शान्ति पर्व · अध्याय 154
शाल्मलि का वायु के विरुद्ध अहंकार
नारद शाल्मलि से पूछते हैं कि वायु उसे कभी तोड़ता क्यों नहीं, क्या इसका कारण नाता या मित्रता है। शाल्मलि अभिमान से किसी भी सम्बन्ध से इनकार करता है, अपना बल वायु से अधिक बताता है और कहता है कि उसने वायु को अनेक बार तोड़ा है। नारद उसे बताते हैं कि बल में वायु की बराबरी कोई नहीं कर सकता, बड़े-बड़े देवता भी नहीं, और बलवान् से बलवान् वृक्ष भी वायु का आदर करते हैं। उसके व्यर्थ गर्व से रुष्ट होकर वे कहते हैं कि वे वायु के पास जाकर उसकी बातें कह देंगे।
नारद उवाच
श्लोक 1 (12.154.1)
बन्धुत्वादथवा सख्याच्छाल्मले नात्र संशयः । कस्मात्त्वां रक्षते नित्यं भीमः सर्वत्रगोऽनिलः ॥
bandhutvādathavā sakhyācchālmale nātra saṃśayaḥ | kasmāttvāṃ rakṣate nityaṃ bhīmaḥ sarvatrago'nilaḥ
हे शाल्मलि, निःसन्देह यह नाते अथवा मित्रता के कारण ही होगा। नहीं तो भयंकर और सर्वत्र चलने वाला वायु सदा तुम्हारी रक्षा क्यों करता है?
श्लोक 2 (12.154.2)
तद्भावं परमं वायोः शाल्मके त्वमुपागतः । तवाहमस्मीति सदा येन रक्षति मारुतः ॥
tadbhāvaṃ paramaṃ vāyoḥ śālmake tvamupāgataḥ | tavāhamasmīti sadā yena rakṣati mārutaḥ
हे शाल्मलि, तुमने वायु का परम भाव पा लिया है, इसीलिए "मैं तुम्हारा हूँ" कहकर वायु सदा तुम्हारी रक्षा करता है।
श्लोक 3 (12.154.3)
न तं पश्याम्यहं वृक्षं पर्वतं वेश्म चेदृशम् । यं न वायुबलाद्भग्नं पृथिव्यामिति मे मतिः ॥
na taṃ paśyāmyahaṃ vṛkṣaṃ parvataṃ veśma cedṛśam | yaṃ na vāyubalādbhagnaṃ pṛthivyāmiti me matiḥ
मैं पृथ्वी पर ऐसा कोई वृक्ष, पर्वत या भवन नहीं देखता जिसे वायु के बल ने न तोड़ा हो; यही मेरी धारणा है।
श्लोक 4 (12.154.4)
त्वं पुनः कारणैर्नूनं रक्ष्यसे शाल्मले यथा । वायुना सपरीवारस्तेन तिष्ठस्यसंशयम् ॥
tvaṃ punaḥ kāraṇairnūnaṃ rakṣyase śālmale yathā | vāyunā saparīvārastena tiṣṭhasyasaṃśayam
परन्तु हे शाल्मलि, तुम निश्चय ही किन्हीं कारणों से रक्षित हो; इसी से तुम अपने समस्त परिवार सहित, निःसन्देह, खड़े हो।
शाल्मलिरुवाच
श्लोक 5 (12.154.5)
न मे वायुः सखा ब्रह्मन्न बन्धुर्मम नारद । चिरं मे प्रीयते नैव येन मां रक्षतेऽनिलः ॥
na me vāyuḥ sakhā brahmanna bandhurmama nārada | ciraṃ me prīyate naiva yena māṃ rakṣate'nilaḥ
हे ब्रह्मन्, वायु न मेरा मित्र है, न बन्धु है, हे नारद; और मेरे प्रति उसकी कोई चिरकाल की प्रीति भी नहीं है कि वह मेरी रक्षा करे।
श्लोक 6 (12.154.6)
मम तेजोबलं भीमं वायोरपि हि नारद । कलामष्टादशीं प्राणैर्न मे प्राप्नोति मारुतः ॥
mama tejobalaṃ bhīmaṃ vāyorapi hi nārada | kalāmaṣṭādaśīṃ prāṇairna me prāpnoti mārutaḥ
हे नारद, मेरा तेज और बल वायु के सामने भी भयंकर है; वायु मेरे प्राणबल की अठारहवीं कला को भी नहीं पहुँचता।
श्लोक 7 (12.154.7)
आगच्छन्परुषो वायुर्मया विष्टम्भितो बलात् । भञ्जन्द्रुमान्पर्वतांश्च यच्चान्यत्स्थाणुजङ्गमम् ॥
āgacchanparuṣo vāyurmayā viṣṭambhito balāt | bhañjandrumānparvatāṃśca yaccānyatsthāṇujaṅgamam
जब प्रचण्ड वायु आता है और वृक्षों, पर्वतों तथा अन्य सब स्थावर-जंगम को तोड़ता चलता है, तब मैं बल से उसे रोक लेता हूँ।
श्लोक 8 (12.154.8)
स मया बहुशो भग्नः प्रभञ्जन्वै प्रभञ्जनः । तस्मान्न विभ्ये देवर्षे क्रुद्धादपि समीरणात् ॥
sa mayā bahuśo bhagnaḥ prabhañjanvai prabhañjanaḥ | tasmānna vibhye devarṣe kruddhādapi samīraṇāt
तोड़ने वाला वायु भी मेरे द्वारा अनेक बार तोड़ा गया है। इसलिए हे देवर्षि, मैं क्रोधित वायु से भी नहीं डरता।
नारद उवाच
श्लोक 9 (12.154.9)
शाल्मले विपरीतं ते दर्शनं नात्र संशयः । न हि वायोर्बलेनास्ति भूतं तुल्यबलं क्वचित् ॥
śālmale viparītaṃ te darśanaṃ nātra saṃśayaḥ | na hi vāyorbalenāsti bhūtaṃ tulyabalaṃ kvacit
हे शाल्मलि, निःसन्देह तुम्हारी दृष्टि उलटी है; बल में वायु के समान कोई प्राणी कहीं नहीं है।
श्लोक 10 (12.154.10)
इन्द्रो यमो वैश्रवणो वरुणश्च जलेश्वरः । नैतेऽपि तुल्या मरुतः किं पुनस्त्वं वनस्पते ॥
indro yamo vaiśravaṇo varuṇaśca jaleśvaraḥ | naite'pi tulyā marutaḥ kiṃ punastvaṃ vanaspate
इन्द्र, यम, वैश्रवण और जलों के स्वामी वरुण भी मरुतों के समान नहीं हैं; फिर हे वनस्पते, तुम्हारी तो बात ही क्या?
श्लोक 11 (12.154.11)
यश्च कश्चिदपि प्राणी चेष्टते शाल्मले भुवि । सर्वत्र भगवान्वायुश्चेष्टाप्राणकरः प्रभुः ॥
yaśca kaścidapi prāṇī ceṣṭate śālmale bhuvi | sarvatra bhagavānvāyuśceṣṭāprāṇakaraḥ prabhuḥ
हे शाल्मलि, इस पृथ्वी पर जो कोई भी प्राणी हिलता-डोलता है, उसमें सर्वत्र भगवान् समर्थ वायु ही चेष्टा और प्राण का देने वाला है।
श्लोक 12 (12.154.12)
एष चेष्टयते सम्यक्प्राणिनः सम्यगायतः । असम्यगायतो भूयश्चेष्टते विकृतं नृषु ॥
eṣa ceṣṭayate samyakprāṇinaḥ samyagāyataḥ | asamyagāyato bhūyaśceṣṭate vikṛtaṃ nṛṣu
वह जब ठीक ढंग से नियन्त्रित रहता है, तब प्राणियों को ठीक चलाता है; और जब ठीक नियन्त्रित नहीं रहता, तब वह मनुष्यों में विकृत चेष्टाएँ उत्पन्न करता है।
श्लोक 13 (12.154.13)
स त्वमेवंविधं वायुं सर्वसत्वभृतां वरम् । न पूजयसि पूज्यं तं किमन्यद्बुद्धिलाघवात् ॥
sa tvamevaṃvidhaṃ vāyuṃ sarvasatvabhṛtāṃ varam | na pūjayasi pūjyaṃ taṃ kimanyadbuddhilāghavāt
इस प्रकार का वायु समस्त प्राणधारियों में श्रेष्ठ है; फिर भी तुम उस पूजनीय की पूजा नहीं करते। बुद्धि की हलकाई के सिवा इसका और क्या कारण है?
श्लोक 14 (12.154.14)
असारश्चापि दुर्मेधाः केवलं बहु भाषसे । क्रोधादिभिरवच्छन्नो मिथ्या वदसि शाल्मले ॥
asāraścāpi durmedhāḥ kevalaṃ bahu bhāṣase | krodhādibhiravacchanno mithyā vadasi śālmale
तुम निःसार और दुर्बुद्धि हो, केवल बहुत बकते हो; क्रोध आदि से ढके हुए तुम, हे शाल्मलि, झूठ बोलते हो।
श्लोक 15 (12.154.15)
मम रोषः समुत्पन्नस्त्वय्येवं संप्रभाषति । ब्रवीम्येष स्वयं वायोस्तव दुर्भाषितं बहु ॥
mama roṣaḥ samutpannastvayyevaṃ saṃprabhāṣati | bravīmyeṣa svayaṃ vāyostava durbhāṣitaṃ bahu
तुम्हारे ऐसा बोलने पर मुझे क्रोध उत्पन्न हो गया है, इसलिए मैं स्वयं वायु से तुम्हारे बहुत से दुर्वचन कह दूँगा।
श्लोक 16 (12.154.16)
चन्दनैः स्यन्दनैः शालैः सरलैर्देवदारुभिः । वेतसैर्धन्वनैश्चापि ये चान्ये बलवत्तराः । तैश्चापि नैवं दुर्बुद्धे क्षिप्तो वायुः कृतात्मभिः ॥
candanaiḥ syandanaiḥ śālaiḥ saralairdevadārubhiḥ | vetasairdhanvanaiścāpi ye cānye balavattarāḥ | taiścāpi naivaṃ durbuddhe kṣipto vāyuḥ kṛtātmabhiḥ
चन्दन, स्यन्दन, साल, सरल, देवदारु, बेंत और धन्वन के वृक्ष, तथा और जो इनसे भी बलवान् हैं, उन संयमी वृक्षों ने भी, हे दुर्बुद्धि, वायु को इस प्रकार नहीं ललकारा।
श्लोक 17 (12.154.17)
तेऽपि जानन्ति वायोश्च बलमात्मन एव च । तस्मात्ते नावमन्यन्ते श्वसनं तरुसत्तमाः ॥
te'pi jānanti vāyośca balamātmana eva ca | tasmātte nāvamanyante śvasanaṃ tarusattamāḥ
वे भी वायु का बल और अपना बल जानते हैं; इसीलिए वे श्रेष्ठ वृक्ष वायु का अनादर नहीं करते।
श्लोक 18 (12.154.18)
त्वं तु मोहान्न जानीषे वायोर्बलमनन्तकम् । एवं तस्माद्गमिष्यामि सकाशं मातरिश्वनः ॥
tvaṃ tu mohānna jānīṣe vāyorbalamanantakam | evaṃ tasmādgamiṣyāmi sakāśaṃ mātariśvanaḥ
परन्तु तुम मोह के कारण वायु के अनन्त बल को नहीं जानते। इसलिए मैं मातरिश्वा वायु के पास जाऊँगा।