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शान्ति पर्व · अध्याय 142

बहुशाखी धर्म और राजा की कठोरता की मर्यादा

राजा को दस्युओं का दमन करना चाहिए — इस कठोर उपदेश से व्याकुल होकर युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्या इसकी कोई मर्यादा भी है। भीष्म बताते हैं कि धर्म बहुशाखी है और राजा को हर प्रसंग में विवेक से काम लेना चाहिए; वे विद्या का व्यापार करने वाले और शास्त्रों की निन्दा करने वाले कुतर्कियों से सावधान करते हैं, और शुक्र का मत स्मरण कराते हैं कि राजा दुष्टों के लिए कठोर तथा सज्जनों का रक्षक हो — पहले उग्र, फिर कोमल। जब युधिष्ठिर ऐसी मर्यादा पूछते हैं जिसे स्वयं राजा भी न लाँघे, तब भीष्म ब्राह्मणों की सेवा का उपदेश देते हैं, जिनकी प्रसन्नता यश देती है और जिनका क्रोध सबसे बड़ा भय है।

अध्याय 141अध्याय-सूचीअध्याय 143

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.142.1)

यदिदं घोरमुद्दिष्टमश्रद्धेयमिवानृतम् । अस्तिस्विद्दस्युमर्यादा यामयं परिवर्जयेत् ॥

yadidaṃ ghoramuddiṣṭamaśraddheyamivānṛtam | astisviddasyumaryādā yāmayaṃ parivarjayet

“आपने जो बताया है वह भयंकर है — इतना कठोर कि झूठ-सा और अविश्वसनीय लगता है। क्या दस्युओं के विषय में कोई ऐसी मर्यादा है जिसे राजा को लाँघना नहीं चाहिए?”

श्लोक 2 (12.142.2)

संमुह्यामि विषीदामि धर्मो मे शिथिलीकृतः । उद्यमं नाधिगच्छामि कुतश्चित्परिचिन्तयन् ॥

saṃmuhyāmi viṣīdāmi dharmo me śithilīkṛtaḥ | udyamaṃ nādhigacchāmi kutaścitparicintayan

“मैं मोहित हो रहा हूँ और विषाद में डूब रहा हूँ; मेरा धर्म शिथिल पड़ गया है। चाहे जिधर से सोचूँ, मुझे कहीं से उद्यम करने का बल नहीं मिलता।”

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.142.3)

नैतच्छ्रुत्वागमादेव तव धर्मानुशासनम् । प्रज्ञासमभिहारोऽयं कविभिः संभृतं मधु ॥

naitacchrutvāgamādeva tava dharmānuśāsanam | prajñāsamabhihāro'yaṃ kavibhiḥ saṃbhṛtaṃ madhu

“तुम्हारा यह धर्म-विषयक उपदेश केवल शास्त्र के सुनने से नहीं बनता; यह प्रज्ञा का समुच्चय है, ज्ञानियों द्वारा संचित मधु है।”

श्लोक 4 (12.142.4)

बाह्याः प्रतिविधातव्याः प्रज्ञा राज्ञा ततस्ततः । बहुशाखेन धर्मेण यत्रैषा संप्रसिध्यते ॥

bāhyāḥ pratividhātavyāḥ prajñā rājñā tatastataḥ | bahuśākhena dharmeṇa yatraiṣā saṃprasidhyate

“राजा को बाहरी प्रसंगों में जहाँ-तहाँ अपनी प्रज्ञा से उपाय करना चाहिए; और यह बहुशाखी धर्म के द्वारा ही सिद्ध होता है।”

श्लोक 5 (12.142.5)

बुद्धिं संजनयेद्राज्ञां धर्ममाचरतां सदा । जयो भवति कौरव्य सदा तद्वृद्धिरेव च ॥

buddhiṃ saṃjanayedrājñāṃ dharmamācaratāṃ sadā | jayo bhavati kauravya sadā tadvṛddhireva ca

“सदा धर्म का आचरण करने वाले राजाओं में बुद्धि जगानी चाहिए। हे कौरव, तब विजय होती है और उसकी वृद्धि भी सदा होती रहती है।”

श्लोक 6 (12.142.6)

बुद्धिश्रेष्ठा हि राजानो जयन्ति विजयैषिणः । धर्मः प्रतिविधातव्यो बुद्ध्या राज्ञा ततस्ततः ॥

buddhiśreṣṭhā hi rājāno jayanti vijayaiṣiṇaḥ | dharmaḥ pratividhātavyo buddhyā rājñā tatastataḥ

“बुद्धि में श्रेष्ठ राजा विजय चाहने पर जीतते हैं। राजा को धर्म का प्रबन्ध भी बुद्धि से, प्रसंग के अनुसार, करना चाहिए।”

श्लोक 7 (12.142.7)

नैकशाखेन धर्मेण राज्ञो धर्मो विधीयते । दुर्बलस्य कुतः प्रज्ञा पुरस्तादनुदाहृता ॥

naikaśākhena dharmeṇa rājño dharmo vidhīyate | durbalasya kutaḥ prajñā purastādanudāhṛtā

“राजा का धर्म एक शाखा वाले धर्म से निश्चित नहीं होता। जो दुर्बल है, उसमें पहले बताई गई वह प्रज्ञा कहाँ से आएगी?”

श्लोक 8 (12.142.8)

अद्वैधज्ञः प्रतिद्वैधे संशयं प्राप्तुमर्हति । बुद्धिद्वैधं विधातव्यं पुरस्तादेव भारत ॥

advaidhajñaḥ pratidvaidhe saṃśayaṃ prāptumarhati | buddhidvaidhaṃ vidhātavyaṃ purastādeva bhārata

“जो केवल एक ही मार्ग जानता है, वह दो मार्गों के टकराव में सन्देह में पड़ जाता है; इसलिए हे भारत, बुद्धि को पहले से ही दोनों पक्ष देखने के लिए तैयार रखना चाहिए।”

श्लोक 9 (12.142.9)

पार्श्वतः कारणं राज्ञो विषूच्यस्त्वापगा इव । जनास्तूच्चरितं धर्मं विजानन्त्यन्यथाऽन्यथा ॥

pārśvataḥ kāraṇaṃ rājño viṣūcyastvāpagā iva | janāstūccaritaṃ dharmaṃ vijānantyanyathā'nyathā

“राजा के कार्य के कारण चारों ओर नदियों की तरह सब दिशाओं में फैले रहते हैं; और लोग कहे गए धर्म को कभी एक तरह, कभी दूसरी तरह समझते हैं।”

श्लोक 10 (12.142.10)

सम्यग्विज्ञानिनः केचिन्मिथ्याविज्ञानिनः परे । तद्वै यथायथं बुद्ध्वा ज्ञानमाददते सताम् ॥

samyagvijñāninaḥ kecinmithyāvijñāninaḥ pare | tadvai yathāyathaṃ buddhvā jñānamādadate satām

“कुछ लोग ठीक समझते हैं, दूसरे ग़लत। दोनों को जैसा है वैसा जानकर सज्जनों के ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए।”

श्लोक 11 (12.142.11)

परिमुष्णन्ति शास्त्राणि धर्मस्य परिपन्थिनः । वैषम्यमर्थविद्यानां निरर्थाः ख्यापयन्ति ते ॥

parimuṣṇanti śāstrāṇi dharmasya paripanthinaḥ | vaiṣamyamarthavidyānāṃ nirarthāḥ khyāpayanti te

“धर्म के शत्रु शास्त्रों को लूटते हैं; स्वयं निःसार होकर वे अर्थविद्याओं की विषमता का प्रचार करते हैं।”

श्लोक 12 (12.142.12)

आजिजीविषवो विद्यां यशः कामौ समन्ततः । ते सर्वे नृप पापिष्ठा धर्मस्य परिपन्थिनः ॥

ājijīviṣavo vidyāṃ yaśaḥ kāmau samantataḥ | te sarve nṛpa pāpiṣṭhā dharmasya paripanthinaḥ

“जो विद्या के सहारे जीना चाहते हैं और सब ओर यश तथा काम की चाह रखते हैं — हे राजन्, वे सब अत्यन्त पापी और धर्म के शत्रु हैं।”

श्लोक 13 (12.142.13)

अपक्वमतयो मन्दा न जानन्ति यथातथम् । तथा ह्यशास्त्रकुशलाः सर्वत्रायुक्तिनिष्ठिताः ॥

apakvamatayo mandā na jānanti yathātatham | tathā hyaśāstrakuśalāḥ sarvatrāyuktiniṣṭhitāḥ

“वे मन्दबुद्धि और अपरिपक्व मति वाले चीज़ों को जैसी वे हैं वैसी नहीं जानते; शास्त्र में अकुशल होने से वे सर्वत्र अयुक्ति पर ही टिके रहते हैं।”

श्लोक 14 (12.142.14)

परिमुष्णन्ति शास्त्राणि शास्त्रदोषानुदर्शिनः । विज्ञानमथ विद्यानां न सम्यगिति मे मतिः ॥

parimuṣṇanti śāstrāṇi śāstradoṣānudarśinaḥ | vijñānamatha vidyānāṃ na samyagiti me matiḥ

“वे शास्त्रों में केवल दोष देखते हुए उन्हें लूटते हैं; मेरा मत है कि विद्याओं की उनकी समझ ठीक नहीं है।”

श्लोक 15 (12.142.15)

निन्दया परविद्यानां स्वविद्यां ख्यापयन्ति च । वागास्तिक्यानुनीताश्च दुग्धविद्याफला इव ॥

nindayā paravidyānāṃ svavidyāṃ khyāpayanti ca | vāgāstikyānunītāśca dugdhavidyāphalā iva

“दूसरों की विद्या की निन्दा करके वे अपनी विद्या का बखान करते हैं; केवल वाणी की आस्तिकता में बहते हुए वे ऐसे हैं मानो उनकी विद्या का फल दुह लिया गया हो।”

श्लोक 16 (12.142.16)

तान्विद्यावणिजो विद्धि राक्षसानिव भारत । व्याजेन कृत्स्नो विहितो धर्मस्ते परिहास्यते ॥

tānvidyāvaṇijo viddhi rākṣasāniva bhārata | vyājena kṛtsno vihito dharmaste parihāsyate

“हे भारत, उन्हें विद्या के व्यापारी, राक्षसों के समान जानो। उनके छल से तुम्हारा सारा निर्धारित धर्म उपहास में उड़ा दिया जाएगा।”

श्लोक 17 (12.142.17)

न धर्मवचनं वाचा नैव बुद्ध्येति नः श्रुतम् । इति बार्हस्पत्यविज्ञानं प्रोवाच मघवा स्वयम् ॥

na dharmavacanaṃ vācā naiva buddhyeti naḥ śrutam | iti bārhaspatyavijñānaṃ provāca maghavā svayam

“‘धर्म का निर्णय न केवल वाणी से होता है, न केवल बुद्धि से’ — ऐसा हमने सुना है। इस प्रकार इन्द्र ने स्वयं बृहस्पति का यह ज्ञान कहा था।”

श्लोक 18 (12.142.18)

न त्वेव वचनं किंचिदनिमित्तादिहोच्यते । स्वविनीतेन शास्त्रेण ह्यविद्यः स्यादथापरः ॥

na tveva vacanaṃ kiṃcidanimittādihocyate | svavinītena śāstreṇa hyavidyaḥ syādathāparaḥ

“फिर भी यहाँ कोई वचन बिना कारण के नहीं कहा जाता। कोई अपने ही गढ़े हुए शास्त्र से अज्ञानी हो जाता है, और कोई दूसरे प्रकार से।”

श्लोक 19 (12.142.19)

लोकयात्रामिहैके तु धर्मं प्राहुर्मनीषिणः । समुद्दिष्टं सतां धर्मं स्वयमूहेत् पण्डितः ॥

lokayātrāmihaike tu dharmaṃ prāhurmanīṣiṇaḥ | samuddiṣṭaṃ satāṃ dharmaṃ svayamūhet paṇḍitaḥ

“यहाँ कुछ मनीषी लोकयात्रा को ही धर्म कहते हैं; पर पण्डित को चाहिए कि सज्जनों द्वारा बताए गए धर्म पर स्वयं विचार करे।”

श्लोक 20 (12.142.20)

अमर्षाच्छास्त्रसंमोहादनिमित्तादिहोच्यते । शास्त्रं प्राज्ञस्य वदतः समूहे यात्यदर्शनम् ॥

amarṣācchāstrasaṃmohādanimittādihocyate | śāstraṃ prājñasya vadataḥ samūhe yātyadarśanam

“क्रोध और शास्त्र-सम्बन्धी मोह से, और बिना कारण भी, यहाँ बातें कही जाती हैं। जब कोई ज्ञानी भीड़ में शास्त्र का उपदेश करता है, तो वह दृष्टि से ओझल हो जाता है।”

श्लोक 21 (12.142.21)

आगमागतया बुद्ध्या वचनेन प्रशस्यते । अज्ञानाज्ज्ञानहेतुत्वाद्वचनं साधु मन्यते ॥

āgamāgatayā buddhyā vacanena praśasyate | ajñānājjñānahetutvādvacanaṃ sādhu manyate

“परम्परा से प्राप्त बुद्धि के साथ कहा गया वचन प्रशंसित होता है; पर अज्ञान के कारण, वचन को ज्ञान का साधन मानकर, मनुष्य किसी भी कथन को अच्छा समझ लेता है।”

श्लोक 22 (12.142.22)

अनुपागतमेवेदं शास्त्रमेवमपार्थकम् । दैतेयानुशना प्राह संशयच्छेदनं पुरा ॥

anupāgatamevedaṃ śāstramevamapārthakam | daiteyānuśanā prāha saṃśayacchedanaṃ purā

“‘यह शास्त्र पहुँच से बाहर है, इसलिए निरर्थक है’ — ऐसा माना जाता है। पर बहुत पहले उशना ने दैत्यों से वह बात कही थी जो सन्देह को काट देती है।”

श्लोक 23 (12.142.23)

ज्ञानमप्यपदिश्यं हि यथा नास्ति तथैव तत् । तेन संच्छिन्नमूलेन कस्तोषयितुमिच्छति ॥

jñānamapyapadiśyaṃ hi yathā nāsti tathaiva tat | tena saṃcchinnamūlena kastoṣayitumicchati

“‘जिस ज्ञान की ओर संकेत नहीं किया जा सकता, वह न होने के बराबर है।’ ऐसे जड़ से कटे हुए मनुष्य को कौन प्रसन्न करना चाहेगा?”

श्लोक 24 (12.142.24)

पुनर्व्यवसितं यो वा नेदं वाक्यमुपाश्नुते । उग्रायैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे तत्त्वमीक्षसे ॥

punarvyavasitaṃ yo vā nedaṃ vākyamupāśnute | ugrāyaiva hi sṛṣṭo'si karmaṇe tattvamīkṣase

“अथवा जो फिर निश्चय करके इस वचन को ग्रहण नहीं करता — तुम तो उग्र कर्म के लिए ही रचे गए हो, फिर भी तत्त्व की ओर देखते हो।”

श्लोक 25 (12.142.25)

अग्रे मामन्ववेक्षस्व राजन्योऽयं बुभूषते । यथा प्रमुच्यते त्वन्यो यदर्थं न प्रमोदते ॥

agre māmanvavekṣasva rājanyo'yaṃ bubhūṣate | yathā pramucyate tvanyo yadarthaṃ na pramodate

“पहले मेरी ओर देखो, हे राजन्: यह राजकुमार ऐसा बनना चाहता है कि दूसरा छूट जाए और जिस प्रयोजन के लिए वह है, उसमें उसे आनन्द न हो।”

श्लोक 26 (12.142.26)

अजोऽश्वः क्षत्रमित्येतत्सदृशं ब्रह्मणा कृतम् । तस्मान्नतैक्ष्ण्याद्भूतानां यात्रा काचित्प्रसिद्ध्यति ॥

ajo'śvaḥ kṣatramityetatsadṛśaṃ brahmaṇā kṛtam | tasmānnataikṣṇyādbhūtānāṃ yātrā kācitprasiddhyati

“‘बकरा, घोड़ा और क्षत्रिय’ — विधाता ने इन्हें एक-सा बनाया है। इसलिए तीक्ष्णता के बिना प्राणियों की कोई जीवन-यात्रा सफल नहीं होती।”

श्लोक 27 (12.142.27)

यस्त्ववध्यवधे दोषः स वध्यस्यावधे स्मृतः । एषा ह्येव तु मर्यादा यामयं परिवर्जयेत् ॥

yastvavadhyavadhe doṣaḥ sa vadhyasyāvadhe smṛtaḥ | eṣā hyeva tu maryādā yāmayaṃ parivarjayet

“जिसका वध नहीं करना चाहिए उसके वध में जो दोष कहा गया है, वही दोष वध के योग्य को न मारने में भी कहा गया है। यही वह मर्यादा है जिससे राजा को बचना चाहिए।”

श्लोक 28 (12.142.28)

तस्मात्तीक्ष्णः प्रजा राजा स्वधर्मे स्थापयत्युत । अन्योन्यं भक्षयन्तो हि प्रचरेयुर्वृका इव ॥

tasmāttīkṣṇaḥ prajā rājā svadharme sthāpayatyuta | anyonyaṃ bhakṣayanto hi pracareyurvṛkā iva

“इसलिए तीक्ष्ण राजा प्रजा को उसके अपने धर्म में स्थिर रखता है। नहीं तो वे भेड़ियों की तरह एक-दूसरे को खाते हुए घूमते।”

श्लोक 29 (12.142.29)

यस्य दस्युगणा राष्ट्रे ध्वाङ्क्षा मत्स्याञ्जलादिव । विहरन्ति परस्वानि स वै क्षत्रियपांसनः ॥

yasya dasyugaṇā rāṣṭre dhvāṅkṣā matsyāñjalādiva | viharanti parasvāni sa vai kṣatriyapāṃsanaḥ

“जिस राजा के राज्य में दस्युओं के झुंड, पानी से मछली छीनने वाले कौओं की तरह, दूसरों का धन लूटते घूमते हैं, वह क्षत्रियों का कलंक है।”

श्लोक 30 (12.142.30)

कुलीनान्सचिवान्कृत्वा वेदविद्यासमन्वितान् । प्रशाधि पृथिवीं राजन्प्रजा धर्मेण पालयन् ॥

kulīnānsacivānkṛtvā vedavidyāsamanvitān | praśādhi pṛthivīṃ rājanprajā dharmeṇa pālayan

“कुलीन और वेद-विद्या से सम्पन्न मन्त्री बनाकर, हे राजन्, प्रजा का धर्म से पालन करते हुए पृथ्वी पर शासन करो।”

श्लोक 31 (12.142.31)

विहीनजन्मकर्माणि यः प्रगृह्णाति भूमिपः । उभयस्याविशेषज्ञस्तद्वै क्षत्रं नपुंसकम् ॥

vihīnajanmakarmāṇi yaḥ pragṛhṇāti bhūmipaḥ | ubhayasyāviśeṣajñastadvai kṣatraṃ napuṃsakam

“जो राजा जन्म और कर्म दोनों से हीन लोगों को अपनाता है और दोनों का भेद नहीं जानता, उसका क्षात्र-बल सचमुच नपुंसक है।”

श्लोक 32 (12.142.32)

नैवोग्रं नैव चानुग्रं धर्मेणेह प्रशस्यते । उभयं न व्यतिक्रामेदुग्रो भूत्वा मृदुर्भव ॥

naivograṃ naiva cānugraṃ dharmeṇeha praśasyate | ubhayaṃ na vyatikrāmedugro bhūtvā mṛdurbhava

“धर्म में न केवल उग्र की प्रशंसा होती है, न केवल कोमल की। राजा को दोनों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए — उग्र होकर फिर कोमल बनो।”

श्लोक 33 (12.142.33)

कष्टः क्षत्रियधर्मोऽयं सौहृदं त्वयि मे स्थितम् । उग्रकर्मणि सृष्टोऽसि तस्माद्राज्यं प्रशाधि वै ॥

kaṣṭaḥ kṣatriyadharmo'yaṃ sauhṛdaṃ tvayi me sthitam | ugrakarmaṇi sṛṣṭo'si tasmādrājyaṃ praśādhi vai

“यह क्षत्रिय-धर्म कठिन है; मेरा स्नेह तुम पर टिका है। तुम उग्र कर्म के लिए ही रचे गए हो, इसलिए राज्य का शासन करो।”

श्लोक 34 (12.142.34)

अरुष्टः कस्यचिद्राजन्नेवमेव समाचर । अशिष्टनिग्रहो नित्यं शिष्टस्य परिपालनम् । एवं शुक्रोऽब्रवीद्धीमानापत्सु भरतर्षभ ॥

aruṣṭaḥ kasyacidrājannevameva samācara | aśiṣṭanigraho nityaṃ śiṣṭasya paripālanam | evaṃ śukro'bravīddhīmānāpatsu bharatarṣabha

“हे राजन्, किसी पर क्रोध किए बिना ऐसा ही आचरण करो — दुष्टों का सदा निग्रह और सज्जनों का पालन। हे भरतश्रेष्ठ, आपत्ति के समय के लिए बुद्धिमान शुक्र ने ऐसा कहा है।”

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 35 (12.142.35)

अस्ति चेदिह मर्यादा यामन्यो नातिलङ्घयेत् । पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

asti cediha maryādā yāmanyo nātilaṅghayet | pṛcchāmi tvāṃ satāṃ śreṣṭha tanme brūhi pitāmaha

“हे सज्जनों में श्रेष्ठ पितामह, यदि यहाँ कोई ऐसी मर्यादा है जिसे दूसरा न लाँघे, तो मैं आपसे पूछता हूँ — वह मुझे बताइए।”

भीष्म उवाच

श्लोक 36 (12.142.36)

ब्राह्मणानेव सेवेत विद्यावृद्धांस्तपस्विनः । श्रुतचारित्रवृत्ताढ्यान्पवित्रं ह्येतदुत्तमम् ॥

brāhmaṇāneva seveta vidyāvṛddhāṃstapasvinaḥ | śrutacāritravṛttāḍhyānpavitraṃ hyetaduttamam

“उसे केवल ब्राह्मणों की सेवा करनी चाहिए — जो विद्या में वृद्ध, तपस्वी, तथा शास्त्र, चरित्र और आचार से सम्पन्न हों। यही सर्वोत्तम पवित्र साधन है।”

श्लोक 37 (12.142.37)

शुश्रूषा तु महाराज सान्त्वं विप्रेषु नित्यदा । क्रुद्धैर्हि विप्रैः कर्माणि कृतानि बहुधा नृप ॥

śuśrūṣā tu mahārāja sāntvaṃ vipreṣu nityadā | kruddhairhi vipraiḥ karmāṇi kṛtāni bahudhā nṛpa

“हे महाराज, ब्राह्मणों की सदा सेवा और उनसे मधुर व्यवहार करो; क्योंकि हे राजन्, क्रुद्ध ब्राह्मणों ने बहुत-से कार्य कर डाले हैं।”

श्लोक 38 (12.142.38)

तेषां प्रीत्या यशो मुख्यमप्रीत्या परमं भयम् । प्रीत्या ह्यमृतवद्विप्राः क्रुद्धाश्चैव यथोरगाः ॥

teṣāṃ prītyā yaśo mukhyamaprītyā paramaṃ bhayam | prītyā hyamṛtavadviprāḥ kruddhāścaiva yathoragāḥ

“उनकी प्रसन्नता से यश मुख्य रूप से मिलता है, उनकी अप्रसन्नता सबसे बड़ा भय है। प्रसन्न होने पर ब्राह्मण अमृत के समान हैं, और क्रुद्ध होने पर सर्पों के समान।”

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