शान्ति पर्व · अध्याय 140
भारद्वाज का राजा शत्रुंतप को आपत्काल की नीति का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि जब धर्म क्षीण हो गया हो और संसार दस्युओं से पीड़ित हो, तब कैसे रहना चाहिए। भीष्म उत्तर में ऋषि भारद्वाज और सौवीर राजा शत्रुंतप का प्राचीन वृत्तान्त सुनाते हैं। ऋषि आपत्ति में पड़े राजा के लिए कठोर नीति बताते हैं: दण्ड सदा उठाए रखना, किसी प्रतिद्वन्द्वी पर विश्वास न करना, शत्रु को मधुर व्यवहार से अपनाते हुए प्रहार की तैयारी रखना, गुप्तचरों का उपयोग करना और समय के अनुसार कोमल या कठोर होना। अन्त में वे कहते हैं कि यह उपदेश केवल संकट के समय के लिए है; राजा उसके अनुसार चलकर समृद्ध होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.140.1)
युगक्षयात्परिक्षीणे धर्मे लोके च भारत । दस्युभिः पीड्यमाने च कथं स्थेयं पितामह ॥
yugakṣayātparikṣīṇe dharme loke ca bhārata | dasyubhiḥ pīḍyamāne ca kathaṃ stheyaṃ pitāmaha
हे भारत, युग के क्षय से जब धर्म क्षीण हो गया हो और संसार दस्युओं से पीड़ित हो रहा हो, तब हे पितामह, मनुष्य को कैसे रहना चाहिए?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.140.2)
हन्त ते वर्तयिष्यामि नीतिमापत्सु भारत । उत्सृज्यापि घृणां काले यथा वर्तेत भूमिपः ॥
hanta te vartayiṣyāmi nītimāpatsu bhārata | utsṛjyāpi ghṛṇāṃ kāle yathā varteta bhūmipaḥ
अच्छा, हे भारत, मैं तुम्हें आपत्ति के समय की नीति बताता हूँ: ऐसे समय में राजा को दया को भी छोड़कर किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए।
श्लोक 3 (12.140.3)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । भारद्वाजस्य संवादं राज्ञः शत्रुंतपस्य च ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | bhāradvājasya saṃvādaṃ rājñaḥ śatruṃtapasya ca
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं: भारद्वाज और राजा शत्रुंतप का संवाद।
श्लोक 4 (12.140.4)
राजा शत्रुंतपो नाम सौवीरेषु महारथः । भारद्वाजमुपागम्य पप्रच्छार्थविनिश्चयम् ॥
rājā śatruṃtapo nāma sauvīreṣu mahārathaḥ | bhāradvājamupāgamya papracchārthaviniścayam
सौवीर देश में शत्रुंतप नाम का एक राजा था, जो महारथी था। उसने भारद्वाज के पास जाकर कर्तव्य का निश्चय पूछा।
शत्रुंतप उवाच
श्लोक 5 (12.140.5)
अलब्धस्य कथं लिप्सा लब्धं केन विवर्धते । वर्धितं पाल्यते केन पालितं प्रणयेत्कथम् ॥
alabdhasya kathaṃ lipsā labdhaṃ kena vivardhate | vardhitaṃ pālyate kena pālitaṃ praṇayetkatham
जो प्राप्त नहीं है, उसे पाने की इच्छा कैसे की जाए? जो प्राप्त हो गया है, वह कैसे बढ़ाया जाए? जो बढ़ गया है, उसकी रक्षा कैसे की जाए? और जिसकी रक्षा हो चुकी है, उसे उचित उपयोग में कैसे लगाया जाए?
भीष्म उवाच
श्लोक 6 (12.140.6)
तस्मै विनिश्चितार्थाय परिपृष्टोऽर्थनिश्चयम् । उवाच मतिमान्वाक्यमिदं हेतुमदुत्तमम् ॥
tasmai viniścitārthāya paripṛṣṭo'rthaniścayam | uvāca matimānvākyamidaṃ hetumaduttamam
जिसने अपना प्रयोजन निश्चित कर लिया था, उस राजा के द्वारा कर्तव्य का निश्चय पूछे जाने पर उस बुद्धिमान ने यह युक्तिपूर्ण और उत्तम वचन कहा।
भारद्वाज उवाच
श्लोक 7 (12.140.7)
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः । अच्छिद्रश्छिद्रदर्शी च परेषां विवरानुगः ॥
nityamudyatadaṇḍaḥ syānnityaṃ vivṛtapauruṣaḥ | acchidraśchidradarśī ca pareṣāṃ vivarānugaḥ
राजा को सदा दण्ड उठाए रखना चाहिए और अपना पौरुष सदा प्रकट रखना चाहिए; स्वयं निर्दोष रहे, दूसरों के दोष देखे और शत्रुओं की दुर्बलताओं के पीछे लगा रहे।
श्लोक 8 (12.140.8)
नित्यमुद्यतदण्डस्य भृशमुद्विजते नरः । तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥
nityamudyatadaṇḍasya bhṛśamudvijate naraḥ | tasmātsarvāṇi bhūtāni daṇḍenaiva prasādhayet
जो सदा दण्ड उठाए रहता है, उससे लोग बहुत डरते हैं; इसलिए सब प्राणियों को दण्ड से ही वश में रखे।
श्लोक 9 (12.140.9)
एवमेव प्रशंसन्ति बुधा ये तत्त्वदर्शिनः । तस्माच्चतुष्टये तस्मिन्प्रधानो दण्ड उच्यते ॥
evameva praśaṃsanti budhā ye tattvadarśinaḥ | tasmāccatuṣṭaye tasminpradhāno daṇḍa ucyate
तत्त्व को देखने वाले विद्वान् ठीक यही कहकर इसकी सराहना करते हैं। इसीलिए उन चारों उपायों में दण्ड को प्रधान कहा जाता है।
श्लोक 10 (12.140.10)
छिन्नमूले त्वधिष्ठाने सर्वे तज्जीविनो हताः । कथं हि शाखास्तिष्ठेयुश्छिन्नमूले वनस्पतौ ॥
chinnamūle tvadhiṣṭhāne sarve tajjīvino hatāḥ | kathaṃ hi śākhāstiṣṭheyuśchinnamūle vanaspatau
आधारभूत मूल के कट जाने पर उस पर जीने वाले सब नष्ट हो जाते हैं। वृक्ष की जड़ कट जाने पर डालियाँ कैसे टिकी रह सकती हैं?
श्लोक 11 (12.140.11)
मूलमेवादितश्छिन्द्यादरिपक्षस्य पण्डितः । ततः सहायान्पक्षं च सर्वमेवानुशातयेत् ॥
mūlamevāditaśchindyādaripakṣasya paṇḍitaḥ | tataḥ sahāyānpakṣaṃ ca sarvamevānuśātayet
बुद्धिमान को चाहिए कि पहले शत्रुपक्ष की जड़ ही काटे; उसके बाद उसके सहायकों का, उसके दल का और सबका नाश कर दे।
श्लोक 12 (12.140.12)
सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् । आपदागमकाले तु कुर्वीत न विचारयेत् ॥
sumantritaṃ suvikrāntaṃ suyuddhaṃ supalāyitam | āpadāgamakāle tu kurvīta na vicārayet
भली-भाँति मन्त्रणा, भली-भाँति पराक्रम, भली-भाँति युद्ध और भली-भाँति पलायन: आपत्ति के आने पर ये सब करे, सोच-विचार में न पड़े।
श्लोक 13 (12.140.13)
वाङ्मात्रेण विनीतः स्याद्धृदयेन यथा क्षुरः । श्लक्ष्णपूर्वाभिभाषी च कामक्रोधौ विवर्जयेत् ॥
vāṅmātreṇa vinītaḥ syāddhṛdayena yathā kṣuraḥ | ślakṣṇapūrvābhibhāṣī ca kāmakrodhau vivarjayet
वह केवल वाणी से विनम्र रहे, पर हृदय से उस्तरे के समान तीखा हो; पहले मीठा बोलने वाला हो और काम तथा क्रोध को त्याग दे।
श्लोक 14 (12.140.14)
सपत्नसहितो राज्ये कृत्वा सन्धिं न विश्वसेत् । उपक्रामेत्ततः शीघ्रं कृतकार्यो विचक्षणः ॥
sapatnasahito rājye kṛtvā sandhiṃ na viśvaset | upakrāmettataḥ śīghraṃ kṛtakāryo vicakṣaṇaḥ
शत्रु के साथ सन्धि करके और राज्य में उसके साथ मिलकर रहते हुए भी उस पर विश्वास न करे; और काम पूरा हो जाने पर चतुर पुरुष शीघ्र वहाँ से हट जाए।
श्लोक 15 (12.140.15)
शत्रुं च मित्रं पूर्वेण सान्त्वेनैवानुसान्त्वयेत् । नित्यशश्चोद्विजेत्तस्मात्सर्पाद्वेश्मगतादिव ॥
śatruṃ ca mitraṃ pūrveṇa sāntvenaivānusāntvayet | nityaśaścodvijettasmātsarpādveśmagatādiva
शत्रु को भी मित्र की भाँति पहले सान्त्वना से ही मनाए, फिर भी उससे सदा वैसे ही सावधान रहे जैसे घर में घुसे साँप से।
श्लोक 16 (12.140.16)
यस्य बुद्धिं परिभवेत्तमतीतेन सान्त्वयेत् । अनागतेन दुष्प्रज्ञं प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम् ॥
yasya buddhiṃ paribhavettamatītena sāntvayet | anāgatena duṣprajñaṃ pratyutpannena paṇḍitam
जिसकी बुद्धि को वह दबा सके, उसे बीती बातों से सान्त्वना दे; मन्दबुद्धि को आने वाली बातों से; और विद्वान् को वर्तमान की बात से।
श्लोक 17 (12.140.17)
अञ्जलिं शपथं सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम् । अश्रुप्रपातनं चैव कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥
añjaliṃ śapathaṃ sāntvaṃ śirasā pādavandanam | aśruprapātanaṃ caiva kartavyaṃ bhūtimicchatā
हाथ जोड़ना, शपथ खाना, मीठे वचन कहना, सिर झुकाकर चरणों में प्रणाम करना और आँसू बहाना: ऐश्वर्य चाहने वाले को यह सब करना चाहिए।
श्लोक 18 (12.140.18)
वहेदमित्रं स्कन्धेन यावदर्थस्य लम्भनम् । अथैनमागते काले भिन्द्याद्धटमिवाश्मनि ॥
vahedamitraṃ skandhena yāvadarthasya lambhanam | athainamāgate kāle bhindyāddhaṭamivāśmani
जब तक प्रयोजन सिद्ध न हो, शत्रु को कन्धे पर ढोता रहे; फिर समय आने पर उसे वैसे ही तोड़ दे जैसे घड़े को पत्थर पर पटककर फोड़ा जाता है।
श्लोक 19 (12.140.19)
मुहूर्तमपि राजेन्द्र तिन्दुकालातवज्ज्वलेत् । मा तुषाग्निरिवानर्चिर्धूमायेत चिरं नरः ॥
muhūrtamapi rājendra tindukālātavajjvalet | mā tuṣāgnirivānarcirdhūmāyeta ciraṃ naraḥ
हे राजेन्द्र, क्षण भर के लिए ही सही, तिन्दुक की जलती लकड़ी की तरह प्रज्वलित हो उठे; मनुष्य भूसी की उस आग की तरह देर तक धुआँ न देता रहे जिसमें लपट नहीं होती।
श्लोक 20 (12.140.20)
नानार्थिकोऽर्थसंबन्धं कृतघ्ने न समाचरेत् । अर्थी तु शक्यते भोक्तुं कृतकार्योऽवमन्यते । तस्मात्सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् ॥
nānārthiko'rthasaṃbandhaṃ kṛtaghne na samācaret | arthī tu śakyate bhoktuṃ kṛtakāryo'vamanyate | tasmātsarvāṇi kāryāṇi sāvaśeṣāṇi kārayet
जिसके अनेक प्रयोजन हों, वह कृतघ्न मनुष्य के साथ स्वार्थ का सम्बन्ध न जोड़े। जिसे अभी कुछ चाहिए, उसका उपयोग किया जा सकता है, पर काम पूरा हो जाने पर वह अनादर करने लगता है। इसलिए सब कार्य कुछ शेष रखकर ही करवाए।
श्लोक 21 (12.140.21)
कोकिलस्य वराहस्य मेरोः शून्यस्य वेश्मनः । व्यालस्य भक्तचित्तस्य यच्छ्रेयस्तत्समाचरेत् ॥
kokilasya varāhasya meroḥ śūnyasya veśmanaḥ | vyālasya bhaktacittasya yacchreyastatsamācaret
कोयल, सूअर, मेरु पर्वत, सूने घर, सर्प और भक्ति से भरे चित्त वाले पुरुष, इनमें से प्रत्येक का जो श्रेष्ठ गुण है, उसे अपनाए।
श्लोक 22 (12.140.22)
उत्थायोत्थाय गच्छेच्च नित्ययुक्तो रिपोर्गृहम् । कुशलं चास्य पृच्छेत यद्यप्यकुशलं भवेत् ॥
utthāyotthāya gacchecca nityayukto riporgṛham | kuśalaṃ cāsya pṛccheta yadyapyakuśalaṃ bhavet
बार-बार उठकर, सदा सावधान रहकर, शत्रु के घर जाए और उसका कुशल पूछे, चाहे वहाँ कुशल न भी हो।
श्लोक 23 (12.140.23)
नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्न क्लीबा नातिमानिनः । न च लोकरवाद्भीता न वै शश्वत्प्रतीक्षिणः ॥
nālasāḥ prāpnuvantyarthānna klībā nātimāninaḥ | na ca lokaravādbhītā na vai śaśvatpratīkṣiṇaḥ
आलसी, कायर, अत्यन्त अभिमानी, लोकनिन्दा से डरने वाले और सदा प्रतीक्षा ही करते रहने वाले लोग अपने प्रयोजन नहीं पाते।
श्लोक 24 (12.140.24)
नास्य च्छिद्रं परो विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु । गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥
nāsya cchidraṃ paro vidyādvidyācchidraṃ parasya tu | gūhetkūrma ivāṅgāni rakṣedvivaramātmanaḥ
शत्रु उसकी दुर्बलता न जाने, पर वह शत्रु की दुर्बलता जान ले। कछुए की तरह अपने अंगों को समेट ले और अपनी कमज़ोरी की रक्षा करे।
श्लोक 25 (12.140.25)
बकवच्चिन्तयेदर्थान्सिंहवच्च पराक्रमेत् । वृकवच्चावलुम्पेत शरवच्च विनिष्पतेत् ॥
bakavaccintayedarthānsiṃhavacca parākramet | vṛkavaccāvalumpeta śaravacca viniṣpatet
बगुले की तरह अपने प्रयोजनों का चिन्तन करे, सिंह की तरह पराक्रम करे, भेड़िये की तरह झपटकर छीन ले और बाण की तरह टूट पड़े।
श्लोक 26 (12.140.26)
पानमक्षास्तथा नार्यो मृगया गीतवादितम् । एतानि युक्त्या सेवेत प्रसङ्गो ह्यत्र दोषवान् ॥
pānamakṣāstathā nāryo mṛgayā gītavāditam | etāni yuktyā seveta prasaṅgo hyatra doṣavān
मदिरा, पासे, स्त्रियाँ, शिकार, गाना और बजाना: इनका सेवन युक्ति से, मर्यादा में रहकर करे; क्योंकि इनमें आसक्ति दोष की जड़ है।
श्लोक 27 (12.140.27)
कुर्यात्तृणमयं चापं शयीत मृगशायिकाम् । अन्धः स्यादन्धवेलायां बाधिर्यमपि संश्रयेत् ॥
kuryāttṛṇamayaṃ cāpaṃ śayīta mṛgaśāyikām | andhaḥ syādandhavelāyāṃ bādhiryamapi saṃśrayet
वह तिनकों का धनुष बनाए, मृग की तरह सोए, अन्धेपन के समय अन्धा बन जाए और बहरेपन का भी आश्रय ले।
श्लोक 28 (12.140.28)
देशकालं समासाद्य विक्रमेत विचक्षणः । देशकालव्यतीतो हि विक्रमो निष्फलो भवेत् ॥
deśakālaṃ samāsādya vikrameta vicakṣaṇaḥ | deśakālavyatīto hi vikramo niṣphalo bhavet
स्थान और समय पाकर ही चतुर पुरुष पराक्रम करे; क्योंकि स्थान और समय को लाँघकर किया हुआ पराक्रम निष्फल होता है।
श्लोक 29 (12.140.29)
कालाकालौ संप्रधार्य बलाबलमथात्मनः । परस्य च बलं ज्ञात्वा तथाऽऽत्मानं नियोजयेत् ॥
kālākālau saṃpradhārya balābalamathātmanaḥ | parasya ca balaṃ jñātvā tathā''tmānaṃ niyojayet
उचित और अनुचित समय का तथा अपने बल और निर्बलता का विचार करके, और दूसरे का बल जानकर, तब अपने को उसी के अनुसार कार्य में लगाए।
श्लोक 30 (12.140.30)
दण्डेनोपनतं शत्रुं यो राजा न नियच्छति । स मृत्युमुपगूहेत् गर्भमश्वतरी यथा ॥
daṇḍenopanataṃ śatruṃ yo rājā na niyacchati | sa mṛtyumupagūhet garbhamaśvatarī yathā
जो राजा दण्ड से वश में आए शत्रु को नियन्त्रण में नहीं रखता, वह अपनी मृत्यु को गले लगाता है, जैसे खच्चरी अपने प्राणहारी गर्भ को धारण करती है।
श्लोक 31 (12.140.31)
सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान्स्याद्दुरारुहः । आमः स्यात्पक्वसंकाशो न च शीर्येत कस्यचित् ॥
supuṣpitaḥ syādaphalaḥ phalavānsyāddurāruhaḥ | āmaḥ syātpakvasaṃkāśo na ca śīryeta kasyacit
वह खूब फूला हुआ पर फलरहित हो; फलवान् हो पर चढ़ने में कठिन; कच्चा हो पर पके जैसा दिखे; और किसी के द्वारा तोड़ा न जा सके।
श्लोक 32 (12.140.32)
आशां कालवतीं कुर्यात्तां च विघ्नेन योजयेत् । विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं चापि हेतुमत् ॥
āśāṃ kālavatīṃ kuryāttāṃ ca vighnena yojayet | vighnaṃ nimittato brūyānnimittaṃ cāpi hetumat
वह आशा को लम्बे समय की बना दे और फिर उसमें विघ्न डाल दे; विघ्न का कारण किसी बहाने से बताए और उस बहाने को भी किसी हेतु से पुष्ट करे।
श्लोक 33 (12.140.33)
भीतवत्संविधातव्यं यावद्भयमनागतम् । आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् ॥
bhītavatsaṃvidhātavyaṃ yāvadbhayamanāgatam | āgataṃ tu bhayaṃ dṛṣṭvā prahartavyamabhītavat
जब तक भय आया नहीं है, तब तक डरे हुए की तरह व्यवस्था करे; पर भय आ जाने पर उसे देखकर निडर होकर प्रहार करे।
श्लोक 34 (12.140.34)
न साहसमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति । संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ॥
na sāhasamanāruhya naro bhadrāṇi paśyati | saṃśayaṃ punarāruhya yadi jīvati paśyati
साहस का आश्रय लिए बिना मनुष्य कल्याण नहीं देखता; संकट में पड़कर यदि वह जीवित रह जाता है, तभी वह कल्याण देखता है।
श्लोक 35 (12.140.35)
अनागतं विजानीयात्त्यजेद्भयमुपस्थितम् । पुनर्बुद्धिक्षयात्किंचिदनिवृत्तिं निशामयेत् ॥
anāgataṃ vijānīyāttyajedbhayamupasthitam | punarbuddhikṣayātkiṃcidanivṛttiṃ niśāmayet
जो आया नहीं है, उसे पहले से जान ले; जो भय सामने आ गया है, उसे छोड़ दे। और फिर बुद्धि के नाश से जिस बात में लौटना नहीं रह जाता, उसे भी ध्यान में रखे।
श्लोक 36 (12.140.36)
प्रत्युपस्थितकालस्य सुखस्य परिवर्जनम् । अनागतसुखाशा च नैव बुद्धिमतां नयः ॥
pratyupasthitakālasya sukhasya parivarjanam | anāgatasukhāśā ca naiva buddhimatāṃ nayaḥ
जिसका समय आ पहुँचा है, ऐसे सुख को छोड़ देना और आने वाले सुख की आशा करना, यह बुद्धिमानों की नीति नहीं है।
श्लोक 37 (12.140.37)
योऽरिणा सह संधाय विश्वस्तः स्वपते सुखम् । स वृक्षाग्रे प्रसुप्तो वा पतितः प्रतिबुध्यते ॥
yo'riṇā saha saṃdhāya viśvastaḥ svapate sukham | sa vṛkṣāgre prasupto vā patitaḥ pratibudhyate
जो शत्रु से सन्धि करके उस पर विश्वास करता हुआ सुख से सोता है, वह वृक्ष की चोटी पर सोए हुए उस मनुष्य के समान है जो गिरने पर ही जागता है।
श्लोक 38 (12.140.38)
कर्मणा येन केनेह मृदुना दारुणेन वा । उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
karmaṇā yena keneha mṛdunā dāruṇena vā | uddhareddīnamātmānaṃ samartho dharmamācaret
जिस किसी भी कर्म से, कोमल हो या कठोर, मनुष्य को दीन दशा से अपना उद्धार करना चाहिए; समर्थ हो जाने पर वह धर्म का आचरण करे।
श्लोक 39 (12.140.39)
ये सपत्नाः सपत्नानां सर्वांस्ताननुवर्तयेत् । आत्मनश्चापि बोद्धव्याश्चाराः सुमहिताः परैः ॥
ye sapatnāḥ sapatnānāṃ sarvāṃstānanuvartayet | ātmanaścāpi boddhavyāścārāḥ sumahitāḥ paraiḥ
जो शत्रुओं के शत्रु हों, उन सबको अपने अनुकूल कर ले; और यह भी जान ले कि दूसरों ने कुशलता से उसके विरुद्ध जो गुप्तचर लगा रखे हैं, वे कौन हैं।
श्लोक 40 (12.140.40)
चारः सुविहितः कार्य आत्मनोऽथ परस्य च । पाषण्डांस्तापसादींश्च परराष्ट्रे प्रवेशयेत् ॥
cāraḥ suvihitaḥ kārya ātmano'tha parasya ca | pāṣaṇḍāṃstāpasādīṃśca pararāṣṭre praveśayet
अपने और शत्रु दोनों के लिए सुनियोजित गुप्तचर रखना चाहिए। अनेक मतों के साधुओं और तपस्वी आदि के वेश वाले लोगों को शत्रु के राज्य में भेजे।
श्लोक 41 (12.140.41)
उद्यानेषु विहारेषु प्रपास्वावसथेषु च । पानागारे प्रवेशेषु तीर्थेषु च सभासु च ॥
udyāneṣu vihāreṣu prapāsvāvasatheṣu ca | pānāgāre praveśeṣu tīrtheṣu ca sabhāsu ca
उद्यानों में, विहार-स्थलों में, प्याऊओं में, विश्रामस्थलों में, मदिरालयों में, प्रवेश-स्थानों में, तीर्थों में और सभाओं में।
श्लोक 42 (12.140.42)
धर्माभिचारिणः पापाश्चौरा लोकस्य कण्टकाः । समागच्छन्ति तान्बुद्ध्वा नियच्छेच्छमयीत च ॥
dharmābhicāriṇaḥ pāpāścaurā lokasya kaṇṭakāḥ | samāgacchanti tānbuddhvā niyacchecchamayīta ca
धर्म का ढोंग करने वाले पापी, चोर और संसार के काँटे वहाँ आकर इकट्ठे होते हैं; उन्हें पहचानकर उन पर नियन्त्रण करे या उन्हें शान्त करे।
श्लोक 43 (12.140.43)
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद्भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत् ॥
na viśvasedaviśvaste viśvaste nātiviśvaset | viśvāsādbhayamabhyeti nāparīkṣya ca viśvaset
जो विश्वास नहीं करता, उस पर विश्वास न करे; और जो विश्वास करता है, उस पर भी अति विश्वास न करे। विश्वास से भय आता है; बिना परखे किसी पर विश्वास न करे।
श्लोक 44 (12.140.44)
विश्वासयित्वा तु परं तत्त्वभूतेन हेतुना । अथास्य प्रहरेत्काले किंचिद्विचलिते पदे ॥
viśvāsayitvā tu paraṃ tattvabhūtena hetunā | athāsya praharetkāle kiṃcidvicalite pade
सच्चे कारण से दूसरे को विश्वास दिलाकर, फिर समय आने पर, जब उसका पैर तनिक डगमगाए, तब उस पर प्रहार करे।
श्लोक 45 (12.140.45)
अशङ्क्यमपि शङ्केत नित्यं शङ्केत शङ्कितात् । भयं ह्यशङ्किताज्जातं समूलमपि कृन्तति ॥
aśaṅkyamapi śaṅketa nityaṃ śaṅketa śaṅkitāt | bhayaṃ hyaśaṅkitājjātaṃ samūlamapi kṛntati
जिस पर शंका नहीं की जा सकती, उस पर भी शंका करे, और जिस पर शंका हो चुकी है, उससे सदा सावधान रहे। जिस पर शंका नहीं थी, उससे उत्पन्न हुआ भय जड़ सहित काट डालता है।
श्लोक 46 (12.140.46)
अवधानेन मौनेन काषायेण जटाजिनैः । विश्वासयित्वा द्वेष्टारमवलुम्पेद्यथा वृकः ॥
avadhānena maunena kāṣāyeṇa jaṭājinaiḥ | viśvāsayitvā dveṣṭāramavalumpedyathā vṛkaḥ
सावधानी, मौन, गेरुए वस्त्र, जटाओं और मृगचर्म के द्वारा शत्रु को विश्वास दिलाकर, भेड़िये की तरह उस पर टूट पड़े।
श्लोक 47 (12.140.47)
पुत्रो वा यदि वा भ्राता पिता वा यदि वा सुहृत् । अर्थस्य विघ्नं कुर्वाणा हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥
putro vā yadi vā bhrātā pitā vā yadi vā suhṛt | arthasya vighnaṃ kurvāṇā hantavyā bhūtimicchatā
पुत्र हो, भाई हो, पिता हो या मित्र, जो भी प्रयोजन में विघ्न डालें, उन्हें ऐश्वर्य चाहने वाले को मार डालना चाहिए।
श्लोक 48 (12.140.48)
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥
gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ | utpathaṃ pratipannasya kāryaṃ bhavati śāsanam
अभिमान में चूर, कर्तव्य और अकर्तव्य को न जानने वाले तथा कुमार्ग पर चले हुए गुरु को भी अनुशासन में लाना चाहिए।
श्लोक 49 (12.140.49)
प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां संप्रदानेन केनचित् । प्रपूजयन्निघाती स्यात्तीक्ष्णतुण्ड इव द्विजः ॥
pratyutthānābhivādābhyāṃ saṃpradānena kenacit | prapūjayannighātī syāttīkṣṇatuṇḍa iva dvijaḥ
उठकर स्वागत करने, प्रणाम करने और कोई दान देने से उसका सम्मान करता हुआ भी वह तीखी चोंच वाले पक्षी की तरह उसका घातक बना रहे।
श्लोक 50 (12.140.50)
नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् । नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति परमां श्रियम् ॥
nācchittvā paramarmāṇi nākṛtvā karma dāruṇam | nāhatvā matsyaghātīva prāpnoti paramāṃ śriyam
दूसरों के मर्मों को छेदे बिना, क्रूर कर्म किए बिना और मछुए की तरह मारे बिना कोई परम लक्ष्मी नहीं पाता।
श्लोक 51 (12.140.51)
नास्ति जात्या रिपुर्नाम मित्रं वाऽपि न विद्यते । सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥
nāsti jātyā ripurnāma mitraṃ vā'pi na vidyate | sāmarthyayogājjāyante mitrāṇi ripavastathā
जन्म से कोई शत्रु नहीं होता और न कोई मित्र ही होता है; सामर्थ्य के योग से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।
श्लोक 52 (12.140.52)
न प्रमुञ्चेत दायादं वदन्तं करुणं बहु । दुःखं तत्र न कर्तव्यं हन्यात्पूर्वापकारिणम् ॥
na pramuñceta dāyādaṃ vadantaṃ karuṇaṃ bahu | duḥkhaṃ tatra na kartavyaṃ hanyātpūrvāpakāriṇam
दायाद चाहे कितना ही करुण विलाप करे, उसे छोड़ना नहीं चाहिए। इसमें दुःख नहीं करना चाहिए; जिसने पहले अपकार किया है, उसे मार डालना चाहिए।
श्लोक 53 (12.140.53)
संग्रहानुग्रहे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता । निग्रहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो हितमिच्छता ॥
saṃgrahānugrahe yatnaḥ sadā kāryo'nasūyatā | nigrahaścāpi yatnena kartavyo hitamicchatā
बिना ईर्ष्या के सदा संग्रह और अनुग्रह में यत्न करना चाहिए, और अपना हित चाहने वाले को निग्रह में भी यत्नपूर्वक लगना चाहिए।
श्लोक 54 (12.140.54)
प्रहरिष्यन्प्रियं ब्रूयात्प्रहृत्यापि प्रियोत्तरम् । असिनाऽपि शिरश्छित्त्वा शोचेत च रुदेत च ॥
prahariṣyanpriyaṃ brūyātprahṛtyāpi priyottaram | asinā'pi śiraśchittvā śoceta ca rudeta ca
प्रहार करने से पहले प्रिय बोले, प्रहार करके भी उसके बाद प्रिय बात ही कहे; तलवार से सिर काटकर भी शोक करे और रोए।
श्लोक 55 (12.140.55)
निमन्त्रयीत सान्त्वेन संमानेन तितिक्षया । आशाकरणमित्येतत्कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥
nimantrayīta sāntvena saṃmānena titikṣayā | āśākaraṇamityetatkartavyaṃ bhūtimicchatā
सान्त्वना, सम्मान और सहनशीलता से बुलाए। आशा जगाने का यही उपाय है; ऐश्वर्य चाहने वाले को यह करना चाहिए।
श्लोक 56 (12.140.56)
न शुष्कवैरं कुर्वीत बाहुभ्यां न नदीं तरेत् । अनर्थकमनायुष्यं गोविषाणस्य भक्षणम् । दन्ताश्च परिमृद्यन्ते रसश्चापि न लभ्यते ॥
na śuṣkavairaṃ kurvīta bāhubhyāṃ na nadīṃ taret | anarthakamanāyuṣyaṃ goviṣāṇasya bhakṣaṇam | dantāśca parimṛdyante rasaścāpi na labhyate
निष्फल वैर न करे; केवल भुजाओं से नदी पार न करे। गाय का सींग चबाना व्यर्थ है और आयु घटाने वाला भी है; दाँत घिस जाते हैं और रस भी नहीं मिलता।
श्लोक 57 (12.140.57)
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडा अनुबन्धस्तथैव च । अनुबन्धं तथा ज्ञात्वा पीडां च परिवर्जयेत् ॥
trivarge trividhā pīḍā anubandhastathaiva ca | anubandhaṃ tathā jñātvā pīḍāṃ ca parivarjayet
धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्ग में तीन प्रकार की पीड़ा होती है और वैसे ही परिणाम भी। परिणाम को जानकर पीड़ा से बचे।
श्लोक 58 (12.140.58)
ऋणशेषं चाग्निशेषं शत्रुशेषं तथैव च । पुनः पुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न कारयेत् ॥
ṛṇaśeṣaṃ cāgniśeṣaṃ śatruśeṣaṃ tathaiva ca | punaḥ punaḥ pravardhante tasmāccheṣaṃ na kārayet
बचा हुआ ऋण, बची हुई आग और बचा हुआ शत्रु, ये बार-बार बढ़ते हैं; इसलिए कुछ भी शेष न रहने दे।
श्लोक 59 (12.140.59)
ऋणशेषा विवर्धन्ते परिभूताश्च शत्रवः । आवहन्त्यनयं तीव्रं व्याधयश्चाप्युपेक्षिताः ॥
ṛṇaśeṣā vivardhante paribhūtāśca śatravaḥ | āvahantyanayaṃ tīvraṃ vyādhayaścāpyupekṣitāḥ
बचे हुए ऋण बढ़ते हैं; अपमानित शत्रु और उपेक्षित रोग भी भारी अनर्थ ले आते हैं।
श्लोक 60 (12.140.60)
नासम्यक्कृत्यकारी स्यादप्रमत्तः सदा भवेत् । कण्टकोऽपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम् ॥
nāsamyakkṛtyakārī syādapramattaḥ sadā bhavet | kaṇṭako'pi hi duśchinno vikāraṃ kurute ciram
वह अनुचित रीति से काम करने वाला न हो, सदा सावधान रहे। क्योंकि काँटा भी यदि ठीक से न निकाला जाए तो देर तक पीड़ा देता है।
श्लोक 61 (12.140.61)
वधेन च मनुष्याणां मार्गाणां दूषणेन च । आकराणां विनाशैश्च परराष्ट्रं विनाशयेत् ॥
vadhena ca manuṣyāṇāṃ mārgāṇāṃ dūṣaṇena ca | ākarāṇāṃ vināśaiśca pararāṣṭraṃ vināśayet
मनुष्यों के वध से, मार्गों को बिगाड़ने से और खानों को नष्ट करने से शत्रु के राष्ट्र का विनाश करे।
श्लोक 62 (12.140.62)
गृध्रदृष्टिर्बकालीनः श्वचेष्टः सिंहविक्रमः । अनुद्विग्नः काकशङ्की भुजङ्गचरितं चरेत् ॥
gṛdhradṛṣṭirbakālīnaḥ śvaceṣṭaḥ siṃhavikramaḥ | anudvignaḥ kākaśaṅkī bhujaṅgacaritaṃ caret
गृध्र की दृष्टि, बगुले की स्थिरता, कुत्ते की सजगता और सिंह का पराक्रम रखे; उद्विग्न न होकर, कौए की तरह शंकालु रहकर, सर्प की चाल चले।
श्लोक 63 (12.140.63)
शूरमञ्जलिपातेन भीरुं भेदेन भेदयेत् । लुब्धमर्थप्रदानेन समं तुल्येन विग्रहः ॥
śūramañjalipātena bhīruṃ bhedena bhedayet | lubdhamarthapradānena samaṃ tulyena vigrahaḥ
शूर को हाथ जोड़कर, डरपोक को फूट डालकर और लोभी को धन देकर वश में करे; और बराबर वाले से बराबर के साधन से युद्ध करे।
श्लोक 64 (12.140.64)
श्रेणीमुख्योपजापेषु वल्लभानुनयेषु च । अमात्यान्परिरक्षेत भेदसंघातयोरपि ॥
śreṇīmukhyopajāpeṣu vallabhānunayeṣu ca | amātyānparirakṣeta bhedasaṃghātayorapi
श्रेणियों के मुखियों की गुप्त उकसाहटों से और प्रियजनों की मनुहारों से तथा फूट और गुटबन्दी से भी अपने मन्त्रियों की रक्षा करे।
श्लोक 65 (12.140.65)
मृदुरित्यवजानन्ति तीक्ष्ण इत्युद्विजन्ति च । तीक्ष्णकाले भवेत्तीक्ष्णो मृदुकाले मृदुर्भवेत् ॥
mṛdurityavajānanti tīkṣṇa ityudvijanti ca | tīkṣṇakāle bhavettīkṣṇo mṛdukāle mṛdurbhavet
लोग कोमल को तुच्छ समझते हैं और तीखे से घबराते हैं; इसलिए तीक्ष्णता के समय तीक्ष्ण हो और कोमलता के समय कोमल।
श्लोक 66 (12.140.66)
मृदुनैव मृदुं हन्ति मृदुना हन्ति दारुणम् । नासाध्यं मृदुना किंचित्तस्मात्तीक्ष्णतरो मृदुः ॥
mṛdunaiva mṛduṃ hanti mṛdunā hanti dāruṇam | nāsādhyaṃ mṛdunā kiṃcittasmāttīkṣṇataro mṛduḥ
कोमलता से ही कोमल को मारा जाता है, और कोमलता से कठोर को भी। कोमलता से कुछ भी असाध्य नहीं है, इसलिए कोमल ही अधिक तीखा है।
श्लोक 67 (12.140.67)
काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः । स साधयति कृत्यानि शत्रुं चाप्यधितिष्ठति ॥
kāle mṛduryo bhavati kāle bhavati dāruṇaḥ | sa sādhayati kṛtyāni śatruṃ cāpyadhitiṣṭhati
जो समय पर कोमल और समय पर कठोर होता है, वह अपने कार्य सिद्ध कर लेता है और शत्रु को भी अपने वश में रखता है।
श्लोक 68 (12.140.68)
पण्डितेन विरुद्धस्तु दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् । दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः ॥
paṇḍitena viruddhastu dūrastho'smīti nāśvaset | dīrghau buddhimato bāhū yābhyāṃ hiṃsati hiṃsitaḥ
विद्वान् से विरोध होने पर 'मैं तो दूर हूँ' यह सोचकर निश्चिन्त न हो; बुद्धिमान की भुजाएँ लम्बी होती हैं, जिनसे वह चोट खाकर प्रहार करता है।
श्लोक 69 (12.140.69)
न तत्तरेद्यस्य न पारमुत्तरे । न्न तद्धरेद्यत्पुनराहरेत्परः । न तत्खनेद्यस्य न मूलमुद्धरे । न्न तं हन्याद्यस्य शिरो न पातयेत् ॥
na tattaredyasya na pāramuttare | nna taddharedyatpunarāharetparaḥ | na tatkhanedyasya na mūlamuddhare | nna taṃ hanyādyasya śiro na pātayet
जिसका दूसरा तट न पा सके, उसे पार करने न उतरे; जिसे दूसरा फिर छीन ले, उसे न ले; जिसकी जड़ न उखाड़ सके, उसे न खोदे; और जिसका सिर न गिरा सके, उसे न मारे।
श्लोक 70 (12.140.70)
इतीदमुक्तं वृजिनाभिसंहितं । न चैतदेवं पुरुषः समाचरेत् । परप्रयुक्तस्तु कथं विभावये । दतो मयोक्तं भवतो हितार्थिना ॥
itīdamuktaṃ vṛjinābhisaṃhitaṃ | na caitadevaṃ puruṣaḥ samācaret | paraprayuktastu kathaṃ vibhāvaye | dato mayoktaṃ bhavato hitārthinā
यह जो कहा गया है, कुटिलता से जुड़ा हुआ है, और मनुष्य को सामान्यतः इस प्रकार आचरण नहीं करना चाहिए। परन्तु दूसरे के आक्रमण से घिरा हुआ मनुष्य और कैसे सोचे? इसीलिए तुम्हारा हित चाहने वाले मैंने यह कहा है।
भीष्म उवाच
श्लोक 71 (12.140.71)
यथावदुक्तं वचनं हितार्थिना । निशम्य विप्रेण सुवीरराष्ट्रपः । तथाऽकरोद्वाक्यमदीनचेतनः । श्रियं च दीप्तां बुभुजे सबान्धवः ॥
yathāvaduktaṃ vacanaṃ hitārthinā | niśamya vipreṇa suvīrarāṣṭrapaḥ | tathā'karodvākyamadīnacetanaḥ | śriyaṃ ca dīptāṃ bubhuje sabāndhavaḥ
हित चाहने वाले ब्राह्मण के यथार्थ वचन सुनकर सुवीर देश के राजा ने, अविचल चित्त से, वैसा ही किया और बन्धुओं सहित दीप्तिमान लक्ष्मी का भोग किया।