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शान्ति पर्व · अध्याय 143

आँधी-पानी में व्याध का आश्रय

युधिष्ठिर शरणागत की रक्षा करने वाले का धर्म पूछते हैं। भीष्म शिबि आदि राजाओं का और उस कपोत का उदाहरण देते हैं जिसने अपने शत्रु को शरण दी और अपना मांस अर्पित किया। फिर वे वह कथा सुनाते हैं जो भार्गव उशना ने राजा मुचुकुन्द से कही थी: बन्धुओं से त्यागा हुआ एक क्रूर व्याध पक्षियों को मारकर और बेचकर जीता है। भीषण आँधी-वर्षा में फँसकर वह भूमि पर पड़ी ठिठुरती कपोती को पिंजरे में डाल देता है और एक विशाल वृक्ष देखता है। आकाश साफ़ होने पर वह उसी के नीचे रात बिताने का निश्चय करता है, वृक्ष में बसने वाले देवताओं की शरण माँगता है और सो जाता है।

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.143.1)

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । शरणागतं पालयतो यो धर्मस्तं ब्रवीहि मे ॥

pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | śaraṇāgataṃ pālayato yo dharmastaṃ bravīhi me

“पितामह, महाप्राज्ञ, सब शास्त्रों में निपुण, शरण में आए हुए की रक्षा करने वाले का जो धर्म है, वह मुझे बताइए।”

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.143.2)

महान्धर्मो महाराज शरणागतपालने । अर्हः प्रष्टुं भवांश्चैनं प्रश्नं भरतसत्तम ॥

mahāndharmo mahārāja śaraṇāgatapālane | arhaḥ praṣṭuṃ bhavāṃścainaṃ praśnaṃ bharatasattama

“हे महाराज, शरणागत की रक्षा में बड़ा धर्म है। हे भरतश्रेष्ठ, आप यह प्रश्न पूछने के योग्य हैं।”

श्लोक 3 (12.143.3)

शिबिप्रभृतयो राजन्राजानः शरणं गतान् । परिपाल्य महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥

śibiprabhṛtayo rājanrājānaḥ śaraṇaṃ gatān | paripālya mahātmānaḥ saṃsiddhiṃ paramāṃ gatāḥ

“हे राजन्, शिबि आदि राजाओं ने शरण में आए हुओं का पालन किया और वे महात्मा परम सिद्धि को प्राप्त हुए।”

श्लोक 4 (12.143.4)

श्रूयते च कपोतेन शत्रुः शरणमागतः । पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥

śrūyate ca kapotena śatruḥ śaraṇamāgataḥ | pūjitaśca yathānyāyaṃ svaiśca māṃsairnimantritaḥ

“और सुना जाता है कि एक कपोत ने शरण में आए हुए अपने शत्रु का यथोचित सत्कार किया और उसे अपने ही मांस से भोजन के लिए निमन्त्रित किया।”

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 5 (12.143.5)

कथं कपोतेन पुरा शत्रुः शरणमागतः । स्वमांसं भोजितः कां च गतिं लेभे स भारत ॥

kathaṃ kapotena purā śatruḥ śaraṇamāgataḥ | svamāṃsaṃ bhojitaḥ kāṃ ca gatiṃ lebhe sa bhārata

“हे भारत, बहुत पहले कपोत ने शरण में आए शत्रु को कैसे स्वीकार किया? और अपने मांस से भोजन कराया गया वह शत्रु किस गति को प्राप्त हुआ?”

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (12.143.6)

शृणु राजन्कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् । नृपतेर्मुचुकुन्दस्य कथितां भार्गवेण वै ॥

śṛṇu rājankathāṃ divyāṃ sarvapāpapraṇāśinīm | nṛpatermucukundasya kathitāṃ bhārgaveṇa vai

“हे राजन्, वह दिव्य कथा सुनो जो सब पापों का नाश करने वाली है और जिसे भार्गव ने राजा मुचुकुन्द से कहा था।”

श्लोक 7 (12.143.7)

इममर्थं पुरा पार्थ मुचुकुन्दो नराधिपः । भार्गवं परिपप्रच्छ प्रणतः पुरुषर्षभ ॥

imamarthaṃ purā pārtha mucukundo narādhipaḥ | bhārgavaṃ paripapraccha praṇataḥ puruṣarṣabha

“हे पार्थ, पहले राजा मुचुकुन्द ने विनम्र होकर भार्गव से इसी विषय में पूछा था, हे पुरुषश्रेष्ठ।”

श्लोक 8 (12.143.8)

तस्मै शुश्रूषमाणाय भार्गवोऽकथयत्कथाम् । इमां यथा कपोतेन सिद्धिः प्राप्ता नराधिप ॥

tasmai śuśrūṣamāṇāya bhārgavo'kathayatkathām | imāṃ yathā kapotena siddhiḥ prāptā narādhipa

“सुनने के इच्छुक उस राजा को भार्गव ने यह कथा सुनाई कि कपोत ने किस प्रकार सिद्धि पाई।”

उशनोवाच

श्लोक 9 (12.143.9)

धर्मनिश्चयसंयुक्तां कामार्थसहितां कथाम् । शृणुष्वावहितो राजन्गदतो मे महाभुजः ॥

dharmaniścayasaṃyuktāṃ kāmārthasahitāṃ kathām | śṛṇuṣvāvahito rājangadato me mahābhujaḥ

“हे महाबाहु राजन्, ध्यान से सुनो; मैं धर्म के निश्चयों से भरी और अर्थ-काम से युक्त एक कथा कहता हूँ।”

श्लोक 10 (12.143.10)

कश्चित्क्षुद्रसमाचारः पृथिव्यां कालसंमितः । चचार पृथिवीपाल घोरः शकुनिलुब्धकः ॥

kaścitkṣudrasamācāraḥ pṛthivyāṃ kālasaṃmitaḥ | cacāra pṛthivīpāla ghoraḥ śakunilubdhakaḥ

“हे पृथ्वीपाल, पृथ्वी पर एक क्षुद्र आचरण वाला, नपे-तुले काल तक जीने वाला भयानक चिड़ीमार घूमा करता था।”

श्लोक 11 (12.143.11)

काकोल इव कृष्णाङ्गो रूक्षः पापसमाहितः । यवमध्यः कृशग्रीवो ह्रस्वपादो महाहनुः ॥

kākola iva kṛṣṇāṅgo rūkṣaḥ pāpasamāhitaḥ | yavamadhyaḥ kṛśagrīvo hrasvapādo mahāhanuḥ

“वह कौए के समान काले अंगों वाला, रूखा, पाप में लीन, बीच में जौ के दाने जैसा, पतली गर्दन, छोटे पैरों और बड़ी ठोड़ी वाला था।”

श्लोक 12 (12.143.12)

नैव तस्य सुहृत्कश्चिन्न संबन्धी न बान्धवाः । बान्धवैः संपरित्यक्तस्तेन रौद्रेण कर्मणा ॥

naiva tasya suhṛtkaścinna saṃbandhī na bāndhavāḥ | bāndhavaiḥ saṃparityaktastena raudreṇa karmaṇā

“उसका न कोई मित्र था, न सम्बन्धी, न बन्धु; उस क्रूर कर्म के कारण बन्धुओं ने उसे त्याग दिया था।”

श्लोक 13 (12.143.13)

नरः पापसमाचारस्त्यक्तव्यो दूरतो बुधैः । आत्मानं यो न संधत्ते सोऽन्यस्य स्यात्कथं हितः ॥

naraḥ pāpasamācārastyaktavyo dūrato budhaiḥ | ātmānaṃ yo na saṃdhatte so'nyasya syātkathaṃ hitaḥ

“पापाचारी मनुष्य को विद्वानों को दूर से ही छोड़ देना चाहिए। जो स्वयं को ही नहीं सँभालता, वह दूसरे का हित कैसे करेगा?”

श्लोक 14 (12.143.14)

ये नृशंसा दुरात्मानः प्राणिप्राणहरा नराः । उद्वेजनीया भूतानां व्याला इव भवन्ति ते ॥

ye nṛśaṃsā durātmānaḥ prāṇiprāṇaharā narāḥ | udvejanīyā bhūtānāṃ vyālā iva bhavanti te

“जो क्रूर, दुष्टात्मा मनुष्य प्राणियों के प्राण हर लेते हैं, वे हिंसक पशुओं की तरह सब प्राणियों के लिए भय के कारण बन जाते हैं।”

श्लोक 15 (12.143.15)

स वै क्षारकमादाय वने हत्वा च पक्षिणः । चकार विक्रयं तेषां पतङ्गानां जनाधिपः ॥

sa vai kṣārakamādāya vane hatvā ca pakṣiṇaḥ | cakāra vikrayaṃ teṣāṃ pataṅgānāṃ janādhipaḥ

“हे जनाधिप, वह जाल लेकर वन में पक्षियों को मारता और उन पक्षियों को बेच देता था।”

श्लोक 16 (12.143.16)

एवं तु वर्तमानस्य तस्य वृत्तिं दुरात्मनः । अगमत्सुमहान्कालो न चाधर्ममबुध्यत ॥

evaṃ tu vartamānasya tasya vṛttiṃ durātmanaḥ | agamatsumahānkālo na cādharmamabudhyata

“इस प्रकार अपनी जीविका चलाते उस दुरात्मा का बहुत लम्बा समय बीत गया, और उसने कभी इसे अधर्म नहीं समझा।”

श्लोक 17 (12.143.17)

तस्य भार्यासहायस्य रममाणस्य शाश्वतम् । दैवयोगविमूढस्य नान्या वृत्तिररोचत ॥

tasya bhāryāsahāyasya ramamāṇasya śāśvatam | daivayogavimūḍhasya nānyā vṛttirarocata

“पत्नी के साथ सदा रमते हुए, दैव के योग से मोहित उस व्याध को कोई और जीविका नहीं भाती थी।”

श्लोक 18 (12.143.18)

ततः कदाचित्तस्याथ वनस्थस्य समन्ततः । पातयन्निव वृक्षांस्तान्सुमहान्वातसंभ्रमः ॥

tataḥ kadācittasyātha vanasthasya samantataḥ | pātayanniva vṛkṣāṃstānsumahānvātasaṃbhramaḥ

“फिर एक दिन जब वह वन में था, चारों ओर से ऐसी प्रचण्ड आँधी उठी मानो उन वृक्षों को गिरा देगी।”

श्लोक 19 (12.143.19)

मेघसंकुलमाकाशं विद्युन्मण्डलमण्डितम् । संछन्नस्तु मुहूर्तेन नौसार्थैरिव सागरः ॥

meghasaṃkulamākāśaṃ vidyunmaṇḍalamaṇḍitam | saṃchannastu muhūrtena nausārthairiva sāgaraḥ

“आकाश बादलों से भर गया, बिजली के घेरों से सज गया, और क्षण भर में ऐसा छा गया जैसे नौकाओं के काफ़िलों से समुद्र छा जाता है।”

श्लोक 20 (12.143.20)

वारिधारासमूहेन संप्रहृष्टः शतक्रतुः । क्षणेन पूरयामास सलिलेन वसुंधराम् ॥

vāridhārāsamūhena saṃprahṛṣṭaḥ śatakratuḥ | kṣaṇena pūrayāmāsa salilena vasuṃdharām

“हर्ष से भरे इन्द्र ने जलधाराओं की झड़ी से क्षण भर में पृथ्वी को जल से भर दिया।”

श्लोक 21 (12.143.21)

ततो धाराकुले लोके संभ्रमन्नष्टचेतनः । शीतार्तस्तद्वनं सर्वमाकुलेनान्तरात्मना ॥

tato dhārākule loke saṃbhramannaṣṭacetanaḥ | śītārtastadvanaṃ sarvamākulenāntarātmanā

“फिर जब जगत् धाराओं से भर गया, तब वह ठण्ड से पीड़ित, व्याकुल मन से, चेतना खोए हुए, उस सारे वन में भटकता रहा।”

श्लोक 22 (12.143.22)

नैव निम्नं स्थलं वाऽपि सोऽविन्दत विहंगहा । पूरितो हि जलौघेन तस्य मार्गो वनस्य तु ॥

naiva nimnaṃ sthalaṃ vā'pi so'vindata vihaṃgahā | pūrito hi jalaughena tasya mārgo vanasya tu

“उस पक्षी-हत्यारे को न नीची भूमि मिली, न ऊँची; वन में उसका मार्ग जल-प्रवाह से भर गया था।”

श्लोक 23 (12.143.23)

पक्षिणः वर्षवेगेन हता लीनास्तु पादपात् । मृगसिंहवराहाश्च ये चान्ये तत्र पक्षिणः ॥

pakṣiṇaḥ varṣavegena hatā līnāstu pādapāt | mṛgasiṃhavarāhāśca ye cānye tatra pakṣiṇaḥ

“वर्षा के वेग से मारे गए पक्षी पेड़ों से सटकर दुबक गए थे; और वहाँ के मृग, सिंह, वराह तथा अन्य प्राणी भी …”

श्लोक 24 (12.143.24)

महता वातवर्षेण त्रासितास्ते वनौकसः । भयार्ताश्च क्षुधार्ताश्च बभ्रमुः सहिता वने ॥

mahatā vātavarṣeṇa trāsitāste vanaukasaḥ | bhayārtāśca kṣudhārtāśca babhramuḥ sahitā vane

“उस भारी आँधी-वर्षा से डरे हुए वे वनवासी जीव भय और भूख से पीड़ित होकर साथ-साथ वन में भटकते रहे।”

श्लोक 25 (12.143.25)

स तु शीतहतैर्गात्रैर्जगामैव न तस्थिवान् । ददर्श पतितां भूमौ कपोतीं शीतविह्वलाम् ॥

sa tu śītahatairgātrairjagāmaiva na tasthivān | dadarśa patitāṃ bhūmau kapotīṃ śītavihvalām

“ठण्ड से जकड़े अंगों से वह चलता ही रहा, रुका नहीं। उसने भूमि पर पड़ी, ठण्ड से बेहाल एक कपोती को देखा।”

श्लोक 26 (12.143.26)

दृष्ट्वाऽऽर्तोऽपि हि पापात्मा स तां पञ्जरकेऽक्षिपत् । स्वयं दुःखाभिभूतोऽपि दुःखमेवाकरोत्परे ॥

dṛṣṭvā''rto'pi hi pāpātmā sa tāṃ pañjarake'kṣipat | svayaṃ duḥkhābhibhūto'pi duḥkhamevākarotpare

“स्वयं पीड़ित होते हुए भी उस पापी ने उसे देखकर पिंजरे में डाल दिया; स्वयं दुःख से घिरा होने पर भी उसने दूसरे को दुःख ही दिया।”

श्लोक 27 (12.143.27)

पापात्मा पापकारित्वात्पापमेव चकार सः । सोऽपश्यत्तरुषण्डेषु मेघनीलं वनस्पतिम् ॥

pāpātmā pāpakāritvātpāpameva cakāra saḥ | so'paśyattaruṣaṇḍeṣu meghanīlaṃ vanaspatim

“पाप करने के स्वभाव से वह पापात्मा पाप ही करता रहा। फिर वृक्षों के झुरमुटों में उसने मेघ के समान नीले एक वृक्ष को देखा।”

श्लोक 28 (12.143.28)

सेव्यमानं विहंगौघैश्छायावासफलार्थिभिः । धात्रा परोपकाराय स साधुरिव निर्मितः ॥

sevyamānaṃ vihaṃgaughaiśchāyāvāsaphalārthibhiḥ | dhātrā paropakārāya sa sādhuriva nirmitaḥ

“छाया, आवास और फल चाहने वाले पक्षियों के झुंड उसका सेवन करते थे; विधाता ने उसे परोपकार के लिए मानो साधु की तरह रचा था।”

श्लोक 29 (12.143.29)

अथाभवत्क्षणेनैव वियद्विमलतारकम् । महत्सर इवोत्फुल्लं कुमुदच्छुरितोदकम् । कुसुमाकारताराढ्यमाकाशं निर्मलं बहु ॥

athābhavatkṣaṇenaiva viyadvimalatārakam | mahatsara ivotphullaṃ kumudacchuritodakam | kusumākāratārāḍhyamākāśaṃ nirmalaṃ bahu

“तब क्षण भर में आकाश निर्मल तारों वाला हो गया — मानो खिला हुआ विशाल सरोवर हो जिसका जल कुमुदों से बिखरा हो; फूलों जैसे तारों से भरा वह आकाश अत्यन्त निर्मल था।”

श्लोक 30 (12.143.30)

घनैर्मुक्तं नभो दृष्ट्वा लुब्धकः शीतविह्वलः । दिशो विलोकयामास वेलां च सुदुरात्मवान् ॥

ghanairmuktaṃ nabho dṛṣṭvā lubdhakaḥ śītavihvalaḥ | diśo vilokayāmāsa velāṃ ca sudurātmavān

“आकाश को बादलों से मुक्त देखकर ठण्ड से काँपते उस व्याध ने दिशाओं की ओर देखा और समय का अनुमान किया — वह अत्यन्त दुष्ट था।”

श्लोक 31 (12.143.31)

दूरे ग्रामनिवेशश्च तस्मात्स्थानादिति प्रभो । कृतबुद्धिर्द्रुमे तस्मिन्वस्तुं तां रजनीं ततः ॥

dūre grāmaniveśaśca tasmātsthānāditi prabho | kṛtabuddhirdrume tasminvastuṃ tāṃ rajanīṃ tataḥ

“‘हे प्रभो, इस स्थान से गाँव दूर है’ — यह सोचकर उसने उसी वृक्ष पर वह रात बिताने का निश्चय किया।”

श्लोक 32 (12.143.32)

साञ्जलिः प्रणतिं कृत्वा वाक्यमाह वनस्पतिम् । शरणं यामि यान्यस्मिन्दैवतानीति भारत ॥

sāñjaliḥ praṇatiṃ kṛtvā vākyamāha vanaspatim | śaraṇaṃ yāmi yānyasmindaivatānīti bhārata

“हे भारत, उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और वृक्ष से कहा — ‘इस वृक्ष में जो भी देवता हैं, मैं उनकी शरण लेता हूँ।’”

श्लोक 33 (12.143.33)

स शिलायां शिरः कृत्वा पर्णान्यास्तीर्य भूतले । दुःखेन महताऽऽविष्टस्ततः सुष्वाप पक्षिहा ॥

sa śilāyāṃ śiraḥ kṛtvā parṇānyāstīrya bhūtale | duḥkhena mahatā''viṣṭastataḥ suṣvāpa pakṣihā

“शिला पर सिर रखकर और भूमि पर पत्ते बिछाकर, बड़े दुःख से घिरा वह पक्षी-हत्यारा तब सो गया।”

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