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शान्ति पर्व · अध्याय 158

भीष्म द्वारा दम की प्रशंसा

युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि स्वाध्याय और धर्म में लगे ब्राह्मण के लिए परम कल्याण क्या है, और अनेक शाखाओं वाले धर्म-मार्ग का परम मूल क्या है। भीष्म बताते हैं कि वह मूल दम (इन्द्रिय-संयम) है, जो इस लोक और परलोक में तेज, पवित्रता और सुख देता है। वे दम के अंगभूत गुण, उसके फल और उसके एकमात्र प्रतीत होने वाले दोष का वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर प्रसन्न होकर भीष्म से आगे और प्रश्न करते हैं।

अध्याय 157अध्याय-सूचीअध्याय 159

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.158.1)

स्वाध्यायकृतयत्नस्य ब्राह्मणस्य विशेषतः । धर्मकामस्य धर्मात्मन्किंनु श्रेय इहोच्यते ॥

svādhyāyakṛtayatnasya brāhmaṇasya viśeṣataḥ | dharmakāmasya dharmātmankiṃnu śreya ihocyate

हे धर्मात्मन्! जिस ब्राह्मण ने स्वाध्याय में विशेष प्रयत्न किया है और जो धर्म की कामना करता है, उसके लिए यहाँ परम कल्याण क्या बताया गया है?

श्लोक 2 (12.158.2)

बहुधा दर्शने लोके श्रेयो यदिह मन्यसे । अस्मिँल्लोके परे चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

bahudhā darśane loke śreyo yadiha manyase | asmim̐lloke pare caiva tanme brūhi pitāmaha

लोक में कल्याण को देखने की अनेक दृष्टियाँ हैं। इस लोक और परलोक में आप जिसे परम कल्याण मानते हैं, हे पितामह, वही मुझे बताइए।

श्लोक 3 (12.158.3)

महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत । किंस्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेयतमं मतम् ॥

mahānayaṃ dharmapatho bahuśākhaśca bhārata | kiṃsvideveha dharmāṇāmanuṣṭheyatamaṃ matam

हे भारत! धर्म का यह मार्ग बहुत बड़ा है और इसकी अनेक शाखाएँ हैं। इन सब धर्मों में यहाँ सबसे अधिक आचरण के योग्य किसे माना गया है?

श्लोक 4 (12.158.4)

धर्मस्य महतो राजन्बहुशाखस्य तत्त्वतः । यन्मूलं परमं तात तत्सर्वं ब्रूह्यतन्द्रितः ॥

dharmasya mahato rājanbahuśākhasya tattvataḥ | yanmūlaṃ paramaṃ tāta tatsarvaṃ brūhyatandritaḥ

हे राजन्! अनेक शाखाओं वाले इस महान् धर्म का जो वास्तव में परम मूल है, हे तात, वह सब आप आलस्य छोड़कर मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 5 (12.158.5)

हन्त ते कथयिष्यामि येन श्रेयो ह्यवाप्स्यसि । पीत्वाऽमृतमिव प्राज्ञो येन तृप्तो भविष्यसि ॥

hanta te kathayiṣyāmi yena śreyo hyavāpsyasi | pītvā'mṛtamiva prājño yena tṛpto bhaviṣyasi

सुनो, मैं तुम्हें वह बताऊँगा जिससे तुम परम कल्याण पाओगे और जिससे तुम प्रज्ञावान् अमृत पीने के समान तृप्त हो जाओगे।

श्लोक 6 (12.158.6)

धर्मस्य विधयो नैके तेते प्रोक्ता महर्षिभिः । स्वंस्वं विज्ञानमाश्रित्य दमस्तेषां परायणम् ॥

dharmasya vidhayo naike tete proktā maharṣibhiḥ | svaṃsvaṃ vijñānamāśritya damasteṣāṃ parāyaṇam

धर्म के साधन एक नहीं हैं; महर्षियों ने अपने-अपने ज्ञान के आधार पर उन्हें बताया है। उन सबका परम आश्रय दम (इन्द्रिय-संयम) है।

श्लोक 7 (12.158.7)

दमं निःश्रेयसं प्राहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः । ब्राह्मणस्य विशेषेण दमो धर्मः सनातनः ॥

damaṃ niḥśreyasaṃ prāhurvṛddhā niścitadarśinaḥ | brāhmaṇasya viśeṣeṇa damo dharmaḥ sanātanaḥ

निश्चित दृष्टि रखने वाले वृद्धजन दम को परम कल्याण का मार्ग कहते हैं। विशेष रूप से ब्राह्मण के लिए दम ही सनातन धर्म है।

श्लोक 8 (12.158.8)

नादान्तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपलभ्यते । दमो दानं तथा यज्ञानधीतं चातिवर्तते ॥

nādāntasya kriyāsiddhiryathāvadupalabhyate | damo dānaṃ tathā yajñānadhītaṃ cātivartate

जो इन्द्रियों को वश में नहीं रखता, उसके कर्म ठीक-ठीक सिद्ध नहीं होते। दम दान, यज्ञ और अध्ययन से भी बढ़कर है।

श्लोक 9 (12.158.9)

दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं च दमः परम् । विपाप्मा तेजसा युक्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥

damastejo vardhayati pavitraṃ ca damaḥ param | vipāpmā tejasā yuktaḥ puruṣo vindate mahat

दम तेज को बढ़ाता है और दम परम पवित्र करने वाला है। पापरहित होकर तेज से युक्त हुआ पुरुष महान् फल पाता है।

श्लोक 10 (12.158.10)

दमेन सदृशं धर्मं नान्यं लोकेषु शुश्रुम । दमो हि परमो लोके प्रशस्तः सर्वधर्मिणाम् ॥

damena sadṛśaṃ dharmaṃ nānyaṃ lokeṣu śuśruma | damo hi paramo loke praśastaḥ sarvadharmiṇām

हमने संसार में दम के समान कोई दूसरा धर्म नहीं सुना। धर्म का पालन करने वाले सभी लोग दम को ही लोक में सर्वोपरि मानकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 11 (12.158.11)

प्रेत्य चात्र मनुष्येन्द्र परमं विन्दते सुखम् । दमेन हि सदा युक्तो महान्तं धर्ममश्नुते ॥

pretya cātra manuṣyendra paramaṃ vindate sukham | damena hi sadā yukto mahāntaṃ dharmamaśnute

हे नरेन्द्र! वह मरने के बाद भी और यहाँ भी परम सुख पाता है; जो सदा दम से युक्त रहता है, वह महान् धर्म का फल पाता है।

श्लोक 12 (12.158.12)

सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुध्यते । सुखं पर्येति लोकांश्च मनश्चास्य प्रसीदति ॥

sukhaṃ dāntaḥ prasvapiti sukhaṃ ca pratibudhyate | sukhaṃ paryeti lokāṃśca manaścāsya prasīdati

दमशील मनुष्य सुख से सोता है, सुख से जागता है, सुखपूर्वक लोकों में विचरता है और उसका मन प्रसन्न रहता है।

श्लोक 13 (12.158.13)

अदान्तः पुरुषः क्लेशमभीक्ष्णं प्रतिपद्यते । अनर्थांश्च बहूनन्यान्प्रसृजत्यात्मदोषजान् ॥

adāntaḥ puruṣaḥ kleśamabhīkṣṇaṃ pratipadyate | anarthāṃśca bahūnanyānprasṛjatyātmadoṣajān

जो मनुष्य संयमरहित है, वह बार-बार क्लेश भोगता है और अपने ही दोषों से उत्पन्न होने वाले और भी बहुत-से अनर्थों को जन्म देता है।

श्लोक 14 (12.158.14)

आश्रमेषु चतुर्ष्वाहुर्दममेवोत्तमं व्रतम् । दमलिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदयो दमः ॥

āśrameṣu caturṣvāhurdamamevottamaṃ vratam | damaliṅgāni vakṣyāmi yeṣāṃ samudayo damaḥ

चारों आश्रमों में दम को ही सर्वोत्तम व्रत कहा गया है। मैं दम के लक्षण बताऊँगा; जिन गुणों का समुदाय है, वही दम है।

श्लोक 15 (12.158.15)

क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । इन्द्रियाभिजयो दाक्ष्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

kṣamā dhṛtirahiṃsā ca samatā satyamārjavam | indriyābhijayo dākṣyaṃ mārdavaṃ hrīracāpalam

क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, इन्द्रियों पर विजय, कुशलता, कोमलता, लज्जा, चंचलता का अभाव,

श्लोक 16 (12.158.16)

अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः प्रियवादिता । अविवित्सानसूया चाप्येषां समुदयो दमः ॥

akārpaṇyamasaṃrambhaḥ saṃtoṣaḥ priyavāditā | avivitsānasūyā cāpyeṣāṃ samudayo damaḥ

दीनता का अभाव, उग्र आवेश का अभाव, संतोष, प्रिय बोलना, बेचैन जिज्ञासा का अभाव और दूसरों में दोष न देखना: इन सबका समुदाय ही दम है।

श्लोक 17 (12.158.17)

गुरुपूजा च कौरव्य दया भूतेष्वपैशुनम् । जनवादमृषावादस्तुतिनिन्दाविसर्जनम् ॥

gurupūjā ca kauravya dayā bhūteṣvapaiśunam | janavādamṛṣāvādastutinindāvisarjanam

हे कौरव्य! गुरु का आदर, प्राणियों पर दया, चुगली न करना, लोकापवाद, असत्य, स्तुति और निन्दा का त्याग,

श्लोक 18 (12.158.18)

कामं क्रोधं च लोभं च दर्पं स्तम्भं विकत्थनम् । रोषमीर्ष्यावमानं च नैव दान्तो निषेवते ॥

kāmaṃ krodhaṃ ca lobhaṃ ca darpaṃ stambhaṃ vikatthanam | roṣamīrṣyāvamānaṃ ca naiva dānto niṣevate

काम, क्रोध, लोभ, दर्प, स्तम्भ (जड़ अकड़), आत्मप्रशंसा, रोष, ईर्ष्या और अवमानना: दमशील पुरुष इनका कभी सेवन नहीं करता।

श्लोक 19 (12.158.19)

अनिन्दितो ह्यकामात्मा नाल्पेष्वर्थ्यनसूयकः । समुद्रकल्पः स नरो न कथंचन पूर्यते ॥

anindito hyakāmātmā nālpeṣvarthyanasūyakaḥ | samudrakalpaḥ sa naro na kathaṃcana pūryate

जो निन्दा से परे है, जिसका मन कामना से रहित है, जो तुच्छ वस्तुओं की चाह नहीं करता और दूसरों में दोष नहीं देखता, वह समुद्र के समान है, जो कितना भी जल पाकर कभी भरता नहीं।

श्लोक 20 (12.158.20)

अहं त्वयि मम त्वं च मयि ते तेषु चाप्यहम् । पूर्वसंबन्धिसंयोगं नैतद्दान्तो निषेवते ॥

ahaṃ tvayi mama tvaṃ ca mayi te teṣu cāpyaham | pūrvasaṃbandhisaṃyogaṃ naitaddānto niṣevate

“मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो, वे मेरे हैं और मैं उनका हूँ”: पूर्व-सम्बन्धों से इस प्रकार जुड़ना दमशील पुरुष नहीं अपनाता।

श्लोक 21 (12.158.21)

सर्वा ग्राम्यास्तथाऽऽरण्या याश्च लोके प्रवृत्तयः । निन्दां चैव प्रशंसां च यो नाश्रयति मुच्यते ॥

sarvā grāmyāstathā''raṇyā yāśca loke pravṛttayaḥ | nindāṃ caiva praśaṃsāṃ ca yo nāśrayati mucyate

संसार में गाँव की हों या वन की, जितनी भी प्रवृत्तियाँ हैं, उनमें जो निन्दा और प्रशंसा, दोनों का सहारा नहीं लेता, वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 22 (12.158.22)

मैत्रोऽथ शीलसंपन्नः प्रसन्नात्मात्मविच्च यः । मुक्तस्य विविधैः सङ्गैस्तस्य प्रेत्य फलं महत् ॥

maitro'tha śīlasaṃpannaḥ prasannātmātmavicca yaḥ | muktasya vividhaiḥ saṅgaistasya pretya phalaṃ mahat

जो मित्रभाव वाला है, शीलवान् है, प्रसन्नचित्त है और आत्मा को जानता है, तथा अनेक प्रकार की आसक्तियों से मुक्त है, उसे परलोक में महान् फल मिलता है।

श्लोक 23 (12.158.23)

सुवृत्तः शीलसंपन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मविद्बुधः । प्राप्येह लोके सत्कारं सुगतिं प्रतिपद्यते ॥

suvṛttaḥ śīlasaṃpannaḥ prasannātmā''tmavidbudhaḥ | prāpyeha loke satkāraṃ sugatiṃ pratipadyate

सदाचारी, शीलवान्, प्रसन्नचित्त, आत्मज्ञानी और बुद्धिमान् पुरुष इस लोक में सम्मान पाकर उत्तम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 24 (12.158.24)

कर्म यच्छुभमेवेह सद्भिराचरितं च यत् । तदेव ज्ञानयुक्तस्य मुनेर्वर्त्म न हीयते ॥

karma yacchubhameveha sadbhirācaritaṃ ca yat | tadeva jñānayuktasya munervartma na hīyate

जो कर्म शुभ है और जिसका सज्जनों ने आचरण किया है, वही मार्ग ज्ञान से युक्त मुनि के लिए कभी क्षीण नहीं होता।

श्लोक 25 (12.158.25)

निष्क्रम्य वनमास्थाय ज्ञानयुक्तो जितेन्द्रियः । कालाकाङ्क्षी चरन्नेवं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

niṣkramya vanamāsthāya jñānayukto jitendriyaḥ | kālākāṅkṣī carannevaṃ brahmabhūyāya kalpate

घर से निकलकर वन में जाकर ज्ञान से युक्त और जितेन्द्रिय हुआ मुनि अपने समय की प्रतीक्षा करता हुआ इस प्रकार विचरते हुए ब्रह्मभाव को पाने योग्य हो जाता है।

श्लोक 26 (12.158.26)

अभयं यस्य भूतेभ्यो भूतानामभयं यतः । तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥

abhayaṃ yasya bhūtebhyo bhūtānāmabhayaṃ yataḥ | tasya dehādvimuktasya bhayaṃ nāsti kutaścana

जिससे प्राणियों को भय नहीं है और जिसके कारण प्राणी निर्भय रहते हैं, शरीर से मुक्त होने पर उसे कहीं से भी भय नहीं रहता।

श्लोक 27 (12.158.27)

अवाचिनोति कर्माणि न च संप्रचिनोति ह । समः सर्वेषु भूतेषु मैत्रायणगतिं चरेत् ॥

avācinoti karmāṇi na ca saṃpracinoti ha | samaḥ sarveṣu bhūteṣu maitrāyaṇagatiṃ caret

वह अपने कर्मों को क्षीण करता है और नए कर्म संचित नहीं करता। सब प्राणियों में समभाव रखता हुआ वह मैत्रायण मार्ग पर, अर्थात् सबके प्रति मैत्री के मार्ग पर, चले।

श्लोक 28 (12.158.28)

शकुनीनामिवाकाशे मत्स्यानांमिव चोदके । यथा गतिर्न दृश्येत तथा तस्य न संशयः ॥

śakunīnāmivākāśe matsyānāṃmiva codake | yathā gatirna dṛśyeta tathā tasya na saṃśayaḥ

जैसे आकाश में पक्षियों का और जल में मछलियों का मार्ग दिखाई नहीं देता, वैसे ही उसकी गति भी दिखाई नहीं देती; इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 29 (12.158.29)

गृहानुत्सृज्य यो राजन्मोक्षमेवाभिपद्यते । लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वतीः समाः ॥

gṛhānutsṛjya yo rājanmokṣamevābhipadyate | lokāstejomayāstasya kalpante śāśvatīḥ samāḥ

हे राजन्! जो घर छोड़कर केवल मोक्ष की ओर बढ़ता है, उसके लिए तेजोमय लोक अनन्त वर्षों तक बने रहने के लिए प्रस्तुत होते हैं।

श्लोक 30 (12.158.30)

संन्यस्य सर्वकर्माणि संन्यस्य विधिवत्तपः । संन्यस्य विविधा विद्याः सर्वं संन्यस्य चैव ह ॥

saṃnyasya sarvakarmāṇi saṃnyasya vidhivattapaḥ | saṃnyasya vividhā vidyāḥ sarvaṃ saṃnyasya caiva ha

सब कर्मों का त्याग करके, विधिपूर्वक तप का त्याग करके, अनेक प्रकार की विद्याओं का त्याग करके और सब कुछ त्यागकर,

श्लोक 31 (12.158.31)

कामे शुचिरनावृत्तः प्रसन्नात्माऽऽत्मविच्छुचिः । प्राप्येह लोके सत्कारं स्वर्गं समभिपद्यते ॥

kāme śuciranāvṛttaḥ prasannātmā''tmavicchuciḥ | prāpyeha loke satkāraṃ svargaṃ samabhipadyate

कामनाओं में शुद्ध, कभी पीछे न हटने वाला, प्रसन्नचित्त और शुद्ध आत्मज्ञानी पुरुष इस लोक में सम्मान पाकर स्वर्ग को प्राप्त होता है।

श्लोक 32 (12.158.32)

यच्च पैतामहं स्थानं ब्रह्मराशिसमुद्भवम् । गुहायां निहितं नित्यं तद्दमेनाभिगम्यते ॥

yacca paitāmahaṃ sthānaṃ brahmarāśisamudbhavam | guhāyāṃ nihitaṃ nityaṃ taddamenābhigamyate

ब्रह्म-समूह से उत्पन्न पितामह का जो धाम सदा हृदय की गुफा में छिपा रहता है, उसकी प्राप्ति दम से होती है।

श्लोक 33 (12.158.33)

ज्ञानारामस्य बुद्धस्य सर्वभूतानुरोधिनः । नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुतः ॥

jñānārāmasya buddhasya sarvabhūtānurodhinaḥ | nāvṛttibhayamastīha paralokabhayaṃ kutaḥ

जो ज्ञान में रमण करता है, जो जाग्रत है और सब प्राणियों के अनुकूल रहता है, उसे यहाँ लौटने का भय नहीं; फिर परलोक का भय कहाँ से हो?

श्लोक 34 (12.158.34)

एक एव दमे दोषो द्वितीयो नोपपद्यते । यदेनं दमसंयुक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥

eka eva dame doṣo dvitīyo nopapadyate | yadenaṃ damasaṃyuktamaśaktaṃ manyate janaḥ

दम में एक ही दोष है, दूसरा कोई नहीं मिलता: लोग दमशील मनुष्य को असमर्थ समझ लेते हैं।

श्लोक 35 (12.158.35)

एकोऽस्य सुमहाप्राज्ञ दोषः स्यात्सुमहान्गुणः । क्षमया विपुला लोका दुर्लभा हि सहिष्णुता ॥

eko'sya sumahāprājña doṣaḥ syātsumahānguṇaḥ | kṣamayā vipulā lokā durlabhā hi sahiṣṇutā

हे महाप्राज्ञ! इसमें एक दोष है, पर बहुत बड़ा गुण भी है: क्षमा से विशाल लोक प्राप्त होते हैं, क्योंकि सहनशीलता दुर्लभ है।

श्लोक 36 (12.158.36)

दान्तस्य किमरण्येन तथाऽदान्तस्य भारत । यत्रैव निवसेद्दान्तस्तदरण्यं स चाश्रमः ॥

dāntasya kimaraṇyena tathā'dāntasya bhārata | yatraiva nivaseddāntastadaraṇyaṃ sa cāśramaḥ

हे भारत! दमशील के लिए वन से क्या प्रयोजन और जो दमशील नहीं है, उसके लिए भी वन से क्या? दमशील मनुष्य जहाँ रहता है, वही वन है और वही आश्रम है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 37 (12.158.37)

एतद्भीष्मस्य वचनं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः । अमृतेनेव संतृप्तः प्रहृष्टः समपद्यत ॥

etadbhīṣmasya vacanaṃ śrutvā rājā yudhiṣṭhiraḥ | amṛteneva saṃtṛptaḥ prahṛṣṭaḥ samapadyata

भीष्म के ये वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर अमृत से तृप्त हुए-से अत्यन्त प्रसन्न हो गए।

श्लोक 38 (12.158.38)

पुनश्च परिपप्रच्छ भीष्मं धर्मभृतां वरम् । ततः प्रीतः स चोवाच तस्मै सर्वं कुरूद्वहः ॥

punaśca paripapraccha bhīṣmaṃ dharmabhṛtāṃ varam | tataḥ prītaḥ sa covāca tasmai sarvaṃ kurūdvahaḥ

उसने धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ भीष्म से फिर प्रश्न किया; तब प्रसन्न होकर कुरुओं के उन अग्रणी ने उसे सब कुछ बताया।

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