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शान्ति पर्व · अध्याय 141

विश्वामित्र और चण्डाल: अकाल में श्वमांस

युधिष्ठिर पूछते हैं कि जब धर्म का ह्रास हो गया हो और देश डाकुओं के हाथ में हो, तब ब्राह्मण और राजा कैसे जिएँ। भीष्म त्रेता और द्वापर की सन्धि में पड़े बारह वर्ष के अकाल की पुरानी कथा सुनाते हैं, जब भूख से व्याकुल विश्वामित्र कुत्ते का मांस चुराने एक चाण्डाल-बस्ती में गए। चण्डाल उन्हें धर्म न छोड़ने की सलाह देता है, पर विश्वामित्र प्राण बचाना पहला कर्तव्य मानकर जाँघ ले लेते हैं और उससे पहले देवताओं और पितरों को तृप्त करते हैं; तब इन्द्र वर्षा करते हैं। अन्त में भीष्म कहते हैं कि विपत्ति में पड़ा बुद्धिमान पुरुष धर्म और अधर्म के निर्णय में अपनी बुद्धि का सहारा लेकर अपना उद्धार करे।

अध्याय 140अध्याय-सूचीअध्याय 142

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.141.1)

हीने परमके धर्मे सर्वलोकविलङ्घिते । अधर्मे धर्मतां नीते धर्मे चाधर्मतां गते ॥

hīne paramake dharme sarvalokavilaṅghite | adharme dharmatāṃ nīte dharme cādharmatāṃ gate

जब परम धर्म क्षीण हो गया हो और सारा संसार उसका उल्लंघन कर रहा हो, जब अधर्म धर्म कहलाने लगा हो और धर्म अधर्म बन गया हो,

श्लोक 2 (12.141.2)

मर्यादासु प्रभिन्नासु क्षुभिते लोकनिश्चये । राजभिः पीडिते लोके चोरैर्वाऽपि विशांपते ॥

maryādāsu prabhinnāsu kṣubhite lokaniścaye | rājabhiḥ pīḍite loke corairvā'pi viśāṃpate

जब सारी मर्यादाएँ टूट चुकी हों, लोगों के निश्चय डगमगा गए हों, और हे प्रजापति, संसार राजाओं तथा चोरों से भी पीड़ित हो,

श्लोक 3 (12.141.3)

सर्वाश्रमेषु मूढेषु कर्मसूपहतेषु च । कामाल्लोभाच्च मोहाच्च भयं पश्यत्सु भारत ॥

sarvāśrameṣu mūḍheṣu karmasūpahateṣu ca | kāmāllobhācca mohācca bhayaṃ paśyatsu bhārata

जब सभी आश्रम मोहग्रस्त हों और उनके कर्म नष्ट हो गए हों, तथा काम, लोभ और मोह के कारण लोग चारों ओर भय ही देख रहे हों, हे भारत,

श्लोक 4 (12.141.4)

अविश्वस्तेषु सर्वेषु नित्यं भीतेषु भारत । नित्यं च हन्यमानेषु वञ्चयत्सु परस्परम् ॥

aviśvasteṣu sarveṣu nityaṃ bhīteṣu bhārata | nityaṃ ca hanyamāneṣu vañcayatsu parasparam

जब कोई किसी पर विश्वास न करता हो और सब सदा भयभीत रहते हों, जब लोग निरन्तर मारे जा रहे हों और एक-दूसरे को ठग रहे हों,

श्लोक 5 (12.141.5)

प्रदीप्तेषु च देशेषु ब्राह्मण्ये चातिपीडिते । अवर्षति च पर्जन्ये मिथो भेदे समुत्थिते ॥

pradīpteṣu ca deśeṣu brāhmaṇye cātipīḍite | avarṣati ca parjanye mitho bhede samutthite

जब देश-के-देश जल रहे हों और ब्राह्मणत्व अत्यन्त पीड़ित हो, जब मेघ वर्षा न करते हों और लोगों में आपसी फूट उठ खड़ी हुई हो,

श्लोक 6 (12.141.6)

सर्वस्मिन्दस्युसाद्भूते पृथिव्यामुपजीवने । केनस्विद्ब्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते ॥

sarvasmindasyusādbhūte pṛthivyāmupajīvane | kenasvidbrāhmaṇo jīvejjaghanye kāla āgate

जब पृथ्वी पर जीविका के सारे साधन डाकुओं के हाथ में चले गए हों, तब ऐसे दुर्दिन के आ जाने पर ब्राह्मण किस उपाय से जीवन बिताए?

श्लोक 7 (12.141.7)

अतितिक्षुः पुत्रपौत्राननुक्रोशान्नराधिप । कतमापदि वर्तेत तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

atitikṣuḥ putrapautrānanukrośānnarādhipa | katamāpadi varteta tanme brūhi pitāmaha

जो ब्राह्मण करुणावश अपने पुत्रों और पौत्रों का कष्ट सह नहीं सकता, हे नरेश्वर, वह ऐसी विपत्ति में कैसे चले? पितामह, यह मुझे बताइए।

श्लोक 8 (12.141.8)

कथं च राजा वर्तेत लोके कलुषतां गते । कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीयेत परंतप ॥

kathaṃ ca rājā varteta loke kaluṣatāṃ gate | kathamarthācca dharmācca na hīyeta paraṃtapa

और जब संसार पाप में डूब गया हो, तब राजा कैसे व्यवहार करे, जिससे हे परंतप, वह न अर्थ से वंचित हो और न धर्म से?

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.141.9)

राजमूला महाबाहो योगक्षेमसुवृष्टयः । प्रजासु व्याधयश्चैव मरणं च भयानि च ॥

rājamūlā mahābāho yogakṣemasuvṛṣṭayaḥ | prajāsu vyādhayaścaiva maraṇaṃ ca bhayāni ca

हे महाबाहो, योग-क्षेम और अच्छी वर्षा का मूल राजा है; और प्रजा में रोग, मृत्यु तथा भय का मूल भी वही है।

श्लोक 10 (12.141.10)

कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्च भरतर्षभ । राजमूला इति मतिर्मम नास्त्यत्र संशयः ॥

kṛtaṃ tretā dvāparaṃ ca kaliśca bharatarṣabha | rājamūlā iti matirmama nāstyatra saṃśayaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग भी राजा पर ही आधारित हैं, ऐसा मेरा मत है; इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 11 (12.141.11)

तस्मिंस्त्वभ्यागते काले प्रजानां दोषकारके । विज्ञानबलमास्थाय जीवितव्यं भवेत्तदा ॥

tasmiṃstvabhyāgate kāle prajānāṃ doṣakārake | vijñānabalamāsthāya jīvitavyaṃ bhavettadā

प्रजा के लिए दोष उत्पन्न करने वाला ऐसा समय जब आ जाए, तब मनुष्य को अपने विवेक के बल का सहारा लेकर जीना चाहिए।

श्लोक 12 (12.141.12)

अथाप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विश्वामित्रस्य संवादं चण्डालस्य च पक्कणे ॥

athāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | viśvāmitrasya saṃvādaṃ caṇḍālasya ca pakkaṇe

इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: चाण्डालों की बस्ती में विश्वामित्र और एक चण्डाल का संवाद।

श्लोक 13 (12.141.13)

त्रेताद्वापरयोः संधौ पुरा दैवव्यतिक्रमात् । अनावृष्टिरभूद्धोरा लोके द्वादशवार्षिकी ॥

tretādvāparayoḥ saṃdhau purā daivavyatikramāt | anāvṛṣṭirabhūddhorā loke dvādaśavārṣikī

बहुत पहले त्रेता और द्वापर की सन्धि में, दैव के उलट-फेर से, संसार में बारह वर्ष तक चलने वाली भीषण अनावृष्टि हुई।

श्लोक 14 (12.141.14)

प्रजानामतिवृद्धानां युगान्ते समुपस्थिते । त्रेतायां मोक्षसमये द्वापरप्रतिपादने ॥

prajānāmativṛddhānāṃ yugānte samupasthite | tretāyāṃ mokṣasamaye dvāparapratipādane

प्रजा बहुत बढ़ गई थी और युग का अन्त आ पहुँचा था; त्रेता के छूटने और द्वापर के आने के उस समय में --

श्लोक 15 (12.141.15)

न ववर्ष सहस्राक्षः प्रतिलोमोऽभवद्गुरुः । जगाम दक्षिणं मार्गं सोमो व्यावृत्तमण्डलः ॥

na vavarṣa sahasrākṣaḥ pratilomo'bhavadguruḥ | jagāma dakṣiṇaṃ mārgaṃ somo vyāvṛttamaṇḍalaḥ

सहस्राक्ष इन्द्र ने वर्षा नहीं की, बृहस्पति वक्र हो गए, और चन्द्रमा अपना मण्डल पलटकर दक्षिण मार्ग पर चला गया।

श्लोक 16 (12.141.16)

नावश्यायोऽपि रात्र्यन्ते कुत एवाभ्रराजयः । नद्यः संक्षिप्ततोयौघाः किंचिदन्तर्गताऽभवन् ॥

nāvaśyāyo'pi rātryante kuta evābhrarājayaḥ | nadyaḥ saṃkṣiptatoyaughāḥ kiṃcidantargatā'bhavan

रात के अन्त में ओस तक नहीं पड़ती थी, बादलों की तो बात ही क्या; नदियाँ सिकुड़ी हुई धाराओं वाली हो गईं और कहीं-कहीं भीतर ही समा गईं।

श्लोक 17 (12.141.17)

सरांसि सरितश्चैव कूपाः प्रस्रवणानि च । हतत्विषो न लक्ष्यन्ते निसर्गात्पूर्वकारितात् ॥

sarāṃsi saritaścaiva kūpāḥ prasravaṇāni ca | hatatviṣo na lakṣyante nisargātpūrvakāritāt

तालाब और नदियाँ, कुएँ और झरने — सब पहले से बँधे प्रकृति के क्रम से अपनी चमक खोकर दिखाई देना बन्द हो गए।

श्लोक 18 (12.141.18)

भूमिः शुष्कजलस्थाना विनिवृत्तसभाप्रपा । निवृत्तयज्ञस्वाध्याया निर्वषट्कारमङ्गला ॥

bhūmiḥ śuṣkajalasthānā vinivṛttasabhāprapā | nivṛttayajñasvādhyāyā nirvaṣaṭkāramaṅgalā

पृथ्वी का जल सूख गया, सभाएँ और प्याऊ बन्द हो गए; यज्ञ और वेदाध्ययन रुक गए, वषट्कार और सारे मंगल कर्म लुप्त हो गए।

श्लोक 19 (12.141.19)

उत्सन्नकृषिगोरक्षा निवृत्तविपणापणा । निवृत्तपूर्वसमया संप्रनष्टमहोत्सवा ॥

utsannakṛṣigorakṣā nivṛttavipaṇāpaṇā | nivṛttapūrvasamayā saṃpranaṣṭamahotsavā

खेती और गोपालन नष्ट हो गए, दुकानें और बाज़ार बन्द हो गए, पहले की सब मर्यादाएँ छूट गईं और बड़े-बड़े उत्सव मिट गए।

श्लोक 20 (12.141.20)

अस्थिकङ्कालसंकीर्णा हाहाभूतनराकुला । शून्यभूयिष्ठनगरा दग्धग्रामनिवेशना ॥

asthikaṅkālasaṃkīrṇā hāhābhūtanarākulā | śūnyabhūyiṣṭhanagarā dagdhagrāmaniveśanā

हड्डियों और कंकालों से पटी, "हाय-हाय" करते लोगों से भरी, अधिकांश नगर सूने, गाँव और बस्तियाँ जली हुई --

श्लोक 21 (12.141.21)

क्वचिच्चोरैः क्वचिच्छूरैः क्वचिद्राजभिरातुरैः । परस्परभयाच्चैव शून्यभूयिष्ठनिर्जना ॥

kvaciccoraiḥ kvacicchūraiḥ kvacidrājabhirāturaiḥ | parasparabhayāccaiva śūnyabhūyiṣṭhanirjanā

कहीं चोरों से, कहीं योद्धाओं से, कहीं पीड़ित राजाओं से, और परस्पर भय के कारण सब ओर अधिकतर सूनी और निर्जन,

श्लोक 22 (12.141.22)

गतदैवतसंस्थाना वृद्धबालविनाकृता । गोजाविमहिषीहीना परस्परपराहता ॥

gatadaivatasaṃsthānā vṛddhabālavinākṛtā | gojāvimahiṣīhīnā parasparaparāhatā

देवस्थानों से रहित, बूढ़ों और बच्चों से हीन, गाय, बकरी, भेड़ और भैंसों से शून्य, लोग आपस में एक-दूसरे को मारते हुए,

श्लोक 23 (12.141.23)

हतविप्रा हतारक्षा प्रनष्टोत्सवसंचया । शवभूतनरप्राया बभूव वसुधा तदा ॥

hataviprā hatārakṣā pranaṣṭotsavasaṃcayā | śavabhūtanaraprāyā babhūva vasudhā tadā

ब्राह्मण मारे गए, रक्षक मारे गए, उत्सव और संचित धन नष्ट हो गए — उस समय पृथ्वी प्रायः शवों की भूमि बन गई।

श्लोक 24 (12.141.24)

तस्मिन्प्रतिभये काले क्षीणधर्मे युधिष्ठिर । बभूवुः क्षुधिता मर्त्याः खादमानाः परस्परम् ॥

tasminpratibhaye kāle kṣīṇadharme yudhiṣṭhira | babhūvuḥ kṣudhitā martyāḥ khādamānāḥ parasparam

हे युधिष्ठिर, धर्म के क्षीण हो जाने पर उस भयंकर समय में भूखे मनुष्य एक-दूसरे को खाते हुए भटकने लगे।

श्लोक 25 (12.141.25)

ऋषयो नियमांस्त्यक्त्वा परित्यक्ताग्निदेवताः । आश्रमान्संपरित्यज्य पर्यधावन्नितस्ततः ॥

ṛṣayo niyamāṃstyaktvā parityaktāgnidevatāḥ | āśramānsaṃparityajya paryadhāvannitastataḥ

ऋषि अपने नियम छोड़ बैठे, अग्नि और देवताओं की उपासना त्याग दी, और आश्रम छोड़कर इधर-उधर भागने लगे।

श्लोक 26 (12.141.26)

विश्वामित्रोऽथ भगवान्महर्षिरनिकेतनः । क्षुधा परिगतो धीमान्समन्तात्पर्यधावत् ॥

viśvāmitro'tha bhagavānmaharṣiraniketanaḥ | kṣudhā parigato dhīmānsamantātparyadhāvat

तब भगवान् महर्षि विश्वामित्र, जो गृहहीन थे, बुद्धिमान होकर भी भूख से पीड़ित हो, चारों ओर दौड़ते फिरे।

श्लोक 27 (12.141.27)

त्यक्त्वा दारांश्च पुत्रांश्च कस्मिंश्च जनसंसदि । भक्ष्याभक्ष्यसमो भूत्वा निरग्निरनिकेतनः ॥

tyaktvā dārāṃśca putrāṃśca kasmiṃśca janasaṃsadi | bhakṣyābhakṣyasamo bhūtvā niragniraniketanaḥ

पत्नी और पुत्रों को कहीं लोगों की भीड़ में छोड़कर, खाने योग्य और न खाने योग्य का भेद भूलकर, बिना अग्नि और बिना घर के,

श्लोक 28 (12.141.28)

स कदाचित्परिपतञ्श्वपचानां निकेतनम् । हिंस्राणां प्राणिघातानामाससाद वने क्वचित् ॥

sa kadācitparipatañśvapacānāṃ niketanam | hiṃsrāṇāṃ prāṇighātānāmāsasāda vane kvacit

वे भटकते-भटकते एक बार वन में कहीं हिंसक और प्राणियों का वध करने वाले श्वपचों की बस्ती में जा पहुँचे।

श्लोक 29 (12.141.29)

विभिन्नकलशाकीर्णं श्वमांसेन च भूषितम् । वराहखरभग्नास्थिकपालघटसंकुलम् ॥

vibhinnakalaśākīrṇaṃ śvamāṃsena ca bhūṣitam | varāhakharabhagnāsthikapālaghaṭasaṃkulam

वहाँ टूटे हुए घड़े बिखरे थे, कुत्ते का मांस सजाकर टँगा था, और सूअरों तथा गधों की टूटी हड्डियों, खोपड़ियों और घड़ों की भीड़ लगी थी;

श्लोक 30 (12.141.30)

मृतचेलपरिस्तीर्णं निर्माल्यकृतभूषणम् । सर्पनिर्मोकमालाभिः कृतचिह्नकुटीमुखम् ॥

mṛtacelaparistīrṇaṃ nirmālyakṛtabhūṣaṇam | sarpanirmokamālābhiḥ kṛtacihnakuṭīmukham

मुर्दों के वस्त्र बिछे थे, बासी चढ़ावे ही उसके आभूषण थे, और झोपड़ियों के द्वार साँपों की केंचुलों की मालाओं से चिह्नित थे,

श्लोक 31 (12.141.31)

कुक्कुटाराबहुलं गर्दभध्वनिनादितम् । उद्घोषद्भिः खरैर्वाक्यैः कलहद्भिः परस्परम् ॥

kukkuṭārābahulaṃ gardabhadhvanināditam | udghoṣadbhiḥ kharairvākyaiḥ kalahadbhiḥ parasparam

मुर्गों की बाँग से गूँजती, गधों के रेंकने से भरी, और आपस में झगड़ते लोगों की कठोर चीख-पुकार से मुखरित,

श्लोक 32 (12.141.32)

उलूकपक्षिध्वनिभिर्देवतायतनैर्वृतम् । लोहघण्टापरिष्कारं श्वयूथपरिवारितम् ॥

ulūkapakṣidhvanibhirdevatāyatanairvṛtam | lohaghaṇṭāpariṣkāraṃ śvayūthaparivāritam

उल्लू और पक्षियों के स्वरों से गूँजते देवमन्दिरों से घिरी, लोहे की घण्टियों से सजी और कुत्तों के झुण्डों से भरी हुई।

श्लोक 33 (12.141.33)

तत्प्रविश्य क्षुधाविष्टो गाधिपुत्रो महानृषिः । आहारान्वेषणे युक्तः परं यत्नं समास्थितः ॥

tatpraviśya kṣudhāviṣṭo gādhiputro mahānṛṣiḥ | āhārānveṣaṇe yuktaḥ paraṃ yatnaṃ samāsthitaḥ

उसमें प्रवेश करके, भूख से व्याकुल गाधि के पुत्र महर्षि ने भोजन ढूँढने में पूरा प्रयत्न लगाया।

श्लोक 34 (12.141.34)

न च क्वचिदविन्दत्स भिक्षमाणोऽपि कौशिकः । मांसमन्नं फलं मूलमन्यद्वा तत्र किंचन ॥

na ca kvacidavindatsa bhikṣamāṇo'pi kauśikaḥ | māṃsamannaṃ phalaṃ mūlamanyadvā tatra kiṃcana

पर माँगने पर भी कौशिक को वहाँ कुछ न मिला — न मांस, न अन्न, न फल, न मूल, न और कोई वस्तु।

श्लोक 35 (12.141.35)

अहो कृच्छ्रं मया प्राप्तमिति निश्चित्य कौशिकः । पपात भूमौ दौर्बल्यात्तस्मिंश्चण्डालपक्कणे ॥

aho kṛcchraṃ mayā prāptamiti niścitya kauśikaḥ | papāta bhūmau daurbalyāttasmiṃścaṇḍālapakkaṇe

"हाय, मुझ पर कैसा कष्ट आ पड़ा!" ऐसा सोचकर कौशिक दुर्बलता के कारण उसी चाण्डाल-बस्ती में भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 36 (12.141.36)

स चिन्तयामास मुनिः किंनु मे सुकृतं भवेत् । कथं वृथा न मृत्युः स्यादिति पार्थिवसत्तम ॥

sa cintayāmāsa muniḥ kiṃnu me sukṛtaṃ bhavet | kathaṃ vṛthā na mṛtyuḥ syāditi pārthivasattama

हे नृपश्रेष्ठ, मुनि सोचने लगे: "मेरे लिए अब क्या भला होगा? मेरी मृत्यु व्यर्थ कैसे न हो?"

श्लोक 37 (12.141.37)

स ददर्श श्वमांसस्य कुतन्त्रीं पतितां मुनिः । चण्डालस्य गृहे राजन्सद्यः शस्त्रहतस्य वै ॥

sa dadarśa śvamāṃsasya kutantrīṃ patitāṃ muniḥ | caṇḍālasya gṛhe rājansadyaḥ śastrahatasya vai

हे राजन्, मुनि ने चण्डाल के घर में पड़ी कुत्ते के मांस की एक पट्टी देखी, जो अभी-अभी शस्त्र से मारे गए कुत्ते की थी।

श्लोक 38 (12.141.38)

स चिन्तयामास तदा स्तेयं कार्यमितो मया । न हीदानीमुपायो मे विद्यते प्राणधारणे ॥

sa cintayāmāsa tadā steyaṃ kāryamito mayā | na hīdānīmupāyo me vidyate prāṇadhāraṇe

तब उन्होंने सोचा: "मुझे यहाँ से चोरी करनी ही होगी; प्राण बचाने का अब मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है।"

श्लोक 39 (12.141.39)

आपत्सु विहितं स्तेयं विशिष्टसमहीनतः । परस्परं भवेत्पूर्वमास्थेयमिति निश्चयः ॥

āpatsu vihitaṃ steyaṃ viśiṣṭasamahīnataḥ | parasparaṃ bhavetpūrvamāstheyamiti niścayaḥ

"आपत्ति में चोरी विहित है — श्रेष्ठ से, समान से या हीन से; यह निश्चय है कि क्रम से पहले वाले का आश्रय लेना चाहिए।"

श्लोक 40 (12.141.40)

हीनादादेयमादौ स्यात्समानात्तदनन्तरम् । असंभवे त्वाददीत विशिष्टादपि धार्मिकात् ॥

hīnādādeyamādau syātsamānāttadanantaram | asaṃbhave tvādadīta viśiṣṭādapi dhārmikāt

"पहले हीन से लेना चाहिए, फिर समान से; और यदि यह सम्भव न हो तो श्रेष्ठ धर्मात्मा से भी ले लेना चाहिए।"

श्लोक 41 (12.141.41)

सोऽहमन्तावसायीनां हराम्येनां प्रतिग्रहात् । न स्तेयदोषं पश्यामि हरिष्याम्येतदामिषम् ॥

so'hamantāvasāyīnāṃ harāmyenāṃ pratigrahāt | na steyadoṣaṃ paśyāmi hariṣyāmyetadāmiṣam

"अतः मैं इसे अधम जनों के पास से, उनकी प्राप्त वस्तु में से, उठा ले जाऊँगा; मुझे इसमें चोरी का दोष नहीं दिखता। मैं यह मांस ले लूँगा।"

श्लोक 42 (12.141.42)

एतां बुद्धिं समास्थाय विश्वामित्रो महामुनिः । तस्मिन्देशे सुसुष्वाप पतितो यत्र भारत ॥

etāṃ buddhiṃ samāsthāya viśvāmitro mahāmuniḥ | tasmindeśe susuṣvāpa patito yatra bhārata

हे भारत, इस निश्चय पर पहुँचकर महामुनि विश्वामित्र जहाँ गिरे थे, उसी स्थान पर सो गए।

श्लोक 43 (12.141.43)

स विगाढां निशां दृष्ट्वा सुप्ते चण्डालपक्कणे । शनैरुत्थाय भगवान्प्रविवेश कुटीमुखम् ॥

sa vigāḍhāṃ niśāṃ dṛṣṭvā supte caṇḍālapakkaṇe | śanairutthāya bhagavānpraviveśa kuṭīmukham

रात गहरी हो गई और चाण्डाल-बस्ती सो गई, यह देखकर भगवान् विश्वामित्र धीरे से उठे और झोपड़ी के द्वार में घुस गए।

श्लोक 44 (12.141.44)

स सुप्त एव चण्डालः श्लेष्मापिहितलोचनः । परिभिन्नस्वरो रूक्षः प्रोवाचाप्रियदर्शनः ॥

sa supta eva caṇḍālaḥ śleṣmāpihitalocanaḥ | paribhinnasvaro rūkṣaḥ provācāpriyadarśanaḥ

वह चण्डाल सोया हुआ ही था; उसकी आँखें कफ से ढकी थीं, स्वर फटा और रूखा था, रूप देखने में अप्रिय था; वह बोल उठा:

श्वपच उवाच

श्लोक 45 (12.141.45)

कः कुतन्त्रीं घट्टयति सुप्ते चण्डालपक्कणे । जागर्मि नैव सुप्तोऽस्मि हतोऽसीति च दारुणः ॥

kaḥ kutantrīṃ ghaṭṭayati supte caṇḍālapakkaṇe | jāgarmi naiva supto'smi hato'sīti ca dāruṇaḥ

"चाण्डाल-बस्ती के सोते समय कुत्ते के मांस की पट्टी को कौन हिला रहा है? मैं जाग रहा हूँ, सोया नहीं हूँ — तू मरा!" वह भयंकर पुरुष बोला।

भीष्म उवाच

श्लोक 46 (12.141.46)

विश्वामित्रोऽहमित्येव सहसा तमुवाच ह । सहसाऽभ्यागतं भूयः सोद्वेगस्तेन कर्मणा ॥

viśvāmitro'hamityeva sahasā tamuvāca ha | sahasā'bhyāgataṃ bhūyaḥ sodvegastena karmaṇā

"मैं विश्वामित्र हूँ," उन्होंने तुरन्त उत्तर दिया; इस प्रकार अचानक पकड़े जाने पर वे अपने उस कर्म से बहुत घबराए हुए थे।

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 47 (12.141.47)

विश्वामित्रोऽहमायुष्मन्नागतोऽहं बुभुक्षितः । मा वधीर्मम सद्बुद्धे यदि सम्यक्प्रपश्यसि ॥

viśvāmitro'hamāyuṣmannāgato'haṃ bubhukṣitaḥ | mā vadhīrmama sadbuddhe yadi samyakprapaśyasi

"आयुष्मन्, मैं विश्वामित्र हूँ और भूखा होकर यहाँ आया हूँ। हे सद्बुद्धि वाले, यदि तुम ठीक से देखते हो तो मुझे मत मारो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 48 (12.141.48)

चण्डालस्तद्वचः श्रुत्वा महर्षेर्भावितात्मनः । शयनादुपसंभ्रान्त उद्ययौ प्रति तं ततः ॥

caṇḍālastadvacaḥ śrutvā maharṣerbhāvitātmanaḥ | śayanādupasaṃbhrānta udyayau prati taṃ tataḥ

शुद्धात्मा महर्षि की वह बात सुनकर चण्डाल घबराकर शय्या से उठा और उनकी ओर बढ़ा।

श्लोक 49 (12.141.49)

स विसृज्याश्रु नेत्राभ्यां बहुमानात्कृताञ्जलिः । उवाच कौशिकं रात्रौ ब्रह्मन्किं ते चिकीर्षितम् ॥

sa visṛjyāśru netrābhyāṃ bahumānātkṛtāñjaliḥ | uvāca kauśikaṃ rātrau brahmankiṃ te cikīrṣitam

उसकी आँखों से आँसू बह निकले; आदरपूर्वक हाथ जोड़कर उसने रात में कौशिक से कहा: "ब्रह्मन्, आप क्या करना चाहते हैं?"

श्लोक 50 (12.141.50)

विश्वामित्रस्तु मातङ्गमुवाच परिसान्त्वयन् । क्षुधितोऽन्तर्गतप्राणो हरिष्यामि श्वजाघनीम् ॥

viśvāmitrastu mātaṅgamuvāca parisāntvayan | kṣudhito'ntargataprāṇo hariṣyāmi śvajāghanīm

विश्वामित्र ने उस मातंग को सान्त्वना देते हुए कहा: "मैं भूखा हूँ, मेरे प्राण निकलने को हैं; मैं कुत्ते की जाँघ ले जाऊँगा।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 51 (12.141.51)

क्षुधितः कलुषं यातो नास्ति ह्रीरशनार्थिनः । क्षुच्च मां दूषयत्यत्र हरिष्यामि श्वजाघनीम् ॥

kṣudhitaḥ kaluṣaṃ yāto nāsti hrīraśanārthinaḥ | kṣucca māṃ dūṣayatyatra hariṣyāmi śvajāghanīm

"भूखा मनुष्य पाप की ओर चला जाता है; भोजन चाहने वाले को लज्जा नहीं रहती। यहाँ भूख मुझे दूषित कर रही है; मैं कुत्ते की जाँघ ले जाऊँगा।

श्लोक 52 (12.141.52)

अवसीदन्ति मे प्राणाः स्मृतिर्मे नश्यति क्षुधा । दुर्बलो नष्टसंज्ञश्च भक्ष्याभक्ष्यविवर्जितः । स्वधर्मं बुध्यमानोऽपि हरिष्यामि श्वजाघनीम् ॥

avasīdanti me prāṇāḥ smṛtirme naśyati kṣudhā | durbalo naṣṭasaṃjñaśca bhakṣyābhakṣyavivarjitaḥ | svadharmaṃ budhyamāno'pi hariṣyāmi śvajāghanīm

"मेरे प्राण डूब रहे हैं, भूख से मेरी स्मृति नष्ट हो रही है; मैं दुर्बल और बेसुध हूँ, खाने योग्य और अयोग्य का विचार खो चुका हूँ। अपना धर्म जानते हुए भी मैं कुत्ते की जाँघ ले जाऊँगा।

श्लोक 53 (12.141.53)

यदा भैक्षं न विन्दामि युष्माकमहमालये । तदा बुद्धिः कृता पापे हरिष्यामि श्वजाघनीम् ॥

yadā bhaikṣaṃ na vindāmi yuṣmākamahamālaye | tadā buddhiḥ kṛtā pāpe hariṣyāmi śvajāghanīm

"तुम्हारे घर में मुझे भिक्षा नहीं मिलती, इसलिए मैंने पाप में मन लगाया है: मैं कुत्ते की जाँघ ले जाऊँगा।

श्लोक 54 (12.141.54)

अग्निर्मुखं पुरोधाश्च देवानां शुचिषाङ्विभुः । यथा च सर्वभुग्ब्रह्मा तथा मां विद्धि धर्मतः ॥

agnirmukhaṃ purodhāśca devānāṃ śuciṣāṅvibhuḥ | yathā ca sarvabhugbrahmā tathā māṃ viddhi dharmataḥ

"अग्नि देवताओं का मुख और पुरोहित है, वही व्यापक और शुद्ध को ही ग्रहण करने वाला है; और जैसे सर्वभक्षी ब्रह्मस्वरूप अग्नि है, वैसा ही धर्मानुसार मुझे भी जानो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 55 (12.141.55)

तमुवाच स चण्डालो महर्षे शृणु मे वचः । श्रुत्वा तथा तमातिष्ठ यथा धर्मो न हीयते ॥

tamuvāca sa caṇḍālo maharṣe śṛṇu me vacaḥ | śrutvā tathā tamātiṣṭha yathā dharmo na hīyate

उस चण्डाल ने उनसे कहा: "हे महर्षि, मेरी बात सुनिए, और सुनकर वैसा कीजिए जिससे आपका धर्म नष्ट न हो।

श्वपच उवाच

श्लोक 56 (12.141.56)

धर्मं तवापि विप्रर्षे शृणु यत्ते ब्रवीम्यहम् ॥

dharmaṃ tavāpi viprarṣe śṛṇu yatte bravīmyaham

"हे विप्रर्षि, मैं आपको जो धर्म बताता हूँ, उसे भी सुनिए।

श्लोक 57 (12.141.57)

मृगाणामधमं श्वानं प्रवदन्ति मनीषिणः । तस्याप्यधम उद्देशः शरीरस्य तु जाघी ॥

mṛgāṇāmadhamaṃ śvānaṃ pravadanti manīṣiṇaḥ | tasyāpyadhama uddeśaḥ śarīrasya tu jāghī

"विद्वान लोग कुत्ते को पशुओं में अधम कहते हैं, और उसके शरीर में जाँघ का भाग भी अधम है।

श्लोक 58 (12.141.58)

नेदं सम्यग्व्यवसितं महर्षे कर्म गर्हितम् । चण्डालस्वस्य हरणमभक्ष्यस्य विशेषतः ॥

nedaṃ samyagvyavasitaṃ maharṣe karma garhitam | caṇḍālasvasya haraṇamabhakṣyasya viśeṣataḥ

"हे महर्षि, यह निश्चय उचित नहीं है, यह निन्दित कर्म है — चण्डाल की वस्तु चुराना, और वह भी विशेषकर अभक्ष्य वस्तु।

श्लोक 59 (12.141.59)

साध्वन्यमनुपश्य त्वमुपायं प्राणधारणे । श्वमांसलोभात्तपसो नाशस्ते स्यान्महामुने ॥

sādhvanyamanupaśya tvamupāyaṃ prāṇadhāraṇe | śvamāṃsalobhāttapaso nāśaste syānmahāmune

"प्राण बचाने का कोई दूसरा अच्छा उपाय ढूँढिए; हे महामुने, कुत्ते के मांस के लोभ से आपकी तपस्या नष्ट हो जाएगी।

श्लोक 60 (12.141.60)

जानता विहितो मार्गो न कार्यो धर्मसंकरः । मा स्म धर्मं परित्याक्षीस्त्वं हि धर्मविदुत्तमः ॥

jānatā vihito mārgo na kāryo dharmasaṃkaraḥ | mā sma dharmaṃ parityākṣīstvaṃ hi dharmaviduttamaḥ

"जो जानता है, उसे विहित मार्ग पर चलना चाहिए और धर्मों का संकर नहीं करना चाहिए। धर्म का त्याग मत कीजिए; आप तो धर्म जानने वालों में श्रेष्ठ हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 61 (12.141.61)

विश्वामित्रस्ततो राजन्नित्युक्तो भरतर्षभ । क्षुधार्तः प्रत्युवाचेदं पुनरेव महामुनिः ॥

viśvāmitrastato rājannityukto bharatarṣabha | kṣudhārtaḥ pratyuvācedaṃ punareva mahāmuniḥ

हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार कहे जाने पर भूख से व्याकुल महामुनि विश्वामित्र ने फिर उसे उत्तर दिया:

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 62 (12.141.62)

निराहारस्य सुमहान्मम कालोऽभिधावतः । न विद्यतेऽप्युपायश्च कश्चिन्मे प्राणधारणे ॥

nirāhārasya sumahānmama kālo'bhidhāvataḥ | na vidyate'pyupāyaśca kaścinme prāṇadhāraṇe

"बिना भोजन के भटकते मेरा बहुत लम्बा समय बीत गया है, और प्राण बचाने का कोई भी उपाय मुझे नहीं दिखता।

श्लोक 63 (12.141.63)

येनकेन विशेषेण कर्मणा येनकेनचित् । उज्जिहीर्षे सीदमानः समर्थो धर्ममाचरेत् ॥

yenakena viśeṣeṇa karmaṇā yenakenacit | ujjihīrṣe sīdamānaḥ samartho dharmamācaret

"जो डूब रहा हो और अपना उद्धार करना चाहता हो, वह जिस-किसी उपाय और जिस-किसी कर्म से भी अपने को उबारे; समर्थ हो जाने पर वह धर्म का आचरण कर सकता है।

श्लोक 64 (12.141.64)

ऐन्द्रो धर्मः क्षत्रियाणां ब्राह्मणानामथाग्निकः । ब्रह्मवह्निर्मम बलं भोक्ष्यामि शमयन्क्षुधाम् ॥

aindro dharmaḥ kṣatriyāṇāṃ brāhmaṇānāmathāgnikaḥ | brahmavahnirmama balaṃ bhokṣyāmi śamayankṣudhām

"क्षत्रियों का धर्म इन्द्र-सम्बन्धी है और ब्राह्मणों का अग्नि-सम्बन्धी। ब्रह्म-अग्नि अर्थात् वेद ही मेरा बल है; मैं खाकर अपनी भूख शान्त करूँगा।

श्लोक 65 (12.141.65)

यथायथैव जीवेद्धि तत्कर्तव्यमहेलया । जीवितं मरणाच्छ्रेयो जीवन्धर्ममवाप्नुयात् ॥

yathāyathaiva jīveddhi tatkartavyamahelayā | jīvitaṃ maraṇācchreyo jīvandharmamavāpnuyāt

"जिस-जिस प्रकार मनुष्य जीवित रह सके, वही बिना संकोच के करना चाहिए; मरने से जीना श्रेष्ठ है, क्योंकि जीवित रहकर ही मनुष्य धर्म पा सकता है।

श्लोक 66 (12.141.66)

सोऽहं जीवितमाकाङ्क्षन्नभक्ष्यस्यापि भक्षणम् । व्यवस्ये बुद्धिपूर्वं वै तद्भवाननुमन्यताम् ॥

so'haṃ jīvitamākāṅkṣannabhakṣyasyāpi bhakṣaṇam | vyavasye buddhipūrvaṃ vai tadbhavānanumanyatām

"इसलिए जीने की इच्छा से मैं सोच-समझकर अभक्ष्य को भी खाने का निश्चय करता हूँ; आप इसकी अनुमति दीजिए।

श्लोक 67 (12.141.67)

जीवन्धर्मं चरिष्यामि प्रणोत्स्याम्यशुभानि तु । तपोभिर्विद्यया चैव ज्योतींषीव महत्तमः ॥

jīvandharmaṃ cariṣyāmi praṇotsyāmyaśubhāni tu | tapobhirvidyayā caiva jyotīṃṣīva mahattamaḥ

"जीवित रहकर मैं धर्म का आचरण करूँगा और तप तथा विद्या से अशुभ को वैसे ही दूर करूँगा, जैसे प्रकाश घने अन्धकार को दूर करते हैं।"

श्वपच उवाच

श्लोक 68 (12.141.68)

नैतत्खादन्प्राप्स्यसे प्राणमद्य । नायुर्दीर्घं नामृतस्येव तृप्तिम् । भिक्षामन्यां भिक्ष मा ते मनोऽस्तु । श्वभक्षणे श्वा ह्यभक्ष्यो द्विजानाम् ॥

naitatkhādanprāpsyase prāṇamadya | nāyurdīrghaṃ nāmṛtasyeva tṛptim | bhikṣāmanyāṃ bhikṣa mā te mano'stu | śvabhakṣaṇe śvā hyabhakṣyo dvijānām

"इसे खाकर आज तुम्हें न प्राण-बल मिलेगा, न दीर्घ आयु, न अमृत जैसी तृप्ति। दूसरी भिक्षा माँगो; तुम्हारा मन इसमें न लगे। कुत्ते को खाना ब्राह्मणों के लिए अभक्ष्य है।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 69 (12.141.69)

न दुर्भिक्षे सुलभं मांसमन्य । च्छ्वपाक नान्नं न च मेऽस्ति वित्तम् । क्षुधार्तश्चाहमगतिर्निराशः । श्वजाघनीं षड्रसात्साधु मन्ये ॥

na durbhikṣe sulabhaṃ māṃsamanya | cchvapāka nānnaṃ na ca me'sti vittam | kṣudhārtaścāhamagatirnirāśaḥ | śvajāghanīṃ ṣaḍrasātsādhu manye

"अकाल में दूसरा मांस मिलना सहज नहीं है, हे श्वपाक; न मेरे पास अन्न है, न धन। भूख से पीड़ित, निराश्रय और निराश होकर मैं कुत्ते की जाँघ को छह रसों से भी उत्तम मानता हूँ।"

श्वपच उवाच

श्लोक 70 (12.141.70)

पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रस्य वै विशः । शल्यकः श्वाविधो गोधा शशः कूर्मश्च पञ्चमः । यदि शास्त्रं प्रमाणं ते माऽभक्ष्ये वै मनः कृथाः ॥

pañca pañcanakhā bhakṣyā brahmakṣatrasya vai viśaḥ | śalyakaḥ śvāvidho godhā śaśaḥ kūrmaśca pañcamaḥ | yadi śāstraṃ pramāṇaṃ te mā'bhakṣye vai manaḥ kṛthāḥ

"ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए पाँच पंजे वाले पाँच जीव खाने योग्य हैं: साही, श्वावित्, गोह, खरगोश और पाँचवाँ कछुआ। यदि शास्त्र तुम्हारे लिए प्रमाण है तो अभक्ष्य में मन मत लगाओ।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 71 (12.141.71)

अगस्त्येनासुरो जग्धो वातापिः क्षुधितेन वै । अहमापद्गतः क्षुब्धो भक्षयिष्ये श्वजाघनीम् ॥

agastyenāsuro jagdho vātāpiḥ kṣudhitena vai | ahamāpadgataḥ kṣubdho bhakṣayiṣye śvajāghanīm

"भूखे अगस्त्य ने असुर वातापि को खा लिया था। मैं भी विपत्ति में पड़ा हूँ और व्याकुल हूँ; मैं कुत्ते की जाँघ खाऊँगा।"

श्वपच उवाच

श्लोक 72 (12.141.72)

भिक्षामन्यामाहरेति न च कर्तुमिहार्हसि । न नूनं कार्यमेतद्वै हर कामं श्वजाघनीम् ॥

bhikṣāmanyāmāhareti na ca kartumihārhasi | na nūnaṃ kāryametadvai hara kāmaṃ śvajāghanīm

"जाकर दूसरी भिक्षा ले आओ; तुम्हें यह करना उचित नहीं है। निश्चय ही यह करने योग्य नहीं है — फिर भी चाहो तो कुत्ते की जाँघ ले जाओ।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 73 (12.141.73)

शिष्टा वै कारणं धर्मे तद्वृत्तमनुवर्तये । परां मेध्याशनादेनां भक्ष्यां मन्ये श्वजाघनीम् ॥

śiṣṭā vai kāraṇaṃ dharme tadvṛttamanuvartaye | parāṃ medhyāśanādenāṃ bhakṣyāṃ manye śvajāghanīm

"धर्म में श्रेष्ठजन ही प्रमाण हैं और मैं उन्हीं के आचरण का अनुसरण करता हूँ। मैं इस कुत्ते की जाँघ को शुद्ध भोजन से भी बढ़कर खाने योग्य मानता हूँ।"

श्वपच उवाच

श्लोक 74 (12.141.74)

असद्भिर्यः समाचीर्णो न स धर्मः सनातनः । अकार्यमिह कार्यं वा मा छलेनाशुभं कृथाः ॥

asadbhiryaḥ samācīrṇo na sa dharmaḥ sanātanaḥ | akāryamiha kāryaṃ vā mā chalenāśubhaṃ kṛthāḥ

"दुष्टों ने जिसका आचरण किया है, वह सनातन धर्म नहीं है। करने योग्य हो या न हो, छल-तर्क से अशुभ कर्म मत करो।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 75 (12.141.75)

न पातकं नावमतमृषिः सन्कर्तुमर्हति । समौ च श्वमृगौ मन्ये तस्माद्भोक्ष्ये श्वजाघनीम् ॥

na pātakaṃ nāvamatamṛṣiḥ sankartumarhati | samau ca śvamṛgau manye tasmādbhokṣye śvajāghanīm

"ऋषि के लिए यह न पाप है, न निन्दनीय। मैं कुत्ते और मृग को समान मानता हूँ; इसलिए कुत्ते की जाँघ खाऊँगा।"

श्वपच उवाच

श्लोक 76 (12.141.76)

यद्ब्राह्मणार्थे कृतमर्थितेन । तेनर्षिणा तदभक्ष्यं न कामात् । स वै धर्मो यत्र न पापमस्ति । सर्वैरुपायैर्गुरवो हि रक्ष्याः ॥

yadbrāhmaṇārthe kṛtamarthitena | tenarṣiṇā tadabhakṣyaṃ na kāmāt | sa vai dharmo yatra na pāpamasti | sarvairupāyairguravo hi rakṣyāḥ

"किसी ब्राह्मण के लिए, उसके माँगने पर, उस ऋषि ने जो किया, वह कामना से नहीं किया गया था, इसलिए वह अभक्ष्य नहीं ठहरा। वही धर्म है जिसमें पाप नहीं; और सब उपायों से गुरुजनों की रक्षा करनी चाहिए।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 77 (12.141.77)

मित्रं च मे ब्राह्मणस्यायमात्मा । प्रियश्च मे पूज्यतमश्च लोके । तद्भोक्तुकामोऽहमिमां जिहीर्षे । नृशंसानामीदृशानां न विभ्ये ॥

mitraṃ ca me brāhmaṇasyāyamātmā | priyaśca me pūjyatamaśca loke | tadbhoktukāmo'hamimāṃ jihīrṣe | nṛśaṃsānāmīdṛśānāṃ na vibhye

"यह मेरा शरीर, एक ब्राह्मण की आत्मा, मेरा मित्र है, मुझे प्रिय है और संसार में सबसे अधिक पूजनीय है। उसे खिलाने की इच्छा से मैं इसे ले जाना चाहता हूँ; तुम जैसे निर्दयी लोगों से मैं नहीं डरता।"

श्वपच उवाच

श्लोक 78 (12.141.78)

कामं नरा जीवितं संत्यजन्ति । न चाभक्ष्ये क्वचित्कुर्वन्ति बुद्धिम् । सर्वांश्च कामान्प्राप्नुवन्तीति विद्धि । स्वर्गे निवासात्सहते क्षुधां वै ॥

kāmaṃ narā jīvitaṃ saṃtyajanti | na cābhakṣye kvacitkurvanti buddhim | sarvāṃśca kāmānprāpnuvantīti viddhi | svarge nivāsātsahate kṣudhāṃ vai

"मनुष्य चाहे तो प्राण छोड़ देते हैं, पर अभक्ष्य में कभी मन नहीं लगाते; जान लो कि वे सब कामनाएँ पा लेते हैं, क्योंकि जो भूख सह लेता है, वह स्वर्ग में निवास करता है।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 79 (12.141.79)

स्थाने भवेत्स यशः प्रेत्यभावे । निःसंशयः कर्मणां वै विनाशः । अहं पुनर्व्रतनित्यः शमात्मा । मूलं रक्ष्यं भक्षयिष्याम्यभक्ष्यम् ॥

sthāne bhavetsa yaśaḥ pretyabhāve | niḥsaṃśayaḥ karmaṇāṃ vai vināśaḥ | ahaṃ punarvratanityaḥ śamātmā | mūlaṃ rakṣyaṃ bhakṣayiṣyāmyabhakṣyam

"परलोक में यश मिलना उचित हो सकता है, पर कर्मों का नाश तो निश्चित है। मैं तो व्रत में सदा दृढ़ और शान्त चित्त हूँ; अपने मूल की रक्षा करता हुआ अभक्ष्य भी खाऊँगा।"

श्लोक 80 (12.141.80)

बुद्ध्यात्मके व्यक्तमस्तीति सृष्टो । मोक्षात्मके त्वं यथा शिष्टचक्षुः । यद्यप्येतत्संशयाच्च त्रपामि । नाहं भविष्यामि यथा न माया ॥

buddhyātmake vyaktamastīti sṛṣṭo | mokṣātmake tvaṃ yathā śiṣṭacakṣuḥ | yadyapyetatsaṃśayācca trapāmi | nāhaṃ bhaviṣyāmi yathā na māyā

"बुद्धिस्वरूप में यह स्पष्ट ही है, ऐसा ही रचा गया है; तुम तो मोक्षस्वरूप में शिष्टजनों की दृष्टि से देखते हो। यद्यपि संशय के कारण मैं इसमें लज्जित होता हूँ, फिर भी मैं वह नहीं बनूँगा जो मैं नहीं हूँ, और मोह से भी कर्म नहीं करूँगा।"

श्वपच उवाच

श्लोक 81 (12.141.81)

गोपनीयमिदं दुःखमिति मे निश्चिता मतिः । दुष्कृतं ब्राह्मणं सन्तं यस्त्वामहमुपालभे ॥

gopanīyamidaṃ duḥkhamiti me niścitā matiḥ | duṣkṛtaṃ brāhmaṇaṃ santaṃ yastvāmahamupālabhe

"मेरा निश्चित मत है कि यह दुःख छिपाकर रखना चाहिए; मैं तो ब्राह्मण होते हुए भी आपको आपके इस बुरे कर्म के लिए ही टोकता हूँ।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 82 (12.141.82)

पिबन्त्येवोदकं गावो मण्डूकेषु रुवत्स्वपि । न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति मा भूरात्मप्रशंसकः ॥

pibantyevodakaṃ gāvo maṇḍūkeṣu ruvatsvapi | na te'dhikāro dharme'sti mā bhūrātmapraśaṃsakaḥ

"मेंढकों के टर्राते रहने पर भी गायें पानी पीती ही रहती हैं। धर्म के विषय में तुम्हारा कोई अधिकार नहीं; अपनी प्रशंसा करने वाले मत बनो।"

श्वपच उवाच

श्लोक 83 (12.141.83)

सुहृद्भूत्वाऽनुशोचे त्वां कृपा हि त्वयि मे द्विज । तदिदं श्रेय आधत्स्व मा लोभे चेत आदधाः ॥

suhṛdbhūtvā'nuśoce tvāṃ kṛpā hi tvayi me dvija | tadidaṃ śreya ādhatsva mā lobhe ceta ādadhāḥ

"हे द्विज, मैं मित्र बनकर आपके लिए शोक करता हूँ, क्योंकि आपके प्रति मेरे मन में करुणा है। इसलिए जो श्रेयस्कर है उसे अपनाइए और लोभ में मन मत लगाइए।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 84 (12.141.84)

सुहृन्मे त्वं सुखेप्सुश्चेदापदो मां समुद्धर । जानेऽहं धर्मतोऽऽत्मानमुत्सृजेमां श्वजाघनीम् ॥

suhṛnme tvaṃ sukhepsuścedāpado māṃ samuddhara | jāne'haṃ dharmato''tmānamutsṛjemāṃ śvajāghanīm

"यदि तुम मेरे मित्र हो और मेरा सुख चाहते हो तो मुझे इस विपत्ति से उबारो। मैं धर्म के अनुसार अपने को जानता हूँ; यह कुत्ते की जाँघ मुझे दे दो।"

श्वपच उवाच

श्लोक 85 (12.141.85)

नैवोत्सहे भवतो दातुमेतां । नोपेक्षितुं ह्रियमाणं स्वमन्नम् । उभौ स्यावः श्वमलेनानुलिप्तौ । दाता चाहं ब्राह्मणस्त्वं प्रतीच्छन् ॥

naivotsahe bhavato dātumetāṃ | nopekṣituṃ hriyamāṇaṃ svamannam | ubhau syāvaḥ śvamalenānuliptau | dātā cāhaṃ brāhmaṇastvaṃ pratīcchan

"मैं आपको यह देने का साहस नहीं करता, और अपना अन्न उठाया जाते देखकर चुप भी नहीं रह सकता। हम दोनों कुत्ते के मल से लिप्त हो जाएँगे — मैं देने वाला और आप, ब्राह्मण होकर, लेने वाले।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 86 (12.141.86)

अद्याहमेतद्वृजिनं कर्म कृत्वा । जीवंश्चरिष्यामि महापवित्रम् । संपूतात्मा धर्ममेवाभिपत्स्ये । यदेतयोर्गुरु तद्वै ब्रवीहि ॥

adyāhametadvṛjinaṃ karma kṛtvā | jīvaṃścariṣyāmi mahāpavitram | saṃpūtātmā dharmamevābhipatsye | yadetayorguru tadvai bravīhi

"आज यह पापकर्म करके मैं जीवित रहूँगा और महान् पवित्र आचरण करूँगा; शुद्ध आत्मा होकर धर्म को ही अपनाऊँगा। इन दोनों में जो भारी है, वह मुझे बताओ।"

श्वपच उवाच

श्लोक 87 (12.141.87)

आत्मैव साक्षी किल धर्मकृत्ये । त्वमेव जानासि यदत्र दुष्कृतम् । यो ह्याद्रियाद्भक्ष्यमिति श्वमांसं । मन्ये न तस्यास्ति विवर्जनीयम् ॥

ātmaiva sākṣī kila dharmakṛtye | tvameva jānāsi yadatra duṣkṛtam | yo hyādriyādbhakṣyamiti śvamāṃsaṃ | manye na tasyāsti vivarjanīyam

"धर्म-कर्म में आत्मा ही साक्षी है; इसमें जो दोष है, उसे आप स्वयं जानते हैं। जो कुत्ते के मांस को भक्ष्य मानकर आदर देता है, उसके लिए मेरी समझ में कुछ भी त्याज्य नहीं रहता।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 88 (12.141.88)

उपधानैः साधते नापि दोषः । कार्ये सिद्धे मित्र नात्रापवादः । अस्मिन्नहिंसा नानृते वाक्यलेशो । भक्ष्यक्रिया यत्र न तद्गरीयः ॥

upadhānaiḥ sādhate nāpi doṣaḥ | kārye siddhe mitra nātrāpavādaḥ | asminnahiṃsā nānṛte vākyaleśo | bhakṣyakriyā yatra na tadgarīyaḥ

"ऐसे साधनों से सधे हुए कार्य में कोई दोष नहीं लगता; कार्य सिद्ध हो जाने पर, मित्र, इसमें कोई निन्दा नहीं। इसमें न हिंसा है, न झूठ का लेशमात्र; जिस भोजन-क्रिया में ये न हों, वह बड़ा दोष नहीं है।"

श्वपच उवाच

श्लोक 89 (12.141.89)

यद्येष हेतुस्तव खादने स्या । न्न ते वेदः कारणं नार्यधर्मः । तस्माद्भक्ष्ये भक्षणे वा द्विजेन्द्र । दोषं न पश्यामि यथेदमत्र ॥

yadyeṣa hetustava khādane syā | nna te vedaḥ kāraṇaṃ nāryadharmaḥ | tasmādbhakṣye bhakṣaṇe vā dvijendra | doṣaṃ na paśyāmi yathedamatra

"यदि खाने के लिए तुम्हारा यही कारण है, तो तुम्हारे लिए न वेद प्रमाण है, न आर्यों का धर्म। इसलिए, हे द्विजश्रेष्ठ, इस प्रकार अभक्ष्य के भक्षण में मुझे कोई दोष नहीं दिखता।"

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 90 (12.141.90)

न पातकं भक्षमाणस्य दृष्टं । सुरां तु पीत्वा पततीति शब्दः । अन्योन्यकार्याणि यथा तथैव । न लेपमात्रेण कृतं हिनस्ति ॥

na pātakaṃ bhakṣamāṇasya dṛṣṭaṃ | surāṃ tu pītvā patatīti śabdaḥ | anyonyakāryāṇi yathā tathaiva | na lepamātreṇa kṛtaṃ hinasti

"खाने में कोई पाप नहीं देखा गया; 'गिर जाता है' यह वचन तो केवल सुरा पीने के विषय में है। जैसे कर्म एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, वैसे ही थोड़े-से लेप से किया हुआ पुण्य नष्ट नहीं होता।"

श्वपच उवाच

श्लोक 91 (12.141.91)

पादौ मूलं समभवद्वृन्ताकं शिर उच्यते । शेफात्तु गृञ्जरं जातं पलाण्डुस्त्वण्डसंभवः ॥

pādau mūlaṃ samabhavadvṛntākaṃ śira ucyate | śephāttu gṛñjaraṃ jātaṃ palāṇḍustvaṇḍasaṃbhavaḥ

"पैरों से मूली उत्पन्न हुई; सिर को बैंगन कहते हैं; लिंग से गृंजन उत्पन्न हुआ और अण्डकोश से प्याज़ पैदा हुई;

श्लोक 92 (12.141.92)

श्वरोमजः शैव्यशाको लशुनं द्विजसंभवम् । चुक्किनामा पर्णशाकः कर्णादजनि भूसुर ॥

śvaromajaḥ śaivyaśāko laśunaṃ dvijasaṃbhavam | cukkināmā parṇaśākaḥ karṇādajani bhūsura

कुत्ते के रोम से शैव्य शाक बना, दाँतों से लहसुन, और कान से चुक्की नाम का पत्तेदार शाक उत्पन्न हुआ, हे ब्राह्मण।"

श्लोक 93 (12.141.93)

अस्थानतो हीनतः कुत्सिताद्वा । तद्विद्वांसं बाधते साधु वृत्तम् । श्वानं पुनर्यो लभतेऽभिषङ्गा । त्तेनापि दण्डः सहितव्य एव ॥

asthānato hīnataḥ kutsitādvā | tadvidvāṃsaṃ bādhate sādhu vṛttam | śvānaṃ punaryo labhate'bhiṣaṅgā | ttenāpi daṇḍaḥ sahitavya eva

"अनुचित स्थान से, हीन से या निन्दित से लेने पर सदाचारी विद्वान की भी हानि होती है; और जो हठपूर्वक कुत्ते का मांस ले लेता है, उसे भी उसका दण्ड सहना ही पड़ता है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 94 (12.141.94)

एवमुक्त्वा निववृते मातङ्गः कौशिकं तदा । विश्वामित्रो जहारैव कृतबुद्धिः श्वजाघनीम् ॥

evamuktvā nivavṛte mātaṅgaḥ kauśikaṃ tadā | viśvāmitro jahāraiva kṛtabuddhiḥ śvajāghanīm

ऐसा कहकर चण्डाल पीछे हट गया, और निश्चय कर चुके विश्वामित्र ने कुत्ते की जाँघ ले ही ली।

श्लोक 95 (12.141.95)

ततो जग्राह स श्वाङ्गं जीवितार्थी महामुनिः । सदारस्तामुपाहृत्य वने भोक्तुमियेष सः ॥

tato jagrāha sa śvāṅgaṃ jīvitārthī mahāmuniḥ | sadārastāmupāhṛtya vane bhoktumiyeṣa saḥ

तब जीवन चाहने वाले महामुनि ने उस कुत्ते का अंग उठा लिया, और पत्नी सहित उसे लेकर वन में खाने की इच्छा की।

श्लोक 96 (12.141.96)

अथास्य बुद्धिरभवद्विधिनाऽहं श्वजाघनीम् । भक्षयामि यथाकालं पूर्वं संतर्प्य देवताः ॥

athāsya buddhirabhavadvidhinā'haṃ śvajāghanīm | bhakṣayāmi yathākālaṃ pūrvaṃ saṃtarpya devatāḥ

तब उनके मन में विचार आया: "मैं पहले देवताओं को तृप्त करके, विधिपूर्वक और यथासमय कुत्ते की जाँघ खाऊँगा।"

श्लोक 97 (12.141.97)

ततोऽग्निमुपसंहृत्य ब्राह्मेण विधिना मुनिः । ऐन्द्राग्नेयेन विधिना चरुं श्रपयत स्वयम् ॥

tato'gnimupasaṃhṛtya brāhmeṇa vidhinā muniḥ | aindrāgneyena vidhinā caruṃ śrapayata svayam

तब मुनि ने ब्राह्म विधि से अग्नि स्थापित की और ऐन्द्राग्न विधि से स्वयं चरु पकाया।

श्लोक 98 (12.141.98)

ततः समारभत्कर्म दैवं पित्र्यं च भारत । आहूय देवानिन्द्रादीन्भागंभागं विधिक्रमात् ॥

tataḥ samārabhatkarma daivaṃ pitryaṃ ca bhārata | āhūya devānindrādīnbhāgaṃbhāgaṃ vidhikramāt

हे भारत, फिर उन्होंने देवकर्म और पितृकर्म आरम्भ किया, इन्द्र आदि देवताओं को बुलाकर विधि-क्रम से सबको उनका-उनका भाग दिया।

श्लोक 99 (12.141.99)

एतस्मिन्नेव काले तु प्रववर्ष स वासवः । संजीवयन्प्रजाः सर्वा जनयामास चौषधीः ॥

etasminneva kāle tu pravavarṣa sa vāsavaḥ | saṃjīvayanprajāḥ sarvā janayāmāsa cauṣadhīḥ

ठीक उसी समय इन्द्र ने वर्षा की; उसने सब प्राणियों को जिला दिया और ओषधियाँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 100 (12.141.100)

विश्वामित्रोऽपि भगवांस्तपसा दग्धकिल्बिषः । कालेन महता सिद्धिमवाप परमाद्भुताम् ॥

viśvāmitro'pi bhagavāṃstapasā dagdhakilbiṣaḥ | kālena mahatā siddhimavāpa paramādbhutām

और भगवान् विश्वामित्र भी तप से अपने पाप जलाकर, समय आने पर परम अद्भुत सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 101 (12.141.101)

स संहृत्य च तत्कर्म अनास्वाद्य च तद्धविः । तोषयामास देवांश्च पितॄंश्च द्विजसत्तमः ॥

sa saṃhṛtya ca tatkarma anāsvādya ca taddhaviḥ | toṣayāmāsa devāṃśca pitṝṃśca dvijasattamaḥ

उस कर्म को पूरा करके, उस हवि को चखे बिना ही, उन द्विजश्रेष्ठ ने देवताओं और पितरों को तृप्त किया।

श्लोक 102 (12.141.102)

एवं विद्वानदीनात्मा व्यसनस्थो जिजीविषुः । सर्वोपायैरुपायज्ञो दीनमात्मानमुद्धरेत् ॥

evaṃ vidvānadīnātmā vyasanastho jijīviṣuḥ | sarvopāyairupāyajño dīnamātmānamuddharet

इसी प्रकार उपायों को जानने वाला, धीर चित्त का बुद्धिमान मनुष्य, विपत्ति में पड़कर जीना चाहे तो सब उपायों से अपने डूबते हुए आत्मा का उद्धार करे।

श्लोक 103 (12.141.103)

एतां बुद्धिं समास्थाय जीवितव्यं सदा भवेत् । जीवन्पुण्यमवाप्नोति पुरुषो भद्रमश्नुते ॥

etāṃ buddhiṃ samāsthāya jīvitavyaṃ sadā bhavet | jīvanpuṇyamavāpnoti puruṣo bhadramaśnute

इस निश्चय को अपनाकर सदा जीवित रहना चाहिए; जीवित रहकर मनुष्य पुण्य पाता है और कल्याण देखता है।

श्लोक 104 (12.141.104)

तस्मात्कौन्तेय विदुषा धर्माधर्मविनिश्चये । बुद्धिमास्थाय लोकेऽस्मिन्वर्तितव्यं कृतात्मना ॥

tasmātkaunteya viduṣā dharmādharmaviniścaye | buddhimāsthāya loke'sminvartitavyaṃ kṛtātmanā

इसलिए हे कुन्तीपुत्र, विद्वान और संयतात्मा पुरुष को धर्म और अधर्म का निर्णय करते समय अपनी बुद्धि का आश्रय लेकर इस लोक में चलना चाहिए।

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