शान्ति पर्व · अध्याय 150
जनमेजय की विनती और शौनक की शर्त
जनमेजय मुनि की फटकार को स्वीकार करते हैं: यह सब उनका अपना किया हुआ है। वे शौनक से क्रोध छोड़कर बात करने की प्रार्थना करते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि उनका वंश बचा रहे और वे फिर ब्राह्मणों की सेवा करें। शौनक कहते हैं कि विद्वान् पुरुष पाप पर पछताता है, और राजा को शान्ति तथा ब्राह्मणों की प्रसन्नता का मार्ग अपनाने को कहते हैं। वे बताते हैं कि वे धर्म के कारण राजा को अपने पास बुला रहे हैं, मित्रों की निन्दा का उन्हें भय है, और राजा से वचन माँगते हैं कि वह कभी ब्राह्मणों से द्रोह नहीं करेगा। जनमेजय मुनि के चरण छूकर वाणी, मन और कर्म से द्रोह न करने की शपथ लेते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.150.1)
एवमुक्तः प्रत्युवाच तं मुनिं जनमेजयः । गर्ह्यं भवान्गर्हयते निन्द्यं निन्दति मां पुनः ॥
evamuktaḥ pratyuvāca taṃ muniṃ janamejayaḥ | garhyaṃ bhavāngarhayate nindyaṃ nindati māṃ punaḥ
ऐसा कहे जाने पर जनमेजय ने उन मुनि को उत्तर दिया: "आप निन्दनीय की निन्दा कर रहे हैं और मुझ निन्द्य को ही फिर धिक्कार रहे हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 2 (12.150.2)
धिक्कार्यं मां धिक्कुरुते तस्मात्त्वाऽहं प्रसादये । सर्वं हीदं स्वकृतं मे ज्वलाम्यग्नाविवाहितम् ॥
dhikkāryaṃ māṃ dhikkurute tasmāttvā'haṃ prasādaye | sarvaṃ hīdaṃ svakṛtaṃ me jvalāmyagnāvivāhitam
"आप मुझ धिक्कार के योग्य को धिक्कारते हैं, इसीलिए मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। यह सब मेरा ही किया हुआ है; मैं अग्नि में रखे हुए की भाँति जल रहा हूँ।
श्लोक 3 (12.150.3)
स्वकर्माण्यभिसंधाय नाभिनन्दति मे मनः । प्राप्तं घोरं भयं नूनं मया वैवस्वतादपि ॥
svakarmāṇyabhisaṃdhāya nābhinandati me manaḥ | prāptaṃ ghoraṃ bhayaṃ nūnaṃ mayā vaivasvatādapi
"अपने कर्मों का विचार करने पर मेरा मन उनमें प्रसन्न नहीं होता। निश्चय ही मुझे वैवस्वत यम से भी बढ़कर घोर भय प्राप्त हुआ है।
श्लोक 4 (12.150.4)
तत्तु शल्यमनिर्हृत्य कथं शक्ष्यामि जीवितुम् । सर्वं मन्युं विनीय त्वमभि मां वद शौनक ॥
tattu śalyamanirhṛtya kathaṃ śakṣyāmi jīvitum | sarvaṃ manyuṃ vinīya tvamabhi māṃ vada śaunaka
"उस काँटे को निकाले बिना मैं कैसे जी सकूँगा? हे शौनक, आप सारा क्रोध त्यागकर मुझसे बात कीजिए।
श्लोक 5 (12.150.5)
महानसं ब्राह्मणानां भूयो वक्ष्यामि सांप्रतम् । गन्ता गतिं ब्राह्मणानां भविष्याम्यर्थवान्पुनः । अस्तु शेषं कुलस्यास्य मा पराभूदिदं कुलम् ॥
mahānasaṃ brāhmaṇānāṃ bhūyo vakṣyāmi sāṃpratam | gantā gatiṃ brāhmaṇānāṃ bhaviṣyāmyarthavānpunaḥ | astu śeṣaṃ kulasyāsya mā parābhūdidaṃ kulam
"मैं अब कहता हूँ कि मैं फिर ब्राह्मणों के लिए बड़ा रसोईघर चलाऊँगा; ब्राह्मणों का आश्रय बनूँगा और फिर उपयोगी सिद्ध होऊँगा। इस कुल का कुछ अंश बचा रहे; यह कुल पराभूत न हो।
श्लोक 6 (12.150.6)
न हि नो ब्रह्मशप्तानां शेषं भवितुमर्हति । स्तुतीरलभमानानां संविदं वेद निश्चयात् ॥
na hi no brahmaśaptānāṃ śeṣaṃ bhavitumarhati | stutīralabhamānānāṃ saṃvidaṃ veda niścayāt
"ब्राह्मणों से शापित हम लोगों का कोई अंश बचा नहीं रह सकता; जिन्हें प्रशंसा नहीं मिलती, उनकी निश्चित गति मैं जानता हूँ।
श्लोक 7 (12.150.7)
निन्दमानः स्वमात्मानं भूयो वक्ष्यामि सांप्रतम् । भूयश्चैवाभिमज्जन्ति निर्धर्मा निर्जला इव ॥
nindamānaḥ svamātmānaṃ bhūyo vakṣyāmi sāṃpratam | bhūyaścaivābhimajjanti nirdharmā nirjalā iva
"अपनी ही निन्दा करता हुआ मैं अब आगे कहता हूँ: धर्महीन लोग जलरहित जीवों की भाँति बार-बार डूबते हैं।
श्लोक 8 (12.150.8)
न ह्ययज्ञा अमुं लोकं प्राप्नुवन्ति कथंचन । अवाक्च प्रपतिष्यन्ति पुलिन्दशवरा इव ॥
na hyayajñā amuṃ lokaṃ prāpnuvanti kathaṃcana | avākca prapatiṣyanti pulindaśavarā iva
"जो यज्ञ नहीं करते, वे किसी प्रकार परलोक को नहीं पाते; वे पुलिन्दों और शबरों की तरह सिर के बल गिरते हैं।
श्लोक 9 (12.150.9)
अविज्ञायैव मे प्रज्ञां बालस्येव स पण्डितः । ब्रह्मन्पितेव पुत्रस्य प्रीतिमान्भव शौनक ॥
avijñāyaiva me prajñāṃ bālasyeva sa paṇḍitaḥ | brahmanpiteva putrasya prītimānbhava śaunaka
"जैसे कोई विद्वान् बालक के साथ व्यवहार करता है, वैसे ही मेरी बुद्धि को जाने बिना भी, हे ब्रह्मन् शौनक, जैसे पिता पुत्र पर प्रसन्न होता है, वैसे मुझ पर प्रसन्न हो जाइए।"
शौनक उवाच
श्लोक 10 (12.150.10)
किमाश्चर्यं यतः प्राज्ञो बहुकुर्यादसांप्रतम् । इति वै पण्डितो भूत्वा भूतानां को नु तप्यते ॥
kimāścaryaṃ yataḥ prājño bahukuryādasāṃpratam | iti vai paṇḍito bhūtvā bhūtānāṃ ko nu tapyate
"इसमें आश्चर्य क्या कि ज्ञानी पुरुष भी बहुत-सा अनुचित कर बैठे? पर विद्वान् होकर प्राणियों में कौन फिर सन्तप्त होता है?
श्लोक 11 (12.150.11)
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचते जनान् । जगतीस्थानिवाद्रिस्थः प्रज्ञया प्रतिपत्स्यति ॥
prajñāprāsādamāruhya aśocyaḥ śocate janān | jagatīsthānivādristhaḥ prajñayā pratipatsyati
"प्रज्ञा के महल पर चढ़कर स्वयं शोकरहित पुरुष लोगों के लिए शोक करता है; पर्वत पर खड़े हुए मनुष्य की भाँति, जो भूमि पर खड़ों को देखता है, वह अपनी प्रज्ञा से देखेगा।
श्लोक 12 (12.150.12)
न चोपलभते कश्चिन्न चाश्चर्याणि पश्यति । निर्विण्णात्मा परोक्षो वा धिक्कृतः सर्वसाधुषु ॥
na copalabhate kaścinna cāścaryāṇi paśyati | nirviṇṇātmā parokṣo vā dhikkṛtaḥ sarvasādhuṣu
"जो खिन्न मन वाला है, या दृष्टि से ओझल है, या सब सज्जनों में तिरस्कृत है, वह न इसे पाता है और न इसके आश्चर्यों को देखता है।
श्लोक 13 (12.150.13)
विदित्वा भवतो वीर्यं माहात्म्यं चैव चागमे । कुरुष्वेह यथाशान्ति ब्रह्मा शरणमस्तु ते ॥
viditvā bhavato vīryaṃ māhātmyaṃ caiva cāgame | kuruṣveha yathāśānti brahmā śaraṇamastu te
"आपके बल और आपकी महिमा को शास्त्र के अनुसार जानकर यहाँ वही कीजिए जिससे शान्ति हो; ब्राह्मण आपकी शरण हो।
श्लोक 14 (12.150.14)
तद्वै पारत्रिकं तात ब्राह्मणानामकुप्यताम् । अथवा तप्यसे पापे धर्मं चेदनुपश्यसि ॥
tadvai pāratrikaṃ tāta brāhmaṇānāmakupyatām | athavā tapyase pāpe dharmaṃ cedanupaśyasi
"हे तात, वही परलोक के लिए हितकर है कि ब्राह्मण क्रोध न करें। अथवा यदि आप धर्म को देखते हैं, तो पाप के कारण सन्तप्त हो रहे हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 15 (12.150.15)
अनुतप्ये च पापेन न चाधर्मं चराम्यहम् । बुभूषुं भजमानं च प्रीतिमान्भव शौनक ॥
anutapye ca pāpena na cādharmaṃ carāmyaham | bubhūṣuṃ bhajamānaṃ ca prītimānbhava śaunaka
"मैं अपने पाप पर पछताता हूँ और अधर्म का आचरण नहीं करता। हे शौनक, मुझ अभ्युदय चाहने वाले और आपकी सेवा करने वाले पर प्रसन्न हो जाइए।"
शौनक उवाच
श्लोक 16 (12.150.16)
छित्त्वा दम्भं च मानं च प्रीतिमिच्छामि ते नृप । सर्वभूतहिते तिष्ठ धर्मं चैव प्रतिस्मरन् ॥
chittvā dambhaṃ ca mānaṃ ca prītimicchāmi te nṛpa | sarvabhūtahite tiṣṭha dharmaṃ caiva pratismaran
"हे राजन्, दम्भ और अभिमान को छोड़ो; तब मैं तुम पर प्रसन्न होना चाहता हूँ। सब प्राणियों के हित में स्थित रहो और धर्म का स्मरण रखो।
श्लोक 17 (12.150.17)
न भयान्न च कार्पण्यान्न लोभात्त्वामुपाह्वये । तां मे दैवीं गिरं सत्यां शृणु त्वं ब्राह्मणैः सह ॥
na bhayānna ca kārpaṇyānna lobhāttvāmupāhvaye | tāṃ me daivīṃ giraṃ satyāṃ śṛṇu tvaṃ brāhmaṇaiḥ saha
"मैं न भय से, न दीनता से, न लोभ से तुम्हें अपने पास बुलाता हूँ। ब्राह्मणों के साथ मेरी इस दिव्य और सच्ची वाणी को सुनो।
श्लोक 18 (12.150.18)
सोऽहं न केनचिच्चार्थी त्वां च धर्मादुपाह्वये । क्रोशतां सर्वभूतानां हाहाधिगिति जल्पताम् ॥
so'haṃ na kenaciccārthī tvāṃ ca dharmādupāhvaye | krośatāṃ sarvabhūtānāṃ hāhādhigiti jalpatām
"मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए; मैं धर्म के कारण तुम्हें अपने पास बुला रहा हूँ, चाहे सब प्राणी 'हाय! धिक्!' कहकर चिल्लाएँ।
श्लोक 19 (12.150.19)
वक्ष्यन्ति मामधर्मज्ञं त्यक्ष्यन्ति सुहृदो जनाः । ता वाचः सुहृदः श्रुत्वा संज्वरिष्यन्ति मे भृशं ॥
vakṣyanti māmadharmajñaṃ tyakṣyanti suhṛdo janāḥ | tā vācaḥ suhṛdaḥ śrutvā saṃjvariṣyanti me bhṛśaṃ
"लोग मुझे अधर्म को न जानने वाला कहेंगे और मुझे छोड़ देंगे। मेरे मित्र वे बातें सुनकर मेरे लिए बहुत सन्तप्त होंगे।
श्लोक 20 (12.150.20)
केचिदेव महाप्राज्ञाः प्रतिज्ञास्यन्ति कार्यताम् । जानीहि मत्कृतं तात ब्राह्मणान्प्रति भारत ॥
kecideva mahāprājñāḥ pratijñāsyanti kāryatām | jānīhi matkṛtaṃ tāta brāhmaṇānprati bhārata
"केवल कुछ महाप्राज्ञ ही इसकी आवश्यकता को समझेंगे। हे तात भारत, ब्राह्मणों के विषय में मेरे किए को जान लो।
श्लोक 21 (12.150.21)
यथा ते सत्कृताः क्षेमं लभेरंस्त्वं तथा कुरु । प्रतिजानीहि चाद्रोहं ब्राह्मणानां नराधिप ॥
yathā te satkṛtāḥ kṣemaṃ labheraṃstvaṃ tathā kuru | pratijānīhi cādrohaṃ brāhmaṇānāṃ narādhipa
"ऐसा करो कि तुम्हारे द्वारा सम्मानित ब्राह्मण कल्याण पाएँ; और हे नरेश, ब्राह्मणों से द्रोह न करने की प्रतिज्ञा करो।"
जनमेजय उवाच
श्लोक 22 (12.150.22)
नैव वाचा न मनसा पुनर्जातु न कर्मणा । द्रोग्धाऽस्मि ब्राह्मणान्विप्र चरणावेव ते स्पृशे ॥
naiva vācā na manasā punarjātu na karmaṇā | drogdhā'smi brāhmaṇānvipra caraṇāveva te spṛśe
"हे विप्र, मैं फिर कभी वाणी से, मन से या कर्म से ब्राह्मणों से द्रोह नहीं करूँगा; मैं आपके चरण ही छूता हूँ।"