शान्ति पर्व · अध्याय 152
गृध्र और सियार: श्मशान में मृत बालक
युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्या कभी किसी मरे हुए को फिर जिलाया गया है; भीष्म वैदिश नगर की एक पुरानी कथा सुनाते हैं। एक ब्राह्मण का इकलौता पुत्र मर जाता है और शोकाकुल स्वजन उसे श्मशान ले जाते हैं। एक गृध्र उन्हें सूर्यास्त से पहले घर लौट जाने को कहता है, जबकि रात की भूख से व्याकुल सियार उन्हें रुकने को कहता है; दोनों शास्त्र का सहारा लेकर तर्क देते हैं। जब स्वजन निराश होने को होते हैं, तब देवी की प्रेरणा से शिव प्रकट होकर बालक को सौ वर्ष का जीवन देते हैं, और सियार तथा गृध्र को भूख मिटाने का वर भी देते हैं। अन्त में भीष्म दृढ़ अध्यवसाय और देव की कृपा की महिमा कहते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.152.1)
कच्चित्पितामहेनासीच्छ्रुतं वा दृष्टमेव च । कच्चिन्मर्त्यो मृतो राजन्पुनरुज्जीवितोऽभवत् ॥
kaccitpitāmahenāsīcchrutaṃ vā dṛṣṭameva ca | kaccinmartyo mṛto rājanpunarujjīvito'bhavat
पितामह, क्या आपने कभी सुना या देखा है कि कोई मरा हुआ मनुष्य, हे राजन्, फिर से जी उठा हो?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.152.2)
शृणु पार्थ यथावृत्तमितिहासं पुरातनम् । गृध्रजम्बुकसंवादं यो वृत्तो वैदिशे पुरे ॥
śṛṇu pārtha yathāvṛttamitihāsaṃ purātanam | gṛdhrajambukasaṃvādaṃ yo vṛtto vaidiśe pure
हे पार्थ, एक पुरानी कथा सुनो: वैदिश नगर में हुआ गृध्र और सियार का वह संवाद।
श्लोक 3 (12.152.3)
कस्यचिद्ब्राह्मणस्यासीद्दुःखलब्धः सुतो मृतः । बाल एव विशालाक्षो बालग्रहनिपीडितः ॥
kasyacidbrāhmaṇasyāsīdduḥkhalabdhaḥ suto mṛtaḥ | bāla eva viśālākṣo bālagrahanipīḍitaḥ
एक ब्राह्मण का बड़े कष्ट से पाया हुआ पुत्र मर गया। वह अभी बालक ही था, बड़ी-बड़ी आँखोंवाला, बालकों को पकड़नेवाले ग्रहों की पीड़ा से ग्रस्त।
श्लोक 4 (12.152.4)
दुःखिताः केचिदादाय बालमप्राप्तयौवनम् । कुलसर्वस्वभूतं वै रुदन्तः शोककर्शिताः ॥
duḥkhitāḥ kecidādāya bālamaprāptayauvanam | kulasarvasvabhūtaṃ vai rudantaḥ śokakarśitāḥ
कुछ दुःखी स्वजन उस बालक को, जो अभी युवा नहीं हुआ था और कुल का सर्वस्व था, उठाकर रोते हुए और शोक से क्षीण होते हुए,
श्लोक 5 (12.152.5)
बालं मृतं गृहीत्वाऽथ श्मशानाभिमुखाः स्थिताः । अङ्गेनाङ्गं समाक्रम्य रुरुदुर्भृशदुःखिताः ॥
bālaṃ mṛtaṃ gṛhītvā'tha śmaśānābhimukhāḥ sthitāḥ | aṅgenāṅgaṃ samākramya rurudurbhṛśaduḥkhitāḥ
उस मृत बालक को लिये श्मशान की ओर मुँह करके खड़े हो गए, और अंग से अंग सटाकर अत्यन्त दुःख से रोने लगे।
श्लोक 6 (12.152.6)
शोचन्तस्तस्य पूर्वोक्तान्भाषितांश्चासकृत्पुनः । तं बालं भूतले क्षिप्य प्रतिगन्तुं न शक्नुयुः ॥
śocantastasya pūrvoktānbhāṣitāṃścāsakṛtpunaḥ | taṃ bālaṃ bhūtale kṣipya pratigantuṃ na śaknuyuḥ
उसकी पहले कही हुई बातों को बार-बार याद करके वे शोक करते रहे; बालक को भूमि पर रखकर भी वे लौट जाने का साहस नहीं जुटा पाए।
श्लोक 7 (12.152.7)
तेषां रुदितशब्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् । प्रेतात्मकमिमंकाले त्यक्त्वा गच्छत माचिरम् ॥
teṣāṃ ruditaśabdena gṛdhro'bhyetya vaco'bravīt | pretātmakamimaṃkāle tyaktvā gacchata māciram
उनके रोने की आवाज़ सुनकर एक गृध्र वहाँ आया और बोला, "इस मृत शरीर को अभी छोड़कर बिना देर किए चले जाओ।
श्लोक 8 (12.152.8)
इह पुंसां सहस्राणि स्त्रीसहस्राणि चैव ह । समानीतानि कालेन हित्वा वै यान्ति बान्धवाः ॥
iha puṃsāṃ sahasrāṇi strīsahasrāṇi caiva ha | samānītāni kālena hitvā vai yānti bāndhavāḥ
यहाँ काल हज़ारों पुरुषों और हज़ारों स्त्रियों को ले आया है; उन्हें छोड़कर उनके बन्धु चले ही जाते हैं।
श्लोक 9 (12.152.9)
संपश्यत जगत्सर्वं सुखदुःखैरधिष्ठितम् । संयोगो विप्रयोगश्च पर्यायेणोपलभ्यते ॥
saṃpaśyata jagatsarvaṃ sukhaduḥkhairadhiṣṭhitam | saṃyogo viprayogaśca paryāyeṇopalabhyate
सारे जगत् को देखो, यह सुख-दुःख के अधीन है; संयोग और वियोग बारी-बारी से मिलते हैं।
श्लोक 10 (12.152.10)
गृहीत्वा ये च गच्छन्ति येऽनुयान्ति च तान्मृतान् । तेऽप्यायुषः प्रमाणेन स्वेन गच्छन्ति जन्तवः ॥
gṛhītvā ye ca gacchanti ye'nuyānti ca tānmṛtān | te'pyāyuṣaḥ pramāṇena svena gacchanti jantavaḥ
जो मृतकों को उठा ले जाते हैं और जो उनके पीछे चलते हैं, वे प्राणी भी अपनी-अपनी आयु के परिमाण के अनुसार ही जाते हैं।
श्लोक 11 (12.152.11)
अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन्गृध्रगोमायुसंकुले । कङ्कालबहुले घोरे सर्वप्राणिभयंकरे ॥
alaṃ sthitvā śmaśāne'smingṛdhragomāyusaṃkule | kaṅkālabahule ghore sarvaprāṇibhayaṃkare
गृध्रों और सियारों से भरे, कंकालों से पटे, भयंकर और सब प्राणियों को डरानेवाले इस श्मशान में अब और ठहरना व्यर्थ है।
श्लोक 12 (12.152.12)
न पुनर्जीवितः कश्चित्कालधर्ममुपागतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ॥
na punarjīvitaḥ kaścitkāladharmamupāgataḥ | priyo vā yadi vā dveṣyaḥ prāṇināṃ gatirīdṛśī
कालधर्म को प्राप्त हुआ कोई भी फिर जीवित नहीं हुआ, चाहे वह प्रिय रहा हो या अप्रिय; प्राणियों की गति ऐसी ही है।
श्लोक 13 (12.152.13)
सर्वेण खलु मर्तव्यं मर्त्यलोके प्रसूयता । कृतान्तविहिते मार्गे मृतं को जीवयिष्यति ॥
sarveṇa khalu martavyaṃ martyaloke prasūyatā | kṛtāntavihite mārge mṛtaṃ ko jīvayiṣyati
मर्त्यलोक में जो भी जन्मा है, उसे अवश्य मरना है। कृतान्त (यम) के बनाए मार्ग पर मरे हुए को कौन जिलाएगा?
श्लोक 14 (12.152.14)
दिशान्तोपचितो यावदस्तं गच्छति भास्करः । गम्यतां स्वमधिष्ठानं सुतस्नेहं विसृज्य वै ॥
diśāntopacito yāvadastaṃ gacchati bhāskaraḥ | gamyatāṃ svamadhiṣṭhānaṃ sutasnehaṃ visṛjya vai
सूर्य दिशा के छोर तक पहुँचकर अस्त होने जा रहा है; पुत्र का मोह छोड़कर अपने घर लौट जाओ।"
श्लोक 15 (12.152.15)
ततो गृध्रवचः श्रुत्वा विक्रोशन्तस्तदा नृप । बान्धवास्तेऽभ्यगच्छन्त पुत्रमुत्सृज्य भूतले ॥
tato gṛdhravacaḥ śrutvā vikrośantastadā nṛpa | bāndhavāste'bhyagacchanta putramutsṛjya bhūtale
तब, हे राजन्, गृध्र की बात सुनकर बन्धु लोग विलाप करते हुए पुत्र को भूमि पर छोड़कर चल पड़े।
श्लोक 16 (12.152.16)
विनिश्चित्याथ च तदा विक्रोशन्तस्ततस्ततः । मृत इत्येव गच्छन्तो निराशास्तस्य दर्शने ॥
viniścityātha ca tadā vikrośantastatastataḥ | mṛta ityeva gacchanto nirāśāstasya darśane
निश्चय करके वे इधर-उधर बिलखते हुए, "वह मर चुका है" ऐसा सोचकर, उसे फिर देख पाने की आशा छोड़े हुए चले जा रहे थे।
श्लोक 17 (12.152.17)
निश्चितार्थाश्च ते सर्वे संत्यजन्तः स्वमात्मजम् । निराशा जीविते तस्य मार्गमावृत्य धिष्ठिताः ॥
niścitārthāśca te sarve saṃtyajantaḥ svamātmajam | nirāśā jīvite tasya mārgamāvṛtya dhiṣṭhitāḥ
इस निश्चय के साथ उन सबने अपने ही पुत्र को छोड़ दिया और उसके जीने की आशा त्यागकर मार्ग पकड़ लिया।
श्लोक 18 (12.152.18)
ध्वाङ्क्षपक्षसवर्णस्तु बिलान्निःसृत्य जम्बुकः । गच्छमानान्स्म तानाह निर्घृणाः खलु मानुषाः ॥
dhvāṅkṣapakṣasavarṇastu bilānniḥsṛtya jambukaḥ | gacchamānānsma tānāha nirghṛṇāḥ khalu mānuṣāḥ
तभी कौए के पंख के रंग का एक सियार अपने बिल से निकला और जाते हुए उन लोगों से बोला, "मनुष्य सचमुच बड़े निर्दयी होते हैं!
जम्बुक उवाच
श्लोक 19 (12.152.19)
आदित्योऽयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत मा भयम् । बहुरूपो मुहूर्ताच्च जीवेदपि च बालकः ॥
ādityo'yaṃ sthito mūḍhāḥ snehaṃ kuruta mā bhayam | bahurūpo muhūrtācca jīvedapi ca bālakaḥ
सूर्य अभी आकाश में है, मूर्खो! स्नेह करो, भय मत करो। रूप बदलते रहनेवाला यह बालक कुछ ही देर में जी भी सकता है।
श्लोक 20 (12.152.20)
दर्भान्भूमौ विनिक्षिप्य पुत्रस्नेहविनाकृताः । श्मशाने सुतमुत्सृज्य कस्माद्गच्छत निर्घृणाः ॥
darbhānbhūmau vinikṣipya putrasnehavinākṛtāḥ | śmaśāne sutamutsṛjya kasmādgacchata nirghṛṇāḥ
दर्भ बिछाकर, पुत्र-स्नेह से रहित होकर, अपने बेटे को श्मशान में छोड़कर, हे निर्दयो, तुम क्यों जा रहे हो?
श्लोक 21 (12.152.21)
न वोऽस्त्यस्मिन्सुते स्नेहो बाले मधुरभाषिणि । यस्य भाषितमात्रेण प्रसादमधिगच्छत ॥
na vo'styasminsute sneho bāle madhurabhāṣiṇi | yasya bhāṣitamātreṇa prasādamadhigacchata
तुम्हें इस बालक पर ज़रा भी स्नेह नहीं, जो मधुर बोलता था और जिसकी बात सुनते ही तुम प्रसन्न हो उठते थे।
श्लोक 22 (12.152.22)
न पश्यध्वं सुतस्नेहो यादृशः पशुपक्षिणाम् । न तेषां धारयित्वा तान्कश्चिदस्ति फलागमः ॥
na paśyadhvaṃ sutasneho yādṛśaḥ paśupakṣiṇām | na teṣāṃ dhārayitvā tānkaścidasti phalāgamaḥ
तुम देखते नहीं कि पशु-पक्षियों को अपने बच्चों से कितना स्नेह होता है; फिर भी उन्हें पालने से किसी को कोई फल नहीं मिलता।
श्लोक 23 (12.152.23)
चतुष्पात्पक्षिकीटानां प्राणिनां स्नेहसङ्गिनाम् । परलोकगतिस्थानां मुनियज्ञक्रियामिव ॥
catuṣpātpakṣikīṭānāṃ prāṇināṃ snehasaṅginām | paralokagatisthānāṃ muniyajñakriyāmiva
चौपाए, पक्षी और कीट स्नेह में बँधे प्राणी हैं; उनके लिए सन्तान को पालना मानो परलोक के लिए किया गया मुनि का यज्ञ-कर्म है।
श्लोक 24 (12.152.24)
तेषां पुत्राभिरामाणामिह लोके परत्र च । न गुणो दृश्यते कश्चित्प्रजाः संधारयन्ति च ॥
teṣāṃ putrābhirāmāṇāmiha loke paratra ca | na guṇo dṛśyate kaścitprajāḥ saṃdhārayanti ca
सन्तान में रमनेवाले उन प्राणियों को इस लोक में या परलोक में कोई लाभ दिखाई नहीं देता, फिर भी वे अपनी सन्तान को पालते हैं।
श्लोक 25 (12.152.25)
अपश्यतां प्रियान्पुत्रान्येषां शोको न तिष्ठति । न ते पोषणसंप्रीता मातापितर एव हि ॥
apaśyatāṃ priyānputrānyeṣāṃ śoko na tiṣṭhati | na te poṣaṇasaṃprītā mātāpitara eva hi
जिनके प्रिय पुत्र आँखों से ओझल हो जाते हैं, उनका शोक थमता नहीं; माता-पिता केवल भरण-पोषण पाकर सन्तुष्ट नहीं होते।
श्लोक 26 (12.152.26)
मानुषाणां कुतः स्नेहो येषां शोको न विद्यते । इमं कुलकरं पुत्रं त्यक्त्वा क्व नु गमिष्यथ ॥
mānuṣāṇāṃ kutaḥ sneho yeṣāṃ śoko na vidyate | imaṃ kulakaraṃ putraṃ tyaktvā kva nu gamiṣyatha
जिन्हें शोक होता ही नहीं, ऐसे मनुष्यों में स्नेह कहाँ? कुल चलानेवाले इस पुत्र को छोड़कर तुम कहाँ जाओगे?
श्लोक 27 (12.152.27)
चिरं मुञ्चत बाष्पं च चिरं स्नेहेन पश्यत । एवंविधानि हीष्टानि दुस्त्यजानि विशेषतः ॥
ciraṃ muñcata bāṣpaṃ ca ciraṃ snehena paśyata | evaṃvidhāni hīṣṭāni dustyajāni viśeṣataḥ
और देर तक आँसू बहाओ, और देर तक स्नेह से इसे देखो; ऐसे प्रियजन विशेष रूप से छोड़े नहीं जाते।
श्लोक 28 (12.152.28)
क्षीणस्याथाभिशस्तस्य श्मशानाभिमुखस्य च । बान्धवा यत्र तिष्ठन्ति तत्रान्यो नाधितिष्ठति ॥
kṣīṇasyāthābhiśastasya śmaśānābhimukhasya ca | bāndhavā yatra tiṣṭhanti tatrānyo nādhitiṣṭhati
जो क्षीण हो गया हो, अभागा हो और श्मशान की ओर मुँह किए हो, उसके पास केवल बन्धु ही ठहरते हैं; कोई और नहीं ठहरता।
श्लोक 29 (12.152.29)
सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वः स्नेहं च विन्दति । तिर्यग्योनिष्वपि संतां स्नेहं पश्यत यादृशम् ॥
sarvasya dayitāḥ prāṇāḥ sarvaḥ snehaṃ ca vindati | tiryagyoniṣvapi saṃtāṃ snehaṃ paśyata yādṛśam
सबको प्राण प्रिय हैं और सब स्नेह करते हैं; पशु-पक्षी योनियों में भी स्नेह कैसा होता है, यह देखो।
श्लोक 30 (12.152.30)
त्यक्त्वा कथं गच्छथेमं पद्मलोलायतेक्षणम् । यथा नवोद्वाहकृतं स्नानमाल्यविभूषितम् ॥
tyaktvā kathaṃ gacchathemaṃ padmalolāyatekṣaṇam | yathā navodvāhakṛtaṃ snānamālyavibhūṣitam
कमल-दल जैसे बड़े नेत्रोंवाले, नए विवाहित वर की भाँति स्नान करके मालाओं से सजे इस बालक को छोड़कर तुम कैसे जा सकते हो?"
भीष्म उवाच
श्लोक 31 (12.152.31)
जम्बुकस्य वचः श्रुत्वा कृपणं परिदेवतः । न्यवर्तन्त तदा सर्वे बालार्थं ते स्म मानुषाः ॥
jambukasya vacaḥ śrutvā kṛpaṇaṃ paridevataḥ | nyavartanta tadā sarve bālārthaṃ te sma mānuṣāḥ
सियार का करुण विलाप सुनकर वे सब मनुष्य बालक के लिए लौट आए।
गृध्र उवाच
श्लोक 32 (12.152.32)
अहो बत नृशंसेन जम्बुकेनाल्पमेधसा । क्षुद्रेणोक्ता हीनसत्वा मानुषाः किं निवर्तथ ॥
aho bata nṛśaṃsena jambukenālpamedhasā | kṣudreṇoktā hīnasatvā mānuṣāḥ kiṃ nivartatha
"हाय! एक क्रूर, मन्दबुद्धि, क्षुद्र सियार के कहने में आकर, हे निर्बल हृदयवाले मनुष्यो, तुम लौट क्यों रहे हो?
श्लोक 33 (12.152.33)
पञ्चभूतपरित्यक्तं शुष्कं काष्ठत्वमागतम् । कस्माच्छोचथ निश्चेष्टमात्मानं किं न शोचथ ॥
pañcabhūtaparityaktaṃ śuṣkaṃ kāṣṭhatvamāgatam | kasmācchocatha niśceṣṭamātmānaṃ kiṃ na śocatha
जिसे पंचभूतों ने त्याग दिया है, जो सूखकर काठ हो गया है, उस निश्चेष्ट शरीर के लिए क्यों शोक करते हो? अपने लिए शोक क्यों नहीं करते?
श्लोक 34 (12.152.34)
तपः कुरुत वै तीव्रं मुच्यध्वं येन किल्बिषात् । तपसा लभ्यते सर्वं विलापः किं करिष्यति ॥
tapaḥ kuruta vai tīvraṃ mucyadhvaṃ yena kilbiṣāt | tapasā labhyate sarvaṃ vilāpaḥ kiṃ kariṣyati
कठोर तप करो, जिससे पाप से छूट जाओ। तप से सब कुछ मिलता है; विलाप से क्या होगा?
श्लोक 35 (12.152.35)
अनिष्टानि न भाग्यानि जानीत स्वंस्वमात्मना । येन गच्छति बालोऽयं दत्त्वा शोकमनन्तकम् ॥
aniṣṭāni na bhāgyāni jānīta svaṃsvamātmanā | yena gacchati bālo'yaṃ dattvā śokamanantakam
जान लो कि अनिष्ट और सौभाग्य, दोनों अपने ही कर्म से आते हैं। उसी नियम से यह बालक अनन्त शोक देकर चला गया।
श्लोक 36 (12.152.36)
धनं गावः सुवर्णं च मणिरत्नमथापि च । अपत्यं च तपोमूलं तपो योगाच्च लभ्यते ॥
dhanaṃ gāvaḥ suvarṇaṃ ca maṇiratnamathāpi ca | apatyaṃ ca tapomūlaṃ tapo yogācca labhyate
धन, गायें, सोना, मणि-रत्न और सन्तान भी, ये सब तप में जड़ पकड़े हुए हैं और तप तथा योग से ही मिलते हैं।
श्लोक 37 (12.152.37)
यथा कृता च भूतेषु प्राप्यते सुखदुःखिता । गृहीत्वा जायते जन्तुर्दुःखानि च सुखानि च ॥
yathā kṛtā ca bhūteṣu prāpyate sukhaduḥkhitā | gṛhītvā jāyate janturduḥkhāni ca sukhāni ca
प्राणियों के प्रति जैसा आचरण किया हो, वैसा ही सुख-दुःख मिलता है। जीव अपने कर्मों को साथ लेकर, अपने दुःखों और सुखों के साथ जन्म लेता है।
श्लोक 38 (12.152.38)
न कर्मणा पितुः पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा । मार्गेणान्येन गच्छन्ति बद्धाः सुकृतदुष्कृतैः ॥
na karmaṇā pituḥ putraḥ pitā vā putrakarmaṇā | mārgeṇānyena gacchanti baddhāḥ sukṛtaduṣkṛtaiḥ
न पुत्र पिता के कर्म से चलता है, न पिता पुत्र के कर्म से; सब अपने-अपने पुण्य-पाप से बँधे अलग-अलग मार्ग से जाते हैं।
श्लोक 39 (12.152.39)
धर्मं चरत यत्नेन तथाऽधर्मान्निवर्तत । वर्तध्वं च यथाकालं दैवतेषु द्विजेषु च ॥
dharmaṃ carata yatnena tathā'dharmānnivartata | vartadhvaṃ ca yathākālaṃ daivateṣu dvijeṣu ca
यत्नपूर्वक धर्म का आचरण करो, अधर्म से हटो, और समय-समय पर देवताओं तथा ब्राह्मणों के प्रति उचित व्यवहार करो।
श्लोक 40 (12.152.40)
शोकं त्यजत दैन्यं च सुतस्नेहान्निवर्तत । त्यज्यतामयमाक्रोशस्ततः शीघ्रं निवर्तत ॥
śokaṃ tyajata dainyaṃ ca sutasnehānnivartata | tyajyatāmayamākrośastataḥ śīghraṃ nivartata
शोक और दीनता छोड़ो, पुत्र के मोह से हटो; यह चीख-पुकार छोड़ दो, फिर शीघ्र लौट चलो।
श्लोक 41 (12.152.41)
यत्करोति शुभं कर्म तथा कर्म सुदारुणम् । तत्कर्तैव समश्नाति बान्धवानां किमत्र ह ॥
yatkaroti śubhaṃ karma tathā karma sudāruṇam | tatkartaiva samaśnāti bāndhavānāṃ kimatra ha
जो कोई शुभ कर्म करता है या अत्यन्त कठोर कर्म, उसका फल कर्ता ही भोगता है; इसमें बन्धुओं का क्या भाग?
श्लोक 42 (12.152.42)
इह त्यक्त्वा न तिष्ठन्ति बान्धवा बान्धवं प्रियम् । स्नेहमुत्सृज्य गच्छन्ति बाष्पपूर्णाविलेक्षणाः ॥
iha tyaktvā na tiṣṭhanti bāndhavā bāndhavaṃ priyam | snehamutsṛjya gacchanti bāṣpapūrṇāvilekṣaṇāḥ
बन्धु अपने प्रिय बन्धु को यहाँ छोड़कर रुकते नहीं; वे स्नेह त्यागकर आँसू भरी आँखों से चले जाते हैं।
श्लोक 43 (12.152.43)
प्राज्ञो वा यदि वा मूर्खः सधनो निर्धनोऽपि वा । सर्वः कालवशं याति शुभाशुभसमन्वितः ॥
prājño vā yadi vā mūrkhaḥ sadhano nirdhano'pi vā | sarvaḥ kālavaśaṃ yāti śubhāśubhasamanvitaḥ
विद्वान् हो या मूर्ख, धनी हो या निर्धन, शुभ-अशुभ कर्मों से जुड़े हुए सब लोग काल के वश में जाते हैं।
श्लोक 44 (12.152.44)
किं करिष्यथ शोचित्वा मृतं किमनुशोचथ । सर्वस्य हि प्रभुः कालो धर्मतः समदर्शनः ॥
kiṃ kariṣyatha śocitvā mṛtaṃ kimanuśocatha | sarvasya hi prabhuḥ kālo dharmataḥ samadarśanaḥ
शोक करके क्या करोगे? मरे हुए के लिए क्यों रोते हो? काल सबका स्वामी है और धर्म के अनुसार सबको समान दृष्टि से देखता है।
श्लोक 45 (12.152.45)
यौवनस्थांश्च बालांश्च वृद्धान्गर्भगतानपि । सर्वानाविशते मृत्युरेवंभूतमिदं जगत् ॥
yauvanasthāṃśca bālāṃśca vṛddhāngarbhagatānapi | sarvānāviśate mṛtyurevaṃbhūtamidaṃ jagat
युवा, बालक, वृद्ध, यहाँ तक कि गर्भ में स्थित जीव भी, मृत्यु सबमें प्रवेश करती है; यह जगत् ऐसा ही है।"
जम्बुक उवाच
श्लोक 46 (12.152.46)
अहो मन्दीकृतः स्नेहो गृध्रेणेहाल्पबुद्धिना । पुत्रस्नेहाभिभूतानां युष्माकं शोचतां भृशम् ॥
aho mandīkṛtaḥ sneho gṛdhreṇehālpabuddhinā | putrasnehābhibhūtānāṃ yuṣmākaṃ śocatāṃ bhṛśam
"अहो! मन्दबुद्धि गृध्र ने तुम्हारा स्नेह ढीला कर दिया, जबकि तुम पुत्र-स्नेह से अभिभूत होकर इतना शोक कर रहे हो।
श्लोक 47 (12.152.47)
समैः सम्यक्प्रयुक्तैश्च वचनैर्हेतुदर्शनैः । सर्वमेतत्प्रपद्याशु कुरुध्वं वा विचारणां । यद्गच्छथ जलस्थानं स्नेहमुत्सृज्य दुस्त्यजम् ॥
samaiḥ samyakprayuktaiśca vacanairhetudarśanaiḥ | sarvametatprapadyāśu kurudhvaṃ vā vicāraṇāṃ | yadgacchatha jalasthānaṃ snehamutsṛjya dustyajam
सम, ठीक ढंग से कहे गए और हेतु दिखानेवाले वचनों के सहारे यह सब शीघ्र समझ लो, अथवा विचार कर लो: तुम छोड़ने में कठिन स्नेह को छोड़कर जल के पास जा रहे हो।
श्लोक 48 (12.152.48)
अहो पुत्रवियोगेन मृतशून्योपसेवनात् । क्रोशतां वा भृशं दुःखं विवत्सानां गवामिव ॥
aho putraviyogena mṛtaśūnyopasevanāt | krośatāṃ vā bhṛśaṃ duḥkhaṃ vivatsānāṃ gavāmiva
हाय! पुत्र के वियोग से और मृत, सूने शरीर के पास बैठने से जो कठोर दुःख होता है, वह बछड़ों से बिछड़ी चीखती गायों के दुःख जैसा है।
श्लोक 49 (12.152.49)
अद्य शोकं विजानामि मानुषाणां महीतले । स्नेहं हि कारणं कृत्वा ममाप्यश्रूण्यथापतन् ॥
adya śokaṃ vijānāmi mānuṣāṇāṃ mahītale | snehaṃ hi kāraṇaṃ kṛtvā mamāpyaśrūṇyathāpatan
आज मैं पृथ्वी पर मनुष्यों का शोक समझ गया। ऐसा स्नेह देखकर मेरी भी आँखों से आँसू गिर पड़े।
श्लोक 50 (12.152.50)
यत्नो हि सततं कार्यस्ततो दैवेन सिद्ध्यति । दैवं पुरुषकारश्च कृतान्तेनोपपद्यते ॥
yatno hi satataṃ kāryastato daivena siddhyati | daivaṃ puruṣakāraśca kṛtāntenopapadyate
प्रयत्न सदा करना चाहिए, तभी दैव के साथ मिलकर वह सिद्ध होता है; दैव और पुरुषार्थ दोनों कृतान्त के द्वारा ही सिद्ध होते हैं।
श्लोक 51 (12.152.51)
अनिर्वेदः सदा कार्यो निर्वेदाद्धि कुतः सुखम् । प्रयत्नात्प्राप्यते ह्यर्थः कस्माद्गच्छथ निर्दयम् ॥
anirvedaḥ sadā kāryo nirvedāddhi kutaḥ sukham | prayatnātprāpyate hyarthaḥ kasmādgacchatha nirdayam
निराश कभी न हो; निराशा से सुख कहाँ? प्रयत्न से ही लक्ष्य मिलता है। फिर तुम इतनी निर्दयता से क्यों जा रहे हो?
श्लोक 52 (12.152.52)
आत्ममांसोपवृत्तं च शरीरार्धमयीं तनुम् । पितॄणां वंशकर्तारं वने त्यक्त्वा क्व यास्यथ ॥
ātmamāṃsopavṛttaṃ ca śarīrārdhamayīṃ tanum | pitṝṇāṃ vaṃśakartāraṃ vane tyaktvā kva yāsyatha
अपने पिता के मांस से पला, पिता के आधे शरीर के समान यह तन, पितरों का वंश चलानेवाला, इसे वन में छोड़कर तुम कहाँ जाओगे?
श्लोक 53 (12.152.53)
अथवाऽस्तं गते सूर्ये संध्याकाल उपस्थिते । ततो नेष्यथ वा पुत्रमिहस्था वा भविष्यथ ॥
athavā'staṃ gate sūrye saṃdhyākāla upasthite | tato neṣyatha vā putramihasthā vā bhaviṣyatha
अथवा सूर्य के अस्त होने पर, सन्ध्या आने पर, तब तुम पुत्र को ले जाना, या यहीं रुके रहना।"
गृध्र उवाच
श्लोक 54 (12.152.54)
अद्य वर्षसहस्रं मे साग्रं जातस्य मानुषाः । न च पश्यामि जीवन्तं मृतं स्त्रीपुंनपुंसकम् ॥
adya varṣasahasraṃ me sāgraṃ jātasya mānuṣāḥ | na ca paśyāmi jīvantaṃ mṛtaṃ strīpuṃnapuṃsakam
"मनुष्यो! मुझे जन्मे पूरे एक हज़ार वर्ष से अधिक हो गए, और मैंने किसी मरे हुए पुरुष, स्त्री या नपुंसक को कभी जीवित होते नहीं देखा।
श्लोक 55 (12.152.55)
मृता गर्भेषु जायन्ते जातमात्रा म्रियन्ति च । चंक्रमन्तो म्रियन्ते च यौवनस्थास्तथा परे ॥
mṛtā garbheṣu jāyante jātamātrā mriyanti ca | caṃkramanto mriyante ca yauvanasthāstathā pare
कुछ गर्भ में ही मर जाते हैं, कुछ जन्म लेते ही मर जाते हैं, कुछ घिसटते-चलते मर जाते हैं, कुछ जवानी में और कुछ दूसरे समय।
श्लोक 56 (12.152.56)
अनित्यानीह भाग्यानि चतुष्पात्पक्षिणामपि । जङ्गमाजङ्गमानां च ह्यायुरग्रेऽवतिष्ठते ॥
anityānīha bhāgyāni catuṣpātpakṣiṇāmapi | jaṅgamājaṅgamānāṃ ca hyāyuragre'vatiṣṭhate
इस लोक में भाग्य अनित्य हैं, पशु-पक्षियों के भी; चर और अचर सभी प्राणियों के सामने उनकी आयु की सीमा खड़ी रहती है।
श्लोक 57 (12.152.57)
इष्टदारवियुक्ताश्च पुत्रशोकान्वितास्तथा । दह्यमानाः स्म शोकेन गृहं गच्छन्ति नित्यशः ॥
iṣṭadāraviyuktāśca putraśokānvitāstathā | dahyamānāḥ sma śokena gṛhaṃ gacchanti nityaśaḥ
प्रिय पत्नियों से बिछड़े और पुत्र-शोक से भरे लोग शोक की आग में जलते हुए रोज़ घर लौटते ही हैं।
श्लोक 58 (12.152.58)
अनिष्टानां सहस्राणि तथेष्टानां शतानि च । उत्सृज्येह प्रयाता वै बान्धवा भृशदुःखिताः ॥
aniṣṭānāṃ sahasrāṇi tatheṣṭānāṃ śatāni ca | utsṛjyeha prayātā vai bāndhavā bhṛśaduḥkhitāḥ
हज़ारों अप्रिय और सैकड़ों प्रिय जनों को यहीं छोड़कर बन्धु अत्यन्त दुःखी होकर चले गए हैं।
श्लोक 59 (12.152.59)
त्यज्यतामेष निस्तेजाः शून्यः काष्ठत्वमागतः । अन्यदेहविषक्तं हि शिशुं काष्ठमुपासथ ॥
tyajyatāmeṣa nistejāḥ śūnyaḥ kāṣṭhatvamāgataḥ | anyadehaviṣaktaṃ hi śiśuṃ kāṣṭhamupāsatha
इसे छोड़ दो; यह निस्तेज, सूना और काठ हो गया है। जिसकी चेतना दूसरे शरीर में जा लगी है, ऐसे शिशु-रूपी काठ की ही तुम सेवा कर रहे हो।
श्लोक 60 (12.152.60)
त्यक्तजीवस्य वै बाष्पं कस्माद्धित्वा न गच्छत । निरर्थको ह्ययं स्नेहो निष्फलश्च परिश्रमः ॥
tyaktajīvasya vai bāṣpaṃ kasmāddhitvā na gacchata | nirarthako hyayaṃ sneho niṣphalaśca pariśramaḥ
जिसके प्राण निकल गए, उसके लिए आँसू बहाकर उसे छोड़ तुम क्यों नहीं जाते? यह स्नेह निरर्थक है और परिश्रम निष्फल।
श्लोक 61 (12.152.61)
न चक्षुर्भ्यां न कर्णाभ्यां च शृणोति स पश्यति । कस्मादेनं समुत्सृज्य न गृहान्गच्छताशु वै ॥
na cakṣurbhyāṃ na karṇābhyāṃ ca śṛṇoti sa paśyati | kasmādenaṃ samutsṛjya na gṛhāngacchatāśu vai
वह न आँखों से देखता है, न कानों से सुनता है। इसे छोड़कर तुम तुरन्त घर क्यों नहीं चले जाते?
श्लोक 62 (12.152.62)
मोक्षधर्माश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिः सुनिष्ठुरैः । मयोक्ता गच्छत क्षिप्रं स्वं स्वमेव निवेशनम् ॥
mokṣadharmāśritairvākyairhetumadbhiḥ suniṣṭhuraiḥ | mayoktā gacchata kṣipraṃ svaṃ svameva niveśanam
मोक्ष-धर्म पर टिके, तर्कयुक्त और बहुत कठोर वचनों से मैंने तुम्हें समझाया है; अब शीघ्र अपने-अपने घर चले जाओ।
श्लोक 63 (12.152.63)
प्रज्ञाविज्ञानयुक्तेन बुद्धिसंज्ञाप्रदायिना । वचनं श्राविता नूनं मानुषाः संनिवर्तथ ॥
prajñāvijñānayuktena buddhisaṃjñāpradāyinā | vacanaṃ śrāvitā nūnaṃ mānuṣāḥ saṃnivartatha
प्रज्ञा और विज्ञान से युक्त, बुद्धि जगानेवाले मैंने तुम्हें अपनी बात सुना दी है; अब, मनुष्यो, लौट जाओ।
श्लोक 64 (12.152.64)
शोको द्विगुणतां याति दृष्ट्वा स्मृत्वा च चेष्टितम् । इत्येतद्वचनं श्रुत्वा सन्निवृत्तास्तु मानुषाः । अपश्यत्तं तदा सुप्तं द्रुतमागत्य जम्बुकः ॥
śoko dviguṇatāṃ yāti dṛṣṭvā smṛtvā ca ceṣṭitam | ityetadvacanaṃ śrutvā sannivṛttāstu mānuṣāḥ | apaśyattaṃ tadā suptaṃ drutamāgatya jambukaḥ
उसे देखकर और उसके आचरण को याद करके शोक दुगुना हो जाता है।" यह सुनकर वे लोग लौट पड़े; तब सियार ने जल्दी से आकर बालक को वहाँ सोया हुआ देखा।
जम्बुक उवाच
श्लोक 65 (12.152.65)
इमं कनकवर्णाभं भूषणैः समलंकृतम् । गृध्रवाक्यात्कथं पुत्रं त्यक्ष्यध्वं पितृपिण्डदम् ॥
imaṃ kanakavarṇābhaṃ bhūṣaṇaiḥ samalaṃkṛtam | gṛdhravākyātkathaṃ putraṃ tyakṣyadhvaṃ pitṛpiṇḍadam
"यह बालक सोने जैसी आभावाला है, गहनों से सजा हुआ है, और पितरों को पिण्ड देनेवाला है। गृध्र के कहने पर तुम इसे कैसे छोड़ दोगे?
श्लोक 66 (12.152.66)
न स्नेहस्य च विच्छेदो विलापरुदितस्य च । मृतस्यास्य परित्यागात्तापो वै भविता ध्रुवम् ॥
na snehasya ca vicchedo vilāparuditasya ca | mṛtasyāsya parityāgāttāpo vai bhavitā dhruvam
स्नेह का, और रोने-बिलखने का अन्त नहीं होता; इस मृतक को त्यागने से निश्चय ही तुम्हें जलता हुआ सन्ताप होगा।
श्लोक 67 (12.152.67)
श्रूयते शम्बुके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः । जीवितो धर्ममासाद्य रामात्सत्यपराक्रमात् ॥
śrūyate śambuke śūdre hate brāhmaṇadārakaḥ | jīvito dharmamāsādya rāmātsatyaparākramāt
सुना जाता है कि शूद्र शम्बूक के मारे जाने पर एक ब्राह्मण का बालक, सत्यपराक्रमी राम के द्वारा, धर्म के बल से जी उठा था।
श्लोक 68 (12.152.68)
तथा श्वैत्यस्य राजर्षेर्बालो दिष्टान्तमागतः । मुनिना धर्मनिष्ठेन मृतः संजीवितः पुनः ॥
tathā śvaityasya rājarṣerbālo diṣṭāntamāgataḥ | muninā dharmaniṣṭhena mṛtaḥ saṃjīvitaḥ punaḥ
इसी प्रकार राजर्षि श्वैत्य का पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गया था, तब एक धर्मनिष्ठ मुनि ने उसे फिर जिला दिया।
श्लोक 69 (12.152.69)
तथा कश्चिद्भवेत्सिद्धो मुनिर्वा देवतापि वा । कृपणानामनुक्रोशं कुर्याद्वो रुदतामिह ॥
tathā kaścidbhavetsiddho munirvā devatāpi vā | kṛpaṇānāmanukrośaṃ kuryādvo rudatāmiha
वैसे ही कोई सिद्ध मुनि, या कोई देवता भी, यहाँ रोते हुए तुम दीनों पर दया कर सकता है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 70 (12.152.70)
इत्युक्तास्ते न्यवर्तन्त शोकार्ताः पुत्रवत्सलाः । अङ्के शिरः समाधाय रुरुदुर्बहुविस्तरम् । तेषां रुदितशब्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ॥
ityuktāste nyavartanta śokārtāḥ putravatsalāḥ | aṅke śiraḥ samādhāya rurudurbahuvistaram | teṣāṃ ruditaśabdena gṛdhro'bhyetya vaco'bravīt
यह सुनकर शोक से व्याकुल और पुत्र पर स्नेह रखनेवाले वे लोग लौट आए, और बालक का सिर गोद में रखकर बहुत देर तक रोते रहे। उनके रोने की आवाज़ सुनकर गृध्र पास आया और बोला।
गृध्र उवाच
श्लोक 71 (12.152.71)
अश्रुपातपरिक्लिन्नः पाणिस्पर्शप्रपीडितः । धर्मराजप्रयोगाच्च दीर्घनिद्रां प्रवेशितः ॥
aśrupātapariklinnaḥ pāṇisparśaprapīḍitaḥ | dharmarājaprayogācca dīrghanidrāṃ praveśitaḥ
"आँसुओं से भीगा, हाथों के स्पर्श से पीड़ित यह बालक धर्मराज के विधान से दीर्घ निद्रा में पहुँचा दिया गया है।
श्लोक 72 (12.152.72)
तपसाऽपि हि संयुक्तो जनः कालेन हन्यते । सर्वस्नेहावसक्तानामिदं हि स्नेहवर्तनम् ॥
tapasā'pi hi saṃyukto janaḥ kālena hanyate | sarvasnehāvasaktānāmidaṃ hi snehavartanam
तप से युक्त मनुष्य भी समय आने पर मारा जाता है; स्नेह में आसक्त सब लोगों के लिए स्नेह का यही स्वरूप है।
श्लोक 73 (12.152.73)
बालवृद्धसहस्राणि सदा संत्यज्य बान्धवाः । दिनानि चैव रात्रीश्च दुःखं तिष्ठन्ति भूतले ॥
bālavṛddhasahasrāṇi sadā saṃtyajya bāndhavāḥ | dināni caiva rātrīśca duḥkhaṃ tiṣṭhanti bhūtale
बन्धु बालकों और वृद्धों के हज़ारों को सदा पीछे छोड़ते आए हैं, और दिन-रात भूमि पर बैठे दुःख भोगते रहते हैं।
श्लोक 74 (12.152.74)
अलं निर्बन्धमागत्य शोकस्य परिवारणम् । अप्रत्ययं कुतो ह्यस्य पुनरद्येह जीवितम् ॥
alaṃ nirbandhamāgatya śokasya parivāraṇam | apratyayaṃ kuto hyasya punaradyeha jīvitam
हठ पकड़कर शोक को अपने चारों ओर बनाए रखना बस करो। आज यहाँ इसके फिर जी उठने का विश्वास कहाँ से हो?
श्लोक 75 (12.152.75)
नैष जम्बुकवाक्येन पुनः प्राप्स्यति जीवितम् । मृतस्योत्सृष्टदेहस्य पुनर्देहो न विद्यते ॥
naiṣa jambukavākyena punaḥ prāpsyati jīvitam | mṛtasyotsṛṣṭadehasya punardeho na vidyate
यह सियार के कहने से फिर जीवन नहीं पाएगा। जिसने देह छोड़ दी, उस मृत की फिर देह नहीं होती।
श्लोक 76 (12.152.76)
नैव मूर्तिप्रदानेन जम्बुकस्य शतैरपि । न स जीवयितुं शक्यो बालो वर्षशतैरपि ॥
naiva mūrtipradānena jambukasya śatairapi | na sa jīvayituṃ śakyo bālo varṣaśatairapi
न शरीर देने से, न सियार की सैकड़ों बातों से, वह बालक सैकड़ों वर्षों में भी जिलाया नहीं जा सकता।
श्लोक 77 (12.152.77)
अथ रुद्रः कुमारो वा ब्रह्मा वा विष्णुरेव च । वरमस्मै प्रयच्छन्ति ततो जीवेदयं शिशुः ॥
atha rudraḥ kumāro vā brahmā vā viṣṇureva ca | varamasmai prayacchanti tato jīvedayaṃ śiśuḥ
यदि रुद्र, कुमार, ब्रह्मा या विष्णु इसे वर दें, तभी यह शिशु जी सकता है।
श्लोक 78 (12.152.78)
नैव बाष्पविमोक्षेण न वा श्वासकृतेन च । न दीर्घरुदितेनायं पुनर्जीवं गमिष्यति ॥
naiva bāṣpavimokṣeṇa na vā śvāsakṛtena ca | na dīrgharuditenāyaṃ punarjīvaṃ gamiṣyati
न आँसू बहाने से, न आहें भरने से, न देर तक रोने से यह फिर जीवित होगा।
श्लोक 79 (12.152.79)
अहं च क्रोष्टुकश्चैव यूयं ये चास्य बान्धवाः । धर्माधर्मौ गृहीत्वेह सर्वे वर्तामहेऽध्वनि ॥
ahaṃ ca kroṣṭukaścaiva yūyaṃ ye cāsya bāndhavāḥ | dharmādharmau gṛhītveha sarve vartāmahe'dhvani
मैं, यह सियार, और तुम इसके बन्धु: हम सब धर्म और अधर्म को साथ लिये इस मार्ग पर चलते हैं।
श्लोक 80 (12.152.80)
अप्रियं परुषं चापि परद्रोहं परस्त्रियम् । अधर्ममनृतं चैव दूरात्प्राज्ञो विवर्जयेत् ॥
apriyaṃ paruṣaṃ cāpi paradrohaṃ parastriyam | adharmamanṛtaṃ caiva dūrātprājño vivarjayet
अप्रिय और कठोर बात, दूसरों से द्रोह, परायी स्त्री, अधर्म और झूठ से ज्ञानी पुरुष दूर ही रहे।
श्लोक 81 (12.152.81)
धर्मं सत्यं श्रुतं न्याय्यं महतीं प्राणिनां दयाम् । अजिह्नत्वमशाठ्यं च यत्नतः परिमार्गत ॥
dharmaṃ satyaṃ śrutaṃ nyāyyaṃ mahatīṃ prāṇināṃ dayām | ajihnatvamaśāṭhyaṃ ca yatnataḥ parimārgata
धर्म, सत्य, शास्त्र-ज्ञान, न्याय, प्राणियों पर महती दया, सरलता और निश्छलता को यत्नपूर्वक खोजो।
श्लोक 82 (12.152.82)
मातरं पितरं वाऽपि बान्धवान्सुहृदस्तथा । जीवतो ये न पश्यन्ति तेषां धर्मविपर्ययः ॥
mātaraṃ pitaraṃ vā'pi bāndhavānsuhṛdastathā | jīvato ye na paśyanti teṣāṃ dharmaviparyayaḥ
जो माता, पिता, बन्धुओं और मित्रों की उनके जीते जी सुध नहीं लेते, उनका धर्म उलट जाता है।
श्लोक 83 (12.152.83)
यो न पश्यति चक्षुर्भ्यां नेङ्गते च कथंचन । तस्य निष्ठावसानान्ते रुदन्तः किं करिष्यथ ॥
yo na paśyati cakṣurbhyāṃ neṅgate ca kathaṃcana | tasya niṣṭhāvasānānte rudantaḥ kiṃ kariṣyatha
जो आँखों से कुछ नहीं देखता और किसी भी तरह हिलता-डुलता नहीं, उसके जीवन-मार्ग के अन्त पर तुम रो-रोकर क्या कर लोगे?"
भीष्म उवाच
श्लोक 84 (12.152.84)
इत्युक्तास्ते सुतं त्यक्त्वा भूमौ शोकपरिप्लुताः । दह्यमानाः सुतस्नेहात्प्रययुर्बान्धवा गृहम् ॥
ityuktāste sutaṃ tyaktvā bhūmau śokapariplutāḥ | dahyamānāḥ sutasnehātprayayurbāndhavā gṛham
यह सुनकर वे बन्धु पुत्र को भूमि पर छोड़, शोक में डूबे और पुत्र-स्नेह से जलते हुए घर चले गए।
जम्बुक उवाच
श्लोक 85 (12.152.85)
दारुणो मर्त्यलोकोऽयं सर्वप्राणिविनाशनः । इष्टबन्धुवियोगश्च तथेहाल्पं च जीवितम् ॥
dāruṇo martyaloko'yaṃ sarvaprāṇivināśanaḥ | iṣṭabandhuviyogaśca tathehālpaṃ ca jīvitam
"यह मर्त्यलोक भयंकर है, सब प्राणियों का नाश करनेवाला; यहाँ प्रियजनों और बन्धुओं का वियोग होता है और जीवन भी थोड़ा है।
श्लोक 86 (12.152.86)
बह्वलीकमसत्यं चाप्यतिवादाप्रियंवदम् । इमं प्रेक्ष्य पुनर्भावं दुःखशोकविवर्धनम् । न मे मानुषलोकोऽयं मुहूर्तमपि रोचते ॥
bahvalīkamasatyaṃ cāpyativādāpriyaṃvadam | imaṃ prekṣya punarbhāvaṃ duḥkhaśokavivardhanam | na me mānuṣaloko'yaṃ muhūrtamapi rocate
झूठ और छल से भरा, निन्दा और कठोर बोलनेवालों से भरा: दुःख और शोक को बढ़ानेवाले इस पुनर्जन्म को देखकर यह मनुष्य-लोक मुझे क्षण भर भी नहीं भाता।
श्लोक 87 (12.152.87)
अहो धिग्गृध्रवाक्येन यथैवाबुद्धयस्तथा । कथं गच्छथ निःस्नेहाः सुतस्नेहं विसृज्य च ॥
aho dhiggṛdhravākyena yathaivābuddhayastathā | kathaṃ gacchatha niḥsnehāḥ sutasnehaṃ visṛjya ca
धिक्कार है तुम्हें, जो मूर्खों की तरह गृध्र की बात मान बैठे! पुत्र का स्नेह छोड़कर तुम स्नेहहीन होकर कैसे जा रहे हो?
श्लोक 88 (12.152.88)
प्रदीप्ताः पुत्रशोकेन सन्निवर्तथ मानुषाः । श्रुत्वा गृध्रस्य वचनं पापस्येहाकृतात्मनः ॥
pradīptāḥ putraśokena sannivartatha mānuṣāḥ | śrutvā gṛdhrasya vacanaṃ pāpasyehākṛtātmanaḥ
पुत्र-शोक से जलते हुए भी, हे मनुष्यो, तुम उस पापी, अशिक्षित-चित्त गृध्र की बात सुनकर चले जा रहे हो!
श्लोक 89 (12.152.89)
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । सुखदुःखावृते लोके नास्ति सौख्यमनन्तकम् ॥
sukhasyānantaraṃ duḥkhaṃ duḥkhasyānantaraṃ sukham | sukhaduḥkhāvṛte loke nāsti saukhyamanantakam
सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख; सुख-दुःख से भरे इस लोक में कोई सुख अनन्त नहीं है।
श्लोक 90 (12.152.90)
इमं क्षितितले त्यक्त्वा बालं रूपसमन्वितम् । कुलशोभाकरं मूढाः पुत्रं त्यक्त्वा क्व यास्यथ ॥
imaṃ kṣititale tyaktvā bālaṃ rūpasamanvitam | kulaśobhākaraṃ mūḍhāḥ putraṃ tyaktvā kva yāsyatha
रूपवान्, कुल की शोभा इस बालक को पृथ्वी पर छोड़कर, मूर्खो, पुत्र को त्यागकर तुम कहाँ जाओगे?
श्लोक 91 (12.152.91)
रूपयौवनसंपन्नं द्योतमानमिव श्रिया । जीवन्तमेव पश्यामि मनसा नात्र संशयः ॥
rūpayauvanasaṃpannaṃ dyotamānamiva śriyā | jīvantameva paśyāmi manasā nātra saṃśayaḥ
रूप और यौवन से सम्पन्न, शोभा से दमकता हुआ: मैं तो उसे मन में जीवित ही देख रहा हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 92 (12.152.92)
विनाशेनास्य न हि वै सुखं प्राप्स्यथ मानुषाः । पुत्रशोकाभितप्तानां मृतमप्यद्य वः क्षमम् ॥
vināśenāsya na hi vai sukhaṃ prāpsyatha mānuṣāḥ | putraśokābhitaptānāṃ mṛtamapyadya vaḥ kṣamam
इसके नाश से, हे मनुष्यो, तुम्हें सुख नहीं मिलेगा। पुत्र-शोक से तपे हुए तुम्हारे लिए इसे मरा हुआ भी रखना ही उचित है।
श्लोक 93 (12.152.93)
दुःखसंभावनं कृत्वा धारयित्वा सुखं स्वयम् । त्यक्त्वा गमिष्यथ क्वाद्य समुत्सृज्याल्पबुद्धिवत् ॥
duḥkhasaṃbhāvanaṃ kṛtvā dhārayitvā sukhaṃ svayam | tyaktvā gamiṣyatha kvādya samutsṛjyālpabuddhivat
दुःख का भार सहकर और इसी में अपने सुख का आधार बनाकर, अब इसे त्यागकर अल्पबुद्धियों की तरह तुम कहाँ जाओगे?"
भीष्म उवाच
श्लोक 94 (12.152.94)
तथा धर्मविरोधेन प्रियमिथ्याभिधायिनाम् । श्मशानवासिना नित्यं रात्रिं मृगयता नृप ॥
tathā dharmavirodhena priyamithyābhidhāyinām | śmaśānavāsinā nityaṃ rātriṃ mṛgayatā nṛpa
इस प्रकार धर्म के विरुद्ध, पर प्रिय लगनेवाली झूठी बातें कहनेवाले, श्मशान में रहनेवाले और रात में शिकार करनेवाले उस सियार ने, हे राजन्,
श्लोक 95 (12.152.95)
ततो मध्यस्थतां नीता वचनैरमृतोपमैः । जम्बुकेन स्वकार्यार्थं बान्धवास्तत्र वारिताः ॥
tato madhyasthatāṃ nītā vacanairamṛtopamaiḥ | jambukena svakāryārthaṃ bāndhavāstatra vāritāḥ
अमृत जैसे वचनों से उन्हें दुविधा में डाल दिया और अपने स्वार्थ के लिए वहाँ बन्धुओं को रोक लिया।
गृध्र उवाच
श्लोक 96 (12.152.96)
अयं प्रेतसमाकीर्णो यक्षराक्षससेवितः । दारुणः काननोद्देशः कौशिकैरभिनादितः ॥
ayaṃ pretasamākīrṇo yakṣarākṣasasevitaḥ | dāruṇaḥ kānanoddeśaḥ kauśikairabhināditaḥ
"यह वन-प्रदेश प्रेतों से भरा, यक्षों और राक्षसों से सेवित और भयंकर है; यहाँ उल्लू चीख रहे हैं।
श्लोक 97 (12.152.97)
भीमः सुघोरश्च तथा नीलमेघसमप्रभः । अस्मिञ्शवं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥
bhīmaḥ sughoraśca tathā nīlameghasamaprabhaḥ | asmiñśavaṃ parityajya pretakāryāṇyupāsata
यह भीषण और अति घोर है, नीले मेघ जैसी आभावाला। शव को यहीं छोड़कर प्रेत-कर्म करो।
श्लोक 98 (12.152.98)
भानुर्यावन्न यात्यस्तं यावच्च विमला दिशः । तावदेनं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥
bhānuryāvanna yātyastaṃ yāvacca vimalā diśaḥ | tāvadenaṃ parityajya pretakāryāṇyupāsata
जब तक सूर्य अस्त नहीं होता और दिशाएँ निर्मल हैं, तब तक इसे छोड़कर प्रेत-कर्म करो।
श्लोक 99 (12.152.99)
नदन्ति परुषं श्येनाः शिवाः क्रोशन्ति दारुणम् । मृगेन्द्राः प्रतिनर्दन्ति रविरस्तं च गच्छति ॥
nadanti paruṣaṃ śyenāḥ śivāḥ krośanti dāruṇam | mṛgendrāḥ pratinardanti ravirastaṃ ca gacchati
बाज कठोर स्वर में बोल रहे हैं, सियारिनें भयंकर चीख रही हैं, सिंह गर्जन के उत्तर में गरज रहे हैं और सूर्य अस्त हो रहा है।
श्लोक 100 (12.152.100)
चिता धूमेन नीलेन संरज्यन्ते च पादपाः । श्मशाने च निराहाराः प्रतिनर्दन्ति देवताः ॥
citā dhūmena nīlena saṃrajyante ca pādapāḥ | śmaśāne ca nirāhārāḥ pratinardanti devatāḥ
चिताओं के नीले धुएँ से वृक्ष रँग गए हैं, और श्मशान में भूखे प्रेत गर्जन का उत्तर दे रहे हैं।
श्लोक 101 (12.152.101)
सर्वे विकृतदेहाश्चाप्यस्मिन्देशे सुदारुणे । युष्मान्प्रधर्षयिष्यन्ति विकृता मांसभोजिनः ॥
sarve vikṛtadehāścāpyasmindeśe sudāruṇe | yuṣmānpradharṣayiṣyanti vikṛtā māṃsabhojinaḥ
इस अत्यन्त भयंकर स्थान में विकृत देहवाले सब मांसभक्षी जीव तुम पर टूट पड़ेंगे।
श्लोक 102 (12.152.102)
क्रूरश्चायं वनोद्देशो भयमद्य भविष्यति । त्यज्यतां काष्ठभूतोऽयं मुच्यतां जाम्बुकं वचः ॥
krūraścāyaṃ vanoddeśo bhayamadya bhaviṣyati | tyajyatāṃ kāṣṭhabhūto'yaṃ mucyatāṃ jāmbukaṃ vacaḥ
यह वन-प्रदेश क्रूर है, आज भय आएगा। काठ जैसे हो गए इस शरीर को छोड़ दो और सियार की बात छोड़ दो।
श्लोक 103 (12.152.103)
यदि जम्बुकवाक्यानि निष्फलान्यनृतानि च । श्रोष्यथ भ्रष्टविज्ञानास्ततः सर्वे विनङ्क्ष्यथ ॥
yadi jambukavākyāni niṣphalānyanṛtāni ca | śroṣyatha bhraṣṭavijñānāstataḥ sarve vinaṅkṣyatha
यदि तुम सियार की निष्फल और झूठी बातें मानोगे, तो बुद्धि खोकर तुम सब नष्ट हो जाओगे।"
जम्बुक उवाच
श्लोक 104 (12.152.104)
स्थीयतां वो न भेतव्यं यावत्तपति भास्करः । तावदस्मिन्सुते स्नेहादनिर्वेदेन वर्तत ॥
sthīyatāṃ vo na bhetavyaṃ yāvattapati bhāskaraḥ | tāvadasminsute snehādanirvedena vartata
"ठहरो, तुम्हें डरना नहीं है। जब तक सूर्य तप रहा है, तब तक इस पुत्र के स्नेह में निराश हुए बिना यहीं रहो।
श्लोक 105 (12.152.105)
स्वैरं रुदन्तो विस्रब्धाश्चिरं स्नेहेन पश्यत । दारुणेऽस्मिन्वनोद्देशे भयं वो न भविष्यति ॥
svairaṃ rudanto visrabdhāściraṃ snehena paśyata | dāruṇe'sminvanoddeśe bhayaṃ vo na bhaviṣyati
निर्भय होकर जी भर रोओ, देर तक स्नेह से इसे देखो। इस भीषण वन-प्रदेश में तुम्हें कोई भय नहीं होगा।
श्लोक 106 (12.152.106)
अयं सौम्यो वनोद्देशः पितृणां निधनाकरः । स्थीयतां यावदादित्यः किंवः क्रव्यादभाषितैः ॥
ayaṃ saumyo vanoddeśaḥ pitṛṇāṃ nidhanākaraḥ | sthīyatāṃ yāvadādityaḥ kiṃvaḥ kravyādabhāṣitaiḥ
यह वन का सौम्य स्थान है, जहाँ पितर विश्राम करते हैं। जब तक सूर्य है, ठहरो; मांसभक्षी की बातों से तुम्हें क्या?
श्लोक 107 (12.152.107)
यदि गृध्रस्य वाक्यानि तीव्राणि रभसानि च । गृह्णीत मोहितात्मानः सुतो वो न भविष्यति ॥
yadi gṛdhrasya vākyāni tīvrāṇi rabhasāni ca | gṛhṇīta mohitātmānaḥ suto vo na bhaviṣyati
यदि तुम गृध्र की तीखी और उतावली बातें मान लोगे, मोहित मन के लोगो, तो तुम्हारा पुत्र नहीं बचेगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 108 (12.152.108)
गृध्रो नास्तमितेऽभ्येति तिष्ठेन्नक्तं च जम्बुकः । मृतस्य तं परिजनमूचतुस्तौ क्षुधान्वितौ ॥
gṛdhro nāstamite'bhyeti tiṣṭhennaktaṃ ca jambukaḥ | mṛtasya taṃ parijanamūcatustau kṣudhānvitau
सूर्यास्त के बाद गृध्र बाहर नहीं आता, जबकि सियार रात में भी टिका रहता है; इसलिए भूख से व्याकुल उन दोनों ने मृतक के परिजनों से बातें कीं।
श्लोक 109 (12.152.109)
स्वकार्यबद्धकक्षौ तौ राजन्गृध्रोऽथ जम्बुकः । क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ शास्त्रमालम्ब्य जल्पतः ॥
svakāryabaddhakakṣau tau rājangṛdhro'tha jambukaḥ | kṣutpipāsāpariśrāntau śāstramālambya jalpataḥ
हे राजन्, गृध्र और सियार, दोनों अपने-अपने स्वार्थ के लिए कमर कसे, भूख-प्यास से थके हुए, शास्त्र का सहारा लेकर बोलते रहे।
श्लोक 110 (12.152.110)
तयोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोर्मृगपतत्रिणोः । वाक्यैरमृतकल्पैस्तैः प्रतिष्ठन्ते व्रजन्ति च ॥
tayorvijñānaviduṣordvayormṛgapatatriṇoḥ | vākyairamṛtakalpaistaiḥ pratiṣṭhante vrajanti ca
ज्ञान के जाननेवाले उन दोनों, पशु और पक्षी, के अमृत जैसे वचनों से वे लोग कभी ठहर जाते और कभी आगे बढ़ते।
श्लोक 111 (12.152.111)
शोकदैन्यसमाविष्टा रुदन्तस्तस्थिरे तदा । स्वकार्यकुशलाभ्यां ते संभ्राम्यन्ते ह नैपुणात् ॥
śokadainyasamāviṣṭā rudantastasthire tadā | svakāryakuśalābhyāṃ te saṃbhrāmyante ha naipuṇāt
शोक और दीनता से भरे वे रोते हुए वहीं रुके रहे, और अपने-अपने काम में कुशल उन दोनों की चतुराई से भ्रम में पड़ गए।
श्लोक 112 (12.152.112)
तथा तयोर्विवदतोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोः । बान्धवानां स्थितानां चाप्युपातिष्ठत शंकरः ॥
tathā tayorvivadatorvijñānaviduṣordvayoḥ | bāndhavānāṃ sthitānāṃ cāpyupātiṣṭhata śaṃkaraḥ
इस प्रकार उन दोनों ज्ञानियों के विवाद के बीच वहाँ खड़े बन्धुओं के सामने शंकर प्रकट हुए।
श्लोक 113 (12.152.113)
देव्या प्रणोदितो देवः कारुण्यार्द्रीकृतेक्षणः । ततस्तानाह मनुजान्वरदोऽस्मीति शंकरः ॥
devyā praṇodito devaḥ kāruṇyārdrīkṛtekṣaṇaḥ | tatastānāha manujānvarado'smīti śaṃkaraḥ
देवी की प्रेरणा से, करुणा से भीगी आँखोंवाले देव ने उन मनुष्यों से कहा, "मैं वर देनेवाला हूँ।"
श्लोक 114 (12.152.114)
ते प्रत्यूचुरिदं वाक्यं दुःखिताः प्रणताः स्थिताः । एकपुत्रविहीनानां सर्वेषां जीवितार्थिनाम् । पुत्रस्य नो जीवदानाज्जीवितं दातुमर्हसि ॥
te pratyūcuridaṃ vākyaṃ duḥkhitāḥ praṇatāḥ sthitāḥ | ekaputravihīnānāṃ sarveṣāṃ jīvitārthinām | putrasya no jīvadānājjīvitaṃ dātumarhasi
दुःखी और नत होकर वे बोले, "हमारा एक ही पुत्र था जो चला गया, और हम सब जीना चाहते हैं। हमारे पुत्र को जीवन देकर आप हमें जीवन दीजिए।"
श्लोक 115 (12.152.115)
एवमुक्तः स भगवान्वारिपूर्णेन पाणिना । जीवं तस्मै कुमाराय प्रादाद्वर्षशतानि वै ॥
evamuktaḥ sa bhagavānvāripūrṇena pāṇinā | jīvaṃ tasmai kumārāya prādādvarṣaśatāni vai
ऐसा कहे जाने पर भगवान् ने जल से भरे हाथ से उस बालक को सौ वर्ष का जीवन दे दिया।
श्लोक 116 (12.152.116)
तथा गोमायुगृध्राभ्यां प्राददत्क्षुद्विनाशनम् । वरं पिनाकी भगवान्सर्वभूतहिते रतः ॥
tathā gomāyugṛdhrābhyāṃ prādadatkṣudvināśanam | varaṃ pinākī bhagavānsarvabhūtahite rataḥ
और सब प्राणियों के हित में लगे पिनाकधारी भगवान् ने सियार और गृध्र को भी भूख मिटानेवाला वर दिया।
श्लोक 117 (12.152.117)
ततः प्रणम्य ते देवं श्रेयोहर्षसमन्विताः । कृतकृत्याः सुसंहृष्टाः प्रातिष्ठन्त तदा विभो ॥
tataḥ praṇamya te devaṃ śreyoharṣasamanvitāḥ | kṛtakṛtyāḥ susaṃhṛṣṭāḥ prātiṣṭhanta tadā vibho
फिर देव को प्रणाम करके, कल्याण और हर्ष से भरे, कृतार्थ और अत्यन्त प्रसन्न होकर वे वहाँ से चले, हे विभो।
श्लोक 118 (12.152.118)
अनिर्वेदेन दीर्घेण निश्चयेन ध्रुवेण च । देवदेवप्रसादाच्च क्षिप्रं फलमवाप्यते ॥
anirvedena dīrgheṇa niścayena dhruveṇa ca | devadevaprasādācca kṣipraṃ phalamavāpyate
लम्बे अध्यवसाय, निश्चय की दृढ़ता और देवाधिदेव की कृपा से फल शीघ्र मिल जाता है।
श्लोक 119 (12.152.119)
पश्य दैवस्य संयोगं बान्धवानां च निश्चयम् । कृपणानां तु रुदतां कृतमश्रुप्रमार्जनम् ॥
paśya daivasya saṃyogaṃ bāndhavānāṃ ca niścayam | kṛpaṇānāṃ tu rudatāṃ kṛtamaśrupramārjanam
देखो, दैव का योग और बन्धुओं का निश्चय: दीन रोनेवालों के आँसू पोंछ दिए गए।
श्लोक 120 (12.152.120)
पश्य चाल्पेन कालेन निश्चयान्वेषणेन च । प्रसादं शंकरात्प्राप्य दुःखिताः सुखमाप्नुवन् ॥
paśya cālpena kālena niścayānveṣaṇena ca | prasādaṃ śaṃkarātprāpya duḥkhitāḥ sukhamāpnuvan
देखो, थोड़े ही समय में निश्चय और खोज के बल पर शंकर की कृपा पाकर वे दुःखी लोग सुखी हो गए।
श्लोक 121 (12.152.121)
ते विस्मिताः प्रहृष्टाश्च पुत्रसंजीवनात्पुनः । बभूवुर्भरतश्रेष्ठ प्रसादाच्छंकरस्य वै ॥
te vismitāḥ prahṛṣṭāśca putrasaṃjīvanātpunaḥ | babhūvurbharataśreṣṭha prasādācchaṃkarasya vai
हे भरतश्रेष्ठ, पुत्र के फिर जीवित हो जाने से वे शंकर की कृपा से विस्मित और अत्यन्त हर्षित हुए।
श्लोक 122 (12.152.122)
ततस्ते त्वरिता राजंस्त्यक्त्वा शोकं शिशूद्भवम् । विविशुः पुत्रमादाय नगरं हृष्टमानसाः ॥
tataste tvaritā rājaṃstyaktvā śokaṃ śiśūdbhavam | viviśuḥ putramādāya nagaraṃ hṛṣṭamānasāḥ
तब, हे राजन्, बालक से उपजे शोक को छोड़कर वे शीघ्रता से पुत्र को गोद में लिए हर्षित मन से नगर में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 123 (12.152.123)
एषा बुद्धिः समस्तानां चातुर्वर्ण्येन दर्शिता ॥
eṣā buddhiḥ samastānāṃ cāturvarṇyena darśitā
यही वह विवेक है जो चारों वर्णों के लिए, सबको दिखाया गया है।
श्लोक 124 (12.152.124)
धर्मार्थमोक्षसंयुक्तमितिहासं पुरातनम् । श्रुत्वा मनुष्यः सततमिहामुत्र प्रमोदते ॥
dharmārthamokṣasaṃyuktamitihāsaṃ purātanam | śrutvā manuṣyaḥ satatamihāmutra pramodate
धर्म, अर्थ और मोक्ष से युक्त इस पुरातन इतिहास को सुनकर मनुष्य इस लोक में और परलोक में सदा आनन्द पाता है।