शान्ति पर्व · अध्याय 156
लोभ: पाप की जड़
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पाप का आधार क्या है और पाप कहाँ से उत्पन्न होता है। भीष्म उत्तर देते हैं कि अकेला लोभ ही महाग्राह है: उसी से क्रोध, काम, मोह, माया, अभिमान, निर्लज्जता और हर प्रकार का दुराचार पैदा होता है, और वह समुद्र की तरह कभी भरता नहीं। वे उन पाखण्डी विद्वानों का वर्णन करते हैं जो धर्म की ध्वजा उठाकर जगत् को लूटते हैं, और फिर उन सच्चे श्रेष्ठ जनों का, जिनकी सेवा राजा को करनी चाहिए: दानी, सत्यनिष्ठ, काम-क्रोध-अहंकार से रहित, और लाभ-हानि में समभाव रखने वाले।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.156.1)
पापस्य यदधिष्ठानं यतः पापं प्रवर्तते । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥
pāpasya yadadhiṣṭhānaṃ yataḥ pāpaṃ pravartate | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tattvena bharatarṣabha
हे भरतर्षभ, मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ कि पाप का आधार क्या है और पाप किससे उत्पन्न होता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.156.2)
पापस्य यदधिष्ठानं तच्छृणुष्व नराधिप । एको लोभो महाग्राहो लोभात्पापं प्रवर्तते ॥
pāpasya yadadhiṣṭhānaṃ tacchṛṇuṣva narādhipa | eko lobho mahāgrāho lobhātpāpaṃ pravartate
हे नराधिप, पाप का जो आधार है, उसे सुनो: अकेला लोभ ही महाग्राह है, और लोभ से ही पाप उत्पन्न होता है।
श्लोक 3 (12.156.3)
अतः पापमधर्मश्च तथा दुःखमनुत्तमम् । निकृत्या मूलमेतद्धि येन पापकृतो जनाः ॥
ataḥ pāpamadharmaśca tathā duḥkhamanuttamam | nikṛtyā mūlametaddhi yena pāpakṛto janāḥ
इसी से पाप, अधर्म और अनुपम दुःख होते हैं; यही कुटिलता की जड़ है, जिसके कारण मनुष्य पापी बनते हैं।
श्लोक 4 (12.156.4)
लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रवर्तते । लोभान्मोहश्च माया च मानस्तम्भः परासुता ॥
lobhātkrodhaḥ prabhavati lobhātkāmaḥ pravartate | lobhānmohaśca māyā ca mānastambhaḥ parāsutā
लोभ से क्रोध पैदा होता है, लोभ से काम प्रवृत्त होता है; लोभ से मोह और माया, अकड़-भरा अभिमान और पराधीनता आती है।
श्लोक 5 (12.156.5)
अक्षमा ह्रीपरित्यागः श्रीनाशो धर्मसंक्षयः । अभिध्याऽप्रख्यता चैव सर्वं लोभात्प्रवर्तते ॥
akṣamā hrīparityāgaḥ śrīnāśo dharmasaṃkṣayaḥ | abhidhyā'prakhyatā caiva sarvaṃ lobhātpravartate
अधीरता, लज्जा का त्याग, श्री का नाश, धर्म की हानि, लालचभरी चिन्ता और अप्रसिद्धि: यह सब लोभ से ही उत्पन्न होता है।
श्लोक 6 (12.156.6)
अत्यागश्च कुतर्कश्च विकर्मसु च याः क्रियाः । कुलविद्यामदश्चैव रूपैश्वर्यमदस्तथा ॥
atyāgaśca kutarkaśca vikarmasu ca yāḥ kriyāḥ | kulavidyāmadaścaiva rūpaiśvaryamadastathā
त्याग का अभाव, कुतर्क, और बुरे कर्मों में जो भी क्रियाएँ होती हैं; कुल और विद्या का मद, तथा रूप और ऐश्वर्य का मद भी।
श्लोक 7 (12.156.7)
सर्वभूतेष्वभिद्रोहः सर्वभूतेष्वसत्कृतिः । सर्वभूतेष्वविश्वासः सर्वभूतेष्वनार्जवम् ॥
sarvabhūteṣvabhidrohaḥ sarvabhūteṣvasatkṛtiḥ | sarvabhūteṣvaviśvāsaḥ sarvabhūteṣvanārjavam
सब प्राणियों से द्रोह, सब प्राणियों का अनादर, सब प्राणियों पर अविश्वास, सब प्राणियों के प्रति कुटिलता,
श्लोक 8 (12.156.8)
हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम् । वाग्वेगो मनसो वेगो निन्दावेगस्तथैव च ॥
haraṇaṃ paravittānāṃ paradārābhimarśanam | vāgvego manaso vego nindāvegastathaiva ca
दूसरों के धन का हरण, दूसरों की स्त्रियों का स्पर्श; वाणी का वेग, मन का वेग और निन्दा का वेग,
श्लोक 9 (12.156.9)
उपस्थोदरयोर्वेगो मृत्युवेगश्च दारुणः । ईर्ष्यावेगश्च बलवान्मिथ्यावेगश्च दुर्जयः ॥
upasthodarayorvego mṛtyuvegaśca dāruṇaḥ | īrṣyāvegaśca balavānmithyāvegaśca durjayaḥ
उपस्थ और उदर का वेग, मृत्यु का भयंकर वेग; ईर्ष्या का बलवान् वेग और मिथ्या का दुर्जय वेग,
श्लोक 10 (12.156.10)
रसवेगश्च दुर्वार्यः श्रोत्रवेगश्च दुःसहः । कुत्सा विकत्था मात्सर्यं पापं दुष्कर्मकारिता । साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा ॥
rasavegaśca durvāryaḥ śrotravegaśca duḥsahaḥ | kutsā vikatthā mātsaryaṃ pāpaṃ duṣkarmakāritā | sāhasānāṃ ca sarveṣāmakāryāṇāṃ kriyāstathā
रस का दुर्वार वेग और श्रवण का दुःसह वेग; निन्दा, डींग, मत्सर, पाप, दुष्कर्म करना, और सब प्रकार के दुस्साहस तथा न करने योग्य कर्मों का आचरण,
श्लोक 11 (12.156.11)
जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवाः । न त्यजन्त्यात्मकर्मैकं यन्न जीर्यति जीर्यतः ॥
jātau bālye ca kaumāre yauvane cāpi mānavāḥ | na tyajantyātmakarmaikaṃ yanna jīryati jīryataḥ
जन्म के समय, बाल्यावस्था में, किशोरावस्था में और यौवन में भी मनुष्य अपने इस एक स्वभाव को नहीं छोड़ते, जो उनके बूढ़े होने पर भी बूढ़ा नहीं होता।
श्लोक 12 (12.156.12)
यो न पूरयितुं शक्यो लोभः प्रीत्या कथंचन । नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधिः ॥
yo na pūrayituṃ śakyo lobhaḥ prītyā kathaṃcana | nityaṃ gambhīratoyābhirāpagābhirivodadhiḥ
जिस लोभ को किसी भी प्रकार तृप्ति से भरा नहीं जा सकता, जैसे गहरे जल वाली नदियों से समुद्र नहीं भरता,
श्लोक 13 (12.156.13)
न प्रहृष्यति यो लोभैः कामैर्यश्च न तृप्यति । यो न देवैर्न गन्धर्वैर्नासुरैर्न महोरगैः ॥
na prahṛṣyati yo lobhaiḥ kāmairyaśca na tṛpyati | yo na devairna gandharvairnāsurairna mahoragaiḥ
जो लोभ लाभों से प्रसन्न नहीं होता और कामनाओं से तृप्त नहीं होता, जिसे देवता, गन्धर्व, असुर और महासर्प भी यथार्थ रूप से नहीं जान पाते,
श्लोक 14 (12.156.14)
ज्ञायते नृप तत्त्वेन सर्वैर्भूतगणैस्तथा । स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ॥
jñāyate nṛpa tattvena sarvairbhūtagaṇaistathā | sa lobhaḥ saha mohena vijetavyo jitātmanā
और न समस्त प्राणिसमूह ही, हे राजन्: उस लोभ को मोह सहित जितात्मा पुरुष को जीतना चाहिए।
श्लोक 15 (12.156.15)
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशून्यं मत्सरस्तथा । भवन्त्येतानि कौरव्य लुब्धानामकृतात्मनाम् ॥
dambho drohaśca nindā ca paiśūnyaṃ matsarastathā | bhavantyetāni kauravya lubdhānāmakṛtātmanām
हे कौरव्य, दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली और मत्सर उन लोभियों में पैदा होते हैं जिनका अन्तःकरण संस्कारित नहीं है।
श्लोक 16 (12.156.16)
सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुताः । छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्तीहाल्पबुद्धयः ॥
sumahāntyapi śāstrāṇi dhārayanto bahuśrutāḥ | chettāraḥ saṃśayānāṃ ca kliśyantīhālpabuddhayaḥ
बड़े-बड़े शास्त्रों को धारण करने वाले, बहुश्रुत और दूसरों के संशय काटने वाले भी, यदि वे अल्पबुद्धि हैं, तो इस लोक में क्लेश पाते हैं।
श्लोक 17 (12.156.17)
द्वेषक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारबहिष्कृताः । अन्तःक्षुरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव ॥
dveṣakrodhaprasaktāśca śiṣṭācārabahiṣkṛtāḥ | antaḥkṣurā vāṅmadhurāḥ kūpāśchannāstṛṇairiva
द्वेष और क्रोध में डूबे, शिष्टों के आचार से बहिष्कृत, भीतर छुरी और वाणी में मधु रखने वाले वे घास से ढके कुओं के समान हैं।
श्लोक 18 (12.156.18)
धर्मवैतंसिकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् । कुर्वते च बहून्मार्गांस्तान्हेतुबलमाश्रिताः । सर्वमार्गान्विलुम्पन्ति लोभज्ञानेष्ववस्थिताः ॥
dharmavaitaṃsikāḥ kṣudrā muṣṇanti dhvajino jagat | kurvate ca bahūnmārgāṃstānhetubalamāśritāḥ | sarvamārgānvilumpanti lobhajñāneṣvavasthitāḥ
धर्म को जाल बनाने वाले वे क्षुद्र जन धर्म की ध्वजा लेकर जगत् को लूटते हैं। तर्कबल का सहारा लेकर वे बहुत से मार्ग बना लेते हैं, और लोभ से मिले ज्ञान में टिके हुए वे सब मार्गों को नष्ट कर देते हैं।
श्लोक 19 (12.156.19)
धर्मस्य ह्रियमाणस्य लोभग्रस्तैर्दुरात्मभिः । याया विक्रियते संस्था ततः साऽपि प्रपद्यते ॥
dharmasya hriyamāṇasya lobhagrastairdurātmabhiḥ | yāyā vikriyate saṃsthā tataḥ sā'pi prapadyate
लोभ से ग्रस्त दुरात्माओं द्वारा धर्म के हरे जाते समय वे जिस-जिस मर्यादा को बदल देते हैं, वही बदली हुई मर्यादा आगे अपना ली जाती है।
श्लोक 20 (12.156.20)
दर्पः क्रोधो मदः स्वप्नो हर्षः शोकोऽभिमानिता । एते हि कौरव्य दृश्यन्ते लुब्धबुद्धिषु ॥
darpaḥ krodho madaḥ svapno harṣaḥ śoko'bhimānitā | ete hi kauravya dṛśyante lubdhabuddhiṣu
हे कौरव्य, दर्प, क्रोध, मद, निद्रा, हर्ष, शोक और अभिमान: ये लोभी बुद्धि वाले मनुष्यों में दिखाई देते हैं।
श्लोक 21 (12.156.21)
एतानशिष्टान्बुद्धस्व नित्यं लोभसमन्वितान् । शिष्टांस्तु परिपृच्छेथा यान्वक्ष्यामि शुचिव्रतान् ॥
etānaśiṣṭānbuddhasva nityaṃ lobhasamanvitān | śiṣṭāṃstu paripṛcchethā yānvakṣyāmi śucivratān
इन लोभ से जुड़े लोगों को सदा अशिष्ट जानो। परन्तु जिन शुद्ध व्रत वाले शिष्ट जनों के विषय में मैं बताऊँगा, उनसे पूछताछ किया करो,
श्लोक 22 (12.156.22)
येष्वावृत्तिभयं नास्ति परलोकभयं न च । नामिषेषु प्रसङ्गोऽस्ति न प्रियेष्वप्रियेषु च ॥
yeṣvāvṛttibhayaṃ nāsti paralokabhayaṃ na ca | nāmiṣeṣu prasaṅgo'sti na priyeṣvapriyeṣu ca
जिन्हें पुनर्जन्म का भय नहीं है और परलोक का भी भय नहीं है, जिन्हें भोग्य विषयों में आसक्ति नहीं है और न प्रिय या अप्रिय में,
श्लोक 23 (12.156.23)
शिष्टाचारः प्रियो येषु दमो येषु प्रतिष्ठितः । सुखं दुःखं समं येषां सत्यं येषां परायणम् ॥
śiṣṭācāraḥ priyo yeṣu damo yeṣu pratiṣṭhitaḥ | sukhaṃ duḥkhaṃ samaṃ yeṣāṃ satyaṃ yeṣāṃ parāyaṇam
जो सदाचार से प्रेम रखते हैं, जिनमें संयम दृढ़ है, जिनके लिए सुख और दुःख समान हैं और सत्य ही परम आश्रय है,
श्लोक 24 (12.156.24)
दातारो न ग्रहीतारो दयावन्तस्तथैव च । पितृदेवातिथेयाश्च नित्योद्युक्तास्तथैव च ॥
dātāro na grahītāro dayāvantastathaiva ca | pitṛdevātitheyāśca nityodyuktāstathaiva ca
जो देने वाले हैं, लेने वाले नहीं, जो दयावान् भी हैं, पितरों, देवताओं और अतिथियों की सेवा में लगे रहते हैं और सदा उद्योगशील हैं,
श्लोक 25 (12.156.25)
सर्वोपकारिणो वीराः सर्वधर्मानुपालकाः । सर्वभूतहिताश्चैव सर्वदेयाश्च भारत ॥
sarvopakāriṇo vīrāḥ sarvadharmānupālakāḥ | sarvabhūtahitāścaiva sarvadeyāśca bhārata
जो सबका उपकार करने वाले, वीर, सब धर्मों का पालन करने वाले, सब प्राणियों के हितैषी और सब कुछ दे देने को तैयार रहने वाले हैं, हे भारत,
श्लोक 26 (12.156.26)
न ते चालयितुं शक्या धर्मव्याहारकारिणः । न तेषां भिद्यते वृत्तं यत्पुरा साधुभिः कृतम् ॥
na te cālayituṃ śakyā dharmavyāhārakāriṇaḥ | na teṣāṃ bhidyate vṛttaṃ yatpurā sādhubhiḥ kṛtam
धर्म के अनुसार वचन और आचरण करने वाले उन लोगों को डिगाया नहीं जा सकता; प्राचीन साधुओं ने जो आचार किया है, वह उनमें टूटता नहीं।
श्लोक 27 (12.156.27)
न त्रासिनो न चपला न रौद्राः सत्पथे स्थिताः । ते सेव्याः साधुभिर्नित्यमसाधूंश्च विवर्जयेत् ॥
na trāsino na capalā na raudrāḥ satpathe sthitāḥ | te sevyāḥ sādhubhirnityamasādhūṃśca vivarjayet
वे न भयभीत होते हैं, न चंचल, न उग्र; वे सन्मार्ग पर स्थित रहते हैं। साधुओं को सदा उनकी सेवा करनी चाहिए, और असाधुओं को छोड़ देना चाहिए।
श्लोक 28 (12.156.28)
कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहंकृताः । सुव्रताः स्थिरमर्यादास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥
kāmakrodhavyapetā ye nirmamā nirahaṃkṛtāḥ | suvratāḥ sthiramaryādāstānupāsva ca pṛccha ca
जो काम और क्रोध से रहित हैं, ममता और अहंकार से मुक्त हैं, उत्तम व्रत वाले और स्थिर मर्यादा वाले हैं, उनकी उपासना करो और उनसे पूछो।
श्लोक 29 (12.156.29)
न वागर्थं यशोर्थं वा धर्मस्तेषां युधिष्ठिर । अवश्यं कार्य इत्येव शरीरस्य क्रियास्तथा ॥
na vāgarthaṃ yaśorthaṃ vā dharmasteṣāṃ yudhiṣṭhira | avaśyaṃ kārya ityeva śarīrasya kriyāstathā
हे युधिष्ठिर, उनके लिए धर्म वाणी या यश के लिए नहीं है; वह इसलिए किया जाता है कि उसे अवश्य करना है, जैसे शरीर की क्रियाएँ।
श्लोक 30 (12.156.30)
न भयं क्रोधचापल्ये न शोकस्तेषु विद्यते । न धर्मध्वजिनश्चैव न गुह्यं किंचिदास्थिताः ॥
na bhayaṃ krodhacāpalye na śokasteṣu vidyate | na dharmadhvajinaścaiva na guhyaṃ kiṃcidāsthitāḥ
उनमें भय, क्रोध और चंचलता नहीं है, और न शोक है; वे धर्म की ध्वजा नहीं उठाते और कुछ छिपाकर नहीं रखते।
श्लोक 31 (12.156.31)
येष्वलोभस्तथाऽमोहो ये च सत्यार्जवे स्थिताः । तेषु कौन्तेय रज्येथा येषां न भ्रश्यते पुनः ॥
yeṣvalobhastathā'moho ye ca satyārjave sthitāḥ | teṣu kaunteya rajyethā yeṣāṃ na bhraśyate punaḥ
हे कौन्तेय, जिनमें लोभ और मोह नहीं हैं और जो सत्य तथा सरलता में स्थित हैं, उनमें अनुराग रखो; उनका आचरण फिर कभी भ्रष्ट नहीं होता।
श्लोक 32 (12.156.32)
ये न हृष्यन्ति लाभेषु नालाभेषु व्यथन्ति च । निर्ममा निरहंकाराः सत्वस्थाः समदर्शिनः ॥
ye na hṛṣyanti lābheṣu nālābheṣu vyathanti ca | nirmamā nirahaṃkārāḥ satvasthāḥ samadarśinaḥ
जो लाभ में हर्षित नहीं होते और हानि में दुःखी नहीं होते, ममता और अहंकार से रहित, सत्त्व में स्थित और सबको समान देखने वाले हैं,
श्लोक 33 (12.156.33)
लाभालाभौ सुखदुःखे च तात । प्रियाप्रिये मरणं जीवितं च । समानि येषां स्थिरविक्रमाणां । बुभुत्सतां सत्यपथे स्थितानाम् ॥
lābhālābhau sukhaduḥkhe ca tāta | priyāpriye maraṇaṃ jīvitaṃ ca | samāni yeṣāṃ sthiravikramāṇāṃ | bubhutsatāṃ satyapathe sthitānām
हे तात, जिनके लिए लाभ और हानि, सुख और दुःख, प्रिय और अप्रिय, मरण और जीवन समान हैं, जो स्थिर पराक्रम वाले, जानने की इच्छा रखने वाले और सत्य के मार्ग पर स्थित हैं,
श्लोक 34 (12.156.34)
धर्मप्रियांस्तान्सुमहानुभावान् । दान्तोऽप्रमत्तश्च समर्चयेथाः । दैवात्सर्वे गुणवन्तो भवन्ति । शुभाशुभे वाक्प्रलापास्तथाऽन्ये ॥
dharmapriyāṃstānsumahānubhāvān | dānto'pramattaśca samarcayethāḥ | daivātsarve guṇavanto bhavanti | śubhāśubhe vākpralāpāstathā'nye
उन धर्मप्रिय महानुभावों का संयम और सावधानी के साथ आदर करो। दैव से सब गुणवान् हो जाते हैं, और इसी प्रकार दूसरों की व्यर्थ बातें शुभ या अशुभ फल देती हैं।