शान्ति पर्व · अध्याय 172
राजधर्मा का पुनर्जीवन
राक्षसराज राजधर्मा के शरीर का सुगन्धित द्रव्यों से दाह-संस्कार कराते हैं; इन्द्र के वचन से सुरभि के मुख से गिरा अमृतमय फेन चिता पर पड़ता है और बकराज फिर जी उठता है। वह अपने मित्र गौतम को छोड़ देने की प्रार्थना करता है; इन्द्र विरूपाक्ष को बताते हैं कि ब्रह्मा ने राजधर्मा को कभी शाप दिया था, और गौतम को जाने देते हैं। गौतम शबरों की बस्ती में लौटकर नरक को प्राप्त होता है। अन्त में भीष्म कृतज्ञता और मित्रता की प्रशंसा तथा कृतघ्न की निन्दा करते हैं, और वैशम्पायन बताते हैं कि युधिष्ठिर प्रसन्न हुए।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.172.1)
विद्वान्संस्कारयामास पार्थिवो राजधर्मणः । गन्धैर्बहुभिरव्यग्रो दाहयामास पूजितम् ॥
vidvānsaṃskārayāmāsa pārthivo rājadharmaṇaḥ | gandhairbahubhiravyagro dāhayāmāsa pūjitam
विद्वान् राजा ने राजधर्मा का संस्कार कराया और शान्त भाव से अनेक सुगन्धित द्रव्यों के साथ उस पूजनीय पक्षी का दाह कराया।
श्लोक 2 (12.172.2)
तस्य देवस्य वचनादिन्द्रस्य बकराडिह । तेनैवामृतसिक्तश्च पुनः संजीवितो बकः ॥
tasya devasya vacanādindrasya bakarāḍiha | tenaivāmṛtasiktaśca punaḥ saṃjīvito bakaḥ
उन देवराज इन्द्र के वचन से उसी अमृत से सींचा जाकर बकराज फिर जीवित हो गया।
श्लोक 3 (12.172.3)
राजधर्माऽपि तं प्राह सहस्राक्षमरिंदमम् । गौतमो ब्राह्मणः क्वाऽसौ मुच्यतां मत्प्रियः सखा ॥
rājadharmā'pi taṃ prāha sahasrākṣamariṃdamam | gautamo brāhmaṇaḥ kvā'sau mucyatāṃ matpriyaḥ sakhā
तब राजधर्मा ने उन सहस्राक्ष शत्रुदमन इन्द्र से कहा, "ब्राह्मण गौतम कहाँ है? उसे छोड़ दिया जाए, वह मेरा प्रिय मित्र है।"
श्लोक 4 (12.172.4)
तस्य वाक्यं समाज्ञाय कौशिकः सुरसत्तमः । गौतमं ह्यभ्यनुज्ञाप्य प्रीतोऽथ गमनोत्सुकः ॥
tasya vākyaṃ samājñāya kauśikaḥ surasattamaḥ | gautamaṃ hyabhyanujñāpya prīto'tha gamanotsukaḥ
उसकी बात समझकर देवश्रेष्ठ कौशिक (इन्द्र) ने गौतम को जाने की अनुमति देकर विदा किया और प्रसन्न होकर जाने को उत्सुक हुए।
श्लोक 5 (12.172.5)
प्रतीतः स गतः सौम्यो राजधर्मा स्वमालयम् । नृशंसो गौतमो मुक्तो मित्रध्रुक्पुरुषाधमः ॥
pratītaḥ sa gataḥ saumyo rājadharmā svamālayam | nṛśaṃso gautamo mukto mitradhrukpuruṣādhamaḥ
सौम्य राजधर्मा सन्तुष्ट होकर अपने घर चला गया; और नृशंस गौतम, वह मित्रद्रोही नराधम, छूटकर
श्लोक 6 (12.172.6)
सभाण्डोपस्करो यातः स तदा शबरालयम् । तत्रासौ शबरी देहे प्रसूतो निरयोपमे ॥
sabhāṇḍopaskaro yātaḥ sa tadā śabarālayam | tatrāsau śabarī dehe prasūto nirayopame
अपने सामान और गठरी सहित शबरों की बस्ती में गया; वहाँ नरक के समान उस शबरी-देह में उसने सन्तान उत्पन्न की।
श्लोक 7 (12.172.7)
एष शापो महांस्तत्र मुक्तः सुरगणैस्तदा ॥
eṣa śāpo mahāṃstatra muktaḥ suragaṇaistadā
देवताओं के समूह ने उसी समय वहाँ उसे यह महान् शाप दिया था।
श्लोक 8 (12.172.8)
दग्धे राक्षसराजेन खगराजे प्रतापिना । चितायाः पार्श्वतो दोग्ध्री सुरभिर्जीवयच्च तम् ॥
dagdhe rākṣasarājena khagarāje pratāpinā | citāyāḥ pārśvato dogdhrī surabhirjīvayacca tam
जब प्रतापी राक्षसराज ने पक्षिराज का दाह कर दिया, तब चिता के पास खड़ी गौ सुरभि ने उसे जीवित कर दिया।
श्लोक 9 (12.172.9)
तस्या वक्राच्च्युतः फेनो दुग्धमात्रस्तदाऽनघ । समीरणाहृतो यातश्चितां तां राजधर्मणः ॥
tasyā vakrāccyutaḥ pheno dugdhamātrastadā'nagha | samīraṇāhṛto yātaścitāṃ tāṃ rājadharmaṇaḥ
हे निष्पाप, उसके मुख से केवल दूध का झाग गिरा और वायु के द्वारा लाया जाकर राजधर्मा की उस चिता पर जा पड़ा।
श्लोक 10 (12.172.10)
देवराजस्ततः प्राप्तो विरूपाक्षपुरं तदा । विरूपाक्षोऽपि तं शक्रमयाचत पुनः पुनः । काश्यपस्य सुतो देव भ्राता मे जीवतामिति ॥
devarājastataḥ prāpto virūpākṣapuraṃ tadā | virūpākṣo'pi taṃ śakramayācata punaḥ punaḥ | kāśyapasya suto deva bhrātā me jīvatāmiti
तब देवराज इन्द्र विरूपाक्ष के नगर में आए, और विरूपाक्ष ने उनसे बार-बार याचना की, "हे देव, मेरा भाई, काश्यप का पुत्र, जीवित हो जाए।"
श्लोक 11 (12.172.11)
विरूपाक्षमुवाचेदमीश्वरः पाकशासनः । ब्रह्मणा व्याहृतो रोषाद्राजधर्मा कदाचन ॥
virūpākṣamuvācedamīśvaraḥ pākaśāsanaḥ | brahmaṇā vyāhṛto roṣādrājadharmā kadācana
तब पाकशासन इन्द्र ने विरूपाक्ष से यह कहा, "किसी समय ब्रह्मा ने क्रोध में राजधर्मा से यह कहा था:
इन्द्र उवाच
श्लोक 12 (12.172.12)
यस्मात्त्वं नागतो द्रष्टुं मम नित्यमिमां सभाम् । तस्माद्बको भवान्भावी धर्मशीलः परात्मवित् ॥
yasmāttvaṃ nāgato draṣṭuṃ mama nityamimāṃ sabhām | tasmādbako bhavānbhāvī dharmaśīlaḥ parātmavit
'तुम सदा की तरह मेरी इस सभा में मुझे देखने नहीं आए, इसलिए तुम बगुला (बक) बनोगे, धर्मशील और परमात्मा को जानने वाले।
श्लोक 13 (12.172.13)
आगमिष्यति ते वासं कदाचित्पापकर्मकृत् । शबरावासगो विप्रः कृतघ्नो वृषलीपतिः ॥
āgamiṣyati te vāsaṃ kadācitpāpakarmakṛt | śabarāvāsago vipraḥ kṛtaghno vṛṣalīpatiḥ
किसी दिन तुम्हारे निवास में एक पापकर्मी आएगा, शबरों की बस्ती में रहने वाला कृतघ्न ब्राह्मण, जो वृषली का पति है।
श्लोक 14 (12.172.14)
यदा निहन्ता मोक्षस्ते तदा भावीत्युवाच तम् । तस्मादेष गतो लोकं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥
yadā nihantā mokṣaste tadā bhāvītyuvāca tam | tasmādeṣa gato lokaṃ brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ
जब वह तुम्हारा वध करेगा, तब तुम्हारी मुक्ति होगी।' ऐसा ब्रह्मा ने उससे कहा था, और इसी कारण यह परमेष्ठी ब्रह्मा के लोक को गया।"
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (12.172.15)
स चापि निरयं प्राप्तो दुष्कृतिः कुलपांसनः ॥
sa cāpi nirayaṃ prāpto duṣkṛtiḥ kulapāṃsanaḥ
और वह दुष्कर्मी, कुलकलंक भी नरक को प्राप्त हुआ।
श्लोक 16 (12.172.16)
एतच्छ्रुत्वा सभामध्ये तद्वाक्यं नारदेरितम् । मयाऽपि तव राजेन्द्र यथावदनुवर्णितम् ॥
etacchrutvā sabhāmadhye tadvākyaṃ nāraderitam | mayā'pi tava rājendra yathāvadanuvarṇitam
सभा के बीच नारद के कहे उस वचन को सुनकर, हे राजेन्द्र, मैंने भी तुम्हें वैसा ही यथावत् सुना दिया।
श्लोक 17 (12.172.17)
ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चोरे भ्रष्टव्रते तथा । निष्कृतिर्विहिता राजन्कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥
brahmaghne ca surāpe ca core bhraṣṭavrate tathā | niṣkṛtirvihitā rājankṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ
हे राजन्, ब्रह्महत्यारे, सुरापान करने वाले, चोर और व्रतभ्रष्ट के लिए प्रायश्चित्त का विधान है; कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं।
श्लोक 18 (12.172.18)
कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् । अश्रद्धेयः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥
kutaḥ kṛtaghnasya yaśaḥ kutaḥ sthānaṃ kutaḥ sukham | aśraddheyaḥ kṛtaghno hi kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ
कृतघ्न का यश कहाँ, स्थान कहाँ, सुख कहाँ? कृतघ्न पर विश्वास नहीं किया जा सकता, और कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं।
श्लोक 19 (12.172.19)
मित्रद्रोहो न कर्तव्यः पुरुषेण विशेषतः । मित्रध्रुङ्निरयं घोरं नरकं प्रतिपद्यते ॥
mitradroho na kartavyaḥ puruṣeṇa viśeṣataḥ | mitradhruṅnirayaṃ ghoraṃ narakaṃ pratipadyate
मनुष्य को मित्र के साथ विश्वासघात कभी नहीं करना चाहिए, विशेषकर; मित्रद्रोही भयानक नरक में जा पड़ता है।
श्लोक 20 (12.172.20)
कृतज्ञमनसा भाव्यं मित्रभावेन चानघ । मित्रात्प्रभवते सर्वं मित्रं धन्यतरं स्मृतम् ॥
kṛtajñamanasā bhāvyaṃ mitrabhāvena cānagha | mitrātprabhavate sarvaṃ mitraṃ dhanyataraṃ smṛtam
हे निष्पाप, कृतज्ञ मन और मित्रभाव वाला होना चाहिए; मित्र से सब कुछ प्राप्त होता है, और मित्र को सबसे धन्य माना गया है।
श्लोक 21 (12.172.21)
अर्थाद्वा मित्रलाभाद्वा मित्रलाभो विशिष्यते । सुलभा मित्रतोऽर्थास्तु मित्रेण यतितुं क्षमम् ॥
arthādvā mitralābhādvā mitralābho viśiṣyate | sulabhā mitrato'rthāstu mitreṇa yatituṃ kṣamam
धन और मित्र की प्राप्ति में मित्र की प्राप्ति श्रेष्ठ है; मित्र के द्वारा धन सहज मिल जाता है, और मित्र के साथ पुरुषार्थ करना सम्भव होता है।
श्लोक 22 (12.172.22)
मित्रं चाभिमतं स्निग्धं फलं चापि सतां फलम् । सत्कारैः स्वजनोपेतः पूजयेत विचक्षणः ॥
mitraṃ cābhimataṃ snigdhaṃ phalaṃ cāpi satāṃ phalam | satkāraiḥ svajanopetaḥ pūjayeta vicakṣaṇaḥ
प्रिय और स्नेही मित्र सज्जनों का भी फल है; बुद्धिमान को अपने स्वजनों के साथ सत्कार द्वारा उसका आदर करना चाहिए।
श्लोक 23 (12.172.23)
परित्याज्यो बुधैः पापः कदर्यः कुलपांसनः । मित्रद्रोही कुलाङ्गारः पापकर्मा कुलाधमः ॥
parityājyo budhaiḥ pāpaḥ kadaryaḥ kulapāṃsanaḥ | mitradrohī kulāṅgāraḥ pāpakarmā kulādhamaḥ
बुद्धिमानों को पापी, कंजूस और कुलकलंक का त्याग करना चाहिए; मित्रद्रोही अपने कुल का अंगारा, पापकर्मा और कुल में अधम होता है।
श्लोक 24 (12.172.24)
एषा सज्जनसांनिध्ये प्रज्ञा प्रोक्ता मयाऽनघ । मित्रदुहि कृतघ्ने च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
eṣā sajjanasāṃnidhye prajñā proktā mayā'nagha | mitraduhi kṛtaghne ca kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
हे निष्पाप, सज्जनों की संगति में मित्रद्रोही और कृतघ्न के विषय में मैंने तुम्हें यह ज्ञान सुनाया; अब और क्या सुनना चाहते हो?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (12.172.25)
एतच्छ्रुत्वा ततो वाक्यं भीष्मेणोक्तं महात्मना । युधिष्ठिरः प्रीतमना बभूव जनमेजय ॥
etacchrutvā tato vākyaṃ bhīṣmeṇoktaṃ mahātmanā | yudhiṣṭhiraḥ prītamanā babhūva janamejaya
हे जनमेजय, महात्मा भीष्म के कहे इन वचनों को सुनकर युधिष्ठिर मन में प्रसन्न हुए।