शान्ति पर्व · अध्याय 139
पक्षिणी पूजनी और राजा ब्रह्मदत्त: वैरी पर अविश्वास
युधिष्ठिर पूछते हैं कि यदि राजा किसी पर विश्वास न करे तो वह कैसे रहे। भीष्म इसके उत्तर में पूजनी नामक पक्षिणी की कथा सुनाते हैं, जो काम्पिल्य के राजा ब्रह्मदत्त के महल में रहती थी। राजकुमार उसके बच्चे को मार डालता है और वह बदले में उसकी आँखें निकाल लेती है; तब राजा उसे रोकता है, और दोनों इस पर तर्क करते हैं कि ऐसी घटनाएँ काल से होती हैं या कर्म से, और क्या वैर कभी मिट सकता है। पूजनी का मत है कि अपकार हो जाने पर विश्वास फिर नहीं लौटता; जाने से पहले वह अच्छे देश, अच्छे मित्र और प्रजा की रक्षा करने वाले अच्छे राजा का वर्णन करती है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.139.1)
उक्तो मन्त्रो महाबाहो विश्वासो नास्ति शत्रुषु । कथं हि राजा वर्तेत यदि सर्वत्र नाश्वसेत् ॥
ukto mantro mahābāho viśvāso nāsti śatruṣu | kathaṃ hi rājā varteta yadi sarvatra nāśvaset
हे महाबाहो, आपने यह उपदेश दिया कि शत्रुओं पर विश्वास नहीं करना चाहिए। परन्तु यदि राजा कहीं भी किसी पर भरोसा न करे, तो वह कैसे व्यवहार करे?
श्लोक 2 (12.139.2)
विश्वासाद्धि परं राजन्राज्ञामुत्पद्यते भयम् । कथं हि नाश्वसन्राजा शत्रूञ्जयति पार्थिवः ॥
viśvāsāddhi paraṃ rājanrājñāmutpadyate bhayam | kathaṃ hi nāśvasanrājā śatrūñjayati pārthivaḥ
हे राजन्, राजाओं पर सबसे बड़ा भय विश्वास से ही आता है। फिर किसी पर विश्वास न करने वाला राजा शत्रुओं को कैसे जीत सकता है?
श्लोक 3 (12.139.3)
एतन्मे संशयं छिन्धि मनो मे संप्रमुह्यति । अविश्वासे कथामेतामुपाश्रित्य पितामह ॥
etanme saṃśayaṃ chindhi mano me saṃpramuhyati | aviśvāse kathāmetāmupāśritya pitāmaha
पितामह, मेरे इस संशय को दूर कीजिए; मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है। अविश्वास के विषय में कोई कथा लेकर उसे मुझे सुनाइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (12.139.4)
शृणुष्व राजन्यो वृत्तो ब्रह्मदत्तनिवेशने । पूजन्या सह संवादो ब्रह्मदत्तस्य भूपतेः ॥
śṛṇuṣva rājanyo vṛtto brahmadattaniveśane | pūjanyā saha saṃvādo brahmadattasya bhūpateḥ
हे राजन्, सुनो; ब्रह्मदत्त के भवन में जो घटा था, वह राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी का संवाद सुनो।
श्लोक 5 (12.139.5)
काम्पिल्ये ब्रह्मदत्तस्य त्वन्तःपुरनिवासिनी । पूजनी नाम शकुनिर्दीर्घकालं सहोषिता ॥
kāmpilye brahmadattasya tvantaḥpuranivāsinī | pūjanī nāma śakunirdīrghakālaṃ sahoṣitā
काम्पिल्य नगर में ब्रह्मदत्त के अन्तःपुर में पूजनी नाम की एक पक्षिणी बहुत समय से रहती थी।
श्लोक 6 (12.139.6)
रुतज्ञा सर्वभूतानां यथा वै जीवजीवकः । सर्वज्ञा सर्वतत्त्वज्ञा तिर्यग्योनिं गताऽपि सा ॥
rutajñā sarvabhūtānāṃ yathā vai jīvajīvakaḥ | sarvajñā sarvatattvajñā tiryagyoniṃ gatā'pi sā
वह जीवजीवक पक्षी के समान सब प्राणियों की बोली समझती थी। पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेकर भी वह सब कुछ जानने वाली और सब तत्त्वों को जानने वाली थी।
श्लोक 7 (12.139.7)
अभिप्रजाता सा तत्र पुत्रमेकं सुवर्चसम् । समकालं च राज्ञोऽपि देव्यां पुत्रो व्यजायत ॥
abhiprajātā sā tatra putramekaṃ suvarcasam | samakālaṃ ca rājño'pi devyāṃ putro vyajāyata
वहीं उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया; और उसी समय राजा की रानी ने भी पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 8 (12.139.8)
तयोरर्थे कृतज्ञा तु खेचरी पूजनी सदा । समुद्रतीरं सा गत्वा आजहार फलद्वयम् ॥
tayorarthe kṛtajñā tu khecarī pūjanī sadā | samudratīraṃ sā gatvā ājahāra phaladvayam
आकाश में विचरने वाली कृतज्ञ पूजनी उन दोनों बालकों के लिए सदा समुद्र के तट पर जाती और दो फल ले आती थी।
श्लोक 9 (12.139.9)
पुष्ट्यर्थं च स्वपुत्रस्य राजपुत्रस्य चैव ह । फलमेकं सुतायादाद्राजपुत्राय चापरम् ॥
puṣṭyarthaṃ ca svaputrasya rājaputrasya caiva ha | phalamekaṃ sutāyādādrājaputrāya cāparam
अपने पुत्र और राजपुत्र के पोषण के लिए वह एक फल अपने बच्चे को देती और दूसरा राजकुमार को।
श्लोक 10 (12.139.10)
अमृतास्वादसदृशं बलतेजोभिवर्धनम् । आदायादाय सैवाशु तयोः प्रादात्पुनः पुनः ॥
amṛtāsvādasadṛśaṃ balatejobhivardhanam | ādāyādāya saivāśu tayoḥ prādātpunaḥ punaḥ
वह फल अमृत के समान स्वादिष्ट था और बल तथा तेज को बढ़ाने वाला था। वह बार-बार उसे लाकर शीघ्र ही उन दोनों को देती रही।
श्लोक 11 (12.139.11)
ततोऽगच्छत्परां वृद्धिं राजपुत्रः फलाशनात् । ततः स धात्र्या कक्षेण उह्यमानो नृपात्मजः ॥
tato'gacchatparāṃ vṛddhiṃ rājaputraḥ phalāśanāt | tataḥ sa dhātryā kakṣeṇa uhyamāno nṛpātmajaḥ
फल खाने से राजकुमार बहुत बलवान हो गया। तब वह राजपुत्र, जिसे धाय अपनी कटि पर उठाए हुए थी,
श्लोक 12 (12.139.12)
ददर्श तं पक्षिसुतं बाल्यादागत्य बालकः । ततो बाल्याच्च यत्नेन तेनाक्रीडत पक्षिणा ॥
dadarśa taṃ pakṣisutaṃ bālyādāgatya bālakaḥ | tato bālyācca yatnena tenākrīḍata pakṣiṇā
उस पक्षी के बच्चे को देखकर, बालकपन के कारण पास आया और बड़े यत्न से उस पक्षी के साथ खेलने लगा।
श्लोक 13 (12.139.13)
शून्ये च तमुपादाय पक्षिणं समजातकम् । हत्वा ततः स राजेन्द्र धात्र्या हस्तमुपागतः ॥
śūnye ca tamupādāya pakṣiṇaṃ samajātakam | hatvā tataḥ sa rājendra dhātryā hastamupāgataḥ
फिर हे राजेन्द्र, सूना स्थान पाकर उसने अपने समान आयु वाले उस पक्षी को पकड़कर मार डाला और उसके बाद वह धाय की गोद में लौट गया।
श्लोक 14 (12.139.14)
अथ सा पूजनी राजन्नागमत्फलहारिणी । अपश्यन्निहतं पुत्रं तेन बालेन भूतले ॥
atha sā pūjanī rājannāgamatphalahāriṇī | apaśyannihataṃ putraṃ tena bālena bhūtale
तब फल लाने गई हुई पूजनी, हे राजन्, लौटी और उसने देखा कि उसका पुत्र उस बालक के हाथों मारा गया है और धरती पर पड़ा है।
श्लोक 15 (12.139.15)
बाष्पपूर्णमुखी दीना दृष्ट्वा तं पतितं सुतम् । पूजनी दुःखसंतप्ता रुदन्ती वाक्यमब्रवीत् ॥
bāṣpapūrṇamukhī dīnā dṛṣṭvā taṃ patitaṃ sutam | pūjanī duḥkhasaṃtaptā rudantī vākyamabravīt
आँसुओं से भरे मुख वाली, दुःखी पूजनी अपने पुत्र को गिरा हुआ देखकर शोक से जलती हुई रोती हुई यह वचन बोली।
पूजन्युवाच
श्लोक 16 (12.139.16)
क्षत्रिये संगतं नास्ति न प्रीतिर्न च सौहृदम् । कारणे सान्त्वयन्त्येते कृतार्थाः संत्यजन्ति च ॥
kṣatriye saṃgataṃ nāsti na prītirna ca sauhṛdam | kāraṇe sāntvayantyete kṛtārthāḥ saṃtyajanti ca
क्षत्रियों में न सच्चा संग होता है, न प्रेम, न मित्रता। वे प्रयोजन होने पर ही सान्त्वना देते हैं और काम निकल जाने पर त्याग देते हैं।
श्लोक 17 (12.139.17)
क्षत्रियेषु न विश्वासः कार्यः सर्वापकारिषु । अपकृत्यापि सततं सान्त्वयन्ति निरर्थकम् ॥
kṣatriyeṣu na viśvāsaḥ kāryaḥ sarvāpakāriṣu | apakṛtyāpi satataṃ sāntvayanti nirarthakam
सबको हानि पहुँचाने वाले क्षत्रियों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। वे अपकार करके भी निरन्तर व्यर्थ ही मीठी बातें करते रहते हैं।
श्लोक 18 (12.139.18)
इयमस्य करोम्यद्य सदृशीं वैरयातनाम् । कृतघ्नस्य नृशंसस्य भृशं विश्वासघातिनः ॥
iyamasya karomyadya sadṛśīṃ vairayātanām | kṛtaghnasya nṛśaṃsasya bhṛśaṃ viśvāsaghātinaḥ
आज मैं इस कृतघ्न, क्रूर और विश्वासघाती से वैर के अनुरूप ही बदला लूँगी।
श्लोक 19 (12.139.19)
सहसंजातवृद्धस्य तथैव सहभोजिनः । शरण्यस्य वधश्चैव त्रिविधं तस्य किल्विषम् ॥
sahasaṃjātavṛddhasya tathaiva sahabhojinaḥ | śaraṇyasya vadhaścaiva trividhaṃ tasya kilviṣam
इसने अपने साथ जन्मे और पले हुए, साथ भोजन करने वाले और शरण में आए हुए का वध किया है; इसका पाप तीन प्रकार का है।
भीष्म उवाच
श्लोक 20 (12.139.20)
इत्युक्त्वा चरणाभ्यां तु नेत्रे नृपसुतस्य सा । हृत्वा स्वस्था तत इदं पूजनी वाक्यमब्रवीत् ॥
ityuktvā caraṇābhyāṃ tu netre nṛpasutasya sā | hṛtvā svasthā tata idaṃ pūjanī vākyamabravīt
ऐसा कहकर उसने अपने पंजों से राजपुत्र की दोनों आँखें निकाल लीं; फिर शान्त होकर पूजनी ने यह वचन कहा।
पूजन्युवाच
श्लोक 21 (12.139.21)
इच्छयेह कृतं पापं सद्य एवोपसर्पति । कृतं प्रतिकृतं येषां न नश्यति शुभाशुभम् ॥
icchayeha kṛtaṃ pāpaṃ sadya evopasarpati | kṛtaṃ pratikṛtaṃ yeṣāṃ na naśyati śubhāśubham
जान-बूझकर किया हुआ पाप तुरन्त कर्ता के पास पहुँचता है। जिन्होंने कर्म के बदले कर्म किया है, उनका किया हुआ शुभ और अशुभ नष्ट नहीं होता।
श्लोक 22 (12.139.22)
पापं कर्म कृतं किंचिद्यदि तस्मिन्न दृश्यते । निपात्यतेऽस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥
pāpaṃ karma kṛtaṃ kiṃcidyadi tasminna dṛśyate | nipātyate'sya putreṣu pautreṣvapi ca naptṛṣu
यदि किया हुआ पाप कर्ता में ही दिखाई न दे, तो वह उसके पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रों पर गिरता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (12.139.23)
ब्रह्मदत्तः सुतं दृष्ट्वा पूजन्या हृतलोचनम् । कृतप्रतिकृतं मत्वा पूजनीमिदमब्रवीत् ॥
brahmadattaḥ sutaṃ dṛṣṭvā pūjanyā hṛtalocanam | kṛtapratikṛtaṃ matvā pūjanīmidamabravīt
पूजनी के द्वारा अपने पुत्र की आँखें निकाली गई देखकर ब्रह्मदत्त ने कर्म का बदला कर्म से चुका हुआ माना और पूजनी से यह कहा।
ब्रह्मदत्त उवाच
श्लोक 24 (12.139.24)
अस्ति वै कृतमस्माभिरस्ति प्रतिकृतं त्वया । उभयं तत्समीभूतं वस पूजनि मा गमः ॥
asti vai kṛtamasmābhirasti pratikṛtaṃ tvayā | ubhayaṃ tatsamībhūtaṃ vasa pūjani mā gamaḥ
हमने अपकार किया और तुमने उसका बदला चुका दिया। दोनों बराबर हो गए। पूजनी, यहीं रहो; मत जाओ।
पूजन्युवाच
श्लोक 25 (12.139.25)
सकृत्कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतः । न तद्बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम् ॥
sakṛtkṛtāparādhasya tatraiva parilambataḥ | na tadbudhāḥ praśaṃsanti śreyastatrāpasarpaṇam
जिसने एक बार अपराध कर दिया हो और फिर भी वहीं विश्वास करके टिका रहे, उसे ज्ञानी लोग अच्छा नहीं कहते; वहाँ से हट जाना ही श्रेयस्कर है।
श्लोक 26 (12.139.26)
सान्त्वे प्रयुक्ते विवृते वैरे चैव न विश्वसेत् । क्षिप्रं स हन्यते मूढो न हि वैरं प्रशाम्यति ॥
sāntve prayukte vivṛte vaire caiva na viśvaset | kṣipraṃ sa hanyate mūḍho na hi vairaṃ praśāmyati
सान्त्वना दी जाने पर, या वैर के प्रकट हो जाने पर, विश्वास नहीं करना चाहिए। जो मूर्ख ऐसा करता है, वह शीघ्र ही फँस जाता है, क्योंकि वैर कभी शान्त नहीं होता।
श्लोक 27 (12.139.27)
अन्योन्यकृतवैराणां पुत्रपौत्रं नियच्छति । पुत्रपौत्रविनाशे च परलोकं नियच्छति ॥
anyonyakṛtavairāṇāṃ putrapautraṃ niyacchati | putrapautravināśe ca paralokaṃ niyacchati
जिन्होंने एक-दूसरे से वैर किया है, उनके पुत्रों और पौत्रों पर वह वैर आ पड़ता है; और पुत्र-पौत्रों के नष्ट होने पर वह परलोक से भी उन्हें रोक देता है।
श्लोक 28 (12.139.28)
सर्वेषां कृतवैराणामविश्वासः सुखावहः । एकान्ततो न विश्वासः कार्यो विश्वासघातके ॥
sarveṣāṃ kṛtavairāṇāmaviśvāsaḥ sukhāvahaḥ | ekāntato na viśvāsaḥ kāryo viśvāsaghātake
जिन्होंने आपस में वैर किया है, उन सबके लिए अविश्वास ही सुखदायी है। विश्वासघाती पर कभी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए।
श्लोक 29 (12.139.29)
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति । कामं विश्वासयेदन्यान्परेषां च न विश्वसेत् ॥
na viśvasedaviśvaste viśvaste nātiviśvaset | viśvāsādbhayamutpannamapi mūlaṃ nikṛntati | kāmaṃ viśvāsayedanyānpareṣāṃ ca na viśvaset
जो विश्वास के योग्य नहीं है, उस पर विश्वास न करे; और जो विश्वासी है, उस पर भी अधिक विश्वास न करे। विश्वास से उत्पन्न भय जड़ तक काट डालता है। मनुष्य दूसरों को भले ही अपने ऊपर विश्वास दिलाए, पर स्वयं दूसरों पर विश्वास न करे।
श्लोक 30 (12.139.30)
माता पिता बान्धवानां वरिष्ठौ । भार्या क्षेत्रं बीजमात्रं तु पुत्रः । भ्राता शत्रुः क्लिन्नपाणिर्वयस्य । आत्मा ह्येकः सुखदुःखस्य भोक्ता ॥
mātā pitā bāndhavānāṃ variṣṭhau | bhāryā kṣetraṃ bījamātraṃ tu putraḥ | bhrātā śatruḥ klinnapāṇirvayasya | ātmā hyekaḥ sukhaduḥkhasya bhoktā
माता और पिता बन्धुओं में सबसे श्रेष्ठ हैं। पत्नी खेत है और पुत्र केवल बीज। भाई शत्रु है और मित्र वह है जिसकी हथेली गीली रखनी पड़ती है। आत्मा अकेला ही अपने सुख-दुःख का भोगने वाला है।
श्लोक 31 (12.139.31)
अन्योन्यकृतवैराणां न संधिरुपपद्यते । स च हेतुरतिक्रान्तो यदर्थमहमावसम् ॥
anyonyakṛtavairāṇāṃ na saṃdhirupapadyate | sa ca heturatikrānto yadarthamahamāvasam
जिन्होंने एक-दूसरे का अपकार किया है, उनमें मेल नहीं हो सकता। और जिस कारण से मैं यहाँ रहती थी, वह कारण बीत चुका।
श्लोक 32 (12.139.32)
पूजितस्यार्थमानाभ्यां सान्त्वं पूर्वापकारिणः । हृदयं भवत्यविश्वस्तं कर्म त्रासयते बलात् ॥
pūjitasyārthamānābhyāṃ sāntvaṃ pūrvāpakāriṇaḥ | hṛdayaṃ bhavatyaviśvastaṃ karma trāsayate balāt
जिसने पहले अपकार किया हो, उसे धन और मान से सम्मानित किया जाए और मीठी बातों से मनाया जाए, तब भी उसका हृदय विश्वास नहीं करता; उसका अपना किया कर्म ही उसे बलपूर्वक डराता है।
श्लोक 33 (12.139.33)
पूर्वं संमानना यत्र पश्चाच्चैव विमानना । जह्यात्स सत्ववान्वासं संमानितविमानितः ॥
pūrvaṃ saṃmānanā yatra paścāccaiva vimānanā | jahyātsa satvavānvāsaṃ saṃmānitavimānitaḥ
जहाँ पहले सम्मान हो और पीछे अपमान, वहाँ से दृढ़ चित्त वाले मनुष्य को, जो सम्मानित होकर फिर अपमानित हुआ हो, वह निवास छोड़ देना चाहिए।
श्लोक 34 (12.139.34)
उषिताऽस्मि तवागारे दीर्घकालमहिंसिता । तदिदं वैरमुत्पन्नं सुखमास्स्व व्रजाम्यहम् ॥
uṣitā'smi tavāgāre dīrghakālamahiṃsitā | tadidaṃ vairamutpannaṃ sukhamāssva vrajāmyaham
मैं तुम्हारे घर में बहुत समय तक बिना किसी हिंसा के रही हूँ। परन्तु अब यह वैर उत्पन्न हो गया है। तुम सुखी रहो; मैं जा रही हूँ।
ब्रह्मदत्त उवाच
श्लोक 35 (12.139.35)
यः कृते प्रतिकुर्याद्वै न स तत्रापराध्नुयात् । अनृणस्तेन भवति वस पूजनि मागमः ॥
yaḥ kṛte pratikuryādvai na sa tatrāparādhnuyāt | anṛṇastena bhavati vasa pūjani māgamaḥ
जो अपने प्रति किए गए अपकार का बदला चुकाता है, वह उसमें अपराधी नहीं होता; उससे वह ऋण से मुक्त हो जाता है। पूजनी, रहो; मत जाओ।
पूजन्युवाच
श्लोक 36 (12.139.36)
न कृतस्य तु कर्तुश्च सख्यं संधीयते पुनः । हृदयं तत्र जानाति कर्तुश्चैव कृतस्य च ॥
na kṛtasya tu kartuśca sakhyaṃ saṃdhīyate punaḥ | hṛdayaṃ tatra jānāti kartuścaiva kṛtasya ca
कर्ता और जिसके प्रति कर्म किया गया, उन दोनों की मित्रता फिर नहीं जुड़ती। दोनों का हृदय, कर्ता का और जिसके साथ किया गया उसका, इसे जानता है।
ब्रह्मदत्त उवाच
श्लोक 37 (12.139.37)
कृतस्य चैव कर्तुश्च सख्यं संधीयते पुनः । वैरस्योपशमो दृष्टः पापं नोपाश्नुते पुनः ॥
kṛtasya caiva kartuśca sakhyaṃ saṃdhīyate punaḥ | vairasyopaśamo dṛṣṭaḥ pāpaṃ nopāśnute punaḥ
कर्ता और जिसके साथ अपकार हुआ, उन दोनों की मित्रता फिर जुड़ जाती है। वैर का शान्त होना देखा गया है, और पाप फिर नहीं लगता।
पूजन्युवाच
श्लोक 38 (12.139.38)
नास्ति वैरमतिक्रान्तं सान्त्वितोऽस्मीति नाश्वसेत् । विश्वासाद्बध्यते लोकस्तस्माच्छ्रेयोऽप्यदर्शनम् ॥
nāsti vairamatikrāntaṃ sāntvito'smīti nāśvaset | viśvāsādbadhyate lokastasmācchreyo'pyadarśanam
एक बार उत्पन्न हुआ वैर कभी बीतता नहीं। "मुझे मना लिया गया" यह सोचकर निश्चिन्त नहीं होना चाहिए। लोग विश्वास से बँधते हैं; इसलिए आँखों से दूर हो जाना ही अच्छा है।
श्लोक 39 (12.139.39)
तरसा ये न शक्यन्ते शस्त्रैः सुनिशितैरपि । साम्ना तेऽपि निगृह्यन्ते गजा इव करेणुभिः ॥
tarasā ye na śakyante śastraiḥ suniśitairapi | sāmnā te'pi nigṛhyante gajā iva kareṇubhiḥ
जो बल से, तीखे शस्त्रों से भी वश में नहीं किए जा सकते, वे भी सान्त्वना से वश में आ जाते हैं, जैसे हाथी हथिनियों से।
ब्रह्मदत्त उवाच
श्लोक 40 (12.139.40)
संवासाज्जायते स्नेहो जीवितान्तकरेष्वपि । अन्योन्यस्य हि विश्वासः श्वानश्वपचयोरिव ॥
saṃvāsājjāyate sneho jīvitāntakareṣvapi | anyonyasya hi viśvāsaḥ śvānaśvapacayoriva
साथ रहने से स्नेह उत्पन्न होता है, चाहे वे एक-दूसरे के प्राण लेने वाले ही क्यों न हों। और उनमें परस्पर विश्वास भी हो जाता है, जैसा कुत्ते और कुत्ते का मांस खाने वाले चाण्डाल में होता है।
श्लोक 41 (12.139.41)
अन्योन्यकृतवैराणां संवासान्मृदुतां गतम् । नैव तिष्ठति तद्वैरं पुष्करस्थमिवोदकम् ॥
anyonyakṛtavairāṇāṃ saṃvāsānmṛdutāṃ gatam | naiva tiṣṭhati tadvairaṃ puṣkarasthamivodakam
जिन्होंने आपस में वैर किया है, उनका वैर साथ रहने से कोमल हो जाता है और टिकता नहीं, जैसे कमल के पत्ते पर जल।
पूजन्युवाच
श्लोक 42 (12.139.42)
वैरं पञ्चसमुत्थानं तच्च बुध्यन्ति पण्डिताः । स्त्रीकृतं वास्तुजं वाग्जं स्वसपत्नापराधजम् ॥
vairaṃ pañcasamutthānaṃ tacca budhyanti paṇḍitāḥ | strīkṛtaṃ vāstujaṃ vāgjaṃ svasapatnāparādhajam
विद्वान जानते हैं कि वैर के पाँच कारण होते हैं: वह स्त्री से उत्पन्न होता है, सम्पत्ति से, वाणी से, अपनों की प्रतिद्वन्द्विता से और अपराध से।
श्लोक 43 (12.139.43)
तत्र दाता न हन्तव्यः क्षत्रियेण विशेषतः । प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥
tatra dātā na hantavyaḥ kṣatriyeṇa viśeṣataḥ | prakāśaṃ vā'prakāśaṃ vā buddhvā doṣabalābalam
ऐसी स्थिति में उपकारी को नहीं मारना चाहिए, विशेषकर क्षत्रिय को; चाहे बात प्रकट हो या गुप्त, दोनों पक्षों के दोष और बल-अबल को जान लेने के बाद।
श्लोक 44 (12.139.44)
कृतवैरे न विश्वासः कार्यस्त्विह सुहृद्यपि । प्रच्छन्नं तिष्ठते वैरं गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥
kṛtavaire na viśvāsaḥ kāryastviha suhṛdyapi | pracchannaṃ tiṣṭhate vairaṃ gūḍho'gniriva dāruṣu
जहाँ वैर हो गया हो, वहाँ मित्र पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए। वैर छिपा रहता है, जैसे लकड़ी में छिपी आग।
श्लोक 45 (12.139.45)
न वित्तेन न पारुष्यैर्न च सान्त्वेन च श्रुतैः । वैराग्निः शाम्यते राजन्निमग्नोऽग्निरिवार्णवे ॥
na vittena na pāruṣyairna ca sāntvena ca śrutaiḥ | vairāgniḥ śāmyate rājannimagno'gnirivārṇave
हे राजन्, न धन से, न कठोर वचनों से, न सान्त्वना से, न शास्त्र-श्रवण से वैर की अग्नि शान्त होती है, जैसे समुद्र में डूबी हुई अग्नि शान्त नहीं होती।
श्लोक 46 (12.139.46)
न हि वैराग्निरुद्धूतः कर्म चाप्यपराधजम् । शाम्यत्यदग्ध्वा नृपते विना ह्येकतरक्षयात् ॥
na hi vairāgniruddhūtaḥ karma cāpyaparādhajam | śāmyatyadagdhvā nṛpate vinā hyekatarakṣayāt
हे राजन्, एक बार भड़की हुई वैर की आग और अपराध से उत्पन्न कर्म बिना जलाए शान्त नहीं होते; दोनों में से एक पक्ष के नाश के बिना नहीं।
श्लोक 47 (12.139.47)
सत्कृतस्यार्थमानाभ्यां तत्र पूर्वापकारिणः । नैव शान्तिर्न विश्वासः कर्मणा जायते बलात् ॥
satkṛtasyārthamānābhyāṃ tatra pūrvāpakāriṇaḥ | naiva śāntirna viśvāsaḥ karmaṇā jāyate balāt
जिसने पहले अपकार किया हो, वह धन और मान से सत्कृत होने पर भी उसमें न शान्ति पाता है, न विश्वास; उसका कर्म बलपूर्वक उसे भयभीत करता है।
श्लोक 48 (12.139.48)
नैवापकारे कस्मिंश्चिदहं त्वयि तथा भवान् । उषितावाऽपि चक्रितं नेदानीं विश्वसाम्यहम् ॥
naivāpakāre kasmiṃścidahaṃ tvayi tathā bhavān | uṣitāvā'pi cakritaṃ nedānīṃ viśvasāmyaham
मैंने तुम्हारा कोई अपकार नहीं किया था, और तुमने भी मेरा नहीं किया था; हम दोनों पहले यहाँ विश्वास के साथ रहे। परन्तु अब मैं तुम पर विश्वास नहीं करती।
ब्रह्मदत्त उवाच
श्लोक 49 (12.139.49)
कालेन क्रियते कार्यं तथैव विविधाः क्रियाः । कालेनैव प्रवर्तन्ते कः कस्येत्यपराध्यति ॥
kālena kriyate kāryaṃ tathaiva vividhāḥ kriyāḥ | kālenaiva pravartante kaḥ kasyetyaparādhyati
समय से ही हर कार्य और नाना प्रकार की क्रियाएँ सिद्ध होती हैं; समय से ही वे चलती हैं। फिर यहाँ कौन किसका अपराध करता है?
श्लोक 50 (12.139.50)
तुल्यं चोभे प्रवर्तेते मरणं जन्म चैव हि । कार्यते चैव कालेन तन्निमित्तं न जीवति ॥
tulyaṃ cobhe pravartete maraṇaṃ janma caiva hi | kāryate caiva kālena tannimittaṃ na jīvati
मृत्यु और जन्म, दोनों साथ-साथ चलते हैं, और उन्हें समय ही कराता है; उस निमित्त से मनुष्य जीवित नहीं रहता।
श्लोक 51 (12.139.51)
बध्यन्ते युगपत्केचिदेकैकं चापरे तथा । कालो दहति भूतानि संप्राप्तोऽग्निरिवेन्धनम् ॥
badhyante yugapatkecidekaikaṃ cāpare tathā | kālo dahati bhūtāni saṃprāpto'gnirivendhanam
कुछ लोग एक साथ मृत्यु के बन्धन में आते हैं, कुछ एक-एक करके। काल प्राणियों को वैसे ही जला देता है, जैसे आग आकर ईंधन को।
श्लोक 52 (12.139.52)
नाहं प्रमाणं नैव त्वमन्योन्यं कारणं शुभे । कालो नित्यमुपादत्ते सुखं दुःखं च देहिनाम् ॥
nāhaṃ pramāṇaṃ naiva tvamanyonyaṃ kāraṇaṃ śubhe | kālo nityamupādatte sukhaṃ duḥkhaṃ ca dehinām
हे शुभे, न मैं इसका कारण हूँ, न तुम; आपस के इस विषय में काल ही देहधारियों को सदा सुख और दुःख देता है।
श्लोक 53 (12.139.53)
एवं वसेह सस्नेहा यथाकाममहिंसिता । यत्कृतं तत्तु मे क्षान्तं त्वं च वै क्षम पूजनि ॥
evaṃ vaseha sasnehā yathākāmamahiṃsitā | yatkṛtaṃ tattu me kṣāntaṃ tvaṃ ca vai kṣama pūjani
इसलिए स्नेह के साथ यहीं रहो, बिना हानि के, अपनी इच्छा के अनुसार। तुमने जो किया, उसे मैंने क्षमा कर दिया; पूजनी, तुम भी क्षमा करो।
पूजन्युवाच
श्लोक 54 (12.139.54)
यदि कालः प्रमाणं ते न वैरं कस्यचिद्भवेत् । कस्मादपचितिं यान्ति बान्धवा बान्धवे हते ॥
yadi kālaḥ pramāṇaṃ te na vairaṃ kasyacidbhavet | kasmādapacitiṃ yānti bāndhavā bāndhave hate
यदि काल ही तुम्हारे लिए प्रमाण है, तो किसी का किसी से वैर नहीं होना चाहिए। फिर बन्धु के मारे जाने पर बन्धु बदला क्यों लेते हैं?
श्लोक 55 (12.139.55)
कस्माद्देवासुराः सर्वे अन्योन्यमभिजघ्निरे । यदि कालेन निर्याणं सुखदुःखे भवाभवौ ॥
kasmāddevāsurāḥ sarve anyonyamabhijaghnire | yadi kālena niryāṇaṃ sukhaduḥkhe bhavābhavau
यदि जाना, सुख-दुःख, उन्नति और पतन काल से ही होते हैं, तो देवताओं और असुरों ने सब मिलकर एक-दूसरे को क्यों मारा?
श्लोक 56 (12.139.56)
भिषजो भैषजं कर्तुं कस्मादिच्छन्ति रोगिणः । यदि कालेन पच्यन्ते भेषजैः किं प्रयोजनम् ॥
bhiṣajo bhaiṣajaṃ kartuṃ kasmādicchanti rogiṇaḥ | yadi kālena pacyante bheṣajaiḥ kiṃ prayojanam
यदि रोगी काल से ही पकते हैं, तो वे वैद्य से औषधि क्यों बनवाना चाहते हैं? औषधियों का क्या प्रयोजन?
श्लोक 57 (12.139.57)
प्रलापः सुमहान्कस्मात्क्रियते शोकमूर्च्छितैः । यदि कालः प्रमाणं ते कस्माद्धर्मोऽस्ति कर्तृषु ॥
pralāpaḥ sumahānkasmātkriyate śokamūrcchitaiḥ | yadi kālaḥ pramāṇaṃ te kasmāddharmo'sti kartṛṣu
यदि काल ही तुम्हारे लिए प्रमाण है, तो शोक से मूर्छित लोग इतना बड़ा विलाप क्यों करते हैं? और कर्म करने वालों के लिए धर्म ही क्यों है?
श्लोक 58 (12.139.58)
तव पुत्रो ममापत्यं हतवान्हिंसितो मया । अनन्तरं त्वयाहं च बाधितव्या महीपते ॥
tava putro mamāpatyaṃ hatavānhiṃsito mayā | anantaraṃ tvayāhaṃ ca bādhitavyā mahīpate
तुम्हारे पुत्र ने मेरी सन्तान को मारा और मैंने उसे पीड़ा दी। इसके बाद, हे पृथ्वीपति, तुम्हें मुझे पकड़ना होगा।
श्लोक 59 (12.139.59)
अहं हि पुत्रशोकेन कृतपापा तवात्मजे । तथा त्वया प्रहर्तव्यं मयि तत्त्वं च मे शृणु ॥
ahaṃ hi putraśokena kṛtapāpā tavātmaje | tathā tvayā prahartavyaṃ mayi tattvaṃ ca me śṛṇu
पुत्र के शोक में मैंने तुम्हारे पुत्र का अपराध किया है; इसलिए तुम्हें मुझ पर प्रहार करना ही होगा। और इसका सत्य मुझसे सुनो।
श्लोक 60 (12.139.60)
भक्षार्थं क्रीडनार्थं च नरा वाञ्छन्ति पक्षिणः । तृतीयो नास्ति संयोगो वधबन्धादृते क्षमः ॥
bhakṣārthaṃ krīḍanārthaṃ ca narā vāñchanti pakṣiṇaḥ | tṛtīyo nāsti saṃyogo vadhabandhādṛte kṣamaḥ
मनुष्य पक्षियों को या तो खाने के लिए चाहते हैं या खेलने के लिए। वध और बन्धन के सिवा उनके साथ कोई तीसरा उचित व्यवहार नहीं है।
श्लोक 61 (12.139.61)
वधबन्धभयादेके मोक्षतन्त्रमुपाश्रिताः । जनिमरणजं दुःखं प्राहुर्वेदविदो जनाः ॥
vadhabandhabhayādeke mokṣatantramupāśritāḥ | janimaraṇajaṃ duḥkhaṃ prāhurvedavido janāḥ
कुछ लोग वध और बन्धन के भय से मोक्ष के मार्ग की शरण में गए हैं। वेद जानने वाले लोग जन्म और मृत्यु से उत्पन्न दुःख की बात कहते हैं।
श्लोक 62 (12.139.62)
सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वस्य दयिताः सुताः । दुःखादुद्विजते सर्वं सर्वस्य सुखमीप्सितम् ॥
sarvasya dayitāḥ prāṇāḥ sarvasya dayitāḥ sutāḥ | duḥkhādudvijate sarvaṃ sarvasya sukhamīpsitam
सबको प्राण प्रिय हैं, सबको पुत्र प्रिय हैं। सब दुःख से घबराते हैं; सुख ही सबको अभीष्ट है।
श्लोक 63 (12.139.63)
दुःखं जरा ब्रह्मदत्त दुःखमर्थविपर्ययः । दुःखं चानिष्टसंवासो दुःखमिष्टवियोजनम् ॥
duḥkhaṃ jarā brahmadatta duḥkhamarthaviparyayaḥ | duḥkhaṃ cāniṣṭasaṃvāso duḥkhamiṣṭaviyojanam
हे ब्रह्मदत्त, बुढ़ापा दुःख है; वस्तुओं का विपरीत हो जाना दुःख है; अप्रिय के साथ रहना दुःख है, और प्रिय का वियोग भी दुःख है।
श्लोक 64 (12.139.64)
वैरबन्धकृतं दुःखं स्त्रीकृतं सह तथा । दुःखं दुःखेन सततं विवर्धति नराधिप ॥
vairabandhakṛtaṃ duḥkhaṃ strīkṛtaṃ saha tathā | duḥkhaṃ duḥkhena satataṃ vivardhati narādhipa
वैर और बन्धन से उत्पन्न दुःख, और वैसे ही स्त्री से उत्पन्न दुःख; हे नरेश्वर, दुःख से दुःख सदा बढ़ता रहता है।
श्लोक 65 (12.139.65)
न दुःखं परदुःखे वै केचिदाहुरबुद्धयः । यो दुःखं नाभिजानाति स जल्पति महाजने ॥
na duḥkhaṃ paraduḥkhe vai kecidāhurabuddhayaḥ | yo duḥkhaṃ nābhijānāti sa jalpati mahājane
कुछ मूर्ख कहते हैं कि दूसरे के दुःख में कोई दुःख नहीं होता। जो स्वयं दुःख को नहीं जानता, वह भीड़ में केवल बकबक करता है।
श्लोक 66 (12.139.66)
यस्तु शोचति दुःखार्तः स कथं वक्तुमुत्सहेत । रसज्ञः सर्वदुःखस्य यथाऽऽत्मनि तथा परे ॥
yastu śocati duḥkhārtaḥ sa kathaṃ vaktumutsaheta | rasajñaḥ sarvaduḥkhasya yathā''tmani tathā pare
परन्तु जो स्वयं दुःख से पीड़ित होकर शोक करता है, वह ऐसा कहने का साहस कैसे करेगा? वह सब दुःखों का स्वाद जानता है; जैसा अपने में, वैसा ही दूसरों में।
श्लोक 67 (12.139.67)
भिन्ना श्लिष्टा न सज्यन्ते शस्त्रैः सुनिशितैरपि । साम्ना तेऽपि निगृह्यन्ते गजा इव करेणुभिः ॥
bhinnā śliṣṭā na sajyante śastraiḥ suniśitairapi | sāmnā te'pi nigṛhyante gajā iva kareṇubhiḥ
जो टूटकर फिर जुड़े हों, वे तीखे शस्त्रों से भी आपस में नहीं चिपकते; पर सान्त्वना से वे भी वश में आ जाते हैं, जैसे हाथी हथिनियों से।
श्लोक 68 (12.139.68)
यत्कृतं ते मया राजंस्त्वया च मम यत्कृतम् । न तद्वर्षशतैः शक्यं व्यपोहितुमरिंदम् ॥
yatkṛtaṃ te mayā rājaṃstvayā ca mama yatkṛtam | na tadvarṣaśataiḥ śakyaṃ vyapohitumariṃdam
हे राजन्, हे शत्रुदमन, जो मैंने तुम्हारे साथ किया और जो तुमने मेरे साथ किया, वह सैकड़ों वर्षों में भी मिटाया नहीं जा सकता।
श्लोक 69 (12.139.69)
आवयोः कृतमन्योन्यं तस्य संधिर्न विद्यते । स्मृत्वास्मृत्वा हि ते पुत्रं नवं वैरं भविष्यति ॥
āvayoḥ kṛtamanyonyaṃ tasya saṃdhirna vidyate | smṛtvāsmṛtvā hi te putraṃ navaṃ vairaṃ bhaviṣyati
हम दोनों ने एक-दूसरे का जो किया है, उसमें मेल नहीं हो सकता। अपने पुत्र को बार-बार याद करके तुम्हारे मन में वैर फिर नया हो उठेगा।
श्लोक 70 (12.139.70)
वैरमन्तिकमासाद्य यः प्रीतिं कर्तुमिच्छति । मृण्मयस्येव भग्नस्य तस्य संधिर्न विद्यते ॥
vairamantikamāsādya yaḥ prītiṃ kartumicchati | mṛṇmayasyeva bhagnasya tasya saṃdhirna vidyate
जो शत्रु के निकट पहुँचकर उससे प्रीति करना चाहता है, उसके लिए जुड़ना सम्भव नहीं, जैसे टूटे हुए मिट्टी के बर्तन का।
श्लोक 71 (12.139.71)
निश्चयः स्वार्थशास्त्रेषु न विश्वासः सुखोदयः । उशना चैव गाथे द्वे प्रह्लादायाब्रवीत्पुरा ॥
niścayaḥ svārthaśāstreṣu na viśvāsaḥ sukhodayaḥ | uśanā caiva gāthe dve prahlādāyābravītpurā
अर्थशास्त्र में यह निश्चित है कि अविश्वास से सुख मिलता है। बहुत पहले उशना ने प्रह्लाद से दो गाथाएँ कही थीं।
श्लोक 72 (12.139.72)
ये वैरिणः श्रद्दधते सत्ये सत्येतरेऽपि वा । वध्यन्ते श्रद्दधाना हि मधु शुष्कतृणैरिव ॥
ye vairiṇaḥ śraddadhate satye satyetare'pi vā | vadhyante śraddadhānā hi madhu śuṣkatṛṇairiva
जो शत्रुओं की बात पर, चाहे वह सच हो या झूठ, विश्वास करते हैं, वे अपने विश्वास से ही नष्ट होते हैं, जैसे सामने रखे मधु पर भरोसा करके कोई सूखी घास से ढके गड्ढे में गिर पड़ता है।
श्लोक 73 (12.139.73)
न हि वैराणि शाम्यन्ति कुलेष्वादशमाद्युगात् । आख्यातारश्च विद्यन्ते कुले चेज्जायते पुमान् ॥
na hi vairāṇi śāmyanti kuleṣvādaśamādyugāt | ākhyātāraśca vidyante kule cejjāyate pumān
दसवीं पीढ़ी तक कुलों में वैर शान्त नहीं होते; और जब तक कुल में कोई पुरुष उत्पन्न होता रहता है, तब तक उन्हें सुनाने वाले भी रहते हैं।
श्लोक 74 (12.139.74)
उपगृह्य तु वैराणि सान्त्वयन्ति नराधिपाः । अथैनं प्रतिहिंसन्ति पूर्णं घटमिवाश्मनि ॥
upagṛhya tu vairāṇi sāntvayanti narādhipāḥ | athainaṃ pratihiṃsanti pūrṇaṃ ghaṭamivāśmani
राजा लोग वैर को भीतर छिपाकर मीठी बातें करते हैं, और फिर उस मनुष्य पर वैसे ही प्रहार करते हैं जैसे भरे घड़े को पत्थर पर पटका जाता है।
श्लोक 75 (12.139.75)
सदा न विश्वसेद्राजन्पापं कृत्वेह कस्यचित् । अपकृत्य परेषां हि विश्वासाद्दुःखमश्नुते ॥
sadā na viśvasedrājanpāpaṃ kṛtveha kasyacit | apakṛtya pareṣāṃ hi viśvāsādduḥkhamaśnute
हे राजन्, जिसने अपराध किया हो, उसे यहाँ किसी का भी विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। दूसरों का अपकार करके जो विश्वास करता है, वह दुःख पाता है।
ब्रह्मदत्त उवाच
श्लोक 76 (12.139.76)
नाविश्वासाच्चिनोत्यर्थमीहते चापि किंचन । भयात्त्वेकतरं मित्रं कृतकृत्या भवत्विह ॥
nāviśvāsāccinotyarthamīhate cāpi kiṃcana | bhayāttvekataraṃ mitraṃ kṛtakṛtyā bhavatviha
जो किसी पर विश्वास नहीं करता, वह न धन जोड़ता है, न कुछ भी करने का प्रयत्न करता है। भय से दोनों में से किसी एक को मित्र बना ले, और इस प्रकार इस लोक में सफल हो।
पूजन्युवाच
श्लोक 77 (12.139.77)
यस्येह व्रणिनौ पादौ पद्भ्यां च परिधावतः । क्षिण्येते तस्य तौ पादौ सुगुप्तमपि धावतः ॥
yasyeha vraṇinau pādau padbhyāṃ ca paridhāvataḥ | kṣiṇyete tasya tau pādau suguptamapi dhāvataḥ
जिसके पैर घायल हों और जो उन्हीं पर दौड़ता हो, उसके वे पैर और भी घिस जाते हैं, चाहे वह कितनी ही सावधानी से दौड़े।
श्लोक 78 (12.139.78)
नेत्राभ्यां सरुजाभ्यां यः प्रतिवातमुदीक्षते । तस्य वायुरुजाऽत्यर्थं नेत्रयोर्भवति ध्रुवम् ॥
netrābhyāṃ sarujābhyāṃ yaḥ prativātamudīkṣate | tasya vāyurujā'tyarthaṃ netrayorbhavati dhruvam
जिसकी आँखें दुःखती हों और जो हवा के सामने देखता हो, उसकी आँखों में हवा की पीड़ा निश्चय ही अत्यन्त बढ़ती है।
श्लोक 79 (12.139.79)
दुष्टं पन्थानमासाद्य यो मोहादभिपद्यते । आत्मनो बलमज्ञात्वा तदन्तं तस्य जीवितम् ॥
duṣṭaṃ panthānamāsādya yo mohādabhipadyate | ātmano balamajñātvā tadantaṃ tasya jīvitam
जो मोह से बुरे मार्ग पर चल पड़ता है और अपना बल नहीं जानता, उसके जीवन का वहीं अन्त है।
श्लोक 80 (12.139.80)
यस्तु वर्षमविज्ञाय क्षेत्रं कर्षति कर्षकः । हीनः पुरुषकारेण तस्य वै नाप्नुते फलम् ॥
yastu varṣamavijñāya kṣetraṃ karṣati karṣakaḥ | hīnaḥ puruṣakāreṇa tasya vai nāpnute phalam
जो किसान वर्षा को जाने बिना और पुरुषार्थ से हीन होकर खेत जोतता है, उसे फल नहीं मिलता।
श्लोक 81 (12.139.81)
यस्तु तिक्तं कषायं वा स्वादु वा मधुरं हितम् । आहारं कुरुते नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
yastu tiktaṃ kaṣāyaṃ vā svādu vā madhuraṃ hitam | āhāraṃ kurute nityaṃ so'mṛtatvāya kalpate
जो मनुष्य सदा हितकर भोजन करता है, चाहे वह कड़वा हो या कसैला, या स्वादिष्ट और मीठा, वह अमृतत्व के योग्य हो जाता है।
श्लोक 82 (12.139.82)
पथ्यं मुक्त्वा तु यो मोहाद्दुष्टमश्नाति भोजनम् । परिणाममविज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ॥
pathyaṃ muktvā tu yo mohādduṣṭamaśnāti bhojanam | pariṇāmamavijñāya tadantaṃ tasya jīvitam
परन्तु जो मनुष्य हितकर भोजन छोड़कर मोह से बुरा भोजन करता है और उसके परिणाम को नहीं जानता, उसके जीवन का वहीं अन्त है।
श्लोक 83 (12.139.83)
दैवं पुरुषकारश्च स्थितावन्योन्यसंश्रयात् । उदात्तं कर्म वै तत्र दैवं क्लीबा उपासते ॥
daivaṃ puruṣakāraśca sthitāvanyonyasaṃśrayāt | udāttaṃ karma vai tatra daivaṃ klībā upāsate
दैव और पुरुषार्थ एक-दूसरे के आश्रय से टिके हैं। इनमें कर्म ही श्रेष्ठ है; दैव की उपासना तो दुर्बल लोग करते हैं।
श्लोक 84 (12.139.84)
कर्म चात्महितं कार्यं तीक्ष्णं वा यदि वा मृदु । ग्रस्यतेऽकर्मशीलस्तु सदाऽनर्थैरकिंचनः ॥
karma cātmahitaṃ kāryaṃ tīkṣṇaṃ vā yadi vā mṛdu | grasyate'karmaśīlastu sadā'narthairakiṃcanaḥ
अपने हित का कर्म करना चाहिए, चाहे वह कठोर हो या कोमल। कर्म न करने वाला निर्धन मनुष्य सदा विपत्तियों से ग्रस्त रहता है।
श्लोक 85 (12.139.85)
तस्मात्संशयितव्येऽर्थे कार्य एव पराक्रमः । सर्वस्वमपि संत्यज्य कार्यमात्महितं नरैः ॥
tasmātsaṃśayitavye'rthe kārya eva parākramaḥ | sarvasvamapi saṃtyajya kāryamātmahitaṃ naraiḥ
इसलिए परिणाम संदिग्ध हो तब भी पराक्रम करना चाहिए। मनुष्यों को अपना सब कुछ छोड़कर भी अपना हित साधना चाहिए।
श्लोक 86 (12.139.86)
विद्या शौचं च दाक्ष्यं च बलं शौर्यं च पञ्चमम् । मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तयन्तीह यैर्बुधाः ॥
vidyā śaucaṃ ca dākṣyaṃ ca balaṃ śauryaṃ ca pañcamam | mitrāṇi sahajānyāhurvartayantīha yairbudhāḥ
विद्या, शुद्धता, दक्षता, बल और पाँचवीं शूरता, इन्हें सहज मित्र कहा गया है, जिनसे विद्वान इस संसार में जीवन चलाते हैं।
श्लोक 87 (12.139.87)
निवेशनं च कुप्यं च क्षेत्रं भार्यां सुहृज्जनम् । एतान्युपचितान्याहुः सर्वत्र लभते पुमान् ॥
niveśanaṃ ca kupyaṃ ca kṣetraṃ bhāryāṃ suhṛjjanam | etānyupacitānyāhuḥ sarvatra labhate pumān
घर, कुप्य, खेत, पत्नी और मित्रजन, इन्हें संचित वस्तुएँ कहा गया है, और मनुष्य इन्हें सर्वत्र पा लेता है।
श्लोक 88 (12.139.88)
सर्वत्र रमते प्राज्ञः सर्वत्र च विरोचते । न विभीषयते किंचिद्भीषितो न बिभेति च ॥
sarvatra ramate prājñaḥ sarvatra ca virocate | na vibhīṣayate kiṃcidbhīṣito na bibheti ca
ज्ञानी सर्वत्र आनन्द पाता है और सर्वत्र शोभित होता है। वह किसी को डराता नहीं और डराए जाने पर भी डरता नहीं।
श्लोक 89 (12.139.89)
नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते । दाक्ष्येण कुर्वतां कर्म संयमात्प्रतितिष्ठति ॥
nityaṃ buddhimato'pyarthaḥ svalpako'pi vivardhate | dākṣyeṇa kurvatāṃ karma saṃyamātpratitiṣṭhati
बुद्धिमान का धन थोड़े से भी सदा बढ़ता है। जो कुशलता और संयम से कर्म करते हैं, वे टिके रहते हैं।
श्लोक 90 (12.139.90)
गृहस्नेहावबद्धानां नराणामल्पमेधसाम् । कुस्त्री खादति मांसानि माघमां सेगवा इव ॥
gṛhasnehāvabaddhānāṃ narāṇāmalpamedhasām | kustrī khādati māṃsāni māghamāṃ segavā iva
घर के स्नेह में बँधे हुए अल्पबुद्धि पुरुषों का मांस बुरी स्त्री वैसे ही खा जाती है, जैसे केकड़ी को उसके बच्चे खा जाते हैं।
श्लोक 91 (12.139.91)
गृहं क्षेत्राणि मित्राणि स्वदेश इति चापरे । इत्येवमवसीदन्ति नरा बुद्धिविपर्यये ॥
gṛhaṃ kṣetrāṇi mitrāṇi svadeśa iti cāpare | ityevamavasīdanti narā buddhiviparyaye
"घर, खेत, मित्र, अपना देश" और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ: इसी प्रकार बुद्धि के उलट जाने पर मनुष्य डूबते हैं।
श्लोक 92 (12.139.92)
उत्पथाच्च विमानाच्च देशाद्दुर्भिक्षपीडितात् । अन्यत्र वसतिं गच्छेद्वसेद्वा नित्यमानितः ॥
utpathācca vimānācca deśāddurbhikṣapīḍitāt | anyatra vasatiṃ gacchedvasedvā nityamānitaḥ
बुरे मार्ग से, अपमान के स्थान से और अकाल से पीड़ित देश से हटकर कहीं और रहने चले जाना चाहिए, या फिर वहाँ रहना चाहिए जहाँ सदा सम्मान मिले।
श्लोक 93 (12.139.93)
तस्मादन्यत्र यास्यामि वस्तुं नाहमिहोत्सहे । कृतमेतदनाहार्यं तव पुत्रे च पार्थिव ॥
tasmādanyatra yāsyāmi vastuṃ nāhamihotsahe | kṛtametadanāhāryaṃ tava putre ca pārthiva
इसलिए मैं कहीं और जाऊँगी; मेरा यहाँ रहने का मन नहीं है। हे राजन्, तुम्हारे पुत्र ने जो किया, वह मिटाया नहीं जा सकता।
श्लोक 94 (12.139.94)
कुभार्यां च कुपुत्रं च कुराजानं कुसौहृदम् । कुसंबन्धं कुदेशं च दूरतः परिवर्जयेत् ॥
kubhāryāṃ ca kuputraṃ ca kurājānaṃ kusauhṛdam | kusaṃbandhaṃ kudeśaṃ ca dūrataḥ parivarjayet
बुरी पत्नी, बुरा पुत्र, बुरा राजा, बुरा मित्र, बुरा सम्बन्ध और बुरा देश, इनसे दूर ही रहना चाहिए।
श्लोक 95 (12.139.95)
कुमित्रे नास्ति विश्वासः कुभार्यायां कुतो रतिः । कुराज्ये निर्वृतिर्नास्ति कुदेशे नास्ति जीविका ॥
kumitre nāsti viśvāsaḥ kubhāryāyāṃ kuto ratiḥ | kurājye nirvṛtirnāsti kudeśe nāsti jīvikā
बुरे मित्र में विश्वास नहीं होता; बुरी पत्नी में सुख कहाँ? बुरे राज्य में शान्ति नहीं, और बुरे देश में जीविका नहीं।
श्लोक 96 (12.139.96)
कुपुत्रे सौहृदं नास्ति नित्यमस्थिरसौहृदम् । अवमानः कुसंबन्धे भवत्यर्थविपर्यये ॥
kuputre sauhṛdaṃ nāsti nityamasthirasauhṛdam | avamānaḥ kusaṃbandhe bhavatyarthaviparyaye
बुरे पुत्र के साथ मित्रता नहीं होती, केवल ऐसी मित्रता होती है जो कभी स्थिर नहीं रहती; बुरे सम्बन्ध में भाग्य पलटने पर अपमान होता है।
श्लोक 97 (12.139.97)
सा भार्या या प्रियं ब्रूते स पुत्रो यत्र निर्वृतिः । तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीवति ॥
sā bhāryā yā priyaṃ brūte sa putro yatra nirvṛtiḥ | tanmitraṃ yatra viśvāsaḥ sa deśo yatra jīvati
पत्नी वही है जो प्रिय बोले; पुत्र वही है जिसमें सुख मिले; मित्र वही है जिसमें विश्वास हो; और देश वही है जहाँ जीवन चल सके।
श्लोक 98 (12.139.98)
यत्र नास्ति बलात्कारः स राजा तीव्रशासनः । स च यौनाभिसंबन्धो यः सतोऽपि बुभूषति ॥
yatra nāsti balātkāraḥ sa rājā tīvraśāsanaḥ | sa ca yaunābhisaṃbandho yaḥ sato'pi bubhūṣati
जहाँ बल-प्रयोग नहीं होता, वह राजा कठोर शासन वाला होता है। और वही बन्धुता जैसा सम्बन्ध है, जो सज्जनों का भी भरण-पोषण करना चाहता है।
श्लोक 99 (12.139.99)
भार्या देशोऽथ मित्राणि पुत्रसंबन्धिबान्धवाः । एते सर्वे गुणवति धर्मनेत्रे महीपतौ ॥
bhāryā deśo'tha mitrāṇi putrasaṃbandhibāndhavāḥ | ete sarve guṇavati dharmanetre mahīpatau
पत्नी, देश, मित्र, पुत्र, सम्बन्धी और बान्धव, ये सब धर्म को मार्गदर्शक मानने वाले गुणवान राजा के होते हैं।
श्लोक 100 (12.139.100)
अधर्मज्ञस्य विषये प्रजा नश्यन्ति निग्रहात् । राजा मूलं त्रिवर्गस्य अप्रमत्तोऽनुपालयन् ॥
adharmajñasya viṣaye prajā naśyanti nigrahāt | rājā mūlaṃ trivargasya apramatto'nupālayan
जो राजा धर्म को नहीं जानता, उसके राज्य में संयम के अभाव से प्रजा नष्ट होती है। राजा त्रिवर्ग का मूल है, यदि वह सावधान रहकर पालन करे।
श्लोक 101 (12.139.101)
बलिषड्भागमुद्धृत्य फलं समुपयोजयेत् । न रक्षति प्रजाः सम्यग्यः स पार्थिवतस्करः ॥
baliṣaḍbhāgamuddhṛtya phalaṃ samupayojayet | na rakṣati prajāḥ samyagyaḥ sa pārthivataskaraḥ
राजा छठा भाग कर के रूप में लेकर उसका फल भोग सकता है; परन्तु जो प्रजा की भली-भाँति रक्षा नहीं करता, वह राजाओं में चोर है।
श्लोक 102 (12.139.102)
दत्वाऽभयं यः स्वयमेव राजा । न तत्प्रमाणं कुरुतेऽर्थलोभात् । स सर्वलोकादुपलभ्य पापम् । अधर्मबुद्धिर्निरयं प्रयाति ॥
datvā'bhayaṃ yaḥ svayameva rājā | na tatpramāṇaṃ kurute'rthalobhāt | sa sarvalokādupalabhya pāpam | adharmabuddhirnirayaṃ prayāti
जो राजा स्वयं अभय देकर लोभवश अपने वचन को पूरा नहीं करता, वह सारे संसार से पाप का भागी होकर, अधर्मी बुद्धि के साथ नरक में जाता है।
श्लोक 103 (12.139.103)
दत्त्वाऽभयं स्वयं राजा प्रमाणं कुरुते यदि । स सर्वं सुखमाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥
dattvā'bhayaṃ svayaṃ rājā pramāṇaṃ kurute yadi | sa sarvaṃ sukhamāpnoti prajā dharmeṇa pālayan
परन्तु जो राजा अभय देकर अपने वचन को पूरा करता है, वह धर्म से प्रजा का पालन करता हुआ सब सुख पाता है।
श्लोक 104 (12.139.104)
पिता भ्राता गुरुः शास्ता वह्निर्वैश्रवणो यमः । सप्त राज्ञो गुणानेतान्मनुराह प्रजापतिः ॥
pitā bhrātā guruḥ śāstā vahnirvaiśravaṇo yamaḥ | sapta rājño guṇānetānmanurāha prajāpatiḥ
पिता, भाई, गुरु, शासक, अग्नि, वैश्रवण और यम, ये सात राजा के गुण हैं, ऐसा प्रजापति मनु ने कहा है।
श्लोक 105 (12.139.105)
पिता हि राजा लोकस्य प्रजानां योऽनुकम्पिता । तस्मिन्मिथ्यापनीते हि तिर्यग्भवति मानवः ॥
pitā hi rājā lokasya prajānāṃ yo'nukampitā | tasminmithyāpanīte hi tiryagbhavati mānavaḥ
जो राजा दयालु है, वह संसार का और प्रजा का पिता है। उसके साथ मिथ्या व्यवहार किए जाने पर मनुष्य पशु-योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 106 (12.139.106)
संभावयति मातेव दीनमप्युपपद्यते । दहत्यग्निरिवानिष्टान्यमयत्यहितांस्तदा ॥
saṃbhāvayati māteva dīnamapyupapadyate | dahatyagnirivāniṣṭānyamayatyahitāṃstadā
वह माता के समान दीन की भी चिन्ता करके उसकी रक्षा करता है; अग्नि के समान अनिष्ट को जला देता है, और तब शत्रुओं को संयम में रखता है।
श्लोक 107 (12.139.107)
इष्टेषु विसृजन्नर्थान्कुबेर इव कामदः । गुरुर्धर्मोपदेशेन गोप्ता च परिपालनात् ॥
iṣṭeṣu visṛjannarthānkubera iva kāmadaḥ | gururdharmopadeśena goptā ca paripālanāt
कुबेर के समान, इच्छाएँ पूरी करने वाला, वह प्रियजनों को धन देता है; धर्म के उपदेश से वह गुरु है और रक्षा से रक्षक है।
श्लोक 108 (12.139.108)
यस्तु रञ्जयते राजा पौरजानपदान्गुणैः । न तस्य भ्रश्यते राज्यं गुणधर्मानुपालनात् ॥
yastu rañjayate rājā paurajānapadānguṇaiḥ | na tasya bhraśyate rājyaṃ guṇadharmānupālanāt
जो राजा अपने गुणों से नगरवासियों और ग्रामवासियों को प्रसन्न करता है, उसका राज्य नहीं छूटता, क्योंकि वह गुणों और धर्म का पालन करता है।
श्लोक 109 (12.139.109)
यः सम्यक्प्रतिगृह्णाति पौरजानपदार्चनम् । स सुखं प्रेक्षते राजा इह लोके परत्र च ॥
yaḥ samyakpratigṛhṇāti paurajānapadārcanam | sa sukhaṃ prekṣate rājā iha loke paratra ca
जो राजा नगरवासियों और ग्रामवासियों के सम्मान को ठीक से स्वीकार करता है, वह इस लोक में और परलोक में सुख देखता है।
श्लोक 110 (12.139.110)
नित्योद्विग्नाः प्रजा यस्य करभारप्रपीडिताः । अनर्थैर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम् ॥
nityodvignāḥ prajā yasya karabhāraprapīḍitāḥ | anarthairvipralupyante sa gacchati parābhavam
जिस राजा की प्रजा सदा उद्विग्न रहती है, करों के बोझ से पिसती है और विपत्तियों से लुटती है, वह पतन को प्राप्त होता है।
श्लोक 111 (12.139.111)
प्रजा यस्य विवर्धन्ते सरसीव महोत्पलम् । स राजा सर्वसुखदः स्वर्गलोके महीयते ॥
prajā yasya vivardhante sarasīva mahotpalam | sa rājā sarvasukhadaḥ svargaloke mahīyate
जिस राजा की प्रजा सरोवर में बड़े कमल के समान बढ़ती है, वह सब सुख देने वाला राजा स्वर्गलोक में पूजित होता है।
श्लोक 112 (12.139.112)
बलिना विग्रहो राजन्न कदाचित्प्रशस्यते । बलिना विग्रही तस्य कुतो राज्यं कुतः सुखम् ॥
balinā vigraho rājanna kadācitpraśasyate | balinā vigrahī tasya kuto rājyaṃ kutaḥ sukham
हे राजन्, बलवान के साथ युद्ध कभी प्रशंसनीय नहीं है। जो बलवान से वैर ठाने, उसके लिए राज्य कहाँ और सुख कहाँ?
भीष्म उवाच
श्लोक 113 (12.139.113)
सैवमुक्त्वा शकुनिका ब्रह्मदत्तं नराधिपम् । राजानं समनुज्ञाप्य जगामाभीप्सितां दिशम् ॥
saivamuktvā śakunikā brahmadattaṃ narādhipam | rājānaṃ samanujñāpya jagāmābhīpsitāṃ diśam
ऐसा कहकर वह पक्षिणी राजा ब्रह्मदत्त से आज्ञा लेकर अपनी इच्छित दिशा में चली गई।
श्लोक 114 (12.139.114)
एतत्ते ब्रह्मदत्तस्य पूजन्या सह भाषितम् । मयोक्तं भरतश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥
etatte brahmadattasya pūjanyā saha bhāṣitam | mayoktaṃ bharataśreṣṭha kimanyacchrotumicchasi
हे भरतश्रेष्ठ, ब्रह्मदत्त और पूजनी का यह संवाद, जैसा हुआ था, मैंने तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?