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शान्ति पर्व · अध्याय 138

बिलाव और चूहा: शत्रु से सन्धि

युधिष्ठिर पूछते हैं कि बहुत से बलवान शत्रुओं से घिरा अकेला दुर्बल राजा कैसे चले, और जो शत्रु मित्र बन जाए उसके साथ कैसा व्यवहार करे। भीष्म एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: बरगद के नीचे बहेलिये के जाल में बिलाव लोमश फँस जाता है, और नेवले तथा उल्लू से घिरा चूहा पलित उससे सन्धि करके फाँसें कुतरता है, और तब तक रुका रहता है जब तक चाण्डाल सामने नहीं आ जाता, ताकि बिलाव को पेड़ पर भागना पड़े। बाद में जब बिलाव उसे फिर मित्रता के लिए बुलाता है, तो पलित मना कर देता है और समझाता है कि मित्रता और शत्रुता परिस्थिति और स्वार्थ से पैदा होती हैं और किसी पर पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि आवश्यकता पड़ने पर बलवान शत्रु से सन्धि करो, सदा सावधान रहो और ब्राह्मणों का सम्मान करो।

अध्याय 137अध्याय-सूचीअध्याय 139

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.138.1)

सर्वत्र बुद्धिः कथिता श्रेष्ठा ते भरतर्षभ । अनागता तथोत्पन्ना दीर्घसूत्रा विनाशिनी ॥

sarvatra buddhiḥ kathitā śreṣṭhā te bharatarṣabha | anāgatā tathotpannā dīrghasūtrā vināśinī

हे भरतश्रेष्ठ, आपने बताया है कि हर परिस्थिति में बुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ है। जो संकट अभी आया नहीं उसे पहले से भाँप लेने वाली बुद्धि और जो आ पड़ा है उसका सामना करने वाली बुद्धि, दोनों श्रेष्ठ हैं; जबकि टालमटोल की आदत विनाश करती है।

श्लोक 2 (12.138.2)

तदिच्छामि परां बुद्धिं श्रोतुं ते भरतर्षभ । यथा राजा न मुह्येत शत्रुभिः परिपीडितः ॥

tadicchāmi parāṃ buddhiṃ śrotuṃ te bharatarṣabha | yathā rājā na muhyeta śatrubhiḥ paripīḍitaḥ

इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, मैं आपसे उस परम बुद्धि को सुनना चाहता हूँ जिससे शत्रुओं द्वारा पीड़ित राजा भ्रमित न हो।

श्लोक 3 (12.138.3)

धर्मार्थकुशलं प्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् । पृच्छामि त्वा कुरुश्रेष्ठ तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

dharmārthakuśalaṃ prājñaṃ sarvaśāstraviśāradam | pṛcchāmi tvā kuruśreṣṭha tanme vyākhyātumarhasi

आप धर्म और अर्थ में कुशल हैं, बुद्धिमान हैं और सब शास्त्रों में पारंगत हैं। हे कुरुश्रेष्ठ, मैं आपसे पूछता हूँ; कृपया मुझे यह समझाइए।

श्लोक 4 (12.138.4)

शत्रुभिर्बहुभिर्ग्रस्तो यथा मुच्येत पार्थिवः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वमेव यथाविधि ॥

śatrubhirbahubhirgrasto yathā mucyeta pārthivaḥ | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ sarvameva yathāvidhi

बहुत से शत्रुओं से घिरा हुआ राजा कैसे उनके चंगुल से छूटे? मैं यह सब विधिपूर्वक क्रम से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 5 (12.138.5)

विषमस्थं हि राजानं शत्रवः परिपन्थिनः । बहवोऽप्येकमुद्धर्तुं यतन्ते पूर्वतापिताः ॥

viṣamasthaṃ hi rājānaṃ śatravaḥ paripanthinaḥ | bahavo'pyekamuddhartuṃ yatante pūrvatāpitāḥ

संकट में पड़े राजा के शत्रु उसकी घात में रहते हैं; जिनको उसने पहले कभी सताया हो, वे बहुत होकर भी मिलकर उस अकेले को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 6 (12.138.6)

सर्वतः प्रार्थ्यमानेन दुर्बलेन महाबलैः । एकेनैवासहायेन शक्यं स्थातुं भवेत्कथम् ॥

sarvataḥ prārthyamānena durbalena mahābalaiḥ | ekenaivāsahāyena śakyaṃ sthātuṃ bhavetkatham

जब चारों ओर से बलवान शत्रु उसे दबोचना चाहते हों, तब एक अकेला, असहाय और दुर्बल मनुष्य कैसे टिका रह सकता है?

श्लोक 7 (12.138.7)

कथं मित्रमरिं चापि विन्देत भरतर्षभ । चेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे ॥

kathaṃ mitramariṃ cāpi vindeta bharatarṣabha | ceṣṭitavyaṃ kathaṃ cātra śatrormitrasya cāntare

हे भरतश्रेष्ठ, मनुष्य मित्र और शत्रु को कैसे पहचाने? और शत्रु तथा मित्र के बीच की स्थिति में उसे कैसा आचरण करना चाहिए?

श्लोक 8 (12.138.8)

अजातलक्षणे राजन्नमित्रे मित्रतां गते । कथं नु पुरुषः कुर्यात्कृत्वा किं वा सुखी भवेत् ॥

ajātalakṣaṇe rājannamitre mitratāṃ gate | kathaṃ nu puruṣaḥ kuryātkṛtvā kiṃ vā sukhī bhavet

हे राजन्, जब कोई शत्रु, जिसके लक्षण अभी पहचाने नहीं गए, मित्र बन जाए, तब मनुष्य को क्या करना चाहिए, और क्या करके वह सुखी रहेगा?

श्लोक 9 (12.138.9)

विग्रहं केन वा कुर्यात्संधिं वा केन योजयेत् । कथं वा शत्रुमध्यस्थो वर्तेत बलवानपि ॥

vigrahaṃ kena vā kuryātsaṃdhiṃ vā kena yojayet | kathaṃ vā śatrumadhyastho varteta balavānapi

वह किसके साथ युद्ध करे और किसके साथ सन्धि जोड़े? और शत्रुओं के बीच खड़ा बलवान मनुष्य भी कैसे व्यवहार करे?

श्लोक 10 (12.138.10)

एतद्धै सर्वकृत्यानां परं कृत्यं नराधिप । नैतस्य कश्चिद्वक्ताऽस्ति श्रोता वाऽपि सुदुर्लभः ॥

etaddhai sarvakṛtyānāṃ paraṃ kṛtyaṃ narādhipa | naitasya kaścidvaktā'sti śrotā vā'pi sudurlabhaḥ

हे नरेश्वर, सब कर्तव्यों में यही सबसे बड़ा कर्तव्य है। इस पर बोलने वाला कोई नहीं है, और सुनने वाला भी बहुत दुर्लभ है।

श्लोक 11 (12.138.11)

ऋते पितामहाद्भीष्मात्सत्यसंधाज्जितेन्द्रियात् । तदन्वीक्ष्य महाभाग सर्वमेतद्ब्रवीहि मे ॥

ṛte pitāmahādbhīṣmātsatyasaṃdhājjitendriyāt | tadanvīkṣya mahābhāga sarvametadbravīhi me

सत्य के प्रति दृढ़ और जितेन्द्रिय पितामह भीष्म को छोड़कर और कोई नहीं है। हे महाभाग, इस पर विचार करके मुझे यह सब बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 12 (12.138.12)

त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो युधिष्ठिर गुणोदयः । शृणु मे पुत्र कार्त्स्न्येन गुह्यमापत्सु भारत ॥

tvadyukto'yamanupraśno yudhiṣṭhira guṇodayaḥ | śṛṇu me putra kārtsnyena guhyamāpatsu bhārata

युधिष्ठिर, तुम्हारा यह प्रश्न उचित है और गुणों को बढ़ाने वाला है। हे भारत, पुत्र, विपत्ति के समय के इस गूढ़ विषय को मुझसे पूरा सुनो।

श्लोक 13 (12.138.13)

अमित्रो मित्रतां याति मित्रं चापि प्रदुष्यति । सामर्थ्ययोगात्कार्याणामनित्या हि सदा गतिः ॥

amitro mitratāṃ yāti mitraṃ cāpi praduṣyati | sāmarthyayogātkāryāṇāmanityā hi sadā gatiḥ

शत्रु मित्र बन जाता है और मित्र भी बिगड़ जाता है; क्योंकि सामर्थ्य के योग से कार्यों की गति कभी स्थिर नहीं रहती।

श्लोक 14 (12.138.14)

तस्माद्विश्वसितव्यं च विग्रहं च समाचरेत् । देशं कालं च विज्ञाय कार्याकार्यविनिश्चये ॥

tasmādviśvasitavyaṃ ca vigrahaṃ ca samācaret | deśaṃ kālaṃ ca vijñāya kāryākāryaviniścaye

इसलिए देश और काल को जानकर, क्या करना है और क्या नहीं, इसका निश्चय करते समय कभी विश्वास करना चाहिए और कभी युद्ध।

श्लोक 15 (12.138.15)

संधातव्यं बुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभिः । अमित्रैरपि संधेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत ॥

saṃdhātavyaṃ budhairnityaṃ vyavasya ca hitārthibhiḥ | amitrairapi saṃdheyaṃ prāṇā rakṣyā hi bhārata

अपना हित चाहने वाले बुद्धिमानों को सदा निश्चय करके सन्धि करनी चाहिए; शत्रुओं से भी सन्धि कर लेनी चाहिए, क्योंकि हे भारत, प्राणों की रक्षा करनी ही होती है।

श्लोक 16 (12.138.16)

यो ह्यमित्रैर्नरैर्नित्यं न संदध्यादपण्डितः । न सोर्थं प्राप्नुयात्किंचित्फलान्यपि च भारत ॥

yo hyamitrairnarairnityaṃ na saṃdadhyādapaṇḍitaḥ | na sorthaṃ prāpnuyātkiṃcitphalānyapi ca bhārata

जो अविवेकी मनुष्य शत्रुओं से कभी सन्धि नहीं करता, हे भारत, उसे न कोई प्रयोजन सिद्ध होता है और न कोई फल मिलता है।

श्लोक 17 (12.138.17)

यस्त्वमित्रेण संधत्ते मित्रेण च विरुध्यते । अर्थयुक्तिं समालोक्य सुमहद्विन्दते फलम् ॥

yastvamitreṇa saṃdhatte mitreṇa ca virudhyate | arthayuktiṃ samālokya sumahadvindate phalam

किन्तु जो अपने प्रयोजन की युक्ति को देखकर शत्रु से सन्धि करता है, भले ही मित्र से उसका विरोध हो जाए, वह बहुत बड़ा फल पाता है।

श्लोक 18 (12.138.18)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मार्जारस्य च संवादं न्यग्रोधे मूषिकस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | mārjārasya ca saṃvādaṃ nyagrodhe mūṣikasya ca

इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: एक बरगद के पेड़ पर बिलाव और चूहे का संवाद।

श्लोक 19 (12.138.19)

वने महति कस्मिंश्चिन्न्यग्रोधः सुमहानभूत् । लताजालपरिच्छन्नो नानाद्विजगणायुतः ॥

vane mahati kasmiṃścinnyagrodhaḥ sumahānabhūt | latājālaparicchanno nānādvijagaṇāyutaḥ

किसी विशाल वन में एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था, जो लताओं के जाल से ढका था और अनेक प्रकार के पक्षियों के झुंडों से भरा रहता था।

श्लोक 20 (12.138.20)

स्कन्धवान्मेघसंकाशः शीतच्छायो मनोरमः । अरण्यमभितो जातस्तरुर्व्यालमृगायुतः ॥

skandhavānmeghasaṃkāśaḥ śītacchāyo manoramaḥ | araṇyamabhito jātastarurvyālamṛgāyutaḥ

उसका तना बहुत मोटा था, वह बादल जैसा दिखता था, उसकी छाया शीतल और रूप मनोहर था। वह वन के किनारे खड़ा था और हिंसक पशुओं से भरा रहता था।

श्लोक 21 (12.138.21)

तस्य मूलमुपाश्रित्य कृत्वा शतमुखं बिलम् । वसति स्म महाप्राज्ञः पलितो नाम मूषिकः ॥

tasya mūlamupāśritya kṛtvā śatamukhaṃ bilam | vasati sma mahāprājñaḥ palito nāma mūṣikaḥ

उसकी जड़ के पास सौ द्वारों वाला बिल बनाकर पलित नाम का एक बड़ा बुद्धिमान चूहा रहता था।

श्लोक 22 (12.138.22)

शाखां तस्य समाश्रित्य वसति स्म सुखं तदा । लोमशो नाम मार्जारः सर्वसत्वावसादकः ॥

śākhāṃ tasya samāśritya vasati sma sukhaṃ tadā | lomaśo nāma mārjāraḥ sarvasatvāvasādakaḥ

और उसकी डाली पर लोमश नाम का एक बिलाव सुख से रहता था, जो सब प्राणियों का नाश करने वाला था।

श्लोक 23 (12.138.23)

तत्र त्वागत्य चण्डालो ह्यरण्यकृतकेतनः । युयोज यन्त्रमुन्माथं नित्यमस्तंगते रवौ ॥

tatra tvāgatya caṇḍālo hyaraṇyakṛtaketanaḥ | yuyoja yantramunmāthaṃ nityamastaṃgate ravau

तब वन में अपनी कुटिया बनाकर रहने वाला एक चाण्डाल वहाँ आया और प्रतिदिन सूर्यास्त होने पर वहाँ एक जाल-यन्त्र लगाने लगा।

श्लोक 24 (12.138.24)

तत्र स्नायुमयान्पाशान्यथावत्संविधाय सः । गृहं गत्वा सुखं शेते प्रभातामेति शर्वरीम् ॥

tatra snāyumayānpāśānyathāvatsaṃvidhāya saḥ | gṛhaṃ gatvā sukhaṃ śete prabhātāmeti śarvarīm

वहाँ विधिपूर्वक नसों की बनी फाँसें बिछाकर वह घर जाकर सुख से सोता और रात बीतकर सवेरा होने तक पड़ा रहता।

श्लोक 25 (12.138.25)

तत्र स्म नित्यं बध्यन्ते नक्तं बहुविधा मृगाः । कदाचिदत्र मार्जारः संप्रवृत्तो व्यबध्यत ॥

tatra sma nityaṃ badhyante naktaṃ bahuvidhā mṛgāḥ | kadācidatra mārjāraḥ saṃpravṛtto vyabadhyata

वहाँ प्रतिदिन रात को अनेक प्रकार के पशु फँसते थे। एक दिन वहाँ आया हुआ बिलाव भी फँस गया।

श्लोक 26 (12.138.26)

तस्मिन्बद्धे महाप्राणे शत्रौ नित्याततायिनि । तं कालं पलितो ज्ञात्वा प्रचचार सुनिर्भयः ॥

tasminbaddhe mahāprāṇe śatrau nityātatāyini | taṃ kālaṃ palito jñātvā pracacāra sunirbhayaḥ

जब वह बलवान और सदा प्रहार को तत्पर रहने वाला शत्रु बँध गया, तब पलित उस समय को पहचानकर निडर होकर घूमने लगा।

श्लोक 27 (12.138.27)

तेनानुचरता तस्मिन्वने विश्वस्तचारिणा । भक्ष्यं मृगयमाणेन नचिराद्दृष्टमामिषम् ॥

tenānucaratā tasminvane viśvastacāriṇā | bhakṣyaṃ mṛgayamāṇena nacirāddṛṣṭamāmiṣam

उस वन में विश्वास के साथ घूमते और भोजन खोजते हुए उसने शीघ्र ही माँस का एक टुकड़ा देखा।

श्लोक 28 (12.138.28)

स तमुन्माथमारुह्य तदामिषमभक्षयत् । तस्योपरि सपत्नस्य बद्धस्य मनसा हसन् ॥

sa tamunmāthamāruhya tadāmiṣamabhakṣayat | tasyopari sapatnasya baddhasya manasā hasan

वह उस जाल-यन्त्र पर चढ़कर वह माँस खाने लगा और अपने बँधे हुए शत्रु को, जो उसके नीचे पड़ा था, मन ही मन हँसता रहा।

श्लोक 29 (12.138.29)

आमिषे तु प्रसक्तः स कदाचिदवलोकयन् । अपश्यदपरं घोरमात्मनो रिपुमागतम् ॥

āmiṣe tu prasaktaḥ sa kadācidavalokayan | apaśyadaparaṃ ghoramātmano ripumāgatam

माँस में लगा हुआ वह जब कभी इधर-उधर देख रहा था, तब उसने अपने एक और भयंकर शत्रु को आते देखा।

श्लोक 30 (12.138.30)

शरप्रसूनसंकाशं महीविवरशायिनम् । नकुलं हरिकं नाम चपलं ताम्रलोचनम् ॥

śaraprasūnasaṃkāśaṃ mahīvivaraśāyinam | nakulaṃ harikaṃ nāma capalaṃ tāmralocanam

वह हरिक नाम का नेवला था, जो सरकण्डे के फूल जैसे रंग का था, धरती के बिल में रहता था, चंचल था और जिसकी आँखें ताँबे जैसी लाल थीं।

श्लोक 31 (12.138.31)

तेन मूषिकगन्धेन त्वरमाण उपागतम् । भक्ष्यार्थं लेलिहन्वक्रं भूमावूर्ध्वमुखः स्थितः ॥

tena mūṣikagandhena tvaramāṇa upāgatam | bhakṣyārthaṃ lelihanvakraṃ bhūmāvūrdhvamukhaḥ sthitaḥ

चूहे की गन्ध से खिंचकर वह उतावली से पास आ गया था और भोजन के लिए अपने जबड़े चाटता हुआ, मुँह ऊपर उठाए, धरती पर खड़ा था।

श्लोक 32 (12.138.32)

शाखागतमरिं चान्यमपश्यत्कोटरालयम् । उलूकं चन्द्रकं नाम वक्रतुण्डं दुरासदम् ॥

śākhāgatamariṃ cānyamapaśyatkoṭarālayam | ulūkaṃ candrakaṃ nāma vakratuṇḍaṃ durāsadam

और डाली पर उसने एक और शत्रु को देखा, जो कोटर में रहता था: चन्द्रक नाम का उल्लू, जिसकी चोंच टेढ़ी थी और जिसका सामना करना कठिन था।

श्लोक 33 (12.138.33)

गतस्य विषयं तस्य नकुलोलूकयोस्तथा । यथास्यासीदियं चिन्ता तत्प्राप्तस्य महद्भयम् ॥

gatasya viṣayaṃ tasya nakulolūkayostathā | yathāsyāsīdiyaṃ cintā tatprāptasya mahadbhayam

नेवले और उल्लू दोनों की पहुँच में आ जाने पर, जब उस पर भारी भय आ पड़ा, तब उसके मन में यह विचार उठा:

श्लोक 34 (12.138.34)

आपद्यस्यां सुकष्टायां मरणे समुपस्थिते । समन्ताद्भय उत्पन्ने कथं कार्यं मनीषिणा ॥

āpadyasyāṃ sukaṣṭāyāṃ maraṇe samupasthite | samantādbhaya utpanne kathaṃ kāryaṃ manīṣiṇā

जब यह घोर विपत्ति आ पड़ी है, मृत्यु सामने खड़ी है और चारों ओर से भय उठ खड़ा हुआ है, तब विचारशील प्राणी को क्या करना चाहिए?

श्लोक 35 (12.138.35)

तथा सर्वतो रुद्धः सर्वत्र भयकर्शितः । भवद्भयसंत्रस्तश्चक्रे च परमां मतिम् ॥

tathā sarvato ruddhaḥ sarvatra bhayakarśitaḥ | bhavadbhayasaṃtrastaścakre ca paramāṃ matim

इस प्रकार चारों ओर से घिरा हुआ, सब ओर भय से पीड़ित और बढ़ते भय से घबराया हुआ वह एक श्रेष्ठ निश्चय पर पहुँचा।

श्लोक 36 (12.138.36)

आपद्विनाशभूयिष्ठं शङ्कनीयं हि जीवितम् । समन्तात्संशयः सोऽयं तस्मादापदुपस्थिता ॥

āpadvināśabhūyiṣṭhaṃ śaṅkanīyaṃ hi jīvitam | samantātsaṃśayaḥ so'yaṃ tasmādāpadupasthitā

जीवन विपत्ति से होने वाले विनाश से भरा है और सदा शंका के योग्य है; यह संशय चारों ओर से घेरे रहता है, इसी कारण अब यह विपत्ति मुझ पर आ पड़ी है।

श्लोक 37 (12.138.37)

गतं हि सहसा भूमिं नकुलो मामवाप्नुयात् । उलूकश्चेह तिष्ठन्तं मार्जारः पाशसंक्षयात् ॥

gataṃ hi sahasā bhūmiṃ nakulo māmavāpnuyāt | ulūkaśceha tiṣṭhantaṃ mārjāraḥ pāśasaṃkṣayāt

यदि मैं अचानक धरती पर जाऊँ तो नेवला मुझे पकड़ लेगा; यहाँ रहूँ तो उल्लू; और फाँसों के कट जाने पर बिलाव।

श्लोक 38 (12.138.38)

न त्वेवास्मद्विधः प्राज्ञः संमोहं गन्तुमर्हति । करिष्ये जीविते यत्नं यावदुच्छ्वासनिग्रहात् ॥

na tvevāsmadvidhaḥ prājñaḥ saṃmohaṃ gantumarhati | kariṣye jīvite yatnaṃ yāvaducchvāsanigrahāt

किन्तु मेरे जैसे बुद्धिमान को घबराहट में नहीं पड़ना चाहिए। जब तक साँस रोके रखने की शक्ति है, मैं प्राण बचाने का यत्न करूँगा।

श्लोक 39 (12.138.39)

न हि बुद्ध्याऽन्वितः प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः । निमज्जत्यापदं प्राप्य महतोऽर्थानवाप्य ह ॥

na hi buddhyā'nvitaḥ prājño nītiśāstraviśāradaḥ | nimajjatyāpadaṃ prāpya mahato'rthānavāpya ha

बुद्धि से युक्त, नीतिशास्त्र में निपुण विवेकी पुरुष विपत्ति आने पर डूब नहीं जाता, चाहे उसने बड़े-बड़े प्रयोजन सिद्ध कर लिए हों।

श्लोक 40 (12.138.40)

न त्वन्यामिह मार्जाराद्गतिं पश्यामि सांप्रतम् । विषमस्थो ह्ययं शत्रुः कृत्यं चास्य महन्मया ॥

na tvanyāmiha mārjārādgatiṃ paśyāmi sāṃpratam | viṣamastho hyayaṃ śatruḥ kṛtyaṃ cāsya mahanmayā

इस समय मुझे इस बिलाव को छोड़कर और कोई उपाय नहीं दीखता। यह शत्रु संकट में पड़ा है और इसे मुझसे बड़ा काम है।

श्लोक 41 (12.138.41)

जीवितार्थी कथं त्वद्य शत्रुभिः प्रार्थितस्त्रिभिः । प्राणहेतोरिमं मित्रं मार्जारं संश्रयामि वै ॥

jīvitārthī kathaṃ tvadya śatrubhiḥ prārthitastribhiḥ | prāṇahetorimaṃ mitraṃ mārjāraṃ saṃśrayāmi vai

आज तीन शत्रु मेरे पीछे पड़े हैं, और मैं जीना चाहता हूँ; तब मैं कैसे बचूँगा? प्राणों के लिए मैं इस बिलाव को मित्र मानकर इसकी शरण लूँगा।

श्लोक 42 (12.138.42)

नीतिशास्त्रं समाश्रित्य हितमस्योपवर्णये । येनेमं शत्रुसंघातं मतिपूर्वेण वञ्चये ॥

nītiśāstraṃ samāśritya hitamasyopavarṇaye | yenemaṃ śatrusaṃghātaṃ matipūrveṇa vañcaye

नीतिशास्त्र का आश्रय लेकर मैं इसका भी हित सोचता हूँ, जिससे सोच-समझकर मैं शत्रुओं के इस दल को चकमा दे सकूँ।

श्लोक 43 (12.138.43)

अयमत्यन्तशत्रुर्मे वैषम्यं परमं गतः । मूढो ग्राहयितुं स्वार्थं संगत्या यदि शक्यते ॥

ayamatyantaśatrurme vaiṣamyaṃ paramaṃ gataḥ | mūḍho grāhayituṃ svārthaṃ saṃgatyā yadi śakyate

यह मेरा घोर शत्रु अब बड़ी विपत्ति में पड़ा है। यदि इस मूढ़ को सन्धि के द्वारा अपना स्वार्थ समझाया जा सके...

श्लोक 44 (12.138.44)

कदाचिद्व्यसनं प्राप्य संधिं कुर्यान्मया सह ॥

kadācidvyasanaṃ prāpya saṃdhiṃ kuryānmayā saha

सम्भव है कि विपत्ति में पड़कर वह मेरे साथ सन्धि कर ले।

श्लोक 45 (12.138.45)

बलिना सन्निकृष्टस्य शत्रोरपि परिग्रहः । कार्य इत्याहुराचार्या विषमे जीवितार्थिना ॥

balinā sannikṛṣṭasya śatrorapi parigrahaḥ | kārya ityāhurācāryā viṣame jīvitārthinā

आचार्य कहते हैं कि संकट में पड़ा जो मनुष्य जीना चाहता है, उसे अपने पास के बलवान शत्रु को भी अपना लेना चाहिए।

श्लोक 46 (12.138.46)

श्रेष्ठो हि पण्डितः शत्रुर्न च मित्रमपण्डितः । अमित्रे खलु मार्जारे जीवितं संप्रतिष्ठितम् ॥

śreṣṭho hi paṇḍitaḥ śatrurna ca mitramapaṇḍitaḥ | amitre khalu mārjāre jīvitaṃ saṃpratiṣṭhitam

बुद्धिमान शत्रु अच्छा है, पर मूर्ख मित्र नहीं; और अभी मेरा जीवन इसी बिलाव पर टिका है, जो मेरा मित्र नहीं है।

श्लोक 47 (12.138.47)

ततोऽस्मै संप्रवक्ष्यामि हेतुमात्माभिरक्षणे । अपीदानीमयं शत्रुः संगत्या पण्डितो भवेत् ॥

tato'smai saṃpravakṣyāmi hetumātmābhirakṣaṇe | apīdānīmayaṃ śatruḥ saṃgatyā paṇḍito bhavet

इसलिए मैं इसे आत्मरक्षा का कारण बताऊँगा; सम्भव है इस मेल से यह शत्रु समझदार हो जाए।

श्लोक 48 (12.138.48)

एवं विचिन्तयामास मूषिकः शत्रुचेष्टितम् ॥

evaṃ vicintayāmāsa mūṣikaḥ śatruceṣṭitam

इस प्रकार चूहे ने अपने शत्रु के व्यवहार पर विचार किया।

श्लोक 49 (12.138.49)

ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः संधिविग्रहकालवित् । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं मार्जारं मूषिकोऽब्रवीत् ॥

tato'rthagatitattvajñaḥ saṃdhivigrahakālavit | sāntvapūrvamidaṃ vākyaṃ mārjāraṃ mūṣiko'bravīt

तब प्रयोजन के तत्त्व को जानने वाले और सन्धि तथा विग्रह के समय को पहचानने वाले चूहे ने पहले मीठी बातों से बिलाव से ये वचन कहे।

पलित उवाच

श्लोक 50 (12.138.50)

सौहृदेनाभिभाषे त्वां कच्चिन्मार्जार जीवसे । जीवितं हि तवेच्छामि श्रेयः साधारणं हि नौ ॥

sauhṛdenābhibhāṣe tvāṃ kaccinmārjāra jīvase | jīvitaṃ hi tavecchāmi śreyaḥ sādhāraṇaṃ hi nau

मैं मित्रभाव से तुमसे बोलता हूँ: बिलाव, तुम जीवित तो हो? मैं तुम्हारा जीवन चाहता हूँ, क्योंकि हम दोनों का कल्याण एक ही है।

श्लोक 51 (12.138.51)

न ते सौम्य भयं कार्यं जीविष्यसि यथा पुरा । अहं त्वामुद्धरिष्यामि प्राणाञ्जह्यां हि ते कृते ॥

na te saumya bhayaṃ kāryaṃ jīviṣyasi yathā purā | ahaṃ tvāmuddhariṣyāmi prāṇāñjahyāṃ hi te kṛte

हे सौम्य, डरो मत; तुम पहले की तरह जीओगे। मैं तुम्हें इससे निकाल लूँगा, और तुम्हारे लिए अपने प्राण भी दे दूँगा।

श्लोक 52 (12.138.52)

अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र पुष्कल प्रतिभाति मे । येन शक्यस्त्वया मोक्षः प्राप्तुं श्रेयस्तथा मया ॥

asti kaścidupāyo'tra puṣkala pratibhāti me | yena śakyastvayā mokṣaḥ prāptuṃ śreyastathā mayā

मुझे यहाँ एक पूरा उपाय सूझता है, जिससे तुम भी छूट सकते हो और मैं भी अपना कल्याण पा सकता हूँ।

श्लोक 53 (12.138.53)

मयाऽप्युपायो दृष्टोऽयं विचार्य मतिमात्मनः । आत्मार्थं च त्वदर्थं च श्रेयः साधारणं हि नौ ॥

mayā'pyupāyo dṛṣṭo'yaṃ vicārya matimātmanaḥ | ātmārthaṃ ca tvadarthaṃ ca śreyaḥ sādhāraṇaṃ hi nau

मैंने अपनी बुद्धि से विचार करके यह उपाय देखा है। यह मेरे भी काम का है और तुम्हारे भी; क्योंकि हम दोनों का कल्याण साझा है।

श्लोक 54 (12.138.54)

इदं हि नकुलोलूकं पापबुद्ध्या हि संस्थितम् । न धर्षयति मार्जार तेन ते स्वस्ति सांप्रतम् ॥

idaṃ hi nakulolūkaṃ pāpabuddhyā hi saṃsthitam | na dharṣayati mārjāra tena te svasti sāṃpratam

यह नेवला और उल्लू बुरी नीयत से यहाँ खड़े हैं, फिर भी हे बिलाव, वे तुम पर आक्रमण नहीं करते; इसीलिए इस समय तुम सुरक्षित हो।

श्लोक 55 (12.138.55)

कूजंश्चपलनेत्रोऽयं कौशिको मां निरीक्षते । नगशाखाग्रगः पापस्तस्याहं भृशमुद्विजे ॥

kūjaṃścapalanetro'yaṃ kauśiko māṃ nirīkṣate | nagaśākhāgragaḥ pāpastasyāhaṃ bhṛśamudvije

वह पापी उल्लू डाली के सिरे पर बैठा, आवाज करता और चंचल आँखों से मुझे ताक रहा है; मैं उससे बहुत डरता हूँ।

श्लोक 56 (12.138.56)

सतां साप्तपदं मैत्रं स सखा मेऽसि पण्डितः । साहाय्यकं करिष्यामि नास्ति ते प्राणतो भयम् ॥

satāṃ sāptapadaṃ maitraṃ sa sakhā me'si paṇḍitaḥ | sāhāyyakaṃ kariṣyāmi nāsti te prāṇato bhayam

सज्जनों की मित्रता सात पग साथ चलने से बन जाती है; तुम मेरे मित्र हो और बुद्धिमान हो। मैं तुम्हारी सहायता करूँगा; मेरी ओर से तुम्हें प्राणों का कोई भय नहीं है।

श्लोक 57 (12.138.57)

न हि शक्तोऽसि मार्जार पाशं छेत्तुं मया विना । अहं छेत्स्यामि पाशांस्ते यदि मां त्वं न हिंससि ॥

na hi śakto'si mārjāra pāśaṃ chettuṃ mayā vinā | ahaṃ chetsyāmi pāśāṃste yadi māṃ tvaṃ na hiṃsasi

हे बिलाव, मेरे बिना तुम फाँस नहीं काट सकते। यदि तुम मुझे नहीं मारोगे तो मैं तुम्हारी फाँसें काट दूँगा।

श्लोक 58 (12.138.58)

त्वमाश्रितो द्रुमस्याग्रं मूलं त्वहमुपाश्रितः । चिरोषितावुभावावां वृक्षेऽस्मिन्विदितं च ते ॥

tvamāśrito drumasyāgraṃ mūlaṃ tvahamupāśritaḥ | ciroṣitāvubhāvāvāṃ vṛkṣe'sminviditaṃ ca te

तुम पेड़ की चोटी पर रहते हो और मैं उसकी जड़ में; हम दोनों इस पेड़ पर बहुत समय से रह रहे हैं, यह तुम जानते ही हो।

श्लोक 59 (12.138.59)

यस्मिन्नाश्वासते कश्चिद्यश्च नाश्वसिति क्वचित् । न तौ धीराः प्रशंसन्ति नित्यमुद्विग्नमानसौ ॥

yasminnāśvāsate kaścidyaśca nāśvasiti kvacit | na tau dhīrāḥ praśaṃsanti nityamudvignamānasau

धीर पुरुष न उसकी प्रशंसा करते हैं जिस पर कोई विश्वास नहीं करता, न उसकी जो कहीं किसी पर विश्वास नहीं करता; ऐसे दोनों का मन सदा उद्विग्न रहता है।

श्लोक 60 (12.138.60)

तस्माद्विवर्धतां प्रीतिर्नित्यं संगतमस्तु नौ । कालातीतमिहार्थं हि न प्रशंसन्ति पण्डिताः ॥

tasmādvivardhatāṃ prītirnityaṃ saṃgatamastu nau | kālātītamihārthaṃ hi na praśaṃsanti paṇḍitāḥ

इसलिए हमारी प्रीति बढ़े और हमारा मेल सदा बना रहे। जो काम अपने समय से निकल चुका हो, उसकी विद्वान प्रशंसा नहीं करते।

श्लोक 61 (12.138.61)

अर्थयुक्तिमिमां तत्र यथाभूतां निशामय । तव जीवितमिच्छामि त्वं ममेच्छसि जीवितम् ॥

arthayuktimimāṃ tatra yathābhūtāṃ niśāmaya | tava jīvitamicchāmi tvaṃ mamecchasi jīvitam

अब यह हित की युक्ति जैसी है वैसी सुनो: मैं तुम्हारा जीवन चाहता हूँ और तुम मेरा जीवन चाहते हो।

श्लोक 62 (12.138.62)

कश्चित्तरति काष्ठेन सुगम्भीरां महानदीम् । स तारयति तत्काष्ठं स च काष्ठेन तार्यते ॥

kaścittarati kāṣṭhena sugambhīrāṃ mahānadīm | sa tārayati tatkāṣṭhaṃ sa ca kāṣṭhena tāryate

कोई मनुष्य लकड़ी के सहारे बहुत गहरी बड़ी नदी पार करता है; वह लकड़ी को पार कराता है और लकड़ी उसे पार कराती है।

श्लोक 63 (12.138.63)

ईदृशो नौ क्रियायोगो भविष्यति सुविस्तरः । अहं त्वां तारयिष्यामि मां च त्वं तारयिष्यसि ॥

īdṛśo nau kriyāyogo bhaviṣyati suvistaraḥ | ahaṃ tvāṃ tārayiṣyāmi māṃ ca tvaṃ tārayiṣyasi

हम दोनों का ऐसा ही दूर तक चलने वाला सहयोग होगा: मैं तुम्हें पार उतारूँगा और तुम मुझे पार उतारोगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 64 (12.138.64)

एवमुक्त्वा तु पलितस्तमर्थमुभयोर्हितम् । हेतुमद्ग्रहणीयं च कालापेक्षी व्यतिष्ठत ॥

evamuktvā tu palitastamarthamubhayorhitam | hetumadgrahaṇīyaṃ ca kālāpekṣī vyatiṣṭhata

दोनों के हित की, युक्तियुक्त और ग्रहण करने योग्य यह बात कहकर पलित उचित समय की प्रतीक्षा करता हुआ ठहर गया।

श्लोक 65 (12.138.65)

अथ सुव्याहृतं श्रुत्वा तस्य शत्रोर्विचक्षणः । हेतुमद्ग्रहणीयार्थं मार्जारो वाक्यमब्रवीत् ॥

atha suvyāhṛtaṃ śrutvā tasya śatrorvicakṣaṇaḥ | hetumadgrahaṇīyārthaṃ mārjāro vākyamabravīt

तब उस चतुर बिलाव ने अपने शत्रु के सुन्दर ढंग से कहे हुए, युक्तियुक्त और मानने योग्य वचन सुनकर उत्तर दिया।

श्लोक 66 (12.138.66)

बुद्धिमान्वाक्यसंपन्नस्तद्वाक्यमनुवर्तयन् । स्वामवस्थां प्रतीक्ष्यैनं साम्नैव प्रत्यपूजयत् ॥

buddhimānvākyasaṃpannastadvākyamanuvartayan | svāmavasthāṃ pratīkṣyainaṃ sāmnaiva pratyapūjayat

बुद्धिमान और वाक्पटु बिलाव ने उसकी बात को मानते हुए, अपनी दशा को देखकर, मीठे शब्दों से ही उसका सत्कार किया।

श्लोक 67 (12.138.67)

ततस्तीक्ष्णाग्रदशनो मणिवैदूर्यलोचनः । मूषिकं मन्दमुद्वीक्ष्य मार्जारो लोमशोऽब्रवीत् ॥

tatastīkṣṇāgradaśano maṇivaidūryalocanaḥ | mūṣikaṃ mandamudvīkṣya mārjāro lomaśo'bravīt

तब तीखी नोकों वाले दाँतों और वैदूर्य मणि जैसी आँखों वाले बिलाव लोमश ने चूहे की ओर कोमलता से देखकर कहा:

लोमश उवाच

श्लोक 68 (12.138.68)

नन्दामि सौम्य भद्रं ते यो मां जीवितुमिच्छसि । श्रेयश्च यदि जानीषे क्रियतां मा विचारय ॥

nandāmi saumya bhadraṃ te yo māṃ jīvitumicchasi | śreyaśca yadi jānīṣe kriyatāṃ mā vicāraya

हे सौम्य, मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो, क्योंकि तुम मुझे जीवित देखना चाहते हो। यदि तुम हित का उपाय जानते हो तो उसे करो, विचार मत करो।

श्लोक 69 (12.138.69)

अहं हि भृशमापन्नस्त्वमापन्नतरो मया । द्वयोरापन्नयोः सन्धिः क्रियतां मा चिराय च ॥

ahaṃ hi bhṛśamāpannastvamāpannataro mayā | dvayorāpannayoḥ sandhiḥ kriyatāṃ mā cirāya ca

मैं बड़ी विपत्ति में हूँ, पर तुम मुझसे भी अधिक विपत्ति में हो। विपत्ति में पड़े हम दोनों के बीच सन्धि हो जाए; देर मत करो।

श्लोक 70 (12.138.70)

विधत्स्व प्राप्तकालं यत्कार्थं सिध्यतु चावयोः । मयि कृच्छ्राद्विनिर्मुक्ते न विनङ्क्ष्यति ते कृतम् ॥

vidhatsva prāptakālaṃ yatkārthaṃ sidhyatu cāvayoḥ | mayi kṛcchrādvinirmukte na vinaṅkṣyati te kṛtam

जो इस समय करना उचित है वही करो, जिससे हम दोनों का काम सिद्ध हो। जब मैं इस संकट से छूट जाऊँगा तब तुम्हारा किया हुआ व्यर्थ नहीं जाएगा।

श्लोक 71 (12.138.71)

न्यस्तमानोस्मि भक्तोस्मि शिष्यस्त्वद्धितकृत्तथा । तथा निदेशवर्ती च भवन्तं शरणं गतः ॥

nyastamānosmi bhaktosmi śiṣyastvaddhitakṛttathā | tathā nideśavartī ca bhavantaṃ śaraṇaṃ gataḥ

मैंने अभिमान छोड़ दिया है; मैं तुम्हारा भक्त और शिष्य हूँ, तुम्हारा हित करने वाला हूँ, तुम्हारी आज्ञा में चलने वाला हूँ, और तुम्हारी शरण में आया हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 72 (12.138.72)

इत्येवमुक्तः पलितो मार्जारं वशमागतम् । वाक्यं हितमुवाचेदमभिजातार्थमर्थवित् ॥

ityevamuktaḥ palito mārjāraṃ vaśamāgatam | vākyaṃ hitamuvācedamabhijātārthamarthavit

ऐसा कहे जाने पर प्रयोजन को समझने वाले पलित ने अपने वश में आए हुए बिलाव से ये हितकारी और उत्तम अर्थ वाले वचन कहे।

पलित उवाच

श्लोक 73 (12.138.73)

उदारं यद्भवानाह नैतच्चित्रं भवद्विधे । विहितो यस्तु मार्गो मे हितार्थं शृणु तं मम ॥

udāraṃ yadbhavānāha naitaccitraṃ bhavadvidhe | vihito yastu mārgo me hitārthaṃ śṛṇu taṃ mama

तुमने जो कहा वह उदार है, और तुम्हारे जैसे के लिए यह आश्चर्य की बात नहीं। अब मैंने हित के लिए जो मार्ग सोचा है, उसे मुझसे सुनो।

श्लोक 74 (12.138.74)

अहं त्वाऽनुप्रवेक्ष्यामि नकुलान्मे महद्भयम् । त्रायस्व मां मा वधीश्च शक्तोऽस्मि तव रक्षणे ॥

ahaṃ tvā'nupravekṣyāmi nakulānme mahadbhayam | trāyasva māṃ mā vadhīśca śakto'smi tava rakṣaṇe

मैं तुम्हारे नीचे घुस जाऊँगा, क्योंकि मुझे नेवले से बड़ा भय है। मेरी रक्षा करो, मुझे मत मारना; मैं तुम्हें छुड़ाने में समर्थ हूँ।

श्लोक 75 (12.138.75)

उलूकाच्चैव मां रक्ष क्षुद्रः प्रार्थयते हि माम् । अहं छेत्स्यामि ते पाशान्सखे सत्येन ते शपे ॥

ulūkāccaiva māṃ rakṣa kṣudraḥ prārthayate hi mām | ahaṃ chetsyāmi te pāśānsakhe satyena te śape

और उल्लू से भी मेरी रक्षा करना, क्योंकि वह नीच मुझे खाना चाहता है। मित्र, मैं तुम्हारी फाँसें काट दूँगा; मैं तुम्हें सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 76 (12.138.76)

तद्वचः संगतं श्रुत्वा लोमशो युक्तमर्थवत् । हर्षादुद्वीक्ष्य पलितं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥

tadvacaḥ saṃgataṃ śrutvā lomaśo yuktamarthavat | harṣādudvīkṣya palitaṃ svāgatenābhyapūjayat

उन उचित और अर्थपूर्ण वचनों को सुनकर लोमश ने हर्ष से पलित की ओर देखा और स्वागत-वचनों से उसका सत्कार किया।

श्लोक 77 (12.138.77)

तं संपूज्याथ पलितं मार्जारः सौहृदे स्थितम् । स विचिन्त्याब्रवीद्धीरः प्रीतस्त्वरित एव च ॥

taṃ saṃpūjyātha palitaṃ mārjāraḥ sauhṛde sthitam | sa vicintyābravīddhīraḥ prītastvarita eva ca

मित्रता में दृढ़ पलित का सत्कार करके धीर बिलाव ने प्रसन्न और उतावला होकर विचार किया और कहा:

लोमश उवाच

श्लोक 78 (12.138.78)

क्षिप्रमागच्छ भद्रं ते त्वं मे प्राणसमः सखा । तव प्राज्ञप्रसादाद्धि प्रियं प्राप्स्यामि जीवितम् ॥

kṣipramāgaccha bhadraṃ te tvaṃ me prāṇasamaḥ sakhā | tava prājñaprasādāddhi priyaṃ prāpsyāmi jīvitam

शीघ्र आओ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम मेरे प्राणों के समान मित्र हो। हे बुद्धिमान, तुम्हारी कृपा से मैं शीघ्र ही अपना प्रिय जीवन पा लूँगा।

श्लोक 79 (12.138.79)

यद्यदेवंगतेनाद्य शक्यं कर्तुं मया तव । तदाज्ञापय कर्तास्मि सिद्धिरेवास्तु नौ सखे ॥

yadyadevaṃgatenādya śakyaṃ kartuṃ mayā tava | tadājñāpaya kartāsmi siddhirevāstu nau sakhe

आज इस दशा में मैं तुम्हारे लिए जो कुछ कर सकता हूँ, उसकी आज्ञा दो, मैं उसे करूँगा। मित्र, हमारी सिद्धि हो।

श्लोक 80 (12.138.80)

अस्मात्ते संशयान्मुक्तः समित्रगणबान्धवः । सर्वकार्याणि कर्ताऽहं प्रियाणि च हितानि च ॥

asmātte saṃśayānmuktaḥ samitragaṇabāndhavaḥ | sarvakāryāṇi kartā'haṃ priyāṇi ca hitāni ca

इस संकट से छूटकर मैं अपने मित्रों और बन्धुओं के साथ तुम्हारे सब प्रिय और हितकारी कार्य करूँगा।

श्लोक 81 (12.138.81)

मुक्तश्च व्यसनादस्मात्सौम्याहमपि नाम ते । प्रीतिमुत्पादयेयं च प्रतिकर्तुं च शक्नुयाम् ॥

muktaśca vyasanādasmātsaumyāhamapi nāma te | prītimutpādayeyaṃ ca pratikartuṃ ca śaknuyām

हे सौम्य, इस विपत्ति से छूटकर मैं भी तुम्हें आनन्द दे सकूँ और तुम्हारे उपकार का बदला चुका सकूँ।

श्लोक 82 (12.138.82)

प्रत्युपकुर्वन्बह्वपि न भाति पूर्वोपकारिणा तुल्यः । एकः करोति हि कृते निष्कारणमेव कुरुतेऽन्यः ॥

pratyupakurvanbahvapi na bhāti pūrvopakāriṇā tulyaḥ | ekaḥ karoti hi kṛte niṣkāraṇameva kurute'nyaḥ

उपकार का बदला चुकाने वाला चाहे बहुत करे, पहले उपकार करने वाले के समान शोभा नहीं पाता: एक तो किए हुए उपकार के बदले करता है, दूसरा बिना किसी कारण के ही करता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 83 (12.138.83)

एवमाश्वासितो विद्वान्मार्जारेण स मूषिकः । प्रविवेश सुविस्रब्धः सम्यगङ्गीचकार ह ॥

evamāśvāsito vidvānmārjāreṇa sa mūṣikaḥ | praviveśa suvisrabdhaḥ samyagaṅgīcakāra ha

बिलाव से इस प्रकार आश्वासन पाकर विद्वान चूहा पूरी तरह निश्शंक होकर भीतर घुस गया और उसने उस व्यवस्था को भलीभाँति स्वीकार कर लिया।

श्लोक 84 (12.138.84)

ग्राहयित्वा तु तं स्वार्थं मार्जारं मूषिकस्तथा । मार्जारोरसि विस्रब्धः सुष्वाप पितृमातृवत् ॥

grāhayitvā tu taṃ svārthaṃ mārjāraṃ mūṣikastathā | mārjārorasi visrabdhaḥ suṣvāpa pitṛmātṛvat

बिलाव से अपनी बात मनवाकर चूहा विश्वास के साथ बिलाव की छाती पर माता-पिता की गोद में सोए बच्चे की तरह सो गया।

श्लोक 85 (12.138.85)

निलीनं तस्य गात्रेषु मार्जारस्याथ मूषिकम् । दृष्ट्वा तौ नकुलोलूकौ निराशौ प्रत्यपद्यताम् ॥

nilīnaṃ tasya gātreṣu mārjārasyātha mūṣikam | dṛṣṭvā tau nakulolūkau nirāśau pratyapadyatām

बिलाव के अंगों से सटे हुए चूहे को देखकर नेवला और उल्लू दोनों निराश हो गए।

श्लोक 86 (12.138.86)

तथैव तौ सुसंत्रस्तौ दृढमागततन्द्रितौ । दृष्ट्वा तयोः परां प्रीतिं विस्मयं परमं गतौ ॥

tathaiva tau susaṃtrastau dṛḍhamāgatatandritau | dṛṣṭvā tayoḥ parāṃ prītiṃ vismayaṃ paramaṃ gatau

इसी प्रकार वे दोनों बहुत डरे हुए और थककर चूर होकर उन दोनों का परम प्रेम देखकर अत्यन्त विस्मय में पड़ गए।

श्लोक 87 (12.138.87)

बलिनौ मतिमन्तौ च सुवृत्तौ चाप्युपासितौ । अशक्तौ तु नयात्तस्मात्संप्रधर्षयितुं बलात् ॥

balinau matimantau ca suvṛttau cāpyupāsitau | aśaktau tu nayāttasmātsaṃpradharṣayituṃ balāt

बलवान, बुद्धिमान और सदाचारी तथा पास ही प्रतीक्षा करते हुए वे दोनों भी उस नीति के कारण बलपूर्वक उन्हें दबा न सके।

श्लोक 88 (12.138.88)

कार्यार्थं कृतसंधी तौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ । उलूकनकुलौ तूर्णं जग्मतुस्तौ स्वमालयम् ॥

kāryārthaṃ kṛtasaṃdhī tau dṛṣṭvā mārjāramūṣikau | ulūkanakulau tūrṇaṃ jagmatustau svamālayam

बिलाव और चूहे को अपने प्रयोजन के लिए सन्धि किए देखकर उल्लू और नेवला शीघ्र ही अपने-अपने घर चले गए।

श्लोक 89 (12.138.89)

लीनः स तस्य गात्रेषु पलितो देशकालवित् । चिच्छेद पाशान्नृपते कालाकाङ्क्षी शनैः शनैः ॥

līnaḥ sa tasya gātreṣu palito deśakālavit | ciccheda pāśānnṛpate kālākāṅkṣī śanaiḥ śanaiḥ

बिलाव के अंगों में छिपे हुए, देश और काल को जानने वाले पलित ने, हे राजन्, उचित समय की प्रतीक्षा करते हुए धीरे-धीरे फाँसें कुतरीं।

श्लोक 90 (12.138.90)

अथ बन्धपरिक्लिष्टो मार्जारो वीक्ष्य मूषिकम् । छिन्दन्तं वै तदा पाशानत्वरन्तं त्वरान्वितः ॥

atha bandhaparikliṣṭo mārjāro vīkṣya mūṣikam | chindantaṃ vai tadā pāśānatvarantaṃ tvarānvitaḥ

तब बन्धन से पीड़ित बिलाव ने देखा कि चूहा फाँसें तो काट रहा है पर जल्दी नहीं कर रहा, और वह स्वयं उतावला हो उठा...

श्लोक 91 (12.138.91)

तमत्वरन्तं पलितं पाशानां छेदने तदा । संचोदयितुमारेभे मार्जारो मूषिकं ततः ॥

tamatvarantaṃ palitaṃ pāśānāṃ chedane tadā | saṃcodayitumārebhe mārjāro mūṣikaṃ tataḥ

...और फाँसें काटने में जल्दी न करने वाले पलित को उकसाने लगा।

लोमश उवाच

श्लोक 92 (12.138.92)

किं सौम्य नातित्वरसे किं कृतार्थोऽवमन्यसे । छिन्धि पाशानमित्रघ्न पुरा श्वपच एति सः ॥

kiṃ saumya nātitvarase kiṃ kṛtārtho'vamanyase | chindhi pāśānamitraghna purā śvapaca eti saḥ

हे मित्र, तुम जल्दी क्यों नहीं करते? क्या अपना काम बन जाने पर मेरी उपेक्षा कर रहे हो? हे शत्रुनाशक, फाँसें काटो; वह श्वपच अभी आ पहुँचेगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 93 (12.138.93)

इत्युक्तस्त्वरताऽनेन मतिमान्पलितोऽब्रवीत् । मार्जारमकृतप्रज्ञं तथ्यमात्महितं वचः ॥

ityuktastvaratā'nena matimānpalito'bravīt | mārjāramakṛtaprajñaṃ tathyamātmahitaṃ vacaḥ

जल्दबाज बिलाव के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान पलित ने उस नासमझ से सच्ची और अपने हित की बात कही।

पलित उवाच

श्लोक 94 (12.138.94)

तूष्णीं भव न ते सौम्य त्वरा कार्या न संभ्रमः । वयमेवात्र कालज्ञा न कालः परिहास्यते ॥

tūṣṇīṃ bhava na te saumya tvarā kāryā na saṃbhramaḥ | vayamevātra kālajñā na kālaḥ parihāsyate

हे सौम्य, चुप रहो; तुम्हें न जल्दी करनी है, न घबराना है। यहाँ समय को हम ही जानते हैं, और समय हाथ से जाएगा नहीं।

श्लोक 95 (12.138.95)

अकाले कृत्यमारब्धं कर्तुर्नार्थाय कल्पते । तदेव काल आरब्धं महतेऽर्थाय कल्पते ॥

akāle kṛtyamārabdhaṃ karturnārthāya kalpate | tadeva kāla ārabdhaṃ mahate'rthāya kalpate

बेसमय आरम्भ किया हुआ काम करने वाले के लाभ का नहीं होता, पर वही काम ठीक समय पर आरम्भ किया जाए तो बड़े लाभ का होता है।

श्लोक 96 (12.138.96)

अकाले विप्रमुक्तान्मे त्वत्त एव भयं भवेत् । तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व किमिति त्वरसे सखे ॥

akāle vipramuktānme tvatta eva bhayaṃ bhavet | tasmātkālaṃ pratīkṣasva kimiti tvarase sakhe

यदि मैं बेसमय छूट गया तो मुझे तुम्हीं से भय हो सकता है। इसलिए समय की प्रतीक्षा करो; मित्र, इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो?

श्लोक 97 (12.138.97)

यावत्पश्यामि चण्डालमायान्तं शस्त्रपाणिनम् । ततश्छेत्स्यामि ते पाशान्प्राप्ते साधारणे भये ॥

yāvatpaśyāmi caṇḍālamāyāntaṃ śastrapāṇinam | tataśchetsyāmi te pāśānprāpte sādhāraṇe bhaye

जब मैं हाथ में शस्त्र लिए चाण्डाल को आता देखूँगा, तब हम दोनों पर समान भय आने पर मैं तुम्हारी फाँसें काट दूँगा।

श्लोक 98 (12.138.98)

तस्मिन्काले प्रमुक्तस्त्वं तरुमेवाधिरोक्ष्यसे । न हि ते जीवितादन्यत्किंचित्कृत्यं भविष्यति ॥

tasminkāle pramuktastvaṃ tarumevādhirokṣyase | na hi te jīvitādanyatkiṃcitkṛtyaṃ bhaviṣyati

उस समय छूटकर तुम सीधे पेड़ पर चढ़ जाओगे; तुम्हें अपने प्राण बचाने के सिवा और कोई काम नहीं रहेगा।

श्लोक 99 (12.138.99)

तस्मिन्कालेऽपि च भवान्दिवाकीर्तिभयार्दितः । मम न ग्रहणे शक्तः पलायनपरायणः ॥

tasminkāle'pi ca bhavāndivākīrtibhayārditaḥ | mama na grahaṇe śaktaḥ palāyanaparāyaṇaḥ

उस समय भी तुम चाण्डाल के भय से पीड़ित होकर भागने में लगे रहने के कारण मुझे पकड़ नहीं सकोगे।

श्लोक 100 (12.138.100)

ततो भवत्यपक्रान्ते त्रस्ते भीते च लुब्धकात् । अहं बिलं प्रवेक्ष्यामि भवाञ्शाखां गमिष्यति ॥

tato bhavatyapakrānte traste bhīte ca lubdhakāt | ahaṃ bilaṃ pravekṣyāmi bhavāñśākhāṃ gamiṣyati

फिर जब तुम व्याध से भयभीत और घबराकर भाग जाओगे, तब मैं अपने बिल में घुस जाऊँगा और तुम डाली पर चले जाओगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 101 (12.138.101)

एवमुक्तस्तु मार्जारो मूषिकेणात्मनो हितम् । वचनं वाक्यतत्त्वज्ञो जीवितार्थी महामतिः ॥

evamuktastu mārjāro mūṣikeṇātmano hitam | vacanaṃ vākyatattvajño jīvitārthī mahāmatiḥ

चूहे के इस प्रकार अपने हित की बात कहने पर बातों का मर्म समझने वाला और जीवित रहने का इच्छुक वह महामति बिलाव...

श्लोक 102 (12.138.102)

अथात्मकृत्ये त्वरितः सम्यक्प्रार्थितमाचरन् । उवाच लोमशो वाक्यं मूषिकं चिरकारिणम् ॥

athātmakṛtye tvaritaḥ samyakprārthitamācaran | uvāca lomaśo vākyaṃ mūṣikaṃ cirakāriṇam

...अपने काम की जल्दी में था, फिर भी जैसा माँगा गया था वैसा ही निभाते हुए उसने देर लगाने वाले चूहे से यह कहा:

लोमश उवाच

श्लोक 103 (12.138.103)

नह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधवः ॥

nahyevaṃ mitrakāryāṇi prītyā kurvanti sādhavaḥ

सज्जन लोग मित्रों के काम प्रेम से इस प्रकार नहीं करते।

श्लोक 104 (12.138.104)

यथा त्वं मोक्षितः कृच्छ्रात्त्वरमाणेन वै मया । तथा हि त्वरमाणेन त्वया कार्यमिदं मम । यत्नं कुरु महाप्राज्ञ यथा स्वस्त्यावयोर्भवेत् ॥

yathā tvaṃ mokṣitaḥ kṛcchrāttvaramāṇena vai mayā | tathā hi tvaramāṇena tvayā kāryamidaṃ mama | yatnaṃ kuru mahāprājña yathā svastyāvayorbhavet

जैसे तुम्हें मैंने जल्दी करके संकट से बचाया, वैसे ही तुम भी जल्दी करके मेरा यह काम करो। हे महाबुद्धिमान, ऐसा यत्न करो कि हम दोनों का कल्याण हो।

श्लोक 105 (12.138.105)

अथवा पूर्ववैरं त्वं स्मरन्कालं जिहीर्षसि । पश्य दुष्कृतकर्मंस्त्वं व्यक्तमायुःक्षयो मम ॥

athavā pūrvavairaṃ tvaṃ smarankālaṃ jihīrṣasi | paśya duṣkṛtakarmaṃstvaṃ vyaktamāyuḥkṣayo mama

अथवा तुम पुराना वैर याद करके समय को बीत जाने देना चाहते हो? हे दुष्कर्मी, देखो, साफ दीखता है कि मेरी आयु समाप्त हो रही है।

श्लोक 106 (12.138.106)

यदि किंचिन्मयाऽज्ञानात्पुरस्ताद्दुष्कृतं कृतम् । न तन्मनसि कर्तव्यं क्षामये त्वां प्रसीद मे ॥

yadi kiṃcinmayā'jñānātpurastādduṣkṛtaṃ kṛtam | na tanmanasi kartavyaṃ kṣāmaye tvāṃ prasīda me

यदि अज्ञान में मैंने पहले कभी तुम्हारा कोई अपराध किया हो तो उसे मन में मत रखना। मैं तुमसे क्षमा माँगता हूँ; मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।

भीष्म उवाच

श्लोक 107 (12.138.107)

तमेवंवादिनं प्राज्ञं शास्त्रविद्बुद्धिसत्तमः । उवाचेदं वचः श्रेष्ठं मार्जारं मूषिकस्तदा ॥

tamevaṃvādinaṃ prājñaṃ śāstravidbuddhisattamaḥ | uvācedaṃ vacaḥ śreṣṭhaṃ mārjāraṃ mūṣikastadā

ऐसा कहने वाले उस बिलाव से शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उस बुद्धिमान चूहे ने तब यह उत्तम वचन कहा।

पलित उवाच

श्लोक 108 (12.138.108)

श्रुतं मे तव मार्जार स्वमर्थं परिगृह्णतः । ममापि त्वं विजानासि स्वमर्थं परिगृह्णतः ॥

śrutaṃ me tava mārjāra svamarthaṃ parigṛhṇataḥ | mamāpi tvaṃ vijānāsi svamarthaṃ parigṛhṇataḥ

बिलाव, तुम अपना प्रयोजन साधते हुए जो कह रहे हो, वह मैंने सुन लिया; तुम भी जान लो कि मैं भी अपना प्रयोजन साध रहा हूँ।

श्लोक 109 (12.138.109)

यन्मित्रं भीतवत्साध्यं यस्मिन्मित्रे भयं हितम् । आरक्षितं ततः कार्यं पाणिः सर्पमुखादिव ॥

yanmitraṃ bhītavatsādhyaṃ yasminmitre bhayaṃ hitam | ārakṣitaṃ tataḥ kāryaṃ pāṇiḥ sarpamukhādiva

जिस मित्र को डरे हुए की तरह सँभालकर साधना पड़े, जिस मित्र से सतर्क रहना ही हितकर हो, उससे अपनी भली-भाँति रक्षा करनी चाहिए, जैसे साँप के मुँह से हाथ को बचाया जाता है।

श्लोक 110 (12.138.110)

कृत्वा बलवता संधिमात्मानं यो न रक्षति । अपथ्यमिव तद्भुक्तं तस्यानर्थाय कल्पते ॥

kṛtvā balavatā saṃdhimātmānaṃ yo na rakṣati | apathyamiva tadbhuktaṃ tasyānarthāya kalpate

जो बलवान से सन्धि करके भी अपनी रक्षा नहीं करता, उसके लिए वह सन्धि खाए हुए अपथ्य भोजन की तरह हानि का कारण बनती है।

श्लोक 111 (12.138.111)

कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचिद्रिपुः । अर्थतस्तु निबध्यन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥

kaścitkasyacinmitraṃ na kaścitkasyacidripuḥ | arthatastu nibadhyante mitrāṇi ripavastathā

कोई किसी का मित्र नहीं होता और कोई किसी का शत्रु नहीं होता; स्वार्थ के कारण ही मित्र और शत्रु बनते और बँधते हैं।

श्लोक 112 (12.138.112)

अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैरिव महागजाः । न च कश्चित्कृते कार्ये कर्तारं समवेक्षते । तस्मात्सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् ॥

arthairarthā nibadhyante gajairiva mahāgajāḥ | na ca kaścitkṛte kārye kartāraṃ samavekṣate | tasmātsarvāṇi kāryāṇi sāvaśeṣāṇi kārayet

जैसे हाथियों के द्वारा बड़े हाथी बाँधे जाते हैं, वैसे ही धन के द्वारा धन बँधता है। काम पूरा हो जाने पर कोई भी उसे करने वाले की ओर नहीं देखता; इसलिए हर काम को कुछ शेष रखकर ही कराना चाहिए।

श्लोक 113 (12.138.113)

तस्मिन्कालेऽपि च भवान्दिवाकीर्तिभयार्दितः । मम न ग्रहणे शक्तः पलायनपरायणः ॥

tasminkāle'pi ca bhavāndivākīrtibhayārditaḥ | mama na grahaṇe śaktaḥ palāyanaparāyaṇaḥ

उस समय भी तुम चाण्डाल के भय से पीड़ित थे और भाग निकलने में ही लगे थे, इसलिए मुझे पकड़ने में समर्थ नहीं हुए।

श्लोक 114 (12.138.114)

छिन्नं तु तन्तुबाहुल्यं तन्तुरेकोऽवशेषितः । छेत्स्याम्यहं तमप्याशु निर्वृतो भव लोमश ॥

chinnaṃ tu tantubāhulyaṃ tantureko'vaśeṣitaḥ | chetsyāmyahaṃ tamapyāśu nirvṛto bhava lomaśa

बहुत-से तन्तुओं में से अब केवल एक तन्तु बचा है। उसे भी मैं अभी काट डालूँगा; हे लोमश, निश्चिन्त हो जाओ।

भीष्म उवाच

श्लोक 115 (12.138.115)

तयोः संवदतोरेवं तथैवापन्नयोर्द्वयोः । क्षयं जगाम सा रात्रिर्लोमशं त्वागमद्भयम् ॥

tayoḥ saṃvadatorevaṃ tathaivāpannayordvayoḥ | kṣayaṃ jagāma sā rātrirlomaśaṃ tvāgamadbhayam

इस प्रकार बातें करते हुए, दोनों एक-सी विपत्ति में पड़े हुए, उनकी वह रात बीत गई; और लोमश को भय आ घेरा।

श्लोक 116 (12.138.116)

ततः प्रभातसमये विकटः कृष्णपिङ्गलः । स्थूलस्फिग्विकृतो रूक्षः श्वयूथपरिवारितः ॥

tataḥ prabhātasamaye vikaṭaḥ kṛṣṇapiṅgalaḥ | sthūlasphigvikṛto rūkṣaḥ śvayūthaparivāritaḥ

तब प्रभात के समय एक भयंकर पुरुष दिखाई दिया, जो काला-पीला, भारी कूल्हों वाला, विकृत और रूखा था और कुत्तों के झुंड से घिरा हुआ था,

श्लोक 117 (12.138.117)

शङ्कुकर्णो महावक्रः खनित्री घोरदर्शनः । परिघो नाम चण्डालः शस्त्रपाणिरदृश्यत ॥

śaṅkukarṇo mahāvakraḥ khanitrī ghoradarśanaḥ | parigho nāma caṇḍālaḥ śastrapāṇiradṛśyata

जिसके कान खूँटे जैसे थे, मुख बहुत बड़ा था, हाथ में खुरपी थी और रूप भयानक था — परिघ नाम का वह चाण्डाल हाथ में शस्त्र लिए दिखाई दिया।

श्लोक 118 (12.138.118)

तं दृष्ट्वा यमदूताभं मार्जारस्त्रस्तचेतनः । उवाच पलितं भीतः किमिदानीं करिष्यसि ॥

taṃ dṛṣṭvā yamadūtābhaṃ mārjārastrastacetanaḥ | uvāca palitaṃ bhītaḥ kimidānīṃ kariṣyasi

यमदूत के समान उस चाण्डाल को देखकर घबराए हुए बिलाव ने भयभीत होकर पलित से कहा, "अब तुम क्या करोगे?"

श्लोक 119 (12.138.119)

तथैव च सुसंत्रस्तौ तं दृष्ट्वा घोरसंकुलम् । क्षणेन नकुलोलूकौ नैराश्यमुपजग्मतुः ॥

tathaiva ca susaṃtrastau taṃ dṛṣṭvā ghorasaṃkulam | kṣaṇena nakulolūkau nairāśyamupajagmatuḥ

उसी प्रकार उस भयंकर भीड़ को देखकर नेवला और उल्लू भी अत्यन्त डर गए और क्षण भर में निराश हो गए।

श्लोक 120 (12.138.120)

बलिनौ मतिमन्तौ च संघातं चाप्युपागतौ । अशक्तौ सुनयात्तस्मात्संप्रधर्षयितुं बलात् ॥

balinau matimantau ca saṃghātaṃ cāpyupāgatau | aśaktau sunayāttasmātsaṃpradharṣayituṃ balāt

बलवान और बुद्धिमान होकर तथा एक साथ मिलकर भी वे दोनों उस उत्तम नीति के कारण बल से उन्हें दबा सकने में समर्थ नहीं हुए।

श्लोक 121 (12.138.121)

कार्यार्थे कृतसंधी तौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ । उलूकनकुलौ तूर्णं जग्मतुः स्वंस्वमालयम् ॥

kāryārthe kṛtasaṃdhī tau dṛṣṭvā mārjāramūṣikau | ulūkanakulau tūrṇaṃ jagmatuḥ svaṃsvamālayam

अपने प्रयोजन के लिए संधि किए हुए बिलाव और चूहे को देखकर उल्लू और नेवला शीघ्र ही अपने-अपने घर चले गए।

श्लोक 122 (12.138.122)

ततश्चिच्छेद तं तन्तुं मार्जारस्य स मूषिकः । विप्रमुक्तोऽथ मार्जारस्तमेवाभ्यपतद्दुमम् ॥

tataściccheda taṃ tantuṃ mārjārasya sa mūṣikaḥ | vipramukto'tha mārjārastamevābhyapataddumam

तब उस चूहे ने बिलाव का वह तन्तु काट दिया, और छूटा हुआ बिलाव उसी वृक्ष पर जा चढ़ा।

श्लोक 123 (12.138.123)

स तस्मात्संभ्रमान्मुक्तो मुक्तो घोरेण शत्रुणा । बिलं विवेश पलितः शाखां लेभे स लोमशः ॥

sa tasmātsaṃbhramānmukto mukto ghoreṇa śatruṇā | bilaṃ viveśa palitaḥ śākhāṃ lebhe sa lomaśaḥ

उस घबराहट से छूटकर, उस भयंकर शत्रु से छूटकर, पलित अपने बिल में घुस गया और लोमश ने वृक्ष की डाल पकड़ ली।

श्लोक 124 (12.138.124)

उन्माथमप्युपादाय चण्डालो वीक्ष्य सर्वशः । विहताशः क्षणेनैव तस्माद्देशादपाक्रमत् । जगाम स स्वभवनं चण्डालो भरतर्षभ ॥

unmāthamapyupādāya caṇḍālo vīkṣya sarvaśaḥ | vihatāśaḥ kṣaṇenaiva tasmāddeśādapākramat | jagāma sa svabhavanaṃ caṇḍālo bharatarṣabha

चाण्डाल ने अपना जाल उठाया और चारों ओर देखा; आशा टूट जाने पर वह क्षण भर में उस स्थान से हट गया और हे भरतश्रेष्ठ, अपने घर चला गया।

श्लोक 125 (12.138.125)

ततस्तस्माद्भयान्मुक्तो दुर्लभं प्राप्य जीवितम् । बिलस्थं पादपाग्रस्थः पलितं लोमशोऽब्रवीत् ॥

tatastasmādbhayānmukto durlabhaṃ prāpya jīvitam | bilasthaṃ pādapāgrasthaḥ palitaṃ lomaśo'bravīt

तब उस भय से मुक्त होकर और दुर्लभ जीवन पाकर, वृक्ष की चोटी पर बैठे लोमश ने बिल में बैठे पलित से कहा।

लोमश उवाच

श्लोक 126 (12.138.126)

अकृत्वा संविदं कांचित्सहसा त्वमपस्रुतः । कृतज्ञः कृतकल्याणः कच्चिन्मां नाभिशङ्कसे ॥

akṛtvā saṃvidaṃ kāṃcitsahasā tvamapasrutaḥ | kṛtajñaḥ kṛtakalyāṇaḥ kaccinmāṃ nābhiśaṅkase

तुम बिना कोई बात तय किए अचानक खिसक गए। तुम तो कृतज्ञ हो और तुम्हारा भला किया गया है — कहीं तुम मुझ पर शंका तो नहीं करते?

श्लोक 127 (12.138.127)

गत्वा च मम विश्वासं दत्त्वा च मम जीवितम् । मित्रोपभोगसमये किं हि मां नोपसर्पसि ॥

gatvā ca mama viśvāsaṃ dattvā ca mama jīvitam | mitropabhogasamaye kiṃ hi māṃ nopasarpasi

तुमने मेरा विश्वास पाकर और मुझे जीवन देकर भी, अब मित्र के साथ सुख भोगने के समय मेरे पास क्यों नहीं आते?

श्लोक 128 (12.138.128)

कृत्वा हि पूर्वं मित्राणि यः पश्चान्नानुतिष्ठति । न स मित्राणि लभते कृच्छ्रात्स्वापत्सु दुर्मतिः ॥

kṛtvā hi pūrvaṃ mitrāṇi yaḥ paścānnānutiṣṭhati | na sa mitrāṇi labhate kṛcchrātsvāpatsu durmatiḥ

जो दुर्बुद्धि पहले मित्र बनाकर बाद में उनके प्रति अपना कर्तव्य नहीं निभाता, वह अपनी विपत्तियों में कठिनाई से भी मित्र नहीं पाता।

श्लोक 129 (12.138.129)

सत्कृतोऽहं त्वया मित्र सामर्थ्यादात्मनः सखे । स मां मित्रत्वमापन्नमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ॥

satkṛto'haṃ tvayā mitra sāmarthyādātmanaḥ sakhe | sa māṃ mitratvamāpannamupabhoktuṃ tvamarhasi

हे मित्र, तुमने अपनी सामर्थ्य के अनुसार मेरा सत्कार किया था। अब जब मैं तुम्हारा मित्र बन गया हूँ, तो तुम्हें मेरे साथ सुख भोगना चाहिए।

श्लोक 130 (12.138.130)

यानि मे सन्ति मित्राणि ये च मे सन्ति बान्धवाः । सर्वे त्वां पूजयिष्यन्ति शिष्या गुरुमिव प्रियम् ॥

yāni me santi mitrāṇi ye ca me santi bāndhavāḥ | sarve tvāṃ pūjayiṣyanti śiṣyā gurumiva priyam

मेरे जो भी मित्र हैं और जो भी बन्धु हैं, वे सब तुम्हारा आदर करेंगे, जैसे शिष्य प्रिय गुरु का आदर करते हैं।

श्लोक 131 (12.138.131)

अहं च पूजयिष्ये त्वां समित्रगणबान्धवम् । जीवितस्य प्रदातारं कृतज्ञः को न पूजयेत् ॥

ahaṃ ca pūjayiṣye tvāṃ samitragaṇabāndhavam | jīvitasya pradātāraṃ kṛtajñaḥ ko na pūjayet

और मैं भी अपने मित्रों और बन्धुओं सहित तुम्हारा आदर करूँगा। जीवन देने वाले का आदर कौन कृतज्ञ न करेगा?

श्लोक 132 (12.138.132)

ईश्वरो मे भवानस्तु शरीरस्य गृहस्य च । अर्थानां चैव सर्वेषामनुशास्ता च मे भव ॥

īśvaro me bhavānastu śarīrasya gṛhasya ca | arthānāṃ caiva sarveṣāmanuśāstā ca me bhava

तुम मेरे शरीर और घर के स्वामी बनो, मेरी सारी सम्पत्ति के भी स्वामी बनो, और मुझे उपदेश देने वाले बनो।

श्लोक 133 (12.138.133)

अमात्यो मे भव प्राज्ञ पितेवेह प्रशाधि माम् । न तेऽस्ति भयमस्मत्तो जीवितेनात्मनः शपे ॥

amātyo me bhava prājña piteveha praśādhi mām | na te'sti bhayamasmatto jīvitenātmanaḥ śape

हे बुद्धिमान, मेरे मन्त्री बनो और पिता की भाँति मुझे शिक्षा दो। तुम्हें मुझसे कोई भय नहीं है; मैं अपने प्राणों की शपथ खाता हूँ।

श्लोक 134 (12.138.134)

बुद्ध्या त्वमुशना साक्षाद्बलेनाधिकृता वयम् । त्वं मन्त्रबलयुक्तो हि दद्या विजयमेव मे ॥

buddhyā tvamuśanā sākṣādbalenādhikṛtā vayam | tvaṃ mantrabalayukto hi dadyā vijayameva me

बुद्धि में तुम साक्षात् शुक्राचार्य हो, और बल में हम बढ़े हुए हैं। मन्त्रणा के बल से युक्त तुम मुझे अवश्य विजय दिला सकोगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 135 (12.138.135)

एवमुक्तः परं सान्त्वं मार्जारेण स मूषिकः । उवाच परमार्थज्ञः श्लक्ष्णमात्महितं वचः ॥

evamuktaḥ paraṃ sāntvaṃ mārjāreṇa sa mūṣikaḥ | uvāca paramārthajñaḥ ślakṣṇamātmahitaṃ vacaḥ

बिलाव के इस प्रकार अत्यन्त मीठे वचन कहने पर परमार्थ को जानने वाले चूहे ने अपने हित की बात कोमल वाणी में कही।

पलित उवाच

श्लोक 136 (12.138.136)

यद्भवानाह तत्सर्वं मया ते लोमश श्रुतम् । ममापि तावद्ब्रुवतः शृणु यत्प्रतिभाति मे ॥

yadbhavānāha tatsarvaṃ mayā te lomaśa śrutam | mamāpi tāvadbruvataḥ śṛṇu yatpratibhāti me

हे लोमश, तुमने जो कुछ कहा वह सब मैंने सुन लिया। अब मैं भी कुछ कहता हूँ, मुझे जो ठीक लगता है उसे सुनो।

श्लोक 137 (12.138.137)

वेदितव्यानि मित्राणि बोद्धव्याश्चापि शत्रवः । एतत्सुसूक्ष्मं लोकेऽस्मिन्दृश्यते प्राज्ञसंमतैः ॥

veditavyāni mitrāṇi boddhavyāścāpi śatravaḥ | etatsusūkṣmaṃ loke'smindṛśyate prājñasaṃmataiḥ

मित्रों को पहचानना चाहिए और शत्रुओं को भी समझना चाहिए। यह संसार की सबसे सूक्ष्म बात है, और इसे वे ही देख पाते हैं जिन्हें विद्वान् मानते हैं।

श्लोक 138 (12.138.138)

शत्रुरूपा हि सुहृदो मित्ररूपाश्च शत्रवः । सान्त्वितास्ते न बुध्यन्ते रागलोभवशं गताः ॥

śatrurūpā hi suhṛdo mitrarūpāśca śatravaḥ | sāntvitāste na budhyante rāgalobhavaśaṃ gatāḥ

मित्र शत्रु का रूप धारण किए होते हैं और शत्रु मित्र का रूप; राग और लोभ के वश में पड़े लोग मीठी बातों से बहला दिए जाने पर यह नहीं समझते।

श्लोक 139 (12.138.139)

येषां सौम्यानि मित्राणि क्रोधनाश्चैव शत्रवः । सान्त्वितास्ते न बुध्यन्ते रागलोभवशंगताः ॥

yeṣāṃ saumyāni mitrāṇi krodhanāścaiva śatravaḥ | sāntvitāste na budhyante rāgalobhavaśaṃgatāḥ

जिनके मित्र सौम्य और शत्रु क्रोधी होते हैं, वे राग और लोभ के वश में पड़कर मीठी बातों से बहला दिए जाने पर सच्चाई को नहीं समझते।

श्लोक 140 (12.138.140)

नास्ति जात्या रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते । सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥

nāsti jātyā ripurnāma mitraṃ nāma na vidyate | sāmarthyayogājjāyante mitrāṇi ripavastathā

जन्म से कोई शत्रु नहीं होता और कोई मित्र भी नहीं होता; सामर्थ्य के योग से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।

श्लोक 141 (12.138.141)

यो यस्मिञ्जीवति स्वार्थे पश्येत्पीडां न जीवति । स तस्य मित्रं तावत्स्याद्यावन्न स्याद्विपर्ययः ॥

yo yasmiñjīvati svārthe paśyetpīḍāṃ na jīvati | sa tasya mitraṃ tāvatsyādyāvanna syādviparyayaḥ

जो मनुष्य किसी के जीवित रहने में अपना स्वार्थ देखता है और उसे संकट में देखकर जी नहीं पाता, वह उसका मित्र तभी तक रहता है जब तक स्थिति उलट नहीं जाती।

श्लोक 142 (12.138.142)

नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम् । अर्थयुक्त्याऽनुजायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥

nāsti maitrī sthirā nāma na ca dhruvamasauhṛdam | arthayuktyā'nujāyante mitrāṇi ripavastathā

न कोई मित्रता स्थिर है और न कोई वैर सदा रहने वाला; स्वार्थ के अनुसार ही मित्र और शत्रु बनते हैं।

श्लोक 143 (12.138.143)

मित्रं च शत्रुतामेति कस्मिंश्चित्कालपर्यये । शत्रुश्च मित्रतामेति स्वार्थो हि बलवत्तरः ॥

mitraṃ ca śatrutāmeti kasmiṃścitkālaparyaye | śatruśca mitratāmeti svārtho hi balavattaraḥ

समय के किसी फेर में मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु मित्र; क्योंकि स्वार्थ ही अधिक बलवान् है।

श्लोक 144 (12.138.144)

यो विश्वसिति मित्रेषु न विश्वसिति शत्रुषु । अर्थयुक्तिमविज्ञाय चलितं तस्य जीवितम् ॥

yo viśvasiti mitreṣu na viśvasiti śatruṣu | arthayuktimavijñāya calitaṃ tasya jīvitam

जो मित्रों पर विश्वास करता है और शत्रुओं पर नहीं, वह स्वार्थ की रीति को नहीं समझता; उसका जीवन डगमगाता रहता है।

श्लोक 145 (12.138.145)

मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मतिः । न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नमपि मूलानि कृन्तति ॥

mitre vā yadi vā śatrau tasyāpi calitā matiḥ | na viśvasedaviśvaste viśvaste nātiviśvaset | viśvāsādbhayamutpannamapi mūlāni kṛntati

चाहे मित्र के प्रति हो या शत्रु के प्रति, उसकी बुद्धि भी डगमगा चुकी होती है। जो विश्वास न करे उस पर विश्वास न करे, और जो विश्वास करे उस पर भी अधिक विश्वास न करे; विश्वास से उत्पन्न भय जड़ों तक को काट देता है।

श्लोक 146 (12.138.146)

अर्थयुक्त्या हि जायन्ते पिता माता सुतस्तथा । मातुला भागिनेयाश्च तथा संबन्धिबान्धवाः ॥

arthayuktyā hi jāyante pitā mātā sutastathā | mātulā bhāgineyāśca tathā saṃbandhibāndhavāḥ

स्वार्थ के योग से ही पिता, माता और पुत्र बनते हैं, और उसी प्रकार मामा, भानजे, सम्बन्धी और बन्धु भी।

श्लोक 147 (12.138.147)

पुत्रं हि मातापितरौ त्यजतः पतितं प्रियम् । लोको रक्षति चात्मानं पश्य स्वार्थस्य सारताम् ॥

putraṃ hi mātāpitarau tyajataḥ patitaṃ priyam | loko rakṣati cātmānaṃ paśya svārthasya sāratām

माता-पिता पतित हो गए प्रिय पुत्र को भी त्याग देते हैं; संसार अपनी ही रक्षा करता है। देखो, स्वार्थ ही सार है।

श्लोक 148 (12.138.148)

सामान्या निष्कृतिः प्राज्ञ यो मोक्षात्समन्तरम् । कृत्यं मृगयते कर्तुं सुखोपायमसंशयम् ॥

sāmānyā niṣkṛtiḥ prājña yo mokṣātsamantaram | kṛtyaṃ mṛgayate kartuṃ sukhopāyamasaṃśayam

हे बुद्धिमान, यह साधारण उपाय है: जो मनुष्य बन्धन से छूटते ही अपना काम करने की खोज में लग जाता है, वह निश्चय ही सबसे सरल मार्ग ढूँढता है।

श्लोक 149 (12.138.149)

अस्मिन्निलय एवं त्वं न्यग्रोधादवतारितः । पूर्वं निविष्टमुन्माथं चपलत्वान्न बुद्धवान् ॥

asminnilaya evaṃ tvaṃ nyagrodhādavatāritaḥ | pūrvaṃ niviṣṭamunmāthaṃ capalatvānna buddhavān

तुम इसी निवास में बरगद के पेड़ से उतारे गए थे; अपनी चंचलता के कारण तुमने पहले से लगे हुए जाल को नहीं पहचाना।

श्लोक 150 (12.138.150)

आत्मनश्चपलो नास्ति कुतोऽन्येषां भविष्यति । तस्मात्सर्वाणि कार्याणि चपलो हन्त्यसंशयम् ॥

ātmanaścapalo nāsti kuto'nyeṣāṃ bhaviṣyati | tasmātsarvāṇi kāryāṇi capalo hantyasaṃśayam

चंचल मनुष्य को अपनी भी चिन्ता नहीं होती, तो दूसरों की कहाँ से होगी? इसलिए चंचल मनुष्य सब कामों को निश्चय ही बिगाड़ देता है।

श्लोक 151 (12.138.151)

ब्रवीषि मधुरं यच्च प्रियो मेऽद्य भवानिति । तन्मिथ्याकारणं सर्वं विस्तरेणापि मे शृणु ॥

bravīṣi madhuraṃ yacca priyo me'dya bhavāniti | tanmithyākāraṇaṃ sarvaṃ vistareṇāpi me śṛṇu

तुम जो मीठी बात कहते हो कि आज तुम मुझे प्रिय हो, वह सब झूठे कारण पर टिकी है; उसे विस्तार से मुझसे सुनो।

श्लोक 152 (12.138.152)

कारणात्प्रियतामेति द्वेष्यो भवति कारणात् । अर्थार्थी जीवलोकोऽयं न कश्चित्कस्यचित्प्रियः ॥

kāraṇātpriyatāmeti dveṣyo bhavati kāraṇāt | arthārthī jīvaloko'yaṃ na kaścitkasyacitpriyaḥ

कारण से ही कोई प्रिय होता है और कारण से ही द्वेष का पात्र बनता है। यह संसार स्वार्थ का ही साधक है; कोई किसी का प्रिय नहीं।

श्लोक 153 (12.138.153)

सख्यं सोदर्ययोर्भ्रात्रोर्दंपत्योर्वा परस्परम् । कस्यचिन्नाभिजानामि प्रीतिं निष्कारणामिह ॥

sakhyaṃ sodaryayorbhrātrordaṃpatyorvā parasparam | kasyacinnābhijānāmi prītiṃ niṣkāraṇāmiha

एक ही कोख से जन्मे भाइयों में, या पति-पत्नी में, मैं यहाँ किसी का भी बिना कारण का स्नेह नहीं जानता।

श्लोक 154 (12.138.154)

यद्यपि भ्रातरः क्रुद्धा भार्या वा कारणान्तरे । स्वभावतस्ते प्रीयन्ते नेतरः प्राकृतो जनः ॥

yadyapi bhrātaraḥ kruddhā bhāryā vā kāraṇāntare | svabhāvataste prīyante netaraḥ prākṛto janaḥ

भाई क्रुद्ध हों या पत्नी किसी और कारण से रुष्ट हो, वे अपने स्वभाव से फिर प्रसन्न हो जाते हैं; कोई और साधारण मनुष्य नहीं।

श्लोक 155 (12.138.155)

प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः । मन्त्रहोमजपैरन्यः कार्यार्थे प्रीयते जनः ॥

priyo bhavati dānena priyavādena cāparaḥ | mantrahomajapairanyaḥ kāryārthe prīyate janaḥ

कोई दान से प्रिय होता है, कोई मीठी बात से, कोई मन्त्र, हवन और जप से; मनुष्य किसी प्रयोजन के लिए ही प्रसन्न होता है।

श्लोक 156 (12.138.156)

उत्पन्ना कारणात्प्रीतिरासीन्नौ कारणान्तरे । प्रध्वस्ते कारणस्थाने सा प्रीतिर्नाभिवर्तते ॥

utpannā kāraṇātprītirāsīnnau kāraṇāntare | pradhvaste kāraṇasthāne sā prītirnābhivartate

हम दोनों में एक कारण से उत्पन्न स्नेह किसी दूसरे कारण के लिए था; कारण का आधार नष्ट हो जाने पर वह स्नेह लौटकर नहीं आता।

श्लोक 157 (12.138.157)

किंनु तत्कारणं मन्ये येनाहं भवतः प्रियः । अन्यत्राभ्यवहारार्थात्तत्रापि च बुधा वयम् ॥

kiṃnu tatkāraṇaṃ manye yenāhaṃ bhavataḥ priyaḥ | anyatrābhyavahārārthāttatrāpi ca budhā vayam

मैं सोचता हूँ, वह कौन-सा कारण है जिससे मैं तुम्हें प्रिय हूँ? भोजन के प्रयोजन को छोड़कर और कोई नहीं, और उसमें भी हम समझदार हैं।

श्लोक 158 (12.138.158)

कालो हेतुं विकुरुते स्वार्थस्तमनुवर्तते । स्वार्थं प्राज्ञोऽभिजानाति प्राज्ञं लोकोऽनुवर्तते । न त्वीदृशं त्वया वाच्यं विद्यते स्वार्थपण्डितः ॥

kālo hetuṃ vikurute svārthastamanuvartate | svārthaṃ prājño'bhijānāti prājñaṃ loko'nuvartate | na tvīdṛśaṃ tvayā vācyaṃ vidyate svārthapaṇḍitaḥ

काल कारण को बदलता है और स्वार्थ उसके पीछे चलता है। बुद्धिमान् अपना स्वार्थ पहचानता है और संसार बुद्धिमान् के पीछे चलता है। अपने स्वार्थ में चतुर तुम्हारे मुख से ऐसी बात शोभा नहीं देती।

श्लोक 159 (12.138.159)

न कालो हि समर्थस्य स्नेहहेतुरयं तव । तस्मान्नाहं चले स्वार्थात्सुस्थितः संधिविग्रहे ॥

na kālo hi samarthasya snehaheturayaṃ tava | tasmānnāhaṃ cale svārthātsusthitaḥ saṃdhivigrahe

समर्थ के लिए कोई विशेष समय आवश्यक नहीं होता; तुम्हारे इस स्नेह के पीछे भी कोई हेतु है। इसलिए मैं संधि और विग्रह दोनों में भली-भाँति स्थिर रहकर अपने स्वार्थ से नहीं डिगता।

श्लोक 160 (12.138.160)

अभ्राणामिव रूपाणि विकुर्वन्ति पदेपदे । अद्यैव हि रिपुर्भूत्वा पुनरद्यैव मे सुहृत् । पुनश्च रिपुरद्यैव युक्तीनां पश्य चापलम् ॥

abhrāṇāmiva rūpāṇi vikurvanti padepade | adyaiva hi ripurbhūtvā punaradyaiva me suhṛt | punaśca ripuradyaiva yuktīnāṃ paśya cāpalam

बादलों की तरह वे पग-पग पर रूप बदलते रहते हैं। आज ही शत्रु होकर फिर आज ही मेरा मित्र, और फिर आज ही शत्रु — इन युक्तियों की चंचलता देखो।

श्लोक 161 (12.138.161)

आसीन्मैत्री तु तावन्नौ यावद्धेतुरभूत्पुरा । सागता सह तेनैव कालयुक्तेन हेतुना ॥

āsīnmaitrī tu tāvannau yāvaddheturabhūtpurā | sāgatā saha tenaiva kālayuktena hetunā

हम दोनों में मित्रता तभी तक थी जब तक पहले वह कारण था; वह उसी समय-बद्ध कारण के साथ ही चली गई।

श्लोक 162 (12.138.162)

त्वं हि मेऽत्यन्ततः शत्रुः सामर्थ्यान्मित्रतां गतः । तत्कृत्यमभिनिर्वर्त्य प्रकृतिः शत्रुतां गता ॥

tvaṃ hi me'tyantataḥ śatruḥ sāmarthyānmitratāṃ gataḥ | tatkṛtyamabhinirvartya prakṛtiḥ śatrutāṃ gatā

तुम तो मेरे स्वभाव से ही सदा के शत्रु थे, केवल सामर्थ्य के कारण मित्र बन गए थे; वह काम पूरा हो जाने पर स्वाभाविक स्थिति फिर शत्रुता में लौट आई।

श्लोक 163 (12.138.163)

सोऽहमेवं प्रणीतानि ज्ञात्वा शास्त्राणि तत्त्वतः । प्रविशेयं कथं पाशं त्वत्कृते तद्ब्रवीहि मे ॥

so'hamevaṃ praṇītāni jñātvā śāstrāṇi tattvataḥ | praviśeyaṃ kathaṃ pāśaṃ tvatkṛte tadbravīhi me

ऐसा होकर, शास्त्रों को उनके वास्तविक रूप में जानते हुए, मैं तुम्हारे कारण फिर जाल में कैसे घुसूँ? यह मुझे बताओ।

श्लोक 164 (12.138.164)

त्वद्वीर्येण विमुक्तोऽहं मद्वीर्येण तथा भवान् । अन्योन्यानुग्रहे वृत्ते नास्ति भूयः समागमः ॥

tvadvīryeṇa vimukto'haṃ madvīryeṇa tathā bhavān | anyonyānugrahe vṛtte nāsti bhūyaḥ samāgamaḥ

मैं तुम्हारे बल से छूटा और तुम मेरे बल से। एक-दूसरे का उपकार हो चुकने पर अब फिर मिलने का कोई कारण नहीं रहा।

श्लोक 165 (12.138.165)

त्वं हि सौम्य कृतार्थोऽद्य निवृत्तार्थास्तथा वयम् । न तेऽस्त्यद्य मया कृत्यं किंचिदन्यत्र भक्षणात् ॥

tvaṃ hi saumya kṛtārtho'dya nivṛttārthāstathā vayam | na te'styadya mayā kṛtyaṃ kiṃcidanyatra bhakṣaṇāt

हे सौम्य, आज तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध हो गया और हमारा भी पूरा हो चुका। आज मुझसे तुम्हारा कोई काम नहीं है, सिवा मुझे खाने के।

श्लोक 166 (12.138.166)

अहमन्नं भवान्भोक्ता दुर्बलोऽहं भवान्बली । नावयोर्विद्यते संधिर्वियुक्ते विषमे बले ॥

ahamannaṃ bhavānbhoktā durbalo'haṃ bhavānbalī | nāvayorvidyate saṃdhirviyukte viṣame bale

मैं भोजन हूँ और तुम खाने वाले; मैं दुर्बल हूँ और तुम बलवान्। हमारे बलों के इस असमान और अलग होने पर हमारे बीच कोई संधि नहीं हो सकती।

श्लोक 167 (12.138.167)

संमन्येऽहं तव प्रज्ञां यन्मोक्षात्प्रत्यनन्तरम् । भक्ष्यं मृगयते नूनं सुखोपायमसंशयम् ॥

saṃmanye'haṃ tava prajñāṃ yanmokṣātpratyanantaram | bhakṣyaṃ mṛgayate nūnaṃ sukhopāyamasaṃśayam

मैं तुम्हारी बुद्धि की सराहना करता हूँ कि बन्धन से छूटते ही मनुष्य भोजन की खोज में लग जाता है, निश्चय ही सबसे सरल उपाय से।

श्लोक 168 (12.138.168)

भक्ष्यार्थी ह्येव सुव्यक्तो विमुक्तः प्रसृतः क्षुधा । शास्त्रजां मतिमास्थाय प्रातराशमिहेच्छसि ॥

bhakṣyārthī hyeva suvyakto vimuktaḥ prasṛtaḥ kṣudhā | śāstrajāṃ matimāsthāya prātarāśamihecchasi

तुम स्पष्ट ही भोजन के इच्छुक हो; छूटकर भूख से प्रेरित हुए तुम शास्त्र से उपजी बुद्धि का सहारा लेकर यहीं अपना प्रातःकालीन भोजन चाहते हो।

श्लोक 169 (12.138.169)

जानामि क्षुधितं च त्वामाहारसमयश्च ते । स त्वं मामभिसंधाय भक्ष्यं मृगयसे पुनः ॥

jānāmi kṣudhitaṃ ca tvāmāhārasamayaśca te | sa tvaṃ māmabhisaṃdhāya bhakṣyaṃ mṛgayase punaḥ

मैं जानता हूँ कि तुम भूखे हो और यह तुम्हारे भोजन का समय है; इसलिए तुम मुझे लक्ष्य बनाकर फिर भोजन ढूँढ रहे हो।

श्लोक 170 (12.138.170)

किंचात्र पुत्रदारार्थं यद्वाणीं सृजसे मयि । शुश्रूषां यतसे कर्तुं सखे मम तत्क्षमम् ॥

kiṃcātra putradārārthaṃ yadvāṇīṃ sṛjase mayi | śuśrūṣāṃ yatase kartuṃ sakhe mama tatkṣamam

और पत्नी और पुत्रों की यह बात क्या है, जो तुम मुझ पर उँडेल रहे हो? हे मित्र, तुम मेरी सेवा करने का यत्न करते हो; यह मेरे योग्य ही है।

श्लोक 171 (12.138.171)

त्वया मां सहितं दृष्ट्वा प्रिया भार्या सुताश्च ये । कस्मात्ते मां न खादेयुः स्पृष्ट्वा प्रणयिनि त्वयि ॥

tvayā māṃ sahitaṃ dṛṣṭvā priyā bhāryā sutāśca ye | kasmātte māṃ na khādeyuḥ spṛṣṭvā praṇayini tvayi

मुझे तुम्हारे साथ देखकर तुम्हारी प्रिय पत्नी और जो पुत्र हैं, वे मुझे छूकर क्यों न खा जाएँ, जब तुम उनके इतने प्रिय हो?

श्लोक 172 (12.138.172)

नाहं त्वया समेष्यामि वृत्ते हेतुसमागमे । शिवं ध्यायस्व मेऽत्रस्थः सुकृतं स्मरसे यदि ॥

nāhaṃ tvayā sameṣyāmi vṛtte hetusamāgame | śivaṃ dhyāyasva me'trasthaḥ sukṛtaṃ smarase yadi

जिस कारण हम मिले थे वह बीत चुका, इसलिए मैं अब तुमसे फिर नहीं मिलूँगा। यदि तुम्हें उपकार याद है, तो वहीं रहकर मेरा कल्याण चाहो।

श्लोक 173 (12.138.173)

शत्रोरन्नाद्यभूतः सन्क्लिष्टस्य क्षुधितस्य च । भक्ष्यं मृगयमाणस्य कः प्राज्ञो विषयं व्रजेत् ॥

śatrorannādyabhūtaḥ sankliṣṭasya kṣudhitasya ca | bhakṣyaṃ mṛgayamāṇasya kaḥ prājño viṣayaṃ vrajet

जिसका वह भोजन हो, जो भूखा और पीड़ित हो और भोजन ढूँढ रहा हो, ऐसे शत्रु के सामने कौन समझदार जाएगा?

श्लोक 174 (12.138.174)

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि दूरादपि तवोद्विजे । विश्वस्तं वा प्रमत्तं वा एतदेव कृतं भवेत् ॥

svasti te'stu gamiṣyāmi dūrādapi tavodvije | viśvastaṃ vā pramattaṃ vā etadeva kṛtaṃ bhavet

तुम्हारा कल्याण हो; मैं जाऊँगा। मैं तुमसे दूर रहकर भी डरता हूँ। चाहे कोई विश्वास करने वाला हो या असावधान, उसके साथ यही किया जाता।

श्लोक 175 (12.138.175)

नाहं त्वया समेष्यामि निवृत्तो भव लोमश । बलवत्सन्निकर्षो हि न कदाचित्प्रशस्यते ॥

nāhaṃ tvayā sameṣyāmi nivṛtto bhava lomaśa | balavatsannikarṣo hi na kadācitpraśasyate

मैं तुमसे फिर नहीं मिलूँगा; हे लोमश, लौट जाओ। बलवान् की निकटता कभी प्रशंसनीय नहीं मानी जाती।

श्लोक 176 (12.138.176)

यदि त्वं सुकृतं वेत्सि तत्सख्यमनुसारय । प्रशान्तादपि हि प्राज्ञाद्भेतव्यं बलिनः सदा ॥

yadi tvaṃ sukṛtaṃ vetsi tatsakhyamanusāraya | praśāntādapi hi prājñādbhetavyaṃ balinaḥ sadā

यदि तुम उस उपकार को जानते हो, तो उस मित्रता को याद रखो। बलवान् से, चाहे वह शान्त और बुद्धिमान् भी हो, सदा डरना चाहिए।

श्लोक 177 (12.138.177)

यदि त्वर्थेन ते कार्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । कामं सर्वं प्रदास्यामि न त्वात्मानं कथंचन ॥

yadi tvarthena te kāryaṃ brūhi kiṃ karavāṇi te | kāmaṃ sarvaṃ pradāsyāmi na tvātmānaṃ kathaṃcana

यदि तुम्हें धन से काम हो तो कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ; मैं सब कुछ प्रसन्नता से दूँगा, पर अपने आपको किसी भी प्रकार नहीं।

श्लोक 178 (12.138.178)

आत्मार्थे संततिस्त्याज्या राज्यं रत्नं धनानि च । अपि सर्वस्वमुत्सृज्य रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥

ātmārthe saṃtatistyājyā rājyaṃ ratnaṃ dhanāni ca | api sarvasvamutsṛjya rakṣedātmānamātmavān

अपने लिए संतान, राज्य, रत्न और धन छोड़ देना चाहिए। आत्मसंयमी पुरुष को सब कुछ त्यागकर भी अपनी रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 179 (12.138.179)

ऐश्वर्यधनरत्नानां प्रत्यमित्रेऽपि वर्तताम् । दृष्टा हि पुनरावृत्तिर्जीवतामिति नः श्रुतम् ॥

aiśvaryadhanaratnānāṃ pratyamitre'pi vartatām | dṛṣṭā hi punarāvṛttirjīvatāmiti naḥ śrutam

ऐश्वर्य, धन और रत्न भले ही शत्रु के पास रहें; जीवित लोगों के लिए उनका फिर लौटना देखा गया है, ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 180 (12.138.180)

न त्वात्मनः संप्रदानं धनरत्नवदिष्यते । आत्मा हि सर्वदा रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि ॥

na tvātmanaḥ saṃpradānaṃ dhanaratnavadiṣyate | ātmā hi sarvadā rakṣyo dārairapi dhanairapi

पर अपने को दे देना धन और रत्न के समान स्वीकार नहीं किया जाता। अपनी रक्षा सदा करनी चाहिए, पत्नियों और धन की कीमत पर भी।

श्लोक 181 (12.138.181)

आत्मरक्षणतन्त्राणां सुपरीक्षितकारिणाम् । आपदो नोपपद्यन्ते पुरुषाणां स्वदोषजाः ॥

ātmarakṣaṇatantrāṇāṃ suparīkṣitakāriṇām | āpado nopapadyante puruṣāṇāṃ svadoṣajāḥ

जो पुरुष अपनी रक्षा का उपाय करते हैं और भली-भाँति सोचकर काम करते हैं, उन पर अपने दोषों से उत्पन्न विपत्तियाँ नहीं आतीं।

श्लोक 182 (12.138.182)

शत्रुः सम्यगविज्ञातो विप्रियो ह्यबलीयसा । शङ्कनीयः स सर्वत्र प्रियमप्याचरन्सदा ॥

śatruḥ samyagavijñāto vipriyo hyabalīyasā | śaṅkanīyaḥ sa sarvatra priyamapyācaransadā

जो शत्रु भली-भाँति जाना नहीं गया हो और निर्बल के प्रति द्वेष रखता हो, वह सदा प्रिय आचरण करता हुआ भी सर्वत्र शंका के योग्य है।

श्लोक 183 (12.138.183)

कुलजानां सुमित्राणां धार्मिकाणां महात्मनाम् । न तेषां चाल्यते बुद्धिः शास्त्रार्थकृतनिश्चया ॥

kulajānāṃ sumitrāṇāṃ dhārmikāṇāṃ mahātmanām | na teṣāṃ cālyate buddhiḥ śāstrārthakṛtaniścayā

कुलीन, सुमित्र, धार्मिक और महात्मा पुरुषों की बुद्धि शास्त्र के अर्थ से दृढ़ निश्चय वाली होने के कारण विचलित नहीं होती।

भीष्म उवाच

श्लोक 184 (12.138.184)

इत्यभिव्यक्तमेवासौ पलितेनापहासितः । मार्जारो व्रीडितो भूत्वा मूषिकं वाक्यमब्रवीत् ॥

ityabhivyaktamevāsau palitenāpahāsitaḥ | mārjāro vrīḍito bhūtvā mūṣikaṃ vākyamabravīt

इस प्रकार पलित के द्वारा खुले रूप से उपहास किए जाने पर बिलाव लज्जित हुआ और चूहे से बोला।

लोमश उवाच

श्लोक 185 (12.138.185)

सत्यं शपे त्वयाऽहं वै मित्रद्रोहो विगर्हितः । संमन्येऽहं तव प्रज्ञां यस्त्वं मम हिते रतः ॥

satyaṃ śape tvayā'haṃ vai mitradroho vigarhitaḥ | saṃmanye'haṃ tava prajñāṃ yastvaṃ mama hite rataḥ

मैं तुम्हारी शपथ खाकर सच कहता हूँ कि मित्र से द्रोह करना मैं निन्दनीय मानता हूँ। मैं तुम्हारी बुद्धि की सराहना करता हूँ, जो तुम मेरे हित में लगे हो।

श्लोक 186 (12.138.186)

उक्तवानर्थतत्त्वेन मया संभिन्नदर्शनः । न तु मामन्यथा साधो त्वं ग्रहीतुमिहार्हसि ॥

uktavānarthatattvena mayā saṃbhinnadarśanaḥ | na tu māmanyathā sādho tvaṃ grahītumihārhasi

तुमने वस्तु के यथार्थ के अनुसार ही कहा, पर मेरे विषय में तुम्हारी दृष्टि मुझसे भिन्न है; किन्तु हे साधु, तुम्हें मुझे और रूप में नहीं समझना चाहिए।

श्लोक 187 (12.138.187)

प्राणप्रदानजं त्वत्तो मयि सौहृदमागतम् । धर्मज्ञोऽस्मि गुणज्ञोऽस्मि कृतज्ञोऽस्मि विशेषतः ॥

prāṇapradānajaṃ tvatto mayi sauhṛdamāgatam | dharmajño'smi guṇajño'smi kṛtajño'smi viśeṣataḥ

तुम्हारे द्वारा प्राण दिए जाने से मुझमें तुम्हारे प्रति मित्रता उत्पन्न हुई है। मैं धर्म को जानता हूँ, गुण को जानता हूँ और विशेष रूप से कृतज्ञ हूँ।

श्लोक 188 (12.138.188)

मित्रेषु वत्सलश्चास्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः । त्वं मामेवंगते साधो न वाचयितुमर्हसि ॥

mitreṣu vatsalaścāsmi tvadbhaktaśca viśeṣataḥ | tvaṃ māmevaṃgate sādho na vācayitumarhasi

मैं मित्रों के प्रति स्नेह रखता हूँ, और विशेष रूप से तुम्हारा भक्त हूँ। हे साधु, मेरी ऐसी दशा में तुम्हें मुझे फटकारना उचित नहीं।

श्लोक 189 (12.138.189)

त्वया हि वाच्यमानोऽहं जह्यां प्राणान्सबान्धवः । धिक्शब्दो हि बुधैर्दृष्टो मद्विधेषु मनस्विषु । पतनं धर्मतत्त्वज्ञ न मे शङ्कितुमर्हसि ॥

tvayā hi vācyamāno'haṃ jahyāṃ prāṇānsabāndhavaḥ | dhikśabdo hi budhairdṛṣṭo madvidheṣu manasviṣu | patanaṃ dharmatattvajña na me śaṅkitumarhasi

तुम्हारे फटकारने पर मैं अपने बन्धुओं सहित प्राण त्याग दूँगा। मुझ जैसे स्वाभिमानी लोगों में "धिक्कार" शब्द को ज्ञानियों ने बहुत भारी माना है; हे धर्म के तत्त्व को जानने वाले, मेरे पतन की शंका करना तुम्हें उचित नहीं।

भीष्म उवाच

श्लोक 190 (12.138.190)

इति संस्तूयमानोऽपि मार्जारेण स मूषिकः । मनसा भावगम्भीरं मार्जारमिदमब्रवीत् ॥

iti saṃstūyamāno'pi mārjāreṇa sa mūṣikaḥ | manasā bhāvagambhīraṃ mārjāramidamabravīt

बिलाव के इस प्रकार प्रशंसा करने पर भी चूहे ने मन में गहरा विचार करके बिलाव से यह कहा।

पलित उवाच

श्लोक 191 (12.138.191)

साधुर्भवान्कृतार्थोऽस्मि प्रिये च न च विश्वसे । संस्तवैर्वा धनौघैर्वा नाहं शक्यः पुनस्त्वया ॥

sādhurbhavānkṛtārtho'smi priye ca na ca viśvase | saṃstavairvā dhanaughairvā nāhaṃ śakyaḥ punastvayā

तुम भले हो और मैं सन्तुष्ट हूँ; प्रिय बात से प्रसन्न होता हूँ, फिर भी विश्वास नहीं करता। न स्तुतियों से और न धन की बाढ़ से तुम मुझे फिर वश में कर सकते हो।

श्लोक 192 (12.138.192)

न ह्यमित्रवशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे । अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निबोधोशनसा कृते ॥

na hyamitravaśaṃ yānti prājñā niṣkāraṇaṃ sakhe | asminnarthe ca gāthe dve nibodhośanasā kṛte

हे मित्र, बुद्धिमान् लोग बिना कारण शत्रु के वश में नहीं जाते। इस विषय में शुक्राचार्य के रचे दो श्लोक सुनो।

श्लोक 193 (12.138.193)

शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा सन्धिं बलीयसा । समाहितश्चरेद्बुद्ध्या कृतार्थश्च न विश्वसेत् ॥

śatrusādhāraṇe kṛtye kṛtvā sandhiṃ balīyasā | samāhitaścaredbuddhyā kṛtārthaśca na viśvaset

जब कोई कार्य शत्रु के साथ साझा हो और बलवान् के साथ संधि कर ली गई हो, तब मनुष्य सावधान होकर बुद्धि से चले, और काम पूरा हो जाने पर विश्वास न करे।

श्लोक 194 (12.138.194)

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । नित्यं विश्वासयेदन्यान्परेषां तु न विश्वसेत् ॥

na viśvasedaviśvaste viśvaste nātiviśvaset | nityaṃ viśvāsayedanyānpareṣāṃ tu na viśvaset

जो विश्वास न करे उस पर विश्वास न करे, और जो विश्वास करे उस पर भी अधिक विश्वास न करे। दूसरों को सदा अपने ऊपर विश्वास दिलाए, पर स्वयं दूसरों पर विश्वास न करे।

श्लोक 195 (12.138.195)

तस्मात्सर्वास्ववस्थासु रक्षेज्जीवितमात्मनः । द्रव्याणि संततिश्चैव सर्वं भवति जीवताम् ॥

tasmātsarvāsvavasthāsu rakṣejjīvitamātmanaḥ | dravyāṇi saṃtatiścaiva sarvaṃ bhavati jīvatām

इसलिए सभी अवस्थाओं में मनुष्य को अपने प्राणों की रक्षा करनी चाहिए; धन, संतान और सब कुछ जीवितों का ही होता है।

श्लोक 196 (12.138.196)

संक्षेपो नीतिशास्त्राणामविश्वासः परो मतः । नृषु तस्मादविश्वासः पुष्कलं हितमात्मनः ॥

saṃkṣepo nītiśāstrāṇāmaviśvāsaḥ paro mataḥ | nṛṣu tasmādaviśvāsaḥ puṣkalaṃ hitamātmanaḥ

नीतिशास्त्रों का सार अविश्वास को ही माना गया है। इसलिए मनुष्यों में अविश्वास अपने लिए पूरा हितकारी है।

श्लोक 197 (12.138.197)

वध्यन्ते न ह्यविश्वस्ताः शत्रुभिर्दुर्बला अपि । विश्वस्तास्तेषु वध्यन्ते बलवन्तोऽपि शत्रुभिः ॥

vadhyante na hyaviśvastāḥ śatrubhirdurbalā api | viśvastāsteṣu vadhyante balavanto'pi śatrubhiḥ

जो विश्वास नहीं करते वे दुर्बल होकर भी शत्रुओं द्वारा नहीं मारे जाते; जो विश्वास करते हैं वे बलवान् होकर भी शत्रुओं द्वारा मारे जाते हैं।

श्लोक 198 (12.138.198)

त्वद्विधेभ्यो मया ह्यात्मा रक्ष्यो मार्जार सर्वदा । रक्ष त्वमपि चात्मानं चण्डालाज्जातिकिल्बिषात् ॥

tvadvidhebhyo mayā hyātmā rakṣyo mārjāra sarvadā | rakṣa tvamapi cātmānaṃ caṇḍālājjātikilbiṣāt

हे बिलाव, तुम जैसों से मुझे सदा अपनी रक्षा करनी चाहिए; और तुम भी जन्म से दूषित उस चाण्डाल से अपनी रक्षा करो।

भीष्म उवाच

श्लोक 199 (12.138.199)

स तस्य ब्रुवतस्त्वेवं संत्रासाज्जातसाध्वसः । कथां हित्वा जवेनाशु मार्जारः प्रययौ ततः ॥

sa tasya bruvatastvevaṃ saṃtrāsājjātasādhvasaḥ | kathāṃ hitvā javenāśu mārjāraḥ prayayau tataḥ

उसके इस प्रकार बोलते रहने पर भय से घबराया हुआ बिलाव बातचीत छोड़कर तेजी से वहाँ से चला गया।

श्लोक 200 (12.138.200)

ततः शास्त्रार्थतत्त्वज्ञो बुद्धिसामर्थ्यमात्मनः । विश्राव्य पलितः प्राज्ञो बिलमन्यज्जगाम ह ॥

tataḥ śāstrārthatattvajño buddhisāmarthyamātmanaḥ | viśrāvya palitaḥ prājño bilamanyajjagāma ha

तब शास्त्र के अर्थ को जानने वाला बुद्धिमान् पलित अपनी बुद्धि का सामर्थ्य दिखाकर दूसरे बिल में चला गया।

श्लोक 201 (12.138.201)

एवं प्रज्ञावता बुद्ध्या दुर्बलेन महाबलाः । एकेन बहवोऽमित्राः पलितेनाभिसंधिताः ॥

evaṃ prajñāvatā buddhyā durbalena mahābalāḥ | ekena bahavo'mitrāḥ palitenābhisaṃdhitāḥ

इस प्रकार बुद्धिमान् पलित नामक एक दुर्बल चूहे ने अपनी समझ से अनेक बलवान् शत्रुओं को चकमा दे दिया।

श्लोक 202 (12.138.202)

अरिणापि समर्थेन सन्धिं कुर्वीत पण्डितः । मूषिकश्च बिडालश्च मुक्तावन्योन्यसंश्रयात् ॥

ariṇāpi samarthena sandhiṃ kurvīta paṇḍitaḥ | mūṣikaśca biḍālaśca muktāvanyonyasaṃśrayāt

बुद्धिमान् को समर्थ शत्रु से भी संधि कर लेनी चाहिए। चूहा और बिलाव एक-दूसरे के सहारे दोनों छूट गए।

श्लोक 203 (12.138.203)

इत्येवं क्षत्रधर्मस्य मया मार्गो निदर्शितः । विस्तरेण महाराज संक्षेपमपि मे शृणु ॥

ityevaṃ kṣatradharmasya mayā mārgo nidarśitaḥ | vistareṇa mahārāja saṃkṣepamapi me śṛṇu

हे महाराज, इस प्रकार मैंने तुम्हें क्षत्रिय-धर्म का मार्ग विस्तार से दिखाया; अब इसे संक्षेप में भी सुनो।

श्लोक 204 (12.138.204)

अन्योन्यं कृतवैरौ तु चक्रतुः प्रीतिमुत्तमाम् । अन्योन्यमभिसंधातुं संबभूव तयोर्मतिः ॥

anyonyaṃ kṛtavairau tu cakratuḥ prītimuttamām | anyonyamabhisaṃdhātuṃ saṃbabhūva tayormatiḥ

परस्पर वैर रखने वाले उन दोनों ने उत्तम मित्रता कर ली, और फिर दोनों के मन में एक-दूसरे को छलने का विचार भी उठा।

श्लोक 205 (12.138.205)

तत्र प्राज्ञोऽभिसंधत्ते सम्यग्बुद्धिबलाश्रयात् । अभिसंधीयते प्राज्ञः प्रमादादपि वा बुधैः ॥

tatra prājño'bhisaṃdhatte samyagbuddhibalāśrayāt | abhisaṃdhīyate prājñaḥ pramādādapi vā budhaiḥ

ऐसे में बुद्धिमान् अपनी बुद्धि के बल का आश्रय लेकर दूसरे को छल लेता है; और बुद्धिमान् भी असावधानी से दूसरे चतुर लोगों द्वारा छल लिया जाता है।

श्लोक 206 (12.138.206)

तस्मादभीतवद्भीतो विश्वस्तवदविश्वसेत् । न ह्यप्रमत्तश्चलति चलितो वा न नश्यति ॥

tasmādabhītavadbhīto viśvastavadaviśvaset | na hyapramattaścalati calito vā na naśyati

इसलिए भयभीत होकर भी निर्भय की तरह और अविश्वास रखते हुए भी विश्वास करने वाले की तरह व्यवहार करे; क्योंकि सावधान मनुष्य डगमगाता नहीं, और डगमगाए भी तो नष्ट नहीं होता।

श्लोक 207 (12.138.207)

काले हि रिपुणा संधिः काले मित्रेण विग्रहः । कार्य इत्येव तत्त्वज्ञाः प्राहुर्नित्यं नराधिप ॥

kāle hi ripuṇā saṃdhiḥ kāle mitreṇa vigrahaḥ | kārya ityeva tattvajñāḥ prāhurnityaṃ narādhipa

हे नरेश्वर, तत्त्व को जानने वाले सदा यही कहते हैं कि उचित समय पर शत्रु से संधि और उचित समय पर मित्र से विग्रह करना चाहिए।

श्लोक 208 (12.138.208)

एतज्ज्ञात्वा महाराज शास्त्रार्थमभिगम्य च । अभियुक्तोऽप्रमत्तश्च प्राग्भयाद्भीतवच्चरेत् ॥

etajjñātvā mahārāja śāstrārthamabhigamya ca | abhiyukto'pramattaśca prāgbhayādbhītavaccaret

हे महाराज, यह जानकर और शास्त्र के अर्थ को समझकर, सतर्क और सावधान रहो, तथा भय आने से पहले ही भयभीत मनुष्य की भाँति चलो।

श्लोक 209 (12.138.209)

भीतवत्संहितः कार्यः प्रतिसंधिस्तथैव च । भयादुत्पद्यते बुद्धिरप्रमत्ताभियोगजा ॥

bhītavatsaṃhitaḥ kāryaḥ pratisaṃdhistathaiva ca | bhayādutpadyate buddhirapramattābhiyogajā

भयभीत मनुष्य की तरह संधि करनी चाहिए और उसी प्रकार प्रतिसंधि भी; भय से ही सावधान प्रयत्न से उत्पन्न होने वाली बुद्धि जन्म लेती है।

श्लोक 210 (12.138.210)

न भयं जायते राजन्भीतस्यानागते भये । अभीतस्य च विस्रम्भात्सुमहज्जायते भयम् ॥

na bhayaṃ jāyate rājanbhītasyānāgate bhaye | abhītasya ca visrambhātsumahajjāyate bhayam

हे राजन्, जो आने वाले भय से पहले ही सावधान रहता है उसे भय नहीं सताता; पर निर्भय रहने वाले को अति विश्वास के कारण बहुत बड़ा भय उत्पन्न होता है।

श्लोक 211 (12.138.211)

न भीरुरिति चात्यन्तं मन्त्रोऽदेयः कथंचन । अविज्ञानाद्धि विज्ञाने गच्छेदास्पददर्शिषु ॥

na bhīruriti cātyantaṃ mantro'deyaḥ kathaṃcana | avijñānāddhi vijñāne gacchedāspadadarśiṣu

"यह डरपोक नहीं है" — इस आधार पर कभी भी अपनी मन्त्रणा किसी को नहीं देनी चाहिए; क्योंकि अनजान में वह जान ली जाने पर उन लोगों के पास पहुँच जाती है जो कमजोरी की ताक में रहते हैं।

श्लोक 212 (12.138.212)

तस्मादभीतवद्भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् । कार्याणां गुरुतां ज्ञात्वा नादृतं किंचिदाचरेत् ॥

tasmādabhītavadbhīto viśvastavadaviśvasan | kāryāṇāṃ gurutāṃ jñātvā nādṛtaṃ kiṃcidācaret

इसलिए भयभीत होकर निर्भय की तरह और अविश्वासी होकर विश्वासी की तरह रहे; कार्यों की गुरुता को समझकर कोई भी काम उपेक्षा से न करे।

श्लोक 213 (12.138.213)

एवमेतन्मया प्रोक्तमितिहासं युधिष्ठिर । श्रुत्वा त्वं सुहृदां मध्ये यथावत्समुदाचर ॥

evametanmayā proktamitihāsaṃ yudhiṣṭhira | śrutvā tvaṃ suhṛdāṃ madhye yathāvatsamudācara

हे युधिष्ठिर, यह इतिहास मैंने तुम्हें सुनाया। इसे सुनकर अपने मित्रों के बीच यथोचित व्यवहार करो।

श्लोक 214 (12.138.214)

उपलभ्य मतिं चाग्र्यामरिमित्रान्तरं तथा । संधिविग्रहकालौ च मोक्षोपायं तथाऽऽपदि ॥

upalabhya matiṃ cāgryāmarimitrāntaraṃ tathā | saṃdhivigrahakālau ca mokṣopāyaṃ tathā''padi

श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त करके — शत्रु और मित्र का भेद, संधि और विग्रह के समय, और विपत्ति में छूटने का उपाय जानकर —

श्लोक 215 (12.138.215)

शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा सन्धिं बलीयसा । समागतश्चरेद्बुद्ध्या कृतार्थो न च विश्वसेत् ॥

śatrusādhāraṇe kṛtye kṛtvā sandhiṃ balīyasā | samāgataścaredbuddhyā kṛtārtho na ca viśvaset

शत्रु के साथ साझा कार्य में बलवान् से संधि करके, उसके साथ मिलकर बुद्धि से चले, और काम पूरा हो जाने पर विश्वास न करे।

श्लोक 216 (12.138.216)

अविरुद्धां त्रिवर्गेण नीतिमेतां महीपते । अभ्युत्तिष्ठ श्रुतात्तस्माद्भूयः संरञ्जयन्प्रजाः ॥

aviruddhāṃ trivargeṇa nītimetāṃ mahīpate | abhyuttiṣṭha śrutāttasmādbhūyaḥ saṃrañjayanprajāḥ

हे पृथ्वीपति, यह नीति तीनों पुरुषार्थों के विरुद्ध नहीं है। जो तुमने सुना है उससे उठ खड़े हो और प्रजा को और अधिक प्रसन्न करो।

श्लोक 217 (12.138.217)

ब्राह्मणैश्चापि ते सार्धं यात्रा भवतु पाण्डव । ब्राह्मणाद्धि परं श्रेयो दिवि चेह च भारत ॥

brāhmaṇaiścāpi te sārdhaṃ yātrā bhavatu pāṇḍava | brāhmaṇāddhi paraṃ śreyo divi ceha ca bhārata

हे पाण्डव, तुम्हारी जीवन-यात्रा ब्राह्मणों के साथ हो; क्योंकि हे भारत, स्वर्ग में और यहाँ भी ब्राह्मण से श्रेष्ठ कल्याण कुछ नहीं।

श्लोक 218 (12.138.218)

एते धर्मस्य वेत्तारः कृतज्ञाः सततं प्रभो । पूजिताः शुभकर्तारः पूजयैनान्नराधिप ॥

ete dharmasya vettāraḥ kṛtajñāḥ satataṃ prabho | pūjitāḥ śubhakartāraḥ pūjayainānnarādhipa

हे प्रभु, ये धर्म को जानने वाले और सदा कृतज्ञ हैं; पूजित होने पर शुभ कर्म करते हैं। हे राजन्, इनका सम्मान करो।

श्लोक 219 (12.138.219)

राज्यं श्रेयः परं राजन्यशश्च महदाप्स्यसे । कुलस्य संततिं चैव यथान्यायं यथाक्रमम् ॥

rājyaṃ śreyaḥ paraṃ rājanyaśaśca mahadāpsyase | kulasya saṃtatiṃ caiva yathānyāyaṃ yathākramam

हे राजन्, तुम्हें राज्य, परम कल्याण और महान् यश प्राप्त होगा, तथा कुल की परम्परा भी न्यायपूर्वक और क्रम से बनी रहेगी।

श्लोक 220 (12.138.220)

श्रुतं च ते भारत संधिविग्रहं । विभावितं बुद्धिविशेषकारितम् । तथा त्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा । निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डलम् ॥

śrutaṃ ca te bhārata saṃdhivigrahaṃ | vibhāvitaṃ buddhiviśeṣakāritam | tathā tvavekṣya kṣitipena sarvadā | niṣevitavyaṃ nṛpa śatrumaṇḍalam

हे भारत, तुमने संधि और विग्रह के विषय में सुन लिया, जो श्रेष्ठ बुद्धि से रचा और भली-भाँति समझाया गया है। हे राजन्, इसे ध्यान में रखकर राजा को शत्रुओं के मण्डल के साथ सदा इसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए।

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