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शान्ति पर्व · अध्याय 153

नारद द्वारा शाल्मलि वृक्ष की प्रशंसा

युधिष्ठिर पूछते हैं कि जो दुर्बल मनुष्य मूर्खतावश किसी बलवान् शत्रु से बैर बाँध बैठा हो और वह शत्रु उसे उखाड़ने आ जाए, तो वह क्या करे। भीष्म उत्तर में शाल्मलि वृक्ष और वायु का एक पुराना संवाद सुनाते हैं। हिमालय पर एक विशाल शाल्मलि खड़ा है, जिसकी छाया में हाथी, पक्षी, व्यापारी और तपस्वी विश्राम करते हैं। नारद उसे देखकर उसकी शोभा की प्रशंसा करते हैं और सोचते हैं कि कहीं वायु उसका मित्र तो नहीं, क्योंकि आँधी ने कभी उसे तोड़ा नहीं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.153.1)

बलिनः प्रत्यमित्रस्य नित्यमासन्नवर्तिनः । उपकारापकाराभ्यां समर्थस्योद्यतस्य च ॥

balinaḥ pratyamitrasya nityamāsannavartinaḥ | upakārāpakārābhyāṃ samarthasyodyatasya ca

मान लीजिए कोई बलवान् शत्रु है, जो सदा पास ही रहता है, जो उपकार और अपकार दोनों कर सकने में समर्थ है और प्रहार के लिए तैयार है।

श्लोक 2 (12.153.2)

मोहाद्विकत्थनामात्रैरसारोऽल्पबलो लघुः । वाग्भिरप्रतिरूपाभिरभिद्रुह्य पितामह ॥

mohādvikatthanāmātrairasāro'lpabalo laghuḥ | vāgbhirapratirūpābhirabhidruhya pitāmaha

और पितामह, मान लीजिए कि कोई निःसार, हलका और अल्प बल वाला मनुष्य मोहवश केवल डींग हाँककर और अनुचित वचनों से उस शत्रु से द्रोह कर बैठा है।

श्लोक 3 (12.153.3)

आत्मनो बलमास्थाय कथं वर्तेत मानवः । आगच्छतोऽतिक्रुद्धस्य तस्योद्धरणकाम्यया ॥

ātmano balamāsthāya kathaṃ varteta mānavaḥ | āgacchato'tikruddhasya tasyoddharaṇakāmyayā

तब वह मनुष्य अपने बल का आश्रय लेकर कैसा व्यवहार करे, जब वह अत्यन्त क्रुद्ध शत्रु उसे उखाड़ फेंकने की इच्छा से उस पर चढ़ आए?

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (12.153.4)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं भरतश्रेष्ठ शाल्मलेः पवनस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | saṃvādaṃ bharataśreṣṭha śālmaleḥ pavanasya ca

हे भरतश्रेष्ठ, इस विषय में लोग एक प्राचीन कथा कहते हैं: शाल्मलि वृक्ष और वायु का संवाद।

श्लोक 5 (12.153.5)

हिमवन्तं समासाद्य महानासीद्वनस्पतिः । वर्षपूगाभिसंवृद्धः शाखामूलपलाशवान् ॥

himavantaṃ samāsādya mahānāsīdvanaspatiḥ | varṣapūgābhisaṃvṛddhaḥ śākhāmūlapalāśavān

हिमालय पर पहुँचकर वहाँ एक विशाल वृक्ष खड़ा था, जो बहुत वर्षों में बढ़ा था और शाखाओं, जड़ों और पत्तों से भरा था।

श्लोक 6 (12.153.6)

तत्र स्म मत्तमातङ्गा घर्मार्ताः श्रमकर्शिताः । विश्राम्यन्ति महाबाहो तथाऽन्या मृगजातयः ॥

tatra sma mattamātaṅgā gharmārtāḥ śramakarśitāḥ | viśrāmyanti mahābāho tathā'nyā mṛgajātayaḥ

हे महाबाहो, धूप से तपे और थकान से शिथिल मदमत्त हाथी वहाँ विश्राम किया करते थे, और दूसरे जाति-जाति के पशु भी।

श्लोक 7 (12.153.7)

नल्वमात्रपरीणाहो घनच्छायो वनस्पतिः । शुकशारिकसंघुष्टः पुष्पवान्फलवानपि ॥

nalvamātraparīṇāho ghanacchāyo vanaspatiḥ | śukaśārikasaṃghuṣṭaḥ puṣpavānphalavānapi

वह वनस्पति एक नल्व (चार सौ हाथ) के घेरे का था, उसकी छाया घनी थी, तोतों और मैनाओं के कलरव से वह गूँजता रहता था, और फूलों तथा फलों दोनों से लदा था।

श्लोक 8 (12.153.8)

सार्थका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकसः । वसन्ति तत्र मार्गस्थाः सुरम्ये नगसत्तमे ॥

sārthakā vaṇijaścāpi tāpasāśca vanaukasaḥ | vasanti tatra mārgasthāḥ suramye nagasattame

मार्ग पर चलने वाले काफिले, व्यापारी, तपस्वी और वनवासी उस रमणीय श्रेष्ठ वृक्ष के नीचे ठहरा करते थे।

श्लोक 9 (12.153.9)

तस्य ता विपुलाः शाखा दृष्ट्वा स्कन्धं च सर्वशः । अभिगम्याब्रवीदेनं नारदो भरतर्षभ ॥

tasya tā vipulāḥ śākhā dṛṣṭvā skandhaṃ ca sarvaśaḥ | abhigamyābravīdenaṃ nārado bharatarṣabha

हे भरतर्षभ, उसकी विशाल शाखाओं और चारों ओर फैले तने को देखकर नारद उसके पास गए और उससे बोले।

नारद उवाच

श्लोक 10 (12.153.10)

अहो नु रमणीयस्त्वमहो चासि मनोहरः । प्रीयामहे त्वया नित्यं तरुप्रवर शाल्मके ॥

aho nu ramaṇīyastvamaho cāsi manoharaḥ | prīyāmahe tvayā nityaṃ tarupravara śālmake

अहो, तुम कितने रमणीय और कितने मनोहर हो! हे वृक्षश्रेष्ठ शाल्मलि, हम तुमसे सदा प्रसन्न रहते हैं।

श्लोक 11 (12.153.11)

सदैव शकुनास्तात मृगाश्चाथ तथा गजाः । वसन्ति तव संहृष्टा मनोहरतरास्तथा ॥

sadaiva śakunāstāta mṛgāścātha tathā gajāḥ | vasanti tava saṃhṛṣṭā manoharatarāstathā

हे तात, पक्षी, मृग और हाथी सदा तुम्हारे पास प्रसन्न होकर रहते हैं, और इसी से वे और भी मनोहर लगते हैं।

श्लोक 12 (12.153.12)

तव शाखा महाशाख स्कन्धांश्च विपुलांस्तथा । न वै प्रभग्नान्पश्यामि मारुतेन कथंचन ॥

tava śākhā mahāśākha skandhāṃśca vipulāṃstathā | na vai prabhagnānpaśyāmi mārutena kathaṃcana

हे महाशाख, मैं तुम्हारी शाखाओं और तुम्हारे विशाल तने को वायु से कभी टूटा हुआ नहीं देखता।

श्लोक 13 (12.153.13)

किंनु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत् । त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम् ॥

kiṃnu te pavanastāta prītimānathavā suhṛt | tvāṃ rakṣati sadā yena vane'tra pavano dhruvam

हे तात, क्या वायु तुम पर प्रीति रखता है या तुम्हारा मित्र है? निश्चय ही इसी कारण वायु इस वन में तुम्हारी सदा रक्षा करता है।

श्लोक 14 (12.153.14)

भगवान्पवनः स्थानाद्वृक्षानुच्चावचानपि । पर्वतानां च शिखराण्याचालयति वेगवान् ॥

bhagavānpavanaḥ sthānādvṛkṣānuccāvacānapi | parvatānāṃ ca śikharāṇyācālayati vegavān

क्योंकि भगवान् वायु अपने वेग से छोटे-बड़े वृक्षों को उनके स्थान से हिला देता है और पर्वतों की चोटियों को भी डिगा देता है।

श्लोक 15 (12.153.15)

शोषयत्येव पातालं वहन्गन्धवहः शुचिः । सरांसि सरितश्चैव सागरांश्च तथैव च ॥

śoṣayatyeva pātālaṃ vahangandhavahaḥ śuciḥ | sarāṃsi saritaścaiva sāgarāṃśca tathaiva ca

गन्ध ढोने वाला वह पवित्र वायु बहते-बहते पाताल तक को सुखा देता है, और सरोवरों, नदियों तथा समुद्रों को भी।

श्लोक 16 (12.153.16)

संरक्षति त्वां पवनः सखित्वेन न संशयः । तस्मात्त्वं बहुशाखोऽपि पर्णवान्पुष्पवानपि ॥

saṃrakṣati tvāṃ pavanaḥ sakhitvena na saṃśayaḥ | tasmāttvaṃ bahuśākho'pi parṇavānpuṣpavānapi

निःसन्देह वायु मित्रता के कारण तुम्हारी रक्षा करता है; इसीलिए तुम बहुत शाखाओं वाले होकर भी पत्तों और फूलों से भरे हो।

श्लोक 17 (12.153.17)

इदं च रमणीयं ते प्रतिभाति वनस्पते । य इमे विहगास्तात रमन्ते मुदितास्त्वयि ॥

idaṃ ca ramaṇīyaṃ te pratibhāti vanaspate | ya ime vihagāstāta ramante muditāstvayi

हे वनस्पते, तुम्हारी यह बात भी बड़ी सुन्दर लगती है कि ये पक्षी, हे तात, तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 18 (12.153.18)

एषां पृथक्समस्तानां श्रूयते मधुरस्वरः । पुष्पसंमोदने काले वाशन्ते हरियूथपाः ॥

eṣāṃ pṛthaksamastānāṃ śrūyate madhurasvaraḥ | puṣpasaṃmodane kāle vāśante hariyūthapāḥ

फूलों के आनन्द के उस समय में इन सबके मधुर स्वर अलग-अलग और एक साथ सुनाई देते हैं, और वानरों के यूथपति भी पुकारते हैं।

श्लोक 19 (12.153.19)

तथेमे गर्जिता नागाः स्वयूथगणशोभिताः । घर्मार्तास्त्वां समासाद्य सुखं विन्दति शाल्मके ॥

tatheme garjitā nāgāḥ svayūthagaṇaśobhitāḥ | gharmārtāstvāṃ samāsādya sukhaṃ vindati śālmake

इसी प्रकार गरजते हुए ये हाथी, जो अपने यूथों से शोभित हैं और धूप से तपे हुए हैं, हे शाल्मलि, तुम्हारे पास आकर सुख पाते हैं।

श्लोक 20 (12.153.20)

तथैव मृगजातीभिरन्याभिरभिशोभसे । तथा सार्थाधिवासैश्च शोभसे मेरुवद्द्रुम् ॥

tathaiva mṛgajātībhiranyābhirabhiśobhase | tathā sārthādhivāsaiśca śobhase meruvaddrum

इसी तरह तुम दूसरी जाति के पशुओं से सुशोभित हो, और काफिलों के पड़ावों से तुम मेरु के समान शोभा पाते हो, हे वृक्ष।

श्लोक 21 (12.153.21)

ब्राह्मणैश्च तपः सिद्धैस्तापसैः श्रमणैस्तथा । त्रिविष्टपसमं मन्ये तवायतनमेव हि ॥

brāhmaṇaiśca tapaḥ siddhaistāpasaiḥ śramaṇaistathā | triviṣṭapasamaṃ manye tavāyatanameva hi

तपस्या से सिद्ध ब्राह्मणों, तपस्वियों और श्रमणों से भरा तुम्हारा यह निवास मुझे स्वर्ग के समान ही लगता है।

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