शान्ति पर्व · अध्याय 149
ब्रह्महत्या से पीड़ित जनमेजय को शौनक की फटकार
युधिष्ठिर पूछते हैं कि बिना इच्छा के हुए पाप से मनुष्य कैसे छूटता है। भीष्म उत्तर में परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय का पुराना वृत्तान्त सुनाते हैं, जिन पर अनजाने में हुई ब्रह्महत्या का दोष आ पड़ा था। ब्राह्मणों से त्यागे हुए और पश्चात्ताप से जलते हुए राजा पृथ्वी भर में उसके निवारण का उपाय पूछते फिरते हैं और अन्त में मुनि इन्द्रोत शौनक के चरण पकड़ लेते हैं। मुनि भयभीत होकर उन्हें कड़ी फटकार देते हैं, कहते हैं कि वे जीते हुए भी मृत के समान हैं, और आगे मिलने वाले नरकों से सावधान करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.149.1)
अबुद्धिपूर्वं यत्पापं कुर्याद्भरतसत्तम । मुच्यते स कथं तस्मादेनसस्तद्ब्रवीहि मे ॥
abuddhipūrvaṃ yatpāpaṃ kuryādbharatasattama | mucyate sa kathaṃ tasmādenasastadbravīhi me
"हे भरतश्रेष्ठ, जो मनुष्य बिना इच्छा के कोई पाप कर बैठे, वह उस पाप से कैसे छूटता है? यह मुझे बताइए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.149.2)
अत्र ते वर्तयिष्यामि पुराणमृषिसंस्तुतम् । इन्द्रोतः शौनको विप्रो यदाह जनमेजयम् ॥
atra te vartayiṣyāmi purāṇamṛṣisaṃstutam | indrotaḥ śaunako vipro yadāha janamejayam
"इस विषय में मैं तुम्हें ऋषियों द्वारा प्रशंसित एक पुराना वृत्तान्त सुनाऊँगा — जो ब्राह्मण इन्द्रोत शौनक ने जनमेजय से कहा था।"
श्लोक 3 (12.149.3)
आसीद्राजा महावीर्यः पारिक्षिज्जनमेजयः । अबुद्धिजा ब्रह्महत्या तमागच्छन्महीपतिम् ॥
āsīdrājā mahāvīryaḥ pārikṣijjanamejayaḥ | abuddhijā brahmahatyā tamāgacchanmahīpatim
परीक्षित् के पुत्र जनमेजय नाम के एक महान् पराक्रमी राजा थे। उन पृथ्वीपति पर बिना इच्छा के हुई ब्रह्महत्या का दोष आ पड़ा।
श्लोक 4 (12.149.4)
ब्राह्मणाः सर्व एवैनं तत्यजुः सपुरोहिताः । स जगाम वनं राजा दह्यमानो दिवानिशम् ॥
brāhmaṇāḥ sarva evainaṃ tatyajuḥ sapurohitāḥ | sa jagāma vanaṃ rājā dahyamāno divāniśam
सब ब्राह्मणों ने पुरोहितों सहित उन्हें त्याग दिया। वे राजा दिन-रात जलते हुए वन में चले गए।
श्लोक 5 (12.149.5)
प्रजाभिः स परित्यक्तश्चकार कुशलं महत् । अतिवेलं तपस्तेपे दह्यमानः स मन्युना ॥
prajābhiḥ sa parityaktaścakāra kuśalaṃ mahat | ativelaṃ tapastepe dahyamānaḥ sa manyunā
प्रजा से त्यागे जाने पर उन्होंने बहुत पुण्य कर्म किया; पश्चात्ताप की आग में जलते हुए वे अत्यन्त कठोर तप करते रहे।
श्लोक 6 (12.149.6)
ब्रह्महत्यापनोदार्थमपृच्छद्ब्राह्मणान्बहून् । पर्यटन्पृथिवीं कृत्स्नां देशेदेशे नराधिपः ॥
brahmahatyāpanodārthamapṛcchadbrāhmaṇānbahūn | paryaṭanpṛthivīṃ kṛtsnāṃ deśedeśe narādhipaḥ
ब्रह्महत्या के दोष को मिटाने के लिए वे नरेश सारी पृथ्वी में स्थान-स्थान पर घूमते हुए बहुत-से ब्राह्मणों से पूछते रहे।
श्लोक 7 (12.149.7)
तत्रेतिहासं वक्ष्यामि धर्मस्यास्योपवृंहणम् । दह्यमानः पापकृत्या जगाम जनमेजयः ॥
tatretihāsaṃ vakṣyāmi dharmasyāsyopavṛṃhaṇam | dahyamānaḥ pāpakṛtyā jagāma janamejayaḥ
"इस विषय में मैं उस इतिहास को कहूँगा जो इस धर्म को पुष्ट करता है। अपने पापकर्म से जलते हुए जनमेजय गए —
श्लोक 8 (12.149.8)
चरिष्यमाण इन्द्रोतं शौनकं संशितव्रतम् । समासाद्योपजग्राह पादयोः परिपीडयन् ॥
cariṣyamāṇa indrotaṃ śaunakaṃ saṃśitavratam | samāsādyopajagrāha pādayoḥ paripīḍayan
— प्रायश्चित्त करने की इच्छा से कठोर व्रत वाले मुनि इन्द्रोत शौनक के पास; उनके निकट पहुँचकर उन्होंने उनके चरण पकड़कर दबाए।"
श्लोक 9 (12.149.9)
ततो भीतो महाप्राज्ञो जगर्हे सुभृशं तदा । कर्ता पापस्य महतो भ्रूणहा किमिहागतः ॥
tato bhīto mahāprājño jagarhe subhṛśaṃ tadā | kartā pāpasya mahato bhrūṇahā kimihāgataḥ
तब महाप्राज्ञ मुनि ने भयभीत होकर उन्हें बहुत धिक्कारा: "महान् पाप के करने वाले ब्रह्मघाती, तुम यहाँ क्यों आए हो?
शौनक उवाच
श्लोक 10 (12.149.10)
किं तवास्मासु कर्तव्यं मा मां द्राक्षीः कथंचन । गच्छगच्छ न ते स्थानं प्रीणात्यस्मानिति ब्रुवन् ॥
kiṃ tavāsmāsu kartavyaṃ mā māṃ drākṣīḥ kathaṃcana | gacchagaccha na te sthānaṃ prīṇātyasmāniti bruvan
"हमसे तुम्हारा क्या काम? मुझे किसी प्रकार दिखाई न देना। जाओ, जाओ! तुम्हारी उपस्थिति हमें अच्छी नहीं लगती" — ऐसा उन्होंने कहा।
श्लोक 11 (12.149.11)
रुधिरस्येव ते गन्धः शवस्येव च दर्शनम् । अशिवः शिवसंकाशो मृतो जीवन्निवाटसि ॥
rudhirasyeva te gandhaḥ śavasyeva ca darśanam | aśivaḥ śivasaṃkāśo mṛto jīvannivāṭasi
"तुम्हारी गन्ध रक्त जैसी है और रूप शव जैसा। तुम शुभ दिखते हो पर अशुभ हो; जीवित-से घूमते हो, पर मर चुके हो।
श्लोक 12 (12.149.12)
अन्तर्भृत्युरशुद्धात्मा पापमेवानुचिन्तयन् । प्रबुध्यसे प्रस्वपिषि वर्तसे परमे सुखे ॥
antarbhṛtyuraśuddhātmā pāpamevānucintayan | prabudhyase prasvapiṣi vartase parame sukhe
"तुम्हारे भीतर मृत्यु बैठी है, आत्मा अशुद्ध है, तुम केवल अपने पाप का ही चिन्तन करते हो; फिर भी जागते हो, सोते हो और परम सुख में दिन बिताते हो।
श्लोक 13 (12.149.13)
मोघं ते जीवितं राजन्परिक्लिष्टं च जीवसि । पापायैव हि सृष्टोऽसि कर्मणेह यवीयसे ॥
moghaṃ te jīvitaṃ rājanparikliṣṭaṃ ca jīvasi | pāpāyaiva hi sṛṣṭo'si karmaṇeha yavīyase
"हे राजन्, तुम्हारा जीवन व्यर्थ है; तुम क्लेश में पड़े हुए जी रहे हो। तुम केवल पाप के लिए, इस लोक में नीच कर्म के लिए ही रचे गए हो।
श्लोक 14 (12.149.14)
बहुकल्याणमिच्छन्त ईहन्ते पितरः सुतान् । तपसा दैवतेज्याभिर्वन्दनेन तितिक्षया ॥
bahukalyāṇamicchanta īhante pitaraḥ sutān | tapasā daivatejyābhirvandanena titikṣayā
"पिता अपने पुत्रों के बहुत कल्याण की इच्छा से तप, देवपूजा, वन्दना और क्षमा के द्वारा उनके लिए प्रयत्न करते हैं।
श्लोक 15 (12.149.15)
पितृवंशमिमं पश्य त्वत्कृते निधनं गतम् । निरर्थाः सर्व एवैषामाशाबन्धास्त्वदाश्रयाः ॥
pitṛvaṃśamimaṃ paśya tvatkṛte nidhanaṃ gatam | nirarthāḥ sarva evaiṣāmāśābandhāstvadāśrayāḥ
"अपने पितरों के इस वंश को देखो, जो तुम्हारे कारण विनाश को प्राप्त हुआ। तुम पर टिकी इन सबकी आशा के बन्धन व्यर्थ हो गए।
श्लोक 16 (12.149.16)
यान्पूजयन्तो विन्दन्ति स्वर्गमायुर्यशः प्रजाः । तेषु ते संततं द्वेषो ब्राह्मणेषु निरर्थकः ॥
yānpūjayanto vindanti svargamāyuryaśaḥ prajāḥ | teṣu te saṃtataṃ dveṣo brāhmaṇeṣu nirarthakaḥ
"जिनकी पूजा करके लोग स्वर्ग, आयु, यश और सन्तान पाते हैं, उन्हीं ब्राह्मणों के प्रति तुम्हारा द्वेष निरन्तर और निराधार है।
श्लोक 17 (12.149.17)
इमं लोकं विमुच्य त्वमवाङ्मूर्धा पतिष्यसि । अशाश्वतीः शाश्वतीश्च समाः पापेन कर्मणा ॥
imaṃ lokaṃ vimucya tvamavāṅmūrdhā patiṣyasi | aśāśvatīḥ śāśvatīśca samāḥ pāpena karmaṇā
"इस लोक को छोड़कर तुम अपने पापकर्म के कारण सिर नीचे किए हुए गिरोगे — ऐसे वर्षों तक जो अनन्त नहीं हैं, फिर भी बहुत लम्बे हैं।
श्लोक 18 (12.149.18)
स्वाद्यमानो जन्तुशतैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैरयोमुखैः । ततश्च पुनरावृत्तः पापयोनिं गमिष्यसि ॥
svādyamāno jantuśataistīkṣṇadaṃṣṭrairayomukhaiḥ | tataśca punarāvṛttaḥ pāpayoniṃ gamiṣyasi
"तीखे दाँतों और लोहे के मुँह वाले सैकड़ों जन्तुओं से खाए जाते हुए तुम उसके बाद फिर लौटकर पापयोनि में जाओगे।
श्लोक 19 (12.149.19)
यदिदं मन्यसे राजन्नायमस्ति कुतः परः । प्रतिस्मारयितारस्त्वां यमदूता यमक्षये ॥
yadidaṃ manyase rājannāyamasti kutaḥ paraḥ | pratismārayitārastvāṃ yamadūtā yamakṣaye
"हे राजन्, तुम जो सोचते हो कि 'यही लोक है, कोई दूसरा परलोक कहाँ?' — यमलोक में यम के दूत तुम्हें इसका स्मरण कराएँगे।"