शान्ति पर्व · अध्याय 164
खड्ग की उत्पत्ति: रुद्र और दानव
नकुल भीष्म से पूछते हैं कि कौन-सा शस्त्र श्रेष्ठ है और खड्ग की उत्पत्ति कैसे हुई। भीष्म बताते हैं कि ब्रह्मा की सृष्टि के बाद जब दानव धर्म को नष्ट करने लगे, तब ब्रह्मा ने हिमालय पर यज्ञ किया; उसकी अग्नि से एक भयंकर प्राणी उठा, जो खड्ग बना। रुद्र ने उसे लेकर दानवों का संहार किया और विष्णु को दे दिया; वहाँ से वह मरीचि, ऋषियों, इन्द्र और लोकपालों के हाथ मनु तक पहुँचा और राजाओं की परम्परा से होता हुआ पाण्डवों तक आया। अन्त में भीष्म खड्ग के आठ गुप्त नाम और इस कथा के श्रवण का फल बताते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.164.1)
कथान्तरमथासाद्य खड्गयुद्धविशारदः । नकुलः शरतल्पस्थमिदमाह पितामहम् ॥
kathāntaramathāsādya khaḍgayuddhaviśāradaḥ | nakulaḥ śaratalpasthamidamāha pitāmaham
फिर बातचीत के बीच अवसर पाकर खड्गयुद्ध में कुशल नकुल ने शरशय्या पर लेटे हुए पितामह से यह कहा:
नकुल उवाच
श्लोक 2 (12.164.2)
धनुः प्रहरणं श्रेष्ठमितिवादः पितामह । मतस्तु मम धर्मज्ञः खड्ग एव सुसंशितः ॥
dhanuḥ praharaṇaṃ śreṣṭhamitivādaḥ pitāmaha | matastu mama dharmajñaḥ khaḍga eva susaṃśitaḥ
"पितामह, लोग कहते हैं कि धनुष सबसे श्रेष्ठ शस्त्र है; परन्तु हे धर्मज्ञ, मेरा मत है कि भलीभाँति तीक्ष्ण की हुई तलवार ही श्रेष्ठ है।
श्लोक 3 (12.164.3)
छिन्ने च कार्मुके राजन्प्रक्षीणेषु शरेषु च । खड्गेन शक्यते योद्धुमात्मानं परिरक्षितुम् ॥
chinne ca kārmuke rājanprakṣīṇeṣu śareṣu ca | khaḍgena śakyate yoddhumātmānaṃ parirakṣitum
हे राजन्, जब धनुष कट जाए और बाण समाप्त हो जाएँ, तब भी तलवार से युद्ध किया जा सकता है और अपनी रक्षा की जा सकती है।
श्लोक 4 (12.164.4)
शरासनधरांश्चैव गदाशक्तिधरांस्तदा । एकः खड्गधरो वीरः समर्थः प्रतिबाधितुम् ॥
śarāsanadharāṃścaiva gadāśaktidharāṃstadā | ekaḥ khaḍgadharo vīraḥ samarthaḥ pratibādhitum
धनुष, गदा और शक्ति धारण करनेवालों के सामने अकेला खड्गधारी वीर ही उन सबको रोकने में समर्थ होता है।
श्लोक 5 (12.164.5)
अत्र मे संशयश्चैव कौतूहलमतीव च । किंस्वित्प्रहरणं श्रेष्ठं सर्वयुद्धेषु पार्थिव ॥
atra me saṃśayaścaiva kautūhalamatīva ca | kiṃsvitpraharaṇaṃ śreṣṭhaṃ sarvayuddheṣu pārthiva
इस विषय में मुझे संशय है और बड़ी जिज्ञासा भी है: हे राजन्, सब युद्धों में कौन-सा शस्त्र श्रेष्ठ है?
श्लोक 6 (12.164.6)
कथं चोत्पादितः खड्गः कस्मै चार्थाय केन वा । पूर्वाचार्यं च खड्गस्य प्रब्रवीहि पितामह ॥
kathaṃ cotpāditaḥ khaḍgaḥ kasmai cārthāya kena vā | pūrvācāryaṃ ca khaḍgasya prabravīhi pitāmaha
तलवार कैसे उत्पन्न हुई, किस प्रयोजन से और किसके द्वारा? हे पितामह, खड्ग के आदि आचार्य कौन थे, यह भी बताइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (12.164.7)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य धीमतः । स्वरकौशलसंयुक्तं सूक्ष्मचित्रार्थवत्सुखम् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā mādrīputrasya dhīmataḥ | svarakauśalasaṃyuktaṃ sūkṣmacitrārthavatsukham
माद्री के बुद्धिमान पुत्र की ये बातें सुनकर, जो स्वर-कौशल से युक्त, सूक्ष्म, विविध अर्थों से भरी और सुनने में मधुर थीं,
श्लोक 8 (12.164.8)
ततस्तस्योत्तरं वाक्यं स्वरवर्णोपपादितम् । शिक्षया चोपपन्नाय द्रोणशिष्याय पृच्छते ॥
tatastasyottaraṃ vākyaṃ svaravarṇopapāditam | śikṣayā copapannāya droṇaśiṣyāya pṛcchate
तब प्रश्न पूछते हुए उस द्रोणशिष्य को, जो उत्तम शिक्षा से सम्पन्न था, स्वर और वर्ण की शुद्धि से युक्त उत्तर दिया गया।
श्लोक 9 (12.164.9)
उवाच सर्वधर्मज्ञो धनुर्वेदस्य पारगः । शरतल्पगतो भीष्मो नकुलाय महात्मने ॥
uvāca sarvadharmajño dhanurvedasya pāragaḥ | śaratalpagato bhīṣmo nakulāya mahātmane
सब धर्मों को जाननेवाले, धनुर्वेद के पारंगत, शरशय्या पर लेटे भीष्म ने महात्मा नकुल से कहा।
भीष्म उवाच
श्लोक 10 (12.164.10)
तत्त्वं शृणुष्व माद्रेय यथैतत्परिपृच्छसि । प्रबोधितोऽस्मि भवता धातुमानिव पर्वतः ॥
tattvaṃ śṛṇuṣva mādreya yathaitatparipṛcchasi | prabodhito'smi bhavatā dhātumāniva parvataḥ
माद्रीपुत्र, तुम जो पूछ रहे हो, उसका तत्त्व सुनो। तुमने मुझे वैसे ही जगा दिया है जैसे धातुओं से भरे पर्वत को कोई जगा दे।
श्लोक 11 (12.164.11)
सलिलैकार्णवं तात पुरा सर्वमभूदिदम् । अप्रज्ञातमनाकाशमनिर्देश्यमहीतलम् ॥
salilaikārṇavaṃ tāta purā sarvamabhūdidam | aprajñātamanākāśamanirdeśyamahītalam
बेटा, पहले यह सब एक ही जल का सागर था; उसमें कुछ भी जाना नहीं जा सकता था, न आकाश था, न कोई भूमि या धरातल, जिसे बताया जा सके,
श्लोक 12 (12.164.12)
तमस्संवृतमस्पर्शमतिगम्भीरदर्शनम् । निःशब्दं चाप्रमेयं च तत्र जज्ञे पितामहः ॥
tamassaṃvṛtamasparśamatigambhīradarśanam | niḥśabdaṃ cāprameyaṃ ca tatra jajñe pitāmahaḥ
वह अन्धकार से ढका था, स्पर्श से परे था, अत्यन्त गहरा और देखने में भयंकर था, शब्दहीन और अप्रमेय था। उसी में पितामह ब्रह्मा प्रकट हुए।
श्लोक 13 (12.164.13)
सोऽसृजद्वायुमग्निं च भास्करं चापि वीर्यवान् । आकाशमसृजच्चोर्ध्वमधो भूमिं च नैर्ऋतिम् ॥
so'sṛjadvāyumagniṃ ca bhāskaraṃ cāpi vīryavān | ākāśamasṛjaccordhvamadho bhūmiṃ ca nairṛtim
उस पराक्रमी ने वायु, अग्नि और सूर्य की सृष्टि की; ऊपर आकाश रचा और नीचे भूमि तथा निर्ऋति का लोक रचा।
श्लोक 14 (12.164.14)
ततः सचन्द्रतारं च नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा । संवत्सरानहोरात्रानृतूनथ लवान्क्षणान् ॥
tataḥ sacandratāraṃ ca nakṣatrāṇi grahāṃstathā | saṃvatsarānahorātrānṛtūnatha lavānkṣaṇān
फिर उसने चन्द्रमा और तारे, नक्षत्र और ग्रह रचे, तथा वर्ष, दिन-रात, ऋतुएँ और लव तथा क्षण जैसे छोटे कालखण्ड भी बनाए।
श्लोक 15 (12.164.15)
ततः शरीरं लोकस्थं स्थापयित्वा पितामहः । जनयामास भगवान्पुत्रानुत्तमतेजसः ॥
tataḥ śarīraṃ lokasthaṃ sthāpayitvā pitāmahaḥ | janayāmāsa bhagavānputrānuttamatejasaḥ
तब लोकों में स्थित शरीर को स्थापित करके भगवान् पितामह ने परम तेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया:
श्लोक 16 (12.164.16)
मरीचिं भृगुमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । वसिष्ठाङ्गिरसौ चोभौ भरद्वाजं तथैव च ॥
marīciṃ bhṛgumatriṃ ca pulastyaṃ pulahaṃ kratum | vasiṣṭhāṅgirasau cobhau bharadvājaṃ tathaiva ca
मरीचि, भृगु, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ और अंगिरा दोनों, तथा भरद्वाज भी।
श्लोक 17 (12.164.17)
प्रजापतिस्तथा दक्षः कन्याः षष्टिमजीजनात् । ताश्च ब्रह्मर्षीन्सर्वान्प्रजार्थं प्रतिपेदिरे ॥
prajāpatistathā dakṣaḥ kanyāḥ ṣaṣṭimajījanāt | tāśca brahmarṣīnsarvānprajārthaṃ pratipedire
फिर प्रजापति दक्ष ने साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं, और वे सब कन्याएँ सन्तान के लिए सभी ब्रह्मर्षियों के पास गईं।
श्लोक 18 (12.164.18)
ताभ्यो विश्वानि भूतानि देवाः पितृगणास्तथा । गन्धर्वाप्सरसश्चैव रक्षासि विविधानि च ॥
tābhyo viśvāni bhūtāni devāḥ pitṛgaṇāstathā | gandharvāpsarasaścaiva rakṣāsi vividhāni ca
उनसे समस्त प्राणी उत्पन्न हुए: देवता और पितृगण, गन्धर्व और अप्सराएँ, तथा अनेक प्रकार के राक्षस,
श्लोक 19 (12.164.19)
पतत्रिमृगमीनाश्च गावश्चैव महोरगाः । नानाकृतिबलाश्चान्ये जलक्षितिविचारिणः ॥
patatrimṛgamīnāśca gāvaścaiva mahoragāḥ | nānākṛtibalāścānye jalakṣitivicāriṇaḥ
पक्षी, पशु और मछलियाँ, गायें और बड़े-बड़े सर्प, तथा जल और थल में विचरनेवाले अनेक रूप और बल वाले अन्य जीव;
श्लोक 20 (12.164.20)
उद्भिज्जाः स्वेदजाश्चैव साण्डजाश्च जरायुजाः । जज्ञे तात जगत्सर्वं तथा स्थावरजङ्गमम् ॥
udbhijjāḥ svedajāścaiva sāṇḍajāśca jarāyujāḥ | jajñe tāta jagatsarvaṃ tathā sthāvarajaṅgamam
भूमि से उगनेवाले, पसीने से उत्पन्न, अण्डे से जन्मे और गर्भ से जन्मे जीव भी हुए। इस प्रकार, तात, चर और अचर सारा जगत् उत्पन्न हुआ।
श्लोक 21 (12.164.21)
अतः सर्गमिमं कृत्वा सर्वलोकपितामहः । शाश्वतं वेदपठितं धर्मं च जुजुषे पुनः ॥
ataḥ sargamimaṃ kṛtvā sarvalokapitāmahaḥ | śāśvataṃ vedapaṭhitaṃ dharmaṃ ca jujuṣe punaḥ
इस सृष्टि को रचकर सब लोकों के पितामह ने फिर वेद में बताए हुए सनातन धर्म में रमण किया।
श्लोक 22 (12.164.22)
तस्मिन्धर्मे स्थिता देवाः सहाचार्यपुरोहिताः । आदित्या वसवो रुद्राः ससाध्या मरुदश्विनः ॥
tasmindharme sthitā devāḥ sahācāryapurohitāḥ | ādityā vasavo rudrāḥ sasādhyā marudaśvinaḥ
उसी धर्म में आचार्यों और पुरोहितों सहित देवता स्थित थे: आदित्य, वसु और रुद्र, साध्य, मरुद्गण और अश्विनीकुमार;
श्लोक 23 (12.164.23)
भृग्वत्र्यङ्गिरसः सिद्धाः कश्यपश्च तपोधनाः । वसिष्ठगौतमागस्त्यास्तथा नारदपर्वतौ ॥
bhṛgvatryaṅgirasaḥ siddhāḥ kaśyapaśca tapodhanāḥ | vasiṣṭhagautamāgastyāstathā nāradaparvatau
भृगु, अत्रि और अंगिरागण, सिद्ध, तपोधन कश्यप, वसिष्ठ, गौतम और अगस्त्य, तथा नारद और पर्वत;
श्लोक 24 (12.164.24)
ऋषयो बालखिल्याश्च प्रभासाः सिकतास्तथा । घृताचाः सोमवायव्या वैश्वानरमरीचिपाः ॥
ṛṣayo bālakhilyāśca prabhāsāḥ sikatāstathā | ghṛtācāḥ somavāyavyā vaiśvānaramarīcipāḥ
ऋषि, वालखिल्य, प्रभास और सिकत, घृताच, सोमवायव्य, तथा वैश्वानर और मरीचिप;
श्लोक 25 (12.164.25)
अकृष्टाश्चैव हंसाश्च ऋषयो वाऽग्नियोनयः । वानप्रस्थाः पृश्नयश्च स्थिता ब्रह्मानुशासने ॥
akṛṣṭāścaiva haṃsāśca ṛṣayo vā'gniyonayaḥ | vānaprasthāḥ pṛśnayaśca sthitā brahmānuśāsane
अकृष्ट और हंस, अग्नि से उत्पन्न ऋषि, वानप्रस्थ और पृश्नि: ये सब ब्रह्मा के शासन में स्थित थे।
श्लोक 26 (12.164.26)
दानवेन्द्रास्त्वतिक्रम्य तत्पितामहशासनम् । धर्मस्यापनयं चक्रुः क्रोधलोभसमन्विताः ॥
dānavendrāstvatikramya tatpitāmahaśāsanam | dharmasyāpanayaṃ cakruḥ krodhalobhasamanvitāḥ
परन्तु दानवों के अधिपतियों ने पितामह की आज्ञा का उल्लंघन करके, क्रोध और लोभ से भरकर, धर्म को नष्ट करना आरम्भ कर दिया।
श्लोक 27 (12.164.27)
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो विरोचनः । शम्बरो विप्रचित्तिश्च प्रह्लादो नमुचिर्बलिः ॥
hiraṇyakaśipuścaiva hiraṇyākṣo virocanaḥ | śambaro vipracittiśca prahlādo namucirbaliḥ
हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, शम्बर, विप्रचित्ति, प्रह्लाद, नमुचि और बलि,
श्लोक 28 (12.164.28)
एते चान्ये च बहवः सगणा दैत्यदानवाः । धर्मसेतुमतिक्रम्य रेमिरेऽधर्मनिश्चयाः ॥
ete cānye ca bahavaḥ sagaṇā daityadānavāḥ | dharmasetumatikramya remire'dharmaniścayāḥ
ये और दूसरे बहुत-से दैत्य और दानव अपने-अपने गणों सहित धर्म की मर्यादा लाँघकर अधर्म का निश्चय किए हुए आनन्द मनाने लगे।
श्लोक 29 (12.164.29)
सर्वे तुल्याभिजातीया यथा देवास्तथा वयम् । इत्येवं हेतुमास्थाय स्पर्धमानाः सुरर्षिभिः ॥
sarve tulyābhijātīyā yathā devāstathā vayam | ityevaṃ hetumāsthāya spardhamānāḥ surarṣibhiḥ
"हम सब समान जन्म वाले हैं; जैसे देवता हैं, वैसे ही हम हैं।" यह हेतु लेकर वे देवताओं और ऋषियों से होड़ करने लगे,
श्लोक 30 (12.164.30)
न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत । त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः ॥
na priyaṃ nāpyanukrośaṃ cakrurbhūteṣu bhārata | trīnupāyānatikramya daṇḍena rurudhuḥ prajāḥ
और हे भारत, प्राणियों पर न प्रेम दिखाया, न दया। तीनों उपायों को छोड़कर वे दण्ड से प्रजा को दबाए रखने लगे।
श्लोक 31 (12.164.31)
न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः । अथ वै भगवान्ब्रह्मा सर्वलोकनमस्कृतः ॥
na jagmuḥ saṃvidaṃ taiśca darpādasurasattamāḥ | atha vai bhagavānbrahmā sarvalokanamaskṛtaḥ
वे अहंकारी असुरश्रेष्ठ उन देवताओं और ऋषियों से कोई समझौता नहीं करते थे। तब सब लोकों से वन्दित भगवान् ब्रह्मा
श्लोक 32 (12.164.32)
तदा हिमवतः पृष्ठे सुरम्ये पद्मतारके । शतयोजनविस्तारे मणिमुक्ताचयाचिते ॥
tadā himavataḥ pṛṣṭhe suramye padmatārake | śatayojanavistāre maṇimuktācayācite
हिमालय के पृष्ठभाग पर, पद्मतारक नामक अत्यन्त रमणीय स्थान में, जो सौ योजन चौड़ा था और मणियों तथा मोतियों के ढेरों से भरा था,
श्लोक 33 (12.164.33)
तस्मिन्गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने । तस्थौ स विबुधश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकार्थसिद्धये ॥
tasmingirivare putra puṣpitadrumakānane | tasthau sa vibudhaśreṣṭho brahmā lokārthasiddhaye
उसी श्रेष्ठ पर्वत पर, बेटा, फूलों से लदे वृक्षों के वन में, देवताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मा लोक के कार्य की सिद्धि के लिए ठहर गए।
श्लोक 34 (12.164.34)
ततो वर्षसहस्रान्ते वितानमकरोत्प्रभुः । विधिना कल्पदृष्टेन यथोक्तेनोपपादितम् ॥
tato varṣasahasrānte vitānamakarotprabhuḥ | vidhinā kalpadṛṣṭena yathoktenopapāditam
हजार वर्ष बीतने पर प्रभु ने एक यज्ञ-मण्डप खड़ा किया, जो कल्पशास्त्र में देखी गई विधि से, जैसा कहा गया है वैसा रचा गया था,
श्लोक 35 (12.164.35)
ऋषिभिर्यज्ञपटुभिर्यथावत्कर्मकर्तृभिः । मरुद्भिः परिसंकीर्णं दीप्यमानैश्च पावकैः ॥
ṛṣibhiryajñapaṭubhiryathāvatkarmakartṛbhiḥ | marudbhiḥ parisaṃkīrṇaṃ dīpyamānaiśca pāvakaiḥ
जो यज्ञ में निपुण, विधिपूर्वक कर्म करनेवाले ऋषियों, मरुद्गणों और दहकती हुई अग्नियों से भरा हुआ था,
श्लोक 36 (12.164.36)
काञ्चनैर्यज्ञभाण्डैश्च भ्राजिष्णुभिरलंकृतम् । वृतं देवगणैश्चैव प्रबभौ यज्ञमण्डलम् ॥
kāñcanairyajñabhāṇḍaiśca bhrājiṣṇubhiralaṃkṛtam | vṛtaṃ devagaṇaiścaiva prababhau yajñamaṇḍalam
सोने के चमकते यज्ञ-पात्रों से सजा था और देवगणों से घिरा हुआ था; वह यज्ञ-मण्डल शोभा पा रहा था,
श्लोक 37 (12.164.37)
तथा ब्रह्मर्षिभिश्चैव सदस्यैरुपशोभितम् । अत्र घोरतमं वृत्तमृषीणां मे परिश्रुतम् ॥
tathā brahmarṣibhiścaiva sadasyairupaśobhitam | atra ghoratamaṃ vṛttamṛṣīṇāṃ me pariśrutam
तथा सदस्य बने हुए ब्रह्मर्षियों से सुशोभित था। वहाँ एक अत्यन्त भयंकर घटना हुई, जिसे मैंने ऋषियों से सुना है।
श्लोक 38 (12.164.38)
चन्द्रमा विमलं व्योम यथाऽभ्युदिततारकम् । विदार्याग्निं तथा भूतमुत्थितं श्रूयते तदा ॥
candramā vimalaṃ vyoma yathā'bhyuditatārakam | vidāryāgniṃ tathā bhūtamutthitaṃ śrūyate tadā
कहते हैं, जैसे उगे हुए तारों से भरे निर्मल आकाश में चन्द्रमा दिखाई देता है, वैसे ही उस समय अग्नि को चीरकर एक प्राणी ऊपर उठा।
श्लोक 39 (12.164.39)
नीलोत्पलसवर्णाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं कृशोदरम् । प्रांशुमुद्धर्षणं चापि तथैव ह्यमितौजसम् ॥
nīlotpalasavarṇābhaṃ tīkṣṇadaṃṣṭraṃ kṛśodaram | prāṃśumuddharṣaṇaṃ cāpi tathaiva hyamitaujasam
उसकी आभा नीले कमल के समान थी, दाँत तीखे थे, पेट पतला था; वह ऊँचा, भयावना और अपार बलशाली था।
श्लोक 40 (12.164.40)
अस्मिन्नुत्पद्यमाने च प्रचचाल वसुंधरा । महोर्मिकलिलावर्तश्चुक्षुभे स महोदधिः ॥
asminnutpadyamāne ca pracacāla vasuṃdharā | mahormikalilāvartaścukṣubhe sa mahodadhiḥ
उसके प्रकट होते ही पृथ्वी काँप उठी और बड़ी-बड़ी लहरों तथा भँवरों वाला महासागर उमड़ पड़ा।
श्लोक 41 (12.164.41)
पेतुश्चोत्का महोत्पाताः शाखाश्च मुमुचुर्द्रुमाः । अप्रसन्ना दिशः सर्वाः पवनश्चाशिवो ववौ । मुहुर्मुहुश्च भूतानि प्राव्यथन्त भयात्तथा ॥
petuścotkā mahotpātāḥ śākhāśca mumucurdrumāḥ | aprasannā diśaḥ sarvāḥ pavanaścāśivo vavau | muhurmuhuśca bhūtāni prāvyathanta bhayāttathā
उल्काएँ गिरीं, बड़े-बड़े उत्पात हुए और वृक्षों ने अपनी शाखाएँ गिरा दीं। सब दिशाएँ धुँधली हो गईं, अशुभ वायु बहने लगी और प्राणी बार-बार भय से व्याकुल होते रहे।
श्लोक 42 (12.164.42)
ततः स तुमुलं दृष्ट्वा तद्भूतं समुपस्थितम् । महर्षिसुरगन्धर्वानुवाचेदं पितामहः ॥
tataḥ sa tumulaṃ dṛṣṭvā tadbhūtaṃ samupasthitam | maharṣisuragandharvānuvācedaṃ pitāmahaḥ
तब उस भयंकर प्राणी को सामने खड़ा देखकर पितामह ने महर्षियों, देवताओं और गन्धर्वों से यह कहा:
श्लोक 43 (12.164.43)
मयैवं चिन्तितं भूतमसिर्नामैष वीर्यवान् । रक्षणार्थाय लोकस्य वधाय च सुरद्विषाम् ॥
mayaivaṃ cintitaṃ bhūtamasirnāmaiṣa vīryavān | rakṣaṇārthāya lokasya vadhāya ca suradviṣām
"इस प्राणी की कल्पना मैंने ही की थी। यह पराक्रमी असि, अर्थात् तलवार, कहलाता है; यह लोक की रक्षा और देवताओं के शत्रुओं के वध के लिए है।"
श्लोक 44 (12.164.44)
ततस्तद्रूपमुत्सृज्य बभौ निस्त्रिंश एव सः । विमलस्तीक्ष्णधारश्च कालान्तक इवोद्यतः ॥
tatastadrūpamutsṛjya babhau nistriṃśa eva saḥ | vimalastīkṣṇadhāraśca kālāntaka ivodyataḥ
तब उस रूप को छोड़कर वह स्वयं तलवार के रूप में चमकने लगा: निर्मल, तीखी धार वाली, और अन्त करनेवाले काल के समान उठी हुई।
श्लोक 45 (12.164.45)
ततस्तं नीलकण्ठाय रुद्रायर्षभकेतवे । ब्रह्मा ददावसिं तीक्ष्णमधर्मप्रतिवारणम् ॥
tatastaṃ nīlakaṇṭhāya rudrāyarṣabhaketave | brahmā dadāvasiṃ tīkṣṇamadharmaprativāraṇam
तब ब्रह्मा ने अधर्म को रोकनेवाली वह तीखी तलवार नीलकण्ठ वृषध्वज रुद्र को दे दी।
श्लोक 46 (12.164.46)
ततः स भगवान्रुद्रो ब्रह्मर्षिगणपूजितः । प्रगृह्यासिममेयात्मा रूपमन्यच्चकार ह ॥
tataḥ sa bhagavānrudro brahmarṣigaṇapūjitaḥ | pragṛhyāsimameyātmā rūpamanyaccakāra ha
तब ब्रह्मर्षियों के समूह से पूजित, अप्रमेय स्वरूप वाले भगवान् रुद्र ने उस तलवार को लेकर दूसरा रूप धारण किया:
श्लोक 47 (12.164.47)
चतुर्बाहुः स्पृशन्मूर्ध्ना भूमिष्ठोऽपि दिशो दश । ऊर्ध्वदृष्टिर्महाबाहुर्मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन् ॥
caturbāhuḥ spṛśanmūrdhnā bhūmiṣṭho'pi diśo daśa | ūrdhvadṛṣṭirmahābāhurmukhājjvālāḥ samutsṛjan
वे चार भुजाओं वाले थे; भूमि पर खड़े होकर भी उनका मस्तक दसों दिशाओं को छू रहा था; उनकी दृष्टि ऊपर थी, भुजाएँ विशाल थीं और मुख से ज्वालाएँ निकल रही थीं,
श्लोक 48 (12.164.48)
विकुर्वन्बहुधा वर्णान्नीलपाण्डुरलोहितान् । बिभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् ॥
vikurvanbahudhā varṇānnīlapāṇḍuralohitān | bibhratkṛṣṇājinaṃ vāso hemapravaratārakam
वे अपने रंग अनेक प्रकार से बदल रहे थे, नीले, पीले और लाल, और सोने के उत्तम तारों से जड़ा काला मृगचर्म पहने हुए थे।
श्लोक 49 (12.164.49)
नेत्रं चैकं ललाटस्थं भास्करप्रतिमं महत् । शुशुभाते सुविमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले ॥
netraṃ caikaṃ lalāṭasthaṃ bhāskarapratimaṃ mahat | śuśubhāte suvimale dve netre kṛṣṇapiṅgale
उनके ललाट पर सूर्य के समान एक बड़ा नेत्र था, और काले-पीले रंग के उनके दोनों निर्मल नेत्र भी चमक रहे थे।
श्लोक 50 (12.164.50)
ततो देवो महादेवः शूलपाणिर्भगाक्षिहा । संप्रगृह्य तु निस्त्रिंशं कालाग्निसमवर्चसम् ॥
tato devo mahādevaḥ śūlapāṇirbhagākṣihā | saṃpragṛhya tu nistriṃśaṃ kālāgnisamavarcasam
तब भग के नेत्रों का नाश करनेवाले, हाथ में त्रिशूल लिए देव महादेव ने कालाग्नि के समान तेजस्वी तलवार को पकड़कर,
श्लोक 51 (12.164.51)
त्रिकूटं चर्म चोद्यम्य सविद्युतमिवाम्बुदम् । चचार विविधान्मार्गान्दानवान्तचिकीर्षया । विधुन्वन्नसिमाकाशे तथा युद्धचिकीर्षया ॥
trikūṭaṃ carma codyamya savidyutamivāmbudam | cacāra vividhānmārgāndānavāntacikīrṣayā | vidhunvannasimākāśe tathā yuddhacikīrṣayā
विद्युत्सहित मेघ के समान त्रिकूट ढाल उठाई और दानवों का अन्त करने की इच्छा से अनेक मार्गों में विचरने लगे; युद्ध की इच्छा से वे आकाश में तलवार घुमा रहे थे।
श्लोक 52 (12.164.52)
तस्य नादं विनदतो महाहासं च मुञ्चतः । बभौ प्रतिभयं रूपं तदा रुद्रस्य भारत ॥
tasya nādaṃ vinadato mahāhāsaṃ ca muñcataḥ | babhau pratibhayaṃ rūpaṃ tadā rudrasya bhārata
हे भारत, जब वे गरजते और अट्टहास करते थे, तब रुद्र का वह रूप भयानक हो उठा।
श्लोक 53 (12.164.53)
तद्रूपधारिणं रुद्रं रौद्रकर्मचिकीर्षया । निशाम्य दानवाः सर्वे हृष्टाः समभिदुद्रुवुः ॥
tadrūpadhāriṇaṃ rudraṃ raudrakarmacikīrṣayā | niśāmya dānavāḥ sarve hṛṣṭāḥ samabhidudruvuḥ
उस रूप में भयंकर कर्म करने को उद्यत रुद्र को देखकर सब दानव हर्षित होकर उनकी ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 54 (12.164.54)
अश्मभिश्चाम्यवर्षन्त प्रदीप्तैश्च तथोल्मुकैः । घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः क्षुरधारैरयस्मयैः ॥
aśmabhiścāmyavarṣanta pradīptaiśca tatholmukaiḥ | ghoraiḥ praharaṇaiścānyaiḥ kṣuradhārairayasmayaiḥ
उन्होंने उन पर पत्थरों की, जलते हुए अंगारों की, तथा उस्तरे की धार वाले लोहे के भयानक अन्य शस्त्रों की वर्षा की।
श्लोक 55 (12.164.55)
ततस्तु दानवानीकं संप्रणेतृकमप्युत । खड्गं दृष्ट्वा बलाधूतं प्रमुमोह चचाल च ॥
tatastu dānavānīkaṃ saṃpraṇetṛkamapyuta | khaḍgaṃ dṛṣṭvā balādhūtaṃ pramumoha cacāla ca
तब दानवों की सेना, नेताओं सहित होने पर भी, तलवार को देखकर उसके बल से हिल उठी, मोहित हो गई और डगमगा गई।
श्लोक 56 (12.164.56)
चित्रं शीघ्रपदत्वाच्च चरन्तमसिपाणिनम् । तमेकमसुराः सर्वे सहस्रमिति मेनिरे ॥
citraṃ śīghrapadatvācca carantamasipāṇinam | tamekamasurāḥ sarve sahasramiti menire
तलवार हाथ में लिए वे इतनी शीघ्रता और विचित्रता से घूमते थे कि सब असुर उस अकेले को हजार समझने लगे।
श्लोक 57 (12.164.57)
छिन्दन्भिन्दन्रुजन्कृन्तन्दारयन्प्रमथन्नपि । अचरद्वैरिसङ्घेषु दावाग्निरिव कक्षगः ॥
chindanbhindanrujankṛntandārayanpramathannapi | acaradvairisaṅgheṣu dāvāgniriva kakṣagaḥ
वे काटते, फाड़ते, तोड़ते, छेदते, चीरते और कुचलते हुए शत्रुओं के दलों में सूखी घास में दावानल की तरह विचरते रहे।
श्लोक 58 (12.164.58)
असिवेगप्रभग्नास्ते छिन्नबाहूरुवक्षसः । उत्तमाङ्गप्रकृत्ताश्च पेतुरुर्व्यां महाबलाः ॥
asivegaprabhagnāste chinnabāhūruvakṣasaḥ | uttamāṅgaprakṛttāśca petururvyāṃ mahābalāḥ
तलवार के वेग से टूटकर, भुजाएँ, जाँघें और छातियाँ कटकर तथा सिर कटकर वे महाबली धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 59 (12.164.59)
अपरे दानवा भग्नाः खड्गधारावपीडिताः । अन्योन्यमभिनर्दन्तो दिशः संप्रतिपेदिरे ॥
apare dānavā bhagnāḥ khaḍgadhārāvapīḍitāḥ | anyonyamabhinardanto diśaḥ saṃpratipedire
दूसरे दानव तलवार की धार से टूटे और पीड़ित होकर एक-दूसरे को पुकारते हुए सब दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 60 (12.164.60)
भूमिं केचित्प्रविविशुः पर्वतानपरे तथा । अपरे जग्मुराकाशमपरेऽम्भः समाविशन् ॥
bhūmiṃ kecitpraviviśuḥ parvatānapare tathā | apare jagmurākāśamapare'mbhaḥ samāviśan
कुछ पृथ्वी में समा गए, कुछ पर्वतों में; कुछ आकाश में चले गए और कुछ जल में घुस गए।
श्लोक 61 (12.164.61)
तस्मिन्महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे । बभूव भूः प्रतिभया मांसशोणितकर्दमा ॥
tasminmahati saṃvṛtte samare bhṛśadāruṇe | babhūva bhūḥ pratibhayā māṃsaśoṇitakardamā
जब वह बड़ा और अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ा, तब भूमि भयावनी होकर मांस और रक्त के कीचड़ से भर गई।
श्लोक 62 (12.164.62)
दानवानां शरीरैश्च पतितैः शोणितोक्षितैः । समाकीर्णा महाबाहो शैलैरिव सकिंशुकैः ॥
dānavānāṃ śarīraiśca patitaiḥ śoṇitokṣitaiḥ | samākīrṇā mahābāho śailairiva sakiṃśukaiḥ
हे महाबाहो, रक्त से सने, गिरे हुए दानवों के शरीरों से बिछी वह पृथ्वी किंशुक के फूलों से लदे पर्वतों जैसी दिखाई देती थी।
श्लोक 63 (12.164.63)
रुधिरेण परिक्लिन्ना प्रबभौ वसुधा तदा । रक्तार्द्रवसना श्यामा नारीव मदविह्वला ॥
rudhireṇa pariklinnā prababhau vasudhā tadā | raktārdravasanā śyāmā nārīva madavihvalā
रक्त से भीगी हुई पृथ्वी उस समय ऐसी शोभित हुई जैसे लाल रंग से भीगे वस्त्र पहने, मद से विह्वल कोई श्यामा नारी।
श्लोक 64 (12.164.64)
स रुद्रो दानवान्हत्वा कृत्वा धर्मोत्तरं जगत् । रौद्रं रूपमथाक्षिप्य चक्रे रूपं शिवं शिवः ॥
sa rudro dānavānhatvā kṛtvā dharmottaraṃ jagat | raudraṃ rūpamathākṣipya cakre rūpaṃ śivaṃ śivaḥ
दानवों को मारकर और जगत् को धर्मप्रधान बनाकर कल्याणकारी रुद्र ने अपना भयंकर रूप त्याग दिया और फिर अपना सौम्य, मंगलमय रूप धारण कर लिया।
श्लोक 65 (12.164.65)
ततो महर्षयः सर्वे सर्वे देवगणास्तथा । जयेनाद्भुतकल्पेन देवदेवमथास्तुवन् ॥
tato maharṣayaḥ sarve sarve devagaṇāstathā | jayenādbhutakalpena devadevamathāstuvan
तब सब महर्षियों और सब देवगणों ने उस अद्भुत विजय के लिए देवाधिदेव की स्तुति की।
श्लोक 66 (12.164.66)
ततः स भगवान्रुद्रो दानवक्षतजोक्षितम् । असिं धर्मस्य गोप्तारं ददौ सत्कृत्य विष्णवे ॥
tataḥ sa bhagavānrudro dānavakṣatajokṣitam | asiṃ dharmasya goptāraṃ dadau satkṛtya viṣṇave
तब भगवान् रुद्र ने दानवों के रक्त से सनी हुई, धर्म की रक्षक उस तलवार को आदरपूर्वक विष्णु को दे दिया।
श्लोक 67 (12.164.67)
विष्णुर्मरीचये प्रादान्मरीचिर्भार्गवाय तम् । महर्षिभ्यो ददौ खड्गमृषयो वासवाय च ॥
viṣṇurmarīcaye prādānmarīcirbhārgavāya tam | maharṣibhyo dadau khaḍgamṛṣayo vāsavāya ca
विष्णु ने उसे मरीचि को दिया और मरीचि ने भार्गव को; उन्होंने वह तलवार महर्षियों को दी और ऋषियों ने इन्द्र को।
श्लोक 68 (12.164.68)
महेन्द्रो लोकपालेभ्यो लोकपालास्तु पुत्रक । मनवे सूर्यपुत्राय ददुः खड्गं सुविस्तरम् ॥
mahendro lokapālebhyo lokapālāstu putraka | manave sūryaputrāya daduḥ khaḍgaṃ suvistaram
महेन्द्र ने उसे लोकपालों को दिया और बेटा, लोकपालों ने वह लम्बी तलवार सूर्यपुत्र मनु को दी।
श्लोक 69 (12.164.69)
ऊचुश्चैनं तथा वाक्यं मानुषाणां त्वमीश्वरः । असिना धर्मगर्भेण पालयस्व प्रजा इति ॥
ūcuścainaṃ tathā vākyaṃ mānuṣāṇāṃ tvamīśvaraḥ | asinā dharmagarbheṇa pālayasva prajā iti
और उन्होंने उनसे कहा: "तुम मनुष्यों के स्वामी हो; धर्म को अपने गर्भ में रखनेवाली इस तलवार से प्रजा का पालन करो।"
श्लोक 70 (12.164.70)
धर्मसेतुमतिक्रान्ताः स्थूलसूक्ष्मार्थकारणात् । विभज्य दण्डं रक्ष्याः स्युर्धर्मतो न यदृच्छया ॥
dharmasetumatikrāntāḥ sthūlasūkṣmārthakāraṇāt | vibhajya daṇḍaṃ rakṣyāḥ syurdharmato na yadṛcchayā
"जो लोग छोटे या बड़े कारण से धर्म की मर्यादा लाँघ जाएँ, उन्हें धर्म के अनुसार दण्ड बाँटकर ही संयत करना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।
श्लोक 71 (12.164.71)
दुर्वाचा निग्रहो दण्डो हिरण्यबहुलस्तथा । व्यङ्गता च शरीरस्य वधो नाल्पस्य करणात् ॥
durvācā nigraho daṇḍo hiraṇyabahulastathā | vyaṅgatā ca śarīrasya vadho nālpasya karaṇāt
कठोर वाणी से फटकार, दण्ड, भारी सुवर्ण-दण्ड, शरीर का अंग-भंग और वध: ये ही दण्ड हैं, पर तुच्छ कारण से वध नहीं होना चाहिए।
श्लोक 72 (12.164.72)
असेरेतानि रूपाणि दुर्वाचादीनि निर्दिशेत् । असेरेवं प्रमाणानि परमाण्यभ्यतिक्रमात् ॥
aseretāni rūpāṇi durvācādīni nirdiśet | aserevaṃ pramāṇāni paramāṇyabhyatikramāt
तलवार के ये रूप कठोर वाणी से आरम्भ करके बताने चाहिए; और इस प्रकार अपराध जितना बढ़े, तलवार के दण्ड उतने ही कठोर होते जाते हैं।"
श्लोक 73 (12.164.73)
अभिषिच्याथ पुत्रं स्वं प्रजानामधिपं ततः । मनुः प्रजानां रक्षार्थं क्षुपाय प्रददावसिम् ॥
abhiṣicyātha putraṃ svaṃ prajānāmadhipaṃ tataḥ | manuḥ prajānāṃ rakṣārthaṃ kṣupāya pradadāvasim
तब मनु ने अपने पुत्र को प्रजा का अधिपति बनाकर अभिषिक्त किया और प्रजा की रक्षा के लिए क्षुप को वह तलवार दे दी।
श्लोक 74 (12.164.74)
क्षुपाज्जग्राह चेक्ष्वाकुरिक्ष्वाकोश्च पुरूरवाः । आयुश्च तस्माल्लेभे तं नहुषश्च ततो भुवि ॥
kṣupājjagrāha cekṣvākurikṣvākośca purūravāḥ | āyuśca tasmāllebhe taṃ nahuṣaśca tato bhuvi
इक्ष्वाकु ने क्षुप से उसे पाया और पुरूरवा ने इक्ष्वाकु से; उससे आयु ने पाया और फिर पृथ्वी पर नहुष ने।
श्लोक 75 (12.164.75)
ययातिर्नहुषाच्चापि पूरुस्तस्माच्च लब्धवान् । आधूर्तश्च गयस्तस्मात्ततो भूमिशयो नृपः ॥
yayātirnahuṣāccāpi pūrustasmācca labdhavān | ādhūrtaśca gayastasmāttato bhūmiśayo nṛpaḥ
नहुष से ययाति ने पाया और उससे पूरु ने; फिर आधूर्त ने, उससे गय ने, और उसके बाद राजा भूमिशय ने।
श्लोक 76 (12.164.76)
भरतश्चापि दौष्यन्तिर्लेभे भूमिशयादसिम् । तस्माल्लेभे च धर्मज्ञो राजन्नैलबिलस्तथा ॥
bharataścāpi dauṣyantirlebhe bhūmiśayādasim | tasmāllebhe ca dharmajño rājannailabilastathā
दुष्यन्त के पुत्र भरत ने भूमिशय से तलवार पाई, और हे राजन्, उससे धर्म को जाननेवाले ऐलबिल ने पाई।
श्लोक 77 (12.164.77)
ततस्त्वैलबिलाल्लेभे धुन्धुमारो नरेश्वरः । धुन्धुमाराच्च काम्भोजो मुचुकुन्दस्ततोऽभजत् ॥
tatastvailabilāllebhe dhundhumāro nareśvaraḥ | dhundhumārācca kāmbhojo mucukundastato'bhajat
फिर ऐलबिल से नरेश्वर धुन्धुमार ने पाई; धुन्धुमार से काम्भोज ने, और उससे मुचुकुन्द ने ग्रहण की।
श्लोक 78 (12.164.78)
मुचुकुन्दान्मरुत्तश्च मरुत्तादपि रैवतः । रैवताद्युवनाश्वश्च युवनाश्वात्ततो रघुः ॥
mucukundānmaruttaśca maruttādapi raivataḥ | raivatādyuvanāśvaśca yuvanāśvāttato raghuḥ
मुचुकुन्द से मरुत्त, मरुत्त से रैवत, रैवत से युवनाश्व और युवनाश्व से रघु ने पाई।
श्लोक 79 (12.164.79)
इक्ष्वाकुवंशजस्तस्माद्धरिणाश्वः प्रतापवान् । हरिणाश्वादसिं लेभे शुनकः शुनकादपि ॥
ikṣvākuvaṃśajastasmāddhariṇāśvaḥ pratāpavān | hariṇāśvādasiṃ lebhe śunakaḥ śunakādapi
उससे इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न प्रतापी हरिणाश्व ने पाई; हरिणाश्व से शुनक ने तलवार पाई, और फिर शुनक से
श्लोक 80 (12.164.80)
उशीनरो वै धर्मात्मा तस्माद्भोजाः सयादवाः । यदुभ्यश्च शिबिर्लेभे शिबेश्चापि प्रतर्दनः ॥
uśīnaro vai dharmātmā tasmādbhojāḥ sayādavāḥ | yadubhyaśca śibirlebhe śibeścāpi pratardanaḥ
धर्मात्मा उशीनर ने; उससे यादवों सहित भोजों ने; यदुवंशियों से शिबि ने पाई और शिबि से प्रतर्दन ने।
श्लोक 81 (12.164.81)
प्रतर्दनादष्टकश्च रुशदश्वोऽष्टकादपि । रुशदश्वाद्भरद्वाजो द्रोणस्तस्मात्कृपस्ततः । ततस्त्वं भ्रातृभिः सार्धं परमासिमवाप्तवान् ॥
pratardanādaṣṭakaśca ruśadaśvo'ṣṭakādapi | ruśadaśvādbharadvājo droṇastasmātkṛpastataḥ | tatastvaṃ bhrātṛbhiḥ sārdhaṃ paramāsimavāptavān
प्रतर्दन से अष्टक ने, अष्टक से रुशदश्व ने, रुशदश्व से भरद्वाज ने, उससे द्रोण ने और फिर कृप ने पाई; और उसके बाद तुमने अपने भाइयों सहित वह श्रेष्ठ तलवार पाई।
श्लोक 82 (12.164.82)
कृत्तिकास्तस्य नक्षत्रमसेरग्निश्च दैवतम् । रोहिण्यो गोत्रमस्याथ रुद्राश्च गुरुसत्तमाः ॥
kṛttikāstasya nakṣatramaseragniśca daivatam | rohiṇyo gotramasyātha rudrāśca gurusattamāḥ
इसका नक्षत्र कृत्तिका है और देवता अग्नि; रोहिणियाँ इसका गोत्र हैं और रुद्रगण इसके श्रेष्ठ गुरु हैं।
श्लोक 83 (12.164.83)
असेरष्टौ हि नामानि रहस्यानि निबोध मे । पाण्डवेय सदा यानि कीर्तयँल्लभते जयम् ॥
aseraṣṭau hi nāmāni rahasyāni nibodha me | pāṇḍaveya sadā yāni kīrtayam̐llabhate jayam
हे पाण्डुपुत्र, अब मुझसे तलवार के आठ गुप्त नाम सुनो, जिनका कीर्तन करने से मनुष्य सदा विजय पाता है।
श्लोक 84 (12.164.84)
असिर्विशसनः खड्गस्तीक्ष्णचर्मा दुरासदः । श्रीगर्भो विजयश्चैव धर्मपालस्तथैव च ॥
asirviśasanaḥ khaḍgastīkṣṇacarmā durāsadaḥ | śrīgarbho vijayaścaiva dharmapālastathaiva ca
असि, विशसन, खड्ग, तीक्ष्णचर्मा, दुरासद, श्रीगर्भ, विजय और धर्मपाल।
श्लोक 85 (12.164.85)
अग्र्यः प्रहरणानां च खड्गो भुवि परिश्रुतः । महेश्वरप्रणीतश्च पुराणे निश्चयं गतः । एतानि चैव नामानि पुराणे निश्चितानि वै ॥
agryaḥ praharaṇānāṃ ca khaḍgo bhuvi pariśrutaḥ | maheśvarapraṇītaśca purāṇe niścayaṃ gataḥ | etāni caiva nāmāni purāṇe niścitāni vai
खड्ग शस्त्रों में अग्रगण्य है और पृथ्वी पर प्रसिद्ध है; महेश्वर ने उसे रचा और पुराण में यही निश्चित हुआ है। ये नाम भी पुराण में निश्चित किए गए हैं।
श्लोक 86 (12.164.86)
पृथुस्तूत्पादयामास धनुराद्यमरिंदमः । तेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि सुबहून्यपि । धर्मेण च यथापूर्वं वैन्येन परिरक्षिता ॥
pṛthustūtpādayāmāsa dhanurādyamariṃdamaḥ | teneyaṃ pṛthivī dugdhā sasyāni subahūnyapi | dharmeṇa ca yathāpūrvaṃ vainyena parirakṣitā
परन्तु शत्रुओं का दमन करनेवाले पृथु ने सबसे पहले धनुष की रचना की। उसी से इस पृथ्वी को दुहा गया और बहुत-सी फसलें प्राप्त हुईं; और वैन्य ने पहले की तरह धर्म से उसकी रक्षा की।
श्लोक 87 (12.164.87)
तदेतदार्षं माद्रेय प्रमाणं कर्तुमर्हसि । असेश्च पूजा कर्तव्या सदा युद्धविशारदैः ॥
tadetadārṣaṃ mādreya pramāṇaṃ kartumarhasi | aseśca pūjā kartavyā sadā yuddhaviśāradaiḥ
हे माद्रीपुत्र, यह ऋषियों की परम्परा है; तुम्हें इसे प्रमाण मानना चाहिए। और युद्ध में कुशल पुरुषों को सदा तलवार की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 88 (12.164.88)
इत्येष प्रथमः कल्पो मया ते कथितः पुनः । एवमेवासिसर्गोऽयं यथावद्भरतर्षभ ॥
ityeṣa prathamaḥ kalpo mayā te kathitaḥ punaḥ | evamevāsisargo'yaṃ yathāvadbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, यह पहला कल्प है, जो मैंने तुम्हें फिर सुनाया; और खड्ग की उत्पत्ति ठीक इसी प्रकार हुई।
श्लोक 89 (12.164.89)
सर्वथा तमिह श्रुत्वा खड्गस्यागममुत्तमम् । लभते पुरुषः कीर्तिं प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥
sarvathā tamiha śrutvā khaḍgasyāgamamuttamam | labhate puruṣaḥ kīrtiṃ pretya cānantyamaśnute
खड्ग की उत्पत्ति की इस उत्तम कथा को पूरी तरह सुनकर मनुष्य यहाँ कीर्ति पाता है और मरने के बाद अनन्त को प्राप्त करता है।