Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 147

कपोती का विलाप और अग्नि-प्रवेश

बहेलिये के चले जाने पर कपोती अपने पति के लिए विलाप करती है और उसके साथ बिताए सुख के दिनों को याद करती है। वह कहती है कि पति ही स्त्री का एकमात्र आश्रय है और उसके बिना जीने की उसकी इच्छा नहीं है। फिर वह जलती हुई अग्नि में प्रवेश करती है, विमान में बैठे अपने पति को पाती है, और दोनों स्वर्ग में साथ आनन्द करते हैं।

अध्याय 146अध्याय-सूचीअध्याय 148

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.147.1)

ततो गते शाकुनिके कपोती प्राह दुःखिता । संस्मृत्य सा च भर्तारं रुदती शोककर्शिता ॥

tato gate śākunike kapotī prāha duḥkhitā | saṃsmṛtya sā ca bhartāraṃ rudatī śokakarśitā

तब बहेलिये के चले जाने पर दुःख से व्याकुल कपोती बोली; वह अपने पति को स्मरण करके रो रही थी और शोक से क्षीण हो गई थी।

कपोत्युवाच

श्लोक 2 (12.147.2)

नाहं ते विप्रियं कान्त कदाचिदपि संस्मरे । सर्वाऽपि विधवा नारी बहुपुत्राऽपि शोचते ॥

nāhaṃ te vipriyaṃ kānta kadācidapi saṃsmare | sarvā'pi vidhavā nārī bahuputrā'pi śocate

"प्रिय, मुझे स्मरण नहीं कि मैंने कभी तुम्हारा कुछ अप्रिय किया हो। हर विधवा स्त्री शोक ही करती है, चाहे उसके बहुत-से पुत्र क्यों न हों।"

श्लोक 3 (12.147.3)

शोच्या भवति बन्धूनां पतिहीना तपस्विनी । लालिताऽहं त्वया नित्यं बहुमानाच्च पूजिता ॥

śocyā bhavati bandhūnāṃ patihīnā tapasvinī | lālitā'haṃ tvayā nityaṃ bahumānācca pūjitā

"पति से हीन स्त्री चाहे कितना ही संयमित जीवन बिताए, अपने बन्धुजनों के लिए भी शोचनीय हो जाती है। तुमने सदा मुझे लाड़ से रखा और बड़े आदर से मेरा मान किया।"

श्लोक 4 (12.147.4)

वचनैर्मधुरैः स्निग्धैरसंक्लिष्टमनोहरैः । कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च ॥

vacanairmadhuraiḥ snigdhairasaṃkliṣṭamanoharaiḥ | kandareṣu ca śailānāṃ nadīnāṃ nirjhareṣu ca

"मधुर, स्नेहभरे, कष्ट न देने वाले और मन को हरने वाले वचनों से तुमने मुझे प्रसन्न रखा; पर्वतों की कन्दराओं में, नदियों के तटों पर और झरनों के पास —"

श्लोक 5 (12.147.5)

द्रुमाग्रेषु च रम्येषु रमिताऽहं त्वया सह । आकाशगमने चैव विहृताऽहं त्वया सुखम् । रमामि स्म पुरा कान्त तन्मे नास्त्यद्य मे प्रिय ॥

drumāgreṣu ca ramyeṣu ramitā'haṃ tvayā saha | ākāśagamane caiva vihṛtā'haṃ tvayā sukham | ramāmi sma purā kānta tanme nāstyadya me priya

"— और सुन्दर वृक्षों की चोटियों पर भी मैंने तुम्हारे साथ क्रीड़ा की। आकाश में उड़ते हुए भी मैं तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरी। हे कान्त, पहले मैं यह सब भोगती थी; हे प्रिय, आज मेरे पास उसमें से कुछ भी नहीं रहा।"

श्लोक 6 (12.147.6)

मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत् ॥

mitaṃ dadāti hi pitā mitaṃ bhrātā mitaṃ sutaḥ | amitasya hi dātāraṃ bhartāraṃ kā na pūjayet

"पिता सीमित ही देता है, भाई सीमित ही देता है, पुत्र भी सीमित ही देता है; किन्तु पति तो असीम देने वाला है। ऐसे दाता का आदर कौन स्त्री न करेगी?"

श्लोक 7 (12.147.7)

नास्ति भर्तृसमो नाथो नास्ति भर्तृसमं सुखम् । विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रियाः ॥

nāsti bhartṛsamo nātho nāsti bhartṛsamaṃ sukham | visṛjya dhanasarvasvaṃ bhartā vai śaraṇaṃ striyāḥ

"पति के समान कोई रक्षक नहीं, पति के समान कोई सुख नहीं। अपना सारा धन छोड़ देने वाला पति ही स्त्री का आश्रय है।"

श्लोक 8 (12.147.8)

न कार्यमिह मे नाथ जीवितेन त्वया विना । पतिहीना तु का नारी सती जीवितुमुत्सहेत् ॥

na kāryamiha me nātha jīvitena tvayā vinā | patihīnā tu kā nārī satī jīvitumutsahet

"हे नाथ, तुम्हारे बिना इस संसार में जीवित रहकर मुझे क्या करना है? पति से हीन होकर कौन सती स्त्री जीने का साहस करेगी?"

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.147.9)

एवं विलप्य बहुधा करुणं सा सुदुःखिता । पतिव्रता संप्रदीप्तं प्रविवेश हुताशनम् ॥

evaṃ vilapya bahudhā karuṇaṃ sā suduḥkhitā | pativratā saṃpradīptaṃ praviveśa hutāśanam

इस प्रकार अत्यन्त दुःखी उस पतिव्रता ने बहुत प्रकार से करुण विलाप करके प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश किया।

श्लोक 10 (12.147.10)

ततश्चित्राङ्गदधरं भर्तारं साऽन्वपद्यत । विमानस्थं सुकृतिभिः पूज्यमानं महात्मभिः ॥

tataścitrāṅgadadharaṃ bhartāraṃ sā'nvapadyata | vimānasthaṃ sukṛtibhiḥ pūjyamānaṃ mahātmabhiḥ

तब उसने अपने पति को पाया, जो रंग-बिरंगे भुजबन्ध धारण किए विमान में बैठा था और पुण्यात्मा महात्माओं से पूजित हो रहा था।

श्लोक 11 (12.147.11)

चित्रमाल्याम्बरधरं सर्वाभरणभूषितम् । विमानशतकोटीभिरावृतं पुण्यकर्मभिः ॥

citramālyāmbaradharaṃ sarvābharaṇabhūṣitam | vimānaśatakoṭībhirāvṛtaṃ puṇyakarmabhiḥ

वह रंग-बिरंगी मालाएँ और वस्त्र धारण किए हुए था, सब आभूषणों से सजा था, और पुण्य कर्म करने वालों के सैकड़ों करोड़ विमानों से घिरा हुआ था।

श्लोक 12 (12.147.12)

ततः स्वर्गं गतः पक्षी विमानवरमास्थितः । कर्मणा पूजितस्तत्र रेमे स सह भार्यया ॥

tataḥ svargaṃ gataḥ pakṣī vimānavaramāsthitaḥ | karmaṇā pūjitastatra reme sa saha bhāryayā

तब वह पक्षी श्रेष्ठ विमान पर बैठकर स्वर्ग गया और वहाँ अपने कर्म से सम्मानित होकर अपनी पत्नी के साथ आनन्द करने लगा।

अध्याय 146अध्याय-सूचीअध्याय 148