शान्ति पर्व · अध्याय 169
राजधर्मा गौतम को विरूपाक्ष के पास भेजते हैं
बगुलों के राजा राजधर्मा गौतम का अतिथि के रूप में सत्कार करते हैं: उसे आसन, अग्नि, मछलियाँ और शय्या देते हैं और पंखों से हवा करके उसकी थकान मिटाते हैं। जब गौतम बताता है कि वह निर्धन है और समुद्र की ओर जा रहा है, तब राजधर्मा मित्र के नाते उसे धनी बनाने का वचन देते हैं और तीन योजन दूर रहने वाले अपने बलवान मित्र राक्षसराज विरूपाक्ष के पास भेजते हैं। गौतम मार्ग में फल खाता हुआ पत्थर के नगर में पहुँचता है, जहाँ विरूपाक्ष के सेवक उसे शीघ्र राजभवन की ओर ले जाते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.169.1)
गिरं तां मधुरां श्रुत्वा गौतमो विस्मितस्तदा । कौतूहलान्वितो राजन्राजधर्माणमैक्षत ॥
giraṃ tāṃ madhurāṃ śrutvā gautamo vismitastadā | kautūhalānvito rājanrājadharmāṇamaikṣata
वे मधुर वचन सुनकर गौतम विस्मित हो गया, और हे राजन्, कौतूहल से भरकर उसने राजधर्मा की ओर देखा।
राजधर्मोवाच
श्लोक 2 (12.169.2)
भोः काश्यपस्य पुत्रोऽहं माता दाक्षायणी मम । सती त्वं च गुणोपेतः स्वागतं ते द्विजोत्तम ॥
bhoḥ kāśyapasya putro'haṃ mātā dākṣāyaṇī mama | satī tvaṃ ca guṇopetaḥ svāgataṃ te dvijottama
'हे सज्जन, मैं कश्यप का पुत्र हूँ, और मेरी माता दाक्षायणी सती हैं; और आप गुणों से युक्त हैं, हे द्विजश्रेष्ठ, आपका स्वागत है।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.169.3)
तस्मै दत्त्वा स सत्कारं विधिदृष्टेन कर्मणा । शालपुष्पमयीं दिव्यां बृसीं समुपकल्पयत् ॥
tasmai dattvā sa satkāraṃ vidhidṛṣṭena karmaṇā | śālapuṣpamayīṃ divyāṃ bṛsīṃ samupakalpayat
विधि के अनुसार उसका सत्कार करके उसने उसके लिए साल के फूलों का एक दिव्य आसन बिछाया।
श्लोक 4 (12.169.4)
भगीरथरथाक्रान्तदेशान्गङ्गानिषेवितान् । ये चरन्ति महामीनास्तांश्च तस्यान्वकल्पयत् ॥
bhagīratharathākrāntadeśāngaṅgāniṣevitān | ye caranti mahāmīnāstāṃśca tasyānvakalpayat
जिन देशों से भगीरथ का रथ गुज़रा था और जिनका गंगा सेवन करती है, उनमें जो बड़ी-बड़ी मछलियाँ विचरती हैं, उन्हें भी उसने उसके लिए जुटा दिया।
श्लोक 5 (12.169.5)
वह्निं चापि सुसंदीप्तं मीनांश्चापि सुपीवरान् । स गौतमायातिथये न्यवेदयत काश्यपिः ॥
vahniṃ cāpi susaṃdīptaṃ mīnāṃścāpi supīvarān | sa gautamāyātithaye nyavedayata kāśyapiḥ
कश्यप-पुत्र ने अतिथि गौतम के सामने खूब दहकती आग और मोटी-मोटी मछलियाँ रख दीं।
श्लोक 6 (12.169.6)
भुक्तवन्तं च तं विप्रं प्रीतात्मानं महामनाः । श्रमापनयनार्थं स पक्षाभ्यामभ्यवीजयत् ॥
bhuktavantaṃ ca taṃ vipraṃ prītātmānaṃ mahāmanāḥ | śramāpanayanārthaṃ sa pakṣābhyāmabhyavījayat
जब वह ब्राह्मण भोजन कर चुका और तृप्त हो गया, तब उस महामना ने उसकी थकान दूर करने के लिए अपने पंखों से उसे हवा की।
श्लोक 7 (12.169.7)
ततो विश्रान्तमासीनं गोत्रवृत्तमपृच्छत । सोऽब्रवीद्गौतमोऽस्मीति ब्राह्मणोऽस्मीत्युदाहरत् ॥
tato viśrāntamāsīnaṃ gotravṛttamapṛcchata | so'bravīdgautamo'smīti brāhmaṇo'smītyudāharat
फिर जब वह विश्राम करके बैठा, तब उसने उससे उसके गोत्र और आचरण के विषय में पूछा। उसने कहा, 'मैं गौतम हूँ,' और बताया, 'मैं ब्राह्मण हूँ,' इसके सिवा कुछ नहीं कहा।
श्लोक 8 (12.169.8)
तस्मै पर्णमयं दिव्यं दिव्यपुष्पाधिवासितम् । गन्धाढ्यं शयनं प्रादात्स शिश्ये तत्र वै सुखम् ॥
tasmai parṇamayaṃ divyaṃ divyapuṣpādhivāsitam | gandhāḍhyaṃ śayanaṃ prādātsa śiśye tatra vai sukham
उसने उसे दिव्य पुष्पों से सुवासित, सुगन्धित, पत्तों की एक दिव्य शय्या दी, और गौतम उस पर सुख से सो गया।
श्लोक 9 (12.169.9)
अथोपविष्टं शयने गौतमं वाक्यवित्तमः । पप्रच्छ काश्यपिर्वाग्मी किमागमनमित्युत ॥
athopaviṣṭaṃ śayane gautamaṃ vākyavittamaḥ | papraccha kāśyapirvāgmī kimāgamanamityuta
जब गौतम शय्या पर बैठा, तब वाक्यों के जानने वालों में श्रेष्ठ, वाग्मी काश्यप ने पूछा, 'आप किस कारण से आए हैं?'
श्लोक 10 (12.169.10)
ततोऽब्रवीद्गौतमस्तं दरिद्रोऽहं महामते । समुद्रगमनाकाङ्क्षी द्रव्यार्थमिति भारत ॥
tato'bravīdgautamastaṃ daridro'haṃ mahāmate | samudragamanākāṅkṣī dravyārthamiti bhārata
तब गौतम ने उससे कहा, 'हे महामते, मैं दरिद्र हूँ; धन के लिए समुद्र जाना चाहता हूँ,' हे भारत।
श्लोक 11 (12.169.11)
तं काश्यपोऽब्रवीत्प्रीत्या नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि । कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ सद्रव्यो यास्यसे गृहान् ॥
taṃ kāśyapo'bravītprītyā notkaṇṭhāṃ kartumarhasi | kṛtakāryo dvijaśreṣṭha sadravyo yāsyase gṛhān
काश्यप ने स्नेह से उससे कहा, 'आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिए। हे द्विजश्रेष्ठ, आप सफल होंगे और धन लेकर घर जाएँगे।'
राजधर्मोवाच
श्लोक 12 (12.169.12)
चतुर्विधा ह्यर्थगतिर्बृहस्पतिमतं यथा । मित्रं विद्या हिरण्यं च बुद्धिश्चेति बुधेप्सिता ॥
caturvidhā hyarthagatirbṛhaspatimataṃ yathā | mitraṃ vidyā hiraṇyaṃ ca buddhiśceti budhepsitā
'धन की प्राप्ति के चार मार्ग हैं, जैसा बृहस्पति का मत है: मित्र से, विद्या से, सोने से और बुद्धि से; विद्वान् यही चाहते हैं।
श्लोक 13 (12.169.13)
प्रादुर्भूतोऽस्मि ते मित्रं सुहृत्त्वं च महत्तरम् । सोऽहं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान् ॥
prādurbhūto'smi te mitraṃ suhṛttvaṃ ca mahattaram | so'haṃ tathā yatiṣyāmi bhaviṣyasi yathārthavān
मैं तुम्हारे मित्र के रूप में प्रकट हुआ हूँ, और तुम्हारे प्रति मेरी सुहृद्भावना बहुत बड़ी है। इसलिए मैं ऐसा यत्न करूँगा कि तुम धनवान हो जाओ।
भीष्म उवाच
श्लोक 14 (12.169.14)
ततः प्रभातसमये सुखं पृष्ट्वाऽब्रवीदिदम् । गच्छ सौम्य पथाऽनेन कृतकृत्यो भविष्यसि ॥
tataḥ prabhātasamaye sukhaṃ pṛṣṭvā'bravīdidam | gaccha saumya pathā'nena kṛtakṛtyo bhaviṣyasi
फिर प्रातःकाल उसका कुशल पूछकर उसने कहा, 'हे सौम्य, इस मार्ग से जाओ, तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाएगा।
राजधर्मोवाच
श्लोक 15 (12.169.15)
इतस्त्रियोजनं गत्वा राक्षसाधिपतिर्महान् । विरूपाक्ष इति ख्यातः सखा मम महाबलः ॥
itastriyojanaṃ gatvā rākṣasādhipatirmahān | virūpākṣa iti khyātaḥ sakhā mama mahābalaḥ
यहाँ से तीन योजन आगे एक महान् राक्षसराज रहता है, जो विरूपाक्ष नाम से प्रसिद्ध है और मेरा बलवान मित्र है।
श्लोक 16 (12.169.16)
तं गच्छ द्विजमुख्य त्वं स मद्वाक्यप्रचोदितः । कामानभीप्सितांस्तुभ्यं दाता नास्त्यत्र संशयः ॥
taṃ gaccha dvijamukhya tvaṃ sa madvākyapracoditaḥ | kāmānabhīpsitāṃstubhyaṃ dātā nāstyatra saṃśayaḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, मेरे कहने से प्रेरित होकर तुम उसके पास जाओ; वह तुम्हें तुम्हारी इच्छित वस्तुएँ देगा, इसमें संशय नहीं।'
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (12.169.17)
इत्युक्तः प्रययौ राजन्गौतमो विगतक्लमः । फलान्यमृतकल्पानि भक्षयानो यथेष्टतः ॥
ityuktaḥ prayayau rājangautamo vigataklamaḥ | phalānyamṛtakalpāni bhakṣayāno yatheṣṭataḥ
ऐसा कहे जाने पर गौतम, हे राजन्, थकान से मुक्त होकर चल पड़ा और अमृत-समान फल इच्छानुसार खाता गया।
श्लोक 18 (12.169.18)
चन्दनागुरुमुख्यानि पत्रत्वचवनानि च । तस्मिन्पथि महाराज सेवमानो द्रुतं ययौ ॥
candanāgurumukhyāni patratvacavanāni ca | tasminpathi mahārāja sevamāno drutaṃ yayau
हे महाराज, उस मार्ग पर श्रेष्ठ चन्दन और अगर के वनों तथा पत्ते और छाल वाले वनों का आनन्द लेता हुआ वह शीघ्रता से चलता रहा।
श्लोक 19 (12.169.19)
ततो मनुव्रजं नाम नगरं शैलतोरणम् । शैलप्राकारवप्रं च शैलयन्त्रार्गलं तथा ॥
tato manuvrajaṃ nāma nagaraṃ śailatoraṇam | śailaprākāravapraṃ ca śailayantrārgalaṃ tathā
फिर वह मनुव्रज नामक नगर में पहुँचा, जिसके तोरण पत्थर के थे, जिसकी प्राचीर और खाई पत्थर की थी, और जिसके अर्गल तथा यन्त्र भी पत्थर के थे।
श्लोक 20 (12.169.20)
विदितश्चाभवत्तस्य राक्षसेन्द्रस्य धीमतः । प्रहितः सुहृदा राजन्प्रीयमाणः प्रियातिथिः ॥
viditaścābhavattasya rākṣasendrasya dhīmataḥ | prahitaḥ suhṛdā rājanprīyamāṇaḥ priyātithiḥ
उस बुद्धिमान राक्षसराज को पता चल गया कि उसके मित्र द्वारा भेजा हुआ एक प्रिय अतिथि, हे राजन्, प्रसन्न होकर आ रहा है।
श्लोक 21 (12.169.21)
ततः स राक्षसेन्द्रः स्वान्प्रेष्यानाह युधिष्ठिर । गौतमो नगरद्वाराच्छीघ्रमानीयतामिति ॥
tataḥ sa rākṣasendraḥ svānpreṣyānāha yudhiṣṭhira | gautamo nagaradvārācchīghramānīyatāmiti
तब हे युधिष्ठिर, उस राक्षसराज ने अपने सेवकों से कहा, 'गौतम को नगर-द्वार से शीघ्र ले आओ।'
श्लोक 22 (12.169.22)
तस्मात्पुरवरात्तूर्णं पुरुषाः श्वेतवेष्टनाः । गौतमेत्यभिभाषन्तः पुरद्वारमुपागमन् ॥
tasmātpuravarāttūrṇaṃ puruṣāḥ śvetaveṣṭanāḥ | gautametyabhibhāṣantaḥ puradvāramupāgaman
तब उस उत्तम नगर से सफ़ेद पगड़ी बाँधे पुरुष 'गौतम! गौतम!' पुकारते हुए नगर-द्वार पर आ पहुँचे।
श्लोक 23 (12.169.23)
ते तमूचुर्महाराज राजप्रेष्यास्तदा द्विजम् । त्वरस्व तूर्णमागच्छ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥
te tamūcurmahārāja rājapreṣyāstadā dvijam | tvarasva tūrṇamāgaccha rājā tvāṃ draṣṭumicchati
हे महाराज, राजा के उन सेवकों ने उस ब्राह्मण से कहा, 'जल्दी करो, तुरन्त आओ; राजा तुम्हें देखना चाहते हैं।
राजप्रेष्या ऊचुः
श्लोक 24 (12.169.24)
राक्षसाधिपतिर्वीरो विरूपाक्ष इति श्रुतः । स त्वां त्वरति वै द्रष्टुं तत्क्षिप्रं संविधीयताम् ॥
rākṣasādhipatirvīro virūpākṣa iti śrutaḥ | sa tvāṃ tvarati vai draṣṭuṃ tatkṣipraṃ saṃvidhīyatām
राक्षसों के अधिपति वीर विरूपाक्ष तुम्हें देखने को उत्सुक हैं; इसलिए शीघ्रता करो।'
भीष्म उवाच
श्लोक 25 (12.169.25)
ततः स प्राद्रवद्विप्रो विस्मयाद्विगतक्लमः । गौतमः परमर्द्धिं तां पश्यन्परमविस्मितः ॥
tataḥ sa prādravadvipro vismayādvigataklamaḥ | gautamaḥ paramarddhiṃ tāṃ paśyanparamavismitaḥ
तब वह ब्राह्मण विस्मय के कारण थकान भूलकर दौड़ पड़ा; गौतम उस नगर की परम समृद्धि को देखता हुआ अत्यन्त चकित था।
श्लोक 26 (12.169.26)
तैरेव सहितो राज्ञो वेश्म तूर्णमुपाद्रवत् । दर्शनं राक्षसेन्द्रस्य काङ्क्षमाणो द्विजस्तदा ॥
taireva sahito rājño veśma tūrṇamupādravat | darśanaṃ rākṣasendrasya kāṅkṣamāṇo dvijastadā
उन्हीं के साथ वह राक्षसराज के दर्शन की इच्छा से तुरन्त राजभवन की ओर दौड़ चला।