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शान्ति पर्व · अध्याय 175

शम्याक का निर्धनता और धन पर गीत

धनी और निर्धन के पास सुख-दुःख कैसे आते हैं, यह पूछे जाने पर भीष्म त्यागी ब्राह्मण शम्याक का गीत सुनाते हैं। अकिंचनता से सुख और स्वतन्त्रता मिलती है, जबकि धन से भय, अभिमान और विनाश उत्पन्न होते हैं; सब कुछ त्यागने से ही स्थायी सुख मिलता है।

अध्याय 174अध्याय-सूचीअध्याय 176

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.175.1)

धनिनश्चाधना ये च वर्तयन्ति स्वतन्त्रिणः । सुखदुःखागमस्तेषां कः कथं वा पितामह ॥

dhaninaścādhanā ye ca vartayanti svatantriṇaḥ | sukhaduḥkhāgamasteṣāṃ kaḥ kathaṃ vā pitāmaha

जो धनी हैं और जो निर्धन हैं, जो अपनी इच्छा से जीवन चलाते हैं, उनके लिए सुख-दुःख का आना क्या है और कैसे होता है, हे पितामह?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.175.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शम्याकेन विमुक्तेन गीतं शान्तिगतेन च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | śamyākena vimuktena gītaṃ śāntigatena ca

इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, मुक्त और शान्त हुए शम्याक का गाया हुआ गीत।

श्लोक 3 (12.175.3)

अब्रवीन्मां पुरा कश्चिद्ब्राह्मणस्त्यागमाश्रितः । क्लिश्यमानः कुदारेण कुचेलेन बुभुक्षया ॥

abravīnmāṃ purā kaścidbrāhmaṇastyāgamāśritaḥ | kliśyamānaḥ kudāreṇa kucelena bubhukṣayā

पूर्वकाल में त्याग का आश्रय लेने वाले एक ब्राह्मण ने मुझसे कहा; वह दुष्ट पत्नी, फटे वस्त्रों और भूख से पीड़ित था।

शम्याक उवाच

श्लोक 4 (12.175.4)

उत्पन्नमिह लोके वै जन्मप्रभृति मानवम् । विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥

utpannamiha loke vai janmaprabhṛti mānavam | vividhānyupavartante duḥkhāni ca sukhāni ca

इस लोक में उत्पन्न मनुष्य के सामने जन्म से ही अनेक प्रकार के दुःख और सुख आते रहते हैं।

श्लोक 5 (12.175.5)

तयोरेकतरो मार्गो यदेनमुपसन्नयेत् । न सुखं प्राप्य संहृष्येन्नासुखं प्राप्य संज्वरेत् ॥

tayorekataro mārgo yadenamupasannayet | na sukhaṃ prāpya saṃhṛṣyennāsukhaṃ prāpya saṃjvaret

इन दोनों में से जिस मार्ग पर भी दैव उसे ले जाए, उस पर सुख पाकर वह हर्ष से फूल न उठे और दुःख पाकर सन्ताप से न जले।

श्लोक 6 (12.175.6)

न वै चरसि यच्छ्रेय आत्मनो वा न रंस्यसे । अकामात्माऽपि हि सदा धुरमुद्यम्य चैव ह ॥

na vai carasi yacchreya ātmano vā na raṃsyase | akāmātmā'pi hi sadā dhuramudyamya caiva ha

तुम न तो अपने लिए जो श्रेयस्कर है उसका आचरण करते हो, न तुम्हें आनन्द मिलेगा; क्योंकि कामना से रहित मनुष्य भी सदा बोझ उठाकर उद्योग करता रहता है।

श्लोक 7 (12.175.7)

अकिञ्चनः परिपतन्सुखमास्वादयिष्यसि । अकिञ्चनः सुखं शेते समुत्तिष्ठति चैव ह ॥

akiñcanaḥ paripatansukhamāsvādayiṣyasi | akiñcanaḥ sukhaṃ śete samuttiṣṭhati caiva ha

अकिंचन होकर स्वच्छन्द विचरते हुए तुम सुख का स्वाद लोगे; जिसके पास कुछ नहीं है, वह सुख से सोता है और सुख से उठता है।

श्लोक 8 (12.175.8)

आकिञ्चन्यं सुखं लोके पथ्यं शिवमनामयम् । अनमित्रपथो ह्येष दुर्लभः सुलभः सताम् ॥

ākiñcanyaṃ sukhaṃ loke pathyaṃ śivamanāmayam | anamitrapatho hyeṣa durlabhaḥ sulabhaḥ satām

संसार में अकिंचनता सुख है; वह हितकर, कल्याणकारी और निरोग है। यह शत्रुरहित मार्ग है, जो दूसरों के लिए दुर्लभ है पर सज्जनों के लिए सुलभ।

श्लोक 9 (12.175.9)

अकिञ्चनस्य शुद्धस्य उपपन्नस्य सर्वतः । अवेक्षमाणस्त्रील्लोँकान्न तुल्यमिह लक्षये ॥

akiñcanasya śuddhasya upapannasya sarvataḥ | avekṣamāṇastrīllom̐kānna tulyamiha lakṣaye

तीनों लोकों पर दृष्टि डालने पर भी मैं अकिंचन, शुद्ध और सब प्रकार से सम्पन्न पुरुष के समान किसी को यहाँ नहीं देखता।

श्लोक 10 (12.175.10)

आकिञ्चन्यं च राज्यं च तुलया समतोलयम् । अत्यरिच्यत दारिद्र्यं राज्यादपि गुणाधिकम् ॥

ākiñcanyaṃ ca rājyaṃ ca tulayā samatolayam | atyaricyata dāridryaṃ rājyādapi guṇādhikam

मैंने अकिंचनता और राज्य को तराजू पर तौला; दरिद्रता राज्य से भी बढ़कर निकली, क्योंकि वह गुणों में अधिक है।

श्लोक 11 (12.175.11)

आकिञ्चन्ये च राज्ये च विशेषः सुमहानयम् । नित्योद्विग्नो हि धनवान्मृत्योरास्यगतो यथा ॥

ākiñcanye ca rājye ca viśeṣaḥ sumahānayam | nityodvigno hi dhanavānmṛtyorāsyagato yathā

अकिंचनता और राज्य में बहुत बड़ा अन्तर है; धनवान सदा उद्विग्न रहता है, मानो मृत्यु के मुख में पड़ा हो।

श्लोक 12 (12.175.12)

नैवास्याग्निर्न चादित्यो न मृत्युर्न च दस्यवः । प्रभवन्ति धनं हर्तुमितरे स्युः कुतः पुनः ॥

naivāsyāgnirna cādityo na mṛtyurna ca dasyavaḥ | prabhavanti dhanaṃ hartumitare syuḥ kutaḥ punaḥ

न अग्नि, न सूर्य, न मृत्यु और न चोर उसका धन हर सकते हैं; फिर दूसरों की तो बात ही क्या?

श्लोक 13 (12.175.13)

तं वै सदा कामचरमनुपस्तीर्णशायिनम् । बाहूपधानं शाम्यन्तं प्रशंसन्ति दिवौकसः ॥

taṃ vai sadā kāmacaramanupastīrṇaśāyinam | bāhūpadhānaṃ śāmyantaṃ praśaṃsanti divaukasaḥ

जो सदा इच्छानुसार विचरता है, बिना बिछौने के सोता है, भुजा को तकिया बनाता है और शान्त रहता है, उसकी देवता प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 14 (12.175.14)

धनवान्क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्टचेतनः । तिर्यग्दृष्टिः शुष्कमुखः पापको भ्रुकुटीमुखः ॥

dhanavānkrodhalobhābhyāmāviṣṭo naṣṭacetanaḥ | tiryagdṛṣṭiḥ śuṣkamukhaḥ pāpako bhrukuṭīmukhaḥ

धनवान क्रोध और लोभ से ग्रस्त होकर चेतना खो देता है; उसकी दृष्टि तिरछी, मुख सूखा, रूप पापी और भौंहें तनी रहती हैं।

श्लोक 15 (12.175.15)

निर्दशन्नधरोष्ठं च क्रुद्धो दारुणभाषिता । कस्तमिच्छेत्परिद्रष्टुं दातुमिच्छति चेन्महीम् ॥

nirdaśannadharoṣṭhaṃ ca kruddho dāruṇabhāṣitā | kastamicchetparidraṣṭuṃ dātumicchati cenmahīm

वह निचला होंठ चबाता है, क्रोध में रहता है और कठोर बोलता है; यदि वह पृथ्वी भी दे देना चाहे, तो भी कौन उसे देखना चाहेगा?

श्लोक 16 (12.175.16)

श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो मोहयत्यविचक्षणम् । सा तस्य चित्तं हरति शारदाभ्रमिवानिलः ॥

śriyā hyabhīkṣṇaṃ saṃvāso mohayatyavicakṣaṇam | sā tasya cittaṃ harati śāradābhramivānilaḥ

लक्ष्मी के साथ निरन्तर रहना अविवेकी को मोह में डाल देता है; वह उसके चित्त को वैसे ही हर लेती है जैसे वायु शरद् ऋतु के बादल को।

श्लोक 17 (12.175.17)

अथैनं रूपमानश्च धनमानश्च विन्दति । अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः । इत्येभिः कारणैस्तस्य त्रिभिश्चित्तं प्रमाद्यति ॥

athainaṃ rūpamānaśca dhanamānaśca vindati | abhijāto'smi siddho'smi nāsmi kevalamānuṣaḥ | ityebhiḥ kāraṇaistasya tribhiścittaṃ pramādyati

फिर उसे रूप का अभिमान और धन का अभिमान घेर लेता है: 'मैं कुलीन हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं केवल साधारण मनुष्य नहीं हूँ।' इन तीन कारणों से उसका चित्त बिगड़ जाता है।

श्लोक 18 (12.175.18)

संप्रसक्तमना भोगान्विसृज्य पितृसंचितान् । परिक्षीणः परस्वानामादानं साधु मन्यते ॥

saṃprasaktamanā bhogānvisṛjya pitṛsaṃcitān | parikṣīṇaḥ parasvānāmādānaṃ sādhu manyate

भोगों में मन लगाकर वह पितरों के संचित भोगों को उड़ा देता है; क्षीण होने पर वह दूसरों का धन छीनने को अच्छा मानने लगता है।

श्लोक 19 (12.175.19)

तमतिक्रान्तमर्यादमाददानं ततस्ततः । प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभिः ॥

tamatikrāntamaryādamādadānaṃ tatastataḥ | pratiṣedhanti rājāno lubdhā mṛgamiveṣubhiḥ

मर्यादा लाँघकर इधर-उधर से छीनते हुए उसे लोभी राजा वैसे ही रोकते हैं जैसे बाणों से हिरन को।

श्लोक 20 (12.175.20)

एवमेतानि दुःखानि तानि तानीह मानवम् । विविधान्युपवर्तन्ते गात्रसंस्पर्शजान्यपि ॥

evametāni duḥkhāni tāni tānīha mānavam | vividhānyupavartante gātrasaṃsparśajānyapi

इस प्रकार ये और वे अनेक दुःख मनुष्य पर आते हैं, यहाँ तक कि शरीर के स्पर्श से उत्पन्न भी।

श्लोक 21 (12.175.21)

तेषां परमदुःखानां बुद्ध्या भैषज्यमाचरेत् । लोकधर्मं समाज्ञाय ध्रुवाणामध्रुवैः सह ॥

teṣāṃ paramaduḥkhānāṃ buddhyā bhaiṣajyamācaret | lokadharmaṃ samājñāya dhruvāṇāmadhruvaiḥ saha

इन भारी दुःखों का उपचार बुद्धि से करे, लोक के स्वभाव को जानकर, जिसमें स्थिर वस्तुएँ अस्थिर के साथ जुड़ी हैं।

श्लोक 22 (12.175.22)

नात्यक्त्वा सुखमाप्नोति नात्यक्त्वा विन्दते परम् । नात्यक्त्वा चाभयः शेते त्यक्त्वा सर्वं सुखी भवेत् ॥

nātyaktvā sukhamāpnoti nātyaktvā vindate param | nātyaktvā cābhayaḥ śete tyaktvā sarvaṃ sukhī bhavet

बिना त्यागे सुख नहीं मिलता, बिना त्यागे परम की प्राप्ति नहीं होती, बिना त्यागे कोई निर्भय होकर नहीं सोता। सब कुछ त्यागकर मनुष्य सुखी होता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 23 (12.175.23)

इत्येतद्धास्तिनपुरे ब्राह्मणेनोपवर्णितम् । शम्याकेन पुरा मह्यं तस्मात्त्यागः परो मतः ॥

ityetaddhāstinapure brāhmaṇenopavarṇitam | śamyākena purā mahyaṃ tasmāttyāgaḥ paro mataḥ

यह बात पूर्वकाल में हस्तिनापुर में ब्राह्मण शम्याक ने मुझे बताई थी; इसीलिए त्याग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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