शान्ति पर्व · अध्याय 155
वायु द्वारा शाल्मलि का मान-भंग
नारद शाल्मलि के अपमानजनक वचन वायु को सुना देते हैं। वायु क्रुद्ध होकर वृक्ष के पास जाता है और अगले दिन अपना बल दिखाने की प्रतिज्ञा करता है। शाल्मलि जानता है कि वह बल में वायु की बराबरी नहीं कर सकता, इसलिए बुद्धि से काम लेता है और रात में स्वयं अपनी शाखाएँ, पत्ते और फूल झाड़ देता है। वायु आकर उसे उजड़ा देखता है तो उसका उपहास करता है, और शाल्मलि लज्जित हो जाता है। भीष्म इससे शिक्षा निकालते हैं कि दुर्बल को बलवान् से बैर नहीं करना चाहिए और बुद्धि सबसे बड़ा बल है। अन्त में वे युधिष्ठिर को याद दिलाते हैं कि अर्जुन ने अकेले अठारह अक्षौहिणी सेना को परास्त किया, और राजधर्म तथा आपद्धर्म का उपदेश यहीं पूरा करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.155.1)
एवमुक्त्वा तु राजेन्द्र शाल्मलिं ब्रह्मवित्तमः । नारदः पवने सर्वं शाल्मलेर्वाक्यमब्रवीत् ॥
evamuktvā tu rājendra śālmaliṃ brahmavittamaḥ | nāradaḥ pavane sarvaṃ śālmalervākyamabravīt
हे राजेन्द्र, शाल्मलि से इस प्रकार कहकर ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ नारद ने वायु को शाल्मलि की सारी बात कह सुनाई।
नारद उवाच
श्लोक 2 (12.155.2)
हिमवत्पृष्ठजः कश्चिच्छाल्मलिः परिवारवान् । बृहन्मूलो बृहच्छायः स त्वां वायोऽवमन्यते ॥
himavatpṛṣṭhajaḥ kaścicchālmaliḥ parivāravān | bṛhanmūlo bṛhacchāyaḥ sa tvāṃ vāyo'vamanyate
हिमालय की पीठ पर एक शाल्मलि वृक्ष है, जिसके चारों ओर बड़ा परिवार बसा है; उसकी जड़ें विशाल हैं और छाया विशाल है। हे वायु, वह तुम्हारा अनादर करता है।
श्लोक 3 (12.155.3)
बहुव्याक्षेपयुक्तानि त्वामाह वचनानि सः । न युक्तानि मया वायो तानि वक्तुं तवाग्रतः ॥
bahuvyākṣepayuktāni tvāmāha vacanāni saḥ | na yuktāni mayā vāyo tāni vaktuṃ tavāgrataḥ
उसने तुम्हारे प्रति बहुत से आक्षेप-भरे वचन कहे हैं। हे वायु, उन्हें तुम्हारे सामने कहना मेरे लिए उचित नहीं।
श्लोक 4 (12.155.4)
जानामि त्वामहं वायो सर्वप्राणभृतां वरम् । वरिष्ठं च गरिष्ठं च सर्वलोकेश्वरं प्रभुम् ॥
jānāmi tvāmahaṃ vāyo sarvaprāṇabhṛtāṃ varam | variṣṭhaṃ ca gariṣṭhaṃ ca sarvalokeśvaraṃ prabhum
हे वायु, मैं तुम्हें समस्त प्राणधारियों में श्रेष्ठ, सबसे ज्येष्ठ और सबसे गुरु, सम्पूर्ण लोकों का स्वामी और प्रभु जानता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (12.155.5)
एतत्तु वचनं श्रुत्वा नारदस्य समीरणः । शाल्मलिं तमुपागम्य क्रुद्धो वचनमब्रवीत् ॥
etattu vacanaṃ śrutvā nāradasya samīraṇaḥ | śālmaliṃ tamupāgamya kruddho vacanamabravīt
नारद की यह बात सुनकर वायु उस शाल्मलि के पास गया और क्रुद्ध होकर बोला।
वायुरुवाच
श्लोक 6 (12.155.6)
शाल्मले नारदो गच्छंस्त्वयोक्तो मद्विगर्हणम् । अहं वायुः प्रभावं ते दर्शयाम्यात्मनो बलम् ॥
śālmale nārado gacchaṃstvayokto madvigarhaṇam | ahaṃ vāyuḥ prabhāvaṃ te darśayāmyātmano balam
हे शाल्मलि, जाते हुए नारद से तुमने मेरी निन्दा की है। मैं वायु हूँ; मैं तुम्हें अपना प्रभाव, अपना बल दिखाऊँगा।
श्लोक 7 (12.155.7)
नाहं त्वां नाभिजानामि विदितश्चासि मे द्रुम । पितामहः प्रजासर्गे त्वयि विश्रान्तवान्प्रभुः ॥
nāhaṃ tvāṃ nābhijānāmi viditaścāsi me druma | pitāmahaḥ prajāsarge tvayi viśrāntavānprabhuḥ
ऐसा नहीं कि मैं तुम्हें नहीं जानता; हे वृक्ष, मैं तुम्हें भली-भाँति जानता हूँ। प्रजा की सृष्टि के समय पितामह प्रभु ब्रह्मा ने तुम पर विश्राम किया था।
श्लोक 8 (12.155.8)
तस्य विश्रमणादेव प्रसादो मत्कृतस्तव । अभूत्तस्य प्रसादात्त्वां न भञ्जामि द्रुमाधम ॥
tasya viśramaṇādeva prasādo matkṛtastava | abhūttasya prasādāttvāṃ na bhañjāmi drumādhama
उन्हीं के विश्राम करने के कारण मेरे द्वारा तुम पर यह कृपा की गई है; और उन्हीं की कृपा से, हे अधम वृक्ष, मैं तुम्हें तोड़ता नहीं।
श्लोक 9 (12.155.9)
यन्मां त्वमवजानीषे यथाऽन्यं प्राकृतं तथा । दर्शयाम्येष चात्मानं यथा मां नावमन्यसे ॥
yanmāṃ tvamavajānīṣe yathā'nyaṃ prākṛtaṃ tathā | darśayāmyeṣa cātmānaṃ yathā māṃ nāvamanyase
तुम मुझे किसी साधारण वायु के समान तुच्छ समझते हो; इसलिए मैं तुम्हें अपना स्वरूप दिखाऊँगा, जिससे तुम मेरा अनादर न करो।
भीष्म उवाच
श्लोक 10 (12.155.10)
एवमुक्तस्ततः प्राह शाल्मलिः प्रहसन्निव । पवन त्वं वने क्रुद्धो दर्शयात्मानमात्मना ॥
evamuktastataḥ prāha śālmaliḥ prahasanniva | pavana tvaṃ vane kruddho darśayātmānamātmanā
ऐसा कहे जाने पर शाल्मलि मानो हँसते हुए बोला: "हे पवन, तुम वन में क्रुद्ध हो; अपना रूप जैसा चाहो दिखा दो।"
शाल्मलिरुवाच
श्लोक 11 (12.155.11)
मयि वै मुच्यतां क्रोधः किं मे क्रुद्धः करिष्यसि । न ते बिभेमि पवन यद्यपि त्वं स्वयं प्रभुः । बलाधिकोऽहं त्वत्तश्च न भीः कार्या मया तव ॥
mayi vai mucyatāṃ krodhaḥ kiṃ me kruddhaḥ kariṣyasi | na te bibhemi pavana yadyapi tvaṃ svayaṃ prabhuḥ | balādhiko'haṃ tvattaśca na bhīḥ kāryā mayā tava
मुझ पर से अपना क्रोध छोड़ दो; क्रुद्ध होकर तुम मेरा क्या करोगे? हे पवन, यद्यपि तुम स्वयं प्रभु हो, फिर भी मैं तुमसे नहीं डरता। मैं तुमसे अधिक बलवान् हूँ, मुझे तुमसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं।
श्लोक 12 (12.155.12)
ये तु बुद्ध्या हि बलिनस्ते भवन्ति बलीयसः । प्राणमात्रबला ये वै नैव ते बलिनो मताः ॥
ye tu buddhyā hi balinaste bhavanti balīyasaḥ | prāṇamātrabalā ye vai naiva te balino matāḥ
जो बुद्धि से बलवान् हैं, वे ही अधिक बलवान् होते हैं; जिनका बल केवल प्राणमात्र का है, वे बलवान् नहीं माने जाते।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (12.155.13)
इत्येवमुक्तः पवनः श्व इत्येवाब्रवीद्वचः । दर्शयिष्यामि ते तेजस्ततो रात्रिरुपागमत् ॥
ityevamuktaḥ pavanaḥ śva ityevābravīdvacaḥ | darśayiṣyāmi te tejastato rātrirupāgamat
ऐसा कहे जाने पर वायु ने कहा, "कल! मैं तुम्हें अपना तेज दिखाऊँगा," और तभी रात आ गई।
श्लोक 14 (12.155.14)
अथ निश्चित्य मनसा शाल्मलिर्वैरधारणम् । पश्यमानस्तदात्मानमसमं मातरिश्वना ॥
atha niścitya manasā śālmalirvairadhāraṇam | paśyamānastadātmānamasamaṃ mātariśvanā
तब शाल्मलि ने मन में सोचकर, यह देखते हुए कि इस बैर में वह वायु की बराबरी नहीं कर सकता, विचार किया।
श्लोक 15 (12.155.15)
नारदे यन्मया प्रोक्तं वचनं प्रति तन्मृषा । असमर्थो ह्यहं वायोर्बलेन बलवान्हि सः ॥
nārade yanmayā proktaṃ vacanaṃ prati tanmṛṣā | asamartho hyahaṃ vāyorbalena balavānhi saḥ
नारद से मैंने वायु के विषय में जो कहा, वह मिथ्या था। मैं वायु के सामने असमर्थ हूँ; वह बल में बलवान् है।
श्लोक 16 (12.155.16)
मारुतो बलवान्नित्यं यथा वै नारदोऽब्रवीत् । अहं तु दुर्बलोऽन्येभ्यो वृक्षेभ्यो नात्र संशयः ॥
māruto balavānnityaṃ yathā vai nārado'bravīt | ahaṃ tu durbalo'nyebhyo vṛkṣebhyo nātra saṃśayaḥ
जैसा नारद ने कहा था, वायु सदा बलवान् है, और मैं अन्य वृक्षों से दुर्बल हूँ, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 17 (12.155.17)
किं तु बुद्ध्या समो नास्ति मम कश्चिद्वनस्पतिः । तदहं बुद्धिमास्थाय भयं त्यक्ष्ये समीरणात् ॥
kiṃ tu buddhyā samo nāsti mama kaścidvanaspatiḥ | tadahaṃ buddhimāsthāya bhayaṃ tyakṣye samīraṇāt
परन्तु बुद्धि में कोई वृक्ष मेरे समान नहीं है। इसलिए मैं बुद्धि का आश्रय लेकर वायु का भय त्याग दूँगा।
श्लोक 18 (12.155.18)
यदि तां बुद्धिमास्थाय तिष्ठेयुः पर्णिनो वने । अरिष्टाः स्युः सदा क्रुद्धात्पवनान्नात्र संशयः ॥
yadi tāṃ buddhimāsthāya tiṣṭheyuḥ parṇino vane | ariṣṭāḥ syuḥ sadā kruddhātpavanānnātra saṃśayaḥ
यदि वन के पत्तों वाले वृक्ष उसी बुद्धि का आश्रय लेकर रहें, तो वे क्रुद्ध वायु से सदा सुरक्षित रहें, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 19 (12.155.19)
ते तु बाला न जानन्ति यथा नैतान्समीरणः । समीरयेत संक्रुद्धो यथा जानाम्यहं तथा ॥
te tu bālā na jānanti yathā naitānsamīraṇaḥ | samīrayeta saṃkruddho yathā jānāmyahaṃ tathā
परन्तु वे मूर्ख नहीं जानते कि क्रुद्ध वायु उन्हें कैसे झकझोरेगा; जैसा मैं जानता हूँ, वैसा वे नहीं जानते।
श्लोक 20 (12.155.20)
ततो निश्चित्य मनसा शाल्मलिः क्षुभितस्तदा । शाखाः स्कन्धान्प्रशाखाश्च स्वयमेव व्यशातयत् ॥
tato niścitya manasā śālmaliḥ kṣubhitastadā | śākhāḥ skandhānpraśākhāśca svayameva vyaśātayat
तब मन में निश्चय करके क्षुब्ध शाल्मलि ने अपनी शाखाओं, बड़ी डालों और टहनियों को स्वयं ही गिरा दिया।
श्लोक 21 (12.155.21)
स परित्यज्य शाखाश्च पत्राणि कुसुमानि च । प्रभाते वायुमायान्तं प्रेक्षते स्म वनस्पतिः ॥
sa parityajya śākhāśca patrāṇi kusumāni ca | prabhāte vāyumāyāntaṃ prekṣate sma vanaspatiḥ
शाखाएँ, पत्ते और फूल त्याग देने के बाद वह वनस्पति प्रभात में आते हुए वायु की ओर देखने लगा।
श्लोक 22 (12.155.22)
ततः क्रुद्धः श्वसन्वायुः पातयन्वै महाद्रुमान् । आजगामाथ तं देशमास्ते यत्र स शाल्मलिः ॥
tataḥ kruddhaḥ śvasanvāyuḥ pātayanvai mahādrumān | ājagāmātha taṃ deśamāste yatra sa śālmaliḥ
तब क्रोध से फुफकारता हुआ वायु बड़े-बड़े वृक्षों को गिराता हुआ उस स्थान पर पहुँचा जहाँ वह शाल्मलि खड़ा था।
श्लोक 23 (12.155.23)
तं हीनपर्णं पतिताग्रशाखं । निशीर्णपुष्पं प्रसमीक्ष्य वायुः । उवाच वाक्यं स्मयमान एवं । मुदायुतः शाल्मलिं रुग्णशाखम् ॥
taṃ hīnaparṇaṃ patitāgraśākhaṃ | niśīrṇapuṣpaṃ prasamīkṣya vāyuḥ | uvāca vākyaṃ smayamāna evaṃ | mudāyutaḥ śālmaliṃ rugṇaśākham
उसे पत्तों से रहित, ऊपर की शाखाओं के गिर जाने से ठूँठ-सा, फूल झड़े हुए और डालियाँ टूटी हुई देखकर वायु मुस्कराता हुआ और आनन्द से भरा हुआ शाल्मलि से यों बोला।
वायुरुवाच
श्लोक 24 (12.155.24)
अहमप्येवमेव त्वां कुर्यां वै शाल्मले रुषा । आत्मना यत्कृतं कृच्छ्रं शाखानामपकर्षणम् ॥
ahamapyevameva tvāṃ kuryāṃ vai śālmale ruṣā | ātmanā yatkṛtaṃ kṛcchraṃ śākhānāmapakarṣaṇam
हे शाल्मलि, मैं भी क्रोध में तुम्हारे साथ ठीक यही करता, जो तुमने स्वयं अपने साथ कर लिया है, अर्थात् अपनी शाखाओं को इस कष्टदायक रीति से उतार फेंकना।
श्लोक 25 (12.155.25)
हीनपुष्पाग्रशाखस्त्वं शीर्णाङ्कुरपलाशकः । आत्मदुर्मन्त्रितेनेह मद्वीर्यवशगः कृतः ॥
hīnapuṣpāgraśākhastvaṃ śīrṇāṅkurapalāśakaḥ | ātmadurmantriteneha madvīryavaśagaḥ kṛtaḥ
फूल और ऊपर की डालियों से हीन, अंकुर और पत्ते बिखेरे हुए तुम अपनी ही बुरी सलाह से मेरे बल के वश में आ गए हो।
भीष्म उवाच
श्लोक 26 (12.155.26)
एतच्छ्रुत्वा वचो वायोः शाल्मलिर्व्रीडितस्तदा । अतप्यत वचः स्मृत्वा नारदो यत्तदाऽब्रवीत् ॥
etacchrutvā vaco vāyoḥ śālmalirvrīḍitastadā | atapyata vacaḥ smṛtvā nārado yattadā'bravīt
वायु की यह बात सुनकर शाल्मलि लज्जित हुआ, और नारद ने जो कहा था उसे याद करके वह पछताने लगा।
श्लोक 27 (12.155.27)
एवं हि राजशार्दूल दुर्बलः सन्वलीयसा । वैरमासञ्जते बालस्तप्यते शाल्मलिर्यथा ॥
evaṃ hi rājaśārdūla durbalaḥ sanvalīyasā | vairamāsañjate bālastapyate śālmaliryathā
हे राजशार्दूल, इसी प्रकार जो दुर्बल मूर्ख बलवान् से बैर बाँधता है, वह शाल्मलि की तरह पछताता है।
श्लोक 28 (12.155.28)
तस्माद्वैरं न कुर्वीत दुर्बलो बलवत्तरैः । शोचेद्धि वैरं कुर्वाणो यथा वै शाल्मलिस्तथा ॥
tasmādvairaṃ na kurvīta durbalo balavattaraiḥ | śoceddhi vairaṃ kurvāṇo yathā vai śālmalistathā
इसलिए दुर्बल को अपने से अधिक बलवानों से बैर नहीं करना चाहिए; जो बैर करता है, वह शाल्मलि की भाँति शोक करता है।
श्लोक 29 (12.155.29)
न हि वैरं महात्मानो विवृण्वन्त्यपकारिषु । शनैः शनैर्महाराज दर्शयन्ति स्म ते बलम् ॥
na hi vairaṃ mahātmāno vivṛṇvantyapakāriṣu | śanaiḥ śanairmahārāja darśayanti sma te balam
हे महाराज, महात्मा लोग अपना अपकार करने वालों के प्रति अपना बैर प्रकट नहीं करते; वे धीरे-धीरे अपना बल दिखाते हैं।
श्लोक 30 (12.155.30)
वैरं न कुर्वीत नरो दुर्बुद्धिर्बुद्धिजीविना । बुद्धिर्बुद्धिमतो याति तूलेष्विव हुताशनः ॥
vairaṃ na kurvīta naro durbuddhirbuddhijīvinā | buddhirbuddhimato yāti tūleṣviva hutāśanaḥ
दुर्बुद्धि मनुष्य को बुद्धि से जीने वाले के साथ बैर नहीं करना चाहिए; बुद्धिमान् की बुद्धि रुई में लगी आग की तरह फैलती है।
श्लोक 31 (12.155.31)
न हि बुद्ध्या समं किंचिद्विद्यते पुरुषे नृप । तथा बलेन राजेन्द्र न समोऽस्तीह कश्चन ॥
na hi buddhyā samaṃ kiṃcidvidyate puruṣe nṛpa | tathā balena rājendra na samo'stīha kaścana
हे राजन्, मनुष्य में बुद्धि के समान कुछ नहीं मिलता; और हे राजेन्द्र, उसी प्रकार बल में भी यहाँ कोई समान नहीं है।
श्लोक 32 (12.155.32)
तस्मात्क्षमेत बालाय जडान्धवधिराय च । बलाधिकाय राजेन्द्र तद्दृष्टं त्वयि शत्रुहन् ॥
tasmātkṣameta bālāya jaḍāndhavadhirāya ca | balādhikāya rājendra taddṛṣṭaṃ tvayi śatruhan
इसलिए बालक, जड़, अन्धे और बहरे के प्रति, और अपने से अधिक बलवान् के प्रति भी, क्षमा रखनी चाहिए; हे शत्रुहन्ता, यह तुममें देखा गया है।
श्लोक 33 (12.155.33)
अक्षौहिण्यो दशैका च सप्त चैव महाद्युते । बलेन न समा राजन्नर्जुनस्य महात्मनः ॥
akṣauhiṇyo daśaikā ca sapta caiva mahādyute | balena na samā rājannarjunasya mahātmanaḥ
हे महातेजस्वी, दस, एक और सात, अर्थात् अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ महात्मा अर्जुन के बल की बराबरी नहीं कर सकीं।
श्लोक 34 (12.155.34)
निहताश्चैव भग्नाश्च पाण्डवेन यशस्विना । चरता बलमास्थाय पाकशासनिना मृधे ॥
nihatāścaiva bhagnāśca pāṇḍavena yaśasvinā | caratā balamāsthāya pākaśāsaninā mṛdhe
वे सेनाएँ यशस्वी पाण्डव, इन्द्रपुत्र अर्जुन के द्वारा, जो बल का आश्रय लेकर युद्ध में विचरण कर रहे थे, मार डाली गईं और तितर-बितर कर दी गईं।
श्लोक 35 (12.155.35)
उक्ताश्च ते राजधर्मा आपद्धर्माश्च भारत । विस्तरेण महाराज किं भूयः प्रब्रवीमि ते ॥
uktāśca te rājadharmā āpaddharmāśca bhārata | vistareṇa mahārāja kiṃ bhūyaḥ prabravīmi te
हे भारत, मैंने तुम्हें राजधर्म और आपद्धर्म विस्तार से बता दिए हैं। हे महाराज, अब और क्या कहूँ?