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शान्ति पर्व · अध्याय 160

सत्य और उसके तेरह रूप

युधिष्ठिर पूछते हैं कि सत्य क्या है, उसकी प्राप्ति कैसे होती है और उससे क्या मिलता है। भीष्म उत्तर देते हैं कि सत्य सब वर्णों का साधारण धर्म है, और उसके रूप गिनाते हैं: समता, दम, अमत्सर, क्षमा, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, धृति, दया, अहिंसा आदि, तथा इनमें से प्रत्येक की प्राप्ति के साधन। अन्त में वे कहते हैं कि सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं, और तराजू पर तौलने पर सत्य हज़ार अश्वमेध यज्ञों से भी भारी ठहरता है।

अध्याय 159अध्याय-सूचीअध्याय 161

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.160.1)

सत्यं धर्मं प्रशंसन्ति विप्रर्षिपितृदेवताः । सत्यमिच्छाम्यहं ज्ञातुं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

satyaṃ dharmaṃ praśaṃsanti viprarṣipitṛdevatāḥ | satyamicchāmyahaṃ jñātuṃ tanme brūhi pitāmaha

ऋषि, ब्राह्मण, पितर और देवता सत्य को धर्म कहकर उसकी प्रशंसा करते हैं। मैं सत्य को जानना चाहता हूँ; हे पितामह, मुझे उसके विषय में बताइए।

श्लोक 2 (12.160.2)

सत्यं किंलक्षणं राजन्कथं वा तदवाप्यते । सत्यं प्राप्य भवेत्किंच कथं चैव तदुच्यताम् ॥

satyaṃ kiṃlakṣaṇaṃ rājankathaṃ vā tadavāpyate | satyaṃ prāpya bhavetkiṃca kathaṃ caiva taducyatām

हे राजन्! सत्य का लक्षण क्या है और वह कैसे प्राप्त होता है? सत्य को पाकर क्या प्राप्त होता है और कैसे? यह बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.160.3)

चातुर्वर्ण्यस्य धर्माणां संकरो न प्रशस्यते । धर्मः साधारणः सत्यं सर्ववर्णेषु भारत ॥

cāturvarṇyasya dharmāṇāṃ saṃkaro na praśasyate | dharmaḥ sādhāraṇaḥ satyaṃ sarvavarṇeṣu bhārata

चारों वर्णों के धर्मों का मिश्रण प्रशंसनीय नहीं है। हे भारत! सत्य सभी वर्णों का साधारण धर्म है।

श्लोक 4 (12.160.4)

सत्यं सत्सु सदा धर्मः सत्यं धर्मः सनातनः । सत्यमेव नमस्येत सत्यं हि परमा गतिः ॥

satyaṃ satsu sadā dharmaḥ satyaṃ dharmaḥ sanātanaḥ | satyameva namasyeta satyaṃ hi paramā gatiḥ

सज्जनों में सत्य सदा धर्म है; सत्य ही सनातन धर्म है। सत्य को ही नमस्कार करना चाहिए, क्योंकि सत्य परम गति है।

श्लोक 5 (12.160.5)

सत्यं धर्मस्तपोयोगः सत्यं ब्रह्म सनातनम् । सत्यं यज्ञः परः प्रोक्तः सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥

satyaṃ dharmastapoyogaḥ satyaṃ brahma sanātanam | satyaṃ yajñaḥ paraḥ proktaḥ sarvaṃ satye pratiṣṭhitam

सत्य धर्म है, तप है और योग है; सत्य सनातन ब्रह्म है; सत्य को परम यज्ञ कहा गया है; सब कुछ सत्य में प्रतिष्ठित है।

श्लोक 6 (12.160.6)

रूपं यदिह सत्यस्य यथावदनुपूर्वशः । लक्षणं च प्रवक्ष्यामि सत्यस्येह पराक्रमम् ॥

rūpaṃ yadiha satyasya yathāvadanupūrvaśaḥ | lakṣaṇaṃ ca pravakṣyāmi satyasyeha parākramam

मैं क्रम से और यथावत् बताऊँगा कि यहाँ सत्य का रूप क्या है, उसके लक्षण क्या हैं और इस लोक में उसका बल कैसा है।

श्लोक 7 (12.160.7)

प्राप्यते च यथा सत्यं तच्च वेत्तुमिहार्हसि । सत्यं त्रयोदशविधं सर्वलोकेषु भारत ॥

prāpyate ca yathā satyaṃ tacca vettumihārhasi | satyaṃ trayodaśavidhaṃ sarvalokeṣu bhārata

सत्य कैसे प्राप्त होता है, यह भी तुम्हें जानना चाहिए। हे भारत! सब लोकों में सत्य तेरह प्रकार का है।

श्लोक 8 (12.160.8)

सत्यं च समता चैव दमश्चैव न संशयः । अमात्सर्यं क्षमा चैव ह्रीस्तितिक्षाऽनसूयता ॥

satyaṃ ca samatā caiva damaścaiva na saṃśayaḥ | amātsaryaṃ kṣamā caiva hrīstitikṣā'nasūyatā

सत्य, समता और दम, इसमें संशय नहीं; मात्सर्य का अभाव, क्षमा, लज्जा, तितिक्षा, दोषदृष्टि का अभाव;

श्लोक 9 (12.160.9)

त्यागो ध्यानमथार्यत्वं धृतिश्च सततं दया । अहिंसा चैव राजेन्द्र सत्याकारास्त्रयोदश ॥

tyāgo dhyānamathāryatvaṃ dhṛtiśca satataṃ dayā | ahiṃsā caiva rājendra satyākārāstrayodaśa

त्याग, ध्यान, आर्यता, निरन्तर धैर्य, दया और अहिंसा, हे राजेन्द्र: ये सत्य के तेरह आकार हैं।

श्लोक 10 (12.160.10)

सत्यं नामाव्ययं नित्यमविकारि तथैव च । सर्वधर्माविरुद्धं च योगेनैतदवाप्यते ॥

satyaṃ nāmāvyayaṃ nityamavikāri tathaiva ca | sarvadharmāviruddhaṃ ca yogenaitadavāpyate

सत्य अविनाशी, नित्य और विकाररहित है; वह किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है और योग से प्राप्त होता है।

श्लोक 11 (12.160.11)

आत्मनीष्टे तथाऽनिष्टे रिपौ च समता तथा । इच्छाद्वेषं क्षयं प्राप्य कामक्रोधक्षयं तथा ॥

ātmanīṣṭe tathā'niṣṭe ripau ca samatā tathā | icchādveṣaṃ kṣayaṃ prāpya kāmakrodhakṣayaṃ tathā

अपने लिए प्रिय और अप्रिय में तथा शत्रु के प्रति भी समभाव; इच्छा और द्वेष का क्षय करके, तथा काम और क्रोध का भी क्षय करके;

श्लोक 12 (12.160.12)

दमी नान्यस्पृहा नित्यं गाम्भीर्यं धैर्यमेव च । अशाठ्यं क्रोधदमनं ज्ञानेनैतदवाप्यते ॥

damī nānyaspṛhā nityaṃ gāmbhīryaṃ dhairyameva ca | aśāṭhyaṃ krodhadamanaṃ jñānenaitadavāpyate

संयमी पुरुष दूसरे की वस्तु की स्पृहा कभी नहीं करता; उसमें गम्भीरता और धैर्य होता है, वह कपटरहित होता है और क्रोध को दबाए रखता है। यह ज्ञान से प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (12.160.13)

अमात्सर्यं बुधाः प्राहुर्दाने धर्मे च संयमः । अवस्थितेन नित्यं च सत्येनामत्सरी भवेत् ॥

amātsaryaṃ budhāḥ prāhurdāne dharme ca saṃyamaḥ | avasthitena nityaṃ ca satyenāmatsarī bhavet

ज्ञानी कहते हैं कि दान और धर्म में संयम ही मात्सर्य का अभाव है। सत्य में सदा स्थित रहने से मनुष्य मत्सरहीन हो जाता है।

श्लोक 14 (12.160.14)

अक्षमायाः क्षमायाश्च प्रियाणीहाप्रियाणि च । क्षमते सर्वतः साधुस्ततः प्राप्नोति सत्यताम् ॥

akṣamāyāḥ kṣamāyāśca priyāṇīhāpriyāṇi ca | kṣamate sarvataḥ sādhustataḥ prāpnoti satyatām

यहाँ क्षमाशील और क्षमारहित, दोनों से प्रिय और अप्रिय बातें मिलती हैं; सज्जन सब ओर से उन्हें सह लेता है और उसी से सत्य को पाता है।

श्लोक 15 (12.160.15)

कल्याणं कुरुते बाढं धीमान्न ग्लायते क्वचित् । प्रशान्तवाङ्मना नित्यं ह्रीस्तु धर्मादवाप्यते ॥

kalyāṇaṃ kurute bāḍhaṃ dhīmānna glāyate kvacit | praśāntavāṅmanā nityaṃ hrīstu dharmādavāpyate

बुद्धिमान् पुरुष पूरे मन से कल्याण करता है और कहीं भी थकता नहीं; वाणी और मन से सदा शान्त रहने वाले को धर्म से लज्जा प्राप्त होती है।

श्लोक 16 (12.160.16)

धर्मार्थहेतोः क्षमते तितिक्षा धर्म उत्तमः । लोकसंग्रहणार्थं वै सा तु धैर्येण लभ्यते ॥

dharmārthahetoḥ kṣamate titikṣā dharma uttamaḥ | lokasaṃgrahaṇārthaṃ vai sā tu dhairyeṇa labhyate

धर्म और प्रयोजन के लिए मनुष्य क्षमा करता है; तितिक्षा उत्तम धर्म है। वह लोक को धारण करने के लिए है और धैर्य से प्राप्त होती है।

श्लोक 17 (12.160.17)

अनसूया तु गाम्भीर्यं दानेनैतदवाप्यते । त्यक्तस्नेहस्य यस्त्यागो विषयाणां तथैव च । रागद्वेषप्रहीणस्य त्यागो भवति नान्यथा ॥

anasūyā tu gāmbhīryaṃ dānenaitadavāpyate | tyaktasnehasya yastyāgo viṣayāṇāṃ tathaiva ca | rāgadveṣaprahīṇasya tyāgo bhavati nānyathā

दोषदृष्टि का अभाव गम्भीरता है, जो दान से प्राप्त होती है। स्नेह का और इसी प्रकार विषयों का परित्याग त्याग है; जो राग और द्वेष से पूरी तरह मुक्त है, उसी में त्याग होता है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 18 (12.160.18)

ध्यानं चाशाठ्यमित्युक्तं मौनेनैतदवाप्यते । आर्यता नाम भूतानां यः करोति प्रयत्नतः । शुभं कर्म निराकारो वीतरागस्तथैव च ॥

dhyānaṃ cāśāṭhyamityuktaṃ maunenaitadavāpyate | āryatā nāma bhūtānāṃ yaḥ karoti prayatnataḥ | śubhaṃ karma nirākāro vītarāgastathaiva ca

ध्यान और कपटरहितता का भी नाम लिया गया है; ये मौन से प्राप्त होते हैं। आर्यता वह है जब मनुष्य प्राणियों के लिए यत्नपूर्वक शुभ कर्म करता है, दिखावे से रहित और वीतराग रहकर।

श्लोक 19 (12.160.19)

धृतिर्नाम सुखे दुःखे यया नाप्नोति विक्रियाम् । तां भजेत सदा प्राज्ञो य इच्छेद्भूतिमात्मनः ॥

dhṛtirnāma sukhe duḥkhe yayā nāpnoti vikriyām | tāṃ bhajeta sadā prājño ya icchedbhūtimātmanaḥ

धृति वह है जिससे मनुष्य सुख और दुःख में विकार को प्राप्त नहीं होता। जो प्रज्ञावान् अपना कल्याण चाहता है, उसे सदा उसका सेवन करना चाहिए।

श्लोक 20 (12.160.20)

सर्वथा क्षमिणा भाव्यं तथा सत्यपरेण च । वीतहर्षभयक्रोधो धृतिमाप्नोति पण्डितः ॥

sarvathā kṣamiṇā bhāvyaṃ tathā satyapareṇa ca | vītaharṣabhayakrodho dhṛtimāpnoti paṇḍitaḥ

मनुष्य को सब प्रकार से क्षमाशील और सत्यनिष्ठ होना चाहिए। हर्ष, भय और क्रोध से रहित होकर पण्डित धृति को पाता है।

श्लोक 21 (12.160.21)

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥

adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā | anugrahaśca dānaṃ ca satāṃ dharmaḥ sanātanaḥ

कर्म, मन और वाणी से सब प्राणियों से द्रोह न करना, अनुग्रह और दान: यह सज्जनों का सनातन धर्म है।

श्लोक 22 (12.160.22)

एते त्रयोदशाकाराः पृथक्सत्यैकलक्षणाः । भजन्ते सत्यमेवेह बृंहयन्ते च भारत ॥

ete trayodaśākārāḥ pṛthaksatyaikalakṣaṇāḥ | bhajante satyameveha bṛṃhayante ca bhārata

ये तेरह आकार अलग-अलग हैं, फिर भी सत्य ही इन सबका एकमात्र लक्षण है; हे भारत! ये सत्य का ही आश्रय लेते हैं और उसे बढ़ाते हैं।

श्लोक 23 (12.160.23)

नान्तः शक्यो गुणानां च वक्तुं सत्यस्य पार्थिव । अतः सत्यं प्रशंसन्ति विप्राः सपितृदेवताः ॥

nāntaḥ śakyo guṇānāṃ ca vaktuṃ satyasya pārthiva | ataḥ satyaṃ praśaṃsanti viprāḥ sapitṛdevatāḥ

हे राजन्! सत्य के गुणों का अन्त बताया नहीं जा सकता; इसीलिए ब्राह्मण, पितरों और देवताओं सहित, सत्य की प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 24 (12.160.24)

नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम् । स्थितिर्हि सत्यं धर्मस्य तस्मात्सत्यं न लोपयेत् ॥

nāsti satyātparo dharmo nānṛtātpātakaṃ param | sthitirhi satyaṃ dharmasya tasmātsatyaṃ na lopayet

सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं और असत्य से बड़ा कोई पातक नहीं। सत्य धर्म की स्थिति है; इसलिए सत्य का कभी लोप नहीं करना चाहिए।

श्लोक 25 (12.160.25)

उपैति सत्याद्दानं हि तथा यज्ञाः सदक्षिणाः । त्रेताग्निहोत्रं वेदाश्च ये चान्ये धर्मनिश्चयाः ॥

upaiti satyāddānaṃ hi tathā yajñāḥ sadakṣiṇāḥ | tretāgnihotraṃ vedāśca ye cānye dharmaniścayāḥ

सत्य से ही दान, दक्षिणा सहित यज्ञ, तीनों अग्नियाँ, अग्निहोत्र, वेद और जो अन्य धर्म-निश्चय हैं, वे सब उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 26 (12.160.26)

अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥

aśvamedhasahasraṃ ca satyaṃ ca tulayā dhṛtam | aśvamedhasahasrāddhi satyameva viśiṣyate

एक हज़ार अश्वमेध यज्ञों और सत्य को तराजू पर तौला गया; सत्य हज़ार अश्वमेध यज्ञों से भी बढ़कर ठहरा।

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