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शान्ति पर्व · अध्याय 174

मेधावी का पिता को तुरन्त धर्म-पालन का उपदेश

युधिष्ठिर पूछते हैं कि सब प्राणियों का क्षय करते हुए बीतते काल में मनुष्य को क्या करना चाहिए। भीष्म युवा मेधावी की कथा सुनाते हैं, जो पिता के इस उपदेश के उत्तर में कि पहले विवाह करे, अग्नियाँ स्थापित करे और तब वन जाए, यह कहता है कि मृत्यु सदा समीप है; जो कल्याणकारी है वह आज ही करना चाहिए, और सत्य, अहिंसा तथा गाँव की आसक्ति के त्याग से ही मृत्यु को जीता जा सकता है। अन्त में भीष्म बताते हैं कि पिता ने पुत्र की बात मानी।

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.174.1)

अतिक्रामति कालेऽस्मिन्सर्वभूतक्षयावहे । किं श्रेयः प्रतिपद्येत तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

atikrāmati kāle'sminsarvabhūtakṣayāvahe | kiṃ śreyaḥ pratipadyeta tanme brūhi pitāmaha

समस्त प्राणियों का क्षय करने वाला यह काल बीतता जा रहा है; ऐसे में मनुष्य किस कल्याणकारी मार्ग को अपनाए? हे पितामह, मुझे यह बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.174.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पितुः पुत्रेण संवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | pituḥ putreṇa saṃvādaṃ taṃ nibodha yudhiṣṭhira

इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, पिता और पुत्र का संवाद। हे युधिष्ठिर, उसे सुनो।

श्लोक 3 (12.174.3)

द्विजातेः कस्यचित्पार्थ स्वाध्यायनिरतस्य वै । बभूव पुत्रो मेधावी मेधावीनाम नामतः ॥

dvijāteḥ kasyacitpārtha svādhyāyaniratasya vai | babhūva putro medhāvī medhāvīnāma nāmataḥ

हे पार्थ, वेदाध्ययन में लगे हुए किसी ब्राह्मण के एक बुद्धिमान पुत्र हुआ, जिसका नाम मेधावी था।

श्लोक 4 (12.174.4)

सोऽब्रवीत्पितरं पुत्रः स्वाध्यायकरणे रतम् । मोक्षधर्मार्थकुशलो लोकतन्त्रविचक्षणः ॥

so'bravītpitaraṃ putraḥ svādhyāyakaraṇe ratam | mokṣadharmārthakuśalo lokatantravicakṣaṇaḥ

मोक्षधर्म के अर्थ में कुशल और लोक-व्यवहार के जानकार उस पुत्र ने स्वाध्याय में लगे हुए अपने पिता से कहा।

पुत्र उवाच

श्लोक 5 (12.174.5)

धीरः किंस्वित्तात कुर्यात्प्रजानन् । क्षिप्रं ह्यायुर्भ्रश्यते मानवानाम् । पितस्तदाचक्ष्व यथार्थयोगं । ममानुपूर्व्या येन धर्मं चरेयम् ॥

dhīraḥ kiṃsvittāta kuryātprajānan | kṣipraṃ hyāyurbhraśyate mānavānām | pitastadācakṣva yathārthayogaṃ | mamānupūrvyā yena dharmaṃ careyam

हे पिताजी, मनुष्यों की आयु शीघ्र ही क्षीण हो जाती है, यह जानने वाला धीर पुरुष क्या करे? पिताजी, मुझे क्रमशः और यथार्थ रूप से बताइए कि मैं किस प्रकार धर्म का आचरण करूँ।

पितोवाच

श्लोक 6 (12.174.6)

वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्र । पुत्रानिच्छेत्पावनार्थं पितृणाम् । अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो । वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत् ॥

vedānadhītya brahmacaryeṇa putra | putrānicchetpāvanārthaṃ pitṛṇām | agnīnādhāya vidhivacceṣṭayajño | vanaṃ praviśyātha munirbubhūṣet

पुत्र, ब्रह्मचर्य के साथ वेदों का अध्ययन करके पितरों को पवित्र करने के लिए पुत्रों की इच्छा करनी चाहिए; फिर विधिपूर्वक अग्नियों की स्थापना और यज्ञ करके वन में प्रवेश करना चाहिए और मुनि होने की इच्छा करनी चाहिए।

पुत्र उवाच

श्लोक 7 (12.174.7)

एवमभ्याहते लोके समन्तात्परिवारिते । अमोघासु पतन्तीषु किं धीर इव भाषसे ॥

evamabhyāhate loke samantātparivārite | amoghāsu patantīṣu kiṃ dhīra iva bhāṣase

जब संसार इस प्रकार चारों ओर से आहत और घिरा हुआ है और अमोघ रात्रियाँ बीतती जा रही हैं, तब आप अविचल पुरुष की तरह क्यों बोल रहे हैं?

पितोवाच

श्लोक 8 (12.174.8)

कथमभ्याहतो लोकः केन वा परिवारितः । अमोघाः काः पतन्तीह किंनु भीषयसीव माम् ॥

kathamabhyāhato lokaḥ kena vā parivāritaḥ | amoghāḥ kāḥ patantīha kiṃnu bhīṣayasīva mām

संसार कैसे आहत है और किससे घिरा हुआ है? यहाँ कौन-सी अमोघ वस्तुएँ बीत रही हैं? तुम मुझे डरा-से क्यों रहे हो?

पुत्र उवाच

श्लोक 9 (12.174.9)

मृत्युनाभ्याहतो लोको जरया परिवारितः । अहोरात्राः पतन्त्येते ननु कस्मान्न बुध्यसे । अमोघा रात्रयश्चापि नित्यमायान्ति यान्ति च ॥

mṛtyunābhyāhato loko jarayā parivāritaḥ | ahorātrāḥ patantyete nanu kasmānna budhyase | amoghā rātrayaścāpi nityamāyānti yānti ca

संसार मृत्यु से आहत है और जरा से घिरा हुआ है। ये दिन-रात बीत रहे हैं; आप यह क्यों नहीं समझते? रात्रियाँ भी अमोघ हैं; वे सदा आती और जाती रहती हैं।

पितोवाच

श्लोक 10 (12.174.10)

यथाऽहमेतज्जानामि न मृत्युस्तिष्ठतीति ह । सोऽहं कथं प्रतीक्षिष्ये जालेनेवावृतश्चरन् ॥

yathā'hametajjānāmi na mṛtyustiṣṭhatīti ha | so'haṃ kathaṃ pratīkṣiṣye jālenevāvṛtaścaran

मैं यह जानता हूँ कि मृत्यु रुकती नहीं है; फिर जाल में लिपटे हुए की तरह घूमते हुए मैं प्रतीक्षा कैसे करूँ?

पुत्र उवाच

श्लोक 11 (12.174.11)

रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं यदा । तदैव बन्ध्यं दिवसमिति विन्द्याद्विचक्षणः ॥

rātryāṃ rātryāṃ vyatītāyāmāyuralpataraṃ yadā | tadaiva bandhyaṃ divasamiti vindyādvicakṣaṇaḥ

जब रात-रात बीतने पर आयु और भी थोड़ी रह जाती है, तब विवेकी पुरुष उसी दिन को निष्फल समझे।

श्लोक 12 (12.174.12)

गाधोदके मत्स्य इव सुखं विन्देत कस्तदा । अनवाप्तेषु कामेषु मृत्युरभ्येति मानवम् ॥

gādhodake matsya iva sukhaṃ vindeta kastadā | anavāpteṣu kāmeṣu mṛtyurabhyeti mānavam

तब उथले जल की मछली की तरह कौन सुख पा सकता है? कामनाएँ अधूरी ही रहती हैं और मृत्यु मनुष्य के पास आ पहुँचती है।

श्लोक 13 (12.174.13)

पुष्पाणीव विचिन्वन्तमन्यत्र गतमानसम् । वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ॥

puṣpāṇīva vicinvantamanyatra gatamānasam | vṛkīvoraṇamāsādya mṛtyurādāya gacchati

फूल चुनते हुए-से, कहीं और मन लगाए हुए मनुष्य को मृत्यु पकड़ ले जाती है, जैसे भेड़िन भेड़ को पकड़कर ले जाती है।

श्लोक 14 (12.174.14)

अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगादयम् । अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै संप्रकर्षति ॥

adyaiva kuru yacchreyo mā tvāṃ kālo'tyagādayam | akṛteṣveva kāryeṣu mṛtyurvai saṃprakarṣati

जो कल्याणकारी है उसे आज ही कर लो; यह समय तुम्हें लाँघकर न चला जाए। कर्म अधूरे ही रहते हैं और मृत्यु खींच ले जाती है।

श्लोक 15 (12.174.15)

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् । नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम् ॥

śvaḥ kāryamadya kurvīta pūrvāhṇe cāparāhṇikam | nahi pratīkṣate mṛtyuḥ kṛtamasya na vā kṛtam

कल का काम आज कर लो और अपराह्न का काम पूर्वाह्न में। मृत्यु यह नहीं देखती कि इसका काम पूरा हुआ या नहीं।

श्लोक 16 (12.174.16)

को हि जानाति कस्याद्य मृत्युकालो भविष्यति । युवैव धर्मशीलः स्यादनित्यं खलु जीवितम् । कृते धर्मे भवेत्कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम् ॥

ko hi jānāti kasyādya mṛtyukālo bhaviṣyati | yuvaiva dharmaśīlaḥ syādanityaṃ khalu jīvitam | kṛte dharme bhavetkīrtiriha pretya ca vai sukham

कौन जानता है कि आज किसकी मृत्यु की घड़ी आएगी? जीवन निश्चय ही अनित्य है, इसलिए मनुष्य युवावस्था में ही धर्मशील हो। धर्म करने पर यहाँ कीर्ति और परलोक में सुख होता है।

श्लोक 17 (12.174.17)

मोहेन हि समाविष्टः पुत्रदारार्थमुद्यतः । कृत्वा कार्यमकार्यं वा पुष्टिमेषां प्रयच्छति ॥

mohena hi samāviṣṭaḥ putradārārthamudyataḥ | kṛtvā kāryamakāryaṃ vā puṣṭimeṣāṃ prayacchati

मोह से ग्रस्त होकर वह स्त्री-पुत्रों के लिए उद्यत रहता है और काम चाहे करने योग्य हो या न हो, उसे करके इनका पोषण करता है।

श्लोक 18 (12.174.18)

तं पुत्रपशुसंपन्नं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं व्याघ्रो मृगमिव मृत्युरादाय गच्छति ॥

taṃ putrapaśusaṃpannaṃ vyāsaktamanasaṃ naram | suptaṃ vyāghro mṛgamiva mṛtyurādāya gacchati

पुत्र और पशुओं से सम्पन्न, उन्हीं में मन लगाए हुए ऐसे मनुष्य को मृत्यु उठा ले जाती है, जैसे बाघ सोए हुए हिरन को।

श्लोक 19 (12.174.19)

संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवादाय मृत्युरादाय गच्छति ॥

saṃcinvānakamevainaṃ kāmānāmavitṛptakam | vyāghraḥ paśumivādāya mṛtyurādāya gacchati

जो सदा संचय करता रहता है और कामनाओं से कभी तृप्त नहीं होता, उसे मृत्यु उठा ले जाती है, जैसे बाघ अपने शिकार को।

श्लोक 20 (12.174.20)

इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम् । एवमीहासुखासक्तं कृतान्तः कुरुते वशे ॥

idaṃ kṛtamidaṃ kāryamidamanyatkṛtākṛtam | evamīhāsukhāsaktaṃ kṛtāntaḥ kurute vaśe

'यह किया, यह करना है, यह दूसरा आधा किया हुआ है'—इस प्रकार चेष्टा के सुख में आसक्त मनुष्य को यम अपने वश में कर लेता है।

श्लोक 21 (12.174.21)

कृतानां फलमप्राप्तं कर्मणां कर्मसंज्ञितम् । क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादाय गच्छति ॥

kṛtānāṃ phalamaprāptaṃ karmaṇāṃ karmasaṃjñitam | kṣetrāpaṇagṛhāsaktaṃ mṛtyurādāya gacchati

जिसके कर्मों का फल अभी प्राप्त नहीं हुआ, जो अपने कर्म के अनुसार नाम पाया हुआ है और खेत, हाट तथा घर में आसक्त है, उसे मृत्यु उठा ले जाती है।

श्लोक 22 (12.174.22)

दुर्बलं बलवन्तं च शूरं भीरुं जडं कविम् । अप्राप्तं सर्वकामार्थान्मृत्युरादाय गच्छति ॥

durbalaṃ balavantaṃ ca śūraṃ bhīruṃ jaḍaṃ kavim | aprāptaṃ sarvakāmārthānmṛtyurādāya gacchati

दुर्बल हो या बलवान, शूर हो या कायर, मूर्ख हो या विद्वान, सभी को उनके सब मनोरथ पूरे होने से पहले ही मृत्यु उठा ले जाती है।

श्लोक 23 (12.174.23)

मृत्युर्जरा च व्याधिश्च दुःखं चानेककारणम् । अनुषक्तं यदा देहे किं स्वस्थ इव तिष्ठसि ॥

mṛtyurjarā ca vyādhiśca duḥkhaṃ cānekakāraṇam | anuṣaktaṃ yadā dehe kiṃ svastha iva tiṣṭhasi

मृत्यु, जरा, रोग और अनेक कारणों वाला दुःख जब शरीर के साथ लगे हुए हैं, तब तुम स्वस्थ की तरह कैसे बैठे हो?

श्लोक 24 (12.174.24)

जातमेवान्तकोऽन्ताय जरा चान्वेति देहिनम् । अनुषक्ता द्वयेनैते भावाः स्थावरजङ्गमाः ॥

jātamevāntako'ntāya jarā cānveti dehinam | anuṣaktā dvayenaite bhāvāḥ sthāvarajaṅgamāḥ

जन्म लेते ही यम अन्त करने के लिए और जरा देहधारी के पीछे लग जाती है; ये दोनों चर और अचर सभी प्राणियों से जुड़े हैं।

श्लोक 25 (12.174.25)

मृत्योर्वा मुखमेतद्वै या ग्रामे वसतो रतिः । देवानामेष वै गोष्ठो यदरण्यमिति श्रुतिः ॥

mṛtyorvā mukhametadvai yā grāme vasato ratiḥ | devānāmeṣa vai goṣṭho yadaraṇyamiti śrutiḥ

गाँव में रहने वाले की जो आसक्ति है, वही मृत्यु का मुख है; और वन देवताओं का निवासस्थान है, ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 26 (12.174.26)

निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः । छित्त्वैनां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ॥

nibandhanī rajjureṣā yā grāme vasato ratiḥ | chittvaināṃ sukṛto yānti naināṃ chindanti duṣkṛtaḥ

गाँव में रहने वाले की यह आसक्ति बाँधने वाली रस्सी है; पुण्यात्मा इसे काटकर चले जाते हैं, पापी इसे नहीं काटते।

श्लोक 27 (12.174.27)

न हिंसयति यो जन्तून्मनोवाक्कायहेतुभिः । जीवितार्थापनयनैः प्राणिभिर्न स हिंस्यते ॥

na hiṃsayati yo jantūnmanovākkāyahetubhiḥ | jīvitārthāpanayanaiḥ prāṇibhirna sa hiṃsyate

जो मन, वाणी और शरीर के साधनों से, तथा जीवन और धन छीनने वाले उपायों से प्राणियों की हिंसा नहीं करता, उसकी हिंसा प्राणी नहीं करते।

श्लोक 28 (12.174.28)

न मृत्युसेनामायान्तीं जातु कश्चित्प्रबाधते । ऋते सत्यमसंत्याज्यं सत्ये ह्यमृतमाश्रितम् ॥

na mṛtyusenāmāyāntīṃ jātu kaścitprabādhate | ṛte satyamasaṃtyājyaṃ satye hyamṛtamāśritam

आती हुई मृत्यु की सेना को कोई नहीं रोक सकता, सिवा सत्य के, जिसे छोड़ा नहीं जा सकता; क्योंकि अमृत सत्य में ही आश्रित है।

श्लोक 29 (12.174.29)

तस्मात्सत्यव्रताचारः सत्ययोगपरायणः । सत्यागमः सदा दान्तः सत्येनैवान्तकं जयेत् ॥

tasmātsatyavratācāraḥ satyayogaparāyaṇaḥ | satyāgamaḥ sadā dāntaḥ satyenaivāntakaṃ jayet

इसलिए मनुष्य सत्य के व्रत और आचरण वाला, सत्ययोग में तत्पर, सत्य को ही शास्त्र मानने वाला और सदा जितेन्द्रिय हो; वह सत्य से ही मृत्यु को जीत सकता है।

श्लोक 30 (12.174.30)

अमृतं चैव मृत्युश्च द्वयं देहे प्रतिष्ठितम् । मृत्युरापद्यते मोहात्सत्येनापद्यतेऽमृतम् ॥

amṛtaṃ caiva mṛtyuśca dvayaṃ dehe pratiṣṭhitam | mṛtyurāpadyate mohātsatyenāpadyate'mṛtam

अमृत और मृत्यु दोनों देह में स्थित हैं; मोह से मृत्यु प्राप्त होती है और सत्य से अमृत।

श्लोक 31 (12.174.31)

सोऽहं ह्यहिंस्रः सत्यार्थी कामक्रोधबहिष्कृतः । समदुःखसुखः क्षेमी मृत्युं हास्याम्यमर्त्यवत् ॥

so'haṃ hyahiṃsraḥ satyārthī kāmakrodhabahiṣkṛtaḥ | samaduḥkhasukhaḥ kṣemī mṛtyuṃ hāsyāmyamartyavat

वही मैं अहिंसक, सत्य का अभिलाषी, काम और क्रोध से रहित, सुख-दुःख में सम और कुशल रहकर मृत्यु को ऐसे छोड़ दूँगा जैसे कोई अमर छोड़ दे।

श्लोक 32 (12.174.32)

शान्तियज्ञरतो दान्तो ब्रह्मयज्ञे स्थितो मुनिः । वाङ्मनः कर्मयज्ञश्च भविष्याम्युदगायने ॥

śāntiyajñarato dānto brahmayajñe sthito muniḥ | vāṅmanaḥ karmayajñaśca bhaviṣyāmyudagāyane

शान्तिरूप यज्ञ में रत, जितेन्द्रिय और ब्रह्मयज्ञ में स्थित मुनि होकर मैं वाणी, मन और कर्म का यज्ञ करने वाला बनूँगा, उत्तरायण में।

श्लोक 33 (12.174.33)

पशुयज्ञैः कथं हिंस्रैर्मादृशो यष्टुमर्हति । अन्तवद्भिरिव प्राज्ञः क्षेत्रयज्ञैः पिशाचवत् ॥

paśuyajñaiḥ kathaṃ hiṃsrairmādṛśo yaṣṭumarhati | antavadbhiriva prājñaḥ kṣetrayajñaiḥ piśācavat

मुझ जैसा मनुष्य हिंसा से भरे पशुयज्ञों से यज्ञ कैसे कर सकता है? नश्वर फल वाले क्षेत्रयज्ञों से यज्ञ करने वाला ज्ञानी पिशाच के समान होगा।

श्लोक 34 (12.174.34)

यस्य वाङ्मनसी स्यातां सम्यक्प्रणिहिते सदा । तपस्त्यागश्च सत्यं च स वै सर्वमवाप्नुयात् ॥

yasya vāṅmanasī syātāṃ samyakpraṇihite sadā | tapastyāgaśca satyaṃ ca sa vai sarvamavāpnuyāt

जिसकी वाणी और मन सदा भली-भाँति संयत रहते हैं, उसे तप, त्याग और सत्य, सब कुछ प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 35 (12.174.35)

नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥

nāsti vidyāsamaṃ cakṣurnāsti satyasamaṃ tapaḥ | nāsti rāgasamaṃ duḥkhaṃ nāsti tyāgasamaṃ sukham

विद्या के समान कोई नेत्र नहीं, सत्य के समान कोई तप नहीं; राग के समान कोई दुःख नहीं और त्याग के समान कोई सुख नहीं।

श्लोक 36 (12.174.36)

आत्मन्येवात्मना जात आत्मनिष्ठोऽप्रजोऽपि वा । आत्मन्येव भविष्यामि न मां तारयति प्रजा ॥

ātmanyevātmanā jāta ātmaniṣṭho'prajo'pi vā | ātmanyeva bhaviṣyāmi na māṃ tārayati prajā

आत्मा से, आत्मा में उत्पन्न और आत्मनिष्ठ होकर, सन्तानहीन होने पर भी, मैं आत्मा में ही स्थित रहूँगा; सन्तान मुझे पार नहीं उतारती।

श्लोक 37 (12.174.37)

नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं । यथैकता समता सत्यता च । शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं । ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥

naitādṛśaṃ brāhmaṇasyāsti vittaṃ | yathaikatā samatā satyatā ca | śīlaṃ sthitirdaṇḍanidhānamārjavaṃ | tatastataścoparamaḥ kriyābhyaḥ

ब्राह्मण के लिए ऐसा धन और कोई नहीं जैसा एकता, समता, सत्यता, शील, स्थिरता, दण्ड का त्याग और सरलता है, और फिर कर्मों से उपरति।

श्लोक 38 (12.174.38)

किं ते धनैर्बान्धवैर्वापि किं ते । किं ते दारैर्ब्राह्मण यो मरिष्यसि । आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं । पितामहास्ते क्व गताः पिता च ॥

kiṃ te dhanairbāndhavairvāpi kiṃ te | kiṃ te dārairbrāhmaṇa yo mariṣyasi | ātmānamanviccha guhāṃ praviṣṭaṃ | pitāmahāste kva gatāḥ pitā ca

हे ब्राह्मण, तुम्हें धन, बन्धु-बान्धव और स्त्रियों से क्या लाभ, जब तुम्हें मरना ही है? हृदय की गुफा में प्रविष्ट आत्मा को खोजो। तुम्हारे पितामह कहाँ गए, और तुम्हारे पिता कहाँ?

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (12.174.39)

पुत्रस्यैतद्वचः श्रुत्वा यथाऽकार्षीत्पिता नृप । तथा त्वमपि वर्तस्व सत्यधर्मपरायणः ॥

putrasyaitadvacaḥ śrutvā yathā'kārṣītpitā nṛpa | tathā tvamapi vartasva satyadharmaparāyaṇaḥ

पुत्र की यह बात सुनकर पिता ने जैसा किया, हे राजन्, तुम भी वैसा ही करो और सत्य तथा धर्म में तत्पर रहो।

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