभी धर्मों का अनुसरण करके यह कहा गया है।