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शान्ति पर्व · अध्याय 165

धर्म, अर्थ और काम: भाइयों के मत

युधिष्ठिर विदुर और अपने चारों भाइयों से पूछते हैं कि धर्म, अर्थ और काम में कौन श्रेष्ठ है। विदुर धर्म को प्रथम रखते हैं; अर्जुन अर्थ को, नकुल और सहदेव धर्मयुक्त अर्थ को, और भीम काम को श्रेष्ठ बताते हैं, तथा तीनों का साथ-साथ सेवन करने को कहते हैं। फिर युधिष्ठिर अपना मत कहते हैं: जो इन तीनों में, पाप या पुण्य में, आसक्त नहीं होता, वह दुःख-सुख से छूट जाता है, और सब पर विधि का शासन है। भाई उन्हें प्रणाम करते हैं और वे आगे के धर्म के विषय में फिर भीष्म से प्रश्न करते हैं।

अध्याय 164अध्याय-सूचीअध्याय 166

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.165.1)

इत्युक्तवति भीष्मे तु तूष्णींभूते युधिष्ठिरः । पप्रच्छावसथं गत्वा भ्रातृन्विदुरपञ्चमान् ॥

ityuktavati bhīṣme tu tūṣṇīṃbhūte yudhiṣṭhiraḥ | papracchāvasathaṃ gatvā bhrātṛnvidurapañcamān

भीष्म के इस प्रकार कहकर चुप हो जाने पर युधिष्ठिर अपने निवास में गए और भाइयों से, जिनमें विदुर पाँचवें थे, पूछा:

श्लोक 2 (12.165.2)

धर्मे चार्थे च कामे च लोकवृत्तिः समाहिता । तेषां गरीयान्कतमो मध्यमः को लघुश्च कः ॥

dharme cārthe ca kāme ca lokavṛttiḥ samāhitā | teṣāṃ garīyānkatamo madhyamaḥ ko laghuśca kaḥ

"संसार का व्यवहार धर्म, अर्थ और काम पर टिका है। इनमें कौन सबसे बड़ा है, कौन मध्यम और कौन सबसे छोटा?

श्लोक 3 (12.165.3)

कस्मिंश्चात्मा नियन्तव्यस्त्रिवर्गविजयाय वै । संपृष्टा नैष्ठिकं वाक्यं यथावद्वक्तुमर्हथ ॥

kasmiṃścātmā niyantavyastrivargavijayāya vai | saṃpṛṣṭā naiṣṭhikaṃ vākyaṃ yathāvadvaktumarhatha

और इन तीनों पर विजय पाने के लिए किस एक में आत्मा को लगाए रखना चाहिए? मेरे पूछने पर तुम लोग निश्चित उत्तर ठीक-ठीक बताओ।"

श्लोक 4 (12.165.4)

ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् । जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ॥

tato'rthagatitattvajñaḥ prathamaṃ pratibhānavān | jagāda viduro vākyaṃ dharmaśāstramanusmaran

तब अर्थ की गति का तत्त्व जाननेवाले, प्रतिभाशाली विदुर ने धर्मशास्त्र का स्मरण करते हुए सबसे पहले कहा:

विदुर उवाच

श्लोक 5 (12.165.5)

बहुश्रुतं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिया क्षमा । भावशुद्धिर्दया सत्यं संयमश्चात्मसंपदः ॥

bahuśrutaṃ tapastyāgaḥ śraddhā yajñakriyā kṣamā | bhāvaśuddhirdayā satyaṃ saṃyamaścātmasaṃpadaḥ

बहुश्रुतता, तप, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावों की शुद्धता, दया, सत्य और संयम: ये आत्मा की सम्पत्ति हैं।

श्लोक 6 (12.165.6)

एतदेवाभिपद्यस्व मा ते भूच्चलितं मनः । एतन्मूलौ हि धर्मार्थावेतदेकपदं हितम् ॥

etadevābhipadyasva mā te bhūccalitaṃ manaḥ | etanmūlau hi dharmārthāvetadekapadaṃ hitam

इसी को पकड़े रहो, तुम्हारा मन डिगने न पाए। धर्म और अर्थ दोनों का मूल यही है; यही एकमात्र मार्ग हितकारी है।

श्लोक 7 (12.165.7)

धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः । धर्मेण देवा दिवि च धर्मे चार्थः समाहितः ॥

dharmeṇaivarṣayastīrṇā dharme lokāḥ pratiṣṭhitāḥ | dharmeṇa devā divi ca dharme cārthaḥ samāhitaḥ

धर्म से ही ऋषि तर गए; धर्म में ही लोक प्रतिष्ठित हैं; धर्म से ही देवता स्वर्ग में हैं, और अर्थ भी धर्म में ही टिका है।

श्लोक 8 (12.165.8)

धर्मो राजन्गुणः श्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते । कामो यवीयानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

dharmo rājanguṇaḥ śreṣṭho madhyamo hyartha ucyate | kāmo yavīyāniti ca pravadanti manīṣiṇaḥ

हे राजन्, धर्म सबसे श्रेष्ठ गुण है, अर्थ मध्यम कहा जाता है, और काम सबसे छोटा: ऐसा विद्वान् कहते हैं।

श्लोक 9 (12.165.9)

तस्माद्धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना । तथा च सर्वभूतेषु वर्तितव्यं यतात्मना ॥

tasmāddharmapradhānena bhavitavyaṃ yatātmanā | tathā ca sarvabhūteṣu vartitavyaṃ yatātmanā

इसलिए संयमी पुरुष को धर्म को प्रधान मानना चाहिए, और संयत मन से सब प्राणियों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (12.165.10)

समाप्तवचने तस्मिन्भीमकर्मा धनञ्जयः । ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञो जगौ वाक्यं प्रचोदितः ॥

samāptavacane tasminbhīmakarmā dhanañjayaḥ | tato'rthagatitattvajño jagau vākyaṃ pracoditaḥ

उनके बोल चुकने पर, भयंकर कर्म करनेवाले और अर्थ की गति का तत्त्व जाननेवाले अर्जुन ने प्रेरित होकर कहा:

अर्जुन उवाच

श्लोक 11 (12.165.11)

कर्मभूमिरियं राजन्निह वार्ता प्रशस्यते । कृषिर्वाणिज्यगोरक्षं शिल्पानि विविधानि च ॥

karmabhūmiriyaṃ rājanniha vārtā praśasyate | kṛṣirvāṇijyagorakṣaṃ śilpāni vividhāni ca

हे राजन्, यह कर्मभूमि है; यहाँ जीविका के उद्योग की प्रशंसा होती है: खेती, व्यापार, गोपालन और अनेक प्रकार की शिल्पकलाएँ।

श्लोक 12 (12.165.12)

अर्थ इत्येव सर्वेषां कर्मणामव्यतिक्रमः । निवृत्तेऽर्थे न वर्तेते धर्मकामाविति श्रुतिः ॥

artha ityeva sarveṣāṃ karmaṇāmavyatikramaḥ | nivṛtte'rthe na vartete dharmakāmāviti śrutiḥ

सब कर्मों की अनिवार्य सीमा अर्थ ही है। अर्थ के न रहने पर धर्म और काम भी नहीं चलते: ऐसा श्रुति का वचन है।

श्लोक 13 (12.165.13)

विषहेतार्थवान्धर्ममाराधयितुमुत्तमम् । कामं च चरितुं शक्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥

viṣahetārthavāndharmamārādhayitumuttamam | kāmaṃ ca carituṃ śakto duṣprāpamakṛtātmabhiḥ

धनवान् पुरुष उत्तम धर्म की आराधना कर सकता है और काम का भी सेवन कर सकता है, जो अपरिपक्व मन के लोगों के लिए दुर्लभ है।

श्लोक 14 (12.165.14)

अर्थस्यावयवावेतौ धर्मकामाविति श्रुतिः । अर्थसिद्ध्या विनिर्वृत्तावृभावेतौ भविष्यतः ॥

arthasyāvayavāvetau dharmakāmāviti śrutiḥ | arthasiddhyā vinirvṛttāvṛbhāvetau bhaviṣyataḥ

श्रुति कहती है कि धर्म और काम अर्थ के ही दो अंग हैं; अर्थ की सिद्धि होने पर ये दोनों सिद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 15 (12.165.15)

तद्गतार्थं हि पुरुषं विशिष्टतरयोनयः । ब्रह्माणमिव भूतानि सततं पर्युपासते ॥

tadgatārthaṃ hi puruṣaṃ viśiṣṭatarayonayaḥ | brahmāṇamiva bhūtāni satataṃ paryupāsate

जिसने अर्थ पा लिया हो, उस पुरुष की सेवा उच्च कुल के लोग भी वैसे ही निरन्तर करते हैं जैसे ब्रह्मा की।

श्लोक 16 (12.165.16)

जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रियाः । मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ॥

jaṭājinadharā dāntāḥ paṅkadigdhā jitendriyāḥ | muṇḍā nistantavaścāpi vasantyarthārthinaḥ pṛthak

कोई जटा और मृगचर्म धारण करते हैं, संयमी हैं, कीचड़ से लिपटे और जितेन्द्रिय हैं; कोई मुण्डित और बन्धनरहित हैं; ये सब अलग-अलग रहते हुए भी अर्थ की ही कामना करते हैं।

श्लोक 17 (12.165.17)

काषायवसनाश्चान्ये श्मश्रुला हि सुसंयताः । विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ताः सर्वपरिग्रहैः ॥

kāṣāyavasanāścānye śmaśrulā hi susaṃyatāḥ | vidvāṃsaścaiva śāntāśca muktāḥ sarvaparigrahaiḥ

दूसरे गेरुए वस्त्र पहनते हैं, दाढ़ी-मूँछ रखते हैं और भलीभाँति संयमी हैं; विद्वान्, शान्त और सब परिग्रहों से मुक्त हैं।

श्लोक 18 (12.165.18)

अर्थार्थिनः सन्ति नित्यं परितष्यन्ति कर्मभिः । अर्थार्थिनः सन्ति केचिदपरे स्वर्गकाङ्क्षिणः । कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वंस्वं धर्ममनुष्ठिताः ॥

arthārthinaḥ santi nityaṃ paritaṣyanti karmabhiḥ | arthārthinaḥ santi kecidapare svargakāṅkṣiṇaḥ | kulapratyāgamāścaike svaṃsvaṃ dharmamanuṣṭhitāḥ

अर्थ चाहनेवाले सदा रहते हैं, जो अपने कर्मों से सन्तुष्ट रहते हैं। कोई अर्थ चाहते हैं, कोई दूसरे स्वर्ग की आकांक्षा रखते हैं, और कुछ अपने कुल की परम्परा से आए मार्ग पर चलते हुए अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

श्लोक 19 (12.165.19)

आस्तिका नास्तिकाश्चैव नियताः संयमे परे । अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशिता ॥

āstikā nāstikāścaiva niyatāḥ saṃyame pare | aprajñānaṃ tamobhūtaṃ prajñānaṃ tu prakāśitā

आस्तिक भी हैं और नास्तिक भी, और कुछ दूसरे संयम में लगे रहते हैं। अज्ञान अन्धकार है और ज्ञान प्रकाश।

श्लोक 20 (12.165.20)

भृत्यान्भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान् । एतन्मतिमतांश्रेष्ठ मतं मम यथातथम् । अनयोस्तु विबोध त्वं वचनं शक्रकण्वयोः ॥

bhṛtyānbhogairdviṣo daṇḍairyo yojayati so'rthavān | etanmatimatāṃśreṣṭha mataṃ mama yathātatham | anayostu vibodha tvaṃ vacanaṃ śakrakaṇvayoḥ

जो अपने सेवकों को भोग देता है और शत्रुओं को दण्ड, वही धनवान् है। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, यह मेरा मत है, जैसा है वैसा ही कहा। अब इन दोनों, शक्र और कण्व, के वचन भी सुनो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (12.165.21)

तथा धर्मार्थकुशलौ माद्रीपुत्रावनन्तरम् । नकुलः सहदेवश्च वाक्यमूचतुरुत्तमम् ॥

tathā dharmārthakuśalau mādrīputrāvanantaram | nakulaḥ sahadevaśca vākyamūcaturuttamam

तब धर्म और अर्थ में कुशल माद्री के दोनों पुत्र नकुल और सहदेव ने इसके बाद उत्तम वचन कहे:

नकुलसहदेवावूचतुः

श्लोक 22 (12.165.22)

आसीनश्च शयानश्च विचरन्नपि वा स्थितः । अर्थयोगं दृढं कुर्याद्योगैरुच्चावचैरपि ॥

āsīnaśca śayānaśca vicarannapi vā sthitaḥ | arthayogaṃ dṛḍhaṃ kuryādyogairuccāvacairapi

बैठे हों, लेटे हों, चलते हों या खड़े हों, ऊँचे-नीचे सब उपायों से मनुष्य को अपना अर्थ दृढ़ करना चाहिए।

श्लोक 23 (12.165.23)

अस्मिंस्तु वै विनिर्वृत्ते दुर्लभे परमप्रिये । इह कामानवाप्नोति प्रत्यक्षं नात्र संशयः ॥

asmiṃstu vai vinirvṛtte durlabhe paramapriye | iha kāmānavāpnoti pratyakṣaṃ nātra saṃśayaḥ

जब यह दुर्लभ और परम प्रिय वस्तु सिद्ध हो जाती है, तब मनुष्य यहीं अपनी कामनाएँ पा लेता है: यह प्रत्यक्ष है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 24 (12.165.24)

योऽर्थो धर्मेण संयुक्तो धर्मो यश्चार्थसंयुतः । मध्विवामृतसंसृष्टं तस्मादेतौ मताविह ॥

yo'rtho dharmeṇa saṃyukto dharmo yaścārthasaṃyutaḥ | madhvivāmṛtasaṃsṛṣṭaṃ tasmādetau matāviha

धर्म से युक्त अर्थ और अर्थ से युक्त धर्म अमृत में मिले मधु के समान हैं; इसीलिए इस संसार में ये दोनों माने गए हैं।

श्लोक 25 (12.165.25)

अनर्थस्य न कामोस्ति तथाऽर्थोऽधर्मिणः कुतः । तस्मादुद्विजते लोको धर्मार्थाभ्यां बहिष्कृतात् ॥

anarthasya na kāmosti tathā'rtho'dharmiṇaḥ kutaḥ | tasmādudvijate loko dharmārthābhyāṃ bahiṣkṛtāt

निर्धन के लिए काम नहीं है, और अधर्मी के पास अर्थ कहाँ से? इसीलिए जो धर्म और अर्थ दोनों से बहिष्कृत है, उससे संसार उद्विग्न होता है।

श्लोक 26 (12.165.26)

तस्माद्धर्मप्रधानेन साध्योऽर्थः संयतात्मना । विश्वस्तेषु हि भूतेषु कल्पते सर्वमेव हि ॥

tasmāddharmapradhānena sādhyo'rthaḥ saṃyatātmanā | viśvasteṣu hi bhūteṣu kalpate sarvameva hi

इसलिए संयमी पुरुष को धर्म को प्रधान रखकर अर्थ का साधन करना चाहिए; क्योंकि जब प्राणी परस्पर विश्वास रखते हैं, तब सब कुछ सम्भव होता है।

श्लोक 27 (12.165.27)

धर्मं समाचरेत्पूर्वं ततोऽर्थं धर्मसंयुतम् । ततः कामं चरेत्पश्चात्सिद्धार्थस्य हि तत्फलम् ॥

dharmaṃ samācaretpūrvaṃ tato'rthaṃ dharmasaṃyutam | tataḥ kāmaṃ caretpaścātsiddhārthasya hi tatphalam

पहले धर्म का आचरण करे, फिर धर्म से युक्त अर्थ का, और उसके बाद काम का; क्योंकि सिद्धार्थ पुरुष के लिए वही फल है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (12.165.28)

विरेमतुस्तु तद्वाक्यमुक्त्वा तावश्विनोः सुतौ । भीमसेनस्ततो वाक्यमिदं वक्तुं प्रचक्रमे ॥

virematustu tadvākyamuktvā tāvaśvinoḥ sutau | bhīmasenastato vākyamidaṃ vaktuṃ pracakrame

यह कहकर अश्विनीकुमारों के दोनों पुत्र चुप हो गए, और तब भीमसेन ने ये वचन कहना आरम्भ किया:

भीम उवाच

श्लोक 29 (12.165.29)

नाकामः कामयत्यर्थं नाकामो धर्ममिच्छति । नाकामः कामयानोऽस्ति तस्मात्कामो विशिष्यते ॥

nākāmaḥ kāmayatyarthaṃ nākāmo dharmamicchati | nākāmaḥ kāmayāno'sti tasmātkāmo viśiṣyate

कामनारहित मनुष्य न अर्थ चाहता है, न धर्म की इच्छा करता है; कामना के बिना कोई कुछ करता ही नहीं। इसलिए काम सबसे बढ़कर है।

श्लोक 30 (12.165.30)

कामेन युक्ता ऋषयस्तपस्येव समाहिताः । पलाशाः शाकमूलाशा वायुभक्षाः सुसंयताः ॥

kāmena yuktā ṛṣayastapasyeva samāhitāḥ | palāśāḥ śākamūlāśā vāyubhakṣāḥ susaṃyatāḥ

तपस्या में लगे ऋषि भी कामना से ही प्रेरित हैं: कोई पत्ते, साग और कन्द-मूल खाते हैं, कोई वायु पर रहते हैं, सब भलीभाँति संयमी हैं।

श्लोक 31 (12.165.31)

वेदोपवेदेष्वपरे युक्ताः स्वाध्यायपारगाः । श्राद्धे यज्ञक्रियायां च तथा दानप्रतिग्रहे ॥

vedopavedeṣvapare yuktāḥ svādhyāyapāragāḥ | śrāddhe yajñakriyāyāṃ ca tathā dānapratigrahe

दूसरे वेदों और उपवेदों में लगे हैं, स्वाध्याय में पारंगत हैं; और कुछ श्राद्ध, यज्ञक्रिया तथा दान लेने-देने में लगे हैं।

श्लोक 32 (12.165.32)

वणिजः कर्षका गोपाः कारवः शिल्पिनस्तथा । देशधर्मकृतश्चैव युक्ताः कामेन कर्मसु ॥

vaṇijaḥ karṣakā gopāḥ kāravaḥ śilpinastathā | deśadharmakṛtaścaiva yuktāḥ kāmena karmasu

व्यापारी, किसान, ग्वाले, कारीगर और शिल्पी, तथा देश-धर्म का पालन करनेवाले, सब कामना से ही अपने कर्मों में लगे हैं।

श्लोक 33 (12.165.33)

समुद्रं वा विशन्त्यन्ये नराः कामेन संयुताः । कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन संततम् ॥

samudraṃ vā viśantyanye narāḥ kāmena saṃyutāḥ | kāmo hi vividhākāraḥ sarvaṃ kāmena saṃtatam

दूसरे मनुष्य कामना से बँधे हुए समुद्र तक में उतर जाते हैं। काम के रूप अनेक हैं; सब कुछ काम से ही व्याप्त है।

श्लोक 34 (12.165.34)

नास्ति नासीन्न भविता भूतं काममृते परम् । एतत्सारं महाराज धर्मार्थावत्र संश्रितौ ॥

nāsti nāsīnna bhavitā bhūtaṃ kāmamṛte param | etatsāraṃ mahārāja dharmārthāvatra saṃśritau

काम से बढ़कर कोई प्राणी न है, न था, न होगा। हे महाराज, यही सार है; धर्म और अर्थ इसी के आश्रित हैं।

श्लोक 35 (12.165.35)

नवनीतं यथा दध्नस्तथा कामोऽर्थधर्मतः । श्रेयस्तैलं न पिण्याको घृतं श्रेय उदश्वितः ॥

navanītaṃ yathā dadhnastathā kāmo'rthadharmataḥ | śreyastailaṃ na piṇyāko ghṛtaṃ śreya udaśvitaḥ

जैसे दही का सार मक्खन है, वैसे ही अर्थ और धर्म का सार काम है। खली से तेल श्रेष्ठ है और छाछ से घी श्रेष्ठ है।

श्लोक 36 (12.165.36)

श्रेयः पुष्पफलं काष्ठात्कामो धर्मार्थयोर्वरः । पुष्पतो मध्विव परं कामात्संजायते सुखम् । कामो धर्मार्थयोर्योनिः कामश्चाथ तदात्मकः ॥

śreyaḥ puṣpaphalaṃ kāṣṭhātkāmo dharmārthayorvaraḥ | puṣpato madhviva paraṃ kāmātsaṃjāyate sukham | kāmo dharmārthayoryoniḥ kāmaścātha tadātmakaḥ

लकड़ी से फूल और फल श्रेष्ठ हैं; काम धर्म और अर्थ दोनों से ऊपर है। जैसे फूल से मधु मिलता है, वैसे ही काम से परम सुख उत्पन्न होता है। काम धर्म और अर्थ का मूल है और स्वयं उन्हीं का स्वरूप भी है।

श्लोक 37 (12.165.37)

नाकामतो ब्राह्मणाः स्वन्नमर्था । न्नाकामतो ददति ब्राह्मणेभ्यः । नाकामतो विविधा लोकचेष्टा । तस्मात्कामः प्राक् त्रिवर्गस्य दृष्टः ॥

nākāmato brāhmaṇāḥ svannamarthā | nnākāmato dadati brāhmaṇebhyaḥ | nākāmato vividhā lokaceṣṭā | tasmātkāmaḥ prāk trivargasya dṛṣṭaḥ

कामना के बिना ब्राह्मण उत्तम अन्न और धन की इच्छा न करते; कामना के बिना कोई ब्राह्मणों को दान न देता; कामना के बिना संसार की अनेक चेष्टाएँ न होतीं। इसलिए काम त्रिवर्ग से पहले दिखाई देता है।

श्लोक 38 (12.165.38)

सुचारुवेषाभिरलंकृताभि । र्मदोत्कटाभिः प्रियवादिनीभिः । रमस्व योषिद्भिरुपेत्य कामं । कामो हि राजन्परमाभिरामः ॥

sucāruveṣābhiralaṃkṛtābhi | rmadotkaṭābhiḥ priyavādinībhiḥ | ramasva yoṣidbhirupetya kāmaṃ | kāmo hi rājanparamābhirāmaḥ

हे राजन्, सुन्दर वेश और आभूषणों से सजी, मद से उन्मत्त, प्रिय बोलनेवाली स्त्रियों के पास जाकर मनचाहा आनन्द लो; क्योंकि काम परम रमणीय है।

श्लोक 39 (12.165.39)

बुद्धिर्ममैषा परिखास्थितस्य । माभूद्विचारस्तव धर्मपुत्र । स्यात्संहितं सद्भिरफल्गुसारं । समस्तवाक्यं परमानृशंसम् ॥

buddhirmamaiṣā parikhāsthitasya | mābhūdvicārastava dharmaputra | syātsaṃhitaṃ sadbhiraphalgusāraṃ | samastavākyaṃ paramānṛśaṃsam

हे धर्मपुत्र, यह मेरा निश्चय है, जो मैंने बात को चारों ओर से परखकर बनाया है; तुम्हारे मन में कोई दुविधा न रहे। मेरा सारा कथन ऐसा हो जो सज्जनों को मान्य हो, सारयुक्त हो और पूरी तरह कठोरता से रहित हो।

श्लोक 40 (12.165.40)

धर्मार्थकामाः सममेव सेव्या । यो ह्येकभक्तः स नरो जघन्यः । द्वयोस्तु सक्तं प्रवदन्ति मध्यमं । स उत्तमो योऽभिरतस्त्रिवर्गे ॥

dharmārthakāmāḥ samameva sevyā | yo hyekabhaktaḥ sa naro jaghanyaḥ | dvayostu saktaṃ pravadanti madhyamaṃ | sa uttamo yo'bhiratastrivarge

धर्म, अर्थ और काम का सेवन साथ-साथ और समान रूप से करना चाहिए। जो केवल एक में लगा रहता है वह निम्न है; जो दो में लगा हो उसे मध्यम कहते हैं; और जो तीनों में रमा हो, वही उत्तम है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (12.165.41)

प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो । विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः । ततो वचः संग्रहविस्तरेण । प्रोक्त्वाऽथ वीरान्विरराम भीमः ॥

prājñaḥ suhṛccandanasāralipto | vicitramālyābharaṇairupetaḥ | tato vacaḥ saṃgrahavistareṇa | proktvā'tha vīrānvirarāma bhīmaḥ

इस प्रकार संक्षेप और विस्तार से वीरों के सामने अपनी बात कहकर, चन्दन के सार से लिप्त, अनेक रंगों की मालाओं और आभूषणों से सजे हुए, उनके मित्र और बुद्धिमान भीम चुप हो गए।

श्लोक 42 (12.165.42)

ततो मुहूर्तादथ धर्मराजो । वाक्यानि तेषामनुचिन्त्य सम्यक् । उवाच वाचाऽवितथं स्मयन्वै । बहुश्रुतो धर्मभृतां वरिष्ठः ॥

tato muhūrtādatha dharmarājo | vākyāni teṣāmanucintya samyak | uvāca vācā'vitathaṃ smayanvai | bahuśruto dharmabhṛtāṃ variṣṭhaḥ

फिर थोड़ी देर बाद धर्मराज ने, जो बहुश्रुत और धर्म धारण करनेवालों में श्रेष्ठ थे, उनकी बातों पर भलीभाँति विचार किया और मुस्कराकर यथार्थ वाणी में कहा:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 43 (12.165.43)

निःसंशयं निश्चितधर्मशास्त्राः । सर्वे भवन्तो विदितप्रमाणाः । विज्ञातुकामस्य ममेह वाक्यम् । उक्तं यद्वै नैष्ठिकं तच्छ्रुतं मे । इह त्ववश्यं गदतो ममापि । वाक्यं निबोधध्वमनन्यभावाः ॥

niḥsaṃśayaṃ niścitadharmaśāstrāḥ | sarve bhavanto viditapramāṇāḥ | vijñātukāmasya mameha vākyam | uktaṃ yadvai naiṣṭhikaṃ tacchrutaṃ me | iha tvavaśyaṃ gadato mamāpi | vākyaṃ nibodhadhvamananyabhāvāḥ

तुम सबने धर्मशास्त्र का निश्चय निःसंशय कर रखा है और तुम प्रमाणों को जानते हो। मैं जानना चाहता था, और तुमने यहाँ जो निश्चित मत कहा, वह मैंने सुन लिया। अब मुझे भी यहाँ अवश्य कहना है; एकाग्र मन से मेरा वचन सुनो।

श्लोक 44 (12.165.44)

यो वै न पापे निरतो न पुण्ये । नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे । विमुक्तदोषः समफल्गुसारो । विमुच्यते दुःखसुखात्स सिद्धः ॥

yo vai na pāpe nirato na puṇye | nārthe na dharme manujo na kāme | vimuktadoṣaḥ samaphalgusāro | vimucyate duḥkhasukhātsa siddhaḥ

जो मनुष्य न पाप में रमता है, न पुण्य में, न अर्थ में, न धर्म में, न काम में, जो दोषों से मुक्त है और जिसके लिए तुच्छ और सार समान हैं, वह दुःख और सुख से छूट जाता है; वही सिद्ध है।

श्लोक 45 (12.165.45)

भूतानि जातीमरणान्वितानि । जराविकारैश्च समन्वितानि । भूयश्च तैस्तैरुपसेवितानि । मोक्षं प्रशंसन्ति न तं च विद्मः ॥

bhūtāni jātīmaraṇānvitāni | jarāvikāraiśca samanvitāni | bhūyaśca taistairupasevitāni | mokṣaṃ praśaṃsanti na taṃ ca vidmaḥ

प्राणी जन्म और मृत्यु से बँधे हैं, बुढ़ापे के विकारों से घिरे हैं, और बार-बार उन-उन वस्तुओं से जुड़ते रहते हैं। लोग मोक्ष की प्रशंसा करते हैं, पर हम उसे नहीं जानते।

श्लोक 46 (12.165.46)

स्नेहे न बद्धस्य न सन्ति तानि । चैवं स्वयंभूर्भगवानुवाच । बोधाय निर्वाणपरा भवन्ति । तस्मान्न कुर्यात्प्रियमप्रियं च ॥

snehe na baddhasya na santi tāni | caivaṃ svayaṃbhūrbhagavānuvāca | bodhāya nirvāṇaparā bhavanti | tasmānna kuryātpriyamapriyaṃ ca

जो स्नेह में बँधा नहीं है, उसके लिए वे बातें नहीं रहतीं: ऐसा भगवान् स्वयम्भू ने कहा है। निर्वाण में लगे लोग बोध को प्राप्त होते हैं। इसलिए न प्रिय करना चाहिए, न अप्रिय।

श्लोक 47 (12.165.47)

एतच्च मुख्यं न तु कामकारो । यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि । भूतानि सर्वाणि विधिर्नियुङ्क्ते । विधिर्बलीयानिति वित्त सर्वे ॥

etacca mukhyaṃ na tu kāmakāro | yathā niyukto'smi tathā karomi | bhūtāni sarvāṇi vidhirniyuṅkte | vidhirbalīyāniti vitta sarve

मुख्य बात यही है कि अपनी इच्छा से कुछ नहीं होता। जैसे मुझे नियुक्त किया गया है, वैसे ही मैं करता हूँ। विधि सब प्राणियों को कर्म में लगाती है; विधि ही बलवान् है, यह तुम सब जान लो।

श्लोक 48 (12.165.48)

न कर्मणाऽप्नोत्यनवाप्यमर्थं । यद्भावि तद्वै भवतीति विद्मः । त्रिवर्गहीनोऽपि हि विन्दतेऽर्थं । तस्माददो लोकहिताय गुह्यम् ॥

na karmaṇā'pnotyanavāpyamarthaṃ | yadbhāvi tadvai bhavatīti vidmaḥ | trivargahīno'pi hi vindate'rthaṃ | tasmādado lokahitāya guhyam

कर्म से वह नहीं मिलता जो मिलनेवाला नहीं है; हम जानते हैं कि जो होनेवाला है, वह होकर रहता है। त्रिवर्ग से रहित मनुष्य भी लक्ष्य को पा लेता है; इसलिए यह लोक के हित के लिए कहा गया गुप्त रहस्य है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 49 (12.165.49)

तदग्र्यबुद्धेर्वचनं मनोनुगं । समस्तमाज्ञाय तथाहि हेतुमत् । तदा प्रणेदुश्च जहर्षिरे च ते । कुरुप्रवीराय च चक्रिरेऽञ्जलिम् ॥

tadagryabuddhervacanaṃ manonugaṃ | samastamājñāya tathāhi hetumat | tadā praṇeduśca jaharṣire ca te | kurupravīrāya ca cakrire'ñjalim

परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर के मन के अनुकूल और युक्तियुक्त उस सारे वचन को समझकर उन्होंने हर्षनाद किया, प्रसन्न हुए और कुरुकुल के उस प्रमुख वीर को हाथ जोड़े।

श्लोक 50 (12.165.50)

सुचारुवर्णाक्षरशब्दभूषितां । मनोनुगां निर्गतवाक्यकण्टकाम् । निशम्य तां पार्थिवभाषितां गिरं । पार्थस्य सर्वे प्रणता बभूवुः ॥

sucāruvarṇākṣaraśabdabhūṣitāṃ | manonugāṃ nirgatavākyakaṇṭakām | niśamya tāṃ pārthivabhāṣitāṃ giraṃ | pārthasya sarve praṇatā babhūvuḥ

सुन्दर वर्णों, अक्षरों और शब्दों से सजी, मन के अनुकूल और कठोर शब्दों के काँटों से रहित राजा की उस वाणी को सुनकर वे सब पार्थ के आगे झुक गए।

श्लोक 51 (12.165.51)

तथैव राजा प्रशशंस वीर्यवान् । पुनश्च पप्रच्छ सरिद्वरासुतम् । धर्मार्थकामेषु विनिश्चयज्ञं । ततः परं धर्ममहीनचेतसम् ॥

tathaiva rājā praśaśaṃsa vīryavān | punaśca papraccha saridvarāsutam | dharmārthakāmeṣu viniścayajñaṃ | tataḥ paraṃ dharmamahīnacetasam

उसी प्रकार पराक्रमी राजा ने उनकी प्रशंसा की। फिर उन्होंने धर्म, अर्थ और काम के निर्णय को जाननेवाले, अटल चित्त वाले गंगापुत्र से आगे के धर्म के विषय में फिर पूछा।

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