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शान्ति पर्व · अध्याय 168

गौतम की बकराज राजधर्मा से भेंट

गौतम धन की खोज में डाकुओं का गाँव छोड़कर समुद्र की ओर जाने वाले व्यापारियों के दल के साथ चल पड़ता है, पर एक मतवाला हाथी उस दल को नष्ट कर देता है और वह अकेला उत्तर की ओर भाग निकलता है। एक सुन्दर वन में उसे एक विशाल बरगद मिलता है और वह उसके नीचे सो जाता है। साँझ को ब्रह्मा के मित्र, बगुलों के तेजस्वी राजा राजधर्मा अपने वृक्ष पर लौटते हैं; गौतम भूख से और हिंसा की दृष्टि से उन्हें देखता है। बकराज अतिथि मानकर उसका आदरपूर्वक स्वागत करते हैं।

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.168.1)

तस्यां निशायां व्युष्टायां गते तस्मिन्द्विजोत्तमे । निष्क्रम्य गौतमोऽगच्छद्धनार्थी विचचार ह ॥

tasyāṃ niśāyāṃ vyuṣṭāyāṃ gate tasmindvijottame | niṣkramya gautamo'gacchaddhanārthī vicacāra ha

वह रात बीत जाने पर और उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के चले जाने पर, गौतम घर से निकल पड़ा और धन की खोज में भटकने लगा।

श्लोक 2 (12.168.2)

सामुद्रिकान्सवणिजस्ततोऽपश्यत्स्थितान्पथि । स तेन सह सार्थेन प्रययौ सागरं प्रति ॥

sāmudrikānsavaṇijastato'paśyatsthitānpathi | sa tena saha sārthena prayayau sāgaraṃ prati

उसने मार्ग में रुके हुए कुछ समुद्र-यात्री वणिकों को देखा, और उस काफ़िले के साथ वह समुद्र की ओर चल पड़ा।

श्लोक 3 (12.168.3)

स तु सार्थो महाराज कस्मिंश्चिद्गिरिगह्वरे । मत्तेन द्विरदेनाथ निहतः प्रायशोऽभवत् ॥

sa tu sārtho mahārāja kasmiṃścidgirigahvare | mattena dviradenātha nihataḥ prāyaśo'bhavat

परन्तु हे महाराज, वह काफ़िला किसी पर्वत की गुफा में एक मतवाले हाथी द्वारा लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

श्लोक 4 (12.168.4)

स कथंचित्ततस्तस्मात्सार्थान्मुक्तो द्विजस्तदा । कांदिग्भूतो जीवितार्थी प्रदुद्रावोत्तरां दिशम् ॥

sa kathaṃcittatastasmātsārthānmukto dvijastadā | kāṃdigbhūto jīvitārthī pradudrāvottarāṃ diśam

किसी तरह वह ब्राह्मण उस काफ़िले से बच निकला, और दिशा का भान खोकर, प्राण बचाने की चिन्ता में वह उत्तर दिशा की ओर भाग चला।

श्लोक 5 (12.168.5)

ततस्तु स परिभ्रष्टः सार्थाद्देशात्तथाऽर्थतः । एकाकी व्यभ्रमत्तत्र वने कापुरुषो यथा ॥

tatastu sa paribhraṣṭaḥ sārthāddeśāttathā'rthataḥ | ekākī vyabhramattatra vane kāpuruṣo yathā

इस प्रकार काफ़िले से, उस प्रदेश से और अपने प्रयोजन से भी भटककर वह अकेला वन में किसी दीन-हीन मनुष्य की तरह घूमता रहा।

श्लोक 6 (12.168.6)

स पन्थानमथासाद्य समुद्राभिसरं तदा । आससाद वनं रम्यं महत्पुष्पितपादपम् ॥

sa panthānamathāsādya samudrābhisaraṃ tadā | āsasāda vanaṃ ramyaṃ mahatpuṣpitapādapam

तब वह समुद्र की ओर जाने वाले मार्ग पर पहुँचा और फूलों से लदे ऊँचे वृक्षों वाले एक सुन्दर वन में आ गया।

श्लोक 7 (12.168.7)

सर्वर्तुकैराम्रवणैः पुष्पितैरुपशोभितम् । नन्दनोद्देशसदृशं यक्षकिन्नरसेवितम् ॥

sarvartukairāmravaṇaiḥ puṣpitairupaśobhitam | nandanoddeśasadṛśaṃ yakṣakinnarasevitam

वह वन सब ऋतुओं में फूलने वाले आम्रवनों से सुशोभित था, देवताओं के नन्दन उद्यान के समान था और यक्षों तथा किन्नरों से सेवित था।

श्लोक 8 (12.168.8)

सालतालधवाश्वत्थप्लक्षागुरुवनैस्तथा । चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम् । गिरिप्रस्थेषु रम्येषु सुखेषु सुखगन्धिषु ॥

sālatāladhavāśvatthaplakṣāguruvanaistathā | candanasya ca mukhyasya pādapairupaśobhitam | giriprastheṣu ramyeṣu sukheṣu sukhagandhiṣu

वह साल, ताल, धव, पीपल, पाकड़ और अगर के वनों से तथा श्रेष्ठ चन्दन के वृक्षों से सुशोभित था, और उसकी पर्वत-ढलानें रमणीय, सुखद और सुगन्धित थीं।

श्लोक 9 (12.168.9)

समन्ततो द्विजश्रेष्ठा वल्गु कूजन्ति तत्र वै । मनुष्यवदनाश्चान्ये भारुण्डा इति विश्रुताः ॥

samantato dvijaśreṣṭhā valgu kūjanti tatra vai | manuṣyavadanāścānye bhāruṇḍā iti viśrutāḥ

वहाँ चारों ओर श्रेष्ठ पक्षी मधुर स्वर में चहक रहे थे, और मनुष्य के-से मुख वाले दूसरे पक्षी भी थे, जो भारुण्ड नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 10 (12.168.10)

स तान्यतिमनोज्ञानि विहगानां रुतानि वै । शृण्वन्सुरमणीयानि विप्रोऽगच्छत गौतमः ॥

sa tānyatimanojñāni vihagānāṃ rutāni vai | śṛṇvansuramaṇīyāni vipro'gacchata gautamaḥ

पक्षियों की उन अत्यन्त मनोहर और सुहावनी बोलियों को सुनता हुआ ब्राह्मण गौतम आगे बढ़ता गया।

श्लोक 11 (12.168.11)

ततोऽपश्यत्सुरम्येषु सुवर्णसिकताचिते । देशभागे समे चित्रे स्वर्गोद्देशसमप्रभे । श्रिया जुष्टं ददर्शाथ न्यग्रोधं च सुमण्डलम् ॥

tato'paśyatsuramyeṣu suvarṇasikatācite | deśabhāge same citre svargoddeśasamaprabhe | śriyā juṣṭaṃ dadarśātha nyagrodhaṃ ca sumaṇḍalam

तब उसने अत्यन्त रमणीय, समतल, विचित्र, सुनहरी बालू से ढकी और स्वर्ग-जैसी आभा वाली भूमि पर शोभा से सम्पन्न, सुन्दर गोलाकार मण्डल वाला एक बरगद देखा।

श्लोक 12 (12.168.12)

शाखाभिरनुरूपाभिः संवृतं छत्रसन्निभम् । तस्य मूलं च संसिक्तं वरचन्दनवारिणा ॥

śākhābhiranurūpābhiḥ saṃvṛtaṃ chatrasannibham | tasya mūlaṃ ca saṃsiktaṃ varacandanavāriṇā

वह अपनी अनुरूप शाखाओं से ढका हुआ छत्र के समान था, और उसकी जड़ श्रेष्ठ चन्दन-मिश्रित जल से सींची हुई थी।

श्लोक 13 (12.168.13)

दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत्पितामहसदोपमम् । तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मनःकान्तमनुत्तमम् ॥

divyapuṣpānvitaṃ śrīmatpitāmahasadopamam | taṃ dṛṣṭvā gautamaḥ prīto manaḥkāntamanuttamam

वह दिव्य पुष्पों से युक्त और तेजस्वी था, पितामह ब्रह्मा की सभा के समान। उसे देखकर गौतम प्रसन्न हो गया, क्योंकि वह मन को प्रिय और अनुपम था,

श्लोक 14 (12.168.14)

मेध्यं सुरगृहप्रख्यं पुष्पितैः पादपैर्वृतम् । तमासाद्य मुदा युक्तस्तस्याधस्तादुपाविशत् ॥

medhyaṃ suragṛhaprakhyaṃ puṣpitaiḥ pādapairvṛtam | tamāsādya mudā yuktastasyādhastādupāviśat

पवित्र, देवताओं के निवास जैसा और फूले हुए वृक्षों से घिरा हुआ। उसके पास पहुँचकर वह आनन्द से भरकर उसके नीचे बैठ गया।

श्लोक 15 (12.168.15)

तत्रासीनस्य कौन्तेय गौतमस्य नराधिप । पुष्पाणि समुपस्पृश्य प्रववावनिलः शुभः । ह्लादयंस्तस्य गात्राणि गौतमस्य तदा नृप ॥

tatrāsīnasya kaunteya gautamasya narādhipa | puṣpāṇi samupaspṛśya pravavāvanilaḥ śubhaḥ | hlādayaṃstasya gātrāṇi gautamasya tadā nṛpa

हे कुन्तीपुत्र, हे नरेश्वर, जब गौतम वहाँ बैठा था, तब फूलों को छूकर एक सुखद वायु चलने लगी और, हे राजन्, गौतम के अंगों को शीतल करने लगी।

श्लोक 16 (12.168.16)

स तु विप्रः परिश्रान्तः स्पृष्टः पुण्येन वायुना । सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्ययात् ॥

sa tu vipraḥ pariśrāntaḥ spṛṣṭaḥ puṇyena vāyunā | sukhamāsādya suṣvāpa bhāskaraścāstamabhyayāt

थका हुआ वह ब्राह्मण पवित्र वायु के स्पर्श से सुख पाकर सो गया, और सूर्य अस्त हो गया।

श्लोक 17 (12.168.17)

ततोऽस्तं भास्करे याते सन्ध्याकाल उपस्थिते । आजगाम स्वभवनं ब्रह्मलोकात्खगोत्तमः ॥

tato'staṃ bhāskare yāte sandhyākāla upasthite | ājagāma svabhavanaṃ brahmalokātkhagottamaḥ

तब सूर्य के अस्त हो जाने पर, सन्ध्या का समय आने पर, पक्षियों में श्रेष्ठ वह ब्रह्मलोक से अपने निवास को लौट आया।

श्लोक 18 (12.168.18)

नाडीजङ्घ इति ख्यातो दयितो ब्रह्मणः सखा । बकराजो महाप्राज्ञः काश्यपस्यात्मसंभवः ॥

nāḍījaṅgha iti khyāto dayito brahmaṇaḥ sakhā | bakarājo mahāprājñaḥ kāśyapasyātmasaṃbhavaḥ

वह नाडीजंघ नाम से प्रसिद्ध था, ब्रह्मा का प्रिय मित्र, बगुलों का राजा, महाप्राज्ञ और कश्यप का पुत्र।

श्लोक 19 (12.168.19)

राजधर्मेति विख्यातो बभूवाप्रतिभो भुवि । देवकन्यासुतः श्रीमान्विद्वान्देवसमप्रभः ॥

rājadharmeti vikhyāto babhūvāpratibho bhuvi | devakanyāsutaḥ śrīmānvidvāndevasamaprabhaḥ

वह राजधर्मा के नाम से विख्यात और पृथ्वी पर अनुपम था; वह एक देवकन्या का पुत्र, तेजस्वी, विद्वान् और देवताओं के समान कान्तिमान था।

श्लोक 20 (12.168.20)

मृष्टहाटकसंछन्नो भूषणैरर्कसन्निभैः । भूषितः सर्वगात्रेषु देवगर्भः श्रिया ज्वलन् ॥

mṛṣṭahāṭakasaṃchanno bhūṣaṇairarkasannibhaiḥ | bhūṣitaḥ sarvagātreṣu devagarbhaḥ śriyā jvalan

वह चमकाए हुए सोने से ढका था, सूर्य-जैसे आभूषणों से उसके सब अंग सजे थे; वह देवों से उत्पन्न-सा तेज से दमक रहा था।

श्लोक 21 (12.168.21)

तमागतं खगं दृष्ट्वा गौतमो विस्मितोऽभवत् । क्षुत्पिपासापरीतात्मा हिंसार्थं चैनमैक्षत ॥

tamāgataṃ khagaṃ dṛṣṭvā gautamo vismito'bhavat | kṣutpipāsāparītātmā hiṃsārthaṃ cainamaikṣata

उस पक्षी को आया देखकर गौतम विस्मित हो गया, और भूख-प्यास से व्याकुल होकर उसने उसे मारने की दृष्टि से देखा।

राजधर्मोवाच

श्लोक 22 (12.168.22)

स्वागतं भवतो विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहान् । अस्तं च सविता यातः संध्येयं समुपस्थिता ॥

svāgataṃ bhavato vipra diṣṭyā prāpto'si me gṛhān | astaṃ ca savitā yātaḥ saṃdhyeyaṃ samupasthitā

'हे ब्राह्मण, आपका स्वागत है; सौभाग्य से आप मेरे घर आ गए। सूर्य अस्त हो चुका है और यह सन्ध्या की बेला आ गई है।

श्लोक 23 (12.168.23)

मम त्वं निलयं प्राप्तः प्रियातिथिरनिन्दितः । पूजितो यास्यसि प्रातर्विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

mama tvaṃ nilayaṃ prāptaḥ priyātithiraninditaḥ | pūjito yāsyasi prātarvidhidṛṣṭena karmaṇā

आप मेरे निवास पर प्रिय और निर्दोष अतिथि के रूप में आए हैं। विधि के अनुसार सत्कार पाकर आप प्रातःकाल जाएँगे।'

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