शान्ति पर्व · अध्याय 145
कपोत द्वारा व्याध को आत्म-समर्पण
पत्नी की सीख से प्रेरित होकर कपोत व्याध का स्वागत करता है, उसका आतिथ्य करता है और ठण्ड मिटाने के लिए आग लाता है। गरमी पाकर व्याध भोजन माँगता है, पर प्रतिदिन जो मिल जाए उसी पर जीने वाले कपोत के पास कुछ संचय नहीं है। क्षण भर सोचकर वह अपने ही शरीर से अतिथि को तृप्त करने का निश्चय करता है, अतिथि-पूजा के महान् धर्म की बात कहता है, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करके उसमें प्रवेश कर जाता है। यह देखकर व्याध घबरा जाता है और अपने किए पर पछताता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.145.1)
स पत्न्या वचनं श्रुत्वा धर्मयुक्तिसमन्वितम् । हर्षेण महता युक्तो वाक्यं व्याकुललोचनः ॥
sa patnyā vacanaṃ śrutvā dharmayuktisamanvitam | harṣeṇa mahatā yukto vākyaṃ vyākulalocanaḥ
अपनी पत्नी के धर्म और युक्ति से भरे वचन सुनकर वह महान् हर्ष से भर गया; उस वाणी से उसकी आँखें भर आईं।
श्लोक 2 (12.145.2)
तं वै शाकुनिकं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा । स पक्षी पूजयामास यत्नात्तं पक्षिजीविनम् ॥
taṃ vai śākunikaṃ dṛṣṭvā vidhidṛṣṭena karmaṇā | sa pakṣī pūjayāmāsa yatnāttaṃ pakṣijīvinam
उस व्याध को देखकर उस पक्षी ने विधि के अनुसार यत्नपूर्वक उस पक्षी-घाती का सत्कार किया।
श्लोक 3 (12.145.3)
उवाच स्वागतं तेऽद्य ब्रूहि किं करवाणि ते । संतापश्च न कर्तव्यः स्वगृहे वर्तते भवान् ॥
uvāca svāgataṃ te'dya brūhi kiṃ karavāṇi te | saṃtāpaśca na kartavyaḥ svagṛhe vartate bhavān
उसने कहा — “आज आपका स्वागत है। बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ? आप दुःखी न हों; आप अपने ही घर में हैं।”
कपोत उवाच
श्लोक 4 (12.145.4)
तद्ब्रवीतु भवान्क्षिप्रं किं करोमि किमिच्छसि । प्रणयेन ब्रवीमि त्वां त्वं हि नः शरणागतः ॥
tadbravītu bhavānkṣipraṃ kiṃ karomi kimicchasi | praṇayena bravīmi tvāṃ tvaṃ hi naḥ śaraṇāgataḥ
“आप शीघ्र बताइए कि मैं क्या करूँ, आप क्या चाहते हैं। मैं स्नेह से आपसे कह रहा हूँ, क्योंकि आप हमारी शरण में आए हैं।”
श्लोक 5 (12.145.5)
अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते । छेत्तुमप्यागते छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥
arāvapyucitaṃ kāryamātithyaṃ gṛhamāgate | chettumapyāgate chāyāṃ nopasaṃharate drumaḥ
“शत्रु भी घर आए तो उसका आतिथ्य करना चाहिए; वृक्ष अपने को काटने आए हुए से भी अपनी छाया नहीं हटाता।”
श्लोक 6 (12.145.6)
शरणागतस्य कर्तव्यमातिथ्यं हि प्रयत्नतः । पञ्चयज्ञप्रवृत्तेन गृहस्थेन विशेषतः ॥
śaraṇāgatasya kartavyamātithyaṃ hi prayatnataḥ | pañcayajñapravṛttena gṛhasthena viśeṣataḥ
“शरण में आए हुए का आतिथ्य प्रयत्नपूर्वक करना कर्तव्य है, विशेषकर पाँच यज्ञों में लगे गृहस्थ के लिए।”
श्लोक 7 (12.145.7)
पञ्चयज्ञांस्तु यो मोहान्न करोति गृहाश्रमी । तस्य नायं न च परो लोको भवति धर्मतः ॥
pañcayajñāṃstu yo mohānna karoti gṛhāśramī | tasya nāyaṃ na ca paro loko bhavati dharmataḥ
“जो गृहस्थ मोहवश पाँच यज्ञ नहीं करता, उसके लिए धर्म के अनुसार न यह लोक है, न परलोक।”
श्लोक 8 (12.145.8)
तद्ब्रूहि मां सुविस्रब्धो यत्त्वं वाचा वदिष्यसि । तत्करिष्याम्यहं सर्वं मा त्वं शोके मनः कृथाः ॥
tadbrūhi māṃ suvisrabdho yattvaṃ vācā vadiṣyasi | tatkariṣyāmyahaṃ sarvaṃ mā tvaṃ śoke manaḥ kṛthāḥ
“इसलिए पूरा विश्वास करके जो कुछ कहना चाहें मुझसे कहिए; मैं वह सब करूँगा। आप अपना मन शोक में न लगाइए।”
भीष्म उवाच
श्लोक 9 (12.145.9)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शकुनेर्लुब्धकोऽब्रवीत् । बाधते खलु मां शीतं संत्राणं हि विधीयताम् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā śakunerlubdhako'bravīt | bādhate khalu māṃ śītaṃ saṃtrāṇaṃ hi vidhīyatām
उसकी बात सुनकर व्याध ने पक्षी से कहा — “मुझे ठण्ड सता रही है; इसके बचाव का कोई प्रबन्ध कीजिए।”
श्लोक 10 (12.145.10)
एवमुक्तस्ततः पक्षी पर्णान्यास्तीर्य भूतले । यथा शुष्काणि यत्नेन ज्वलनार्थं द्रुतं ययौ ॥
evamuktastataḥ pakṣī parṇānyāstīrya bhūtale | yathā śuṣkāṇi yatnena jvalanārthaṃ drutaṃ yayau
ऐसा कहे जाने पर पक्षी ने भूमि पर पत्ते बिछाए — यत्न से जितने सूखे मिल सके — और आग लाने के लिए तुरन्त चल पड़ा।
श्लोक 11 (12.145.11)
स गत्वाऽङ्गारकर्मान्तं गृहीत्वाऽग्निमथागमत् । तथा शुष्केषु पर्णेषु पावकं सोऽप्यदीपयत् ॥
sa gatvā'ṅgārakarmāntaṃ gṛhītvā'gnimathāgamat | tathā śuṣkeṣu parṇeṣu pāvakaṃ so'pyadīpayat
अंगार बनाने की भट्ठी पर जाकर वह आग लेकर लौटा और उसने सूखे पत्तों में आग जला दी।
श्लोक 12 (12.145.12)
सुसंदीप्तं महत्कृत्वा तमाह शरणागतम् । प्रतापय सुविस्रब्धः स्वगात्राण्यकुतोभयः ॥
susaṃdīptaṃ mahatkṛtvā tamāha śaraṇāgatam | pratāpaya suvisrabdhaḥ svagātrāṇyakutobhayaḥ
उसे खूब प्रज्वलित करके उसने शरण में आए हुए से कहा — “निश्चिन्त होकर अपने अंग सेंकिए; आपको कहीं से भय नहीं।”
श्लोक 13 (12.145.13)
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा लुब्धो गात्राण्यतापयत् । अग्निप्रत्यागतप्राणस्ततः प्राह विहंगमम् ॥
sa tathoktastathetyuktvā lubdho gātrāṇyatāpayat | agnipratyāgataprāṇastataḥ prāha vihaṃgamam
ऐसा कहे जाने पर व्याध ने “ठीक है” कहकर अपने अंग सेंके; आग से प्राण लौट आने पर वह फिर पक्षी से बोला।
श्लोक 14 (12.145.14)
हर्षेण महताऽऽविष्टो वाक्यं व्याकुललोचनः । तथेमं शकुनिं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
harṣeṇa mahatā''viṣṭo vākyaṃ vyākulalocanaḥ | tathemaṃ śakuniṃ dṛṣṭvā vidhidṛṣṭena karmaṇā
महान् हर्ष से भरकर, आँखें भरी हुई, विधि से इस प्रकार सेवा करने वाले उस पक्षी को देखकर वह बोला —
श्लोक 15 (12.145.15)
दत्तमाहारमिच्छामि त्वया क्षुद्बाधते हि माम् । स तद्वचः प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहंगमः ॥
dattamāhāramicchāmi tvayā kṣudbādhate hi mām | sa tadvacaḥ pratiśrutya vākyamāha vihaṃgamaḥ
“मुझे भोजन दीजिए, मैं वही चाहता हूँ, क्योंकि भूख मुझे सता रही है।” यह बात मानकर पक्षी ने उत्तर दिया।
कपोत उवाच
श्लोक 16 (12.145.16)
न मेऽस्ति विभवो येन नाशयेयं क्षुधां तव । उत्पन्नेन हि जीवामो वयं नित्यं वनौकसः ॥
na me'sti vibhavo yena nāśayeyaṃ kṣudhāṃ tava | utpannena hi jīvāmo vayaṃ nityaṃ vanaukasaḥ
“मेरे पास ऐसा कोई संग्रह नहीं जिससे मैं आपकी भूख मिटा सकूँ। हम वनवासी सदा जो मिल जाए उसी से जीते हैं।”
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (12.145.17)
संचयो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव कानने । इत्युक्त्वा तं तदा तत्र विवर्णवदनोऽभवत् ॥
saṃcayo nāsti cāsmākaṃ munīnāmiva kānane | ityuktvā taṃ tadā tatra vivarṇavadano'bhavat
“और वन में मुनियों की तरह हम कुछ जमा नहीं रखते।” यह कहकर उसका मुख उदास पड़ गया।
श्लोक 18 (12.145.18)
कथं नु खलु कर्तव्यमिति चिन्तापरस्तदा । बभूव भरतश्रेष्ठ गर्हयन्वृत्तिमात्मनः ॥
kathaṃ nu khalu kartavyamiti cintāparastadā | babhūva bharataśreṣṭha garhayanvṛttimātmanaḥ
“अब क्या करना चाहिए?” — इस चिन्ता में डूबकर वह अपनी जीविका की निन्दा करने लगा, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 19 (12.145.19)
मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु स पक्षी पक्षिघातिनम् । उवाच तर्पयिष्ये त्वां मुहूर्तं प्रतिपालय ॥
muhūrtāllabdhasaṃjñastu sa pakṣī pakṣighātinam | uvāca tarpayiṣye tvāṃ muhūrtaṃ pratipālaya
क्षण भर में होश सँभालकर उस पक्षी ने पक्षी-घातक से कहा — “मैं आपको तृप्त करूँगा; एक क्षण ठहरिए।”
श्लोक 20 (12.145.20)
इत्युक्त्वा शुष्कपर्णैस्तु समुज्ज्वाल्य हुताशनम् । हर्षेण महताऽऽविष्टः कपोतः पुनरब्रबीत् ॥
ityuktvā śuṣkaparṇaistu samujjvālya hutāśanam | harṣeṇa mahatā''viṣṭaḥ kapotaḥ punarabrabīt
यह कहकर उसने सूखे पत्तों से आग भड़काई और हर्ष से भरे कपोत ने फिर कहा।
कपोत उवाच
श्लोक 21 (12.145.21)
ऋषीणां देवतानां च पितृणां च महात्मनाम् । श्रुतः पूर्वं मया धर्मो महानतिथिपूजने ॥
ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca pitṛṇāṃ ca mahātmanām | śrutaḥ pūrvaṃ mayā dharmo mahānatithipūjane
“ऋषियों, देवताओं और महात्मा पितरों से मैंने पहले सुना है कि अतिथि की पूजा में बड़ा धर्म है।”
श्लोक 22 (12.145.22)
कुरुष्वानुग्रहं सौम्य सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । निश्चिता खलु मे बुद्धिरतिथिप्रतिपूजने ॥
kuruṣvānugrahaṃ saumya satyametadbravīmi te | niścitā khalu me buddhiratithipratipūjane
“हे सौम्य, मुझ पर यह कृपा कीजिए; मैं सच कहता हूँ — अतिथि-पूजा के विषय में मेरी बुद्धि निश्चित है।”
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (12.145.23)
ततः कृतप्रतिज्ञो वै स पक्षी प्रहसन्निव । तमग्निं त्रिः परिक्रम्य प्रविवेश महामतिः ॥
tataḥ kṛtapratijño vai sa pakṣī prahasanniva | tamagniṃ triḥ parikramya praviveśa mahāmatiḥ
तब अपने प्रण पर अडिग उस बुद्धिमान पक्षी ने मानो हँसते हुए अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा की और उसमें प्रवेश कर गया।
श्लोक 24 (12.145.24)
अग्निमध्ये प्रविष्टं तु लुब्धो दृष्ट्वा च पक्षिणम् । चिन्तयामास मनसा किमिदं वै मया कृतम् ॥
agnimadhye praviṣṭaṃ tu lubdho dṛṣṭvā ca pakṣiṇam | cintayāmāsa manasā kimidaṃ vai mayā kṛtam
पक्षी को अग्नि के बीच गया देखकर व्याध ने मन में सोचा — “मैंने यह क्या कर डाला?”
श्लोक 25 (12.145.25)
अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा । अधर्मः सुमहान्घोरो भविष्यति न संशयः ॥
aho mama nṛśaṃsasya garhitasya svakarmaṇā | adharmaḥ sumahānghoro bhaviṣyati na saṃśayaḥ
“हाय, मुझ क्रूर और अपने कर्मों से निन्दित के लिए निश्चय ही बहुत बड़ा और भयंकर अधर्म होगा।”
श्लोक 26 (12.145.26)
एवं बहुविधं भूरि विललाप स लुब्धकः । गर्हयन्स्वानि कर्माणि द्विजं दृष्ट्वा तथाऽऽगतम् ॥
evaṃ bahuvidhaṃ bhūri vilalāpa sa lubdhakaḥ | garhayansvāni karmāṇi dvijaṃ dṛṣṭvā tathā''gatam
इस प्रकार उस व्याध ने उस पक्षी की यह गति देखकर अपने कर्मों की निन्दा करते हुए बहुत विलाप किया।