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शान्ति पर्व · अध्याय 144

कपोत का विलाप और कपोती का उपदेश

भीष्म कथा आगे बढ़ाते हैं। उसी वृक्ष पर रहने वाला कपोत, आँधी में अपनी भार्या के न लौटने पर चिन्तित होकर ऊँचे स्वर में विलाप करता है और अच्छी पत्नी को घर का सार तथा जीवन, रोग और धर्मसाधन में पुरुष का सबसे बड़ा साथी बताता है। व्याध के पिंजरे में बन्द उसकी पत्नी यह सुनकर अपने पति की प्रशंसा से प्रसन्न होती है और उससे कहती है कि घर में शरण लेने आए व्याध का आतिथ्य करे; वह याद दिलाती है कि शरणागत का वध ब्राह्मण या गौ के वध के समान पाप है, और उसे उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.144.1)

अथ वृक्षस्य शाखायां विहंगः ससुहृज्जनः । दीर्घकालोषितो राजंस्तत्र चित्रतनूरुहः ॥

atha vṛkṣasya śākhāyāṃ vihaṃgaḥ sasuhṛjjanaḥ | dīrghakāloṣito rājaṃstatra citratanūruhaḥ

हे राजन्, उसी वृक्ष की एक शाखा पर अपने स्वजनों के साथ एक पक्षी रहता था — बहुत समय से वहीं बसा हुआ, रंग-बिरंगे पंखों वाला।

श्लोक 2 (12.144.2)

तस्य कल्यगता भार्या चरितुं नाभ्यवर्तत । प्राप्तां च रजनीं दृष्ट्वा स पक्षी पर्यतप्यत ॥

tasya kalyagatā bhāryā carituṃ nābhyavartata | prāptāṃ ca rajanīṃ dṛṣṭvā sa pakṣī paryatapyata

उसकी भार्या प्रातः चरने गई थी और लौटी नहीं थी। रात हो गई देखकर वह पक्षी सन्ताप से जलने लगा।

कपोत उवाच

श्लोक 3 (12.144.3)

वातवर्षं महच्चासीन्न चागच्छति मे प्रिया । किंनु तत्कारणं येन साऽद्यापि न निवर्तते ॥

vātavarṣaṃ mahaccāsīnna cāgacchati me priyā | kiṃnu tatkāraṇaṃ yena sā'dyāpi na nivartate

“भारी आँधी-वर्षा हुई है और मेरी प्रिया लौट नहीं रही। क्या कारण है कि वह अब तक भी नहीं लौटी?”

श्लोक 4 (12.144.4)

अपि स्वस्ति भवेत्तस्याः प्रियाया मम कानने । तया विरहितं हीदं शून्यमद्य गृहं मम ॥

api svasti bhavettasyāḥ priyāyā mama kānane | tayā virahitaṃ hīdaṃ śūnyamadya gṛhaṃ mama

“वन में मेरी प्रिया कुशल से तो होगी! उसके बिना आज मेरा यह घर सूना है।”

श्लोक 5 (12.144.5)

पुत्रपौत्रवधूभृत्यैराकीर्णमपि सर्वतः । भार्याहीनं गृहस्थस्य शून्यमेव गृहं भवेत् ॥

putrapautravadhūbhṛtyairākīrṇamapi sarvataḥ | bhāryāhīnaṃ gṛhasthasya śūnyameva gṛhaṃ bhavet

“पुत्रों, पौत्रों, बहुओं और सेवकों से चारों ओर भरा होने पर भी पत्नी के बिना गृहस्थ का घर सूना ही रहता है।”

श्लोक 6 (12.144.6)

न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते । गृहं तु गृहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥

na gṛhaṃ gṛhamityāhurgṛhiṇī gṛhamucyate | gṛhaṃ tu gṛhiṇīhīnamaraṇyasadṛśaṃ matam

“कहते हैं कि घर घर नहीं होता, गृहिणी ही घर कही जाती है; गृहिणी के बिना घर जंगल के समान माना गया है।”

श्लोक 7 (12.144.7)

यदि सा रक्तनेत्रान्ता चित्राङ्गी मधुरस्वरा । अद्य नाभ्येति मे कान्ता न कार्यं जीवितेन मे ॥

yadi sā raktanetrāntā citrāṅgī madhurasvarā | adya nābhyeti me kāntā na kāryaṃ jīvitena me

“यदि वह लाल नेत्र-कोरों वाली, रंग-बिरंगे अंगों और मधुर स्वर वाली मेरी प्रिया आज नहीं आती, तो मुझे जीवन से कोई प्रयोजन नहीं।”

श्लोक 8 (12.144.8)

न भुङ्क्ते मय्यभुक्ते या नास्नाते स्नाति सुव्रता । नातिष्ठत्युपतिष्ठेत शेते च शयिते मयि ॥

na bhuṅkte mayyabhukte yā nāsnāte snāti suvratā | nātiṣṭhatyupatiṣṭheta śete ca śayite mayi

“वह सुव्रता मेरे भोजन न करने पर भोजन नहीं करती, मेरे स्नान न करने पर स्नान नहीं करती; वह मेरी इच्छा का उल्लंघन नहीं करती, मेरी सेवा में रहती है, और मेरे सो जाने पर ही सोती है।”

श्लोक 9 (12.144.9)

हृष्टे भवति सा हृष्टा दुःखिते मयि दुःखिता । प्रोषिते दीनवदना क्रुद्धे च प्रियवादिनी ॥

hṛṣṭe bhavati sā hṛṣṭā duḥkhite mayi duḥkhitā | proṣite dīnavadanā kruddhe ca priyavādinī

“मेरे प्रसन्न होने पर वह प्रसन्न होती है, मेरे दुःखी होने पर दुःखी; परदेश जाने पर वह उदास मुख रहती है और मेरे क्रोधित होने पर मीठा बोलती है।”

श्लोक 10 (12.144.10)

पतिधर्मव्रता साध्वी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । यस्य स्यात्तादृशी भार्या धन्यः स पुरुषो भुवि ॥

patidharmavratā sādhvī prāṇebhyo'pi garīyasī | yasya syāttādṛśī bhāryā dhanyaḥ sa puruṣo bhuvi

“पति-धर्म में निष्ठा रखने वाली, साध्वी, प्राणों से भी प्रिय — जिसकी पत्नी ऐसी हो, वह पुरुष पृथ्वी पर धन्य है।”

श्लोक 11 (12.144.11)

सा हि श्रान्तं क्षुधार्तं च जानीते मां तपस्विनी । अनुरक्ता स्थिरा चैव भक्ता स्निग्धा यशस्विनी ॥

sā hi śrāntaṃ kṣudhārtaṃ ca jānīte māṃ tapasvinī | anuraktā sthirā caiva bhaktā snigdhā yaśasvinī

“वह भली स्त्री जान लेती है कि मैं कब थका और भूखा हूँ। वह अनुरक्त, स्थिर, भक्त, स्नेहमयी और यशस्विनी है।”

श्लोक 12 (12.144.12)

वृक्षमूलेऽपि दयिता यस्य तिष्ठति तद्गृहम् । प्रासादोऽपि तया हीनः कान्तार इति निश्चितम् ॥

vṛkṣamūle'pi dayitā yasya tiṣṭhati tadgṛham | prāsādo'pi tayā hīnaḥ kāntāra iti niścitam

“जहाँ प्रिया रहती है, वृक्ष की जड़ में भी वही घर है; उसके बिना महल भी निश्चय ही निर्जन वन है।”

श्लोक 13 (12.144.13)

धर्मार्थकामकालेषु भार्या पुंसः सहायिनी । विदेशगमने चास्य सैव विश्वासकारिका ॥

dharmārthakāmakāleṣu bhāryā puṃsaḥ sahāyinī | videśagamane cāsya saiva viśvāsakārikā

“धर्म, अर्थ और काम के अवसरों पर पत्नी पुरुष की सहायक होती है, और परदेश जाने पर वही उसे विश्वास देती है।”

श्लोक 14 (12.144.14)

भार्या हि परमो ह्यर्थः पुरुषस्येह पठ्यते । असहायस्य लोकेऽस्मिँल्लोकयात्रासहायिनी ॥

bhāryā hi paramo hyarthaḥ puruṣasyeha paṭhyate | asahāyasya loke'smim̐llokayātrāsahāyinī

“पत्नी पुरुष का परम धन कही गई है; इस लोक में असहाय के लिए वही जीवन-यात्रा की सहायिका है।”

श्लोक 15 (12.144.15)

तथा रोगाभिभूतस्य नित्यं कृच्छ्रगतस्य च । नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥

tathā rogābhibhūtasya nityaṃ kṛcchragatasya ca | nāsti bhāryāsamaṃ mitraṃ narasyārtasya bheṣajam

“इसी प्रकार रोग से ग्रस्त और सदा कष्ट में पड़े पुरुष के लिए पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पीड़ित के लिए कोई औषधि नहीं।”

श्लोक 16 (12.144.16)

नास्ति भार्यासमो बन्धुर्नास्ति भार्यासमा गतिः । नास्ति भार्यासमो लोके सहायो धर्मसंग्रहे ॥

nāsti bhāryāsamo bandhurnāsti bhāryāsamā gatiḥ | nāsti bhāryāsamo loke sahāyo dharmasaṃgrahe

“पत्नी के समान कोई बन्धु नहीं, पत्नी के समान कोई गति नहीं, और धर्म के संग्रह में पत्नी के समान कोई सहायक नहीं।”

श्लोक 17 (12.144.17)

यस्य भार्या गृहे नास्ति साध्वी च प्रियवादिनी । अरण्यं तेन गन्तव्यं यथाऽरण्यं तथा गृहम् ॥

yasya bhāryā gṛhe nāsti sādhvī ca priyavādinī | araṇyaṃ tena gantavyaṃ yathā'raṇyaṃ tathā gṛham

“जिसके घर में साध्वी और प्रियवादिनी पत्नी न हो, उसे वन चला जाना चाहिए; क्योंकि जैसा वन है वैसा ही उसके लिए घर है।”

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (12.144.18)

एवं विलपतस्तस्य द्विजस्यार्तस्य वै तदा । गृहीता शकुनिघ्नेन भार्या शुश्राव भारतीम् ॥

evaṃ vilapatastasya dvijasyārtasya vai tadā | gṛhītā śakunighnena bhāryā śuśrāva bhāratīm

जब वह पीड़ित पक्षी इस प्रकार विलाप कर रहा था, तब पक्षी-घातक के हाथ में पड़ी उसकी भार्या ने उसकी वाणी सुनी।

कपोत्युवाच

श्लोक 19 (12.144.19)

अहोऽतीव सुभाग्याऽहं यस्या मे दयितः पतिः । असतो वा सतो वाऽपि गुणानेवं प्रभाषते ॥

aho'tīva subhāgyā'haṃ yasyā me dayitaḥ patiḥ | asato vā sato vā'pi guṇānevaṃ prabhāṣate

“मैं कितनी भाग्यशाली हूँ कि मेरे प्रिय पति मेरे गुणों का — चाहे वे हों या न हों — इस प्रकार बखान करते हैं!”

श्लोक 20 (12.144.20)

सा हि स्त्रीत्यवगन्तव्या यस्य भर्ता तु तुष्यति । तुष्टे भर्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः । अग्निसाक्षिकमप्येतद्भर्ता हि शरणं परम् ॥

sā hi strītyavagantavyā yasya bhartā tu tuṣyati | tuṣṭe bhartari nārīṇāṃ tuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ | agnisākṣikamapyetadbhartā hi śaraṇaṃ param

“स्त्री वही जानी जानी चाहिए जिससे उसका पति प्रसन्न रहे। पति के प्रसन्न होने पर स्त्रियों से सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं। यह अग्नि के साक्षी में भी है कि पति ही परम शरण है।”

श्लोक 21 (12.144.21)

दावाग्निनेव निर्दग्धा सपुष्पस्तबका लता । भस्मीभवति सा नारी यस्या भर्ता न तुष्यति ॥

dāvāgnineva nirdagdhā sapuṣpastabakā latā | bhasmībhavati sā nārī yasyā bhartā na tuṣyati

“वन की आग से जली हुई, फूलों के गुच्छों वाली लता की तरह वह स्त्री भस्म हो जाती है जिसका पति उससे प्रसन्न नहीं होता।”

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (12.144.22)

इति संचिन्त्य दुःखार्ता भर्तारं दुःखितं तदा । कपोती लुब्धकेनापि गृहीता वाक्यमब्रवीत् ॥

iti saṃcintya duḥkhārtā bhartāraṃ duḥkhitaṃ tadā | kapotī lubdhakenāpi gṛhītā vākyamabravīt

यह सोचकर, दुःख से पीड़ित और व्याध के हाथ में पड़ी कपोती ने अपने दुःखी पति से ये वचन कहे।

कपोत्युवाच

श्लोक 23 (12.144.23)

हन्त वक्ष्यामि ते श्रेयः श्रुत्वा तु कुरु तत्तथा । शरणागतसंत्राता भव कान्त विशेषतः ॥

hanta vakṣyāmi te śreyaḥ śrutvā tu kuru tattathā | śaraṇāgatasaṃtrātā bhava kānta viśeṣataḥ

“सुनो, मैं तुम्हारे कल्याण की बात कहती हूँ; उसे सुनकर वैसा ही करो। हे प्रिय, विशेष रूप से शरणागत के रक्षक बनो।”

श्लोक 24 (12.144.24)

एष शाकुनिकः शेते तव वासं समाश्रितः । शीतार्तश्च क्षुधार्तश्च पूजामस्मै समाचर ॥

eṣa śākunikaḥ śete tava vāsaṃ samāśritaḥ | śītārtaśca kṣudhārtaśca pūjāmasmai samācara

“यह व्याध तुम्हारे निवास में आश्रय लेकर यहाँ पड़ा है, ठण्ड और भूख से पीड़ित। इसका यथोचित सत्कार करो।”

श्लोक 25 (12.144.25)

यो हि कश्चिद्द्विजं हन्याद्गां वा लोकस्य मातरम् । शरणागतं च यो हन्यात्तुल्यं तेषां च पातकम् ॥

yo hi kaściddvijaṃ hanyādgāṃ vā lokasya mātaram | śaraṇāgataṃ ca yo hanyāttulyaṃ teṣāṃ ca pātakam

“जो कोई ब्राह्मण को, या जगत् की माता गौ को, या शरण में आए हुए को मारता है — इन सबका पाप समान है।”

श्लोक 26 (12.144.26)

अस्माकं विहिता वृत्तिः कापोती जातिधर्मतः । सा न्याय्याऽऽत्मवता नित्यं त्वद्विधेनानुवर्तितुं ॥

asmākaṃ vihitā vṛttiḥ kāpotī jātidharmataḥ | sā nyāyyā''tmavatā nityaṃ tvadvidhenānuvartituṃ

“हमारी जाति के धर्म के अनुसार हमारे लिए कपोतों की वृत्ति निर्धारित है। तुम जैसे आत्मसंयमी को उसका सदा पालन करना उचित है।”

श्लोक 27 (12.144.27)

यस्तु धर्मं यथाशक्ति गृहस्थो ह्यनुवर्तते । स प्रेत्य लभते लोकानक्षयानिति शुश्रुम ॥

yastu dharmaṃ yathāśakti gṛhastho hyanuvartate | sa pretya labhate lokānakṣayāniti śuśruma

“जो गृहस्थ अपनी शक्ति भर धर्म का पालन करता है, वह मरकर अक्षय लोकों को पाता है — ऐसा हमने सुना है।”

श्लोक 28 (12.144.28)

स त्वं संतानवानद्य पुत्रवानपि च द्विज । त्वं स्वदेहे दयां त्यक्त्वा धर्मार्थौ परिगृह्य वै । पूजामस्मै प्रयुङ्क्ष्व त्वं प्रीयेतास्य मनो यथा ॥

sa tvaṃ saṃtānavānadya putravānapi ca dvija | tvaṃ svadehe dayāṃ tyaktvā dharmārthau parigṛhya vai | pūjāmasmai prayuṅkṣva tvaṃ prīyetāsya mano yathā

“हे द्विज, अब तुम्हारे सन्तान है, पुत्र भी है। इसलिए अपने शरीर की दया छोड़कर, धर्म और अर्थ को अपनाकर इसका ऐसा सत्कार करो कि इसका मन प्रसन्न हो।”

श्लोक 29 (12.144.29)

शरीरे मा च संतापं कुर्वीथास्त्वं विहंगम । शरीरयात्रावृत्त्यर्थमन्यान्दारानुपैष्यसि ॥

śarīre mā ca saṃtāpaṃ kurvīthāstvaṃ vihaṃgama | śarīrayātrāvṛttyarthamanyāndārānupaiṣyasi

“हे विहंगम, अपने शरीर के विषय में सन्ताप मत करो; जीवन-निर्वाह के लिए तुम दूसरी पत्नियाँ ले लोगे।”

भीष्म उवाच

श्लोक 30 (12.144.30)

इति सा शकुनी वाक्यं पञ्जरस्था तपस्विनी । अतिदुःखान्विता प्रोक्त्वा भर्तारं समुदैक्षत ॥

iti sā śakunī vākyaṃ pañjarasthā tapasvinī | atiduḥkhānvitā proktvā bhartāraṃ samudaikṣata

यह कहकर पिंजरे में बन्द वह भली कपोती, अत्यन्त दुःख से भरी हुई, अपने पति की ओर देखने लगी।

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