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शान्ति पर्व · अध्याय 146

व्याध का उपवास का निश्चय और कपोती की मुक्ति

अग्नि में जलते कपोत को देखकर व्याध अपने को बहुत धिक्कारता है। कपोत के अपने मांस के दान से धर्म की शिक्षा पाकर वह प्रिय प्राण, पत्नी और पुत्रों को छोड़ने तथा परलोक के लिए उपवास और कष्ट से अपने शरीर को ग्रीष्म में छोटे सरोवर की तरह सुखा देने का संकल्प करता है। फिर वह महाप्रस्थान के लिए निकल पड़ता है और जाने से पहले पिंजरे में बँधी कपोती को छोड़ देता है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.146.1)

ततः स लुब्धकः पश्यन्क्षुधयाऽपि परिप्लुतः । कपोतमग्निपतितं वाक्यं पुनरुवाच ह ॥

tataḥ sa lubdhakaḥ paśyankṣudhayā'pi pariplutaḥ | kapotamagnipatitaṃ vākyaṃ punaruvāca ha

तब वह व्याध, यद्यपि भूख से भी विह्वल था, अग्नि में पड़े कपोत को देखता हुआ फिर बोला।

श्लोक 2 (12.146.2)

किमीदृशं नृशंसेन मया कृतमबुद्धिना । भविष्यति हि मे नित्यं पातकं भुवि जीवतः । स विनिन्दंस्तथाऽऽत्मानं पुनः पुनरुवाच ह ॥

kimīdṛśaṃ nṛśaṃsena mayā kṛtamabuddhinā | bhaviṣyati hi me nityaṃ pātakaṃ bhuvi jīvataḥ | sa vinindaṃstathā''tmānaṃ punaḥ punaruvāca ha

“मुझ क्रूर और मूर्ख ने यह क्या कर डाला! जब तक मैं पृथ्वी पर जीता रहूँगा, यह पाप मेरे साथ रहेगा।” इस प्रकार अपनी निन्दा करते हुए वह बार-बार बोलता रहा।

लुब्धक उवाच

श्लोक 3 (12.146.3)

धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धिं सदा निकृतिनिश्चयम् । शुभं कर्म परित्यज्य सोऽहं शकुनिलुब्धकः ॥

dhiṅmāmastu sudurbuddhiṃ sadā nikṛtiniścayam | śubhaṃ karma parityajya so'haṃ śakunilubdhakaḥ

“मुझे धिक्कार है, जो दुर्बुद्धि और सदा छल का निश्चय रखने वाला हूँ! शुभ कर्म छोड़कर मैं वही पक्षियों का व्याध बना रहा।”

श्लोक 4 (12.146.4)

नृशंसस्य ममाद्यायं प्रत्यादेशो न संशयः । दत्तः स्वमांसं दहता कपोतेन महात्मना ॥

nṛśaṃsasya mamādyāyaṃ pratyādeśo na saṃśayaḥ | dattaḥ svamāṃsaṃ dahatā kapotena mahātmanā

“आज मुझ क्रूर को निश्चय ही यह फटकार मिली है — महात्मा कपोत ने अपना मांस जलाकर मुझे दिया।”

श्लोक 5 (12.146.5)

सोऽहं त्यक्ष्ये प्रियान्प्राणान्पुत्रान्दारान्विसृज्य च । उपदिष्टो हि मे धर्मः कपोतेनात्र धर्मिणा ॥

so'haṃ tyakṣye priyānprāṇānputrāndārānvisṛjya ca | upadiṣṭo hi me dharmaḥ kapotenātra dharmiṇā

“इसलिए मैं पुत्रों और पत्नियों को छोड़कर अपने प्रिय प्राण त्याग दूँगा। क्योंकि यहाँ धर्मात्मा कपोत ने मुझे धर्म का उपदेश दिया है।”

श्लोक 6 (12.146.6)

अद्यप्रभृति देहं स्वं सर्वभोगैर्विवर्जितम् । यथा स्वल्पं सरो ग्रीष्मे शोषयिष्याम्यहं तथा ॥

adyaprabhṛti dehaṃ svaṃ sarvabhogairvivarjitam | yathā svalpaṃ saro grīṣme śoṣayiṣyāmyahaṃ tathā

“आज से मैं अपने शरीर को सब भोगों से रहित करके वैसे ही सुखा दूँगा जैसे गरमी में छोटा-सा सरोवर सूख जाता है।”

श्लोक 7 (12.146.7)

क्षुत्पिपासातपसहः कृशो धमनिसन्ततः । उपवासैर्बहुविधैश्चरिष्ये पारलौकिकम् ॥

kṣutpipāsātapasahaḥ kṛśo dhamanisantataḥ | upavāsairbahuvidhaiścariṣye pāralaukikam

“भूख, प्यास और धूप सहता हुआ, दुबला, नसों के जाल से ढका हुआ, मैं अनेक प्रकार के उपवासों से परलोक के लिए तप करूँगा।”

श्लोक 8 (12.146.8)

अहो देहप्रदानेन दर्शिताऽतिथिपूजना । तस्माद्धर्मं चरिष्यामि धर्मो हि परमा गतिः ॥

aho dehapradānena darśitā'tithipūjanā | tasmāddharmaṃ cariṣyāmi dharmo hi paramā gatiḥ

“अहो, अपना शरीर देकर उसने दिखा दिया कि अतिथि की पूजा कैसे की जाती है। इसलिए मैं धर्म का आचरण करूँगा; धर्म ही परम गति है।”

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.146.9)

दृष्टो धर्मो हि धर्मिष्ठे यादृशो विहगोत्तमे । एवमुक्त्वा विनिश्चित्य रौद्रकर्मा स लुब्धकः ॥

dṛṣṭo dharmo hi dharmiṣṭhe yādṛśo vihagottame | evamuktvā viniścitya raudrakarmā sa lubdhakaḥ

“उस परम धर्मात्मा श्रेष्ठ पक्षी में मैंने जैसा धर्म देखा है, वैसा ही अब करूँगा।” यह कहकर और निश्चय करके वह क्रूरकर्मा व्याध …

श्लोक 10 (12.146.10)

महाप्रस्थानमाश्रित्य प्रययौ संशितव्रतः ॥

mahāprasthānamāśritya prayayau saṃśitavrataḥ

… दृढ़ व्रत वाला होकर महाप्रस्थान के मार्ग पर चल पड़ा।

श्लोक 11 (12.146.11)

ततो यष्टिं शलाकां च क्षारकं पञ्जरं तथा । तां च बद्धां कपोतीं स प्रमुच्य विससर्ज ह ॥

tato yaṣṭiṃ śalākāṃ ca kṣārakaṃ pañjaraṃ tathā | tāṃ ca baddhāṃ kapotīṃ sa pramucya visasarja ha

फिर उसने लाठी, शलाकाएँ, जाल और पिंजरा छोड़ दिया, और बँधी हुई कपोती को खोलकर मुक्त कर दिया।

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