शान्ति पर्व · अध्याय 148
बहेलिये का दावाग्नि में प्रवेश और स्वर्ग-प्राप्ति
बहेलिया कपोत और कपोती को विमान में बैठा देखता है और वैसी ही गति पाने का निश्चय करता है। वह उपवास करके और केवल वायु पर रहकर महाप्रस्थान के लिए निकलता है तथा काँटों से भरे वन में प्रवेश करता है। वन में आग लग जाती है; वह प्रसन्न मन से उसमें दौड़ जाता है, पापरहित होकर स्वर्ग पाता है। अन्त में भीष्म पति का अनुसरण करने वाली स्त्री की प्रशंसा करते हैं, इस कथा को सुनने वाले के लिए कल्याण बताते हैं और कहते हैं कि गोहत्यारे के लिए भी प्रायश्चित्त है, पर शरणागत का वध करने वाले के लिए नहीं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.148.1)
विमानस्थौ तु तौ राजंल्लुब्धको वै ददर्श ह । दृष्ट्वा तौ दंपती राजन्व्यचिन्तयत तां गतिम् ॥
vimānasthau tu tau rājaṃllubdhako vai dadarśa ha | dṛṣṭvā tau daṃpatī rājanvyacintayata tāṃ gatim
हे राजन्, बहेलिये ने उन दोनों को विमान में बैठे देखा; और उस जोड़े को देखकर, हे राजन्, वह उनकी उस गति के विषय में सोचने लगा।
श्लोक 2 (12.148.2)
कीदृशेनेह तपसा गच्छेयं परमां गतिम् । इति बुद्ध्या विनिश्चित्य गमनायोपचक्रमे ॥
kīdṛśeneha tapasā gaccheyaṃ paramāṃ gatim | iti buddhyā viniścitya gamanāyopacakrame
"किस तप से मैं परम गति को प्राप्त करूँ?" — यह बुद्धि से निश्चय करके उसने प्रस्थान की तैयारी की।
श्लोक 3 (12.148.3)
महाप्रस्थानमाश्रित्य लुब्धकः पक्षिजीवकः । निश्चेष्टो मरुदाहारो निर्ममः स्वर्गकाङ्क्षया ॥
mahāprasthānamāśritya lubdhakaḥ pakṣijīvakaḥ | niśceṣṭo marudāhāro nirmamaḥ svargakāṅkṣayā
पक्षियों से जीविका चलाने वाले उस बहेलिये ने महाप्रस्थान का आश्रय लिया; वह निश्चल हो गया, केवल वायु का आहार करने लगा और ममता छोड़कर स्वर्ग की इच्छा से रहने लगा।
श्लोक 4 (12.148.4)
ततोऽपश्यत्सुविस्तीर्णं हृद्यं पद्माभिभूषितम् । नानापक्षिगणाकीर्णं सरः शीतजलं शिवम् ॥
tato'paśyatsuvistīrṇaṃ hṛdyaṃ padmābhibhūṣitam | nānāpakṣigaṇākīrṇaṃ saraḥ śītajalaṃ śivam
तब उसने एक विस्तृत, मनोहर सरोवर देखा, जो कमलों से सजा था, अनेक प्रकार के पक्षियों के झुण्डों से भरा था और जिसका जल शीतल तथा मंगलकारी था।
श्लोक 5 (12.148.5)
पिपासार्तोऽपि तद्दृष्ट्वा तृप्तः स्यान्नात्र संशयः ॥
pipāsārto'pi taddṛṣṭvā tṛptaḥ syānnātra saṃśayaḥ
प्यास से पीड़ित मनुष्य भी उसे देखकर तृप्त हो जाए, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 6 (12.148.6)
उपवासकृशोऽत्यर्थं स तु पार्थिव लुब्धकः । उपसृत्य तु तद्धृष्टः श्वापदाध्युपितं वनम् ॥
upavāsakṛśo'tyarthaṃ sa tu pārthiva lubdhakaḥ | upasṛtya tu taddhṛṣṭaḥ śvāpadādhyupitaṃ vanam
परन्तु हे राजन्, उपवास से अत्यन्त दुर्बल हुआ वह बहेलिया उसे देखकर प्रसन्न हो हिंसक पशुओं से भरे उस वन के पास गया।
श्लोक 7 (12.148.7)
महान्तं निश्चयं कृत्वा लुब्धकः प्रविवेश ह । प्रविशन्नेव स वनं निगृहीतः स कण्टकैः ॥
mahāntaṃ niścayaṃ kṛtvā lubdhakaḥ praviveśa ha | praviśanneva sa vanaṃ nigṛhītaḥ sa kaṇṭakaiḥ
बड़ा निश्चय करके बहेलिये ने वन में प्रवेश किया; प्रवेश करते ही वह काँटों में जकड़ गया।
श्लोक 8 (12.148.8)
स कण्टकैर्विभिन्नाङ्गो लोहितार्द्रीकृतच्छविः । बभ्राम तस्मिन्विजने नानामृगसमाकुले ॥
sa kaṇṭakairvibhinnāṅgo lohitārdrīkṛtacchaviḥ | babhrāma tasminvijane nānāmṛgasamākule
काँटों से उसके अंग छिल गए और त्वचा रक्त से भीग गई; वह अनेक प्रकार के पशुओं से भरे उस निर्जन वन में भटकता रहा।
श्लोक 9 (12.148.9)
ततो द्रुमाणां महतां पवनेन वने तदा । उदतिष्ठत संघर्षान्सुमहान्हव्यवाहनः ॥
tato drumāṇāṃ mahatāṃ pavanena vane tadā | udatiṣṭhata saṃgharṣānsumahānhavyavāhanaḥ
तब वन में वायु से बड़े-बड़े वृक्षों के आपस में रगड़ खाने से एक विशाल अग्नि उठ खड़ी हुई।
श्लोक 10 (12.148.10)
तद्वनं वृक्षसंकीर्णं लताविटपसंकुलम् । ददाह पावकः क्रुद्धो युगान्ताग्निसमप्रभः ॥
tadvanaṃ vṛkṣasaṃkīrṇaṃ latāviṭapasaṃkulam | dadāha pāvakaḥ kruddho yugāntāgnisamaprabhaḥ
युगान्त की अग्नि के समान तेज वाली उस अग्नि ने क्रुद्ध होकर वृक्षों से घने और लताओं तथा डालियों से भरे उस वन को जला डाला।
श्लोक 11 (12.148.11)
स ज्वलैः पवनोद्भूतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्ततः । ददाह तद्वनं घोरं मृगपक्षिसमाकुलम् ॥
sa jvalaiḥ pavanodbhūtairvisphuliṅgaiḥ samantataḥ | dadāha tadvanaṃ ghoraṃ mṛgapakṣisamākulam
वायु से उड़ती हुई जलती चिनगारियों से चारों ओर घिरी वह आग पशु-पक्षियों से भरे उस भयंकर वन को जलाने लगी।
श्लोक 12 (12.148.12)
ततः स देहमोक्षार्थं संप्रहृष्टेन चेतसा । अभ्यधावत वर्धन्तं पावकं लुब्धकस्तदा ॥
tataḥ sa dehamokṣārthaṃ saṃprahṛṣṭena cetasā | abhyadhāvata vardhantaṃ pāvakaṃ lubdhakastadā
तब उस बहेलिये ने देह त्यागने की इच्छा से प्रसन्न मन होकर बढ़ती हुई अग्नि की ओर दौड़ लगाई।
श्लोक 13 (12.148.13)
ततस्तेनाग्निना दग्धो लुब्धको नष्टकल्मषः । जगाम परमां सिद्धिं ततो भरतसत्तम ॥
tatastenāgninā dagdho lubdhako naṣṭakalmaṣaḥ | jagāma paramāṃ siddhiṃ tato bharatasattama
हे भरतश्रेष्ठ, उस अग्नि से जलकर बहेलिया पापरहित हो गया और परम सिद्धि को प्राप्त हुआ।
श्लोक 14 (12.148.14)
ततः स्वर्गस्थमात्मानमपश्यद्विगतज्वरः । यक्षगन्धर्वसिद्धानां मध्ये भ्राजन्तमिन्द्रवत् ॥
tataḥ svargasthamātmānamapaśyadvigatajvaraḥ | yakṣagandharvasiddhānāṃ madhye bhrājantamindravat
तब सन्ताप से मुक्त होकर उसने अपने को स्वर्ग में देखा, जहाँ वह यक्षों, गन्धर्वों और सिद्धों के बीच इन्द्र के समान शोभित हो रहा था।
श्लोक 15 (12.148.15)
एवं खलु कपोतश्च कपोती च पतिव्रता । लुब्धकेन सह स्वर्गं गताः पुण्येन कर्मणा ॥
evaṃ khalu kapotaśca kapotī ca pativratā | lubdhakena saha svargaṃ gatāḥ puṇyena karmaṇā
इस प्रकार कपोत और उसकी पतिव्रता कपोती अपने पुण्य कर्म से बहेलिये के साथ स्वर्ग को गए।
श्लोक 16 (12.148.16)
याऽन्या चैवंविधा नारी भर्तारमनुवर्तते । विराजते हि सा क्षिप्रं कपोतीव दिवि स्थिता ॥
yā'nyā caivaṃvidhā nārī bhartāramanuvartate | virājate hi sā kṣipraṃ kapotīva divi sthitā
जो दूसरी स्त्री भी इस प्रकार पति का अनुसरण करती है, वह कपोती की भाँति शीघ्र ही स्वर्ग में शोभा पाती है।
श्लोक 17 (12.148.17)
एवमेतत्पुरावृत्तं लुब्धकस्य महात्मनः । कपोतस्य च धर्मिष्ठा गतिः पुण्येन कर्मणा ॥
evametatpurāvṛttaṃ lubdhakasya mahātmanaḥ | kapotasya ca dharmiṣṭhā gatiḥ puṇyena karmaṇā
यह महात्मा बहेलिये की और कपोत की प्राचीन कथा है, जिसमें पुण्य कर्म से धर्मपूर्ण गति प्राप्त हुई।
श्लोक 18 (12.148.18)
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तयेत् । नाशुभं विद्यते तस्य मनसाऽपि प्रमादतः ॥
yaścedaṃ śṛṇuyānnityaṃ yaścedaṃ parikīrtayet | nāśubhaṃ vidyate tasya manasā'pi pramādataḥ
जो इसे नित्य सुनता है अथवा सुनाता है, उसे मन से भी, प्रमादवश भी, कोई अशुभ नहीं होता।
श्लोक 19 (12.148.19)
युधिष्ठिर महानेष धर्मो धर्मभृतां वर । गोघ्नेष्वपि भवेदस्मिन्निष्कृतिः पापकर्मणः ॥
yudhiṣṭhira mahāneṣa dharmo dharmabhṛtāṃ vara | goghneṣvapi bhavedasminniṣkṛtiḥ pāpakarmaṇaḥ
हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर, यह धर्म बहुत महान् है; गोहत्यारों के लिए भी इसमें पापकर्म का प्रायश्चित्त हो सकता है।
श्लोक 20 (12.148.20)
न निष्कृतिर्भवेत्तस्य यो हन्याच्छरणागतम् । इतिहासमिमं श्रुत्वा पुण्यं पापप्रणाशनम् । न दुर्गतिमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
na niṣkṛtirbhavettasya yo hanyāccharaṇāgatam | itihāsamimaṃ śrutvā puṇyaṃ pāpapraṇāśanam | na durgatimavāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
परन्तु जो शरण में आए हुए का वध करता है, उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है। पुण्यदायक और पापनाशक इस इतिहास को सुनकर मनुष्य दुर्गति को नहीं पाता और स्वर्गलोक को जाता है।