शान्ति पर्व · अध्याय 176
मङ्कि का गीत और बोध्य के छह गुरु
युधिष्ठिर पूछते हैं कि धन के लिए व्यर्थ प्रयत्न करने वाला मनुष्य सुख कैसे पाए। भीष्म बताते हैं कि दो बछड़ों को ऊँट के ले जाने पर मङ्कि ने कामना त्यागकर शान्ति पाई, और जनक का अकिंचनता पर कहा हुआ श्लोक उद्धृत करते हैं। फिर वे ऋषि बोध्य के छह गुरुओं, पिङ्गला, कुरर, सर्प, सारंग, बाण बनाने वाले और कुमारी, तथा उनसे मिलने वाली शिक्षा का परिचय देते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.176.1)
ईहमानः समारम्भान्यदि नासादयेद्धनम् । धनतृष्णाभिभूतश्च किं कुर्वन्सुखमाप्नुयात् ॥
īhamānaḥ samārambhānyadi nāsādayeddhanam | dhanatṛṣṇābhibhūtaśca kiṃ kurvansukhamāpnuyāt
यदि कोई मनुष्य प्रयत्न करने पर भी धन न पाए और धन की तृष्णा से दबा हुआ हो, तो वह क्या करने से सुख पाएगा?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.176.2)
सर्वसाम्यमनायासः सत्यवाक्यं च भारत । निर्वेदश्चाविधित्सा च यस्य स्यात्स सुखी नरः ॥
sarvasāmyamanāyāsaḥ satyavākyaṃ ca bhārata | nirvedaścāvidhitsā ca yasya syātsa sukhī naraḥ
हे भारत, सबके प्रति समभाव, परिश्रम से मुक्ति, सत्य वचन, वैराग्य और कुछ पाने की इच्छा का अभाव, ये जिसमें हों, वही मनुष्य सुखी है।
श्लोक 3 (12.176.3)
एतान्येव पदान्याहुः पञ्च वृद्धाः प्रशान्तये । एष स्वर्गश्च धर्मश्च सुखं चानुत्तमं सताम् ॥
etānyeva padānyāhuḥ pañca vṛddhāḥ praśāntaye | eṣa svargaśca dharmaśca sukhaṃ cānuttamaṃ satām
वृद्धों ने शान्ति के लिए इन्हीं पाँच पदों को बताया है। यही स्वर्ग है, यही धर्म है और यही सज्जनों का सर्वोत्तम सुख है।
श्लोक 4 (12.176.4)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । निर्वेदान्मङ्किना गीतं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nirvedānmaṅkinā gītaṃ tannibodha yudhiṣṭhira
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, मङ्कि का वैराग्य से गाया हुआ गीत। हे युधिष्ठिर, उसे सुनो।
श्लोक 5 (12.176.5)
ईहमानो धनं मङ्किर्भग्नेहश्च पुनः पुनः । केनचिद्धनलेशेन क्रीतवान्दम्यगोयुगम् ॥
īhamāno dhanaṃ maṅkirbhagnehaśca punaḥ punaḥ | kenaciddhanaleśena krītavāndamyagoyugam
धन के लिए प्रयत्न करते हुए और बार-बार असफल होते हुए मङ्कि ने अपने बचे हुए थोड़े-से धन से सधाने योग्य बछड़ों की एक जोड़ी खरीदी।
श्लोक 6 (12.176.6)
सुसंबद्धौ तु तौ दम्यौ दमनायाभिनिःसृतौ । आसीनमुष्ट्रं मध्येन सहसैवाभ्यधावताम् ॥
susaṃbaddhau tu tau damyau damanāyābhiniḥsṛtau | āsīnamuṣṭraṃ madhyena sahasaivābhyadhāvatām
जुए में भली-भाँति जुते हुए वे दोनों बछड़े सधाने के लिए निकले और अचानक बीच रास्ते में बैठे हुए एक ऊँट की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 7 (12.176.7)
तयोः संप्राप्तयोरुष्ट्रः स्कन्धदेशममर्षणः । उत्थायोत्क्षिप्य तौ दम्यौ प्रससार महाजवः ॥
tayoḥ saṃprāptayoruṣṭraḥ skandhadeśamamarṣaṇaḥ | utthāyotkṣipya tau damyau prasasāra mahājavaḥ
जब वे दोनों पास पहुँचे, तब क्रोधित ऊँट उठा और उन दोनों बछड़ों को अपनी गर्दन पर उछालकर बड़े वेग से भाग चला।
श्लोक 8 (12.176.8)
ह्रियमाणौ तु तौ दम्यौ तेनोष्ट्रेण प्रमाथिना । म्रियमाणौ च संप्रेक्ष्य मङ्किस्तत्राब्रवीदिदम् ॥
hriyamāṇau tu tau damyau tenoṣṭreṇa pramāthinā | mriyamāṇau ca saṃprekṣya maṅkistatrābravīdidam
उस निर्दयी ऊँट द्वारा ले जाए जाते और मरते हुए उन दोनों बछड़ों को देखकर मङ्कि ने वहाँ यह कहा।
मङ्किरुवाच
श्लोक 9 (12.176.9)
न जात्वविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम् । युक्तेन श्रद्धया सम्यगीहां समनुतिष्ठता ॥
na jātvavihitaṃ śakyaṃ dakṣeṇāpīhituṃ dhanam | yuktena śraddhayā samyagīhāṃ samanutiṣṭhatā
जो विधान में नहीं है, ऐसा धन कुशल पुरुष भी नहीं पा सकता, चाहे वह सावधान रहकर श्रद्धापूर्वक और भली-भाँति प्रयत्न करे।
श्लोक 10 (12.176.10)
पूर्वमर्थैर्विहीनस्य युक्तस्याप्यनुतिष्ठतः । इमं पश्यत संगत्या मम दैवमुपप्लवम् ॥
pūrvamarthairvihīnasya yuktasyāpyanutiṣṭhataḥ | imaṃ paśyata saṃgatyā mama daivamupaplavam
देखो, पहले ही धन से रहित हो चुके और सावधान रहकर प्रयत्न करते हुए मुझ पर इस संयोग से दैव का यह कैसा संकट आ पड़ा है।
श्लोक 11 (12.176.11)
उद्यम्योद्यम्य मे दम्यौ विषमेणैव गच्छतः । उत्क्षिप्य काकतालीयमुन्माथेनेव जम्बुकः ॥
udyamyodyamya me damyau viṣameṇaiva gacchataḥ | utkṣipya kākatālīyamunmātheneva jambukaḥ
मेरे दोनों बछड़ों को बार-बार उठाकर वह ऊबड़-खाबड़ चाल से जा रहा है; उसने उन्हें संयोगवश ऐसे उछाल दिया है जैसे सियार किसी फन्दे से शिकार पकड़ ले।
श्लोक 12 (12.176.12)
मणीवोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरौ मम । शुद्धं हि दैवमेवेदं हठे नैवास्ति पौरुषम् ॥
maṇīvoṣṭrasya lambete priyau vatsatarau mama | śuddhaṃ hi daivamevedaṃ haṭhe naivāsti pauruṣam
मेरे दोनों प्रिय बछड़े ऊँट के गले में आभूषण की तरह लटक रहे हैं। यह केवल दैव है; बल-प्रयोग में पुरुषार्थ नहीं होता।
श्लोक 13 (12.176.13)
यदि वाऽप्युपपद्येत पौरुषं नाम कर्हिचित् । अन्विष्यमाणं तदपि दैवमेवावतिष्ठते ॥
yadi vā'pyupapadyeta pauruṣaṃ nāma karhicit | anviṣyamāṇaṃ tadapi daivamevāvatiṣṭhate
और यदि कभी पुरुषार्थ नाम की कोई वस्तु मिल भी जाए, तो खोजने पर वह भी दैव पर ही टिकी निकलती है।
श्लोक 14 (12.176.14)
तस्मान्निर्वेद एवेह गन्तव्यः सुखभीप्सता । सुखं स्वपिति निर्विण्णो निराशश्चार्थसाधने ॥
tasmānnirveda eveha gantavyaḥ sukhabhīpsatā | sukhaṃ svapiti nirviṇṇo nirāśaścārthasādhane
इसलिए सुख चाहने वाले को वैराग्य की ही ओर जाना चाहिए; विरक्त और धन-साधन में आशारहित मनुष्य सुख से सोता है।
श्लोक 15 (12.176.15)
अहो सम्यक्शुकेनोक्तं सर्वतः परिमुच्यता । प्रतिष्ठता महारण्यं जनकस्य निवेशनात् ॥
aho samyakśukenoktaṃ sarvataḥ parimucyatā | pratiṣṭhatā mahāraṇyaṃ janakasya niveśanāt
अहा, शुकदेव ने कितना ठीक कहा था, जब सब ओर से मुक्त होकर वे जनक के निवास से महावन की ओर चले!
श्लोक 16 (12.176.16)
यः कामानाप्नुयात्सर्वान्यश्चैतान्केवलांस्त्यजेत् । प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥
yaḥ kāmānāpnuyātsarvānyaścaitānkevalāṃstyajet | prāpaṇātsarvakāmānāṃ parityāgo viśiṣyate
जो सब कामनाओं को पा ले और जो उन्हें केवल त्याग दे, उनमें से सब कामनाओं को पाने की अपेक्षा परित्याग श्रेष्ठ है।
श्लोक 17 (12.176.17)
नान्तं सर्वविधित्सानां गतपूर्वोऽस्ति कश्चन । शरीरे जीविते चैव तृष्णा मर्त्यस्य वर्धते ॥
nāntaṃ sarvavidhitsānāṃ gatapūrvo'sti kaścana | śarīre jīvite caiva tṛṣṇā martyasya vardhate
आज तक कोई भी अपनी सब इच्छित योजनाओं का अन्त नहीं पा सका; शरीर और जीवन के विषय में मरणशील मनुष्य की तृष्णा बढ़ती ही जाती है।
श्लोक 18 (12.176.18)
निवर्तस्य विधित्साभ्यः शाम्य निर्विद्य कामुक । असकृच्चासि निकृतो न च निर्विद्यसे मनः ॥
nivartasya vidhitsābhyaḥ śāmya nirvidya kāmuka | asakṛccāsi nikṛto na ca nirvidyase manaḥ
हे कामी मन, योजनाओं से लौट आ, शान्त हो, विरक्त हो जा। तू बार-बार ठगा गया है, फिर भी विरक्त नहीं होता।
श्लोक 19 (12.176.19)
यदि नाहं विनाश्यस्ते यद्येवं रमसे मया । मा मां योजय लोभेन वृथा त्वं वित्तकामुक ॥
yadi nāhaṃ vināśyaste yadyevaṃ ramase mayā | mā māṃ yojaya lobhena vṛthā tvaṃ vittakāmuka
यदि मैं तेरे द्वारा नष्ट किए जाने योग्य नहीं हूँ, यदि तू सचमुच मुझमें रमता है, तो हे धनलोलुप, मुझे व्यर्थ लोभ में मत जोत।
श्लोक 20 (12.176.20)
संचितं संचितं द्रव्यं नष्टं तव पुनः पुनः । कदा तां मोक्ष्यसे मूढ धनेहां धनकामुक ॥
saṃcitaṃ saṃcitaṃ dravyaṃ naṣṭaṃ tava punaḥ punaḥ | kadā tāṃ mokṣyase mūḍha dhanehāṃ dhanakāmuka
तेरा बार-बार जोड़ा हुआ धन बार-बार नष्ट हुआ है। हे मूढ़ धनकामुक, धन की यह चेष्टा तू कब छोड़ेगा?
श्लोक 21 (12.176.21)
अहो नु मम बालिश्यं योऽहं क्रीडनकस्तव । क्लेशैर्नानाविधैर्नित्यं संयोजयसि निर्घृणः । किं नैवं जातु पुरुषः परेषां प्रेष्यतामियात् ॥
aho nu mama bāliśyaṃ yo'haṃ krīḍanakastava | kleśairnānāvidhairnityaṃ saṃyojayasi nirghṛṇaḥ | kiṃ naivaṃ jātu puruṣaḥ pareṣāṃ preṣyatāmiyāt
अहो, यह मेरी कैसी मूर्खता है कि मैं तेरा खिलौना बना हुआ हूँ! हे निर्दय, तू मुझे नाना प्रकार के क्लेशों से सदा जोड़े रखता है। नहीं तो क्या कोई पुरुष कभी दूसरों का सेवक बनता?
श्लोक 22 (12.176.22)
न पूर्वे नापरे जातु कामानामन्तमाप्नुवन् । त्यक्त्वा सर्वसमारम्भान्प्रतिबुद्धोऽस्मि जागृमि ॥
na pūrve nāpare jātu kāmānāmantamāpnuvan | tyaktvā sarvasamārambhānpratibuddho'smi jāgṛmi
न पहले के लोग और न बाद के लोग कभी कामनाओं का अन्त पा सके। सब आरम्भ छोड़कर अब मैं जाग उठा हूँ और सजग हूँ।
श्लोक 23 (12.176.23)
नूनं मे हृदयं कामं वज्रसारमयं दृढम् । यदनर्थशताविष्टं शतधा न विदीर्यते ॥
nūnaṃ me hṛdayaṃ kāmaṃ vajrasāramayaṃ dṛḍham | yadanarthaśatāviṣṭaṃ śatadhā na vidīryate
निश्चय ही मेरा हृदय हीरे जैसा कठोर और दृढ़ है, जो सैकड़ों अनर्थों से घिरकर भी सौ टुकड़े नहीं हो जाता।
श्लोक 24 (12.176.24)
त्यजामि काम त्वां चैव यच्च किंचित्प्रियं तव । तवाहं प्रियमन्विच्छन्नात्मन्युपलभे सुखम् ॥
tyajāmi kāma tvāṃ caiva yacca kiṃcitpriyaṃ tava | tavāhaṃ priyamanvicchannātmanyupalabhe sukham
हे काम, मैं तुझे और तुझे जो कुछ प्रिय है, उसे छोड़ता हूँ। तेरी प्रिय वस्तुओं की खोज करके अब मैं अपने भीतर ही सुख पाता हूँ।
श्लोक 25 (12.176.25)
काम जानामि ते मूलं संकल्पात्किल जायसे । न त्वां संकल्पयिष्यामि समूलो न भविष्यसि ॥
kāma jānāmi te mūlaṃ saṃkalpātkila jāyase | na tvāṃ saṃkalpayiṣyāmi samūlo na bhaviṣyasi
हे काम, मैं तेरा मूल जानता हूँ; तू संकल्प से ही उत्पन्न होता है। मैं तेरा संकल्प नहीं करूँगा, तो तू जड़ सहित नष्ट हो जाएगा।
श्लोक 26 (12.176.26)
ईहा धनस्य न सुखा लुब्ध्वा चिन्ता च भूयसी । लब्धनाशो यथा मृत्युर्लब्धं भवति वा न वा ॥
īhā dhanasya na sukhā lubdhvā cintā ca bhūyasī | labdhanāśo yathā mṛtyurlabdhaṃ bhavati vā na vā
धन की चेष्टा सुखद नहीं है; पाने पर चिन्ता और बढ़ जाती है। प्राप्त धन का नाश मृत्यु के समान है, और वह रहे या न रहे, यह निश्चित नहीं।
श्लोक 27 (12.176.27)
परित्यागे न लभते ततो दुःखतरं नु किम् । न च तुष्यति लब्धेन भूय एव च मार्गति ॥
parityāge na labhate tato duḥkhataraṃ nu kim | na ca tuṣyati labdhena bhūya eva ca mārgati
इससे बढ़कर दुःख क्या है कि छूट जाने पर वह फिर नहीं मिलता? और मनुष्य पाए हुए से कभी सन्तुष्ट नहीं होता, और अधिक ढूँढ़ता रहता है।
श्लोक 28 (12.176.28)
अनुतर्षुल एवार्थः स्वादु गाङ्गमिवोदकम् । मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धोऽस्मि संत्यज ॥
anutarṣula evārthaḥ svādu gāṅgamivodakam | madvilāpanametattu pratibuddho'smi saṃtyaja
धन तृष्णा को बढ़ाने वाला ही है, गंगाजल की तरह मीठा लगता है; यह मुझे विलाप कराने वाला है। मैं जाग गया हूँ; मुझे छोड़ दे।
श्लोक 29 (12.176.29)
य इमं मामकं देहं भूतग्रामः समाश्रितः । स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम् ॥
ya imaṃ māmakaṃ dehaṃ bhūtagrāmaḥ samāśritaḥ | sa yātvito yathākāmaṃ vasatāṃ vā yathāsukham
मेरे इस शरीर में जो भूतसमूह आश्रय लिए हुए है, वह इच्छानुसार यहाँ से चला जाए, या सुखपूर्वक ठहरा रहे।
श्लोक 30 (12.176.30)
न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु । तस्मादुत्सृज्य वः सर्वान्सत्वमेवाश्रयाम्यहम् ॥
na yuṣmāsviha me prītiḥ kāmalobhānusāriṣu | tasmādutsṛjya vaḥ sarvānsatvamevāśrayāmyaham
कामना और लोभ के पीछे चलने वाले तुम लोगों से मेरी प्रीति नहीं है; इसलिए तुम सबको छोड़कर मैं सत्त्वगुण का ही आश्रय लेता हूँ।
श्लोक 31 (12.176.31)
सर्वभूतान्यहं देहे पश्यन्मनसि चात्मनः । योगे बुद्धिं श्रुते सत्वं मनो ब्रह्मणि धारयन् ॥
sarvabhūtānyahaṃ dehe paśyanmanasi cātmanaḥ | yoge buddhiṃ śrute satvaṃ mano brahmaṇi dhārayan
अपने शरीर और अपने मन में सब प्राणियों को देखते हुए, योग में बुद्धि, श्रुत में सत्त्व और ब्रह्म में मन को स्थिर करते हुए,
श्लोक 32 (12.176.32)
विहरिष्याम्यनासक्तः सुखी लोकान्निरामयः । यथा मां त्वं पुनर्नैवं दुःखेषु प्रणिधास्यसि ॥
vihariṣyāmyanāsaktaḥ sukhī lokānnirāmayaḥ | yathā māṃ tvaṃ punarnaivaṃ duḥkheṣu praṇidhāsyasi
मैं अनासक्त, सुखी और निरामय होकर लोकों में विचरूँगा, जिससे तू फिर कभी मुझे इस प्रकार दुःखों में नहीं डाल सकेगा।
श्लोक 33 (12.176.33)
त्वया हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते । तृष्णा शोकश्रमाणां हि त्वं काम प्रभवः सदा ॥
tvayā hi me praṇunnasya gatiranyā na vidyate | tṛṣṇā śokaśramāṇāṃ hi tvaṃ kāma prabhavaḥ sadā
तुझसे प्रेरित हुए मेरे लिए और कोई गति नहीं है; हे काम, तृष्णा, शोक और श्रम का उद्गम तू ही है।
श्लोक 34 (12.176.34)
धननाशेऽधिकं दुःखं मन्ये सर्वमहत्तरम् । ज्ञातयो ह्यवमन्यन्ते मित्राणि च धनाच्च्युतम् ॥
dhananāśe'dhikaṃ duḥkhaṃ manye sarvamahattaram | jñātayo hyavamanyante mitrāṇi ca dhanāccyutam
धन का नाश मैं सबसे बड़ा दुःख मानता हूँ; धन से गिरे हुए को बन्धु-बान्धव भी तुच्छ समझते हैं और मित्र भी।
श्लोक 35 (12.176.35)
अवज्ञानसहस्रैस्तु दोषाः कष्टतराऽधने । धने सुखकला या तु साऽपि दुःखैर्विधीयते ॥
avajñānasahasraistu doṣāḥ kaṣṭatarā'dhane | dhane sukhakalā yā tu sā'pi duḥkhairvidhīyate
निर्धन के लिए हज़ारों अपमानों के साथ दोष और भी कष्टदायक होते हैं; और धन में सुख की जो थोड़ी-सी कला है, वह भी दुःखों से ही प्राप्त होती है।
श्लोक 36 (12.176.36)
धनमस्येति पुरुषं पुरो निघ्नन्ति दस्यवः । क्लिश्यन्ति विविधैर्दण्डैर्नित्यमुद्वेजयन्ति च ॥
dhanamasyeti puruṣaṃ puro nighnanti dasyavaḥ | kliśyanti vividhairdaṇḍairnityamudvejayanti ca
'इसके पास धन है', ऐसा सोचकर डाकू पहले उसी पर प्रहार करते हैं; वे तरह-तरह के दण्डों से उसे सताते हैं और सदा भयभीत करते रहते हैं।
श्लोक 37 (12.176.37)
धनलोलुपता दुःखमिति बुद्धं चिरान्मया । यद्यदालम्बसे कामं तत्तदेवानुरुध्यसे ॥
dhanalolupatā duḥkhamiti buddhaṃ cirānmayā | yadyadālambase kāmaṃ tattadevānurudhyase
धन का लोभ दुःख है, यह मैंने बहुत समय बाद जाना। हे काम, तू जिस-जिस वस्तु को पकड़ता है, उसी-उसी के पीछे पड़ जाता है।
श्लोक 38 (12.176.38)
अतत्त्वज्ञोऽसि बालश्च दुस्तोषोऽपूरणोऽनलः । नैव त्वं वेत्थ सुलभं नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम् ॥
atattvajño'si bālaśca dustoṣo'pūraṇo'nalaḥ | naiva tvaṃ vettha sulabhaṃ naiva tvaṃ vettha durlabham
तू तत्त्व को नहीं जानता; तू बालक है, कठिनाई से सन्तुष्ट होने वाला, कभी न भरने वाला, अग्नि के समान है। तू न जानता है कि क्या सुलभ है, न यह कि क्या दुर्लभ।
श्लोक 39 (12.176.39)
पाताल इव दुष्पूरो मां दुःखैर्योक्तुमिच्छसि । नाहमद्य समावेष्टुं शक्यः काम पुनस्त्वया ॥
pātāla iva duṣpūro māṃ duḥkhairyoktumicchasi | nāhamadya samāveṣṭuṃ śakyaḥ kāma punastvayā
पाताल की तरह कभी न भरने वाला तू मुझे दुःखों में जोड़ना चाहता है। हे काम, अब तू फिर मुझे अपने वश में नहीं कर सकता।
श्लोक 40 (12.176.40)
निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद्यदृच्छया । निवृत्तिं परमां प्राप्य नाद्य कामान्विचिन्तये ॥
nirvedamahamāsādya dravyanāśādyadṛcchayā | nivṛttiṃ paramāṃ prāpya nādya kāmānvicintaye
संयोग से धन के नाश के कारण मैं वैराग्य को प्राप्त हुआ हूँ; परम निवृत्ति पाकर अब मैं कामनाओं का चिन्तन नहीं करता।
श्लोक 41 (12.176.41)
अतिक्लेशान्सहामीह नाहं बुद्ध्याम्यबुद्धिमान् । निकृतो धननाशेन शये सर्वाङ्गविज्वरः ॥
atikleśānsahāmīha nāhaṃ buddhyāmyabuddhimān | nikṛto dhananāśena śaye sarvāṅgavijvaraḥ
यहाँ मैं बड़े क्लेश सहता रहा, और मूर्ख होकर समझ न सका। धन के नाश से ठगा गया मैं सब अंगों में ज्वर लिए पड़ा हूँ।
श्लोक 42 (12.176.42)
परित्यजामि काम त्वां हित्वा सर्वं मनोगतम् । न त्वं मया पुनः काम नस्योतेनेव रंस्यसे ॥
parityajāmi kāma tvāṃ hitvā sarvaṃ manogatam | na tvaṃ mayā punaḥ kāma nasyoteneva raṃsyase
हे काम, मन में बसी सब बातों को छोड़कर मैं तुझे त्यागता हूँ। जैसे नाक की रस्सी से बैल को, वैसे तू अब फिर मुझसे नहीं खेल सकेगा।
श्लोक 43 (12.176.43)
क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसितः । द्वेष्यमुक्तः प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम् ॥
kṣamiṣye kṣipamāṇānāṃ na hiṃsiṣye vihiṃsitaḥ | dveṣyamuktaḥ priyaṃ vakṣyāmyanādṛtya tadapriyam
जो मेरी निन्दा करेंगे, उन्हें मैं क्षमा करूँगा; मारे जाने पर भी मैं मारूँगा नहीं। द्वेष से मुक्त होकर मैं प्रिय वचन कहूँगा और अप्रिय बात की उपेक्षा करूँगा।
श्लोक 44 (12.176.44)
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन् । न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ॥
tṛptaḥ svasthendriyo nityaṃ yathālabdhena vartayan | na sakāmaṃ kariṣyāmi tvāmahaṃ śatrumātmanaḥ
तृप्त और स्वस्थ इन्द्रियों वाला होकर, जो मिले उसी से सदा निर्वाह करते हुए, मैं अपने शत्रु तुझ काम की इच्छा कभी पूरी नहीं करूँगा।
श्लोक 45 (12.176.45)
निर्वेदं निर्वृतिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम् । सर्वभूतदयां चैव विद्धि मां शरणागतम् ॥
nirvedaṃ nirvṛtiṃ tṛptiṃ śāntiṃ satyaṃ damaṃ kṣamām | sarvabhūtadayāṃ caiva viddhi māṃ śaraṇāgatam
वैराग्य, सन्तोष, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और सब प्राणियों के प्रति दया, इन्हीं की शरण में आया हुआ मुझे जानो।
श्लोक 46 (12.176.46)
तस्मात्कामश्च लोभश्च तृष्णा कार्पण्यमेव च । त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्वस्थो ह्यस्मि सांप्रतम् ॥
tasmātkāmaśca lobhaśca tṛṣṇā kārpaṇyameva ca | tyajantu māṃ pratiṣṭhantaṃ satvastho hyasmi sāṃpratam
इसलिए काम, लोभ, तृष्णा और कृपणता मुझे छोड़ दें, क्योंकि मैं प्रस्थान कर रहा हूँ; इस समय मैं सत्त्व में स्थित हूँ।
श्लोक 47 (12.176.47)
प्रहाय कामं लोभं च क्रोधं पारुष्यमेव च । नाद्य लोभवशं प्राप्तो दुःखं प्राप्स्याम्यनात्मवान् ॥
prahāya kāmaṃ lobhaṃ ca krodhaṃ pāruṣyameva ca | nādya lobhavaśaṃ prāpto duḥkhaṃ prāpsyāmyanātmavān
काम, लोभ, क्रोध और कठोरता को छोड़कर आज मैं लोभ के वश में नहीं हुआ हूँ; आत्मसंयमहीन की तरह मैं दुःख नहीं पाऊँगा।
श्लोक 48 (12.176.48)
यद्यत्त्यजति कामानां तत्सुखस्याभिपूर्यते । कामस्य वशगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्यते ॥
yadyattyajati kāmānāṃ tatsukhasyābhipūryate | kāmasya vaśago nityaṃ duḥkhameva prapadyate
मनुष्य जितनी-जितनी कामनाओं को छोड़ता है, उतना-उतना सुख उसमें भरता जाता है; जो सदा काम के वश में रहता है, वह दुःख ही पाता है।
श्लोक 49 (12.176.49)
कामानुबन्धं नुदते यत्किंचित्पुरुषो रजः । कामक्रोधोद्भवं दुःखमह्रीररतिरेव च ॥
kāmānubandhaṃ nudate yatkiṃcitpuruṣo rajaḥ | kāmakrodhodbhavaṃ duḥkhamahrīraratireva ca
जो रजोगुण कामना से बँधा है, उसे मनुष्य दूर कर दे; क्योंकि काम और क्रोध से दुःख, निर्लज्जता और अरति उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 50 (12.176.50)
एष ब्रह्मप्रतिष्ठोऽहं ग्रीष्मे शीतमिव ह्रदम् । शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् ॥
eṣa brahmapratiṣṭho'haṃ grīṣme śītamiva hradam | śāmyāmi parinirvāmi sukhamāse ca kevalam
अब मैं ब्रह्म में स्थित हूँ, जैसे ग्रीष्म में कोई शीतल सरोवर में स्थित हो; मैं शान्त हो रहा हूँ, पूर्णतः शीतल हो रहा हूँ और केवल सुख में रहता हूँ।
श्लोक 51 (12.176.51)
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥
yacca kāmasukhaṃ loke yacca divyaṃ mahatsukham | tṛṣṇākṣayasukhasyaite nārhataḥ ṣoḍaśīṃ kalām
संसार में कामजन्य जो सुख है और जो महान् दिव्य सुख है, ये तृष्णा के क्षय से मिलने वाले सुख की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं।
श्लोक 52 (12.176.52)
आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् । प्राप्यावध्यं ब्रह्मपुरं राजेव च वसाम्यहम् ॥
ātmanā saptamaṃ kāmaṃ hatvā śatrumivottamam | prāpyāvadhyaṃ brahmapuraṃ rājeva ca vasāmyaham
सबसे बड़े शत्रु की तरह काम को, स्वयं को सातवाँ गिनते हुए, मारकर मैं अवध्य ब्रह्मपुर में पहुँचकर राजा की तरह वास करता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 53 (12.176.53)
एतां बुद्धिं समास्थाय मङ्किर्निर्वेदमागतः । सर्वान्कामान्परित्यज्य प्राप्य ब्रह्म महत्सुखम् ॥
etāṃ buddhiṃ samāsthāya maṅkirnirvedamāgataḥ | sarvānkāmānparityajya prāpya brahma mahatsukham
इस बुद्धि का आश्रय लेकर मङ्कि वैराग्य को प्राप्त हुआ; उसने सब कामनाएँ छोड़कर ब्रह्म और महान् सुख को पाया।
श्लोक 54 (12.176.54)
दम्यनाशकृते मङ्किरमृतत्वं किलागमत् । अच्छिनत्काममूलं स तेन प्राप परां गतिम् ॥
damyanāśakṛte maṅkiramṛtatvaṃ kilāgamat | acchinatkāmamūlaṃ sa tena prāpa parāṃ gatim
कहते हैं कि दोनों बछड़ों के नाश के कारण मङ्कि ने अमरत्व पा लिया; उसने काम की जड़ काट दी और इसी से परम गति पाई।
श्लोक 55 (12.176.55)
अत्राप्युदाहरन्तीमं श्लोकं मोक्षोपसंहितम् । गीतं विदेहराजेन जनकेन प्रशाम्यता ॥
atrāpyudāharantīmaṃ ślokaṃ mokṣopasaṃhitam | gītaṃ videharājena janakena praśāmyatā
इस विषय में विदेहराज जनक का गाया हुआ, मोक्ष से जुड़ा एक श्लोक भी कहा जाता है, जो उन्होंने शान्त होते हुए गाया था।
जनक उवाच
श्लोक 56 (12.176.56)
अनन्तमिव मे वित्तं यस्य मे नास्ति किंचन । मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन ॥
anantamiva me vittaṃ yasya me nāsti kiṃcana | mithilāyāṃ pradīptāyāṃ na me dahyati kiṃcana
मेरे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी मेरा धन मानो अनन्त है; मिथिला जल रही हो तो भी मेरा कुछ नहीं जलता।
भीष्म उवाच
श्लोक 57 (12.176.57)
अत्रैवोदाहरन्तीमं बोध्यस्य पदसंचयम् । निर्वेदं प्रति विन्यस्तं तं निबोध युधिष्ठिर ॥
atraivodāharantīmaṃ bodhyasya padasaṃcayam | nirvedaṃ prati vinyastaṃ taṃ nibodha yudhiṣṭhira
इसी विषय में बोध्य के वचनों का संग्रह भी कहा जाता है, जो वैराग्य के विषय में कहा गया है। हे युधिष्ठिर, उसे सुनो।
श्लोक 58 (12.176.58)
बोध्यं शान्तमृषिं राजा नाहुषः पर्यपृच्छत । निर्वेदाच्छान्तिमापन्नं शास्त्रप्रज्ञानतर्पितम् ॥
bodhyaṃ śāntamṛṣiṃ rājā nāhuṣaḥ paryapṛcchata | nirvedācchāntimāpannaṃ śāstraprajñānatarpitam
नहुष के पुत्र राजा ने शान्त ऋषि बोध्य से पूछा, जो वैराग्य से शान्ति को प्राप्त थे और शास्त्र के ज्ञान से तृप्त थे।
नाहुष उवाच
श्लोक 59 (12.176.59)
उपदेशं महाप्राज्ञ शमस्योपदिशस्व मे । कां बुद्धिं समनुप्राप्य शान्तश्चरसि निर्वृतः ॥
upadeśaṃ mahāprājña śamasyopadiśasva me | kāṃ buddhiṃ samanuprāpya śāntaścarasi nirvṛtaḥ
हे महाप्राज्ञ, मुझे शान्ति का उपदेश दीजिए। किस बुद्धि को अपनाकर आप शान्त और सन्तुष्ट होकर विचरते हैं?
बोध्य उवाच
श्लोक 60 (12.176.60)
उपदेशेन वर्तामि नानुशास्मीह कंचन । लक्षणं तस्य वक्ष्येऽहं तत्स्वयं परिमृष्यताम् ॥
upadeśena vartāmi nānuśāsmīha kaṃcana | lakṣaṇaṃ tasya vakṣye'haṃ tatsvayaṃ parimṛṣyatām
मैं उपदेश के अनुसार चलता हूँ और यहाँ किसी को उपदेश नहीं देता। मैं उसका लक्षण बताऊँगा; उसे आप स्वयं विचार लें।
श्लोक 61 (12.176.61)
पिङ्गला कुररः सर्पः सारङ्गान्वेषणं वने । इषुकारः कुमारी च षडेते गुरवो मम ॥
piṅgalā kuraraḥ sarpaḥ sāraṅgānveṣaṇaṃ vane | iṣukāraḥ kumārī ca ṣaḍete guravo mama
पिङ्गला, कुरर पक्षी, सर्प, वन में सारंग का अन्वेषण, बाण बनाने वाला और कुमारी, ये छह मेरे गुरु हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 62 (12.176.62)
आशा बलवती राजन्नैराश्यं परमं सुखम् । आशां निराशां कृत्वा तु सुखं स्वपिति पिङ्गला ॥
āśā balavatī rājannairāśyaṃ paramaṃ sukham | āśāṃ nirāśāṃ kṛtvā tu sukhaṃ svapiti piṅgalā
हे राजन्, आशा बलवती है और निराशा परम सुख है; आशा को निराश करके पिङ्गला सुख से सोती है।
श्लोक 63 (12.176.63)
सामिषं कुररं दृष्ट्वा वध्यमानं निरामिषैः । आमिषस्य परित्यागात्कुररः सुखमेधते ॥
sāmiṣaṃ kuraraṃ dṛṣṭvā vadhyamānaṃ nirāmiṣaiḥ | āmiṣasya parityāgātkuraraḥ sukhamedhate
मांस लिए हुए कुरर पक्षी को मांसरहित पक्षी मार रहे थे; मांस छोड़ देने से कुरर सुख से बढ़ा।
श्लोक 64 (12.176.64)
गृहारम्भो हि दुःखाय न सुखाय कदाचन । सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥
gṛhārambho hi duḥkhāya na sukhāya kadācana | sarpaḥ parakṛtaṃ veśma praviśya sukhamedhate
घर बनाना दुःख के लिए है, कभी सुख के लिए नहीं; सर्प दूसरों के बनाए घर में घुसकर सुख से रहता है।
श्लोक 65 (12.176.65)
सुखं जीवन्ति मुनयो भैक्ष्यवृत्तिं समाश्रिताः । अद्रोहेणैव भूतानां सारङ्ग इव पक्षिणः ॥
sukhaṃ jīvanti munayo bhaikṣyavṛttiṃ samāśritāḥ | adroheṇaiva bhūtānāṃ sāraṅga iva pakṣiṇaḥ
भिक्षा से जीवन चलाने वाले मुनि सुख से जीते हैं, सारंग पक्षियों की तरह किसी प्राणी से द्रोह न करके।
श्लोक 66 (12.176.66)
अल्पेभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यो मतिमान्नरः । सर्वतः सारमादद्यात्पुष्पेभ्य इव षट्पदः ॥
alpebhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyo matimānnaraḥ | sarvataḥ sāramādadyātpuṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ
बुद्धिमान मनुष्य छोटे और बड़े सभी शास्त्रों से सब ओर से सार ले ले, जैसे भौंरा फूलों से।
श्लोक 67 (12.176.67)
इषुकारो नरः कश्चिदिषावासक्तमानसः । समीपेनापि गच्छन्तं राजानं नावबुद्धवान् ॥
iṣukāro naraḥ kaścidiṣāvāsaktamānasaḥ | samīpenāpi gacchantaṃ rājānaṃ nāvabuddhavān
एक बाण बनाने वाला मनुष्य बाण में मन लगाए था; पास से ही राजा के निकल जाने पर भी उसे पता न चला।
श्लोक 68 (12.176.68)
बहूनां कलहो नित्यं द्वयोः संकथनं ध्रुवम् । एकाकी विचरिष्यामि कुमारीशङ्खको यथा ॥
bahūnāṃ kalaho nityaṃ dvayoḥ saṃkathanaṃ dhruvam | ekākī vicariṣyāmi kumārīśaṅkhako yathā
बहुतों में सदा कलह रहता है और दो में बातचीत निश्चित है; मैं कुमारी के अकेले शंख-कंकण की तरह अकेला विचरूँगा।