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शान्ति पर्व · अध्याय 167

डाकुओं के गाँव में ब्राह्मण गौतम

मित्रद्रोही के विषय में पूछे जाने पर भीष्म उत्तर दिशा के म्लेच्छों के बीच घटी एक प्राचीन कथा सुनाते हैं। गौतम नामक निर्धन और वेदहीन ब्राह्मण धन की इच्छा से डाकुओं के गाँव में जाता है, जहाँ एक उदार डाकू उसे घर, वस्त्र और स्त्री देता है। वह वहीं बस जाता है, बाण चलाना सीखता है और डाकुओं की तरह शिकारी बन जाता है। एक दिन उसका विद्वान् ब्राह्मण मित्र उसे खून से लथपथ देखकर उसके पतन के लिए उसे धिक्कारता है। गौतम बताता है कि वह धन के लिए आया था और मित्र से रात वहीं ठहरने को कहता है, पर मित्र घृणावश भोजन स्वीकार नहीं करता।

अध्याय 166अध्याय-सूचीअध्याय 168

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.167.1)

विस्तरेणार्थसंबन्धं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यः प्रोक्तस्तं च मे वद ॥

vistareṇārthasaṃbandhaṃ śrotumicchāmi tattvataḥ | mitradrohī kṛtaghnaśca yaḥ proktastaṃ ca me vada

जिसे आपने मित्रद्रोही और कृतघ्न कहा, उसकी पूरी कथा मैं विस्तार से और यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ। वह मुझे सुनाइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.167.2)

हन्त ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् । उदीच्यां दिशि यद्वृत्तं म्लेच्छेषु मनुजाधिप ॥

hanta te vartayiṣye'hamitihāsaṃ purātanam | udīcyāṃ diśi yadvṛttaṃ mleccheṣu manujādhipa

अच्छा, हे नरेश्वर, मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जो उत्तर दिशा में म्लेच्छों के बीच घटी थी।

श्लोक 3 (12.167.3)

ब्राह्मणो मध्यदेशीयः कृष्णाङ्गो ब्रह्मवर्जितः । ग्रामं दस्युगणाकीर्णं प्राविशद्धनतृष्णया ॥

brāhmaṇo madhyadeśīyaḥ kṛṣṇāṅgo brahmavarjitaḥ | grāmaṃ dasyugaṇākīrṇaṃ prāviśaddhanatṛṣṇayā

मध्यदेश का रहने वाला एक ब्राह्मण, जो साँवले शरीर का और वेद तथा वैदिक आचार से रहित था, धन के लोभ में डाकुओं से भरे एक गाँव में घुस गया।

श्लोक 4 (12.167.4)

तत्र दस्युर्धनयुतः सर्ववर्णविशेषवित् । ब्रह्मण्यः सत्यसन्धश्च दाने च निरतोऽभवत् ॥

tatra dasyurdhanayutaḥ sarvavarṇaviśeṣavit | brahmaṇyaḥ satyasandhaśca dāne ca nirato'bhavat

वहाँ एक धनी डाकू रहता था, जो सब वर्णों की विशेषताओं को जानता था, ब्राह्मणों का भक्त था, सत्य पर टिकने वाला था और दान में लगा रहता था।

श्लोक 5 (12.167.5)

तस्य क्षयमुपागम्य ततो भिक्षामयाचत । प्रतिश्रयं च वासार्थं भिक्षां चैवाथ वार्षिकीम् ॥

tasya kṣayamupāgamya tato bhikṣāmayācata | pratiśrayaṃ ca vāsārthaṃ bhikṣāṃ caivātha vārṣikīm

ब्राह्मण उसके घर गया और उससे भिक्षा माँगी: रहने के लिए आश्रय और वर्ष भर का अन्न।

श्लोक 6 (12.167.6)

प्रादात्तस्मै स विप्राय वस्त्रं च सदृशं नवम् । नारीं चापि वयोपेतां भर्त्रा विरहितां तथा ॥

prādāttasmai sa viprāya vastraṃ ca sadṛśaṃ navam | nārīṃ cāpi vayopetāṃ bhartrā virahitāṃ tathā

डाकू ने उस ब्राह्मण को एक नया और उपयुक्त वस्त्र दिया, और साथ ही एक युवावस्था की स्त्री भी दी, जिसका पति नहीं था।

श्लोक 7 (12.167.7)

एतत्संप्राप्य हृष्टात्मा गौतमोऽथ द्विजस्तथा । तस्मिन्गृहवरे राजंस्तया रेमे स गौतमः ॥

etatsaṃprāpya hṛṣṭātmā gautamo'tha dvijastathā | tasmingṛhavare rājaṃstayā reme sa gautamaḥ

यह सब पाकर ब्राह्मण गौतम प्रसन्न हो गया, और हे राजन्, उस उत्तम घर में वह उस स्त्री के साथ रमण करने लगा।

श्लोक 8 (12.167.8)

कुटुम्बार्थं च दस्योश्च साहाय्यं चाप्यथाकरोत् । सोऽवसद्वर्षमेकं वै समृद्धे शबरालये ॥

kuṭumbārthaṃ ca dasyośca sāhāyyaṃ cāpyathākarot | so'vasadvarṣamekaṃ vai samṛddhe śabarālaye

उसने डाकू के परिवार के कार्यों में भी उसकी सहायता की। वह उस समृद्ध शबर-बस्ती में एक वर्ष तक रहा।

श्लोक 9 (12.167.9)

बाणवेधे परं यत्नमकरोच्चैव गौतमः । चक्राङ्गान्स च नित्यं वै सर्वतो वनगोचरान् । जघान गौतमो राजन्यथा दस्युगणास्तथा ॥

bāṇavedhe paraṃ yatnamakaroccaiva gautamaḥ | cakrāṅgānsa ca nityaṃ vai sarvato vanagocarān | jaghāna gautamo rājanyathā dasyugaṇāstathā

गौतम बाण चलाने के अभ्यास में बहुत यत्न करने लगा। हे राजन्, वह प्रतिदिन चारों ओर वन में विचरने वाले हंसों को वैसे ही मारता था जैसे डाकुओं के दल मारते थे।

श्लोक 10 (12.167.10)

हिंसापटुर्घृणाहीनः सदा प्राणिवधे रतः । गौतमः सन्निकर्षेण दस्युभिः समतामियात् ॥

hiṃsāpaṭurghṛṇāhīnaḥ sadā prāṇivadhe rataḥ | gautamaḥ sannikarṣeṇa dasyubhiḥ samatāmiyāt

हिंसा में कुशल, दया से रहित और सदा प्राणियों के वध में लगा रहने वाला गौतम निरन्तर साथ रहने से डाकुओं के समान हो गया।

श्लोक 11 (12.167.11)

तथा तु वसतस्तस्य दस्युग्रामे सुखं तदा । अगमन्बहवो मासा निघ्नतः पक्षिणो बहून् ॥

tathā tu vasatastasya dasyugrāme sukhaṃ tadā | agamanbahavo māsā nighnataḥ pakṣiṇo bahūn

इस प्रकार वह डाकुओं के गाँव में सुख से रहता रहा, और बहुत-से पक्षियों को मारते हुए उसके अनेक महीने बीत गए।

श्लोक 12 (12.167.12)

ततः कदाचिदपरो द्विजस्तं देशमागतः । जटाचीराजिनधरः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥

tataḥ kadācidaparo dvijastaṃ deśamāgataḥ | jaṭācīrājinadharaḥ svādhyāyanirataḥ śuciḥ

तब किसी समय एक दूसरा ब्राह्मण उस देश में आया, जो जटा, वल्कल और मृगचर्म धारण किए था, वेदपाठ में लगा रहता था और पवित्र था।

श्लोक 13 (12.167.13)

विनीतो वेदशास्त्रेषु वेदान्तानां च पारगः । अदृश्यत ततस्तत्र सखा तस्यैव तु द्विजः । तं दस्युग्राममगमद्यत्रासौ गौतमोऽभवत् ॥

vinīto vedaśāstreṣu vedāntānāṃ ca pāragaḥ | adṛśyata tatastatra sakhā tasyaiva tu dvijaḥ | taṃ dasyugrāmamagamadyatrāsau gautamo'bhavat

वह वेद और शास्त्रों में सुशिक्षित और वेदान्त का पारगामी था। वह उसी गौतम का मित्र एक ब्राह्मण था; वह वहाँ दिखाई दिया, क्योंकि वह उस डाकुओं के गाँव में आ पहुँचा था जहाँ गौतम रहता था।

श्लोक 14 (12.167.14)

स तु विप्रगृहान्वेषी शूद्रान्नपरिवर्जकः । ग्रामे दस्युसमाकीर्णे व्यचरत्सर्वतो द्विजः ॥

sa tu vipragṛhānveṣī śūdrānnaparivarjakaḥ | grāme dasyusamākīrṇe vyacaratsarvato dvijaḥ

ब्राह्मण का घर खोजता हुआ और शूद्र का अन्न त्यागता हुआ वह ब्राह्मण डाकुओं से भरे उस गाँव में चारों ओर घूमा।

श्लोक 15 (12.167.15)

ततः स गौतमगृहं प्रविवेश द्विजोत्तमः । गौतमश्चापि संप्राप्तस्तावन्योन्येन संगतौ ॥

tataḥ sa gautamagṛhaṃ praviveśa dvijottamaḥ | gautamaścāpi saṃprāptastāvanyonyena saṃgatau

तब वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गौतम के घर में गया, और गौतम भी वहाँ आ पहुँचा; इस प्रकार दोनों आपस में मिल गए।

श्लोक 16 (12.167.16)

चक्राङ्गभारस्कन्धं तं धनुष्पाणिं धृतायुधम् । रुधिरेणावसिक्ताङ्गं गृहद्वारमुपागतम् ॥

cakrāṅgabhāraskandhaṃ taṃ dhanuṣpāṇiṃ dhṛtāyudham | rudhireṇāvasiktāṅgaṃ gṛhadvāramupāgatam

उसने गौतम को घर के द्वार पर आते देखा: उसके कन्धे पर हंसों का बोझ था, हाथ में धनुष था, वह शस्त्र धारण किए था और उसका शरीर रक्त से भीगा हुआ था।

श्लोक 17 (12.167.17)

तं दृष्ट्वा पुरुषादाभमपध्वस्तं क्षमागतम् । अभिज्ञाय द्विजो व्रीडन्निदं वाक्यमथाब्रवीत् ॥

taṃ dṛṣṭvā puruṣādābhamapadhvastaṃ kṣamāgatam | abhijñāya dvijo vrīḍannidaṃ vākyamathābravīt

उसे नरभक्षी राक्षस जैसा, पतित और नष्ट हुआ देखकर, उस ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया और लज्जित होकर ये वचन कहे।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 18 (12.167.18)

किमिदं कुरुषे मोहाद्विप्रस्त्वं हि कुलोद्भवः । मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गतः कथम् ॥

kimidaṃ kuruṣe mohādviprastvaṃ hi kulodbhavaḥ | madhyadeśaparijñāto dasyubhāvaṃ gataḥ katham

'तुम यह क्या कर रहे हो, मोहवश? तुम तो उत्तम कुल में उत्पन्न ब्राह्मण हो, मध्यदेश में प्रसिद्ध हो; तुम डाकुओं के-से आचरण में कैसे आ गए?

श्लोक 19 (12.167.19)

पूर्वान्स्मर द्विज ज्ञातीन्प्रख्यातान्वेदपारगान् । येषां वंशेऽभिजातस्त्वमीदृशः कुलपांसनः ॥

pūrvānsmara dvija jñātīnprakhyātānvedapāragān | yeṣāṃ vaṃśe'bhijātastvamīdṛśaḥ kulapāṃsanaḥ

हे ब्राह्मण, अपने उन पूर्वजों को याद करो जो प्रसिद्ध और वेद के पारगामी थे, और जिनके वंश में उत्पन्न होकर तुम ऐसे कुलकलंक बने हो।

श्लोक 20 (12.167.20)

अवबुध्यात्मनाऽऽत्मानं सत्वं शीलं श्रुतं दमम् । अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज ॥

avabudhyātmanā''tmānaṃ satvaṃ śīlaṃ śrutaṃ damam | anukrośaṃ ca saṃsmṛtya tyaja vāsamimaṃ dvija

अपने को पहचानो; सत्त्व, शील, विद्या, दम और करुणा को याद करो, और हे ब्राह्मण, इस निवास को छोड़ दो।'

भीष्म उवाच

श्लोक 21 (12.167.21)

स एवमुक्तः सुहृदा तेन तत्र हितैषिणा । प्रत्युवाच ततो राजन्विनिश्वस्य तदाऽऽर्तवत् ॥

sa evamuktaḥ suhṛdā tena tatra hitaiṣiṇā | pratyuvāca tato rājanviniśvasya tadā''rtavat

हितैषी मित्र के इस प्रकार कहने पर उसने, हे राजन्, गहरी साँस लेकर पीड़ित-सा होकर उत्तर दिया।

गौतम उवाच

श्लोक 22 (12.167.22)

निर्धनोऽस्मि द्विजश्रेष्ठ नापि वेदविदप्यहम् । वित्तार्थमिह संप्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ॥

nirdhano'smi dvijaśreṣṭha nāpi vedavidapyaham | vittārthamiha saṃprāptaṃ viddhi māṃ dvijasattama

'हे द्विजश्रेष्ठ, मैं निर्धन हूँ और वेद का जानकार भी नहीं हूँ। हे द्विजोत्तम, जान लो कि मैं यहाँ धन के लिए आया हूँ।

श्लोक 23 (12.167.23)

त्वद्दर्शनात्तु विप्रेन्द्र कृतार्थोऽस्म्यद्य वै द्विज । अध्वानं सह यास्यावः श्वो वसस्वाद्य शर्वरीम् ॥

tvaddarśanāttu viprendra kṛtārtho'smyadya vai dvija | adhvānaṃ saha yāsyāvaḥ śvo vasasvādya śarvarīm

हे विप्रश्रेष्ठ, आपके दर्शन से आज मैं कृतार्थ हो गया। कल हम दोनों साथ मार्ग पर चलेंगे; आज रात यहीं ठहरिए।'

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (12.167.24)

स तत्र न्यवसद्विप्रो घृणी किंचिदसंस्पृशन् । क्षुधितश्छन्द्यमानोऽपि भोजनं नाभ्यनन्दत ॥

sa tatra nyavasadvipro ghṛṇī kiṃcidasaṃspṛśan | kṣudhitaśchandyamāno'pi bhojanaṃ nābhyanandata

वह ब्राह्मण वहाँ रात भर ठहरा, पर घृणा से भरा होने के कारण उसने कुछ भी नहीं छुआ; भूखा होने पर और आग्रह किए जाने पर भी उसने भोजन स्वीकार नहीं किया।

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