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शान्ति पर्व · अध्याय 177

अजगर-व्रत: प्रह्लाद और मुनि का संवाद

युधिष्ठिर पूछते हैं कि किस आचरण से मनुष्य शोकरहित होकर संसार में विचर सकता है। भीष्म उत्तर में प्रह्लाद और एक शान्त ब्राह्मण का प्राचीन संवाद सुनाते हैं, जो बालक की तरह लाभ-हानि से अछूता विचरता है। मुनि बताता है कि वह प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश को निमित्तहीन देखता है, जो मिल जाए उसी से खाता-सोता है और अजगर-व्रत का पालन करता है; भीष्म इसे सुख का मार्ग बताते हैं।

अध्याय 176अध्याय-सूचीअध्याय 178

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.177.1)

केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वीतशोकश्चरेन्महीम् । किंच कुर्वन्नरो लोके प्राप्नोति गतिमुत्तमाम् ॥

kena vṛttena vṛttajña vītaśokaścarenmahīm | kiṃca kurvannaro loke prāpnoti gatimuttamām

हे आचार के ज्ञाता! किस आचरण से मनुष्य शोक से मुक्त होकर पृथ्वी पर विचर सकता है, और इस लोक में क्या करके वह परम गति पाता है?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.177.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराजगरस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | prahlādasya ca saṃvādaṃ munerājagarasya ca

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं—प्रह्लाद और अजगर-वृत्ति से जीने वाले मुनि का संवाद।

श्लोक 3 (12.177.3)

चरन्तं ब्राह्मणं कंचित्कल्यचित्तमनामयम् । पप्रच्छ राजा प्रह्लादो बुद्धिमान्प्राज्ञसत्तमः ॥

carantaṃ brāhmaṇaṃ kaṃcitkalyacittamanāmayam | papraccha rājā prahlādo buddhimānprājñasattamaḥ

एक ब्राह्मण निर्मल चित्त और निरोग होकर विचर रहा था। बुद्धिमान तथा ज्ञानियों में श्रेष्ठ राजा प्रह्लाद ने उससे प्रश्न किया।

प्रह्लाद उवाच

श्लोक 4 (12.177.4)

स्वस्थः शक्तो मृदुर्दान्तो निर्विधित्सोऽनसूयकः । सुवाग्बहुमतो लोके प्राज्ञश्चरसि बालवत् ॥

svasthaḥ śakto mṛdurdānto nirvidhitso'nasūyakaḥ | suvāgbahumato loke prājñaścarasi bālavat

तुम स्वस्थ, समर्थ, कोमल और संयमी हो; किसी उद्यम की इच्छा से रहित और ईर्ष्या से मुक्त हो; मधुरभाषी हो, संसार में सम्मानित हो और ज्ञानी हो, फिर भी बालक की तरह विचरते हो।

श्लोक 5 (12.177.5)

नैव प्रार्थयसे लाभं नालाभेष्वनुशोचसि । नित्यतृप्त इव ब्रह्मन्न किंचिदिव मन्यसे ॥

naiva prārthayase lābhaṃ nālābheṣvanuśocasi | nityatṛpta iva brahmanna kiṃcidiva manyase

तुम न लाभ चाहते हो, न हानि पर शोक करते हो। हे ब्राह्मण! नित्य तृप्त के समान तुम मानो किसी भी वस्तु को कुछ नहीं गिनते।

श्लोक 6 (12.177.6)

स्रोतसा ह्रियमाणासु प्रजासु विमना इव । धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थ इव लक्ष्यसे ॥

srotasā hriyamāṇāsu prajāsu vimanā iva | dharmakāmārthakāryeṣu kūṭastha iva lakṣyase

जब प्रजा धारा में बही जा रही है, तब तुम मानो उदासीन हो; धर्म, काम और अर्थ के कार्यों में तुम अटल साक्षी की तरह दिखाई देते हो।

श्लोक 7 (12.177.7)

नानुतिष्ठसि धर्मार्थौ न कामे चापि वर्तसे । इन्द्रियार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत् ॥

nānutiṣṭhasi dharmārthau na kāme cāpi vartase | indriyārthānanādṛtya muktaścarasi sākṣivat

तुम न धर्म और अर्थ का अनुष्ठान करते हो, न काम में प्रवृत्त होते हो; इन्द्रियों के विषयों की उपेक्षा करके मुक्त होकर साक्षी की तरह विचरते हो।

श्लोक 8 (12.177.8)

का नु प्रज्ञा श्रुतं वा किं वृत्तिर्वा का नु ते मुने । क्षिप्रमाचक्ष्व मे ब्रह्मञ्श्रेयो यदिह मन्यसे ॥

kā nu prajñā śrutaṃ vā kiṃ vṛttirvā kā nu te mune | kṣipramācakṣva me brahmañśreyo yadiha manyase

हे मुने! तुम्हारी प्रज्ञा क्या है, तुम्हारा शास्त्र-ज्ञान क्या है और तुम्हारी जीवन-वृत्ति क्या है? हे ब्रह्मन्! यहाँ जिसे तुम श्रेयस्कर मानते हो, वह मुझे शीघ्र बताओ।

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.177.9)

अनुयुक्तः स मेधावी लोकधर्मविधानवित् । उवाच श्लक्ष्णया वाचा प्रह्लादमनपार्थया ॥

anuyuktaḥ sa medhāvī lokadharmavidhānavit | uvāca ślakṣṇayā vācā prahlādamanapārthayā

इस प्रकार पूछे जाने पर लोक की रीति को जानने वाले उस बुद्धिमान ने प्रह्लाद से कोमल और सार्थक वाणी में कहा।

मुनिरुवाच

श्लोक 10 (12.177.10)

पश्य प्रह्लाद भूतानामुत्पत्तिमनिमित्ततः । ह्रासं वृद्धिं विनाशं च न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥

paśya prahlāda bhūtānāmutpattimanimittataḥ | hrāsaṃ vṛddhiṃ vināśaṃ ca na prahṛṣye na ca vyathe

हे प्रह्लाद! देखो, प्राणियों की उत्पत्ति बिना किसी निमित्त के होती है, फिर उनका ह्रास, वृद्धि और विनाश भी होता है; मैं न इससे हर्षित होता हूँ, न व्यथित।

श्लोक 11 (12.177.11)

स्वभावादेव संदृश्या वर्तमानाः प्रवृत्तयः । स्वभावनिरताः सर्वाः प्रतिपाद्या न केनचित् ॥

svabhāvādeva saṃdṛśyā vartamānāḥ pravṛttayaḥ | svabhāvaniratāḥ sarvāḥ pratipādyā na kenacit

ये सब प्रवृत्तियाँ स्वभाव से ही चलती दीखती हैं; सभी प्राणी अपने स्वभाव में ही रमे हैं, उन्हें कोई दूसरा मोड़ नहीं सकता।

श्लोक 12 (12.177.12)

पश्य प्रह्लाद संयोगान्विप्रयोगपरायणान् । संचयांश्च विनाशान्तान्न क्वचिद्विदधे मनः ॥

paśya prahlāda saṃyogānviprayogaparāyaṇān | saṃcayāṃśca vināśāntānna kvacidvidadhe manaḥ

हे प्रह्लाद! देखो, संयोग वियोग में समाप्त होते हैं और संचय विनाश में; इसलिए मैं अपना मन कहीं नहीं लगाता।

श्लोक 13 (12.177.13)

अन्तवन्ति च भूतानि गुणयुक्तानि पश्यतः । उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं पर्यायेणोपलक्षये ॥

antavanti ca bhūtāni guṇayuktāni paśyataḥ | utpattinidhanajñasya kiṃ paryāyeṇopalakṣaye

मैं देखता हूँ कि प्राणी नश्वर हैं और गुणों से बँधे हैं, और उनके जन्म तथा मृत्यु को जानता हूँ; फिर एक-एक करके मैं उन पर ध्यान क्यों दूँ?

श्लोक 14 (12.177.14)

जलजानामपि ह्यन्तं पर्यायेणोपलक्षये । महतामपि कायानां सूक्ष्माणां च महोदधौ ॥

jalajānāmapi hyantaṃ paryāyeṇopalakṣaye | mahatāmapi kāyānāṃ sūkṣmāṇāṃ ca mahodadhau

जल में उत्पन्न प्राणियों का, और महासागर के बड़े तथा सूक्ष्म शरीर वालों का भी, मैं क्रम से अन्त होते देखता हूँ।

श्लोक 15 (12.177.15)

जङ्गमस्थावराणां च भूतानामसुराधिप । पार्थिवानामपि व्यक्तं मृत्युं पश्यामि सर्वशः ॥

jaṅgamasthāvarāṇāṃ ca bhūtānāmasurādhipa | pārthivānāmapi vyaktaṃ mṛtyuṃ paśyāmi sarvaśaḥ

हे असुरों के स्वामी! चर और अचर प्राणियों की तथा पृथ्वी पर रहने वाले सभी की मृत्यु को मैं सब ओर स्पष्ट देखता हूँ।

श्लोक 16 (12.177.16)

अन्तरिक्षचराणां च दानवोत्तमपक्षिणाम् । उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि ॥

antarikṣacarāṇāṃ ca dānavottamapakṣiṇām | uttiṣṭhate yathākālaṃ mṛtyurbalavatāmapi

हे दानवश्रेष्ठ! आकाश में विचरने वाले पक्षियों के लिए भी, बलवानों के लिए भी, मृत्यु समय आने पर उठ खड़ी होती है।

श्लोक 17 (12.177.17)

दिवि संचरमाणानि ह्रस्वानि च महान्ति च । ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये ॥

divi saṃcaramāṇāni hrasvāni ca mahānti ca | jyotīṃṣyapi yathākālaṃ patamānāni lakṣaye

आकाश में विचरने वाली छोटी और बड़ी ज्योतियों को भी मैं समय आने पर गिरते देखता हूँ।

श्लोक 18 (12.177.18)

इति भूतानि संपश्यन्ननुषक्तानि मृत्युना । सर्वं सामान्यतो विद्वान्कृतकृत्यः सुखं स्वपे ॥

iti bhūtāni saṃpaśyannanuṣaktāni mṛtyunā | sarvaṃ sāmānyato vidvānkṛtakṛtyaḥ sukhaṃ svape

इस प्रकार सब प्राणियों को मृत्यु से बँधा देखकर और सबको समान जानकर मैं कृतकृत्य ज्ञानी की तरह सुख से सोता हूँ।

श्लोक 19 (12.177.19)

सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लब्धं यदृच्छया । शये पुनरभुञ्जानो दिवसानि बहून्यपि ॥

sumahāntamapi grāsaṃ grase labdhaṃ yadṛcchayā | śaye punarabhuñjāno divasāni bahūnyapi

संयोग से जब बहुत बड़ा ग्रास मिल जाता है, तो उसे खा लेता हूँ; और फिर बिना खाए बहुत दिनों तक भी पड़ा रहता हूँ।

श्लोक 20 (12.177.20)

आशयन्त्यपि मामन्नं पुनर्बहुगुणं बहु । पुनरल्पं पुनस्तोकं पुनर्नैवोपपद्यते ॥

āśayantyapi māmannaṃ punarbahuguṇaṃ bahu | punaralpaṃ punastokaṃ punarnaivopapadyate

कभी लोग मुझे बहुत-सा और उत्तम गुणों वाला अन्न खिलाते हैं, कभी थोड़ा, कभी बहुत ही थोड़ा, और कभी कुछ भी नहीं मिलता।

श्लोक 21 (12.177.21)

कणं कदाचित्खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे । भक्षये शालिमांसानि भक्षांश्चोच्चावचान्पुनः ॥

kaṇaṃ kadācitkhādāmi piṇyākamapi ca grase | bhakṣaye śālimāṃsāni bhakṣāṃścoccāvacānpunaḥ

कभी मैं अन्न के दाने खाता हूँ, कभी खली खा लेता हूँ; कभी चावल और मांस खाता हूँ, और फिर तरह-तरह के ऊँचे-नीचे भोजन भी।

श्लोक 22 (12.177.22)

शये कदाचित्पर्यङ्के भूमावपि पुनः शये । प्रासादे चापि मे शय्या कदाचिदुपपद्यते ॥

śaye kadācitparyaṅke bhūmāvapi punaḥ śaye | prāsāde cāpi me śayyā kadācidupapadyate

कभी मैं पलंग पर सोता हूँ, कभी फिर भूमि पर सोता हूँ, और कभी मुझे महल में भी शय्या मिल जाती है।

श्लोक 23 (12.177.23)

धारयामि च चीराणि शाणक्षौमाजिनानि च । महार्हाणि च वासांसि धारयाम्यहमेकदा ॥

dhārayāmi ca cīrāṇi śāṇakṣaumājināni ca | mahārhāṇi ca vāsāṃsi dhārayāmyahamekadā

मैं कभी चीर, सन के वस्त्र, क्षौम और मृगचर्म पहनता हूँ, और कभी बहुमूल्य वस्त्र भी धारण कर लेता हूँ।

श्लोक 24 (12.177.24)

न सन्निपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छया । प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुध्ये सुदुर्लभम् ॥

na sannipatitaṃ dharmyamupabhogaṃ yadṛcchayā | pratyācakṣe na cāpyenamanurudhye sudurlabham

संयोग से जो धर्मसंगत भोग मिल जाए, उसे मैं ठुकराता नहीं; और जो अत्यन्त दुर्लभ हो, उसके पीछे भी नहीं दौड़ता।

श्लोक 25 (12.177.25)

अचलमनिधनं शिवं विशोकं । शुचिमतुलं विदुषां मते प्रविष्टम् । अनभिमतमसेवितं विमूढै । र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

acalamanidhanaṃ śivaṃ viśokaṃ | śucimatulaṃ viduṣāṃ mate praviṣṭam | anabhimatamasevitaṃ vimūḍhai | rvratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

जो अचल, अनन्त, कल्याणकारी, शोकरहित, पवित्र और अतुलनीय है, ज्ञानियों के मत में स्थित है, मूढ़ों को अप्रिय है और जिसका उन्होंने कभी सेवन नहीं किया—इस अजगर-व्रत का मैं शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 26 (12.177.26)

अचलितमतिरच्युतः स्वधर्मा । त्परिमितसंसरणः परावरज्ञः । विगतभयकषायलोभमोहो । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

acalitamatiracyutaḥ svadharmā | tparimitasaṃsaraṇaḥ parāvarajñaḥ | vigatabhayakaṣāyalobhamoho | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

जिसकी बुद्धि अडिग है, जो अपने धर्म से च्युत नहीं हुआ, जिसका विचरण सीमित है, जो ऊँच-नीच को जानता है और जो भय, राग, लोभ और मोह से रहित है—वह मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 27 (12.177.27)

अनियतफलभक्ष्यभोज्यपेयं । विधिपरिणामविभक्तदेशकालम् । हृदयसुखमसेवितं कदर्यै । र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

aniyataphalabhakṣyabhojyapeyaṃ | vidhipariṇāmavibhaktadeśakālam | hṛdayasukhamasevitaṃ kadaryai | rvratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

जिसमें फल, भक्ष्य, भोज्य और पेय का कोई नियम नहीं, जिसमें देश और काल प्रारब्ध के परिणाम के अनुसार बँटे हैं, जो हृदय को सुख देता है और कृपणों ने जिसका सेवन नहीं किया—इस अजगर-व्रत का मैं शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 28 (12.177.28)

इदमिदमिति तृष्णयाऽभिभूतं । जनमनवाप्तधनं विषीदमानम् । निपुणमनुनिशाम्य तत्त्वबुद्ध्या । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

idamidamiti tṛṣṇayā'bhibhūtaṃ | janamanavāptadhanaṃ viṣīdamānam | nipuṇamanuniśāmya tattvabuddhyā | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

‘यह चाहिए, यह चाहिए’—इस तृष्णा से अभिभूत और धन न पाकर दुखी होते मनुष्य को तत्त्व-बुद्धि से भली-भाँति देखकर मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 29 (12.177.29)

बहुविधमनुदृश्य चार्थहेतोः । कृपणमिहार्यमनार्यमाश्रयं तम् । उपशमरुचिरात्मवान्प्रशान्तो । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

bahuvidhamanudṛśya cārthahetoḥ | kṛpaṇamihāryamanāryamāśrayaṃ tam | upaśamarucirātmavānpraśānto | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

यहाँ धन के लिए दीन मनुष्य को तरह-तरह से कभी श्रेष्ठ, कभी नीच का आश्रय लेते देखकर, शान्ति में रुचि रखने वाला, आत्मसंयमी और प्रशान्त होकर मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 30 (12.177.30)

सुखमसुखमलाभमर्थलाभं । रतिमरतिं मरणं च जीवितं च । विधिनियतमवेक्ष्य तत्त्वतोऽहं । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

sukhamasukhamalābhamarthalābhaṃ | ratimaratiṃ maraṇaṃ ca jīvitaṃ ca | vidhiniyatamavekṣya tattvato'haṃ | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

सुख-दुःख, अलाभ और धन का लाभ, रति-अरति, मरण और जीवन—इन सबको तत्त्वतः विधाता के नियम से बँधा जानकर मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 31 (12.177.31)

अपगतभयरागमोहदर्पो । धृतिमतिबुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः । उपगतफलभोगिनो निशाम्य । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

apagatabhayarāgamohadarpo | dhṛtimatibuddhisamanvitaḥ praśāntaḥ | upagataphalabhogino niśāmya | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

भय, राग, मोह और दर्प से रहित, धैर्य, विवेक और निश्चय से युक्त तथा शान्त होकर, जो फल आए उसी का भोग करने वाले सर्पों (अजगरों) को देखकर मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 32 (12.177.32)

अनियतशयनासनः प्रकृत्या । दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्तः । अपगतफलसंचयः प्रहृष्टो । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

aniyataśayanāsanaḥ prakṛtyā | damaniyamavratasatyaśaucayuktaḥ | apagataphalasaṃcayaḥ prahṛṣṭo | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

स्वभाव से ही जिसका शयन और आसन अनियत है, जो दम, नियम, व्रत, सत्य और शौच से युक्त है, जिसने फलों का संचय त्याग दिया है और जो प्रसन्न है—वह मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 33 (12.177.33)

अपगतमसुखार्थमीहनार्थै । रुपगतबुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थम् । तृषितमनियतं मनो नियन्तुं । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

apagatamasukhārthamīhanārthai | rupagatabuddhiravekṣya cātmasaṃstham | tṛṣitamaniyataṃ mano niyantuṃ | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

दुःख में समाप्त होने वाले प्रयत्नों के उद्देश्यों से विमुख होकर, ज्ञान पाकर और आत्मा में स्थित रहकर, प्यासे और चंचल मन को वश में करने के लिए मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 34 (12.177.34)

न हृदयमनुरुध्यते मनो वा । प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च । तदुभयमुपलक्षयन्निवाहं । व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

na hṛdayamanurudhyate mano vā | priyasukhadurlabhatāmanityatāṃ ca | tadubhayamupalakṣayannivāhaṃ | vratamidamājagaraṃ śuciścarāmi

न मेरा हृदय और न मेरा मन प्रिय सुख की दुर्लभता के पीछे खिंचता है, न उसकी अनित्यता के पीछे; इन दोनों को मानो देखते हुए मैं इस अजगर-व्रत का शुद्ध भाव से पालन करता हूँ।

श्लोक 35 (12.177.35)

बहु कथितमिदं हि बुद्धिमद्भिः । कविभिरपि प्रथयद्भिरात्मकीर्तिम् । इदमिदमिति तत्रतत्र हन्त । स्वपरमतैर्गहनं प्रतर्कयद्भिः ॥

bahu kathitamidaṃ hi buddhimadbhiḥ | kavibhirapi prathayadbhirātmakīrtim | idamidamiti tatratatra hanta | svaparamatairgahanaṃ pratarkayadbhiḥ

बुद्धिमानों ने और अपनी कीर्ति फैलाने वाले कवियों ने इस विषय में बहुत कहा है; जहाँ-तहाँ ‘यह है, यह है’ कहते हुए वे अपने और दूसरों के मतों से इस गहन विषय की अटकल लगाते रहे हैं।

श्लोक 36 (12.177.36)

तदिदमनुनिशाम्य विप्रपातं । पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यैः । अनवसितमनन्तदोषपारं । नृषु विहरामि विनीतदोषतृष्णः ॥

tadidamanuniśāmya viprapātaṃ | pṛthagabhipannamihābudhairmanuṣyaiḥ | anavasitamanantadoṣapāraṃ | nṛṣu viharāmi vinītadoṣatṛṣṇaḥ

अज्ञानी मनुष्यों ने जिस भटकाव को अलग-अलग अपना रखा है, जिसका कोई अन्त नहीं और जिसके दोषों का कोई पार नहीं, उसे देखकर मैं दोष और तृष्णा को वश में किए हुए मनुष्यों के बीच विचरता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 37 (12.177.37)

अजगरचरितं व्रतं महात्मा । य इह नरोऽनुचरेद्विनीतरागः । अपगतभयलोभमोहमन्युः । स खलु सुखी विचरेदिमं विहारम् ॥

ajagaracaritaṃ vrataṃ mahātmā | ya iha naro'nucaredvinītarāgaḥ | apagatabhayalobhamohamanyuḥ | sa khalu sukhī vicaredimaṃ vihāram

जो महात्मा मनुष्य यहाँ आसक्ति को शान्त करके, भय, लोभ, मोह और क्रोध से रहित होकर अजगर के आचरण वाले इस व्रत का पालन करे, वही सचमुच सुखी होकर इस प्रकार के विहार में विचरेगा।

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