Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 170

विरूपाक्ष के उपहार और गौतम की कृतघ्नता

राक्षसराज विरूपाक्ष के सामने उपस्थित किया गया गौतम अपने गोत्र के सिवा और कुछ नहीं बता पाता और स्वीकार करता है कि वह शबरों के बीच एक शूद्र स्त्री के साथ रहता है। फिर भी विरूपाक्ष अपने मित्र राजधर्मा के सम्मान में उसका आदर करता है, कार्तिकी के भोज में एक हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराता है और उन्हें रत्न उपहार में दिलवाता है। गौतम सोने का भारी बोझ लेकर किसी तरह बरगद के पास लौटता है, जहाँ राजधर्मा फिर उसका स्वागत करके उसे भोजन कराते हैं। लम्बे मार्ग और खाने के अभाव की चिन्ता में गौतम कृतघ्न होकर बगुले को मारकर उसका मांस ले जाने का निश्चय करता है।

अध्याय 169अध्याय-सूचीअध्याय 171

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.170.1)

ततः स विदितो राज्ञः प्रविश्य गृहमुत्तमम् । पूजितो राक्षसेन्द्रेण निषसादासनोत्तमे ॥

tataḥ sa vidito rājñaḥ praviśya gṛhamuttamam | pūjito rākṣasendreṇa niṣasādāsanottame

राजा को सूचित किए जाने पर वह उत्तम राजभवन में गया; राक्षसराज द्वारा सम्मानित होकर वह एक श्रेष्ठ आसन पर बैठा।

श्लोक 2 (12.170.2)

पृष्टश्च गोत्रचरणं स्वाध्यायं ब्रह्मचारिकम् । न तत्र व्याजहारान्यद्गोत्रमात्रादृते द्विजः ॥

pṛṣṭaśca gotracaraṇaṃ svādhyāyaṃ brahmacārikam | na tatra vyājahārānyadgotramātrādṛte dvijaḥ

उससे उसके गोत्र, वेद-शाखा, स्वाध्याय और ब्रह्मचर्य के विषय में पूछा गया, पर उस ब्राह्मण ने गोत्र के सिवा और कुछ नहीं कहा।

श्लोक 3 (12.170.3)

ब्रह्मवर्चसहीनस्य स्वाध्यायविरतस्य च । गोत्रमात्रविदो राजा निवासं समपृच्छत ॥

brahmavarcasahīnasya svādhyāyaviratasya ca | gotramātravido rājā nivāsaṃ samapṛcchata

उसे वेदतेज से हीन, स्वाध्याय से विरत और केवल गोत्र जानने वाला देखकर राजा ने उसके निवास के विषय में पूछा।

विरूपाक्ष उवाच

श्लोक 4 (12.170.4)

क्व ते निवासः कल्याण किङ्गोत्रा ब्राह्मणी च ते । तत्त्वं ब्रूहि न भीः कार्या विश्रमस्व यथासुखम् ॥

kva te nivāsaḥ kalyāṇa kiṅgotrā brāhmaṇī ca te | tattvaṃ brūhi na bhīḥ kāryā viśramasva yathāsukham

'हे भद्र, आपका निवास कहाँ है, और आपकी ब्राह्मणी पत्नी किस गोत्र की है? यथार्थ बताइए। डरिए मत; सुख से विश्राम कीजिए।'

गौतम उवाच

श्लोक 5 (12.170.5)

मध्यदेशप्रसूतोऽहं वासो मे शबरालये । शूद्रा पुनर्भूर्भार्या मे सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

madhyadeśaprasūto'haṃ vāso me śabarālaye | śūdrā punarbhūrbhāryā me satyametadbravīmi te

'मैं मध्यदेश में उत्पन्न हुआ हूँ, और मैं शबरों की बस्ती में रहता हूँ। मेरी पत्नी एक शूद्र स्त्री है, पुनर्विवाहिता विधवा। मैं यह सच कह रहा हूँ।'

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (12.170.6)

ततो राजा विममृशे कथं कार्यमिदं भवेत् । कथं वा सुकृतं मे स्यादिति बुद्ध्यान्वचिन्तयत् ॥

tato rājā vimamṛśe kathaṃ kāryamidaṃ bhavet | kathaṃ vā sukṛtaṃ me syāditi buddhyānvacintayat

तब राजा ने सोचा, 'यह कार्य कैसे किया जाए? मेरा पुण्य कैसे हो?' इस प्रकार वह मन में विचार करने लगा।

श्लोक 7 (12.170.7)

अयं वै जननाद्विप्रः सुहृत्तस्य महात्मनः । सम्प्रेषितश्च तेनायं काश्यपेन ममान्तिकम् ॥

ayaṃ vai jananādvipraḥ suhṛttasya mahātmanaḥ | sampreṣitaśca tenāyaṃ kāśyapena mamāntikam

यह जन्म से ब्राह्मण है, उस महात्मा का मित्र है, और उन काश्यप ने इसे मेरे पास भेजा है।

श्लोक 8 (12.170.8)

तस्य प्रियं करिष्यामि स हि मामाश्रितः सदा । भ्राता मे बान्धवश्चासौ सखा च हृदयङ्गमः ॥

tasya priyaṃ kariṣyāmi sa hi māmāśritaḥ sadā | bhrātā me bāndhavaścāsau sakhā ca hṛdayaṅgamaḥ

मैं उसका प्रिय करूँगा, क्योंकि वह सदा मेरा आश्रित रहा है। वह मेरा भाई, मेरा बन्धु और मेरे हृदय का प्रिय मित्र है।

श्लोक 9 (12.170.9)

कार्त्तिक्यामद्य भोक्तारः सहस्रं मे द्विजोत्तमाः । तत्रायमपि भोक्ता वै देयमस्मै च मे धनम् ॥

kārttikyāmadya bhoktāraḥ sahasraṃ me dvijottamāḥ | tatrāyamapi bhoktā vai deyamasmai ca me dhanam

आज कार्तिकी पूर्णिमा को मेरे यहाँ एक हज़ार श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करेंगे। यह भी उनके साथ भोजन करेगा, और इसे मुझे धन देना है।

श्लोक 10 (12.170.10)

ततः सहस्रं विप्राणां विदुषां समलङ्कृतम् । स्नातानामनुसम्प्राप्तमहतक्षौमवाससाम् ॥

tataḥ sahasraṃ viprāṇāṃ viduṣāṃ samalaṅkṛtam | snātānāmanusamprāptamahatakṣaumavāsasām

तब एक हज़ार विद्वान् ब्राह्मण आ पहुँचे, जो सजे हुए थे, स्नान किए हुए थे और नए रेशमी वस्त्र पहने थे।

श्लोक 11 (12.170.11)

तानागतान्द्विजश्रेष्ठान्विरूपाक्षो विशां पते । यथार्हं प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

tānāgatāndvijaśreṣṭhānvirūpākṣo viśāṃ pate | yathārhaṃ pratijagrāha vidhidṛṣṭena karmaṇā

हे नरेश्वर, विरूपाक्ष ने आए हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों का विधि के अनुसार यथोचित स्वागत किया।

श्लोक 12 (12.170.12)

बृस्यस्तेषां तु संन्यस्ता राक्षसेन्द्रस्य शासनात् । भूमौ वरकुथास्तीर्णाः प्रेष्यैर्भरतसत्तम ॥

bṛsyasteṣāṃ tu saṃnyastā rākṣasendrasya śāsanāt | bhūmau varakuthāstīrṇāḥ preṣyairbharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ, राक्षसराज की आज्ञा से सेवकों ने उनके लिए भूमि पर उत्तम बिछौनों से ढके आसन बिछा दिए।

श्लोक 13 (12.170.13)

तासु ते पूजिता राज्ञा निषण्णा द्विजसत्तमाः । व्यराजन्त महाराज नक्षत्रपतयो यथा ॥

tāsu te pūjitā rājñā niṣaṇṇā dvijasattamāḥ | vyarājanta mahārāja nakṣatrapatayo yathā

हे महाराज, उन आसनों पर राजा द्वारा सम्मानित होकर बैठे वे श्रेष्ठ ब्राह्मण नक्षत्रों के बीच चन्द्रमाओं की तरह शोभित हो रहे थे।

श्लोक 14 (12.170.14)

ततो जाम्बूनदाः पात्रीर्वज्राङ्का विमलाः शुभाः । वरान्नपूर्णा विप्रेभ्यः प्रादान्मधुघृताप्लुताः ॥

tato jāmbūnadāḥ pātrīrvajrāṅkā vimalāḥ śubhāḥ | varānnapūrṇā viprebhyaḥ prādānmadhughṛtāplutāḥ

फिर उसने ब्राह्मणों के सामने हीरों से जड़े, निर्मल और सुन्दर सोने के पात्र रखे, जो उत्तम अन्न से भरे थे और मधु तथा घी से सिंचे थे।

श्लोक 15 (12.170.15)

तस्य नित्यं तथाषाढ्यां माघ्यां च बहवो द्विजाः । ईप्सितं भोजनवरं लभन्ते सत्कृतं सदा ॥

tasya nityaṃ tathāṣāḍhyāṃ māghyāṃ ca bahavo dvijāḥ | īpsitaṃ bhojanavaraṃ labhante satkṛtaṃ sadā

उसके यहाँ आषाढ़ी और माघी पूर्णिमा पर भी बहुत-से ब्राह्मण सदा अपनी इच्छा के अनुसार उत्तम भोजन पाते हैं और सत्कार पाते हैं।

श्लोक 16 (12.170.16)

विशेषतस्तु कार्त्तिक्यां द्विजेभ्यः सम्प्रयच्छति । शरद्व्यपाये रत्नानि पौर्णमास्यामिति श्रुतिः ॥

viśeṣatastu kārttikyāṃ dvijebhyaḥ samprayacchati | śaradvyapāye ratnāni paurṇamāsyāmiti śrutiḥ

परन्तु विशेष रूप से शरद् के अन्त में कार्तिकी पूर्णिमा को वह ब्राह्मणों को रत्न देता है, ऐसी परम्परा है।

श्लोक 17 (12.170.17)

सुवर्णं रजतं चैव मणीनथ च मौक्तिकम् । वज्रान्महाधनांश्चैव वैडूर्याजिनराङ्कवान् ॥

suvarṇaṃ rajataṃ caiva maṇīnatha ca mauktikam | vajrānmahādhanāṃścaiva vaiḍūryājinarāṅkavān

सोना, चाँदी, मणियाँ और मोती, बहुमूल्य हीरे, वैडूर्य, मृगचर्म और रङ्कु मृग के कम्बल;

श्लोक 18 (12.170.18)

रत्नराशीन्विनिक्षिप्य दक्षिणार्थे स भारत । ततः प्राह द्विजश्रेष्ठान्विरूपाक्षो महायशाः ॥

ratnarāśīnvinikṣipya dakṣiṇārthe sa bhārata | tataḥ prāha dvijaśreṣṭhānvirūpākṣo mahāyaśāḥ

दक्षिणा के लिए रत्नों के ढेर लगाकर, हे भारत, यशस्वी विरूपाक्ष ने तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कहा:

विरूपाक्ष उवाच

श्लोक 19 (12.170.19)

गृह्णीत रत्नान्येतानि यथोत्साहं यथेष्टतः । येषु येषु च भाण्डेषु भुक्तं वो द्विजसत्तमाः । तान्येवादाय गच्छध्वं स्ववेश्मानीति भारत ॥

gṛhṇīta ratnānyetāni yathotsāhaṃ yatheṣṭataḥ | yeṣu yeṣu ca bhāṇḍeṣu bhuktaṃ vo dvijasattamāḥ | tānyevādāya gacchadhvaṃ svaveśmānīti bhārata

'ये रत्न अपनी इच्छा और उत्साह के अनुसार जितने चाहें ले लीजिए; और हे द्विजश्रेष्ठो, आपने जिन-जिन पात्रों में भोजन किया है, उन्हीं को लेकर अपने घर चले जाइए,' हे भारत, उसने कहा।

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (12.170.20)

इत्युक्तवचने तस्मिन्राक्षसेन्द्रे महात्मनि । यथेष्टं तानि रत्नानि जगृहुर्ब्राह्मणर्षभाः ॥

ityuktavacane tasminrākṣasendre mahātmani | yatheṣṭaṃ tāni ratnāni jagṛhurbrāhmaṇarṣabhāḥ

महात्मा राक्षसराज के ऐसा कहने पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने अपनी इच्छा के अनुसार वे रत्न ले लिए।

श्लोक 21 (12.170.21)

ततो महार्हैस्ते सर्वे रत्नैरभ्यर्चिताः शुभैः । ब्राह्मणा मृष्टवसनाः सुप्रीताः स्म तदाभवन् ॥

tato mahārhaiste sarve ratnairabhyarcitāḥ śubhaiḥ | brāhmaṇā mṛṣṭavasanāḥ suprītāḥ sma tadābhavan

तब वे सब ब्राह्मण बहुमूल्य और सुन्दर रत्नों से सम्मानित होकर, स्वच्छ वस्त्र पहने, बहुत प्रसन्न हुए।

श्लोक 22 (12.170.22)

ततस्तान्राक्षसेन्द्रश्च द्विजानाह पुनर्वचः । नानादिगागतान्राजन्राक्षसान्प्रतिषिध्य वै ॥

tatastānrākṣasendraśca dvijānāha punarvacaḥ | nānādigāgatānrājanrākṣasānpratiṣidhya vai

तब राक्षसराज ने, हे राजन्, चारों दिशाओं से आए राक्षसों को रोककर ब्राह्मणों से फिर कहा।

विरूपाक्ष उवाच

श्लोक 23 (12.170.23)

अध्यैकदिवसं विप्रा न वोऽस्तीह भयं क्वचित् । राक्षसेभ्यः प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम् ॥

adhyaikadivasaṃ viprā na vo'stīha bhayaṃ kvacit | rākṣasebhyaḥ pramodadhvamiṣṭato yāta māciram

'हे ब्राह्मणो, आज एक दिन के लिए यहाँ आपको राक्षसों से कहीं कोई भय नहीं है। आनन्द कीजिए, और अपनी इच्छा के अनुसार बिना देर किए चले जाइए।'

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (12.170.24)

ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे विप्रसङ्घाः समन्ततः । गौतमोऽपि सुवर्णस्य भारमादाय सत्वरः ॥

tataḥ pradudruvuḥ sarve viprasaṅghāḥ samantataḥ | gautamo'pi suvarṇasya bhāramādāya satvaraḥ

तब ब्राह्मणों के सब दल चारों ओर चल पड़े, और गौतम भी सोने का बोझ लेकर शीघ्रता से चला,

श्लोक 25 (12.170.25)

कृच्छ्रात्समुद्वहन्वीर न्यग्रोधं समुपागमत् । न्यषीदच्च परिश्रान्तः क्लान्तश्च क्षुधितश्च ह ॥

kṛcchrātsamudvahanvīra nyagrodhaṃ samupāgamat | nyaṣīdacca pariśrāntaḥ klāntaśca kṣudhitaśca ha

हे वीर, कठिनाई से उसे ढोता हुआ वह बरगद के पास पहुँचा। वहाँ वह थका, निढाल और भूखा होकर बैठ गया।

श्लोक 26 (12.170.26)

ततस्तमभ्यगाद्राजन्राजधर्मा खगोत्तमः । स्वागतेनाभ्यनन्दच्च गौतमं मित्रवत्सलः ॥

tatastamabhyagādrājanrājadharmā khagottamaḥ | svāgatenābhyanandacca gautamaṃ mitravatsalaḥ

तब हे राजन्, पक्षियों में श्रेष्ठ राजधर्मा उसके पास आया, और मित्रों पर स्नेह रखने वाले उसने गौतम का प्रेम से स्वागत किया।

श्लोक 27 (12.170.27)

तस्य पक्षाग्रविक्षेपैः क्लमं व्यपनयत्खगः । पूजां चाप्यकरोद्धीमान्भोजनं चाप्यकल्पयत् ॥

tasya pakṣāgravikṣepaiḥ klamaṃ vyapanayatkhagaḥ | pūjāṃ cāpyakaroddhīmānbhojanaṃ cāpyakalpayat

उस पक्षी ने अपने पंखों के सिरों से हवा करके उसकी थकान दूर की, और उस बुद्धिमान ने उसका सत्कार किया और भोजन का प्रबन्ध किया।

श्लोक 28 (12.170.28)

स भुक्तवान्सुविश्रान्तो गौतमोऽचिन्तयत्तदा । हाटकस्याभिरूपस्य भारोऽयं सुमहान्मया । गृहीतो लोभमोहाद्वै दूरं च गमनं मम ॥

sa bhuktavānsuviśrānto gautamo'cintayattadā | hāṭakasyābhirūpasya bhāro'yaṃ sumahānmayā | gṛhīto lobhamohādvai dūraṃ ca gamanaṃ mama

भोजन करके और भली-भाँति विश्राम करके गौतम ने तब सोचा, 'सुन्दर सोने का यह बड़ा बोझ मैंने लोभ और मोह से उठा लिया है, और मेरी यात्रा लम्बी है।

श्लोक 29 (12.170.29)

न चास्ति पथि भोक्तव्यं प्राणसन्धारणं मम । किं कृत्वा धारयेयं वै प्राणानित्यभ्यचिन्तयत् ॥

na cāsti pathi bhoktavyaṃ prāṇasandhāraṇaṃ mama | kiṃ kṛtvā dhārayeyaṃ vai prāṇānityabhyacintayat

और मार्ग में खाने को कुछ नहीं है जिससे मेरे प्राण टिके रहें। प्राणों को कैसे बनाए रखूँ?' ऐसा उसने सोचा।

श्लोक 30 (12.170.30)

ततः स पथि भोक्तव्यं प्रेक्षमाणो न किञ्चन । कृतघ्नः पुरुषव्याघ्र मनसेदमचिन्तयत् ॥

tataḥ sa pathi bhoktavyaṃ prekṣamāṇo na kiñcana | kṛtaghnaḥ puruṣavyāghra manasedamacintayat

तब मार्ग में खाने को कुछ भी न देखकर उस कृतघ्न ने, हे पुरुषव्याघ्र, मन में यह सोचा:

श्लोक 31 (12.170.31)

अयं बकपतिः पार्श्वे मांसराशिः स्थितो मम । इमं हत्वा गृहीत्वा च यास्येऽहं समभिद्रुतम् ॥

ayaṃ bakapatiḥ pārśve māṃsarāśiḥ sthito mama | imaṃ hatvā gṛhītvā ca yāsye'haṃ samabhidrutam

'बगुलों का यह स्वामी मेरे पास पड़ा हुआ मांस का ढेर है। इसे मारकर और ले जाकर मैं शीघ्र आगे बढ़ जाऊँगा।'

अध्याय 169अध्याय-सूचीअध्याय 171