शान्ति पर्व · अध्याय 163
यज्ञ के लिए धन-ग्रहण और पापों के प्रायश्चित्त
भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि किन ब्राह्मणों को दान मिलना चाहिए और धर्मात्मा राजा आवश्यकता पड़ने पर यज्ञ और दान की उपेक्षा करने वालों से कैसे धन ले सकता है; साथ ही विपत्ति में यज्ञ, दक्षिणा और प्रतिनिधि विधियों के नियम कहते हैं। फिर वे महापापों और अन्य दोषों को गिनाकर प्रायश्चित्त बताते हैं: ब्रह्महत्या, सुरापान, गुरुशय्या-गमन, पशुवध, व्यभिचार तथा बड़े भाई से पहले छोटे भाई के विवाह के।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.163.1)
कृतार्थी यक्ष्यमाणश्च सर्ववेदान्तगश्च यः । आचार्यपितृकार्यार्थं स्वाध्यायार्थमथापि च ॥
kṛtārthī yakṣyamāṇaśca sarvavedāntagaśca yaḥ | ācāryapitṛkāryārthaṃ svādhyāyārthamathāpi ca
जिन्होंने अपना प्रयोजन पूरा कर लिया है, जो यज्ञ करने वाले हैं, जो समस्त वेदान्त के पारगामी हैं, अथवा जो आचार्य, पितृकार्य या स्वाध्याय के लिए याचना करते हैं,
श्लोक 2 (12.163.2)
एते वै साधवो दृष्टा ब्राह्मणाः धर्मभिक्षवः । निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्या च भारत ॥
ete vai sādhavo dṛṣṭā brāhmaṇāḥ dharmabhikṣavaḥ | niḥsvebhyo deyametebhyo dānaṃ vidyā ca bhārata
ये सज्जन माने गए हैं, धर्म के लिए भिक्षा माँगने वाले ब्राह्मण। हे भारत, इनमें से जो निर्धन हों, उन्हें दान और विद्या देनी चाहिए।
श्लोक 3 (12.163.3)
अन्यत्र दक्षिणादानं देयं भरतसत्तम । अन्येभ्योऽपि बहिर्वेदि न कृतान्नं विधीयते ॥
anyatra dakṣiṇādānaṃ deyaṃ bharatasattama | anyebhyo'pi bahirvedi na kṛtānnaṃ vidhīyate
हे भरतश्रेष्ठ, इनके अतिरिक्त अन्यत्र भी दक्षिणा देनी चाहिए; और दूसरों को वेदी के बाहर पका हुआ अन्न देने का विधान नहीं है।
श्लोक 4 (12.163.4)
सर्वरत्नानि राजा हि यथार्हं प्रतिपादयेत् । ब्राह्मणायैव यज्ञाश्च सहान्नाः सहदक्षिणाः ॥
sarvaratnāni rājā hi yathārhaṃ pratipādayet | brāhmaṇāyaiva yajñāśca sahānnāḥ sahadakṣiṇāḥ
राजा को चाहिए कि सब प्रकार के रत्न यथायोग्य ब्राह्मण को ही दे; और अन्न तथा दक्षिणा सहित यज्ञ भी ब्राह्मण के लिए ही हैं।
श्लोक 5 (12.163.5)
अन्येभ्यो विमलाचारा यजन्ते गुणतः सदा । यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये । अधिकं चापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥
anyebhyo vimalācārā yajante guṇataḥ sadā | yasya traivārṣikaṃ bhaktaṃ paryāptaṃ bhṛtyavṛttaye | adhikaṃ cāpi vidyeta sa somaṃ pātumarhati
निर्मल आचरण वाले दूसरे लोग सदा अपनी योग्यता के अनुसार यज्ञ करते हैं। जिसके पास अपने आश्रितों के पालन के लिए तीन वर्ष का अन्न पर्याप्त हो और उससे अधिक भी हो, वह सोमपान के योग्य है।
श्लोक 6 (12.163.6)
यज्ञश्चेत्प्रतिरुद्धः स्यादंशेनैकेन यज्वनः । ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥
yajñaścetpratiruddhaḥ syādaṃśenaikena yajvanaḥ | brāhmaṇasya viśeṣeṇa dhārmike sati rājani
यदि किसी यज्ञ करने वाले का, और विशेषकर ब्राह्मण का, यज्ञ एक अंग के अभाव में रुक जाए और राजा धर्मात्मा हो,
श्लोक 7 (12.163.7)
यो वैश्यः स्याद्बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः । कुटुम्बात्तस्य तद्वित्तं यज्ञार्थं पार्थिवो हरेत् ॥
yo vaiśyaḥ syādbahupaśurhīnakraturasomapaḥ | kuṭumbāttasya tadvittaṃ yajñārthaṃ pārthivo haret
तो जो वैश्य बहुत पशुओं वाला होकर भी यज्ञ नहीं करता और सोमपान नहीं करता, उसके परिवार से वह धन राजा यज्ञ के लिए ले ले।
श्लोक 8 (12.163.8)
आहरेद्द्रुह्यतः किंचित्कामं शूद्रस्य वेश्मनि । न हि वेश्मनि शूद्रस्य किंचिदस्ति परिग्रहः ॥
āhareddruhyataḥ kiṃcitkāmaṃ śūdrasya veśmani | na hi veśmani śūdrasya kiṃcidasti parigrahaḥ
द्वेष रखने वाले शूद्र के घर से भी वह इच्छानुसार कुछ ले सकता है; क्योंकि शूद्र के घर में उसका अपना कोई परिग्रह नहीं होता।
श्लोक 9 (12.163.9)
योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः । तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥
yo'nāhitāgniḥ śatagurayajvā ca sahasraguḥ | tayorapi kuṭumbābhyāmāharedavicārayan
जिसने अग्नि की स्थापना नहीं की और जिसके पास सौ गायें हैं, अथवा जो यज्ञ नहीं करता और जिसके पास हज़ार गायें हैं, इन दोनों के परिवारों से वह बिना विचार किए ले सकता है।
श्लोक 10 (12.163.10)
अदातृभ्यो हरेद्वित्तं विख्याप्य नृपतिः सदा । तथैवाचरतो धर्मो नृपतेः स्यादथाखिलः ॥
adātṛbhyo haredvittaṃ vikhyāpya nṛpatiḥ sadā | tathaivācarato dharmo nṛpateḥ syādathākhilaḥ
जो दान नहीं देते, उनसे राजा सबको बताकर सदा धन ले सकता है; ऐसा करने से राजा का धर्म पूर्ण होता है।
श्लोक 11 (12.163.11)
तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नतः । अश्वस्तनविभागेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥
tathaiva saptame bhakte bhaktāni ṣaḍanaśnataḥ | aśvastanavibhāgena hartavyaṃ hīnakarmaṇaḥ
इसी प्रकार जो छह भोजन-काल निराहार रह चुका हो, वह सातवें भोजन-काल पर कर्तव्य से हीन मनुष्य से एक दिन के निर्वाह जितना ले ले, कल के लिए कुछ बचाकर न रखे।
श्लोक 12 (12.163.12)
खलात्क्षेत्रात्तथागाराद्यतो वाऽप्युपपद्यते । आख्यातव्यं नृपस्यैतत्पृच्छतोऽपृच्छतोऽपि वा । न तस्मै धारयेद्दण्डं राजा धर्मेण धर्मवित् ॥
khalātkṣetrāttathāgārādyato vā'pyupapadyate | ākhyātavyaṃ nṛpasyaitatpṛcchato'pṛcchato'pi vā | na tasmai dhārayeddaṇḍaṃ rājā dharmeṇa dharmavit
खलिहान से, खेत से, घर से या जहाँ से भी मिल सके, वह इसकी सूचना राजा को दे, चाहे राजा पूछे या न पूछे। तब धर्म जानने वाला राजा धर्मानुसार उसे दण्ड न दे।
श्लोक 13 (12.163.13)
क्षत्रियस्य तु बालिश्याद्ब्राह्मणः क्लिश्यते क्षुधा । श्रुतशीले समाज्ञाय वृत्तिमस्य प्रकल्पयेत् ॥
kṣatriyasya tu bāliśyādbrāhmaṇaḥ kliśyate kṣudhā | śrutaśīle samājñāya vṛttimasya prakalpayet
यदि क्षत्रिय की असावधानी से कोई ब्राह्मण भूख से कष्ट पाए, तो राजा उसकी विद्या और शील जानकर उसकी आजीविका का प्रबन्ध करे,
श्लोक 14 (12.163.14)
अथैनं परिरक्षेत पिता पुत्रमिवौरसम् ॥
athainaṃ parirakṣeta pitā putramivaurasam
और फिर उसकी रक्षा वैसे ही करे जैसे पिता अपने औरस पुत्र की करता है।
श्लोक 15 (12.163.15)
इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये । अविकल्पः पुरा धर्मो धर्मवादैस्तु केवलः ॥
iṣṭiṃ vaiśvānarīṃ nityaṃ nirvapedabdaparyaye | avikalpaḥ purā dharmo dharmavādaistu kevalaḥ
प्रत्येक वर्ष के अन्त में वह वैश्वानरी इष्टि का अनुष्ठान करे। प्राचीन काल में धर्म में कोई विकल्प नहीं था; विकल्प केवल धर्म के वक्ताओं के कथनों से ही माने जाते हैं।
श्लोक 16 (12.163.16)
विश्वैर्देवैश्च साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः । आपत्सु मरणाद्भीतैर्लिङ्गः प्रतिनिधीकृतः ॥
viśvairdevaiśca sādhyaiśca brāhmaṇaiśca maharṣibhiḥ | āpatsu maraṇādbhītairliṅgaḥ pratinidhīkṛtaḥ
विपत्ति में मृत्यु के भय से विश्वेदेवों, साध्यों, ब्राह्मणों और महर्षियों ने एक प्रतीक को प्रतिनिधि (स्थानापन्न) बना लिया।
श्लोक 17 (12.163.17)
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते । स नाप्नोति फलं तस्य प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ॥
prabhuḥ prathamakalpasya yo'nukalpena vartate | sa nāpnoti phalaṃ tasya pretya ceha ca durmatiḥ
जो मुख्य विधि का पालन करने में समर्थ होकर भी गौण विधि से चलता है, वह दुर्बुद्धि उसका फल न इस लोक में पाता है, न परलोक में।
श्लोक 18 (12.163.18)
न ब्राह्मणो वेदयीत किंचिद्राजनि धर्मवित् । अविद्यावेदनाद्विद्यात्स्ववीर्यं वीर्यवत्तरम् । तस्माद्राज्ञः सदा तेजो दुःसहं ब्रह्मवादिनाम् ॥
na brāhmaṇo vedayīta kiṃcidrājani dharmavit | avidyāvedanādvidyātsvavīryaṃ vīryavattaram | tasmādrājñaḥ sadā tejo duḥsahaṃ brahmavādinām
धर्म जानने वाला ब्राह्मण राजा को कुछ न बताए। जो बात राजा नहीं जानता, उसे बताने से मनुष्य अपने बल को अधिक बलवान समझने लगे। इसीलिए ब्रह्मवादियों का तेज राजा के लिए सदा असह्य होता है।
श्लोक 19 (12.163.19)
मन्ता शास्ता विधाता च ब्राह्मणो देव उच्यते । तस्मिन्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कामीरयेद्गिरम् ॥
mantā śāstā vidhātā ca brāhmaṇo deva ucyate | tasminnākuśalaṃ brūyānna śuṣkāmīrayedgiram
ब्राह्मण को मन्त्रणा देने वाला, शासन करने वाला और विधान करने वाला, अर्थात् देव कहा जाता है। उसके विषय में अमंगल बात न कहे और न उससे कठोर वाणी बोले।
श्लोक 20 (12.163.20)
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः । धनैर्वैश्यश्च शूद्रश्च मन्त्रैर्होमैश्च वै द्विजः ॥
kṣatriyo bāhuvīryeṇa taredāpadamātmanaḥ | dhanairvaiśyaśca śūdraśca mantrairhomaiśca vai dvijaḥ
क्षत्रिय अपने बाहुबल से अपनी विपत्ति पार करे; वैश्य और शूद्र धन से; और ब्राह्मण मन्त्रों तथा होम से।
श्लोक 21 (12.163.21)
नैव कन्या न युवतिर्नामन्त्रज्ञो न बालिशः । परिवेष्टाऽग्निहोत्रस्य भवेन्नासंस्कृतस्तथा ॥
naiva kanyā na yuvatirnāmantrajño na bāliśaḥ | pariveṣṭā'gnihotrasya bhavennāsaṃskṛtastathā
न कन्या, न युवती, न मन्त्र न जानने वाला, न मूर्ख और न संस्कारहीन पुरुष अग्निहोत्र की आहुतियाँ देने का कार्य करे।
श्लोक 22 (12.163.22)
नरके निपतन्त्येते जुह्वानाः सवनस्य तत् । तस्माद्वैतानकुशलो होता स्याद्वेदपारगः ॥
narake nipatantyete juhvānāḥ savanasya tat | tasmādvaitānakuśalo hotā syādvedapāragaḥ
जो इस प्रकार सवन में आहुतियाँ देते हैं, वे नरक में गिरते हैं। इसलिए होता वैतानिक कर्मों में कुशल और वेद का पारगामी होना चाहिए।
श्लोक 23 (12.163.23)
प्राजापत्यमदत्त्वा च अग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् । अनाहिताग्निरिति सं प्रोच्यते धर्मदर्शिभिः ॥
prājāpatyamadattvā ca agnyādheyasya dakṣiṇām | anāhitāgniriti saṃ procyate dharmadarśibhiḥ
जिसने अग्न्याधान की दक्षिणा के रूप में प्राजापत्य दान नहीं दिया, उसे धर्म को देखने वाले लोग 'अनाहिताग्नि' कहते हैं।
श्लोक 24 (12.163.24)
पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । अनाप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्न यजेत कथंचन ॥
puṇyānyanyāni kurvīta śraddadhāno jitendriyaḥ | anāptadakṣiṇairyajñairna yajeta kathaṃcana
श्रद्धालु और जितेन्द्रिय पुरुष अन्य पुण्यकर्म करे, किन्तु जिन यज्ञों में दक्षिणा न दी गई हो, उनसे कभी यज्ञ न करे।
श्लोक 25 (12.163.25)
प्रजाः पशूंश्च स्वर्गं च हन्ति यज्ञो ह्यदक्षिणः । इन्द्रियाणि यशः कीर्तिमायुश्चाप्यवकृन्तति ॥
prajāḥ paśūṃśca svargaṃ ca hanti yajño hyadakṣiṇaḥ | indriyāṇi yaśaḥ kīrtimāyuścāpyavakṛntati
दक्षिणारहित यज्ञ प्रजा, पशुओं और स्वर्ग का नाश करता है; वह इन्द्रियों, यश, कीर्ति और आयु को काट डालता है।
श्लोक 26 (12.163.26)
उदक्यामासते ये च द्विजाः केचिदनग्नयः । कुलं चाश्रोत्रियं येषां सर्वे ते शूद्रकर्मिणः ॥
udakyāmāsate ye ca dvijāḥ kecidanagnayaḥ | kulaṃ cāśrotriyaṃ yeṣāṃ sarve te śūdrakarmiṇaḥ
जो द्विज रजस्वला स्त्री के साथ संसर्ग करते हैं, या जो अग्निहीन हैं, और जिनके कुल में कोई श्रोत्रिय नहीं है, वे सब शूद्र के कर्म करने वाले हैं।
श्लोक 27 (12.163.27)
उदपानोदके ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः । उषित्वा द्वादश समाः शूद्रकर्मैव गच्छति ॥
udapānodake grāme brāhmaṇo vṛṣalīpatiḥ | uṣitvā dvādaśa samāḥ śūdrakarmaiva gacchati
जो ब्राह्मण एक ही कुएँ का जल पीने वाले गाँव में वृषली का पति बनकर बारह वर्ष रह जाता है, वह शूद्र की गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 28 (12.163.28)
अभार्यां शयने विभ्रच्छूद्रं वृद्धं च वै द्विजः । अब्राह्मणं मन्यमानस्तृणेष्वासीत पृष्ठतः । तथा संशुध्यते राजञ्शृणु चात्र वचो मम ॥
abhāryāṃ śayane vibhracchūdraṃ vṛddhaṃ ca vai dvijaḥ | abrāhmaṇaṃ manyamānastṛṇeṣvāsīta pṛṣṭhataḥ | tathā saṃśudhyate rājañśṛṇu cātra vaco mama
जो द्विज अपनी शय्या पर पत्नी न रहने वाली स्त्री, शूद्र और वृद्ध को रखता है और अपने को अब्राह्मण मानता है, वह पीछे की ओर घास पर बैठे। इस प्रकार वह शुद्ध होता है। हे राजन्, इस विषय में मेरी बात सुनो।
श्लोक 29 (12.163.29)
यदेकरात्रेण करोति पापं । कृष्णं वर्णं ब्राह्मणः सेवमानः । स्थानासनाभ्यां विहरन्व्रती संस् । त्रिभिर्वर्षैः शमयेदात्मपापम् ॥
yadekarātreṇa karoti pāpaṃ | kṛṣṇaṃ varṇaṃ brāhmaṇaḥ sevamānaḥ | sthānāsanābhyāṃ viharanvratī saṃs | tribhirvarṣaiḥ śamayedātmapāpam
ब्राह्मण कृष्ण वर्ण की सेवा करके एक ही रात में जो पाप करता है, उसे वह व्रत धारण करके, खड़े रहकर और बैठकर विचरते हुए, तीन वर्षों में शान्त कर देता है।
श्लोक 30 (12.163.30)
न नर्मयुक्तमनृतं हिनस्ति । न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले । प्राणात्यये सर्वधनापहारे । पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥
na narmayuktamanṛtaṃ hinasti | na strīṣu rājanna vivāhakāle | prāṇātyaye sarvadhanāpahāre | pañcānṛtānyāhurapātakāni
हास-परिहास में कही गई असत्य बात हानि नहीं करती; न स्त्रियों के प्रति, हे राजन्, न विवाह के समय; न प्राण-संकट में, न तब जब सारा धन छीना जा रहा हो। ये पाँच असत्य पातक नहीं कहे गए हैं।
श्लोक 31 (12.163.31)
श्रद्दधानः शुभां विद्यां हीनादपि समाप्नुयात् । सुवर्णमपि चामेध्यादाददीताविचारयन् ॥
śraddadhānaḥ śubhāṃ vidyāṃ hīnādapi samāpnuyāt | suvarṇamapi cāmedhyādādadītāvicārayan
श्रद्धावान मनुष्य हीन व्यक्ति से भी उत्तम विद्या ग्रहण करे, और अपवित्र स्थान से भी बिना विचार किए सोना ले ले।
श्लोक 32 (12.163.32)
स्त्रीरत्नं दुष्कुलाच्चापि विषादप्यमृतं पिबेत् । अदूष्या हि स्त्रियो रत्नमाप इत्येव धर्मतः ॥
strīratnaṃ duṣkulāccāpi viṣādapyamṛtaṃ pibet | adūṣyā hi striyo ratnamāpa ityeva dharmataḥ
बुरे कुल से भी स्त्री-रत्न को ग्रहण करे, जैसे विष में से भी अमृत पी लिया जाता है; क्योंकि स्त्रियाँ दोषरहित हैं, और धर्म के अनुसार स्त्री रत्न है तथा जल के समान है।
श्लोक 33 (12.163.33)
गोब्राह्मणहितार्थं च वर्णानां संकरेषु च । वैश्यो गृह्णीत शस्त्राणि परित्राणार्थमात्मनः ॥
gobrāhmaṇahitārthaṃ ca varṇānāṃ saṃkareṣu ca | vaiśyo gṛhṇīta śastrāṇi paritrāṇārthamātmanaḥ
गौ और ब्राह्मणों के हित के लिए तथा वर्णसंकर की स्थिति में वैश्य अपनी रक्षा के लिए शस्त्र धारण कर सकता है।
श्लोक 34 (12.163.34)
सुरापो ब्रह्महा चैव गुरुतल्पगतस्तथा । अचिरेण महाराज पतितो वै भवत्युत ॥
surāpo brahmahā caiva gurutalpagatastathā | acireṇa mahārāja patito vai bhavatyuta
सुरापान करने वाला, ब्रह्महत्यारा और गुरु की शय्या पर गया हुआ, हे महाराज, ये शीघ्र ही पतित हो जाते हैं।
श्लोक 35 (12.163.35)
सुवर्णहरणं स्तैन्यं विप्रस्वं चेति पातकम् । विहारो मद्यपानं च अगम्यागमनं तथा ॥
suvarṇaharaṇaṃ stainyaṃ viprasvaṃ ceti pātakam | vihāro madyapānaṃ ca agamyāgamanaṃ tathā
सोने की चोरी, चोरी और ब्राह्मण का धन हरण पातक हैं; इसी प्रकार उच्छृंखल विहार, मद्यपान और अगम्या स्त्री से गमन भी।
श्लोक 36 (12.163.36)
पतितैः संप्रयोगश्च ब्राह्मणीयोनितस्तथा । अनिर्देश्यानि मन्यन्ते प्राणान्तानीति धारणा ॥
patitaiḥ saṃprayogaśca brāhmaṇīyonitastathā | anirdeśyāni manyante prāṇāntānīti dhāraṇā
पतितों से संसर्ग और (अब्राह्मण का) ब्राह्मणी से गमन, इन्हें ऐसे पाप माना जाता है जिनके लिए कोई प्रायश्चित्त निर्दिष्ट नहीं है और जो प्राणान्त के साथ ही समाप्त होते हैं; ऐसी मान्यता है।
श्लोक 37 (12.163.37)
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् । याजनाध्यापनाद्दानान्न तु यानासनाशनात् ॥
saṃvatsareṇa patati patitena sahācaran | yājanādhyāpanāddānānna tu yānāsanāśanāt
पतित के साथ रहने वाला एक वर्ष में पतित हो जाता है, यज्ञ कराने, पढ़ाने या दान देने से; किन्तु साथ यात्रा करने, बैठने या भोजन करने से नहीं।
श्लोक 38 (12.163.38)
एतानि हित्वातोऽन्यानि निर्देश्यानीति धारणा । निर्देश्यकेन विधिना कालेनाव्यसनी भवेत् ॥
etāni hitvāto'nyāni nirdeśyānīti dhāraṇā | nirdeśyakena vidhinā kālenāvyasanī bhavet
इनको छोड़कर शेष पाप प्रायश्चित्त-निर्दिष्ट माने जाते हैं; निर्दिष्ट विधि से समय पाकर मनुष्य निर्दोष हो जाता है।
श्लोक 39 (12.163.39)
अनुत्तीर्य न होतव्यं प्रेतकर्मण्युपाश्रिते । त्रिषु त्वेतेषु पूर्वेषु न कुर्वीत विचारणम् ॥
anuttīrya na hotavyaṃ pretakarmaṇyupāśrite | triṣu tveteṣu pūrveṣu na kurvīta vicāraṇam
प्रेतकर्म उपस्थित होने पर बिना पार उतरे आहुति नहीं देनी चाहिए; और इनमें से पहले तीन के विषय में कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 40 (12.163.40)
अमात्यान्वा गुरून्वापि जह्याद्धर्मेण धार्मिकः । प्रायश्चित्तान्यकुर्वाणा नैते कुर्वन्ति संविदम् ॥
amātyānvā gurūnvāpi jahyāddharmeṇa dhārmikaḥ | prāyaścittānyakurvāṇā naite kurvanti saṃvidam
धर्मात्मा पुरुष धर्मानुसार अपने मन्त्रियों या गुरुओं को भी त्याग दे, यदि वे प्रायश्चित्त न करें; ऐसे लोग किसी करार में नहीं आते।
श्लोक 41 (12.163.41)
अधर्मकारी धर्मेण तपसा हन्ति किल्विषम् । ब्राह्मणायावगुर्येत स्पृष्टे गुरुतरं भवेत् ॥
adharmakārī dharmeṇa tapasā hanti kilviṣam | brāhmaṇāyāvaguryeta spṛṣṭe gurutaraṃ bhavet
अधर्म करने वाला धर्म और तप से अपने पाप का नाश करता है। जो ब्राह्मण पर शस्त्र उठाए और ब्राह्मण को चोट लग जाए, तो पाप और भारी हो जाता है।
श्लोक 42 (12.163.42)
अस्तेनं स्तेन इत्युक्त्वा द्विगुणं पापमाप्नुयात् । त्रिभागं ब्रह्महत्यायाः कन्यां प्राप्नोति दुष्यति । यस्तु दूषयिता तस्याः शेषं प्राप्नोति पाप्मनः ॥
astenaṃ stena ityuktvā dviguṇaṃ pāpamāpnuyāt | tribhāgaṃ brahmahatyāyāḥ kanyāṃ prāpnoti duṣyati | yastu dūṣayitā tasyāḥ śeṣaṃ prāpnoti pāpmanaḥ
जो निर्दोष को चोर कहता है, वह दुगुना पाप पाता है। दूषित हुई कन्या ब्रह्महत्या के पाप का तीसरा भाग पाती है, और जिसने उसे दूषित किया वह उस पाप का शेष भाग पाता है।
श्लोक 43 (12.163.43)
ब्राह्मणानवगर्ह्येह स्पृष्ट्वा गुरुतरं भवेत् । वर्षाणां हि शतं पापः प्रतिष्ठां नाधिगच्छति ॥
brāhmaṇānavagarhyeha spṛṣṭvā gurutaraṃ bhavet | varṣāṇāṃ hi śataṃ pāpaḥ pratiṣṭhāṃ nādhigacchati
यहाँ जो ब्राह्मणों की निन्दा करके उन पर प्रहार करता है, उसका दोष और भारी हो जाता है; वह पापी सौ वर्ष तक कहीं ठौर नहीं पाता।
श्लोक 44 (12.163.44)
सहस्रं चैव वर्षाणां निपत्य नरकं वसेत् । तस्मान्नैवावगुर्याद्धि नैव जातु निपातयेत् ॥
sahasraṃ caiva varṣāṇāṃ nipatya narakaṃ vaset | tasmānnaivāvaguryāddhi naiva jātu nipātayet
वह गिरकर हज़ार वर्ष तक नरक में रहता है। इसलिए ब्राह्मण पर कभी शस्त्र न उठाए और कभी उसे गिराए नहीं।
श्लोक 45 (12.163.45)
शोणितं यावतः पांसून्संगृह्णीयाद्द्विजक्षतात् । तावतीः स समा राजन्नरके प्रतिपद्यते ॥
śoṇitaṃ yāvataḥ pāṃsūnsaṃgṛhṇīyāddvijakṣatāt | tāvatīḥ sa samā rājannarake pratipadyate
ब्राह्मण के घाव से निकले रक्त को जितने धूल-कण सोख लेते हैं, हे राजन्, उतने वर्षों तक वह नरक में रहता है।
श्लोक 46 (12.163.46)
भ्रूणहाऽऽहवमध्ये तु शुध्यते शस्त्रपाततः । आत्मानं जुहुयादग्नौ समिद्धे तेन शुध्यते ॥
bhrūṇahā''havamadhye tu śudhyate śastrapātataḥ | ātmānaṃ juhuyādagnau samiddhe tena śudhyate
ब्रह्महत्यारा युद्ध के बीच शस्त्र से मारा जाने पर शुद्ध होता है; अथवा प्रज्वलित अग्नि में अपने को होम देने से वह शुद्ध होता है।
श्लोक 47 (12.163.47)
सुरापो वारुणीमुष्णां पीत्वा पापाद्विमुच्यते ॥
surāpo vāruṇīmuṣṇāṃ pītvā pāpādvimucyate
सुरापान करने वाला खौलती हुई सुरा पीकर पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 48 (12.163.48)
तया स काये निर्दग्धे मृत्युं वा प्राप्य शुध्यति । लोकांश्च लभते विप्रो नान्यथा लभते हि सः ॥
tayā sa kāye nirdagdhe mṛtyuṃ vā prāpya śudhyati | lokāṃśca labhate vipro nānyathā labhate hi saḥ
उससे शरीर जल जाने पर, अथवा मृत्यु को प्राप्त होकर वह शुद्ध हो जाता है; और वह ब्राह्मण लोकों को पाता है, अन्य प्रकार से नहीं पाता।
श्लोक 49 (12.163.49)
गुरुतल्पमधिष्ठाय दुरात्मा पापचेतनः । शिलां ज्वलन्तीमासाद्य मृत्युना सोऽभिशुध्यति ॥
gurutalpamadhiṣṭhāya durātmā pāpacetanaḥ | śilāṃ jvalantīmāsādya mṛtyunā so'bhiśudhyati
जो दुरात्मा और पापबुद्धि पुरुष गुरु की शय्या पर चढ़ा हो, वह जलती हुई शिला के पास जाकर मृत्यु से पूर्णतः शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 50 (12.163.50)
अथवा शिश्नवृषणावादायाञ्जलिना स्वयम् । नैर्ऋतीं दिशमास्थाय निपतेत्सत्वजिह्मगः ॥
athavā śiśnavṛṣaṇāvādāyāñjalinā svayam | nairṛtīṃ diśamāsthāya nipatetsatvajihmagaḥ
अथवा वह अपने ही हाथों की अञ्जलि में अपना लिङ्ग और अण्डकोश लेकर नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा की ओर चल पड़े और बिना मुड़े सीधा चलता हुआ गिर पड़े।
श्लोक 51 (12.163.51)
ब्राह्मणार्थेऽपि वा प्राणान्संत्यजंस्तेन शुध्यति ॥
brāhmaṇārthe'pi vā prāṇānsaṃtyajaṃstena śudhyati
अथवा ब्राह्मण के लिए प्राण त्याग देने से भी वह शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 52 (12.163.52)
अश्वमेधेन वाऽपीष्ट्वा अथवा गोसवेन वा । मरुत्सोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूज्यते ॥
aśvamedhena vā'pīṣṭvā athavā gosavena vā | marutsomena vā samyagiha pretya ca pūjyate
अथवा अश्वमेध, गोसव या मरुत्सोम यज्ञ विधिपूर्वक करके वह यहाँ और मरने के बाद भी पूजित होता है।
श्लोक 53 (12.163.53)
तथैव द्वादशसमाः कापोतं धर्ममाचरेत् । एककालं चरेद्भैक्षं स्वकर्मोदाहरञ्जने ॥
tathaiva dvādaśasamāḥ kāpotaṃ dharmamācaret | ekakālaṃ caredbhaikṣaṃ svakarmodāharañjane
इसी प्रकार बारह वर्ष तक वह कापोत वृत्ति से रहे, दिन में एक बार भिक्षा माँगे और लोगों में अपना कर्म घोषित करता रहे।
श्लोक 54 (12.163.54)
एवं वा तपसा युक्तो ब्रह्महा सवनी भवेत् । एवं गर्भमविज्ञातमात्रेयीं वा निपातयेत् ॥
evaṃ vā tapasā yukto brahmahā savanī bhavet | evaṃ garbhamavijñātamātreyīṃ vā nipātayet
अथवा इसी प्रकार तप से युक्त होकर ब्रह्महत्यारा तीनों सवनों में स्नान करने वाला बने। यही विधि उसके लिए है जो अज्ञात गर्भ को, या गर्भवती आत्रेयी को गिरा दे।
श्लोक 55 (12.163.55)
द्विगुणा ब्रह्महत्या वै आत्रेयीहिंसने भवेत् । सुरापी नियताहारो ब्रह्मचारी क्षपाचरः ॥
dviguṇā brahmahatyā vai ātreyīhiṃsane bhavet | surāpī niyatāhāro brahmacārī kṣapācaraḥ
आत्रेयी की हिंसा में ब्रह्महत्या का पाप दुगुना होता है। सुरापान करने वाला नियमित आहार करे, ब्रह्मचारी रहे और रात्रि में विचरे,
श्लोक 56 (12.163.56)
ऊर्ध्वं त्रिभ्योऽपि वर्षेभ्यो यजेताग्निष्टुता परम् । ऋषभैकसहस्रं वा गा दत्त्वा शौचमाप्नुयात् ॥
ūrdhvaṃ tribhyo'pi varṣebhyo yajetāgniṣṭutā param | ṛṣabhaikasahasraṃ vā gā dattvā śaucamāpnuyāt
और तीन वर्ष के बाद अग्निष्टुत् यज्ञ करे; अथवा एक बैल सहित हज़ार गायें दान करके शुद्धि पाए।
श्लोक 57 (12.163.57)
वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशतं च गाः । शूद्रं हत्वाऽब्दमेवैकमृषभं च शतं च गाः ॥
vaiśyaṃ hatvā tu varṣe dve ṛṣabhaikaśataṃ ca gāḥ | śūdraṃ hatvā'bdamevaikamṛṣabhaṃ ca śataṃ ca gāḥ
वैश्य को मारने पर दो वर्ष और बैल सहित सौ गायें; शूद्र को मारने पर केवल एक वर्ष और एक बैल तथा सौ गायें।
श्लोक 58 (12.163.58)
श्ववराहखरान्हत्वा शौद्रमेव व्रतं चरेत् । मार्जारचाषमण्डूकान्काकं व्यालं च मूषिकम् ॥
śvavarāhakharānhatvā śaudrameva vrataṃ caret | mārjāracāṣamaṇḍūkānkākaṃ vyālaṃ ca mūṣikam
कुत्ता, सूअर या गधे को मारकर शूद्र-वध का ही व्रत करे; बिल्ली, चाष (नीलकण्ठ), मेंढक, कौआ, सर्प या चूहे को मारने पर भी वही।
श्लोक 59 (12.163.59)
उक्तः पशुवधे दोषो राजन्प्राणिनिपातनात् । अनस्थिकेषु गोमूत्रं पानमेकं प्रचक्षते । प्रायश्चित्तान्यथान्यानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥
uktaḥ paśuvadhe doṣo rājanprāṇinipātanāt | anasthikeṣu gomūtraṃ pānamekaṃ pracakṣate | prāyaścittānyathānyāni pravakṣyāmyanupūrvaśaḥ
हे राजन्, प्राणियों के वध से होने वाला पशुवध का दोष कहा जा चुका। अस्थिरहित जीवों के लिए एक बार गोमूत्र पीना बताया गया है। अब मैं दूसरे प्रायश्चित्त क्रम से कहूँगा।
श्लोक 60 (12.163.60)
तल्पे वाऽन्यस्य चौर्ये च पृथक् संवत्सरं चरेत् । त्रीणि श्रोत्रियभार्यायां परदारे च द्वे स्मृते ॥
talpe vā'nyasya caurye ca pṛthak saṃvatsaraṃ caret | trīṇi śrotriyabhāryāyāṃ paradāre ca dve smṛte
दूसरे की शय्या के अपराध में और चोरी में वह अलग-अलग एक-एक वर्ष व्रत करे; श्रोत्रिय की पत्नी के विषय में तीन वर्ष और परायी स्त्री के विषय में दो वर्ष माने गए हैं।
श्लोक 61 (12.163.61)
काले चतुर्थे भुञ्जानो ब्रह्मचारी व्रती भवेत् । स्थानासनाभ्यां विहरेत्रिरह्नाऽभ्युपयन्नपः ॥
kāle caturthe bhuñjāno brahmacārī vratī bhavet | sthānāsanābhyāṃ viharetrirahnā'bhyupayannapaḥ
वह ब्रह्मचारी और व्रती बने, चौथे भोजन-काल में भोजन करे, खड़े रहकर और बैठकर समय बिताए, और दिन में तीन बार जल में उतरे।
श्लोक 62 (12.163.62)
एवमेव चरन्राजंस्तस्मात्पापात्प्रमुच्यते । एवमेव निराकर्ता यश्चाग्नीनपविध्यति ॥
evameva caranrājaṃstasmātpāpātpramucyate | evameva nirākartā yaścāgnīnapavidhyati
हे राजन्, ऐसा ही करता हुआ वह उस पाप से छूट जाता है। यही विधि उसके लिए भी है जो धर्मकर्म का त्याग करता और अपनी अग्नियाँ फेंक देता है।
श्लोक 63 (12.163.63)
त्यजत्यकारणे यश्च पितरं मातरं गुरुम् । पतितः स्यात्स कौरव्य यथा धर्मेषु निश्चयः ॥
tyajatyakāraṇe yaśca pitaraṃ mātaraṃ gurum | patitaḥ syātsa kauravya yathā dharmeṣu niścayaḥ
जो बिना कारण अपने पिता, माता या गुरु को त्याग देता है, हे कौरव्य, वह पतित हो जाता है; धर्म के विषय में यही निश्चय है।
श्लोक 64 (12.163.64)
ग्रासाच्छादनयानं च शयनं ह्यासनं तथा । ब्रह्मचारी द्विजेभ्यश्च दत्त्वा पापात्प्रमुच्यते ॥
grāsācchādanayānaṃ ca śayanaṃ hyāsanaṃ tathā | brahmacārī dvijebhyaśca dattvā pāpātpramucyate
द्विजों को भोजन, वस्त्र, वाहन, शय्या और आसन देकर और ब्रह्मचारी रहकर वह पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 65 (12.163.65)
भार्यायां व्यभिचारिण्यां निरुद्धायां विशेषतः । यत्पुंसः परदारेषु तदेनां चारयेद्व्रतम् ॥
bhāryāyāṃ vyabhicāriṇyāṃ niruddhāyāṃ viśeṣataḥ | yatpuṃsaḥ paradāreṣu tadenāṃ cārayedvratam
व्यभिचारिणी पत्नी को, विशेषकर जब वह रोक दी गई हो, वही व्रत कराया जाए जो पुरुष परायी स्त्रियों से सम्बन्ध करने पर करता है।
श्लोक 66 (12.163.66)
श्रेयांसं शयने हित्वा पापीयांसं समृच्छति । श्वभिस्तामर्दयेद्राजा संस्थाने बहुविस्तरे ॥
śreyāṃsaṃ śayane hitvā pāpīyāṃsaṃ samṛcchati | śvabhistāmardayedrājā saṃsthāne bahuvistare
जो स्त्री शय्या पर श्रेष्ठ पुरुष को छोड़कर अधम के पास जाती है, उसे राजा किसी विशाल खुले स्थान में कुत्तों से नुचवा दे।
श्लोक 67 (12.163.67)
पुमांसं बन्धयेत्पाशैः शयने तप्त आयसे । अप्यादधीत दारूणि तत्र दह्येत पापकृत् ॥
pumāṃsaṃ bandhayetpāśaiḥ śayane tapta āyase | apyādadhīta dārūṇi tatra dahyeta pāpakṛt
और उस पुरुष को तपी हुई लोहे की शय्या पर रस्सियों से बँधवा दे; उस पर लकड़ियाँ रखवाई जाएँ और वहीं वह पापी जलाया जाए।
श्लोक 68 (12.163.68)
एष दण्डो महाराज स्त्रीणां भर्तृव्यतिक्रमे । संवत्सरोऽभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो भवेत् ॥
eṣa daṇḍo mahārāja strīṇāṃ bhartṛvyatikrame | saṃvatsaro'bhiśastasya duṣṭasya dviguṇo bhavet
हे महाराज, पति का उल्लंघन करने वाली स्त्रियों के लिए यही दण्ड है। जिस पर आरोप लगा हो उसके लिए एक वर्ष, और दोषी के लिए उसका दुगुना होना चाहिए।
श्लोक 69 (12.163.69)
द्वे तस्य त्रीणि वर्षाणि चत्वारि सहसेविनः । कुमारः पञ्चवर्षाणि चरेद्भैक्षं मुनिव्रतः ॥
dve tasya trīṇi varṣāṇi catvāri sahasevinaḥ | kumāraḥ pañcavarṣāṇi caredbhaikṣaṃ munivrataḥ
उसके लिए दो या तीन वर्ष, और उसके साथ रहने वालों के लिए चार वर्ष; कुमार पाँच वर्ष मुनि-व्रत धारण कर भिक्षा से निर्वाह करे।
श्लोक 70 (12.163.70)
परिवित्तिः परिवेत्ता या चैव परिविद्यते । पाणिग्राहस्त्वधर्मेण सर्वे ते पतिताः स्मृताः ॥
parivittiḥ parivettā yā caiva parividyate | pāṇigrāhastvadharmeṇa sarve te patitāḥ smṛtāḥ
अविवाहित बड़ा भाई, उससे पहले विवाह करने वाला छोटा भाई, जिस स्त्री से विवाह होता है वह, और धर्म के विरुद्ध पाणिग्रहण करने वाला, ये सब पतित माने गए हैं।
श्लोक 71 (12.163.71)
चरेयुः सर्व एवैते वीरहा यद्व्रतं चरेत् । चान्द्रायणं चरेन्मासं कृच्छ्रं वा पापशुद्धये ॥
careyuḥ sarva evaite vīrahā yadvrataṃ caret | cāndrāyaṇaṃ carenmāsaṃ kṛcchraṃ vā pāpaśuddhaye
ये सब वही व्रत करें जो वीर का हत्यारा करता है: एक मास तक चान्द्रायण, अथवा कृच्छ्र, पाप की शुद्धि के लिए।
श्लोक 72 (12.163.72)
परिवेत्ता प्रयच्छेत तां स्नुषां परिवित्तये । ज्येष्ठेन त्वभ्यनुज्ञातो यवीयान्प्रत्यनन्तरम् । एनसो मोक्षमाप्नोति तौ च सा चैव धर्मतः ॥
parivettā prayaccheta tāṃ snuṣāṃ parivittaye | jyeṣṭhena tvabhyanujñāto yavīyānpratyanantaram | enaso mokṣamāpnoti tau ca sā caiva dharmataḥ
विवाह कर लेने वाला छोटा भाई उस स्त्री को पुत्रवधू के रूप में अविवाहित बड़े भाई को दे; फिर बड़े भाई की अनुमति मिलने पर छोटा भाई उसके बाद उसे ग्रहण करे। इस प्रकार वे दोनों पुरुष और वह स्त्री धर्मानुसार पाप से छूट जाते हैं।
श्लोक 73 (12.163.73)
अमानुषीषु गोवर्जमनादिष्टं न दुष्यति । अधिष्ठातारमत्तारं पशूनां पुरुषं विदुः ॥
amānuṣīṣu govarjamanādiṣṭaṃ na duṣyati | adhiṣṭhātāramattāraṃ paśūnāṃ puruṣaṃ viduḥ
मनुष्येतर प्राणियों के विषय में, गाय को छोड़कर, जहाँ कोई दण्ड निर्दिष्ट नहीं है वहाँ दोष नहीं लगता; क्योंकि पुरुष को पशुओं का स्वामी और भोक्ता माना गया है।
श्लोक 74 (12.163.74)
परिधायोर्ध्ववालं तु पात्रमादाय मृन्मयम् । चरेत्सप्तगृहान्भैक्षं स्वकर्म परिकीर्तयन् ॥
paridhāyordhvavālaṃ tu pātramādāya mṛnmayam | caretsaptagṛhānbhaikṣaṃ svakarma parikīrtayan
ऊपर उठी हुई पूँछ के बाल (चँवर) धारण करके और मिट्टी का पात्र लेकर वह अपना कर्म बताता हुआ सात घरों में भिक्षा माँगे।
श्लोक 75 (12.163.75)
तथैव लब्धभोजी स्याद्द्वादशाहात्स शुध्यति । चरेत्संवत्सरं चापि तद्व्रतं येन कृन्तति ॥
tathaiva labdhabhojī syāddvādaśāhātsa śudhyati | caretsaṃvatsaraṃ cāpi tadvrataṃ yena kṛntati
इसी प्रकार वह जो मिले वही खाए, और बारह दिन में शुद्ध हो जाता है। अथवा वह उस व्रत को एक वर्ष तक करे, जिससे वह अपने पाप को काट डालता है।
श्लोक 76 (12.163.76)
भवेत्तु मानुषेष्वेवं प्रायश्चित्तमनुत्तमम् । दानं वा दानशक्तेषु सर्वमेतत्प्रकल्पयेत् ॥
bhavettu mānuṣeṣvevaṃ prāyaścittamanuttamam | dānaṃ vā dānaśakteṣu sarvametatprakalpayet
मनुष्यों के विषय में यही सर्वोत्तम प्रायश्चित्त होगा; अथवा जो दान देने में समर्थ हैं, उनके लिए इस सबके स्थान पर दान की व्यवस्था कर ली जाए।
श्लोक 77 (12.163.77)
अनास्तिकेषु गोमात्रं दानमेकं प्रचक्षते । श्ववराहमनुष्याणां कुक्कुटस्य खरस्य च ॥
anāstikeṣu gomātraṃ dānamekaṃ pracakṣate | śvavarāhamanuṣyāṇāṃ kukkuṭasya kharasya ca
जो नास्तिक नहीं हैं, उनके लिए केवल एक गोदान बताया गया है। कुत्ते, सूअर, मनुष्य, मुर्गे और गधे के विषय में:
श्लोक 78 (12.163.78)
मांसं मूत्रं पुरीषं च प्राश्य संस्कारमर्हति । ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमादाय सोमपाः ॥
māṃsaṃ mūtraṃ purīṣaṃ ca prāśya saṃskāramarhati | brāhmaṇastu surāpasya gandhamādāya somapāḥ
यदि कोई इनका मांस, मूत्र या मल खा ले तो वह शुद्धि-संस्कार के योग्य होता है; और सोमपान करने वाला ब्राह्मण यदि सुरा पीने वाले की गन्ध सूँघ ले,
श्लोक 79 (12.163.79)
अपस्त्र्यहं पिबेदुष्णाः संयतात्मा जितेन्द्रियः । अपः पीत्वा तु स पुनर्वायुभक्षो भवेन्त्र्यहम् ॥
apastryahaṃ pibeduṣṇāḥ saṃyatātmā jitendriyaḥ | apaḥ pītvā tu sa punarvāyubhakṣo bhaventryaham
तो वह आत्मसंयमी और जितेन्द्रिय होकर तीन दिन गरम जल पिए; और जल पीने के बाद फिर तीन दिन केवल वायु पर रहे।
श्लोक 80 (12.163.80)
एवमेतत्समुद्दिष्टं प्रायश्चित्तनिषेवणम् । ब्राह्मणस्य विशेषेण यदज्ञानेन जायते ॥
evametatsamuddiṣṭaṃ prāyaścittaniṣevaṇam | brāhmaṇasya viśeṣeṇa yadajñānena jāyate
इस प्रकार प्रायश्चित्त के पालन का यह विधान कहा गया है, विशेषकर ब्राह्मण के लिए, उन दोषों के विषय में जो अज्ञान से हो जाते हैं।