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शान्ति पर्व · अध्याय 173

सेनजित् का शोक और पिङ्गला की गाथा

युधिष्ठिर आश्रमों में रहने वालों के लिए श्रेष्ठ धर्म पूछते हैं, और भीष्म एक पुरानी कथा सुनाते हैं: पुत्रशोक से व्याकुल राजा सेनजित् को एक ब्राह्मण समझाता है। वह बताता है कि सुख और दुःख चक्र की तरह घूमते हैं, पुत्र, पत्नी और धन की आसक्ति शोक की जड़ है, प्राणियों का मिलना सागर में बहती लकड़ियों के मिलने जैसा है, और तृष्णा तथा क्रोध का त्याग करना चाहिए। अन्त में वह वेश्या पिङ्गला की गाथा कहता है, जिसने प्रियतम से छोड़ी जाने पर आशा त्यागकर परम सुख पाया।

अध्याय 172अध्याय-सूचीअध्याय 174

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.173.1)

धर्माः पितामहेनोक्ता राजधर्माश्रिताः शुभाः । धर्ममाश्रमिणां श्रेष्ठं वक्तुमर्हसि सत्तम ॥

dharmāḥ pitāmahenoktā rājadharmāśritāḥ śubhāḥ | dharmamāśramiṇāṃ śreṣṭhaṃ vaktumarhasi sattama

पितामह, आपने राजधर्म पर आश्रित शुभ धर्म बताए। हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ, अब आश्रमवासियों के लिए जो श्रेष्ठ धर्म है, उसे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.173.2)

सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलोदयः । बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥

sarvatra vihito dharmaḥ svargyaḥ satyaphalodayaḥ | bahudvārasya dharmasya nehāsti viphalā kriyā

धर्म सर्वत्र विहित है; वह स्वर्ग देने वाला है और उसका फल निश्चित है। धर्म के अनेक द्वार हैं, यहाँ उसका कोई कर्म निष्फल नहीं होता।

श्लोक 3 (12.173.3)

यस्मिन्यस्मिंस्तु विषये योयो याति विनिश्चयम् । स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥

yasminyasmiṃstu viṣaye yoyo yāti viniścayam | sa tamevābhijānāti nānyaṃ bharatasattama

जो-जो मनुष्य जिस-जिस विषय में निश्चय पर पहुँचता है, वह उसी को जानता है, किसी और को नहीं, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 4 (12.173.4)

यथायथा च पर्येति लोकतन्त्रमसारवत् । तथातथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥

yathāyathā ca paryeti lokatantramasāravat | tathātathā virāgo'tra jāyate nātra saṃśayaḥ

जैसे-जैसे मनुष्य संसार के व्यवहार को सारहीन समझता जाता है, वैसे-वैसे उसमें वैराग्य उत्पन्न होता है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 5 (12.173.5)

एवं व्यवसिते लोके बहुदोषे युधिष्ठिर । आत्ममोक्षनिमित्तं वै यतेत मतिमान्नरः ॥

evaṃ vyavasite loke bahudoṣe yudhiṣṭhira | ātmamokṣanimittaṃ vai yateta matimānnaraḥ

हे युधिष्ठिर, संसार ऐसा निश्चित और बहुत दोषों से भरा है; इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (12.173.6)

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते । यया बुद्ध्या नुदेच्छोकं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

naṣṭe dhane vā dāre vā putre pitari vā mṛte | yayā buddhyā nudecchokaṃ tanme brūhi pitāmaha

धन, पत्नी, पुत्र या पिता के नष्ट होने या मर जाने पर मनुष्य किस बुद्धि से शोक को दूर करे? पितामह, मुझे वह बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (12.173.7)

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते । अहोदुःखमिति ध्यायञ्शोकस्यापचितिं चरेत् ॥

naṣṭe dhane vā dāre vā putre pitari vā mṛte | ahoduḥkhamiti dhyāyañśokasyāpacitiṃ caret

धन, पत्नी, पुत्र या पिता के नष्ट होने या मरने पर "हाय, कैसा दुःख है" ऐसा सोचकर मनुष्य को शोक के प्रतिकार का उपाय करना चाहिए।

श्लोक 8 (12.173.8)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यथा सेनजितं विप्रः कश्चिदेत्याब्रवीत्सुहृत् ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | yathā senajitaṃ vipraḥ kaścidetyābravītsuhṛt

इस विषय में एक पुराना इतिहास सुनाया जाता है कि कैसे कोई ब्राह्मण मित्र सेनजित् के पास आकर उससे बोला।

श्लोक 9 (12.173.9)

पुत्रशोकाभिसंतप्तं राजानं शोकविह्वलम् । विषण्णमनसं दृष्ट्वा विप्रो वचनमब्रवीत् ॥

putraśokābhisaṃtaptaṃ rājānaṃ śokavihvalam | viṣaṇṇamanasaṃ dṛṣṭvā vipro vacanamabravīt

पुत्रशोक से सन्तप्त, शोक से विह्वल और खिन्न मन वाले राजा को देखकर उस ब्राह्मण ने यह वचन कहा।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 10 (12.173.10)

किंनु मुह्यसि मूढस्त्वं शोच्यः किमनु शोचसि । यदा त्वामपि शोचंतः शोच्या यास्यन्ति तां गतिम् ॥

kiṃnu muhyasi mūḍhastvaṃ śocyaḥ kimanu śocasi | yadā tvāmapi śocaṃtaḥ śocyā yāsyanti tāṃ gatim

तुम मूढ़ की तरह क्यों मोहित हो रहे हो? तुम स्वयं शोक के योग्य हो, फिर किसके लिए शोक करते हो? जो लोग आज तुम्हारे लिए शोक कर रहे हैं, वे भी शोचनीय बनकर उसी गति को जाएँगे।

श्लोक 11 (12.173.11)

त्वं चैवाहं च ये चान्ये त्वां राजन्पर्युपासते । सर्वे तत्र गमिष्यामो यत एवागता वयम् ॥

tvaṃ caivāhaṃ ca ye cānye tvāṃ rājanparyupāsate | sarve tatra gamiṣyāmo yata evāgatā vayam

हे राजन्, तुम, मैं और जो अन्य लोग तुम्हारी सेवा करते हैं, हम सब वहीं लौट जाएँगे जहाँ से आए हैं।

सेनजिदुवाच

श्लोक 12 (12.173.12)

का बुद्धिः किं तपो विप्र कः समाधिस्तपोधन । किं ज्ञानं किं श्रुतं वा ते यत्प्राप्य न विषीदसि ॥

kā buddhiḥ kiṃ tapo vipra kaḥ samādhistapodhana | kiṃ jñānaṃ kiṃ śrutaṃ vā te yatprāpya na viṣīdasi

हे विप्र, वह कौन-सी बुद्धि, कौन-सा तप, कौन-सी समाधि है, हे तपोधन? आपका कौन-सा ज्ञान और कौन-सा शास्त्रश्रवण है, जिसे पाकर आप शोक नहीं करते?

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 13 (12.173.13)

हृष्यन्तमवसीदन्तं सुखदुःखविपर्यये । आत्मानमनुशोचामि यो ममैष हृदि स्थितः ॥

hṛṣyantamavasīdantaṃ sukhaduḥkhaviparyaye | ātmānamanuśocāmi yo mamaiṣa hṛdi sthitaḥ

सुख-दुःख के उलटफेर में हर्षित होने और खिन्न होने वाले अपने उस आत्मा के लिए मैं खेद करता हूँ जो मेरे हृदय में स्थित है।

श्लोक 14 (12.173.14)

पश्य भूतानि दुःखेन व्यतिषिक्तानि सर्वशः । उत्तमाधममध्यानि तेषु तेष्विह कर्मसु ॥

paśya bhūtāni duḥkhena vyatiṣiktāni sarvaśaḥ | uttamādhamamadhyāni teṣu teṣviha karmasu

देखो, सभी प्राणी सब ओर दुःख से व्याप्त हैं, ऊँचे, नीचे और मध्यम, अपने-अपने कर्मों में बँधे हुए।

श्लोक 15 (12.173.15)

आत्माऽपि चायं न मम सर्वा वा पृथिवी मम । यथा मम तथाऽन्येषामिति मत्वा न मे व्यथा । एतां बुद्धिमहं प्राप्य न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥

ātmā'pi cāyaṃ na mama sarvā vā pṛthivī mama | yathā mama tathā'nyeṣāmiti matvā na me vyathā | etāṃ buddhimahaṃ prāpya na prahṛṣye na ca vyathe

यह आत्मा भी मेरा नहीं है, और सारी पृथ्वी भी मेरी नहीं है; जैसी वह मेरी है, वैसी ही दूसरों की भी है। ऐसा समझकर मुझे व्यथा नहीं होती। इस बुद्धि को पाकर मैं न हर्षित होता हूँ, न दुःखी।

श्लोक 16 (12.173.16)

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ । समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः ॥

yathā kāṣṭhaṃ ca kāṣṭhaṃ ca sameyātāṃ mahodadhau | sametya ca vyapeyātāṃ tadvadbhūtasamāgamaḥ

जैसे महासागर में एक लकड़ी और दूसरी लकड़ी मिलती हैं और मिलकर फिर अलग हो जाती हैं, वैसा ही प्राणियों का समागम है।

श्लोक 17 (12.173.17)

एवं पुत्राश्च पौत्राश्च ज्ञातयो बान्धवास्तथा । तेषु स्नेहो न कर्तव्यो विप्रयोगो ध्रुवो हि तैः ॥

evaṃ putrāśca pautrāśca jñātayo bāndhavāstathā | teṣu sneho na kartavyo viprayogo dhruvo hi taiḥ

इसी प्रकार पुत्र, पौत्र, जाति-बन्धु और सम्बन्धी भी हैं; उनमें आसक्ति नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि उनसे वियोग निश्चित है।

श्लोक 18 (12.173.18)

अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः । न त्वाऽसौ वेद न त्वं तं कस्मात्त्वमनुशोचसि ॥

adarśanādāpatitaḥ punaścādarśanaṃ gataḥ | na tvā'sau veda na tvaṃ taṃ kasmāttvamanuśocasi

वह अदृश्य से आया और फिर अदृश्य में चला गया। न वह तुम्हें जानता है, न तुम उसे जानते हो; फिर तुम किसके लिए शोक करते हो?

श्लोक 19 (12.173.19)

सुखान्तप्रभवं दुःखं दुःखान्तप्रभवं सुखम् । सुखात्संजायते दुःखं दुःखात्संजायते सुखम् ॥

sukhāntaprabhavaṃ duḥkhaṃ duḥkhāntaprabhavaṃ sukham | sukhātsaṃjāyate duḥkhaṃ duḥkhātsaṃjāyate sukham

सुख के अन्त से दुःख उत्पन्न होता है और दुःख के अन्त से सुख; सुख से दुःख पैदा होता है और दुःख से सुख।

श्लोक 20 (12.173.20)

सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । सुखदुःखे मनुष्याणां चक्रवत्परिवर्ततः ॥

sukhasyānantaraṃ duḥkhaṃ duḥkhasyānantaraṃ sukham | sukhaduḥkhe manuṣyāṇāṃ cakravatparivartataḥ

सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख; मनुष्यों के सुख और दुःख चक्र की तरह घूमते रहते हैं।

श्लोक 21 (12.173.21)

सुखात्त्वं दुःखमापन्नः पुनरापत्स्यसे सुखम् । न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ॥

sukhāttvaṃ duḥkhamāpannaḥ punarāpatsyase sukham | na nityaṃ labhate duḥkhaṃ na nityaṃ labhate sukham

तुम सुख से दुःख में आ पड़े हो और फिर सुख को प्राप्त करोगे; न कोई सदा दुःख पाता है और न सदा सुख।

श्लोक 22 (12.173.22)

शरीरमेवायतनं सुखस्य । दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् । यद्यच्छरीरेण करोति कर्म । तेनैव देही समुपाश्नुते तत् ॥

śarīramevāyatanaṃ sukhasya | duḥkhasya cāpyāyatanaṃ śarīram | yadyaccharīreṇa karoti karma | tenaiva dehī samupāśnute tat

शरीर ही सुख का आधार है और शरीर ही दुःख का आधार है; शरीर से जो-जो कर्म मनुष्य करता है, उसका फल वह उसी शरीर से भोगता है।

श्लोक 23 (12.173.23)

जीवितं च शरीरेण तेनैव सह जायते । उभे सह विवर्तेते उभे सह विनश्यतः ॥

jīvitaṃ ca śarīreṇa tenaiva saha jāyate | ubhe saha vivartete ubhe saha vinaśyataḥ

जीवन शरीर के साथ ही उत्पन्न होता है; दोनों साथ-साथ चलते हैं और दोनों साथ-साथ नष्ट होते हैं।

श्लोक 24 (12.173.24)

स्नेहपाशैर्बहुविधैराविष्टविषया जनाः । अकृतार्थाश्च सीदन्ते जलैः सैकतसेतवः ॥

snehapāśairbahuvidhairāviṣṭaviṣayā janāḥ | akṛtārthāśca sīdante jalaiḥ saikatasetavaḥ

अनेक स्नेह-बन्धनों में बँधे और विषयों में लीन लोग अपना प्रयोजन सिद्ध नहीं कर पाते और जल में बालू के बाँध की तरह डूब जाते हैं।

श्लोक 25 (12.173.25)

स्नेहेन तैलवत्सर्वं सर्गचक्रे निपीड्यते । तिलपीडैरिवाक्रम्य क्लेशैरज्ञानसंभवैः ॥

snehena tailavatsarvaṃ sargacakre nipīḍyate | tilapīḍairivākramya kleśairajñānasaṃbhavaiḥ

सृष्टि के चक्र में सब कुछ स्नेह से उसी तरह पेरा जाता है जैसे तिल से तेल, और अज्ञान से उत्पन्न क्लेश तिल पेरने वाली घानियों की तरह उसे कुचलते हैं।

श्लोक 26 (12.173.26)

संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः । एकः क्लेशानवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥

saṃcinotyaśubhaṃ karma kalatrāpekṣayā naraḥ | ekaḥ kleśānavāpnoti paratreha ca mānavaḥ

पत्नी आदि के लिए मनुष्य अशुभ कर्म बटोरता है; उसके क्लेश अकेला वही इस लोक और परलोक में भोगता है।

श्लोक 27 (12.173.27)

पुत्रदारकुटुम्बेषु प्रसक्ताः सर्वमानवाः । शोकपङ्कार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव ॥

putradārakuṭumbeṣu prasaktāḥ sarvamānavāḥ | śokapaṅkārṇave magnā jīrṇā vanagajā iva

सभी मनुष्य पुत्र, स्त्री और परिवार में आसक्त होकर शोक के कीचड़ और सागर में बूढ़े जंगली हाथियों की तरह डूब जाते हैं।

श्लोक 28 (12.173.28)

पुत्रनाशे वित्तनाशे ज्ञातिसंबन्धिनामपि । प्राप्यते सुमहद्दुःखं दावाग्निप्रतिमं विभो । दैवायत्तमिदं सर्वं सुखदुःखे भवाभवौ ॥

putranāśe vittanāśe jñātisaṃbandhināmapi | prāpyate sumahadduḥkhaṃ dāvāgnipratimaṃ vibho | daivāyattamidaṃ sarvaṃ sukhaduḥkhe bhavābhavau

पुत्र के नाश, धन के नाश और जाति-सम्बन्धियों के नाश में भी, हे विभो, दावानल के समान महान् दुःख प्राप्त होता है; यह सब दैव के अधीन है, सुख-दुःख और उन्नति-अवनति भी।

श्लोक 29 (12.173.29)

असुहृत्ससुहृच्चापि सशत्रुर्मित्रवानपि । सप्रज्ञः प्रज्ञया हीनो दैवेन लभते सुखम् ॥

asuhṛtsasuhṛccāpi saśatrurmitravānapi | saprajñaḥ prajñayā hīno daivena labhate sukham

मित्रहीन हो या मित्रों वाला, शत्रुओं वाला हो या मित्रवान्, बुद्धिमान हो या बुद्धिहीन, मनुष्य दैव से ही सुख पाता है।

श्लोक 30 (12.173.30)

नालं सुखाय सुहृदो नालं दुःखाय दुर्हृदः । न च प्रज्ञाऽलमर्थानां न सुखानामलं धनम् ॥

nālaṃ sukhāya suhṛdo nālaṃ duḥkhāya durhṛdaḥ | na ca prajñā'lamarthānāṃ na sukhānāmalaṃ dhanam

मित्र सुख देने में समर्थ नहीं, न शत्रु दुःख देने में; न बुद्धि धन दिला सकती है और न धन सुख।

श्लोक 31 (12.173.31)

न बुद्धिर्धनलाभाय न मौढ्यमसमृद्ध्ये । लोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ॥

na buddhirdhanalābhāya na mauḍhyamasamṛddhye | lokaparyāyavṛttāntaṃ prājño jānāti netaraḥ

बुद्धि से धन-प्राप्ति नहीं होती और मूढ़ता से निर्धनता नहीं; संसार के चक्र के इस वृत्तान्त को ज्ञानी ही जानता है, दूसरा नहीं।

श्लोक 32 (12.173.32)

बुद्धिमन्तं च शूरं च मूढं भीरुं जडं कविम् । दुर्बलं बलवन्तं च भागिनं भजते सुखम् ॥

buddhimantaṃ ca śūraṃ ca mūḍhaṃ bhīruṃ jaḍaṃ kavim | durbalaṃ balavantaṃ ca bhāginaṃ bhajate sukham

बुद्धिमान और शूर, मूढ़ और डरपोक, जड़ और कवि, दुर्बल और बलवान्, इनमें से जो भाग्यशाली है, सुख उसी के पास पहुँचता है।

श्लोक 33 (12.173.33)

धेनुर्वत्सस्य गोपस्य स्वामिनस्तस्करस्य च । पयः पिबति यस्तस्या धेनुस्तस्येति निश्चयः ॥

dhenurvatsasya gopasya svāminastaskarasya ca | payaḥ pibati yastasyā dhenustasyeti niścayaḥ

गौ बछड़े की है, ग्वाले की, स्वामी की और चोर की भी; जो उसका दूध पीता है, गौ उसी की है, यह निश्चय है।

श्लोक 34 (12.173.34)

ये च मूढतमा लोके ये च बुद्धेः परं गताः । ते नराः सुखमेधन्ते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥

ye ca mūḍhatamā loke ye ca buddheḥ paraṃ gatāḥ | te narāḥ sukhamedhante kliśyatyantarito janaḥ

जो संसार में सबसे अधिक मूढ़ हैं और जो बुद्धि से भी परे पहुँच गए हैं, वे मनुष्य सुख से बढ़ते हैं; बीच में रहने वाला मनुष्य कष्ट पाता है।

श्लोक 35 (12.173.35)

अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमन्तयोः ॥

anteṣu remire dhīrā na te madhyeṣu remire | antaprāptiṃ sukhaṃ prāhurduḥkhamantaramantayoḥ

धीर पुरुष दोनों छोरों में रमे हैं, बीच में नहीं रमे। वे छोर की प्राप्ति को सुख कहते हैं और दोनों छोरों के बीच के भाग को दुःख।

श्लोक 36 (12.173.36)

सुखं स्वपिति दुर्मेधाः स्वानि कर्माण्यचिन्तयन् । अविज्ञानेन महता कम्बलेनेव संवृतः ॥

sukhaṃ svapiti durmedhāḥ svāni karmāṇyacintayan | avijñānena mahatā kambaleneva saṃvṛtaḥ

मन्दबुद्धि लोग अपने कर्मों का विचार किए बिना सुख से सोते हैं, मानो महान् अज्ञान का कम्बल ओढ़े हों।

श्लोक 37 (12.173.37)

ये च बुद्धिं परां प्राप्ता द्वन्द्वातीता विमत्सराः । तान्नैवार्था न चानर्था व्यथयन्ति कदाचन ॥

ye ca buddhiṃ parāṃ prāptā dvandvātītā vimatsarāḥ | tānnaivārthā na cānarthā vyathayanti kadācana

परन्तु जिन्होंने परम बुद्धि पा ली है, जो द्वन्द्वों से परे और ईर्ष्या से रहित हैं, उन्हें लाभ या हानि कभी व्यथित नहीं करते।

श्लोक 38 (12.173.38)

अथ ये बुद्धिमप्राप्ता व्यतिक्रान्ताश्च मूढताम् । तेऽतिवेलं प्रहृष्यन्ति संतापमुपयान्ति च ॥

atha ye buddhimaprāptā vyatikrāntāśca mūḍhatām | te'tivelaṃ prahṛṣyanti saṃtāpamupayānti ca

और जो बुद्धि को प्राप्त नहीं हुए और मूढ़ता से भी आगे निकल गए हैं, वे अत्यधिक हर्षित होते हैं और सन्ताप भी पाते हैं।

श्लोक 39 (12.173.39)

नित्यं प्रमुदिता मूढा दिवि देवगणा इव । अवलेपेन महता परितृप्ता विचेतसः ॥

nityaṃ pramuditā mūḍhā divi devagaṇā iva | avalepena mahatā paritṛptā vicetasaḥ

मूढ़ लोग स्वर्ग के देवगणों की तरह सदा आनन्द में रहते हैं, बड़े अहंकार से तृप्त और विवेकहीन।

श्लोक 40 (12.173.40)

सुखं दुःखान्तमालस्यं दुःखं दाक्ष्यं सुखोदयम् । भूतिश्चैव श्रिया सार्धं दक्षे वसति नालसे ॥

sukhaṃ duḥkhāntamālasyaṃ duḥkhaṃ dākṣyaṃ sukhodayam | bhūtiścaiva śriyā sārdhaṃ dakṣe vasati nālase

आलस्य सुख है जिसका अन्त दुःख में होता है; कुशलता दुःख है जिससे सुख का उदय होता है। ऐश्वर्य और लक्ष्मी कुशल के पास रहते हैं, आलसी के पास नहीं।

श्लोक 41 (12.173.41)

सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥

sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ priyaṃ vā yadi vā'priyam | prāptaṃ prāptamupāsīta hṛdayenāparājitaḥ

सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, जो-जो प्राप्त हो उसे अपराजित हृदय से स्वीकार करना चाहिए।

श्लोक 42 (12.173.42)

शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

śokasthānasahasrāṇi bhayasthānaśatāni ca | divasedivase mūḍhamāviśanti na paṇḍitam

शोक के हज़ारों और भय के सैकड़ों कारण प्रतिदिन मूढ़ में प्रवेश करते हैं, पण्डित में नहीं।

श्लोक 43 (12.173.43)

बुद्धिमन्तं कृतप्रज्ञं शुश्रूषुमनहंकृतम् । शान्तं जितेन्द्रियं चापि शोको न स्पृशते नरम् ॥

buddhimantaṃ kṛtaprajñaṃ śuśrūṣumanahaṃkṛtam | śāntaṃ jitendriyaṃ cāpi śoko na spṛśate naram

जो बुद्धिमान, कृतप्रज्ञ, श्रवण का इच्छुक, अहंकार से रहित, शान्त और जितेन्द्रिय है, उस मनुष्य को शोक स्पर्श नहीं करता।

श्लोक 44 (12.173.44)

एतां बुद्धिं समास्थाय शुद्धचित्तश्चरेद्बुधः । शुक्लकृष्णगतिज्ञं तं देवासुरविनिर्गमम् । उदयास्तमयज्ञं हि न शोकः स्प्रष्टुमर्हति ॥

etāṃ buddhiṃ samāsthāya śuddhacittaścaredbudhaḥ | śuklakṛṣṇagatijñaṃ taṃ devāsuravinirgamam | udayāstamayajñaṃ hi na śokaḥ spraṣṭumarhati

इस बुद्धि का आश्रय लेकर ज्ञानी को शुद्ध चित्त से विचरना चाहिए। जो शुक्ल और कृष्ण गति को, देवों और असुरों के निर्गमन को तथा उदय और अस्त को जानता है, उसे शोक स्पर्श नहीं कर सकता।

श्लोक 45 (12.173.45)

यन्निमत्तो भवेच्छोकस्रासो वा क्रोध एव वा । आयासो वा यतो मूलं तदेकाङ्गमपि त्यजेत् ॥

yannimatto bhavecchokasrāso vā krodha eva vā | āyāso vā yato mūlaṃ tadekāṅgamapi tyajet

जिस कारण से शोक, भय या दुःख होता है, या जो परिश्रम की जड़ है, उसे एक अंग होने पर भी त्याग देना चाहिए।

श्लोक 46 (12.173.46)

यद्यत्त्यजति कामनां तत्सुखस्याभिपूर्यते । कामानुसारी पुरुषः कामाननुविनश्यति ॥

yadyattyajati kāmanāṃ tatsukhasyābhipūryate | kāmānusārī puruṣaḥ kāmānanuvinaśyati

जिस-जिस कामना को मनुष्य छोड़ता है, उससे उतना सुख भरता जाता है; कामनाओं के पीछे चलने वाला पुरुष कामनाओं के साथ ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 47 (12.173.47)

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥

yacca kāmasukhaṃ loke yacca divyaṃ mahatsukham | tṛṣṇākṣayasukhasyaite nārhataḥ ṣoḍaśīṃ kalām

लोक में जो कामजन्य सुख है और जो स्वर्ग का महान् सुख है, वे तृष्णा के क्षय से मिलने वाले सुख की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं।

श्लोक 48 (12.173.48)

पूर्वदेहकृतं कर्म शुभं वा यदि वाऽशुभम् । प्राज्ञं मूढं तथा शूरं भजते तादृशं नरम् ॥

pūrvadehakṛtaṃ karma śubhaṃ vā yadi vā'śubham | prājñaṃ mūḍhaṃ tathā śūraṃ bhajate tādṛśaṃ naram

पूर्व शरीर में किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म ज्ञानी, मूढ़ और शूर, सबको उसी के अनुरूप आकर प्राप्त होता है।

श्लोक 49 (12.173.49)

एवमेव किलैतानि प्रियाण्येवाप्रियाणि च । जीवेषु परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥

evameva kilaitāni priyāṇyevāpriyāṇi ca | jīveṣu parivartante duḥkhāni ca sukhāni ca

इसी प्रकार प्रिय और अप्रिय, दुःख और सुख, प्राणियों में बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं।

श्लोक 50 (12.173.50)

एतां बुद्धिं समास्थाय नावसीदेद्गुणान्वितः । सर्वान्कामाञ्जुगुप्सेत कोपं कुर्वीत पृष्ठतः ॥

etāṃ buddhiṃ samāsthāya nāvasīdedguṇānvitaḥ | sarvānkāmāñjugupseta kopaṃ kurvīta pṛṣṭhataḥ

इस बुद्धि का आश्रय लेकर गुणवान् मनुष्य को हताश नहीं होना चाहिए; सब कामनाओं से घृणा करे और क्रोध को पीछे डाल दे।

श्लोक 51 (12.173.51)

वृत्त एव हृदि प्रौढो मृत्युरेष मनोभवः । क्रोधो नाम शरीरस्थो देहिनां प्रोच्यते बुधैः ॥

vṛtta eva hṛdi prauḍho mṛtyureṣa manobhavaḥ | krodho nāma śarīrastho dehināṃ procyate budhaiḥ

हृदय में दृढ़ता से स्थित, मन से उत्पन्न यह मृत्यु है, जिसे ज्ञानी लोग देहधारियों के शरीर में रहने वाला क्रोध कहते हैं।

श्लोक 52 (12.173.52)

यदा संहरते कामान्कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । तदात्मज्योतिरात्मश्रीरात्मन्येव प्रसीदति ॥

yadā saṃharate kāmānkūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ | tadātmajyotirātmaśrīrātmanyeva prasīdati

जब मनुष्य कछुए के अंगों की तरह अपनी सब कामनाओं को चारों ओर से समेट लेता है, तब आत्मज्योति और आत्मशोभा वाला आत्मा अपने भीतर ही प्रसन्न हो जाता है।

श्लोक 53 (12.173.53)

किंचिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम् । तदेव परितापाय नाशे संपद्यते तदा ॥

kiṃcideva mamatvena yadā bhavati kalpitam | tadeva paritāpāya nāśe saṃpadyate tadā

जब कोई वस्तु ममत्व से "मेरी" मान ली जाती है, तब वही उसके नष्ट होने पर सन्ताप का कारण बन जाती है।

श्लोक 54 (12.173.54)

न बिभेति यदा चायं यदा चास्मान्न विभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

na bibheti yadā cāyaṃ yadā cāsmānna vibhyati | yadā necchati na dveṣṭi brahma saṃpadyate tadā

जब मनुष्य किसी से नहीं डरता और कोई उससे नहीं डरता, जब वह न चाहता है न द्वेष करता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 55 (12.173.55)

उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ भयाभये । प्रियाप्रिये परित्यज्य प्रशान्तात्मा भविष्यति ॥

ubhe satyānṛte tyaktvā śokānandau bhayābhaye | priyāpriye parityajya praśāntātmā bhaviṣyati

सत्य और असत्य, शोक और आनन्द, भय और अभय, प्रिय और अप्रिय को त्यागकर वह प्रशान्त आत्मा वाला हो जाएगा।

श्लोक 56 (12.173.56)

यदा न कुरुते धीरः सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

yadā na kurute dhīraḥ sarvabhūteṣu pāpakam | karmaṇā manasā vācā brahma saṃpadyate tadā

जब धीर पुरुष कर्म, मन और वाणी से किसी प्राणी का अहित नहीं करता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 57 (12.173.57)

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखं ॥

yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ | yosau prāṇāntiko rogastāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukhaṃ

जिस तृष्णा को दुर्बुद्धि लोग नहीं छोड़ पाते, जो शरीर के जीर्ण होने पर भी जीर्ण नहीं होती और जो प्राण के अन्त तक रहने वाला रोग है, उसे छोड़ने वाले को सुख मिलता है।

श्लोक 58 (12.173.58)

अत्र पिङ्गलया गीता गाथा शृणु नराधिप । यथा सा कृच्छ्रकालेऽपि लेभे शर्म सनातनम् ॥

atra piṅgalayā gītā gāthā śṛṇu narādhipa | yathā sā kṛcchrakāle'pi lebhe śarma sanātanam

इस विषय में पिङ्गला ने एक गाथा गाई थी; हे नरेश्वर, उसे सुनो, कि वह संकट के समय भी कैसे सनातन शान्ति पा गई।

श्लोक 59 (12.173.59)

संकेते पिङ्गला वेश्या कान्तेनासीद्विनाकृता । अथ कृच्छ्रगता शान्तां बुद्धिमास्थापयत्तदा ॥

saṃkete piṅgalā veśyā kāntenāsīdvinākṛtā | atha kṛcchragatā śāntāṃ buddhimāsthāpayattadā

पिङ्गला नाम की वेश्या संकेत-स्थल पर अपने प्रियतम से वंचित रह गई; तब संकट में पड़कर उसने मन को शान्ति में स्थिर किया।

पिङ्गलोवाच

श्लोक 60 (12.173.60)

उन्मत्ताऽहमनुन्मत्तं कान्तमन्ववसं चिरम् । अन्तिके रमणं सन्तं नैनमध्यगमं पुरा ॥

unmattā'hamanunmattaṃ kāntamanvavasaṃ ciram | antike ramaṇaṃ santaṃ nainamadhyagamaṃ purā

मैं स्वयं उन्मत्त थी और बहुत समय तक एक अनुन्मत्त प्रियतम के पीछे लगी रही; जो पास ही रहकर मुझे आनन्द देने वाला था, उसे मैं पहले नहीं पहचान सकी।

श्लोक 61 (12.173.61)

एकस्थूणं नवद्वारमपिधास्याम्यगारकम् । का ह्यकान्तमिहायान्तं कान्त इत्यभिमंस्यते ॥

ekasthūṇaṃ navadvāramapidhāsyāmyagārakam | kā hyakāntamihāyāntaṃ kānta ityabhimaṃsyate

एक खम्भे और नौ द्वारों वाले इस घर को मैं बन्द कर दूँगी। भला कौन स्त्री यहाँ आने वाले प्रेमहीन पुरुष को प्रियतम समझेगी?

श्लोक 62 (12.173.62)

अकामाः कामरूपेण धूर्ताश्च नररूपिणः । न पुनर्वञ्चयिष्यन्ति प्रतिबुद्धाऽस्मि जागृमि ॥

akāmāḥ kāmarūpeṇa dhūrtāśca nararūpiṇaḥ | na punarvañcayiṣyanti pratibuddhā'smi jāgṛmi

प्रेम से रहित जो प्रेमी का रूप धरते हैं और जो मनुष्य के रूप में धूर्त हैं, वे अब मुझे फिर नहीं ठगेंगे; मैं जाग गई हूँ, सजग हूँ।

श्लोक 63 (12.173.63)

अनर्थोऽपि भवत्यर्थो दैवात्पूर्वकृतेन वा । संबुद्धाऽहं निराकारा नाहमद्याजितेन्द्रिया ॥

anartho'pi bhavatyartho daivātpūrvakṛtena vā | saṃbuddhā'haṃ nirākārā nāhamadyājitendriyā

अनर्थ भी दैव या पूर्वकृत कर्म से अर्थ बन जाता है। मैं पूरी तरह जाग गई हूँ, मोहक आकारों से मुक्त हूँ, और आज मेरी इन्द्रियाँ अजित नहीं रहीं।

श्लोक 64 (12.173.64)

सुखं निराशः स्वपिति नैराश्यं परमं सुखम् । आशामनाशां कृत्वा हि सुखं स्वपिति पिङ्गला ॥

sukhaṃ nirāśaḥ svapiti nairāśyaṃ paramaṃ sukham | āśāmanāśāṃ kṛtvā hi sukhaṃ svapiti piṅgalā

आशा से रहित मनुष्य सुख से सोता है; निराशा परम सुख है। आशा को अनाशा बनाकर पिङ्गला सुख से सोती है।

भीष्म उवाच

श्लोक 65 (12.173.65)

एतैश्चान्यैश्च विप्रस्य हेतुमद्भिः प्रभाषितैः । पर्यवस्थापितो राजा सेनजिन्मुमुदे सुखम् ॥

etaiścānyaiśca viprasya hetumadbhiḥ prabhāṣitaiḥ | paryavasthāpito rājā senajinmumude sukham

ब्राह्मण के इन और अन्य युक्तिपूर्ण वचनों से राजा सेनजित् स्थिर हो गया और सुखी हुआ।

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